Forwarded from सनातन संस्कृत के वीडियो
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चौंक गए ?
यह किसी 3D फ़िल्म का चित्र नहीं बल्कि हमारे प्राचीन मंदिर परिसर का एक हिस्सा है, प्रत्येक वर्ष में एक या दो बार ऐसा होता है जब चंद्रमा इस मंडप के एकदम बीच में आता है । हैरान करने वाली बात है कि ऐसा केवल #कार्तिक_पूर्णिमा के दिन ही होता है ।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की दशा और दिशा को ध्यान में रखकर इस मंडप को बनाना ही प्राचीन भारत के वास्तुकला के उन्नत होने का प्रमाण है ।
साभार
(कोपेश्वर मंदिर, महाराष्ट्र)
यह किसी 3D फ़िल्म का चित्र नहीं बल्कि हमारे प्राचीन मंदिर परिसर का एक हिस्सा है, प्रत्येक वर्ष में एक या दो बार ऐसा होता है जब चंद्रमा इस मंडप के एकदम बीच में आता है । हैरान करने वाली बात है कि ऐसा केवल #कार्तिक_पूर्णिमा के दिन ही होता है ।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की दशा और दिशा को ध्यान में रखकर इस मंडप को बनाना ही प्राचीन भारत के वास्तुकला के उन्नत होने का प्रमाण है ।
साभार
(कोपेश्वर मंदिर, महाराष्ट्र)
फ्रेंड्स ! क्या कोई बता सकता है इसे बनाने में किस तरह की टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल हुआ है ?
यह किसी धातु के स्तम्भ नहीं हैं जिनके पार्ट्स को अलग-अलग आकार देकर वेल्डिंग या अन्य तकनीक से आपस में जोड़ा गया है, बल्कि यह पत्थर के स्तम्भ हैं, और सबसे ज्यादा रोचक बात यह है की प्रत्येक स्तम्भ केवल एक पत्थर से बना है । यह मंदिर इतना प्राचीन है कि इसके निर्माण का निश्चित समय काल ज्ञात नहीं है ।
क्या हमारे पूर्वजों के द्वारा निर्मित ऐसी विरासतें आपको सनातनी होने पर गर्व करने के लिए मजबूर नहीं करती ?
(किराडू मंदिर, राजस्थान, अनुमानतः 11वीं शताब्दी )
यह किसी धातु के स्तम्भ नहीं हैं जिनके पार्ट्स को अलग-अलग आकार देकर वेल्डिंग या अन्य तकनीक से आपस में जोड़ा गया है, बल्कि यह पत्थर के स्तम्भ हैं, और सबसे ज्यादा रोचक बात यह है की प्रत्येक स्तम्भ केवल एक पत्थर से बना है । यह मंदिर इतना प्राचीन है कि इसके निर्माण का निश्चित समय काल ज्ञात नहीं है ।
क्या हमारे पूर्वजों के द्वारा निर्मित ऐसी विरासतें आपको सनातनी होने पर गर्व करने के लिए मजबूर नहीं करती ?
(किराडू मंदिर, राजस्थान, अनुमानतः 11वीं शताब्दी )
इंद्रप्रस्थ का खोया शहर !! दिल्ली में पुराण किला में संस्कृत (1300 सीई) में एक शिलालेख इंद्रप्रस्थ के लोगों को समर्पित बवली के बारे में वार्तालाप मुगल इतिहास की किताब, रजाम नामंद्रंद्र के बारे में बातचीत करती है। लेकिन हमारे इतिहासकारों ने दिल्ली के हिंदू अतीत को नकारते हैं ... क्यों?
