ऐतिहासिक मंदिर और उनकी कथा
1.89K subscribers
1K photos
408 videos
200 files
325 links
हमारी संस्कृति हमारा अभिमान

*इस चैनल मे हमारे मंदिरों की कथा के आडियो विडियो और हमारी सभ्यता से जुड़ी जगह का प्रसारण किया जाता है*

किसी और को इस ग्रुप में जोड़ने के लिये उन्हें ये लिंक दे

https://t.me/joinchat/AAAAAFTKJrx50fB1EhTzeg
Download Telegram
Forwarded from सनातन संस्कृत के वीडियो
VID-20200924-WA0005.mp4
12.4 MB
Video from jaikey
🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे गोविंद*🙏🏻🌹
🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे* 🙏🏻🌹

*वीडियो👆🏻👆🏻👇🏻👇🏻*
🕰➡️1.50

*🙏🏻💐👆👆इंसान के विचार सब तरफ से फसा हुआ है पर अपनी जिंदगी में मस्त है💐🙏🏻*

🚩 *सनातन धर्म को पहचानो* 🚩
*👇🏻टेलीग्राम चैनल से जुड़े👇🏻*
https://t.me/joinchat/AAAAAFKtXqZ-TRwRqPB-Uw

*🙏🏻🌹 हरे कृष्ण 🙏🏻🌹*
विजय स्तम्भ का रियासतकालीन दुर्लभ दृश्य (1880 ई. से पूर्व)

विजय स्तम्भ (चित्तौड़गढ़ दुर्ग) :- इसे भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष कहते हैं। संसार भर में इसका कोई सानी नहीं। इसका निर्माण महाराणा कुम्भा के शासनकाल में हुआ। इसे बनने में 8 वर्ष लगे। ये भगवान विष्णु को समर्पित है। ये 9 मंजिला एक स्तम्भ है। इसकी ऊंचाई 122 फीट है, जिसमें 157 सीढियां हैं। स्तम्भ का निर्माण वास्तुशिल्पी मंडन द्वारा निर्मित नक्शे के आधार पर उनके निर्देशन में हुआ। इसके वास्तुकार जैता व उनके पुत्र नापा, पुंजा आदि थे।

लोग 8वीं मंज़िल तक ही जाते हैं। 9वीं के लिए उल्टी सीढियां हैं। 9वीं मंज़िल पर कीर्तिस्तंभ प्रशस्ति अंकित है।

कीर्ति स्तम्भ के भीतर व बाहर भगवान विष्णु के सभी स्वरूपों सहित अनेक मूर्तियां सुसज्जित हैं।

पोस्ट लेखक :- तनवीर सिंह सारंगदेवोत (लक्ष्मणपुरा -मेवाड़)
मूर्ति के हाथ मे जो डमरू देख रहे हो ना, वो पत्थर का है। ये तो कुछ भी नहीं है, डमरू पर जो रस्सी देख रहे हो ना, वह भी पत्थर की है।
और तो और आप पत्थर की रस्सी के नीचे उंगली भी डाल सकते हो इतनी जगह है।...
हुआ ना आश्चर्य।

अब जरा सोचिए बिना किसी तकनीक के क्या केवल छेनी और हथौड़ी से यह सब कैसे संभव है।
एक हल्की सी गलत चोट क्या पूरी मूर्ति को खराब नहीं कर सकती थी।
और, अगर छेनी -हथौड़े से संभव है तो आज इतनी तकनीक के बावजूद भी इतनी सटीकता से कोई इसकी प्रतिलिपि क्यों नहीं बना पाता है।
ऐसे हजारों आश्चर्य है सनातन में लेकिन कुछ वामपंथी इतिहासकारों ने इनको आश्चर्य ही बनाकर रहने दिया किसी के सामने आने ही नहीं दिया और हमारी विडंबना देखिए कि हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं लेकिन हमें हमारे पूर्वजों द्वारा बनाई गई इन महान कलाकृतियों का ज्ञान भी नहीं है।

धन्य हैं हमारे वह पूर्वज जिन्होंने यह सब कुछ बनाया...
धन्य है हमारी सनातन संस्कृति।

