ऐतिहासिक मंदिर और उनकी कथा
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*इस चैनल मे हमारे मंदिरों की कथा के आडियो विडियो और हमारी सभ्यता से जुड़ी जगह का प्रसारण किया जाता है*

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ये है एशिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर, सुंदरता में इसका कोई मुकाबला ही नहीं है।
हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में बना हुआ है। हिमाचल प्रदेश के सोलन में स्थित जटोली शिव मंदिर भवननिर्माण कला का बेजोड़ नमूना है। इसे एशिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर माना जाता है। यह मंदिर शिवभक्तों की आस्था का केंद्र बना हुआ है।

यहां महाशिवरात्रि को भारी संख्या में शिवभक्त उमड़ते हैं। मंदिर दक्षिण-द्रविड़ शैली से बना है। मंदिर को बनने में करीब 39 साल का समय लगे थे।

सोलन शहर से करीब सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित जटोली मंदिर के पीछे मान्यता है कि पौराणिक समय में भगवान शिव यहां आए और कुछ समय यहां रहे थे। बाद में एक सिद्ध बाबा स्वामी कृष्णानंद परमहंस ने यहां आकर तपस्या की। उनके मार्गदर्शन और दिशा-निर्देश पर ही जटोली शिव मंदिर का निर्माण शुरू हुआ।
मंदिर के कोने में स्वामी कृष्णानंद की गुफा है। यहां पर शिव लिंग स्थापित किया गया है।

मंदिर का गुंबद 111 फीट ऊंचा है। इसी कारण ये एशिया का सबसे ऊंचा मंदिर है।
जय_जय_महाकाल
🙏हरि ॐ तत्सत् 🙏हरि ॐ तत्सत् 🙏हरि ॐ तत्सत्
हरे कृष्ण,

मादा बिच्छू की मृत्यु बहुत बहुत बहुत ही दु:खदायी रूप में होती है!! नीचे दिया गया चित्र एक मादा बिच्छु का है , इसकी अस्थिमज्जा पर मौजूद ये इसके बच्चे हैं, ये सभी बच्चे जन्म लेते ही अपनी मां की पीठ पर बैठ जाते हैं और अपनी भूख मिटाने हेतु तुरंत ही अपनी माँ के शरीर को ही खाना प्रारम्भ कर देते हैं, और तब तक खाते हैं जब तक कि उसकी केवल अस्थियां ही शेष ना रह जाए। वो तड़पती है , कराहती है , लेकिन ये पीछा नहीं छोड़ते , और ये उसे पलभर में नहीं मार देते बल्कि कई दिनों तक यह मौत से बदतर असहनीय पीड़ा को झेलती हुई दम तोड़ती है।
मादा बिच्छु की मौत होने पश्चात् ही ये सभी उसकी पीठ से नीचे उतरते हैं !!!

लख चौरासी के कुचक्र में ऐसी असंख्य योनियां हैं , जिनकी स्थितियां अज्ञात हैं , कदाचित् इसीलिए भवसागर को अगम और अपार कहा गया है।
*ऋषिमत के मुताबिक यह भी मनुष्य योनि में किए गये कर्मों का ही भुगतान है।*

अर्थात्
इन्सान इस मनुष्य जीवन में जो कर्म करेगा , नाना प्रकार की असंख्य योनियों में इन कर्मों के आधार से ही उसे दुःख सुख मिलते रहेंगे।
यह तय है !!!

चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय
दोय पाटन के बीच में, साबुत बचा ना कोय।

साथियों,

*मनुष्य जन्म बड़ी मुश्किल से मिला है...*
*ये जो गलियों में आवारा जानवर घूम रहे हैं न ... इन्हें भी कभी मनुष्य जन्म मिला था... इनमें से कोई डॉक्टर था... कोई इंजीनियर.. कोई कुछ और...*

*इनके गुरु भी इन्हें हरिनाम का भजन करने को कहते थे तो हँस कर जवाब देते थे कि... अभी हमारे पास टाइम नहीं है...*

*वो मनुष्य जन्म हार गए ... भगवान का भजन व धन्यवाद नहीं किया... पशु योनि में आ गए...*

*अब देखो टाइम ही टाइम है.... बेचारे गली - गली आवारा घूमते हैं... कोई धुत्कारता है... कोई फटकारता है...कर्म बहुत रूला डालते हैं ... किसी को नहीं छोड़ते अब नहीं समझेंगे तो कब समझेंगे...??*

