Forwarded from श्रीमद्भागवत कथा मूल पाठ
🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे गोविंद* 🙏🏻🌹
🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे* 🙏🏻🌹
*📖श्रीमद्भागवत कथा मूल पाठ📖*
*कुल भाग* ➡️2️⃣9️⃣6️⃣
*आज का भाग* ⬇️⬇️
*42._Vaarha_Avtar_Ki_Katha*
ऑडियो-📀🕰➡10.02
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*🙏🏻🌹 हरे कृष्णा 🙏🏻🌹*
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श्रीमद्भागवत कथा मूल पाठ
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सौ साल बनने में लगे तोड़ने में तीन सौ साल लग गये #विदिशा_के_विजय_मंदिर को जो तीन सौ फ़िट ऊँचा था।मुग़ल इतिहासकार अलबरूनी ने लिखा है कि यह मंदिर 100 गज ऊँचा था और मीलों दूर से इसका शिखर दिखाई देता था।
तीन सौ साल के ध्वंस के बाद भी जब दीवारें नहीं टूटी तब औरंगज़ेब ने इसे तोप के गोलों से उड़ाने का आदेश दिया। मंदिर को ध्वस्त कर इस विशाल मंदिर के मलवे से ही आलमगीरी मस्जिद का निर्माण कर दिया गया और शहर का नाम भी विदिशा से आलमगीरपुर कर दिया गया।
नब्बे के दशक में तेज बारिश से मस्जिद का मसला धसका और मंदिर का आधार सामने आया भारतीय पुरातत्व ने खुदाई की तब इस एक हज़ार साल पुराने मंदिर से जुड़े तथ्य और अभिलेख प्राप्त हुये। उत्खनन का विरोध हुआ और काम रोक दिया गया।तब से यही स्थिति है इस मंदिर की।
विध्वंस के अवशेष एक किलोमीटर के दायरे में जगह-जगह आज भी बिखरे पड़े हैं।कभी आईये और देखिये कि इतिहास की हत्या यहाँ कितनी बेरहमी से हुई हम नहीं कहेंगे, कहेंगे इस परिसर में फैले पड़े ध्वंस के बाद के अवशेष जो अपनी कहानी खुद बयां करने में पूरी तरह सक्षम है।
🚩🚩🚩सनातन धर्म की जय हो🚩🚩🚩
तीन सौ साल के ध्वंस के बाद भी जब दीवारें नहीं टूटी तब औरंगज़ेब ने इसे तोप के गोलों से उड़ाने का आदेश दिया। मंदिर को ध्वस्त कर इस विशाल मंदिर के मलवे से ही आलमगीरी मस्जिद का निर्माण कर दिया गया और शहर का नाम भी विदिशा से आलमगीरपुर कर दिया गया।
नब्बे के दशक में तेज बारिश से मस्जिद का मसला धसका और मंदिर का आधार सामने आया भारतीय पुरातत्व ने खुदाई की तब इस एक हज़ार साल पुराने मंदिर से जुड़े तथ्य और अभिलेख प्राप्त हुये। उत्खनन का विरोध हुआ और काम रोक दिया गया।तब से यही स्थिति है इस मंदिर की।
विध्वंस के अवशेष एक किलोमीटर के दायरे में जगह-जगह आज भी बिखरे पड़े हैं।कभी आईये और देखिये कि इतिहास की हत्या यहाँ कितनी बेरहमी से हुई हम नहीं कहेंगे, कहेंगे इस परिसर में फैले पड़े ध्वंस के बाद के अवशेष जो अपनी कहानी खुद बयां करने में पूरी तरह सक्षम है।
🚩🚩🚩सनातन धर्म की जय हो🚩🚩🚩
वामपंथियों ने सनातनियों की इस कला को इतिहास मे कोई स्थान नहीं दिया लेकिन आज के तकनीकी युग मे भी क्या हमारे पूर्वजों की शिल्पकला की बराबरी की जा सकती है?
रोम या एथेंस नहीं Srirangam swami ki pavitra bhoomi hai
Tamilnadu
Tamilnadu
यह किसी जीवित नर्तकी का पैर नहीं है
मित्रों क्या आप विश्वास करेंगे यह एक पत्थर की प्रतिमा है ?
हाँ ..इसे 900 साल पहले सनातनियों ने तराशा था, जब तक आप इसे स्पर्श नहीं करते तब तक यह किसी जीवित नर्तकी के पैर प्रतीत होते हैं ।
सच में हमारी प्राचीन सभ्यता का मुकाबला दुनियाँ की कोई सभ्यता नहीं कर सकती ।
#चेन्नकेशवा_मंदिर_बेलूर_कर्नाटक_भारतवर्ष
मित्रों क्या आप विश्वास करेंगे यह एक पत्थर की प्रतिमा है ?