#सनातनहमारीपहचान

केशव मन्दिर,कर्नाटक
Forwarded from सनातन संस्कृत के वीडियो
🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे गोविंद*🙏🏻🌹
🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे* 🙏🏻🌹

*वीडियो👆🏻👆🏻👇🏻👇🏻*
🕰➡️3.02

*🙏🏻💐रहस्य भरा महादेव का मंदिर 💐🙏🏻*

🚩 *सनातन धर्म को पहचानो* 🚩
*👇🏻टेलीग्राम चैनल से जुड़े👇🏻*
https://t.me/joinchat/AAAAAFKtXqZ-TRwRqPB-Uw

*🙏🏻🌹 हरे कृष्ण 🙏🏻🌹*
Forwarded from सनातन संस्कृत के वीडियो
This media is not supported in your browser
VIEW IN TELEGRAM
Video from Jaikey
#आदि_संकल्प

एक #पर्वत_शिखर है, ऊँचाई 29,028 फीट। हमारे #पुराणों ने इसे #गौरी_शंकर कहा; क्योंकि हमारे पूर्वज मानते थे कि इस पर्वत के उतुंग शिखर पर महादेव अपनी पत्नी गौरी के साथ विचरण करते हैं।

इसी पर्वत को हमारे पूर्वजों ने #सागर_माथा भी कहा यानि अगर हम सागर की ओर से चलें और दृष्टि ऊपर करें तो इसी पर्वत के शिखर को हम देख पातें हैं (भाव रूप में) क्योंकि ये सबसे ऊँची है। जिस नेपाल पर हम आज कल चुट्कुले बना रहे हैं, उस नेपाल में इसे अब भी सागरमाथा ही कहा जाता है।

यह पर्वत शिखर प्रभु राम के पूर्वज राजा सगर की भी तपःस्थली थी।

स्वामी दयानंद सरस्वती जिस तिब्बत को मानव-सभ्यता की उदगम स्थली मानते हैं, उस तिब्बत के लोग इस पर्वत शिखर को #चोमोलुंगमा कहते हैं।

मगर हम लोग इसे क्या कहते हैं...... ?

हम हिन्दू इस पर्वत शिखर को"#एवरेस्ट" कहते हैं, क्यों कहते हैं....... ?

क्योंकि सन 1852 में एक अंग्रेज सर्वेयर था 'जॉर्ज एवरेस्ट", उसने इसका एक नक्शा बनाया और हल्ला मचाया कि इस पर्वत की खोज उसने की है और इस झूठ को वो दुनिया भर में लेकर गया। सन 1865 में जब ये आदमी रिटायर होकर अपने देश इंग्लैंड जा रहा था तो उसके रिटायरमेंट फेयरवेल में बतौर तोहफ़ा उसके नाम पर इस शिखर का नाम #एवरेस्ट रख दिया गया।

और हम अभागे, धिम्मी लोग भी उसे सागरमाथा, गौरी-शंकर के नाम से पुकारना छोड़कर एवरेस्ट कहने लग गये।

गुलामी के चिन्हों को उतारिये वरना हम स्वाभिमान से भरे हिन्दू कभी भी नहीं बन सकते। #आदि के साथ आज संकल्प करिये कि आज से लिखने में, बोलने में, चर्चा करने में हम इसे एवटेस्ट नहीं कहेंगे।

#वन्दे_मातरम् 🚩🚩🙏👉
Forwarded from सनातन संस्कृत के वीडियो
🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे गोविंद*🙏🏻🌹
🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे* 🙏🏻🌹

*वीडियो👆🏻👆🏻👇🏻👇🏻*
🕰➡️2.43

*🙏🏻💐ब्रज 84 कोस परिक्रमा एक आध्यात्मिक और मानसिक यात्रा आज का पड़ाव अक्रूर घाट वृन्दावन🙏🏻💐*

🚩 *सनातन धर्म को पहचानो* 🚩
*👇🏻टेलीग्राम चैनल से जुड़े👇🏻*
https://t.me/joinchat/AAAAAFKtXqZ-TRwRqPB-Uw

*🙏🏻🌹 हरे कृष्ण 🙏🏻🌹*
Forwarded from सनातन संस्कृत के वीडियो
This media is not supported in your browser
VIEW IN TELEGRAM
*हाबूर पत्थर क्या है? क्यों इसके संपर्क में आते ही दूध जम कर दही बन जाता है?