*हरिनाम का भजन कर्मफलों को भी धो डालता हैं...*

*हमें चाहिए कि....*
*हरिनाम जाप जरूर करें...*

*सदैव जपें और खुश रहे*
*हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे*
*हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे*

🙏🏼🙏जय श्री कृष्ण🙏
जब औरंगजेब ने मथुरा का श्रीनाथ मंदिर तोड़ा तो मेवाड़ के नरेश राज सिंह 100 मस्जिद तुड़वा दिये थे।अपने पुत्र भीम सिंह को गुजरात भेजा, कहा 'सब मस्जिद तोड़ दो तो भीम सिंह ने 300 मस्जिद तोड़ दी थी'।वीर दुर्गादास राठौड़ ने औरंगजेब की नाक में दम कर दिया था और महाराज अजीत सिंह को राजा बनाकर ही दम लिया।कहा जाता है कि दुर्गादास राठौड़ का भोजन, जल और शयन सब अश्व के पार्श्व पर ही होता था। वहाँ के लोकगीतों में ये गाया जाता है कि यदि दुर्गादास न होते तो राजस्थान में सुन्नत हो जाती।वीर दुर्गादास राठौड़ भी शिवाजी के जैसे ही छापामार युद्ध की कला में विशेषज्ञ थे।मध्यकाल का दुर्भाग्य बस इतना है कि हिन्दू संगठित होकर एक संघ के अंतर्गत नहीं लड़े, अपितु भिन्न भिन्न स्थानों पर स्थानीय रूप से प्रतिरोध करते रहे।औरंगजेब के समय दक्षिण में शिवाजी, राजस्थान में दुर्गादास, पश्चिम में सिख गुरु गोविंद सिंह और पूर्व में लचित बुरफुकन, बुंदेलखंड में राजा छत्रसाल आदि ने भरपूर प्रतिरोध किया और इनके प्रतिरोध का ही परिणाम था कि औरंगजेब के मरते ही मुगलवंश का पतन हो गया।इतिहास साक्षी रहा है कि जब जब आततायी अत्यधिक बर्बर हुए हैं, हिन्दू अधिक संगठित होकर प्रतिरोध किया है। हिन्दू स्वतंत्र चेतना के लिए ही बना है। हिंदुओं का धर्मांतरण सूफियों ने अधिक किया है। तलवार का प्रतिरोध तो उसने सदैव किया है, बस सूफियों और मिशनरियों से हार जाता है।बाबर ने मुश्किल से कोई 4 वर्ष राज किया। हुमायूं को ठोक पीटकर भगा दिया। मुग़ल साम्राज्य की नींव अकबर ने डाली और जहाँगीर, शाहजहाँ से होते हुए औरंगजेब आते आते उखड़ गया।कुल 100 वर्ष (अकबर 1556ई. से औरंगजेब 1658ई. तक) के समय के स्थिर शासन को मुग़ल काल नाम से इतिहास में एक पूरे पार्ट की तरह पढ़ाया जाता है....मानो सृष्टि आरम्भ से आजतक के कालखण्ड में तीन भाग कर बीच के मध्यकाल तक इन्हीं का राज रहा....!•अब इस स्थिर (?) शासन की तीन चार पीढ़ी के लिए कई किताबें, पाठ्यक्रम, सामान्य ज्ञान, प्रतियोगिता परीक्षाओं में प्रश्न, विज्ञापनों में गीत, ....इतना हल्ला मचा रखा है, मानो पूरा मध्ययुग इन्हीं 100 वर्षों के इर्द गिर्द ही है।•जबकि उक्त समय में मेवाड़ इनके पास नहीं था। दक्षिण और पूर्व भी एक सपना ही था।अब जरा विचार करें..... क्या भारत में अन्य तीन चार पीढ़ी और शताधिक वर्षों तक राज्य करने वाले वंशों को इतना महत्त्व या स्थान मिला है ?