ऐतिहासिक मंदिर और उनकी कथा
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प्रम्बानन मंदिर, जावा द्वीप, इंडोनेशिया

*प्रम्बानन मंदिर का इतिहास*

प्राचीन जावा द्वीप पर स्थित प्रम्बानन मंदिर इंडोनेशियाल सबसे बड़ा मंदिर है। मंदिर में प्राप्त एक शिलालेख प्राप्त हुया है जिसके निर्माण का समय 856 ई० बताया गया है और इस शिलालेख को नाम शिवगृह शिलालेख का नाम दिया गया है। शिलालेख के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 9वीं शताब्दी के मध्य हिन्दू संजय राजवंश के शासक राकाई पिकाटन द्वारा किया गया था। उस समय बौद्ध धर्म के मंदिरों में बढ़ोत्तरी होने के कारण ही इस मंदिर का निर्माण किया गया था। राकाई पिकाटन के बाद इस मंदिर का विस्तार लोकपाल और बालीटुंग महासमभू द्वारा किया गया था। परंतु मुख्य शिव मंदिर का पुनर्निर्माण 1953 ई॰ में पूरा हुआ था और इसका उद्घाटन डॉ० सुकर्णो ने किया था।

*प्रम्बानन मंदिर परिसर में कुल 240 मंदिर की सूची निम्नलिखित हैं:*

3 त्रिमूर्ति मंदिर: विष्णु, शिव और ब्रह्मा को समर्पित तीन मुख्य मंदिर।

3 वाहन मंदिर: त्रिमूर्ति मंदिरों के सामने तीन मंदिर, जो प्रत्येक देवताओं के मंदिर में समर्पित हैं गरुड़, नंदी और हंस।

2 अपित मंदिर: उत्तर और दक्षिण की ओर त्रिमूर्ति और वाहन मंदिरों की पंक्तियों के बीच स्थित हैं।

4 केलिर मंदिर: आंतरिक क्षेत्र के चार मुख्य द्वारों दिशाओं पर स्थित चार छोटे मंदिर

4 पटोक मंदिर: आंतरिक क्षेत्र के चार कोनों पर स्थित चार छोटे मंदिर

224 परवारा मंदिर: चार संकेंद्रित वर्ग पंक्तियों में सैकड़ों मंदिरों की व्यवस्था, आंतरिक पंक्ति से बाहरी पंक्ति में मंदिरों की संख्या इस प्रकार है- 44, 52, 60 और 68

*प्रम्बानन मंदिर के बारे में रोचक तथ्य:*

प्रम्बानन परिसर को रारा जोंग्गरंग परिसर के नाम से भी जाना जाता है, जिसका नाम रारा जोंगग्रांग की लोकप्रिय कथा के नाम पर रखा गया है, वर्तमान में यह मंदिर युनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल की सूची में जोड़ा गया है।प्रम्बानन मंदिर परिसर में तीन क्षेत्र हैं, पहला बाहरी क्षेत्र, जो एक आयताकार दीवार द्वारा चिह्नित है। दूसरा मध्य क्षेत्र जिसमें सैकड़ों छोटे मंदिर हैं, और तीसरा सबसे पवित्र आंतरिक क्षेत्र है जिसमें आठ मुख्य मंदिर और आठ छोटे मंदिर हैं।मंदिर का आंतरिक क्षेत्र या केंद्रीय परिसर तीनों क्षेत्रों में सबसे पवित्र है। यह एक चौकोर ऊंचे मंच पर स्थित है, जिसके प्रत्येक चार मुख्य बिंदुओं पर पत्थर के फाटक बने हुए हैं तथा यह परिसर एक चौकोर पत्थर की दीवार से घिरा हुआ है।

प्रम्बानन मंदिर के मुख्य परिसर के अंदर त्रिमूर्ति “तीन रूप” कहे जाने वाले तीन मुख्य मंदिर, जो तीन देवों (भगवान बब्रह्मा, विष्णु और शिव) को समर्पित हैं, बनाए गए हैं।प्रम्बानन रारा जोंग्गरंग परिसर में शिव मंदिर की सबसे ऊंची और सबसे बड़ी संरचना है। मंदिर की संरचना का आकार 47 मीटर ऊंचा और 34 मीटर चौड़ा है।मुख्य मंदिर की सीढ़ियाँ पूर्व की ओर स्थित हैं। शिव मंदिर के पूर्वी द्वार को दो छोटे मंदिरों द्वारा प्रवाहित किया गया है, जो संरक्षक देवताओं, महाकाल और नंदिसवारा को समर्पित है।

