नामची में चारधाम,भारत 🙏🚩🚩
इसे सिक्किम में सिद्धेश्वर धाम कहा जाता है, जिसमें शिव की 108 फीट ऊंची प्रतिमा है, 12 ज्योतिर्लिंगों की प्रतिकृति और पवित्र चारधाम के मॉडल हैं।
नामची सिक्किम में सोलोफोक पहाड़ी पर चारधाम
नामची सिक्किम प्रदेश में सोलोफोक पहाड़ी पर स्थित चारधाम भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों की एक ही जगह समेट कर पर बनायी गयी प्रतिकृति है। यहां पर भारत के चारों कोनों में स्थित चार धाम, जैसे रामेश्वरम, सोमनाथ, पुरी और बद्रीनाथ और पूरे भारतखंड में स्थित 12 ज्योतिर्लिंग शामिल हैं। सिद्धेश्वर धाम के नाम से जाने इस स्थल के आकर्षण का शिखर बिन्दु भगवान शिव की ऊँची-लंबी प्रतिमा है।
दक्षिण सिक्किम में बसा हुआ, सिक्किम के दक्षिण जिले का जिला मुख्यालय होने के बावजूद नामची एक छोटा सा शहर है। रंगीत नदी के किनारे बसे बाईगुने में कुछ सुंदर दिन बिताने के बाद हम नामची की ओर बढ़े। हमारे लिए नामची के दौरे का सबसे बड़ा आकर्षण यहां की सोलोफोक पहाड़ी पर स्थित चारधाम या सिद्धेश्वर धाम था। हमसे एक दिन पहले जो लोग पहाड़ी का दौरा कर आए थे उनसे हमने इस तीर्थ स्थल के बारे में बहुत सुना था। हम वहाँ के नवनिर्मित परिसर, जो सिक्किम पर्यटन का पसंदीदा गंतव्य बन चुका था, को देखने के लिए सबसे ज्यादा उत्साहित थे।
नामची सिक्किम के सोलोफोक पहाड़ी का इतिहास
महाकाव्य महाभारत में एक ऐसा अध्याय है जहां पर अर्जुन शिव भगवान से पशुपतिअस्त्र प्राप्त करने के लिए कड़ी तपस्या करते हैं। जब शिवजी उनके समर्पित धीरज से प्रसन्न हुए, तो उन्होंने अर्जुन के समुख प्रकट होकर उन्हें पशुपतिअस्त्र का वरदान दे दिया। कहा जाता है कि यह प्रकरण नामची की सोलोफोक पहाड़ी पर घटित हुआ था। मैंने धार्मिक सिक्किम पर एक किताब पढ़ी थी जिसके अनुसार, अर्जुन को पशुपतिअस्त्र का आशीर्वाद देने के लिए इस पहाड़ी पर शिव भगवान के अवतरण की खुशी मनाने के प्रतीक स्वरूप चारधाम का परिसर बनवाया गया था। इस परिसर का उद्घाटन नवंबर 2011 में श्री जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज और अनेकों धार्मिक गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में प्राण प्रतिष्ठान के साथ हुआ।
ऊंची पहाड़ी पर स्थित होने के कारण मेघ हमेशा इस अद्वितीय तीर्थ यात्रा का हिस्सा बनते हैं। इन बादलों के बीच से गुजरते हुए आप मंदिरों और भगवान शिव की मूर्ति को बादलों के बीच से उभरते हुए देख सकते हैं, जो आपको एक झलक देकर वापस बादलों के बीच खो जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है, मानो भगवान आपको दूसरे कामों के लिए आगे बढ़ने से पहले दर्शन दे रहे हैं। अगर बादल इस जगह को थोडा फीका बनाते हैं, तो यहाँ के फूल अपने रंगों की जीवंतता से पूरे वातावरण में खुशी भर देते हैं। चारों ओर इतने सुंदर पहाड़ी फूल हैं कि हम रास्ते में रुक-रुक कर उनकी तस्वीरें खिचते रहे।
नामची सिक्किम में चारधाम का परिसर
नामची के चारधाम परिसर का केंद्रीय आकर्षण 87 फीट ऊँची शिव मूर्ति है जो पहाड़ी के शिखर पर स्थित है। यहां से शिव भगवान पूरे चारधाम परिसर और उसके चारों ओर की घाटियों की निगरानी करते हैं। यह मूर्ति पहाड़ी के पश्चिमी छोर पर पूर्वी दिशा की ओर मुख किए स्थित है। यह मूर्ति 12 ज्योतिर्लिंगों से घिरी है।यह 12 प्रसिद्ध शिव मंदिर पूरे भारत के धार्मिक भूगोल पर फैले हैं। यहां का हर एक शिवलिंग अपने मूल जगह पर स्थापित शिवलिंग की सटीक प्रतिकृति है।
#भारतवर्ष #सिद्धेश्वरधाम
#राहुल
#रितेश
#हिन्दू
#हिन्दुराष्ट्र
*दिपावली आ रही है दोस्तो.सामान ऐसी जगह से खरीदे जिसका दूकानदार आपकी वजह से दशहरा दिपावली मना सके और उन दुकानदारो का विशेष ध्यान रखे जिन्होने CAA के विरोध मे दुकान बंद की थी।*
