इसके सामने तो ताजमहल भी पानी भरता है।
इससे खूबसूरत क्या होगा ।
प्रम्बनान मंदिर बनाने वाले ने भी क्या खूब रचा है ना ।
मंदिर को देखिए ये 2000 साल पुराना शिव मंदिर है जिसका बाहर से भी आकर शिवलिंग जैसा है,
उस समय न तो आधुनिक तकनीक थी और न ही कोई मशीने लेकिन कला का बेहतरीन नमूना देखिये।
जब समय मिलता है अपने मंदिरों के बारे में पढ़ता रहता हूँ ।
ये तस्वीर गवाह है हमारे पूर्वजों ने हमे क्या दिया था ।
बस इसे सहेज के रखने की जरूरत है ।
हमारे साथ छल भी तो हुआ है हमे हमेशा पढा दिया गया कि मुगल कला कृतियां सबसे बेहतरीन है ।
हिन्दू को सबसे ज्यादा बर्बाद इस देश की शिक्षा पद्दति ने किया।
हम भूलते जा रहे हैं हमारा इतिहास ये मंदिर शिव जी का है।
ॐ नमः शिवाय
साभार
इससे खूबसूरत क्या होगा ।
प्रम्बनान मंदिर बनाने वाले ने भी क्या खूब रचा है ना ।
मंदिर को देखिए ये 2000 साल पुराना शिव मंदिर है जिसका बाहर से भी आकर शिवलिंग जैसा है,
उस समय न तो आधुनिक तकनीक थी और न ही कोई मशीने लेकिन कला का बेहतरीन नमूना देखिये।
जब समय मिलता है अपने मंदिरों के बारे में पढ़ता रहता हूँ ।
ये तस्वीर गवाह है हमारे पूर्वजों ने हमे क्या दिया था ।
बस इसे सहेज के रखने की जरूरत है ।
हमारे साथ छल भी तो हुआ है हमे हमेशा पढा दिया गया कि मुगल कला कृतियां सबसे बेहतरीन है ।
हिन्दू को सबसे ज्यादा बर्बाद इस देश की शिक्षा पद्दति ने किया।
हम भूलते जा रहे हैं हमारा इतिहास ये मंदिर शिव जी का है।
ॐ नमः शिवाय
साभार
जिन चित्रकारियों का स्केच बनाना भी आसान नहीं,
उसे पत्थरों पर उकेरा था हमारे पूर्वजों ने।
(होयसलेश्वर मंदिर, कर्नाटक)
उसे पत्थरों पर उकेरा था हमारे पूर्वजों ने।
(होयसलेश्वर मंदिर, कर्नाटक)
*क्या आप जानते हैं, दुनिया की सबसे ऊंचे गणपति की मूर्ति कहाँ हैं*
गणेशजी की सबसे ऊंची मूर्ति की चर्चा करे तो आप सभी सोचेगे कि ऐसी मूर्ति भारत मे ही होगी और वो भी महाराष्ट्र में होगी जो गणपति पूजा का सबसे बडा केन्द्र है लेकिन जब आप से कहा जाए कि वो मूर्ति भारत में नहीं है तो आप अनुमान नही लगा पाएगे कि वो किस देश में हो सकती है।
नेपाल या कम्बोडिया के मुकाबले भला ऐसा कौन देश हो सकता है जो गणेशजी पर इतनी श्रद्धा रखता हो कि उनकी दुनिया मे सबसे ऊंची मूर्ति बना दे ये मूर्ति सदियों पुरानी नहीं है बल्कि 2012 में ही बनकर तैयार हुई है ये मूर्ति बनी है।
*थाइलैंड के ख्लॉन्ग ख्वेन शहर (khlong khwang)* में यहा एक गणेश इंटरनेशनल पार्क बनाया गया है जिसमें कांसे की ये 39 मीटर ऊंची मूर्ति लगाई गई है।
इस मूर्ति को आप ध्यान से देखेंगे तो उनके सर पर कमल का फूल और उसके बीच में ओम बनाया गया है ।इस मूर्ति को कांसे के 854 अलग अलग हिस्सों से मिलाकर बनाया गया है इस मूर्ति समेत पूरे पार्क को बनाने में 2008 से लेकर 2012 तक 4 साल का समय लगा।
