*🛕 स्वामीनारायण मंदिर, लंदन*
*🔶 जिनके पूर्वज 800 सालों में हमारे मंदिर नहीं तोड़ पाये वो हमारा हौसला कैसे तोड़ पाएंगे।*
*🔶 लंदन का स्वामीनारायण मंदिर भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। यह ब्रिटेन का पहला प्रामाणिक हिंदू मंदिर माना जाता है। यह एक बहुत ही सुंदर मंदिर है। मंदिर परिसर के साथ-साथ यहां स्थित भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति का श्रृंगार भी बहुत ही सुदंर तरीके से किया जाता है।*
*🔶 इस मंदिर के निर्माण के लिए 2,828 टन बल्गेरियाई चूना पत्थर और 2,000 टन इतालवी संगमरमर भारत भेजा गया था जिसे 1526 भारतीय शिल्पकारों ने अपने कौशल से सुंदर नक्काशियों में बदल दिया। आज यह भारत से बाहर सबसे बड़े मंदिरों में से एक है ।*
*🔶 इस मंदिर की निर्माण वास्तुकला का एक अच्छा उदाहरण है। स्वामीनारायण मंदिर वहां रहने वाले हिंदुओं के लिए आस्था का केन्द्र है। यहां पर लगभग सभी हिंदू त्यौहार बहुत ही धूम-धाम से मनाए जाते हैं। त्यौहार के अनुसार मंदिर की सजावट की जाती है और भगवान के वस्त्र और श्रृंगार भी वैसे ही पहनाए जाते हैं।*
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*🔶 जिनके पूर्वज 800 सालों में हमारे मंदिर नहीं तोड़ पाये वो हमारा हौसला कैसे तोड़ पाएंगे।*
*🔶 लंदन का स्वामीनारायण मंदिर भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। यह ब्रिटेन का पहला प्रामाणिक हिंदू मंदिर माना जाता है। यह एक बहुत ही सुंदर मंदिर है। मंदिर परिसर के साथ-साथ यहां स्थित भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति का श्रृंगार भी बहुत ही सुदंर तरीके से किया जाता है।*
*🔶 इस मंदिर के निर्माण के लिए 2,828 टन बल्गेरियाई चूना पत्थर और 2,000 टन इतालवी संगमरमर भारत भेजा गया था जिसे 1526 भारतीय शिल्पकारों ने अपने कौशल से सुंदर नक्काशियों में बदल दिया। आज यह भारत से बाहर सबसे बड़े मंदिरों में से एक है ।*
*🔶 इस मंदिर की निर्माण वास्तुकला का एक अच्छा उदाहरण है। स्वामीनारायण मंदिर वहां रहने वाले हिंदुओं के लिए आस्था का केन्द्र है। यहां पर लगभग सभी हिंदू त्यौहार बहुत ही धूम-धाम से मनाए जाते हैं। त्यौहार के अनुसार मंदिर की सजावट की जाती है और भगवान के वस्त्र और श्रृंगार भी वैसे ही पहनाए जाते हैं।*
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*🛕सुरकंडा देवी मंदिर,टिहरी(उत्तराखंड)*
*🔶 सुरकंडा देवी एक हिन्दूओं का प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर देवी दुर्गो को समर्पित है जो कि नौ देवी के रूपों में से एक है। सुरकंडा देवी मंदिर 51 शक्ति पीठ में से है। सुरकंडा देवी मंदिर में देवी काली की प्रतिमा स्थापित है। यह मंदिर यूलिसाल गांव, धानाल्टी, टिहरी जिला, उत्तराखंड में स्थित है।*
*🔶 यह मंदिर लगभग 2,757 मीटर की ऊंचाई पर है। सुरकंडा देवी मंदिर घने जंगलों से घिरा हुआ है और इस स्थान से उत्तर दिशा में हिमालय का सुन्दर दृश्य दिखाई देता है। दक्षिण दिशा में देहरादून और ऋ़षिकेश शहरों का सुन्दर नजारा देखा जा सकता है। यह मंदिर साल में ज्यादा दर समय कोहरे से डका रहता है।*
*🔶 पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शंकर देवी सती के मृत शरीर को लेकर पूरे ब्रह्मांड के चक्कर लगा रहे थे, उसी दौरान भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया था, जिसमें सती का सिर इस स्थान पर गिरा था, इसलिए इसे मंदिर को श्री सुरकंडा देवी मंदिर भी कहा जाता है।*
*🔶 सुरकंडा देवी एक हिन्दूओं का प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर देवी दुर्गो को समर्पित है जो कि नौ देवी के रूपों में से एक है। सुरकंडा देवी मंदिर 51 शक्ति पीठ में से है। सुरकंडा देवी मंदिर में देवी काली की प्रतिमा स्थापित है। यह मंदिर यूलिसाल गांव, धानाल्टी, टिहरी जिला, उत्तराखंड में स्थित है।*
*🔶 यह मंदिर लगभग 2,757 मीटर की ऊंचाई पर है। सुरकंडा देवी मंदिर घने जंगलों से घिरा हुआ है और इस स्थान से उत्तर दिशा में हिमालय का सुन्दर दृश्य दिखाई देता है। दक्षिण दिशा में देहरादून और ऋ़षिकेश शहरों का सुन्दर नजारा देखा जा सकता है। यह मंदिर साल में ज्यादा दर समय कोहरे से डका रहता है।*
*🔶 पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शंकर देवी सती के मृत शरीर को लेकर पूरे ब्रह्मांड के चक्कर लगा रहे थे, उसी दौरान भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया था, जिसमें सती का सिर इस स्थान पर गिरा था, इसलिए इसे मंदिर को श्री सुरकंडा देवी मंदिर भी कहा जाता है।*