मुख्य मंदिर के अंदर पाँच कक्ष हैं जिसमें प्रत्येक दिशा में चार छोटे कक्ष और मंदिर के मध्य भाग में एक बड़ा मुख्य कक्ष है। यह प्रम्बानन मंदिर का सबसे बड़ा परिसर है। इसके अंदर शिव महादेव की तीन मीटर ऊंची प्रतिमा है।इसके अतिरिक्त अन्य तीन छोटे कक्षों में शिव से संबंधित हिंदू देवताओं की मूर्तियाँ हैं जिसमें भगवान शिव की पत्नी पार्वती, ऋषि अगस्त्य और उनके पुत्र गणेश की मूर्तियाँ स्थापित है। अगस्त्य की एक प्रतिमा दक्षिण कक्ष में विराजमान है, पश्चिम कक्ष में गणेश की प्रतिमा है, जबकि उत्तर कक्ष में दुर्गा महिषासुर मर्दिनी के रूप में विराजमान हैं, जिसमें दुर्गा को बैल दानव का वध करते हुए दिखाया गया है।प्रम्बानन मंदिर के अंदर दो अन्य मुख्य तीर्थस्थलों भी मौजूद है, जो भगवान विष्णु तथा ब्रह्मा को समर्पित है। दोनों मंदिरों का की चौड़ाई 20 मीटर और ऊंचाई 33 मीटर है।

मंदिर के अंदर देवताओं के अतिरिक्त उनके वाहनो के मंदिर भी उपस्थित हैं, जिनमें शिव के बैल नंदी, ब्रह्मा के पवित्र हंस और विष्णु के गरुड़ शामिल है। शिव मंदिर के ठीक सामने नंदी मंदिर है और इसके आगे, अन्य मूर्तियाँ भी हैं, चन्द्र देवता की प्रतिमा और सूर्य देवता सूर्य की प्रतिमा भी स्थापित है।भगवान ब्रह्मा के मंदिर के ठीक सामने पवित्र हंस मंदिर है और विष्णु मंदिर के सामने गरुड़ को समर्पित मंदिर है। इसके अलावा गरुड़ पक्षी इंडोनेशिया के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका रखता है, क्योंकि यह इंडोनेशिया के राष्ट्रीय प्रतीक है।

मंदिर के मध्य क्षेत्र में 224 व्यक्तिगत छोटे मंदिरों की चार पंक्तियाँ हैं। लेकिन इनमें से अधिकांश मंदिर खंडहर के रूप में हैं और जिनमें से केवल कुछ मंदिरों का पुनर्निर्माण किया गया है। मंदिरों की ये संकेंद्रित पंक्तियाँ एक समान डिजाइन में बनाई गई थीं। इन मंदिरों को “कैंडि प
ेरवारा” संरक्षक या पूरक मंदिर इमारतें कहा जाता है।

प्रम्बानन मंदिर की वास्तुकला वास्तु शास्त्र पर आधारित विशिष्ट हिंदू वास्तुकला परंपराओं का पालन करती है। मंदिर के डिजाइन में मंडला मंदिर की योजना व्यवस्था और हिंदू मंदिरों के विशिष्ट उच्च विशाल मीनारों को शामिल किया गया था।

प्रम्बानन मंदिर के खोजकर्ताओं को मंदिर के मुख्य केंद्र से पत्थर के कोयले, लकड़ी का कोयला, जले हुए जानवरों की हड्डियों के ढेर और पत्थर के एक ताबूत में तांबे, चारकोल, राख, 20 सिक्के, गहने, कांच, सोने और चांदी के पत्तों के टुकड़े, सीशेल और 12 सोने की पत्तियां प्राप्त हुईं थी।