*अकेला विजयनगर साम्राज्य ही 300 वर्षों तक टिका रहा।हम्पी नगर में हीरे माणिक्य की मण्डियां लगती थीं।महाभारत युद्ध के बाद 1006 वर्ष तक जरासन्ध वंश के 22 राजाओं ने,5 प्रद्योत वंश के राजाओं ने 138 वर्ष ,10 शैशुनागों ने 360 वर्षों तक ,9 नन्दों ने 100 वर्षों तक ,12 मौर्यों ने 316 वर्षों तक ,10 शुंगों ने 300 वर्षों तक ,4 कण्वों ने 85 वर्षों तक ,33 आंध्रों ने 506 वर्षों तक ,7 गुप्तों ने 245 वर्षों तक राज्य किया ।और पाकिस्तान के सिंध, पंजाब से लेके अफ़ग़ानिस्तान के पर समरकन्द तक राज करने वाले रघुवंशी लोहाणा(लोहर-राणा) जिन्होने देश के सारे उत्तर-पश्चिम भारत वर्ष पर राज किया और सब से ज्यादा खून देकर इस देश को आक्रांताओ से बचाया, सिकंदर से युद्ध करने से लेकर मुहम्मद गजनी के बाप सुबुकटिगिन को इनके खुद के दरबार मे मारकर इनका सर लेके मूलतान मे लाके टाँगने वाले जसराज को भुला दिया।कश्मीर मे करकोटक वंश के ललितादित्य मुक्तपीड ने आरबों को वो धूल चटाई की सदियो तक कश्मीर की तरफ आँख नहीं उठा सके। और कश्मीर की सबसे ताकतवर रानी दिद्दा लोहराणा(लोहर क्षत्रिय) ने सब से मजबूत तरीके से राज किया। और सारे दुश्मनों को मार दिया।तारीखे हिंदवा सिंध और चचनामा पहला आरब मुस्लिम आक्रमण जिन मे कराची के पास देब्बल मे 700 बौद्ध साध्विओ का बलात्कार नहीं पढ़ाया जाता। और इन आरबों को मारते हुए इराक तक भेजने वाले बाप्पा रावल, नागभट प्रथम, पुलकेसीन जैसे वीर योद्धाओ के बारेमे नहीं पढ़ाया जाता।*फिर विक्रमादित्य ने 100 वर्षों तक राज्य किया था । इतने महान सम्राट होने पर भी भारत के इतिहास में गुमनाम कर दिए गए ।•उनका वर्णन करते समय इतिहासकारों को मुँह का कैंसर हो जाता है। सामान्य ज्ञान की किताबों में पन्ने कम पड़ जाते है। पाठ्यक्रम के पृष्ठ सिकुड़ जाते है। प्रतियोगी परीक्षकों के हृदय पर हल चल जाते हैं।वामपंथी इतिहासकारों ने नेहरूवाद का ........ भक्षण कर, जो उल्टियाँ की उसे ज्ञान समझ चाटने वाले चाटुकारों...!तुम्हे धिक्कार है !!!•यह सब कैसे और किस उद्देश्य से किया गया ये अभी तक हम ठीक से समझ नहीं पाए हैं और ना हम समझने का प्रयास कर रहे हैं।एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत हिन्दू योद्धाओं को इतिहास से बाहर कर सिर्फ मुगलों को महान बतलाने वाला नकली इतिहास पढ़ाया जाता है। महाराणा प्रताप के स्थान पर अत्याचारी व अय्याश अकबर को महान होना लिख दिया है।ये इतिहास को ऐसा प्रस्तुत करने का जिम्मेवार सिर्फ एक व
्यक्ति है वो है,,मौलाना आजाद भारत का पहला केंद्रीय शिक्षा मंत्री अब यदि इतिहास में उस समय के वास्तविक हिन्दू योद्धाओं को सम्मिलित करने का प्रयास किया जाता है तो विपक्ष शिक्षा के भगवा करण करने का आरोप लगाता है !