विश्व का केवल एक मंदिर जहां भगवान विष्णु की पूजा उसके कुर्मा अवतार में की जाती है।इस मंदिर में 108 एकल पत्थर के स्तंभ हैं जिनमें एक दूसरे से मिलता-जुलता कोई नहीं है.(Srikurmuram Kurmanathaswamy मंदिर, आंध्र प्रदेश)
कंसुआ शिव मंदिर 🚩🚩🚩
कोटा से 6 किमी. दूर कंसुआ महादेव मंदिर आठवीं शताब्दी का माना गया है। इसकी परिक्रमा में कुटिल लिपि का एक लेख मौजूद है। मंदिर के में एक चतुर्मुख शिवलिंग स्थित है। बाहर चबुतरे पर एक शिवलिंग ऐसा भी हैै जो हजारमुखी है।
वैदिक ऋषि कण्व की तपोस्थली कंसुआ शिव मंदिर
वैदिक ऋषि कण्व की तपोस्थली कंसुआ शिव मंदिर की प्राचीनतम और आध्यात्मिक वैभवता के साथ कई ऐसे प्रसंग जुड़े हैं, जिनकी सत्यता प्रामाणिकता इतिहास के पन्नों पर दर्ज है। देश के कुछेक प्राचीनतम धार्मिक स्थलों की सूची में दर्ज कंसुआ धाम शिवालय और इसके आसपास मौजूद सैकडों साल पुरानी पुरासंपदा वह अनमोल धरोहर है, जिस पर इस शहर को गर्व होना चाहिए। दुष्यंत-शकुंतला के प्रणय प्रसंग और उससे जन्मे महाप्रतापी भरत की क्रीड़ा स्थली है यह। वे ही भरत, जिनके नाम पर हमारे देश का नामकरण हुआ। भला इससे बड़ा गौरव और क्या हो सकता है। प्रत्येक शहरवासी का दायित्व है कि वह न केवल इसे सहेजे बल्कि दुनिया को इसके बारे में बताए भी।
‘हमारे माता और पिता अगर बूढ़े हो जाएं, उनके बाल सफेद और दांत गिर जाएं तो क्या हम उनके पास जाना छोड़ देते हैं? तब क्या हम उनके अस्तित्व को नकार देते हैं? बिल्कुल नहीं, बल्कि हम उनकी ज्यादा देखभाल और फिक्र करते हैं। आश्चर्य की बात है कि मेरे नगरवासी यहां की इतिहास प्रसिद्ध महान थाती से अपरिचित हैं। हां, हम चर्चा कर रहे हैं, कोटा स्थित पवित्र कण्वाश्रम तीर्थ की महत्ता की। जिसके नाम पर आज कंसुआ बस्ती बसी हुई है। यह सही है कि आज यह स्थान इसके आसपास गंदगी और टूटफूट से विकृत नजर आता है लेकिन इसके अंतरंग में जो प्राचीनतम भव्य गौरवशाली स्मारक है उसको जानने का कोई प्रयास नहीं करता।
आज की कंसुआ बस्ती जो एक नाले के किनारे बसी हुई है। उसका इतना चौड़ा पाट है कि यह अवश्य कभी कोई नदी रही होगी। यह नदी दक्षिण पश्चिम दिशा से आती हुई जहां पूर्वमुखी होती है, वहीं पर एक प्राचीन मंदिर है। हमारे धर्मग्रंथों में यह कहा जाता है कि जहां नदी पूर्वमुखी होती है वहां बनाए गए मंदिर को तीर्थ माना जाता है। इसलिए इस मंदिर को पुरातनकाल से कंसुआ तीर्थ कहा जाता है। यहां जो प्राचीन शिवमंदिर खड़ा हुआ है इसका निर्माण विक्रमी संवत 795 यानि 738 ईस्वी में हुआ था। इस हिसाब से यह मंदिर 1274 साल पुराना है। कभी किसी आक्रांता द्वारा या हमारी लापरवाही के कारण यह मंदिर भग्न हो गया था और इसका शिखर टूट गया था। बाद में जब इसका पुनरुद्धार किया गया तो छावना (लेंटल) स्तर तक यह मूल मंदिर था और इसका शिखर बाद में बनाया गया। इस मंदिर के दाहिनी दीवार पर एक शिलालेख लगा हुआ है, जिसमें इस मंदिर के निर्माण का उल्लेख हुआ है।