यह मंदिर हिंदू महाकाव्य रामायण और भागवत पुराण की कहानी को बताते हुए कथा के आधार पर बनाया गया है। तीन मुख्य मंदिरों के चारों ओर गैलरी में आंतरिक बलुस्ट्रैड दीवार के साथ कथा आधार-राहत पैनल उकेरे गए थे। जिसमें तीर्थयात्रियों द्वारा मंदिर परिक्रमा लगाने का विस्तार पूर्वक लेख लिखा हुआ है।

मुख्य मंदिरों की निचली बाहरी दीवार पर उभरे हुए कल्पवृक्ष वृक्षों का चित्रण के साथ एक सिंह की प्रतिमा भी स्थापित है। प्रम्बानन मंदिर परिसर में यह पेड़ विशिष्ट हैं, इसलिए इसे “प्रम्बानन पैनल” भी कहा जाता है।
इसके सामने तो ताजमहल भी पानी भरता है।
इससे खूबसूरत क्या होगा ।

प्रम्बनान मंदिर बनाने वाले ने भी क्या खूब रचा है ना ।
मंदिर को देखिए ये 2000 साल पुराना शिव मंदिर है जिसका बाहर से भी आकर शिवलिंग जैसा है,

उस समय न तो आधुनिक तकनीक थी और न ही कोई मशीने लेकिन कला का बेहतरीन नमूना देखिये।

जब समय मिलता है अपने मंदिरों के बारे में पढ़ता रहता हूँ ।

ये तस्वीर गवाह है हमारे पूर्वजों ने हमे क्या दिया था ।
बस इसे सहेज के रखने की जरूरत है ।

हमारे साथ छल भी तो हुआ है हमे हमेशा पढा दिया गया कि मुगल कला कृतियां सबसे बेहतरीन है ।

हिन्दू को सबसे ज्यादा बर्बाद इस देश की शिक्षा पद्दति ने किया।
हम भूलते जा रहे हैं हमारा इतिहास ये मंदिर शिव जी का है।

ॐ नमः शिवाय
साभार
जिन चित्रकारियों का स्केच बनाना भी आसान नहीं,
उसे पत्थरों पर उकेरा था हमारे पूर्वजों ने।

(होयसलेश्वर मंदिर, कर्नाटक)
*क्या आप जानते हैं, दुनिया की सबसे ऊंचे गणपति की मूर्ति कहाँ हैं*

गणेशजी की सबसे ऊंची मूर्ति की चर्चा करे तो आप सभी सोचेगे कि ऐसी मूर्ति भारत मे ही होगी और वो भी महाराष्ट्र में होगी जो गणपति पूजा का सबसे बडा केन्द्र है लेकिन जब आप से कहा जाए कि वो मूर्ति भारत में नहीं है तो आप अनुमान नही लगा पाएगे कि वो किस देश में हो सकती है।

नेपाल या कम्बोडिया के मुकाबले भला ऐसा कौन देश हो सकता है जो गणेशजी पर इतनी श्रद्धा रखता हो कि उनकी दुनिया मे सबसे ऊंची मूर्ति बना दे ये मूर्ति सदियों पुरानी नहीं है बल्कि 2012 में ही बनकर तैयार हुई है ये मूर्ति बनी है।

*थाइलैंड के ख्लॉन्ग ख्वेन शहर (khlong khwang)* में यहा एक गणेश इंटरनेशनल पार्क बनाया गया है जिसमें कांसे की ये 39 मीटर ऊंची मूर्ति लगाई गई है।

इस मूर्ति को आप ध्यान से देखेंगे तो उनके सर पर कमल का फूल और उसके बीच में ओम बनाया गया है ।इस मूर्ति को कांसे के 854 अलग अलग हिस्सों से मिलाकर बनाया गया है इस मूर्ति समेत पूरे पार्क को बनाने में 2008 से लेकर 2012 तक 4 साल का समय लगा।

थाइलैंड में जिन 4 फलों को पवित्र कार्यों में रखा जाता है वो सभी फल गणेश जी के हाथों में रखे गए है जिनमें से एक है *कटहल* दूसरा *आम* तीसरा *गन्ना* और चौथा *केला* ।