भारत का हाबूर गांव, जहां मिलता है दही जमाने वाला चमत्कारी पत्थर

दही जमाने के लिए लोग अक्सर जामन ढूंढ़ते नजर आते हैं। कभी कटोरी लेकर पड़ोसी के यहां पर भागते हैं तो कभी थोड़ा सा दही बाजार से ले आते हैं, सोचते है की थोड़े से दही को दूध में डालकर खूब सारा दही जमा ले। लेकिन राजस्थान के जैसलमेर जिले के एक गांव को अभी तक जामन की जरूरत ही नहीं पड़ी, ऐसा नहीं है कि यहां पर लोग दही नहीं खाते, छाछ नहीं पीते। बल्कि उनके पास लाखों बरस पुराना जादुई पत्थर है जिसके संपर्क में आते ही दूध, दही बन जाता है। आइए जानते हैं उस गांव के पास विशेष पत्थर के साथ दही बनाने की अनूठी विधि कौनसी है ? और उस पत्थर का रहस्य क्या है?

हाबूर गांव - जैसलमेर से 40 किलोमीटर दूर स्थित है हाबूर गांव। ये वहीं गांव है जहां पर दही जमाने वाला रहस्यमयी पत्थर पाया जाता है। इस गांव को स्वर्णगिरी के नाम से जाना जाता है। हाबूर गांव का वर्तमान नाम पूनमनगर है। हाबूर पत्थर को स्थानीय भाषा में हाबूरिया भाटा कहा जाता है। ये गांव अनोखे पत्थर की वजह से देश- विदेश में प्रसिद्ध है।

दही जामने वाला हाबूर पत्थर: जैसलमेर पत्थरों के लिए प्रसिद्ध है, यहां के पीले पत्थर दुनियाभर में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। लेकिन हाबूर गांव का जादुई पत्थर अपने आप में विशिष्ट खूबियां समेटे हुए है। हाबूर पत्थर दिखने में बहुत खूबसूरत होता है। ये हल्का सुनहरा और चमकीला होता है। हाबूर पत्थर का कमाल ऐसा है कि इस पत्थर में दूध को दही बनाने की कला है। हाबूर पत्थर के संपर्क में आते ही दूध एक रात में दही बन जाता है। जो स्वाद में मीठा और सौंधी खुशबू वाला होता है। इस पत्थर का उपयोग आज भी जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में दूध को जमाने के लिए किया जाता है। इस गांव में मिलने वाले स्टोन से यहां के लोग बर्तन, मूर्ति और खिलौने बनाते हैं जो अपनी विशेष खूबी के चलते देश-विदेश में काफी लोकप्रिय है। इस पत्थर से गिलास, प्लेट, कटोरी, प्याले, ट्रे, मालाएं, फूलदान, कप, थाली, और मूर्तियां बनाए जाते हैं।

पत्थर से दही जमने की वजह : अब सवाल उठता है कि एक पत्थर से कैसे दही जम सकता है। वो भी रात को दूध उस पत्थर से बने बर्तन में डाला और सुबह उठकर दही खा लो। जब ऐसा होने लगा तो रिसर्च भी होने लगी, जिसमें ये सामने आया है की हाबूर पत्थर में दही जमाने वाले सारे केमिकल्स मौजूद है। इस पत्थर में एमिनो एसिड, फिनायल एलिनिया, रिफ्टाफेन टायरोसिन हैं। ये केमिकल दूध से दही जमाने में सहायक होते हैं। हाबूर गांव के भूगर्भ से निकलने वाले इस पत्थर में कई खनिज और अन्य जीवाश्मों की भरमार है जो इसे चमत्कारी बनाते हैं।


