ऐतिहासिक मंदिर और उनकी कथा
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वैज्ञानिक नहीं पता लगा पा रहे गंगाजल का रहस्य...

फ्रास के प्रसिद्ध डा0 डी हेरेल ने जब गंगाजल की इतनी प्रशंसा सुनी तो वे भारत आये और गंगाजल का वैज्ञानिक परीक्षण किया ।
उन्होने पाया कि इस जल में संक्रामक रोगों के कीटाणुओं की जबरजस्त शक्ति है। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि एक गिलास में किसी नदी या कुएं का पानी लें‚ जिसमें कोई कीटाणु नाशक तत्व नहो‚ उसमें गंगाजल मिला देने पर उसमें कृमिनाशक सामर्थ्य आ जाती है । इससे सिद्ध होता है कि गंगाजी में कोई ऐसा तत्व है जो किसी मिश्रण वाले जल को भी अपने ही समान बना लेता है । यही कारण 1557 मील लम्बी गंगाजी में गोमती‚घाघरा ‚ यमुना ‚सेन ‚ पर उसकी कृमिनाशक क्षमता अक्षृण्ण बनी रही। यह एक प्रकार का चमत्कार ही है।

डा0 डी हेरेल ने अपने प्रयोगो में सिद्ध कर दिया कि इस जल में टी0बी0 अतिसार ‚ संग्रहणी‚ ब्रण‚ हैजा के जीवाणुओं को मारने की शक्ति विद्यमान है ।

डा0 केहिमान ने लिखा है– ʺकिसी की शक्ति जवाब देने लगे तो उस समय उसे गंगाजल दिया जाये तो आश्चर्यजनक ढंग से जीवनी शक्ति बढती और रोगी का ऐसा लगता है कि उसके भीतर किसी सात्विक आनन्द का स्त्रोत फूट रहा है।ʺडा0 हेनकेन आगरा में गवर्नमंण्ट सा
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सौ साल बनने में लगे तोड़ने में तीन सौ साल लग गये #विदिशा_के_विजय_मंदिर को जो तीन सौ फ़िट ऊँचा था।मुग़ल इतिहासकार अलबरूनी ने लिखा है कि यह मंदिर 100 गज ऊँचा था और मीलों दूर से इसका शिखर दिखाई देता था।

तीन सौ साल के ध्वंस के बाद भी जब दीवारें नहीं टूटी तब औरंगज़ेब ने इसे तोप के गोलों से उड़ाने का आदेश दिया। मंदिर को ध्वस्त कर इस विशाल मंदिर के मलवे से ही आलमगीरी मस्जिद का निर्माण कर दिया गया और शहर का नाम भी विदिशा से आलमगीरपुर कर दिया गया।

नब्बे के दशक में तेज बारिश से मस्जिद का मसला धसका और मंदिर का आधार सामने आया भारतीय पुरातत्व ने खुदाई की तब इस एक हज़ार साल पुराने मंदिर से जुड़े तथ्य और अभिलेख प्राप्त हुये। उत्खनन का विरोध हुआ और काम रोक दिया गया।तब से यही स्थिति है इस मंदिर की।

विध्वंस के अवशेष एक किलोमीटर के दायरे में जगह-जगह आज भी बिखरे पड़े हैं।कभी आईये और देखिये कि इतिहास की हत्या यहाँ कितनी बेरहमी से हुई हम नहीं कहेंगे, कहेंगे इस परिसर में फैले पड़े ध्वंस के बाद के अवशेष जो अपनी कहानी खुद बयां करने में पूरी तरह सक्षम है।

🚩🚩🚩सनातन धर्म की जय हो🚩🚩🚩
वामपंथियों ने सनातनियों की इस कला को इतिहास मे कोई स्थान नहीं दिया लेकिन आज के तकनीकी युग मे भी क्या हमारे पूर्वजों की शिल्पकला की बराबरी की जा सकती है?
रोम या एथेंस नहीं Srirangam swami ki pavitra bhoomi hai
Tamilnadu
यह किसी जीवित नर्तकी का पैर नहीं है
मित्रों क्या आप विश्वास करेंगे यह एक पत्थर की प्रतिमा है ?
हाँ ..इसे 900 साल पहले सनातनियों ने तराशा था, जब तक आप इसे स्पर्श नहीं करते तब तक यह किसी जीवित नर्तकी के पैर प्रतीत होते हैं ।
सच में हमारी प्राचीन सभ्यता का मुकाबला दुनियाँ की कोई सभ्यता नहीं कर सकती ।
#चेन्नकेशवा_मंदिर_बेलूर_कर्नाटक_भारतवर्ष
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*फैशन क्या होता है..ये हमसे पूछो ।*

प्रतिमाओं को ध्यान से देखिये एक प्रतिमा में महिला अपनी आंखों में काजल लगा रही है और पास की ही छोटी प्रतिमा में एक महिला ने पर्स लिया है, अगली बार जब आप किसी को काजल लगाते हुए देखना तो याद रखना की इस फैशन की शुरुआत हजारों वर्ष पहले सनातनियों ने ही की थी ।

(खजुराहो मंदिर, मध्यप्रदेश)
lost temples of world
*🛕जगदीश मंदिर, उदयपुर*

*🔶इसका निर्माण महाराणा जगत सिंह ने 1651 में करवाया था , उस समय उदयपुर मेवाड़ की राजधानी था। यह मंदिर लगभग 400 वर्ष पुराना है यह उदयपुर का सबसे बड़ा मंदिर है । मंदिर में प्रतिष्ठापित चार हाथ वाली विष्णु की छवि काले पत्थर से बनी है।*

*🔶 यह मंदिर 50 कलात्मक खंभों पर टिका है। मंदिर में भगवान जगन्नाथ का श्रृंगार अति सुंदर है। मंदिर के द्वारपाल के रूप में सीढ़ियों के पास दो हाथियों की मूर्तियां तैनात है।*

*🔶खंभों पर विभिन्न छोटी-छोटी शिल्प कलाकृतियाँ है जिन्हें देखकर लगता है मानो ये कोई कहानी कह रही हो । मंदिर के अंदर लगे शिलालेख हमें इतिहास के बारे में बहुत कुछ बताते हैं।*
तमिलनाडु से 60 किलोमीटर कन्याकुमारी की ओर
सुचिन्द्रम गोपुरम का यह सिर्फ ऊपर का हिस्सा है। है ना अद्भुत अद्वितीय कलाकारी?? कुछ तो विशेष तकनीक रही होगी हमारे पूर्वजों के पास जिसे फिर से प्राप्त करने की कोशिश हमारी होनी चाहिए।
बाकी तो वामपंथी इतिहासकारों ने अकबर महान और ताजमहल को सर्वश्रेष्ठ कृति बताया है जबकि हम देखे तो हमारे पुराने मंदिर एक विराट धरोवर को संजोए हुए है। गर्व है हमें उन शिल्पकारों पर जिन्होंने इतने जीवंत कलाकृतियों से हमें संजोया है।