हिंदी के महाकवि जयशंकर प्रसाद ने अपने नाटक ‘चंद्रगुप्तÓ की भूमिका में इस शिलालेख का उल्लेख किया है। इस शिलालेख को कुटिल लिपि में लिखे गए देश के श्रेष्ठतम शिलालेखों में से शीर्ष माना जाता है। शिलालेख में इस स्थान को प्राचीनतम धार्मिक तीर्थस्थल उल्लेखित करने के साथ ही लिखा हुआ है कि यह प्राचीनतम कण्व आश्रम है। इसलिए ही इस स्थान की महत्ता को समझकर चित्तौड़ के राजा धवल मौर्य के सामंत शिवगण ने विक्रमी संवत 795 में इस मंदिर का निर्माण कराया था। शिवगण ब्राह्मण था और उसने शिवमंदिर का निर्माण कराके वैदिक ऋषि महर्षि कण्व के आश्रम को हमेशा के लिए अमर बना दिया। हमारी कोटा नगरी धन्य है, जहां कि वैदिक कालीन महर्षि कण्व ने अपना आश्रम बनाया था। मंदिर का समय समय पर कोटा के हाड़ा वंशीय शासकों ने भी जीर्णोद्धार कराया।
मूर्तिकला की बेजोड़ मिसाल है कंसुआधाम
कंसुआधाम में छावना तक जो मूल मंदिर है, वह आठवीं शताब्दी की मंदिर व मूर्तिकला की बेजोड़ मिसाल है। हमारे स्थापत्य और मंदिर निर्माण में जिन पुरातन शास्त्रसम्मत विधान का उल्लेख है, उसका इस मंदिर निर्माण में पूर्णतया पालन हुआ है। इसकी पत्थरों की पॉलिश मूर्तियों की सुघड़ता भव्य होने के साथ ही बड़ी ही भव्य आकर्षक महसूस होती है। मुख्य मंदिर के सामने जो पंचमुखी शिवलिंग है वह मूर्तिकला का अनुपम उदाहरण है। यूं तो पूरा परिसर शिवलिंग से भरा हुआ है। लगता है हर काल में प्रमुख श्रद्धालुओं ने यहां एक-एक शिवलिंग की स्थापना की होगी। नाले के किनारे चबूतरे पर सहस्त्र शिवलिंग बना हुआ है, जिसमें मुख्य शिवलिंग पर 999 छोटे शिवलिंग उत्कीर्ण हैं।
भरत की जन्मस्थली शोध का विषय
पहले जब हमें ज्ञात था कि देश में केवल यही कोटा का कंसुआ धाम महर्षि कण्व का आश्रम था। तब हम बड़े दावे से कहते थे कि शकुंतला इसी आश्रम में रहती थी और उनकी कोख से भारत के प्रतापी नरेश भरत का जन्म इसी जगह हुआ था। लेकिन अब देश के कुछेक स्थानों से महर्षि कण्व का आश्रम होने के समाचार आने लगे तो हमारे लिए यह शोध का विषय हो गया कि भरत का जन्म किस कण्व आश्रम में हुआ था। शकुंतला का जन्म अजमेर के पुष्कर में महर्षि विश्वामित्र औ
कोटा से 6 किमी. दूर कंसुआ महादेव मंदिर आठवीं शताब्दी का माना गया है। इसकी परिक्रमा में कुटिल लिपि का एक लेख मौजूद है। मंदिर के में एक चतुर्मुख शिवलिंग स्थित है। बाहर चबुतरे पर एक शिवलिंग ऐसा भी हैै जो हजारमुखी है।
वैदिक ऋषि कण्व की तपोस्थली कंसुआ शिव मंदिर
वैदिक ऋषि कण्व की तपोस्थली कंसुआ शिव मंदिर की प्राचीनतम और आध्यात्मिक वैभवता के साथ कई ऐसे प्रसंग जुड़े हैं, जिनकी सत्यता प्रामाणिकता इतिहास के पन्नों पर दर्ज है। देश के कुछेक प्राचीनतम धार्मिक स्थलों की सूची में दर्ज कंसुआ धाम शिवालय और इसके आसपास मौजूद सैकडों साल पुरानी पुरासंपदा वह अनमोल धरोहर है, जिस पर इस शहर को गर्व होना चाहिए। दुष्यंत-शकुंतला के प्रणय प्रसंग और उससे जन्मे महाप्रतापी भरत की क्रीड़ा स्थली है यह। वे ही भरत, जिनके नाम पर हमारे देश का नामकरण हुआ। भला इससे बड़ा गौरव और क्या हो सकता है। प्रत्येक शहरवासी का दायित्व है कि वह न केवल इसे सहेजे बल्कि दुनिया को इसके बारे में बताए भी।