क्या है इतिहास: कहा जाता है कि जैसलमेर में पहले समुद्र हुआ करता था। जिसका का नाम तेती सागर था। कई समुद्री जीव समुद्र सूखने के बाद यहां जीवाश्म बन गए और पहाड़ों का निर्माण हुआ। हाबूर गांव में इन पहाड़ों से निकलने वाले पत्थर में कई खनिज और अन्य जीवाश्मों की भरमार है। जिसकी वजह से इस पत्थर से बनने वाले बर्तनों की भारी डिमांड है।

हाबूर पत्थर से बने बर्तनों की डिमांड: हाबूर पत्थर से बने बर्तनों कि डिमांड देश के साथ-साथ विदेशों में भी है। इस पत्थर से बने बर्तनों की बिक्री ऑनलाइन भी होती है। कई ऐसे ऑनलाइन आउटलेट है जहां पर आपको इस पत्थर से बने बर्तन अलग- अलग Rate पर मिल जाएंगे। उदाहरण के तौर पर अगर आपको हाबूर पत्थर से बनी एक प्याली खरीदनी है तो आपको 1500 से 2000 रुपये चुकाने होंगे। वहीं कटोरी की कीमत 2500 के आसपास हो सकती है। वहीं एक गिलास की कीमत 650 रुपये से लेकर 1000 रुपये तक होती है।

हाबूर पत्थर में औषधीय गुण: हाबूर पत्थर चमत्कारी जीवाश्म पत्थर बताया जाता है जिसका गठन 180 मिलियन साल पहले समुद्र के खोल से जैसलमेर में हुआ था। इसमें भारी औषधीय गुण होते हैं, जैसे मधुमेह तथा रक्त दबाव नियंत्रित करता है। ऐसा कहा जाता है कि इस पत्थर से बने गिलास में रात को सोते समय पानी भरकर रख दो और सुबह खाली पेट पी लो। अगर आप एक से डेढ़ महीने तक लगातार इसका पानी पीते है, तो आपके शरीर में एक चेंज नजर आएगा। आपके शरीर में होने वाला जोड़ों का दर्द कम होगा साथ ही पाइल्स की बीमारी कंट्रोल होगी।

हाबूर गांव कैसे जाएं : अगर आप दिल्ली से हाबूर गांव आना चाहते हैं तो आपको 810 किलोमीटर का सफर तय करना होगा। आप यहां पर बस, कार, जीप में आ सकते हैं।*

https://www.mymandir.com/p/5PpLab

💯 💯
*भारत का एकमात्र धार्मिक ऐप्प*।
अभी डाउनलोड करें और 50 लाख धार्मिक लोगों के परिवार का हिस्सा बनें।
ऐप्प डाउनलोड करें📲👇 https://goo.gl/dUyZ2H
🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे गोविंद*🙏🏻🌹
🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे* 🙏🏻🌹

*वीडियो👆🏻👆🏻👇🏻👇🏻*
🕰➡️2.20

*🙏🏻💐*मन्दिर दर्शन में भाग 2 आज का पड़ाव श्री मरघट वाले बाबा हनुमान मन्दिर यमुना बाजार दिल्ली💐🙏🏻*

🚩 *सनातन धर्म को पहचानो* 🚩
*👇🏻टेलीग्राम चैनल से जुड़े👇🏻*
https://t.me/joinchat/AAAAAFKtXqZ-TRwRqPB-Uw

*🙏🏻🌹 हरे कृष्ण 🙏🏻🌹*
भगवान केदारनाथ के रोचक रहस्य क्या हैं?
400 साल तक बर्फ में दबे रहे केदारेश्‍वर मंदिर के 6 रहस्य

भारतीय राज्य उत्तराखंड में गिरिराज हिमालय की केदार नामक चोटी पर स्थित देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक सर्वोच्च केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग का मंदिर बना हुआ है। रहस्यों से भरे इस केदारनाथ धाम और मंदिर के संबंध में कई कथाएं जुड़ी हुई हैं। आओ जानते हैं कि कब और क्यों केदारनाथ का मंदिर 400 साल तक बर्फ में दबा रहा और क्या है इस मंदिर के पांच रहस्य।