आम को इस इलाके का प्रतीक फल माना जाता है जो समृद्धि का प्रतीक भी है उनके पेट पर एक सांप लपेटा हुआ है सूंड में एक लड्डू है और पैरों में चूहा बैठा है, हाथों पर ब्रेसलेट और पैरों का आभूषण बुद्धिमत्ता की निशानी है।

थाइलैंड में गणेशजी की मान्यता ज्ञान और बुद्धिमत्ता के देवता के तौर पर होती है

अब आपको ये जानने की दिलचस्पी होगी कि इसको आखिर बनवाया किसने है ।इसके लिए आपको वहा की अयोध्या यानी अयुथ्या साम्राज्य के बारे में विस्तार से जानना होगा इस साम्राज्य के तहत चाचोएंगशाओ नाम का एक शहर 1549 में बसाया गया था ।

जहां चाचोएंगशाओ एसोशिएयन नाम की एक संस्था कई तरह के धार्मिक और सामाजिक कार्यों को पूरा कराने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध रहती है। इस एसोसिएशन के प्रेसीडेंट पोल जेन समाचाई वानीशेनी ने ये तय किया था कि विश्व की सबसे ऊंची गणेशजी की मूर्ति यहा लगाई जाएगी और इसके बाद जगह की तलाश शुरू हुई।

उसके बाद पास के ख्लॉन्ग ख्वेन शहर में 40,000 वर्ग मीटर की ये जगह तलाशी गई यहां की मिट्टी काफी उपजाऊ है और पूरी तरह कृषि प्रधान क्षेत्र होने की वजह से भी यही जगह भगवान की मूर्ति की स्थापना के लिए चुनी गई।

पहले यहाँ एक इंटरनेशनल गणेश पार्क बनाया गया फिर उसमें ये मूर्ति लगाई गई ।चाचोएंगशाओ एसोशिएशन ने यहां एक सेंट्रल म्यूजियम भी तैयार किया गया है जो स्थानीय इतिहास को सुरक्षित रखने के उद्धेश्य से बनाया गया था।

इस इलाके मे सदियों तक हिंदू सभ्यता पुष्पित और पल्लवित हुई। पिछले कुछ सालों में केन्द्रीय थाइलैंड मे बैंक पैकोंग नदी के आसपास का ये क्षेत्र सबसे बड़े टूरिस्ट स्पॉट के तौर पर उभरा है।

दरअसल वो लोग एक इंटरनेशनल भगवान की मूर्ति वहां चाहते थे और ऐसे मे गणेशजी के नाम पर सहमति बनी। ये मूर्ति वहा के प्रख्यात मूर्तिविद पिटक चर्लेमलाओ की उत्कृष्ट कारीगरी का नमूना है ।

इस मूर्ति को लेकर एसोसिएशन का दावा है कि ये विश्व की सबसे ऊंची गणेश मूर्ति है और अभी तक किसी ने उनके इस दावे को चुनौती नहीं दी है।
#अदभूत_छटा
एक चमत्कारी दृश्य पूरा आकाश काले बादलों से ढंका हुआ है और सूर्यदेव अपनी आभा बसवेश्वर मंदिर पर बिखेर रहा है..!!

बसवेश्वर मंदिर, गुलबर्गा, कर्नाटक 🚩
🚩🔱

*1000 साल पुराना रहस्यमय भगवान गणेश तीर्थस्थल, छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में एक ढोलकल पहाड़ पर, 3000 फीट की ऊँचाई पर एक घने जंगल के बीच में एक पहाड़ी के ऊपर स्थित है*

पौराणिक कथाओं में
परशुराम और भगवान गणेश के बीच जिस युद्ध का वर्णन है
*वह छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के ढोलकल पहाडिय़ों पर हुआ था।*

यहां आज भी इस बात के प्रमाण मिलते हैं।

यहां समुद्र तल से 2994 फीट ऊंची चोटी पर भगवान गणेश विराजे हुए हैं।

यह कोई नहीं जानता,
*इतनी ऊंचाई पर गणेश की प्रतिमा कैसे पहुंची।*

पुरातत्ववेत्ताओं के मुताबिक यह प्रतिमा 11 वीं सदी की है।
तब यहां नागवंशी राजाओं का शासन था।
*गणेश प्रतिमा के पेट पर नाग का चित्र अंकित है।*