सब लोग दबाकर कॉपी-पेस्ट करें, शेयर भी करें.... ताकी इस कड़वी सच्चाई को अधिक से अधिक लोग जान सके,,,,,,
*कलकत्ता का विश्वप्रसिद्ध काली माता का मंदिर*
*🛕 कालिंजर किला, कालिंजर(मध्यप्रदेश)*

*🔶कालिंजर का किला भारत के सबसे विशाल और अपराजेय दुर्गों में गिना जाता रहा है। प्राचीन काल में यह दुर्ग जयशक्ति साम्राज्य के आधीन था। इन राजाओं के शासनकाल में कालिंजर पर महमूद गजनवी, कुतुबुद्दीन ऐबक, शेर शाह सूरी और हुमांयू जैसे योद्धाओं ने आक्रमण किए, लेकिन इस पर विजय पाने में असफल रहे।*

*🔶इस किले में कई प्राचीन मंदिर भी हैं। इनमें से कई मंदिर तीसरी से पांचवीं सदी यानी गुप्तकाल के हैं। यहां के शिव मंदिर के बारे में मान्यता है कि सागर-मंथन से निकले विष को पीने के बाद भगवान शिव ने यहीं तपस्या कर उसकी ज्वाला शांत की थी।*

*🔶 800 फीट ऊंचाई पर नीलकंठ महादेव का मंदिर व 5 फिट ऊंचा शिवलिंग है। हजारों साल से शिवलिंग के गले से रिस रहा पसीना बनकर विष। इस किले का 18 पुराणों व 4 वेदों में वर्णन है।*
*⛳🤝हिन्दू एकता🤝⛳*

*🚩विधर्मियो पर प्रहार 💪*

*" # 😡😡 "*
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*🕉️सनातन धर्म का इतिहास जानो🕉️*

*🛕माँ हरसिद्धि मंदिर (उज्जैन) म.प्र*

*🔶51 फीट ऊंचे 2 दीप स्तंभों को जलाने में लगता है 60 लीटर तेल और 4 किलो रुई 2 वर्ष पहले 51 फीट ऊंचे 2 दीप स्तंभों को जलाने में लगता है 60 लीटर तेल और 4 किलो रुई|*

*🔶मध्य प्रदेश के उज्जैन में हरसिद्धि मंदिर है जो माता के 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि इस स्थान पर देवी सती की कोहनी गिरी थी। मंदिर प्रांगण में स्थापित 2 दीप स्तंभ। ये दीप स्तंभ लगभग 51 फीट ऊंचे हैं। दोनों दीप स्तंभों में मिलाकर लगभग 1 हजार 11 दीपक हैं। मान्यता है कि इन दीप स्तंभों की स्थापना उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने करवाई थी।*

*🔶विक्रमादित्य का इतिहास करीब 2 हजार साल पुराना है। इस दृष्टिकोण से ये दीप स्तंभ लगभग 2 हजार साल से अधिक पुराने हैं*

*🔶उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य माता हरसिद्धि के परम भक्त थे। किवदंती है कि हर बारह साल में एक बार वे अपना सिर माता के चरणों में अर्पित कर देते थे, लेकिन माता की कृपा से पुन: नया सिर मिल जाता था।*

*🔶बारहवीं बार जब उन्होंने अपना सिर चढ़ाया तो वह फिर वापस नहीं आया। इस कारण उनका जीवन समाप्त हो गया। आज भी मंदिर के एक कोने में 11 सिंदूर लगे रुण्ड पड़े हैं। कहते हैं ये उन्हीं के कटे हुए मुण्ड हैं।*

*सत्य सनातन धर्म🙏🚩*
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_*🚩खून अपना गर्म है*_
_*क्योकि सनातन अपना धर्म है 💪*_
क्या आप जानते है कि वृंदावन में करीब 54 एकड़ परिसर में दीदी साध्वी ऋतंभरा जी का 'वात्सल्य ग्राम' आश्रम है।
आश्रम के विशाल दरवाजे के बाईं ओर एक पालना है, जहां कोई भी व्यक्ति, किसी भी समय अनचहा या अनाथ शिशु को रखकर जा सकता है।
पालने में बच्चा छोड़कर जाने वाले व्यक्ति को आश्रम से संबंधित सदस्य किसी भी प्रकार का प्रश्‍न नहीं पूछता। पालने में कोई बच्चा रखते ही पालने पर लगा सेंसर आश्रम के व्यवस्थापन को इसकी सूचना देता है और आश्रम का कोई अधिकारी आकर उस बच्चे को आश्रम ले आता है। आश्रम में प्रवेश होते ही वह बच्चा वात्सल्य ग्राम परिवार का सदस्य हो जाता है। अब वह वह अनाथ नहीं कहलाता, उसे आश्रम में ही माँ, मौसी, दादा-दादी; सब रिश्तेदार मिल जाते हैं !
इसके बाद सीबीएसई की पढ़ाई ....प्राकृतिक चिकत्सा .... योग.. मिलिट्री ट्रेनिंग सब देते हुए उसकी शादी तक करवाई जाती है ..
ये है हिंदुत्व का एक दर्शन .. सनातन धर्मियों का भाव ... हिन्दुस्तान में ऐसे सेवा भाव से किये गए कार्यों में सिर्फ सनातन याने हिन्दुधर्मी लोग ही मिलेंगे...!!
जय माँ भारती 🚩
🚩🔱

7 मार्च 1679 ई0 की बात है,
*ठाकुर सुजान सिंह अपनी शादी की बारात लेकर जा रहे थे,*
22 वर्ष के सुजान सिंह किसी देवता की तरह लग रहे थे।
ऐसा लग रहा था मानो देवता अपनी बारात लेकर जा रहे हों..