1. पहला रहस्य :
केदारनाथ धाम में एक तरफ करीब 22 हजार फुट ऊंचा केदार, दूसरी तरफ 21 हजार 600 फुट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ 22 हजार 700 फुट ऊंचा भरतकुंड का पहाड़। न सिर्फ 3 पहाड़ बल्कि 5 नदियों का संगम भी है यहां- मं‍दाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी। इन नदियों में अलकनंदा की सहायक मंदाकिनी आज भी मौजूद है। इसी के किनारे है केदारेश्वर धाम। यहां सर्दियों में भारी बर्फ और बारिश में जबरदस्त पानी रहता है।

2. दूसरा रहस्य
यह मंदिर कटवां पत्थरों के भूरे रंग के विशाल और मजबूत शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है। 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर खड़े 85 फुट ऊंचे, 187 फुट लंबे और 80 फुट चौड़े मंदिर की दीवारें 12 फुट मोटी हैं। यह आश्चर्य ही है कि इतने भारी पत्थरों को इतनी ऊंचाई पर लाकर व तराशकर कैसे मंदिर की शक्ल दी गई होगी? खासकर यह विशालकाय छत कैसे खंभों पर रखी गई? पत्थरों को एक-दूसरे में जोड़ने के लिए इंटरलॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।

3. तीसरा रहस्य :
यह मंदिर मौजूदा मंदिर के पीछे सर्वप्रथम पांडवों ने बनवाया था, लेकिन वक्त के थपेड़ों की मार के चलते यह मंदिर लुप्त हो गया। तब इस मंदिर का निर्माण 508 ईसा पूर्व जन्मे और 476 ईसा पूर्व देहत्याग गए आदिशंकराचार्य ने करवाया था। इस मंदिर के पीछे ही उनकी समाधि है। इसका गर्भगृह अपेक्षाकृत प्राचीन है जिसे 80वीं शताब्दी के लगभग का माना जाता है। पहले 10वीं सदी में मालवा के राजा भोज द्वारा और फिर 13वीं सदी में मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया।

4. चौथा रहस्य :
दीपावली महापर्व के दूसरे दिन के दिन शीत ऋतु में मंदिर के द्वार बंद कर दिए जाते हैं। 6 माह तक मंदिर के अंदर दीपक जलता रहता है। पुरोहित ससम्मान पट बंद कर भगवान के विग्रह एवं दंडी को 6 माह तक पहाड़ के नीचे ऊखीमठ में ले जाते हैं। 6 माह बाद मई माह में केदारनाथ के कपाट खुलते हैं, तब उत्तराखंड की यात्रा आरंभ होती है। 6 माह मंदिर और उसके आसपास कोई नहीं रहता है। लेकिन आश्चर्य की बा‍त कि 6 माह तक दीपक भी जलता रहता और निरंतर पूजा भी होती रहती है। कपाट खुलने के बाद यह भी आश्चर्य का विषय है कि वैसी की वैसी ही साफ-सफाई मिलती है, जैसी कि छोड़कर गए थे।

5. पांचवां रहस्य
16 जून 2013 की रात प्रकृति ने कहर बरपाया था। जलप्रलय से कई बड़ी-बड़ी और मजबूत इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढहकर पानी में बह गईं, लेकिन केदारनाथ के मंदिर का कुछ नहीं बिगड़ा। आश्चर्य तो तब हुआ, जब पीछे पहाड़ी से पानी के बहाव में लुढ़कती हुई विशालकाय चट्टान आई और अचानक वह मंदिर के पीछे ही रुक गई! उस चट्टान के रुकने से बाढ़ का जल 2 भागों में विभक्त हो गया और मंदिर कहीं ज्यादा सुरक्षित हो गया। इस प्रलय में लगभग 10 हजार लोगों की मौत हो गई थी।