थाइलैंड में जिन 4 फलों को पवित्र कार्यों में रखा जाता है वो सभी फल गणेश जी के हाथों में रखे गए है जिनमें से एक है *कटहल* दूसरा *आम* तीसरा *गन्ना* और चौथा *केला* ।
आम को इस इलाके का प्रतीक फल माना जाता है जो समृद्धि का प्रतीक भी है उनके पेट पर एक सांप लपेटा हुआ है सूंड में एक लड्डू है और पैरों में चूहा बैठा है, हाथों पर ब्रेसलेट और पैरों का आभूषण बुद्धिमत्ता की निशानी है।
थाइलैंड में गणेशजी की मान्यता ज्ञान और बुद्धिमत्ता के देवता के तौर पर होती है
अब आपको ये जानने की दिलचस्पी होगी कि इसको आखिर बनवाया किसने है ।इसके लिए आपको वहा की अयोध्या यानी अयुथ्या साम्राज्य के बारे में विस्तार से जानना होगा इस साम्राज्य के तहत चाचोएंगशाओ नाम का एक शहर 1549 में बसाया गया था ।
जहां चाचोएंगशाओ एसोशिएयन नाम की एक संस्था कई तरह के धार्मिक और सामाजिक कार्यों को पूरा कराने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध रहती है। इस एसोसिएशन के प्रेसीडेंट पोल जेन समाचाई वानीशेनी ने ये तय किया था कि विश्व की सबसे ऊंची गणेशजी की मूर्ति यहा लगाई जाएगी और इसके बाद जगह की तलाश शुरू हुई।
उसके बाद पास के ख्लॉन्ग ख्वेन शहर में 40,000 वर्ग मीटर की ये जगह तलाशी गई यहां की मिट्टी काफी उपजाऊ है और पूरी तरह कृषि प्रधान क्षेत्र होने की वजह से भी यही जगह भगवान की मूर्ति की स्थापना के लिए चुनी गई।
पहले यहाँ एक इंटरनेशनल गणेश पार्क बनाया गया फिर उसमें ये मूर्ति लगाई गई ।चाचोएंगशाओ एसोशिएशन ने यहां एक सेंट्रल म्यूजियम भी तैयार किया गया है जो स्थानीय इतिहास को सुरक्षित रखने के उद्धेश्य से बनाया गया था।
इस इलाके मे सदियों तक हिंदू सभ्यता पुष्पित और पल्लवित हुई। पिछले कुछ सालों में केन्द्रीय थाइलैंड मे बैंक पैकोंग नदी के आसपास का ये क्षेत्र सबसे बड़े टूरिस्ट स्पॉट के तौर पर उभरा है।
दरअसल वो लोग एक इंटरनेशनल भगवान की मूर्ति वहां चाहते थे और ऐसे मे गणेशजी के नाम पर सहमति बनी। ये मूर्ति वहा के प्रख्यात मूर्तिविद पिटक चर्लेमलाओ की उत्कृष्ट कारीगरी का नमूना है ।
इस मूर्ति को लेकर एसोसिएशन का दावा है कि ये विश्व की सबसे ऊंची गणेश मूर्ति है और अभी तक किसी ने उनके इस दावे को चुनौती नहीं दी है।
गणेशजी की सबसे ऊंची मूर्ति की चर्चा करे तो आप सभी सोचेगे कि ऐसी मूर्ति भारत मे ही होगी और वो भी महाराष्ट्र में होगी जो गणपति पूजा का सबसे बडा केन्द्र है लेकिन जब आप से कहा जाए कि वो मूर्ति भारत में नहीं है तो आप अनुमान नही लगा पाएगे कि वो किस देश में हो सकती है।
नेपाल या कम्बोडिया के मुकाबले भला ऐसा कौन देश हो सकता है जो गणेशजी पर इतनी श्रद्धा रखता हो कि उनकी दुनिया मे सबसे ऊंची मूर्ति बना दे ये मूर्ति सदियों पुरानी नहीं है बल्कि 2012 में ही बनकर तैयार हुई है ये मूर्ति बनी है।