‘हमारे माता और पिता अगर बूढ़े हो जाएं, उनके बाल सफेद और दांत गिर जाएं तो क्या हम उनके पास जाना छोड़ देते हैं? तब क्या हम उनके अस्तित्व को नकार देते हैं? बिल्कुल नहीं, बल्कि हम उनकी ज्यादा देखभाल और फिक्र करते हैं। आश्चर्य की बात है कि मेरे नगरवासी यहां की इतिहास प्रसिद्ध महान थाती से अपरिचित हैं। हां, हम चर्चा कर रहे हैं, कोटा स्थित पवित्र कण्वाश्रम तीर्थ की महत्ता की। जिसके नाम पर आज कंसुआ बस्ती बसी हुई है। यह सही है कि आज यह स्थान इसके आसपास गंदगी और टूटफूट से विकृत नजर आता है लेकिन इसके अंतरंग में जो प्राचीनतम भव्य गौरवशाली स्मारक है उसको जानने का कोई प्रयास नहीं करता।
आज की कंसुआ बस्ती जो एक नाले के किनारे बसी हुई है। उसका इतना चौड़ा पाट है कि यह अवश्य कभी कोई नदी रही होगी। यह नदी दक्षिण पश्चिम दिशा से आती हुई जहां पूर्वमुखी होती है, वहीं पर एक प्राचीन मंदिर है। हमारे धर्मग्रंथों में यह कहा जाता है कि जहां नदी पूर्वमुखी होती है वहां बनाए गए मंदिर को तीर्थ माना जाता है। इसलिए इस मंदिर को पुरातनकाल से कंसुआ तीर्थ कहा जाता है। यहां जो प्राचीन शिवमंदिर खड़ा हुआ है इसका निर्माण विक्रमी संवत 795 यानि 738 ईस्वी में हुआ था। इस हिसाब से यह मंदिर 1274 साल पुराना है। कभी किसी आक्रांता द्वारा या हमारी लापरवाही के कारण यह मंदिर भग्न हो गया था और इसका शिखर टूट गया था। बाद में जब इसका पुनरुद्धार किया गया तो छावना (लेंटल) स्तर तक यह मूल मंदिर था और इसका शिखर बाद में बनाया गया। इस मंदिर के दाहिनी दीवार पर एक शिलालेख लगा हुआ है, जिसमें इस मंदिर के निर्माण का उल्लेख हुआ है।
हिंदी के महाकवि जयशंकर प्रसाद ने अपने नाटक ‘चंद्रगुप्तÓ की भूमिका में इस शिलालेख का उल्लेख किया है। इस शिलालेख को कुटिल लिपि में लिखे गए देश के श्रेष्ठतम शिलालेखों में से शीर्ष माना जाता है। शिलालेख में इस स्थान को प्राचीनतम धार्मिक तीर्थस्थल उल्लेखित करने के साथ ही लिखा हुआ है कि यह प्राचीनतम कण्व आश्रम है। इसलिए ही इस स्थान की महत्ता को समझकर चित्तौड़ के राजा धवल मौर्य के सामंत शिवगण ने विक्रमी संवत 795 में इस मंदिर का निर्माण कराया था। शिवगण ब्राह्मण था और उसने शिवमंदिर का निर्माण कराके वैदिक ऋषि महर्षि कण्व के आश्रम को हमेशा के लिए अमर बना दिया। हमारी कोटा नगरी धन्य है, जहां कि वैदिक कालीन महर्षि कण्व ने अपना आश्रम बनाया था। मंदिर का समय समय पर कोटा के हाड़ा वंशीय शासकों ने भी जीर्णोद्धार कराया।
मूर्तिकला की बेजोड़ मिसाल है कंसुआधाम
कंसुआधाम में छावना तक जो मूल मंदिर है, वह आठवीं शताब्दी की मंदिर व मूर्तिकला की बेजोड़ मिसाल है। हमारे स्थापत्य और मंदिर निर्माण में जिन पुरातन शास्त्रसम्मत विधान का उल्लेख है, उसका इस मंदिर निर्माण में पूर्णतया पालन हुआ है। इसकी पत्थरों की पॉलिश मूर्तियों की सुघड़ता भव्य होने के साथ ही बड़ी ही भव्य आकर्षक महसूस होती है। मुख्य मंदिर के सामने जो पंचमुखी शिवलिंग है वह मूर्तिकला का अनुपम उदाहरण है। यूं तो पूरा परिसर शिवलिंग से भरा हुआ है। लगता है हर काल में प्रमुख श्रद्धालुओं ने यहां एक-एक शिवलिंग की स्थापना की होगी। नाले के किनारे चबूतरे पर सहस्त्र शिवलिंग बना हुआ है, जिसमें मुख्य शिवलिंग पर 999 छोटे शिवलिंग उत्कीर्ण हैं।