यह भट्टी श्री राधारमण मंदिर की है जो पिछले 478 सालों से लगातार जल रही है।
कई वर्षों से जल रही इस भट्टी का उपयोग ठाकुर जी की रसोई तैयार करने के लिए किया जाता है। श्री राधारमण मंदिर में दीपक जलाने से लेकर प्रसाद तैयार करने में भी इस भट्टी का इस्तेमाल किया जाता है। मंदिर की प्रथम आरती के लिए अग्नि वैदिक मंत्रों के माध्यम से आज से 478 वर्ष पहले प्रकट की गई थी। इसके लिए अरण्य मंथन का सहारा लिया गया था।
उसके बाद ही ठाकुर ने गोपाल भट्ट गोस्वामी के मन में यह भाव पैदा किया कि इसी अग्नि से भविष्य में ठाकुर की आरती की जाय। यहीं कारण है कि इस मंदिर में करीब पौने पांच सौ वर्ष से माचिस का प्रयोग नहीं किया गया। आज भी ठाकुर की आरती पौने पांच सौ वर्ष पूर्व प्रकट अग्नि से की जाती है।..
कई वर्षों से जल रही इस भट्टी का उपयोग ठाकुर जी की रसोई तैयार करने के लिए किया जाता है। श्री राधारमण मंदिर में दीपक जलाने से लेकर प्रसाद तैयार करने में भी इस भट्टी का इस्तेमाल किया जाता है। मंदिर की प्रथम आरती के लिए अग्नि वैदिक मंत्रों के माध्यम से आज से 478 वर्ष पहले प्रकट की गई थी। इसके लिए अरण्य मंथन का सहारा लिया गया था।
उसके बाद ही ठाकुर ने गोपाल भट्ट गोस्वामी के मन में यह भाव पैदा किया कि इसी अग्नि से भविष्य में ठाकुर की आरती की जाय। यहीं कारण है कि इस मंदिर में करीब पौने पांच सौ वर्ष से माचिस का प्रयोग नहीं किया गया। आज भी ठाकुर की आरती पौने पांच सौ वर्ष पूर्व प्रकट अग्नि से की जाती है।..
*चित्रदुर्ग किला, चित्रदुर्ग(कर्नाटक)*
*🔶 चित्रदुर्ग किला, कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में पहाड़ी की चोटी पर एक विशालकाय पत्थरों से बना किला है। इस किले को "चित्त्तलदूर्ग" भी कहा जाता हैं। चित्रदुर्ग किला की संरचना बचाव की मुद्रा में है। किले का निर्माण 10वीं से 18वीं शताब्दी के मध्य में हुआ था, इस किले में निर्माण में मुख्य योगदान चालुक्य, होयसला और विजयनगर साम्राज्य का था।*
*🔶 किले के ऊपरी हिस्से में 18 मंदिर हैं, और निचले किले मे एक विशाल मंदिर भी हैं जो देवी को समर्पित है। इनमें से, हिडिम्बेश्वरा मंदिर सबसे पुराना और सबसे आकर्षित है चित्रदुर्ग किला महाभारत महाकाव्य के हिडिम्बा रक्षा की जगह भी माना जाता है। यहां के प्रमुख मंदिर हैं जिनमें से गोपाला कृष्णा, नंदी, सुबराया, एकाननाथम्मा, भगवान हनुमान, फल्नेश्वर, और सिद्देश्वर हैं।*
*🔶 किले में कई आक्रमण भी हुए, मदकर नायक के समय, हैदर अली ने किले में अपनी सेना को घेर लिया और नायक कबीले के अंतिम प्रतिनिधि पर जीत हासिल करने के बाद विजय प्राप्त की। हैदर अली ने वास्तव में इस किले पर तीन बार हमला किया और तीसरी बार 1779 में उसने सफलतापूर्वक विजय प्राप्त की। ऐसा कहा जाता है कि नायक ने लगभग 200 वर्षों तक इस किले पर शासन किया था।*
*🔶 चित्रदुर्ग किला, कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में पहाड़ी की चोटी पर एक विशालकाय पत्थरों से बना किला है। इस किले को "चित्त्तलदूर्ग" भी कहा जाता हैं। चित्रदुर्ग किला की संरचना बचाव की मुद्रा में है। किले का निर्माण 10वीं से 18वीं शताब्दी के मध्य में हुआ था, इस किले में निर्माण में मुख्य योगदान चालुक्य, होयसला और विजयनगर साम्राज्य का था।*
*🔶 किले के ऊपरी हिस्से में 18 मंदिर हैं, और निचले किले मे एक विशाल मंदिर भी हैं जो देवी को समर्पित है। इनमें से, हिडिम्बेश्वरा मंदिर सबसे पुराना और सबसे आकर्षित है चित्रदुर्ग किला महाभारत महाकाव्य के हिडिम्बा रक्षा की जगह भी माना जाता है। यहां के प्रमुख मंदिर हैं जिनमें से गोपाला कृष्णा, नंदी, सुबराया, एकाननाथम्मा, भगवान हनुमान, फल्नेश्वर, और सिद्देश्वर हैं।*
*🔶 किले में कई आक्रमण भी हुए, मदकर नायक के समय, हैदर अली ने किले में अपनी सेना को घेर लिया और नायक कबीले के अंतिम प्रतिनिधि पर जीत हासिल करने के बाद विजय प्राप्त की। हैदर अली ने वास्तव में इस किले पर तीन बार हमला किया और तीसरी बार 1779 में उसने सफलतापूर्वक विजय प्राप्त की। ऐसा कहा जाता है कि नायक ने लगभग 200 वर्षों तक इस किले पर शासन किया था।*
हमारे मंदिरों को नष्ट करने वालों को यह पता नहीं था कि अगर एक भी स्तंभ बच गया तो वह सनातनियों के स्वाभिमान को जगाने के लिए पर्याप्त होगा ..