*थाइलैंड के ख्लॉन्ग ख्वेन शहर (khlong khwang)* में यहा एक गणेश इंटरनेशनल पार्क बनाया गया है जिसमें कांसे की ये 39 मीटर ऊंची मूर्ति लगाई गई है।
इस मूर्ति को आप ध्यान से देखेंगे तो उनके सर पर कमल का फूल और उसके बीच में ओम बनाया गया है ।इस मूर्ति को कांसे के 854 अलग अलग हिस्सों से मिलाकर बनाया गया है इस मूर्ति समेत पूरे पार्क को बनाने में 2008 से लेकर 2012 तक 4 साल का समय लगा।
थाइलैंड में जिन 4 फलों को पवित्र कार्यों में रखा जाता है वो सभी फल गणेश जी के हाथों में रखे गए है जिनमें से एक है *कटहल* दूसरा *आम* तीसरा *गन्ना* और चौथा *केला* ।
आम को इस इलाके का प्रतीक फल माना जाता है जो समृद्धि का प्रतीक भी है उनके पेट पर एक सांप लपेटा हुआ है सूंड में एक लड्डू है और पैरों में चूहा बैठा है, हाथों पर ब्रेसलेट और पैरों का आभूषण बुद्धिमत्ता की निशानी है।
थाइलैंड में गणेशजी की मान्यता ज्ञान और बुद्धिमत्ता के देवता के तौर पर होती है
अब आपको ये जानने की दिलचस्पी होगी कि इसको आखिर बनवाया किसने है ।इसके लिए आपको वहा की अयोध्या यानी अयुथ्या साम्राज्य के बारे में विस्तार से जानना होगा इस साम्राज्य के तहत चाचोएंगशाओ नाम का एक शहर 1549 में बसाया गया था ।
जहां चाचोएंगशाओ एसोशिएयन नाम की एक संस्था कई तरह के धार्मिक और सामाजिक कार्यों को पूरा कराने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध रहती है। इस एसोसिएशन के प्रेसीडेंट पोल जेन समाचाई वानीशेनी ने ये तय किया था कि विश्व की सबसे ऊंची गणेशजी की मूर्ति यहा लगाई जाएगी और इसके बाद जगह की तलाश शुरू हुई।
उसके बाद पास के ख्लॉन्ग ख्वेन शहर में 40,000 वर्ग मीटर की ये जगह तलाशी गई यहां की मिट्टी काफी उपजाऊ है और पूरी तरह कृषि प्रधान क्षेत्र होने की वजह से भी यही जगह भगवान की मूर्ति की स्थापना के लिए चुनी गई।
पहले यहाँ एक इंटरनेशनल गणेश पार्क बनाया गया फिर उसमें ये मूर्ति लगाई गई ।चाचोएंगशाओ एसोशिएशन ने यहां एक सेंट्रल म्यूजियम भी तैयार किया गया है जो स्थानीय इतिहास को सुरक्षित रखने के उद्धेश्य से बनाया गया था।
इस इलाके मे सदियों तक हिंदू सभ्यता पुष्पित और पल्लवित हुई। पिछले कुछ सालों में केन्द्रीय थाइलैंड मे बैंक पैकोंग नदी के आसपास का ये क्षेत्र सबसे बड़े टूरिस्ट स्पॉट के तौर पर उभरा है।
दरअसल वो लोग एक इंटरनेशनल भगवान की मूर्ति वहां चाहते थे और ऐसे मे गणेशजी के नाम पर सहमति बनी। ये मूर्ति वहा के प्रख्यात मूर्तिविद पिटक चर्लेमलाओ की उत्कृष्ट कारीगरी का नमूना है ।
इस मूर्ति को लेकर एसोसिएशन का दावा है कि ये विश्व की सबसे ऊंची गणेश मूर्ति है और अभी तक किसी ने उनके इस दावे को चुनौती नहीं दी है।
#अदभूत_छटा
एक चमत्कारी दृश्य पूरा आकाश काले बादलों से ढंका हुआ है और सूर्यदेव अपनी आभा बसवेश्वर मंदिर पर बिखेर रहा है..!!