उन्होंने अपने दुल्हन का मुख भी नहीं देखा था,
शाम हो चुकी थी , इसलिए
*रात्रि विश्राम के लिए "छापोली" में पड़ाव डाल दिये।*
कुछ ही क्षणों में उन्हें गायों में लगे घुंघरुओं की आवाजें सुनाई देने लगी,
आवाजें स्पष्ट नहीं थीं,
फिर भी वे सुनने का प्रयास कर रहे थे,
मानो वो आवाजें उनसे कुछ कह रही थी।

सुजान सिंह ने अपने लोगों से कहा, शायद ये चरवाहों की आवाज है जरा सुनो वे क्या कहना चाहते हैं।

*गुप्तचरों ने सूचना दी कि युवराज ये लोग कह रहे है कि कोई फौज "देवड़े" पर आई है।*

वे चौंक पड़े और फिर कहा कि कैसी फौज, किसकी फौज, किस मंदिर पे आयी है ?

जवाब आया
*"युवराज ये औरंगजेब की बहुत ही विशाल सेना है, जिसका सेनापति दराबखान है, जो खंडेला के बाहर पड़ाव डाल रखी है।*

*कल खंडेला स्थित श्रीकृष्णमंदिर को तोड़ दिया जाएगा ।*

निर्णय हो चुका था,
एक ही पल में सब कुछ बदल गया।
शादी के खुशनुमा चहरे अचानक सख्त हो चुके थे।
कोमल शरीर वज्र के समान कठोर हो चुका था।

जो बाराती थे, वे सेना में तब्दील हो चुके थे,
वे अपने सेना के लोगों से विचार विमर्श करने लगे ।

तब उनको पता चला कि
*उनके साथ सिर्फ 70 सेना थी।*

तब वे रात्रि के समय में बिना एक पल गंवाए उन्होंने
*पास के गांव से कुछ आदमी इकठ्ठे कर लिए।*

*करीब 500 घुड़सवार अब उनके पास हो चुके थे।*

अचानक उन्हें अपनी पत्नी की याद आयी, जिसका मुख भी वे नहीं देख पाए थे,
जो डोली में बैठी हुई थी।

क्या बीतेगी उसपे ?? जिसने अपनी लाल जोड़े भी ठीक से नहीं देखी हो।

वे तरह-तरह के विचारों में खोए हुए थे,
तभी उनके कानों में अपनी माँ को दिए वचन याद आये, जिसमें उन्होंने राजपूती धर्म को ना छोड़ने का वचन दिया था,
उनकी पत्नी भी सारी बातों को समझ चुकी थी,
डोली के तरफ उनकी नजर गयी, उनकी पत्नी महँदी वाली हाथों को निकालकर इशारा कर रही थी ।
मुख पे प्रसन्नता के भाव थे,
वो एक सच्ची क्षत्राणी के कर्तब्य निभा रही थी, मानो वो खुद तलवार लेकर दुश्मन पे टूट पड़ना चाहती थी, परंतु ऐसा नहीं हो सकता था ।

सुजान सिंह ने डोली के पास जाकर डोली को और अपनी पत्नी को प्रणाम किये और
*कहारों और नाई को डोली सुरक्षित अपने राज्य भेज देने का आदेश दे दिया , और खुद खंडेला को घेरकर उसकी चौकसी करने लगे ।*

लोग कहते हैं कि
*मानो खुद कृष्ण उस मंदिर की चौकसी कर रहे थे,*
*उनका मुखड़ा भी श्रीकृष्ण की ही तरह चमक रहा था।*

8 मार्च 1679 को दराबखान की सेना आमने सामने आ चुकी थी,
महाकाल भक्त सुजान सिंह ने
अपने इष्टदेव को याद किये और
*हर हर महादेव के जयघोष के साथ 10 हजार की मुगल सेना के साथ सुजान सिंह के 500 वीरों के बीच घनघोर युद्ध आरम्भ हो गया ।*