इन स्तंभों में सजावटी नक्काशियो वाले हिस्से को अलग से नहीं जोड़ा गया बल्कि पूरा स्तम्भ एक ही पत्थर को तोड़कर बना है । क्या इनकी फिनिशिंग देखकर आपको लगता है कि इसे मात्र छेनी से तराशा गया होगा ?
(चेलुवर्यस्वामी मंदिर, मेलुकोट)
इन स्तंभों में सजावटी नक्काशियो वाले हिस्से को अलग से नहीं जोड़ा गया बल्कि पूरा स्तम्भ एक ही पत्थर को तोड़कर बना है । क्या इनकी फिनिशिंग देखकर आपको लगता है कि इसे मात्र छेनी से तराशा गया होगा ?
(चेलुवर्यस्वामी मंदिर, मेलुकोट)
#क्या_आपने_कभी_पढ़ा_है_कि_हल्दीघाटी_के_बाद_अगले_१०_साल_में_मेवाड़_में_क्या_हुआ...??
इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा क्यूंकि वही #हिन्दू_रेजिस्टेंस_और_शौर्य_के_प्रतीक_हैं.
इतिहास में तो ये भी नहीं पढ़ाया गया है कि हल्दीघाटी युद्ध में जब महाराणा प्रताप ने कुंवर मानसिंह के हाथी पर जब प्रहार किया तो शाही फ़ौज पांच छह कोस दूर तक भाग गई थी और अकबर के आने की अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई है. ये वाकया #अबुल_फज़ल की पुस्तक #अकबरनामा में दर्ज है.
क्या हल्दी घाटी अलग से एक युद्ध था..या एक बड़े युद्ध की छोटी सी घटनाओं में से बस एक शुरूआती घटना..
महाराणा प्रताप को इतिहासकारों ने हल्दीघाटी तक ही सिमित करके #मेवाड़_के_इतिहास के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है. वास्तविकता में हल्दीघाटी का युद्ध , महाराणा प्रताप और मुगलो के बीच हुए कई युद्धों की शुरुआत भर था. मुग़ल न तो प्रताप को पकड़ सके और न ही मेवाड़ पर अधिपत्य जमा सके. हल्दीघाटी के बाद क्या हुआ वो हम बताते हैं.
हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा के पास सिर्फ 7000 सैनिक ही बचे थे..और कुछ ही समय में मुगलों का कुम्भलगढ़, गोगुंदा , उदयपुर और आसपास के ठिकानों पर अधिकार हो गया था. उस स्थिति में महाराणा ने “गुरिल्ला युद्ध” की योजना बनायीं और मुगलों को कभी भी मेवाड़ में सेटल नहीं होने दिया. महाराणा के शौर्य से विचलित अकबर ने उनको दबाने के लिए 1576 में हुए हल्दीघाटी के बाद भी हर साल 1577 से 1582 के बीच एक एक लाख के सैन्यबल भेजे जो कि #महाराणा_को_झुकाने_में_नाकामयाब_रहे.
हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप के खजांची #भामाशाह_और_उनके_भाई_ताराचंद मालवा से दंड के पच्चीस लाख रुपये और दो हज़ार अशर्फिया लेकर हाज़िर हुए. इस घटना के बाद महाराणा प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया और दिवेर पर हमले की योजना बनाई। भामाशाह ने जितना धन महाराणा को राज्य की सेवा के लिए दिया उस से 25 हज़ार सैनिकों को 12 साल तक रसद दी जा सकती थी. बस फिर क्या था..महाराणा ने फिर से अपनी सेना संगठित करनी शुरू की और कुछ ही समय में 40000 लडाकों की एक शक्तिशाली सेना तैयार हो गयी.
उसके बाद शुरू हुआ #हल्दीघाटी_युद्ध_का_दूसरा_भाग जिसको इतिहास से एक षड्यंत्र के तहत या तो हटा दिया गया है या एकदम दरकिनार कर दिया गया है. इसे #बैटल_ऑफ़_दिवेर_कहा_गया_गया_है.