इस आधार पर माना जाता है, इसकी स्थापना नागवंशी राजाओं ने की होगी।

*यह प्रतिमा पूरी तरह सुरक्षित और ललितासन में है।*

हालांकि इतनी ऊंचाई पर ले जाने या इसे बनाने के लिए कौन सी तकनीक अपनाई गई यह रहस्य है।

आर्कियोलॉजिस्ट के मुताबिक पूरे बस्तर में ऐसे प्रतिमा और कहीं नहीं है।

इसलिए यह रहस्य और भी गहरा हो जाता है कि ऐसी एक ही प्रतिमा यहां कहां से आई।

इस घटना को चिरस्थाई बनाने के लिए छिंदक नागवंशी राजाओं ने शिखर पर गणेश की प्रतिमा स्थापति की।

चूंकि परशूराम के फरसे से गणेश का दांत टूटा था, इसलिए पहाड़ी की शिखर के नीचे के गांव का नाम फरसपाल रखा गया।

बगल में कोतवाल पारा गांव है। कोतवाल मतलब रक्षक या पहरेदार।

लोग यहां गणेश को अपने क्षेत्र का रक्षक मानते हैं।


श्री गणेश चतुर्थी की अनंत शुभकामनाएं🙏🙏🙏
हमारे प्राचीन मंदिरों की दीवालों पर कुछ ऐसी नक्काशियाँ हैं जो इस बात की ओर इशारा करती हैं कि हमारे पूर्वजों के पास मिसाइल सहित अन्य विध्वंशक हथियारों की जानकारी थी ।

अमेरिका के वैज्ञानिक रॉबर्ट ओपनहाइमर ने अपनी रिसर्च में ब्रह्मास्त्र को एक परमाणु हथियार माना है, क्योंकि महाभारत में लाखों लोगों के एक साथ मारे जाने का उल्लेख है और यह एक परमाणु हथियार से ही संभव था।

ब्रह्मास्त्र एक दैवीय हथियार था। माना जाता है कि यह अचूक और सबसे भयंकर अस्त्र था। रामायण और महाभारतकाल में यह अस्त्र आज की तरह गिने चुने मॉडर्न देशों की तरह ही केवल कुछ गिने-चुने योद्धाओं के पास ही था।

यहाँ तक कि सिंधु घाटी सभ्यता में हुई रिसर्च में ऐसे कई नगर मिले हैं, जो लगभग 5000 से 7000 ईसापूर्व अस्तित्व में थे। यहां मिले नरकंकालों की स्थिति से पता चलता है कि मानो इन्हें किसी भयंकर प्रहार से मारा गया था। इसके भी सबूत मिले हैं कि यहां किसी काल में भयंकर ऊष्मा और रेडिएशन पैदा हुआ था, जैसा कि किसी परमाणु बम के विस्फोट के बाद पैदा होता है।
क्या कभी आपने सोचा है कि पुराणों में सूर्य के रथ को चलाने वाले 7 घोड़ो की बात क्यों कि गयी है ?

यह बात सच है कि विज्ञान की शिक्षा लेने वाला एक बच्चा भी इस बात से इनकार कर देगा कि सूर्य सात घोड़ो वाले किसी रथ पर सवार है, जबकि पुराणों में वर्णित जिस ज्ञान का मूर्ख और वामपंथी मजाक उड़ाते है उस ज्ञान को केवल एक बुद्धिमान ही समझ सकता है, हमारे वेद और पुराणों में अलंकारों का अत्यधिक प्रयोग हुआ है, सोचिये इन घोड़ो की संख्या 8 या 10 या और कुछ क्यों नहीं बताया गया आखिर 7 ही क्यों ? विज्ञान के अनुसार सूर्य के प्रकाश में सात रंग होते हैं इन्ही सात रंगों को ही घोड़ो की उपमा दी गयी है, रंग रूपी यहीं घोड़े समय के रथ पर सवार होकर अंतरिक्ष में आकाशगंगा की परिक्रमा करते रहते हैं