भरत की जन्मस्थली शोध का विषय
पहले जब हमें ज्ञात था कि देश में केवल यही कोटा का कंसुआ धाम महर्षि कण्व का आश्रम था। तब हम बड़े दावे से कहते थे कि शकुंतला इसी आश्रम में रहती थी और उनकी कोख से भारत के प्रतापी नरेश भरत का जन्म इसी जगह हुआ था। लेकिन अब देश के कुछेक स्थानों से महर्षि कण्व का आश्रम होने के समाचार आने लगे तो हमारे लिए यह शोध का विषय हो गया कि भरत का जन्म किस कण्व आश्रम में हुआ था। शकुंतला का जन्म अजमेर के पुष्कर में महर्षि विश्वामित्र औ
र अप्सरा मेनका के संसर्ग से हुआ था। पुष्कर से वापस लौटते समय मेनका अपनी नवजात पुत्री शकुंतला को पालन पोषण के लिए कण्व ऋषि के आश्रम के समीप छोड़ गई थी।
कोटा पुष्कर के नजदीक होने से हमारा एक ध्यान यह भी जाता है कि शायद इसी स्थान पर शकुंतला रही हो।
पवित्र स्नान का पुण्य और गोठ का मजा था यहां
कंसुआधाम का स्मारक (शिवालय) तो सुरक्षित है लेकिन बाहर का ऐतिहासिक परिसर गंदगी से अटा है। पुराने समय में यह परिसर कोटा क्षेत्र के लोगों के लिए पवित्र स्नान और गोठ का स्थान था। परिसर के बीच में बहुत ही सुंदर चौकोर कुंड बना हुआ है, जिसमें किसी समय स्वच्छ निर्मल जल भरा रहता था। एक झरने के रूप में यह पानी गिरता था। यह झरना इस नदी के ऊपर बनाए गए बंधे से गिरता था। वहां विपुल जलराशि रहती थी जिससे नाला निरंतर भरता रहता था। बाद में इस तीर्थ स्थली के आसपास अनेक कारखाने लगने और बस्ती की गंदगी से इस जलराशि के जल संग्रहण स्थल को पूरी तरह पाट दिया गया। बरसात के पानी को भी लोग गंदगी डालकर दूषित कर देते हैं जो 12 माह इस जगह भरा रहता है। प्राचीन नदी व नाले का उपयोग खुले शौचालय के रूप में किया जा रहा है। विडंबना है कि प्रशासन इस गौरवमयी तीर्थस्थली के रखरखाव व सौंदर्यीकरण का जिम्मा नहीं निभाता। कुंड के आसपास जो गोठ करने, भोजन बनाने के कक्ष थे वे भी भग्न अवस्था में हैं और उनकी मरम्मत पर कोई ध्यान नहीं देता।
हर हर महादेव...🙏🌺🙏
कोटा पुष्कर के नजदीक होने से हमारा एक ध्यान यह भी जाता है कि शायद इसी स्थान पर शकुंतला रही हो।
पवित्र स्नान का पुण्य और गोठ का मजा था यहां
कंसुआधाम का स्मारक (शिवालय) तो सुरक्षित है लेकिन बाहर का ऐतिहासिक परिसर गंदगी से अटा है। पुराने समय में यह परिसर कोटा क्षेत्र के लोगों के लिए पवित्र स्नान और गोठ का स्थान था। परिसर के बीच में बहुत ही सुंदर चौकोर कुंड बना हुआ है, जिसमें किसी समय स्वच्छ निर्मल जल भरा रहता था। एक झरने के रूप में यह पानी गिरता था। यह झरना इस नदी के ऊपर बनाए गए बंधे से गिरता था। वहां विपुल जलराशि रहती थी जिससे नाला निरंतर भरता रहता था। बाद में इस तीर्थ स्थली के आसपास अनेक कारखाने लगने और बस्ती की गंदगी से इस जलराशि के जल