बात सन १५८२ की है, #विजयदशमी_का_दिन था और महराणा ने अपनी नयी संगठित सेना के साथ मेवाड़ को वापस स्वतंत्र कराने का प्रण लिया. उसके बाद सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूंक दिया..एक टुकड़ी की कमान स्वंय महाराणा के हाथ थी दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे.
कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में हल्दीघाटी को Thermopylae of Mewar और दिवेर के युद्ध को राजस्थान का मैराथन बताया है. #ये_वही_घटनाक्रम_हैं__जिसके_इर्द_गिर्द_आप_फिल्म_300_देख_चुके_हैं. कर्नल टॉड ने भी महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, तेज और देश के प्रति उनके अभिमान को स्पार्टन्स के तुल्य ही बताया है जो युद्ध भूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से यूँ ही टकरा जाते थे.
#दिवेर_का_युद्ध_बहुत_ही_भीषण_था, महाराणा प्रताप की सेना ने महाराजकुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर थाने पर हमला किया , हज़ारो की संख्या में मुग़ल, राजपूती तलवारो बरछो भालो और कटारो से बींध दिए गए।
युद्ध में महाराजकुमार अमरसिंह ने सुलतान खान मुग़ल को बरछा मारा जो #सुल्तान_खान_और_उसके_घोड़े_को_काटता_हुआ निकल गया. उसी युद्ध में एक अन्य राजपूत की तलवार एक #हाथी पर लगी और उसका #पैर काट कर निकल गई।
#महाराणा_प्रताप_ने_बहलेखान_मुगल_के_सिर_पर_वार किया और #तलवार_से_उसे_घोड़े_समेत_काट_दिया। शौर्य की ये बानगी इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलती है. उसके बाद यह कहावत बनी की मेवाड़ में सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया जाता है. ये घटनाये #मुगलो_को_भयभीत करने के लिए बहुत थी। बचे खुचे ३६००० मुग़ल सैनिकों ने #महाराणा_के_सामने_आत्म_समर्पण_कर_दिया.
दिवेर के युद्ध ने मुगलो का मनोबल इस तरह तोड़ दिया की जिसके परिणाम स्वरुप मुगलों को मेवाड़ में बनायीं अपनी सारी 36 थानों, ठिकानों को छोड़ के भागना पड़ा, यहाँ तक की जब मुगल कुम्भलगढ़ का किला तक रातो रात खाली कर भाग गए.
दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुन्दा , कुम्भलगढ़ , बस्सी, चावंड , जावर , मदारिया , मोही , माण्डलगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण ठिकानो पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद भी महाराणा और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ को छोड़ के मेवाड़ के सारे ठिकाने/दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए.
अधिकांश मेवाड़ को पुनः कब्जाने के बाद महाराणा प्रताप ने आदेश निकाला की अगर कोई एक बिस्वा जमीन भी खेती करके मुसलमानो को हासिल (टैक्स) देगा , उसका सर काट दिया जायेगा। इसके बाद मेवाड़ और आस पास के बचे ख
इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा क्यूंकि वही #हिन्दू_रेजिस्टेंस_और_शौर्य_के_प्रतीक_हैं.
इतिहास में तो ये भी नहीं पढ़ाया गया है कि हल्दीघाटी युद्ध में जब महाराणा प्रताप ने कुंवर मानसिंह के हाथी पर जब प्रहार किया तो शाही फ़ौज पांच छह कोस दूर तक भाग गई थी और अकबर के आने की अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई है. ये वाकया #अबुल_फज़ल की पुस्तक #अकबरनामा में दर्ज है.
क्या हल्दी घाटी अलग से एक युद्ध था..या एक बड़े युद्ध की छोटी सी घटनाओं में से बस एक शुरूआती घटना..
महाराणा प्रताप को इतिहासकारों ने हल्दीघाटी तक ही सिमित करके #मेवाड़_के_इतिहास के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है. वास्तविकता में हल्दीघाटी का युद्ध , महाराणा प्रताप और मुगलो के बीच हुए कई युद्धों की शुरुआत भर था. मुग़ल न तो प्रताप को पकड़ सके और न ही मेवाड़ पर अधिपत्य जमा सके. हल्दीघाटी के बाद क्या हुआ वो हम बताते हैं.
हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा के पास सिर्फ 7000 सैनिक ही बचे थे..और कुछ ही समय में मुगलों का कुम्भलगढ़, गोगुंदा , उदयपुर और आसपास के ठिकानों पर अधिकार हो गया था. उस स्थिति में महाराणा ने “गुरिल्ला युद्ध” की योजना बनायीं और मुगलों को कभी भी मेवाड़ में सेटल नहीं होने दिया. महाराणा के शौर्य से विचलित अकबर ने उनको दबाने के लिए 1576 में हुए हल्दीघाटी के बाद भी हर साल 1577 से 1582 के बीच एक एक लाख के सैन्यबल भेजे जो कि #महाराणा_को_झुकाने_में_नाकामयाब_रहे.
हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप के खजांची #भामाशाह_और_उनके_भाई_ताराचंद मालवा से दंड के पच्चीस लाख रुपये और दो हज़ार अशर्फिया लेकर हाज़िर हुए. इस घटना के बाद महाराणा प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया और दिवेर पर हमले की योजना बनाई। भामाशाह ने जितना धन महाराणा को राज्य की सेवा के लिए दिया उस से 25 हज़ार सैनिकों को 12 साल तक रसद दी जा सकती थी. बस फिर क्या था..महाराणा ने फिर से अपनी सेना संगठित करनी शुरू की और कुछ ही समय में 40000 लडाकों की एक शक्तिशाली सेना तैयार हो गयी.