बसवेश्वर मंदिर, गुलबर्गा, कर्नाटक 🚩
एक चमत्कारी दृश्य पूरा आकाश काले बादलों से ढंका हुआ है और सूर्यदेव अपनी आभा बसवेश्वर मंदिर पर बिखेर रहा है..!!
बसवेश्वर मंदिर, गुलबर्गा, कर्नाटक 🚩
🚩🔱
*1000 साल पुराना रहस्यमय भगवान गणेश तीर्थस्थल, छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में एक ढोलकल पहाड़ पर, 3000 फीट की ऊँचाई पर एक घने जंगल के बीच में एक पहाड़ी के ऊपर स्थित है*
पौराणिक कथाओं में
परशुराम और भगवान गणेश के बीच जिस युद्ध का वर्णन है
*वह छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के ढोलकल पहाडिय़ों पर हुआ था।*
यहां आज भी इस बात के प्रमाण मिलते हैं।
यहां समुद्र तल से 2994 फीट ऊंची चोटी पर भगवान गणेश विराजे हुए हैं।
यह कोई नहीं जानता,
*इतनी ऊंचाई पर गणेश की प्रतिमा कैसे पहुंची।*
पुरातत्ववेत्ताओं के मुताबिक यह प्रतिमा 11 वीं सदी की है।
तब यहां नागवंशी राजाओं का शासन था।
*गणेश प्रतिमा के पेट पर नाग का चित्र अंकित है।*
इस आधार पर माना जाता है, इसकी स्थापना नागवंशी राजाओं ने की होगी।
*यह प्रतिमा पूरी तरह सुरक्षित और ललितासन में है।*
हालांकि इतनी ऊंचाई पर ले जाने या इसे बनाने के लिए कौन सी तकनीक अपनाई गई यह रहस्य है।
आर्कियोलॉजिस्ट के मुताबिक पूरे बस्तर में ऐसे प्रतिमा और कहीं नहीं है।
इसलिए यह रहस्य और भी गहरा हो जाता है कि ऐसी एक ही प्रतिमा यहां कहां से आई।
इस घटना को चिरस्थाई बनाने के लिए छिंदक नागवंशी राजाओं ने शिखर पर गणेश की प्रतिमा स्थापति की।
चूंकि परशूराम के फरसे से गणेश का दांत टूटा था, इसलिए पहाड़ी की शिखर के नीचे के गांव का नाम फरसपाल रखा गया।
बगल में कोतवाल पारा गांव है। कोतवाल मतलब रक्षक या पहरेदार।
लोग यहां गणेश को अपने क्षेत्र का रक्षक मानते हैं।
श्री गणेश चतुर्थी की अनंत शुभकामनाएं🙏🙏🙏
*1000 साल पुराना रहस्यमय भगवान गणेश तीर्थस्थल, छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में एक ढोलकल पहाड़ पर, 3000 फीट की ऊँचाई पर एक घने जंगल के बीच में एक पहाड़ी के ऊपर स्थित है*
पौराणिक कथाओं में
परशुराम और भगवान गणेश के बीच जिस युद्ध का वर्णन है
*वह छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के ढोलकल पहाडिय़ों पर हुआ था।*
यहां आज भी इस बात के प्रमाण मिलते हैं।
यहां समुद्र तल से 2994 फीट ऊंची चोटी पर भगवान गणेश विराजे हुए हैं।
यह कोई नहीं जानता,
*इतनी ऊंचाई पर गणेश की प्रतिमा कैसे पहुंची।*
पुरातत्ववेत्ताओं के मुताबिक यह प्रतिमा 11 वीं सदी की है।
तब यहां नागवंशी राजाओं का शासन था।
*गणेश प्रतिमा के पेट पर नाग का चित्र अंकित है।*
इस आधार पर माना जाता है, इसकी स्थापना नागवंशी राजाओं ने की होगी।
*यह प्रतिमा पूरी तरह सुरक्षित और ललितासन में है।*