संग्रहण स्थल को पूरी तरह पाट दिया गया। बरसात के पानी को भी लोग गंदगी डालकर दूषित कर देते हैं जो 12 माह इस जगह भरा रहता है। प्राचीन नदी व नाले का उपयोग खुले शौचालय के रूप में किया जा रहा है। विडंबना है कि प्रशासन इस गौरवमयी तीर्थस्थली के रखरखाव व सौंदर्यीकरण का जिम्मा नहीं निभाता। कुंड के आसपास जो गोठ करने, भोजन बनाने के कक्ष थे वे भी भग्न अवस्था में हैं और उनकी मरम्मत पर कोई ध्यान नहीं देता।
हर हर महादेव...🙏🌺🙏
#अद्मयभारत10
चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर
(🙏🏼कृपया सारे फ़ोटो देखे 🙏🏼)
*इस मंदिर को एक बार देखे बिना मृत्यु होना मतलब आप का भारत मे जन्म लेना व्यर्थ है।*
*भारत का गौरव* दुनिया का अजूबा
यह मंदिर कर्नाटक राज्य के हासन ज़िले के बेलूर नामक ऐतिहासिक स्थान पर स्थित हैं।
#यहमंदिरक़रीब900वर्षपुरानाहैं। इस मंदिर का निर्माण होयसल वंश के राजा विष्णुवर्धन द्वारा 1106 से 1117 के बीच करवाया गया था। 1104 में युद्ध जीतने की ख़ुशी में विष्णुवर्धन ने इस मंदिर का निर्माण कार्य शुरू करवाया जो की 1117 में पूरा हुआ।
पुराने दिनों के दौरान, यह "द्वारसमुद्र" के रूप में जाना जाता था, जिसका अर्थ है "समुद्र का द्वार"।
इस मंदिर की कई जगाह इतनी महीन शिल्पकारी है कि जिसे सामान्य आंखों से देख पाना ना मुमकिन है उसे देखने समझने के लिए मेग्नीफाइन ग्लॉस की जरूरत होती है सोचिये ये उस 10वी 11वी सदी के कारीगरों ने बनाया कैसे होगा जबकि मेग्नीफाईन ग्लास की खोज 1296 में इंग्लैंड में हुई है।
आधुनिक दुनिया मे होली की पिचकारी की खोज और पेटेंट 1896 का है पर इस मंदिर के शिल्पों में 10वी 11वी सदी में ही होली में पिचकारी का उपयोग करते हुवे शिल्प है जिन्हें हाली ही में खोजा गया है🙏🏼
चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर
(🙏🏼कृपया सारे फ़ोटो देखे 🙏🏼)
*इस मंदिर को एक बार देखे बिना मृत्यु होना मतलब आप का भारत मे जन्म लेना व्यर्थ है।*
*भारत का गौरव* दुनिया का अजूबा
यह मंदिर कर्नाटक राज्य के हासन ज़िले के बेलूर नामक ऐतिहासिक स्थान पर स्थित हैं।
#यहमंदिरक़रीब900वर्षपुरानाहैं। इस मंदिर का निर्माण होयसल वंश के राजा विष्णुवर्धन द्वारा 1106 से 1117 के बीच करवाया गया था। 1104 में युद्ध जीतने की ख़ुशी में विष्णुवर्धन ने इस मंदिर का निर्माण कार्य शुरू करवाया जो की 1117 में पूरा हुआ।
पुराने दिनों के दौरान, यह "द्वारसमुद्र" के रूप में जाना जाता था, जिसका अर्थ है "समुद्र का द्वार"।
इस मंदिर की कई जगाह इतनी महीन शिल्पकारी है कि जिसे सामान्य आंखों से देख पाना ना मुमकिन है उसे देखने समझने के लिए मेग्नीफाइन ग्लॉस की जरूरत होती है सोचिये ये उस 10वी 11वी सदी के कारीगरों ने बनाया कैसे होगा जबकि मेग्नीफाईन ग्लास की खोज 1296 में इंग्लैंड में हुई है।
आधुनिक दुनिया मे होली की पिचकारी की खोज और पेटेंट 1896 का है पर इस मंदिर के शिल्पों में 10वी 11वी सदी में ही होली में पिचकारी का उपयोग करते हुवे शिल्प है जिन्हें हाली ही में खोजा गया है🙏🏼