हाँ ..इसे 900 साल पहले सनातनियों ने तराशा था, जब तक आप इसे स्पर्श नहीं करते तब तक यह किसी जीवित नर्तकी के पैर प्रतीत होते हैं ।
सच में हमारी प्राचीन सभ्यता का मुकाबला दुनियाँ की कोई सभ्यता नहीं कर सकती ।
#चेन्नकेशवा_मंदिर_बेलूर_कर्नाटक_भारतवर्ष
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*फैशन क्या होता है..ये हमसे पूछो ।*
प्रतिमाओं को ध्यान से देखिये एक प्रतिमा में महिला अपनी आंखों में काजल लगा रही है और पास की ही छोटी प्रतिमा में एक महिला ने पर्स लिया है, अगली बार जब आप किसी को काजल लगाते हुए देखना तो याद रखना की इस फैशन की शुरुआत हजारों वर्ष पहले सनातनियों ने ही की थी ।
(खजुराहो मंदिर, मध्यप्रदेश)
lost temples of world
*फैशन क्या होता है..ये हमसे पूछो ।*
प्रतिमाओं को ध्यान से देखिये एक प्रतिमा में महिला अपनी आंखों में काजल लगा रही है और पास की ही छोटी प्रतिमा में एक महिला ने पर्स लिया है, अगली बार जब आप किसी को काजल लगाते हुए देखना तो याद रखना की इस फैशन की शुरुआत हजारों वर्ष पहले सनातनियों ने ही की थी ।
(खजुराहो मंदिर, मध्यप्रदेश)
lost temples of world
*🛕जगदीश मंदिर, उदयपुर*
*🔶इसका निर्माण महाराणा जगत सिंह ने 1651 में करवाया था , उस समय उदयपुर मेवाड़ की राजधानी था। यह मंदिर लगभग 400 वर्ष पुराना है यह उदयपुर का सबसे बड़ा मंदिर है । मंदिर में प्रतिष्ठापित चार हाथ वाली विष्णु की छवि काले पत्थर से बनी है।*
*🔶 यह मंदिर 50 कलात्मक खंभों पर टिका है। मंदिर में भगवान जगन्नाथ का श्रृंगार अति सुंदर है। मंदिर के द्वारपाल के रूप में सीढ़ियों के पास दो हाथियों की मूर्तियां तैनात है।*
*🔶खंभों पर विभिन्न छोटी-छोटी शिल्प कलाकृतियाँ है जिन्हें देखकर लगता है मानो ये कोई कहानी कह रही हो । मंदिर के अंदर लगे शिलालेख हमें इतिहास के बारे में बहुत कुछ बताते हैं।*
*🔶इसका निर्माण महाराणा जगत सिंह ने 1651 में करवाया था , उस समय उदयपुर मेवाड़ की राजधानी था। यह मंदिर लगभग 400 वर्ष पुराना है यह उदयपुर का सबसे बड़ा मंदिर है । मंदिर में प्रतिष्ठापित चार हाथ वाली विष्णु की छवि काले पत्थर से बनी है।*
*🔶 यह मंदिर 50 कलात्मक खंभों पर टिका है। मंदिर में भगवान जगन्नाथ का श्रृंगार अति सुंदर है। मंदिर के द्वारपाल के रूप में सीढ़ियों के पास दो हाथियों की मूर्तियां तैनात है।*
*🔶खंभों पर विभिन्न छोटी-छोटी शिल्प कलाकृतियाँ है जिन्हें देखकर लगता है मानो ये कोई कहानी कह रही हो । मंदिर के अंदर लगे शिलालेख हमें इतिहास के बारे में बहुत कुछ बताते हैं।*
तमिलनाडु से 60 किलोमीटर कन्याकुमारी की ओर
सुचिन्द्रम गोपुरम का यह सिर्फ ऊपर का हिस्सा है। है ना अद्भुत अद्वितीय कलाकारी?? कुछ तो विशेष तकनीक रही होगी हमारे पूर्वजों के पास जिसे फिर से प्राप्त करने की कोशिश हमारी होनी चाहिए।
बाकी तो वामपंथी इतिहासकारों ने अकबर महान और ताजमहल को सर्वश्रेष्ठ कृति बताया है जबकि हम देखे तो हमारे पुराने मंदिर एक विराट धरोवर को संजोए हुए है। गर्व है हमें उन शिल्पकारों पर जिन्होंने इतने जीवंत कलाकृतियों से हमें संजोया है।
सुचिन्द्रम गोपुरम का यह सिर्फ ऊपर का हिस्सा है। है ना अद्भुत अद्वितीय कलाकारी?? कुछ तो विशेष तकनीक रही होगी हमारे पूर्वजों के पास जिसे फिर से प्राप्त करने की कोशिश हमारी होनी चाहिए।
बाकी तो वामपंथी इतिहासकारों ने अकबर महान और ताजमहल को सर्वश्रेष्ठ कृति बताया है जबकि हम देखे तो हमारे पुराने मंदिर एक विराट धरोवर को संजोए हुए है। गर्व है हमें उन शिल्पकारों पर जिन्होंने इतने जीवंत कलाकृतियों से हमें संजोया है।
आप जितनी बार हमारे प्राचीन मंदिरों में जाओगे हमारे पूर्वजों की तकनीक आपको हर-बार चौंका देंगी
एक प्राचीन हिन्दू मंदिर का यह दरवाजा लकड़ी का नहीं बल्कि पत्थर का है, जब तक पर्यटक इसे अपने हाथों से स्पर्श नहीं कर लेते इसे लकड़ी का दरवाजा मान बैठते हैं, यह मंदिर सर्वोच्च शक्ति शिव को समर्पित है, जो कि राजा इंद्रवर्मन द्वारा निर्मित है ।
(प्रिह को मंदिर, कंबोडिया)
एक प्राचीन हिन्दू मंदिर का यह दरवाजा लकड़ी का नहीं बल्कि पत्थर का है, जब तक पर्यटक इसे अपने हाथों से स्पर्श नहीं कर लेते इसे लकड़ी का दरवाजा मान बैठते हैं, यह मंदिर सर्वोच्च शक्ति शिव को समर्पित है, जो कि राजा इंद्रवर्मन द्वारा निर्मित है ।
(प्रिह को मंदिर, कंबोडिया)