उसके बाद शुरू हुआ #हल्दीघाटी_युद्ध_का_दूसरा_भाग जिसको इतिहास से एक षड्यंत्र के तहत या तो हटा दिया गया है या एकदम दरकिनार कर दिया गया है. इसे #बैटल_ऑफ़_दिवेर_कहा_गया_गया_है.
बात सन १५८२ की है, #विजयदशमी_का_दिन था और महराणा ने अपनी नयी संगठित सेना के साथ मेवाड़ को वापस स्वतंत्र कराने का प्रण लिया. उसके बाद सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूंक दिया..एक टुकड़ी की कमान स्वंय महाराणा के हाथ थी दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे.
कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में हल्दीघाटी को Thermopylae of Mewar और दिवेर के युद्ध को राजस्थान का मैराथन बताया है. #ये_वही_घटनाक्रम_हैं__जिसके_इर्द_गिर्द_आप_फिल्म_300_देख_चुके_हैं. कर्नल टॉड ने भी महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, तेज और देश के प्रति उनके अभिमान को स्पार्टन्स के तुल्य ही बताया है जो युद्ध भूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से यूँ ही टकरा जाते थे.
#दिवेर_का_युद्ध_बहुत_ही_भीषण_था, महाराणा प्रताप की सेना ने महाराजकुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर थाने पर हमला किया , हज़ारो की संख्या में मुग़ल, राजपूती तलवारो बरछो भालो और कटारो से बींध दिए गए।
युद्ध में महाराजकुमार अमरसिंह ने सुलतान खान मुग़ल को बरछा मारा जो #सुल्तान_खान_और_उसके_घोड़े_को_काटता_हुआ निकल गया. उसी युद्ध में एक अन्य राजपूत की तलवार एक #हाथी पर लगी और उसका #पैर काट कर निकल गई।
#महाराणा_प्रताप_ने_बहलेखान_मुगल_के_सिर_पर_वार किया और #तलवार_से_उसे_घोड़े_समेत_काट_दिया। शौर्य की ये बानगी इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलती है. उसके बाद यह कहावत बनी की मेवाड़ में सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया जाता है. ये घटनाये #मुगलो_को_भयभीत करने के लिए बहुत थी। बचे खुचे ३६००० मुग़ल सैनिकों ने #महाराणा_के_सामने_आत्म_समर्पण_कर_दिया.
दिवेर के युद्ध ने मुगलो का मनोबल इस तरह तोड़ दिया की जिसके परिणाम स्वरुप मुगलों को मेवाड़ में बनायीं अपनी सारी 36 थानों, ठिकानों को छोड़ के भागना पड़ा, यहाँ तक की जब मुगल कुम्भलगढ़ का किला तक रातो रात खाली कर भाग गए.
दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुन्दा , कुम्भलगढ़ , बस्सी, चावंड , जावर , मदारिया , मोही , माण्डलगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण ठिकानो पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद भी महाराणा और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ को छोड़ के मेवाड़ के सारे ठिकाने/दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए.
अधिकांश मेवाड़ को पुनः कब्जाने के बाद महाराणा प्रताप ने आदेश निकाला की अगर कोई एक बिस्वा जमीन भी खेती करके मुसलमानो को हासिल (टैक्स) देगा , उसका सर काट दिया जायेगा। इसके बाद मेवाड़ और आस पास के बचे ख
ुचे शाही ठिकानो पर रसद पूरी सुरक्षा के साथ अजमेर से मगाई जाती थी.
दिवेर का युद्ध न केवल महाराणा प्रताप बल्कि मुगलो के इतिहास में भी बहुत निर्णायक रहा। #मुट्ठी_भर_राजपूतो ने पुरे भारतीय उपमहाद्वीप पर राज करने वाले मुगलो के ह्रदय में भय भर दिया। दिवेर के युद्ध ने मेवाड़ में अकबर की विजय के सिलसिले पर न सिर्फ विराम लगा दिया बल्कि मुगलो में ऐसे भय का संचार कर दिया की अकबर के समय में मेवाड़ पर बड़े आक्रमण लगभग बंद हो गए.
इस घटना से क्रोधित अकबर ने हर साल लाखों सैनिकों के सैन्य बल अलग अलग सेनापतियों के नेतृत्व में मेवाड़ भेजने जारी रखे लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली. अकबर खुद 6 महीने मेवाड़ पर चढ़ाई करने के मकसद से मेवाड़ के आस पास डेरा डाले रहा लेकिन ये #महराणा_द्वारा_बहलोल_खान_को_उसके_घोड़े_समेत_आधा_चीर_देने_के_ही_डर_था कि वो सीधे तौर पे कभी मेवाड़ पे चढ़ाई करने नहीं आया.