सुजान सिंह ने दराबखान को मारने के लिए उसकी ओर लपके
और 40 मुगल सेना को मौत के घाट उतार दिए ।

ऐसे पराक्रम को देखकर दराबखान पीछे हटने में ही भलाई समझी, लेकिन ठाकुर सुजान सिंह रुकनेवाले नहीं थे ।

जो भी उनके सामने आ रहा था वो मारा जा रहा था ।
सुजान सिंह साक्षात मृत्यु का रूप धारण करके युद्ध कर रहे थे ।
ऐसा लग रहा था मानो खुद महाकाल ही युद्ध कर रहे हों ।

इस बीच कुछ लोगों की नजर सुजान सिंह पे पड़ी,
*लेकिन ये क्या !!!*
*सुजान सिंह के शरीर में सिर तो है ही नहीं...!!!*

लोगों को घोर आश्चर्य हुआ,
लेकिन
उनके अपने लोगों को ये समझते देर नहीं लगी
कि सुजान सिंह तो कब के मोक्ष को प्राप्त कर चुके हैं ।

*ये जो युद्ध कर रहे हैं, वे सुजान सिंह के इष्टदेव हैं ।*

*सबों ने मन ही मन अपना शीश झुककर इष्टदेव को प्रणाम किये ।*

*अब दराबखान मारा जा चुका था,*
*मुगल सेना भाग रही थी,*

*लेकिन ये क्या, सुजान सिंह घोड़े पे सवार बिना सिर के ही मुगलों का संहार कर रहे थे ।*

*उस युद्धभूमि में मृत्यु का ऐसा तांडव हुआ,*
*जिसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुगलों की 7 हजार सेना अकेले सुजान सिंह के हाथों मारी जा चुकी थी ।*

*जब मुगल की बची खुची सेना पूर्ण रूप से भाग गई, तब सुजान सिंह जो सिर्फ शरीर मात्र थे, मंदिर का रुख किये ।*

इतिहासकार कहते हैं कि
देखनेवालों को
*सुजान के शरीर से दिव्य प्रकाश का तेज निकल रहा था,*
*एक अजीब विश्मित करनेवाला प्रकाश निकल रहा था,*
*जिसमें सूर्य की रोशनी भी मन्द पड़ रही थी ।*

*ये देखकर उनके अपने लोग भी घबरा गए थे और सबों ने एक साथ श्रीकृष्ण की स्तुति करने लगे,*

*घोड़े से नीचे उतरने के बाद सुजान सिंह का शरीर मंदिर के प्रतिमा के सामने जाकर लुढ़क गया ... और एक शूरवीर योद्धा का अंत हो गया ।*

"माँ भारती के इस शूरवीर योद्धा को कोटि-कोटि नमन"
🙏🏻💐💐




🚩🚩🚩🚩🚩
बदलते भारत की सुनहरी छवि।😊

आज तक मॉल में जहां सिर्फ़ क्रिसमस ट्री और वैलेंटायन डे की सजावट होती थी,
पहली बार किसी मॉल में भारतीय संस्कृति के अनुरूप: भव्य राम मंदिर की सजावट की गयी। #जय_श्री_राम
(चित्र: पसिफ़िक मॉल, टगोर गार्डेन दिल्ली)
Forwarded from Sadhak Swami
Why does Diwali come exactly 21 days after Dussehra every year? If you don't believe, check the calendar. Valmiki sage says that it took 21 days (504 hours) to reach Ayodhya on foot from Sri Lanka for Lord Ramachandra's army !!!! So 504 hours divided by 24 hours, the answer will be 21.00 is 21 days.
I was surprised. To confirm, I searched on Google map out of curiosity. I was shocked to see the distance from Sri Lanka to Ayodhya on foot is 3145 km and time taken to walk is 504 hr !!!!
Google Map is completely reliable these days. We celebrate Dussehra and Diwali since Tretayug, according to the tradition.
If you don't believe me, do a Google search and share this information with others. Valmiki sage had written Ramayana with accuracy. *How great is our Hindu culture.Be proud of being born in Hindu culture!*
*Jai Shriram. Jai Shriram.*
🙏🙏
*2021 साल में हरिद्वार में होने वाले कुंभ स्नान की तिथियां सहित जानकारी,*

*सनातन संस्कृति के पर्व को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें* 🙏🏻🙏🏻