हालांकि इतनी ऊंचाई पर ले जाने या इसे बनाने के लिए कौन सी तकनीक अपनाई गई यह रहस्य है।
आर्कियोलॉजिस्ट के मुताबिक पूरे बस्तर में ऐसे प्रतिमा और कहीं नहीं है।
इसलिए यह रहस्य और भी गहरा हो जाता है कि ऐसी एक ही प्रतिमा यहां कहां से आई।
इस घटना को चिरस्थाई बनाने के लिए छिंदक नागवंशी राजाओं ने शिखर पर गणेश की प्रतिमा स्थापति की।
चूंकि परशूराम के फरसे से गणेश का दांत टूटा था, इसलिए पहाड़ी की शिखर के नीचे के गांव का नाम फरसपाल रखा गया।
बगल में कोतवाल पारा गांव है। कोतवाल मतलब रक्षक या पहरेदार।
लोग यहां गणेश को अपने क्षेत्र का रक्षक मानते हैं।
श्री गणेश चतुर्थी की अनंत शुभकामनाएं🙏🙏🙏
हमारे प्राचीन मंदिरों की दीवालों पर कुछ ऐसी नक्काशियाँ हैं जो इस बात की ओर इशारा करती हैं कि हमारे पूर्वजों के पास मिसाइल सहित अन्य विध्वंशक हथियारों की जानकारी थी ।
अमेरिका के वैज्ञानिक रॉबर्ट ओपनहाइमर ने अपनी रिसर्च में ब्रह्मास्त्र को एक परमाणु हथियार माना है, क्योंकि महाभारत में लाखों लोगों के एक साथ मारे जाने का उल्लेख है और यह एक परमाणु हथियार से ही संभव था।
ब्रह्मास्त्र एक दैवीय हथियार था। माना जाता है कि यह अचूक और सबसे भयंकर अस्त्र था। रामायण और महाभारतकाल में यह अस्त्र आज की तरह गिने चुने मॉडर्न देशों की तरह ही केवल कुछ गिने-चुने योद्धाओं के पास ही था।
यहाँ तक कि सिंधु घाटी सभ्यता में हुई रिसर्च में ऐसे कई नगर मिले हैं, जो लगभग 5000 से 7000 ईसापूर्व अस्तित्व में थे। यहां मिले नरकंकालों की स्थिति से पता चलता है कि मानो इन्हें किसी भयंकर प्रहार से मारा गया था। इसके भी सबूत मिले हैं कि यहां किसी काल में भयंकर ऊष्मा और रेडिएशन पैदा हुआ था, जैसा कि किसी परमाणु बम के विस्फोट के बाद पैदा होता है।
अमेरिका के वैज्ञानिक रॉबर्ट ओपनहाइमर ने अपनी रिसर्च में ब्रह्मास्त्र को एक परमाणु हथियार माना है, क्योंकि महाभारत में लाखों लोगों के एक साथ मारे जाने का उल्लेख है और यह एक परमाणु हथियार से ही संभव था।
ब्रह्मास्त्र एक दैवीय हथियार था। माना जाता है कि यह अचूक और सबसे भयंकर अस्त्र था। रामायण और महाभारतकाल में यह अस्त्र आज की तरह गिने चुने मॉडर्न देशों की तरह ही केवल कुछ गिने-चुने योद्धाओं के पास ही था।
यहाँ तक कि सिंधु घाटी सभ्यता में हुई रिसर्च में ऐसे कई नगर मिले हैं, जो लगभग 5000 से 7000 ईसापूर्व अस्तित्व में थे। यहां मिले नरकंकालों की स्थिति से पता चलता है कि मानो इन्हें किसी भयंकर प्रहार से मारा गया था। इसके भी सबूत मिले हैं कि यहां किसी काल में भयंकर ऊष्मा और रेडिएशन पैदा हुआ था, जैसा कि किसी परमाणु बम के विस्फोट के बाद पैदा होता है।
क्या कभी आपने सोचा है कि पुराणों में सूर्य के रथ को चलाने वाले 7 घोड़ो की बात क्यों कि गयी है ?