ये इतिहास के वो पन्ने हैं जिनको #दरबारी_इतिहासकारों ने जानबूझ कर पाठ्यक्रम से गायब कर दिया है. जिन्हें अब वापस करने का प्रयास किया जा रहा है।
दिवेर का युद्ध न केवल महाराणा प्रताप बल्कि मुगलो के इतिहास में भी बहुत निर्णायक रहा। #मुट्ठी_भर_राजपूतो ने पुरे भारतीय उपमहाद्वीप पर राज करने वाले मुगलो के ह्रदय में भय भर दिया। दिवेर के युद्ध ने मेवाड़ में अकबर की विजय के सिलसिले पर न सिर्फ विराम लगा दिया बल्कि मुगलो में ऐसे भय का संचार कर दिया की अकबर के समय में मेवाड़ पर बड़े आक्रमण लगभग बंद हो गए.
इस घटना से क्रोधित अकबर ने हर साल लाखों सैनिकों के सैन्य बल अलग अलग सेनापतियों के नेतृत्व में मेवाड़ भेजने जारी रखे लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली. अकबर खुद 6 महीने मेवाड़ पर चढ़ाई करने के मकसद से मेवाड़ के आस पास डेरा डाले रहा लेकिन ये #महराणा_द्वारा_बहलोल_खान_को_उसके_घोड़े_समेत_आधा_चीर_देने_के_ही_डर_था कि वो सीधे तौर पे कभी मेवाड़ पे चढ़ाई करने नहीं आया.
ये इतिहास के वो पन्ने हैं जिनको #दरबारी_इतिहासकारों ने जानबूझ कर पाठ्यक्रम से गायब कर दिया है. जिन्हें अब वापस करने का प्रयास किया जा रहा है।
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🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे गोविंद*🙏🏻🌹
🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे* 🙏🏻🌹
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🕰➡️.44
*🙏🏻💐माँ कामाख्या देवी, (गुवाहाटी असम) 15 साल में एक बार ही माँ का चेहरा दिखता है। बाकी समय, उनका चेहरा हमेशा फूलों से ढका रहता है। आप इसे अन्य भक्तों के साथ साझा कर सकते हैं ताकि वे भी देख सकें। बहुत शक्तिशाली देवी।💐🙏🏻*
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*🙏🏻🌹 हरे कृष्ण 🙏🏻🌹*
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अगर आपकी नजर किसी नागा साधु पर पड़ती है तो आप उसे हिकारत की नज़र से देखते हुए जल्दी से आगे बढ़ जाते हैं। आपके दिल में उसके लिए कोई सम्मान नहीं पनपता।
आपको अगर ऐसा लगता है कि हमारे संत समाज ने भारत माता के कुछ नहीं किया है। कोई युद्ध नहीं लड़ा है सिर्फ मांगते रहे हैं तो आपकी यह बहुत बड़ी भूल है। वैसे इसमें आपकी कोई गलती नहीं है क्योकि भारतीय इतिहास से ना जाने क्यों नागा साधुओं का युद्ध हटा दिया गया। नागा साधुओं का युद्ध जिसमें भारत माता की रक्षा के लिए 2000 साधू संत तो शहीद हो गये थे. लेकिन दुश्मन 4 कदम भी आगे नहीं बढ़ पाया था।
तब नागा साधुओं के एक हाथ में त्रिशूल था और दूजे हाथ में शास्त्र (धार्मिक किताबें) थीं। संतों को धर्म भी बचाना था और देश भी। उस वक़्त अफगानी शासक अगर आगे बढ़ जाते तो लाखों लोगों का कत्लेआम हो सकता था. हिन्दू मंदिर तोड़ दिए जाते, लेकिन हर साधू ने अपनी बहादुरी का परिचय दिया और मरने से पहले एक-एक साधू ने सैंकड़ों दुश्मनों को धूल में मिला दिया था। इनके पास शस्त्र के नाम पर केवल त्रिशूल था और कुछ नहीं। युद्ध लड़ने के लिए इनके प्रमुख दैत्यानन्द जी ने स्थानीय राजाओं से तलवार और भाले जैसे हथियारों की मांग की पर इन्हें वह भी नहीं मिला तब मजबूर होकर इन्होंने त्रिशूल से युद्ध किया। यहाँ तक कि इनके भोजन और पानी तक कि व्यवस्था का जिम्मा किसी ने नहीं उठाया।
जब काबुल और बिलोचिस्तान की और से आक्रमण कर विदेशी आक्रमणकारी मुसलमान जोधपुर पर आये तो चारों तरफ हाहाकार था. मंदिर तोड़े जा रहे थे और कत्लेआम हो रहा था. मुस्लिम शासकों ने हर व्यक्ति पर भारी कर लगा दिया था। हिंदुओं पर जबरदस्त अत्याचार हो रहा था। तब इन नागाओं ने मुस्लिमों को परास्त किया था। वैसे यह नागा साधुओं का युद्ध इतना छोटा था कि किसीकी भी इस पर नजर नहीं पड़ती है. इसके बाद क्रूर अहमदशाह अब्दाली से साधू संतों और वह भी नागा साधुओं ने जो युद्ध लड़ा है वह युद्ध बेमिसाल था।
जब अहमदशाह अब्दाली दिल्ली और मथुरा पर आक्रमण करता हुआ गोकुल तक आ गया था। लोगों को बर्बरतापूर्वक काटा जा रहा था. महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहे थे और बच्चे देश के बाहर बेचे जा रहे थे. तभी गोकुल में अहमदशाह अब्दाली का सामना नागा साधुओं हुआ। कुछ 5 हजार साधुओं की सेना कई हजार सैनिकों से लड़ गयी थी. पहले तो अब्दाली साधुओं को मजाक में ले रहा था किन्तु तभी अब्दाली को एहसास हो गया था कि यह साधू अपनी भारत माता के लिए जान तक दे सकते हैं। इस युद्ध में 2000 नागा साधू वीरगति को प्राप्त हुए थे. लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही थी कि दुश्मनों की सेना चार कदम भी आगे नहीं बढ़ा पाई थी. जो जहाँ था वहीं ढेर कर दिया गया था या फिर पीछे हटकर भाग गया था.