6. छठा रहस्य :
पुराणों की भविष्यवाणी के अनुसार इस समूचे क्षेत्र के तीर्थ लुप्त हो जाएंगे। माना जाता है कि जिस दिन नर और नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे, बद्रीनाथ का मार्ग पूरी तरह बंद हो जाएगा और भक्त बद्रीनाथ के दर्शन नहीं कर पाएंगे। पुराणों के अनुसार वर्तमान बद्रीनाथ धाम और केदारेश्वर धाम लुप्त हो जाएंगे और वर्षों बाद भविष्य में 'भविष्यबद्री' नामक नए तीर्थ का उद्गम होगा।
मित्रो, अब जानिए 400 सालों तक कैसे बर्फ में दबा रहा केदारनाथ का मंदिर और जब बर्फ से बाहर निकला तो पूर्णत: सुरक्षित था। देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट के हिमालयन जियोलॉजिकल वैज्ञानिक विजय जोशी के अनुसार 13वीं से 17वीं शताब्दी तक यानी 400 साल तक एक छोटा हिमयुग आया था जिसमें हिमालय का एक बड़ा क्षेत्र बर्फ के अंदर दब गया था। उसमें यह मंदिर क्षेत्र भी था। वैज्ञानिकों के अनुसार मंदिर की दीवार और पत्थरों पर आज भी इसके निशान देखे जा सकते हैं।
दरअसल, केदारनाथ का यह इलाका चोराबरी ग्लैशियर का एक हिस्सा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लैशियरों के लगातार पिघलते रहने और चट्टानों के खिसकते रहने से आगे भी इस तरह का जलप्रलय या अन्य प्राकृतिक आपदाएं जारी रहेंगी।
भौतिक विज्ञान के नियमो की धज्जियां उड़ाती हजारो वर्ष पुरानी श्रीकृष्ण मक्खन गेंद --

यह पत्थर #श्रीकृष्ण_बटरबॉल के नाम से प्रसिद्ध है ।। आपको यह साधारण पत्थर लगता होगा, लेकिन यह पत्थर विज्ञान के सारे नियमो की धज्जियां उड़ाते हुए अडिग है :--

यह पत्थर ढलान वाली पहाड़ी पर, 45 डिग्री के कोण पर मात्र 4 फुट की जगह घेरकर बिना लुढ़के टिका हुआ है ।। इस पत्थर का वजन 250 टन है, इसे साथ हाथियों की मदद से यहां से हटाने का प्रयास किया गया था, लेकिन यह हिला तक नही । ढलान के ऊपर इस पत्थर का अपने आप टिका रहना ही किसी आश्चर्य से कम नही, उल्टे यह महान प्रयासों के बाद भी हिलाने से भी नही हिलता, यह महाआश्चर्य की बात है ।

देखने से यह पत्थर ऐसे लगता है की किसी भी क्षण यह पत्थर लुढ़ककर इस पहाड़ी को चकनाचूर कर देगा, लेकिन हजारो वर्षो के बाद भी गिरना तो दूर, यह पत्थर हिला तक नही है ।

इस पत्थर को यहां से हटाने का प्रयास पल्लव राजाओ ने किया था, लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी वह इसे हिलाने में भी कामयाब नही हुए, उसके बाद 1908 में अंग्रेजो ने इसे हटाने का प्रयास किया, 7 हाथी इस पत्थर को हटाने में लगाये, लेकिन हिला तक नही -- पल्लव राजाओ के समय तो हाथियों की संख्या इससे कहीं अधिक थी, तब यह नही हिला, तो अंग्रेजो से तो हिलना ही क्या था ??

जियोलॉजिस्ट भी इस पत्थर की गुत्थी सुलझा नही पाए है, वह भी यह मानते है की प्राकृतिक रूप से भी इस प्रकार की आकृति नही बन सकती, अगर बन भी जाये, तो उसे कम से कम हटाया तो जा ही सकता है, इस पत्थर का इस तरह अडिग रहना, विज्ञान के समझ के परे है, इस चमत्कार को विज्ञान भी नमस्कार करता है :--

यहां के स्थानीय लोगो का मानना है की यह पत्थर स्वर्ग से आया था, मतलब बाहरी दुनिया के लोग साक्षात भगवान के कारण ही यह पत्थर इस तरह है । शायद स्थानीय लोग ही जियोलॉजिस्ट की तुलना में ज़्यादा सही है ।।

#कृष्णबटरबॉल_महाबलीपुरम ( तमिलनाडु - भारत )👌👌😱😱