यह बात सच है कि विज्ञान की शिक्षा लेने वाला एक बच्चा भी इस बात से इनकार कर देगा कि सूर्य सात घोड़ो वाले किसी रथ पर सवार है, जबकि पुराणों में वर्णित जिस ज्ञान का मूर्ख और वामपंथी मजाक उड़ाते है उस ज्ञान को केवल एक बुद्धिमान ही समझ सकता है, हमारे वेद और पुराणों में अलंकारों का अत्यधिक प्रयोग हुआ है, सोचिये इन घोड़ो की संख्या 8 या 10 या और कुछ क्यों नहीं बताया गया आखिर 7 ही क्यों ? विज्ञान के अनुसार सूर्य के प्रकाश में सात रंग होते हैं इन्ही सात रंगों को ही घोड़ो की उपमा दी गयी है, रंग रूपी यहीं घोड़े समय के रथ पर सवार होकर अंतरिक्ष में आकाशगंगा की परिक्रमा करते रहते हैं
यह बात सच है कि विज्ञान की शिक्षा लेने वाला एक बच्चा भी इस बात से इनकार कर देगा कि सूर्य सात घोड़ो वाले किसी रथ पर सवार है, जबकि पुराणों में वर्णित जिस ज्ञान का मूर्ख और वामपंथी मजाक उड़ाते है उस ज्ञान को केवल एक बुद्धिमान ही समझ सकता है, हमारे वेद और पुराणों में अलंकारों का अत्यधिक प्रयोग हुआ है, सोचिये इन घोड़ो की संख्या 8 या 10 या और कुछ क्यों नहीं बताया गया आखिर 7 ही क्यों ? विज्ञान के अनुसार सूर्य के प्रकाश में सात रंग होते हैं इन्ही सात रंगों को ही घोड़ो की उपमा दी गयी है, रंग रूपी यहीं घोड़े समय के रथ पर सवार होकर अंतरिक्ष में आकाशगंगा की परिक्रमा करते रहते हैं
अपनी पहचान को तलाशती हमारी एक वीरान विरासत..
लेटराइट पत्थरों से बना यह तालाब दुनिया में अपनी तरह का एकमात्र तालाब है । इस तालाब में आश्चर्यजनक तरीके से तुला संक्रांति के दिन कावेरी का पानी प्रवेश करता है जिसकी वजह से यह हमेशा पवित्र पानी से भरा रहता है, फ्रेंड्स इस पवित्र स्थान श्रीराम और लक्ष्मण जी लंका जाते वक्त कुछ समय के लिए ठहरे थे ।
(श्री पेरालास्सेरी मंदिर, केरल)
लेटराइट पत्थरों से बना यह तालाब दुनिया में अपनी तरह का एकमात्र तालाब है । इस तालाब में आश्चर्यजनक तरीके से तुला संक्रांति के दिन कावेरी का पानी प्रवेश करता है जिसकी वजह से यह हमेशा पवित्र पानी से भरा रहता है, फ्रेंड्स इस पवित्र स्थान श्रीराम और लक्ष्मण जी लंका जाते वक्त कुछ समय के लिए ठहरे थे ।
(श्री पेरालास्सेरी मंदिर, केरल)