तबसे कई मुस्लिम शासक जब यह सुनते थे कि युद्ध में नागा साधू भाग ले रहे हैं तो वह लड़ते ही नहीं थे. देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ नहीं है कि आज हम दुश्मन औरंगजेब को याद रखते हैं, जहाँगीर को सपनों में देखते हैं और ऐसे भारतीय वीर योद्धाओं के बारें में कुछ नहीं जानते हैं जो देश और धर्म की शान हैं.
तो इस प्रकार से साधू संतों ने देश की आजादी के लिए भी कई युद्ध लड़े है और अपनी कुर्बानियां दी हैं।
सनातन धर्म, संस्कृति और साधु संत यही पहचान रही है हमारी
हर हर महादेव ...🙏🙏🙏
आपको अगर ऐसा लगता है कि हमारे संत समाज ने भारत माता के कुछ नहीं किया है। कोई युद्ध नहीं लड़ा है सिर्फ मांगते रहे हैं तो आपकी यह बहुत बड़ी भूल है। वैसे इसमें आपकी कोई गलती नहीं है क्योकि भारतीय इतिहास से ना जाने क्यों नागा साधुओं का युद्ध हटा दिया गया। नागा साधुओं का युद्ध जिसमें भारत माता की रक्षा के लिए 2000 साधू संत तो शहीद हो गये थे. लेकिन दुश्मन 4 कदम भी आगे नहीं बढ़ पाया था।
तब नागा साधुओं के एक हाथ में त्रिशूल था और दूजे हाथ में शास्त्र (धार्मिक किताबें) थीं। संतों को धर्म भी बचाना था और देश भी। उस वक़्त अफगानी शासक अगर आगे बढ़ जाते तो लाखों लोगों का कत्लेआम हो सकता था. हिन्दू मंदिर तोड़ दिए जाते, लेकिन हर साधू ने अपनी बहादुरी का परिचय दिया और मरने से पहले एक-एक साधू ने सैंकड़ों दुश्मनों को धूल में मिला दिया था। इनके पास शस्त्र के नाम पर केवल त्रिशूल था और कुछ नहीं। युद्ध लड़ने के लिए इनके प्रमुख दैत्यानन्द जी ने स्थानीय राजाओं से तलवार और भाले जैसे हथियारों की मांग की पर इन्हें वह भी नहीं मिला तब मजबूर होकर इन्होंने त्रिशूल से युद्ध किया। यहाँ तक कि इनके भोजन और पानी तक कि व्यवस्था का जिम्मा किसी ने नहीं उठाया।
जब काबुल और बिलोचिस्तान की और से आक्रमण कर विदेशी आक्रमणकारी मुसलमान जोधपुर पर आये तो चारों तरफ हाहाकार था. मंदिर तोड़े जा रहे थे और कत्लेआम हो रहा था. मुस्लिम शासकों ने हर व्यक्ति पर भारी कर लगा दिया था। हिंदुओं पर जबरदस्त अत्याचार हो रहा था। तब इन नागाओं ने मुस्लिमों को परास्त किया था। वैसे यह नागा साधुओं का युद्ध इतना छोटा था कि किसीकी भी इस पर नजर नहीं पड़ती है. इसके बाद क्रूर अहमदशाह अब्दाली से साधू संतों और वह भी नागा साधुओं ने जो युद्ध लड़ा है वह युद्ध बेमिसाल था।
जब अहमदशाह अब्दाली दिल्ली और मथुरा पर आक्रमण करता हुआ गोकुल तक आ गया था। लोगों को बर्बरतापूर्वक काटा जा रहा था. महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहे थे और बच्चे देश के बाहर बेचे जा रहे थे. तभी गोकुल में अहमदशाह अब्दाली का सामना नागा साधुओं हुआ। कुछ 5 हजार साधुओं की सेना कई हजार सैनिकों से लड़ गयी थी. पहले तो अब्दाली साधुओं को मजाक में ले रहा था किन्तु तभी अब्दाली को एहसास हो गया था कि यह साधू अपनी भारत माता के लिए जान तक दे सकते हैं। इस युद्ध में 2000 नागा साधू वीरगति को प्राप्त हुए थे. लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही थी कि दुश्मनों की सेना चार कदम भी आगे नहीं बढ़ा पाई थी. जो जहाँ था वहीं ढेर कर दिया गया था या फिर पीछे हटकर भाग गया था.
तबसे कई मुस्लिम शासक जब यह सुनते थे कि युद्ध में नागा साधू भाग ले रहे हैं तो वह लड़ते ही नहीं थे. देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ नहीं है कि आज हम दुश्मन औरंगजेब को याद रखते हैं, जहाँगीर को सपनों में देखते हैं और ऐसे भारतीय वीर योद्धाओं के बारें में कुछ नहीं जानते हैं जो देश और धर्म की शान हैं.
तो इस प्रकार से साधू संतों ने देश की आजादी के लिए भी कई युद्ध लड़े है और अपनी कुर्बानियां दी हैं।
सनातन धर्म, संस्कृति और साधु संत यही पहचान रही है हमारी
हर हर महादेव ...🙏🙏🙏
*🚩🚩सत्य सनातन धर्म की जय हो जैहादीयो का नाश करना है🚩🚩*
✅⬇️⛳✅⬇️⛳✅⬇️⛳
*🔥⛳ये सिक्के भारत से प्राप्त नहीं हुए थे।*
*ये हरक्यूलिस की धरती से मिले थे।*
*वही हरक्यूलिस, जिसके चरित्र की विशेषताएं श्रीकृष्ण की विशेषताओं से मेल खाती है।*
*⛳गौधन का सम्मान तो सनातन ही कर सकता है।*
*एक सिक्के में बैल दिखाया गया है।*
*बैल का श्रृंगार देख मुझे दीपावली के बाद के दिनों की स्मृति हो आई,*
*जब गौधन को सजा-संवार कर गाँव में घुमाया जाता है।*
*दूसरे सिक्के में गौमाता के दर्शन होते हैं।*
*इस सिक्के में तो स्वस्तिक भी दिख रहा है।*
*जब आर्कटिक प्रदेश की भूमि से देव तुल्य अज्ञात रहस्यमयी व्यक्तियों ने वेदों का ज्ञान मौखिक रूप से सुनाया,*
*तो उस ज्ञान को लेकर सनातनी संपूर्ण विश्व में फ़ैल गए थे।*
*पृथ्वी का मूल धर्म सनातन ही था।*
*वह प्रकृति से जुड़ा हुआ था, उसमे कृत्रिमता नहीं थी।*
*पृथ्वी के नियमों के अनुरूप इस धर्म को विकसित किया गया था।*
*ये अलिखित नियम था कि इस धरा के सभी प्राणियों का एक ही धर्म होगा।*
*आज सनातन की बहुत सी फोटोकॉपी आप देख पा रहे हैं लेकिन वे प्राण विहीन है।*
*आर्कटिक प्रदेश में फूटा सनातन का पहला सोता नितांत दैवीय था।*
*ये पहली और आखिरी घटना थी,*
*⛳जब सनातन धर्म के पालक इस तरह प्रत्यक्ष रूप से सामने आए थे।*
*ये बात लोकमान्य तिलक अपने शोध के बाद लिख गए थे।*
*सिक्के पहली शताब्दी के हैं इसलिए उनका आकार पूर्ण गोल नहीं है।*
*मशीनरी के अभाव में हाथों से ढाले गए चांदी के सिक्के।*⬇️🚩
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*🔥⛳ये सिक्के भारत से प्राप्त नहीं हुए थे।*
*ये हरक्यूलिस की धरती से मिले थे।*
*वही हरक्यूलिस, जिसके चरित्र की विशेषताएं श्रीकृष्ण की विशेषताओं से मेल खाती है।*
*⛳गौधन का सम्मान तो सनातन ही कर सकता है।*
*एक सिक्के में बैल दिखाया गया है।*
*बैल का श्रृंगार देख मुझे दीपावली के बाद के दिनों की स्मृति हो आई,*
*जब गौधन को सजा-संवार कर गाँव में घुमाया जाता है।*
*दूसरे सिक्के में गौमाता के दर्शन होते हैं।*
*इस सिक्के में तो स्वस्तिक भी दिख रहा है।*
*जब आर्कटिक प्रदेश की भूमि से देव तुल्य अज्ञात रहस्यमयी व्यक्तियों ने वेदों का ज्ञान मौखिक रूप से सुनाया,*
*तो उस ज्ञान को लेकर सनातनी संपूर्ण विश्व में फ़ैल गए थे।*
*पृथ्वी का मूल धर्म सनातन ही था।*
*वह प्रकृति से जुड़ा हुआ था, उसमे कृत्रिमता नहीं थी।*
*पृथ्वी के नियमों के अनुरूप इस धर्म को विकसित किया गया था।*
*ये अलिखित नियम था कि इस धरा के सभी प्राणियों का एक ही धर्म होगा।*
*आज सनातन की बहुत सी फोटोकॉपी आप देख पा रहे हैं लेकिन वे प्राण विहीन है।*
*आर्कटिक प्रदेश में फूटा सनातन का पहला सोता नितांत दैवीय था।*
*ये पहली और आखिरी घटना थी,*
*⛳जब सनातन धर्म के पालक इस तरह प्रत्यक्ष रूप से सामने आए थे।*
*ये बात लोकमान्य तिलक अपने शोध के बाद लिख गए थे।*
*सिक्के पहली शताब्दी के हैं इसलिए उनका आकार पूर्ण गोल नहीं है।*
*मशीनरी के अभाव में हाथों से ढाले गए चांदी के सिक्के।*⬇️🚩