*उन दुकानदार का भी ध्यान रखे जिनकी औलादे सोशल मिडिया पर राम मंदिर को तोड़ने का कैंपेन चला रही है। इनका आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार करे।*
*आपकी वजह से कोई दिपावली मना सके ऐसे दुकानदार से सामान ले ऐसे दुकान से कभी नही जो अपनी कमाई का एक हिस्सा आतंकी संगठनो को देता हो।*
*हलाल सर्टीफाइड प्रोडक्ट और उसकी कंपनी का बहिष्कार करे*
"""मुझसे जुड़ने के लिए मेरी प्रॉफाइल *राहुल जरीवाला* को खोल कर follow पर क्लिक करे एवम see first सेलेक्ट करे"""
सभार:-®.जागले।
🇮🇳🕉️हिन्दुराष्ट्रम🕉️🇮🇳
🇮🇳🕉️जय माँ भारती🕉️🇮🇳
🇮🇳🕉️उत्तिष्ठ भारतः🕉️🇮🇳
🇮🇳🕉️माँ तुझे प्रणाम🕉️🇮🇳
इसे सिक्किम में सिद्धेश्वर धाम कहा जाता है, जिसमें शिव की 108 फीट ऊंची प्रतिमा है, 12 ज्योतिर्लिंगों की प्रतिकृति और पवित्र चारधाम के मॉडल हैं।
नामची सिक्किम में सोलोफोक पहाड़ी पर चारधाम
नामची सिक्किम प्रदेश में सोलोफोक पहाड़ी पर स्थित चारधाम भारत के प्रमुख तीर्थ स्थलों की एक ही जगह समेट कर पर बनायी गयी प्रतिकृति है। यहां पर भारत के चारों कोनों में स्थित चार धाम, जैसे रामेश्वरम, सोमनाथ, पुरी और बद्रीनाथ और पूरे भारतखंड में स्थित 12 ज्योतिर्लिंग शामिल हैं। सिद्धेश्वर धाम के नाम से जाने इस स्थल के आकर्षण का शिखर बिन्दु भगवान शिव की ऊँची-लंबी प्रतिमा है।
दक्षिण सिक्किम में बसा हुआ, सिक्किम के दक्षिण जिले का जिला मुख्यालय होने के बावजूद नामची एक छोटा सा शहर है। रंगीत नदी के किनारे बसे बाईगुने में कुछ सुंदर दिन बिताने के बाद हम नामची की ओर बढ़े। हमारे लिए नामची के दौरे का सबसे बड़ा आकर्षण यहां की सोलोफोक पहाड़ी पर स्थित चारधाम या सिद्धेश्वर धाम था। हमसे एक दिन पहले जो लोग पहाड़ी का दौरा कर आए थे उनसे हमने इस तीर्थ स्थल के बारे में बहुत सुना था। हम वहाँ के नवनिर्मित परिसर, जो सिक्किम पर्यटन का पसंदीदा गंतव्य बन चुका था, को देखने के लिए सबसे ज्यादा उत्साहित थे।
नामची सिक्किम के सोलोफोक पहाड़ी का इतिहास
महाकाव्य महाभारत में एक ऐसा अध्याय है जहां पर अर्जुन शिव भगवान से पशुपतिअस्त्र प्राप्त करने के लिए कड़ी तपस्या करते हैं। जब शिवजी उनके समर्पित धीरज से प्रसन्न हुए, तो उन्होंने अर्जुन के समुख प्रकट होकर उन्हें पशुपतिअस्त्र का वरदान दे दिया। कहा जाता है कि यह प्रकरण नामची की सोलोफोक पहाड़ी पर घटित हुआ था। मैंने धार्मिक सिक्किम पर एक किताब पढ़ी थी जिसके अनुसार, अर्जुन को पशुपतिअस्त्र का आशीर्वाद देने के लिए इस पहाड़ी पर शिव भगवान के अवतरण की खुशी मनाने के प्रतीक स्वरूप चारधाम का परिसर बनवाया गया था। इस परिसर का उद्घाटन नवंबर 2011 में श्री जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती महाराज और अनेकों धार्मिक गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में प्राण प्रतिष्ठान के साथ हुआ।
ऊंची पहाड़ी पर स्थित होने के कारण मेघ हमेशा इस अद्वितीय तीर्थ यात्रा का हिस्सा बनते हैं। इन बादलों के बीच से गुजरते हुए आप मंदिरों और भगवान शिव की मूर्ति को बादलों के बीच से उभरते हुए देख सकते हैं, जो आपको एक झलक देकर वापस बादलों के बीच खो जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है, मानो भगवान आपको दूसरे कामों के लिए आगे बढ़ने से पहले दर्शन दे रहे हैं। अगर बादल इस जगह को थोडा फीका बनाते हैं, तो यहाँ के फूल अपने रंगों की जीवंतता से पूरे वातावरण में खुशी भर देते हैं। चारों ओर इतने सुंदर पहाड़ी फूल हैं कि हम रास्ते में रुक-रुक कर उनकी तस्वीरें खिचते रहे।
नामची सिक्किम में चारधाम का परिसर
नामची के चारधाम परिसर का केंद्रीय आकर्षण 87 फीट ऊँची शिव मूर्ति है जो पहाड़ी के शिखर पर स्थित है। यहां से शिव भगवान पूरे चारधाम परिसर और उसके चारों ओर की घाटियों की निगरानी करते हैं। यह मूर्ति पहाड़ी के पश्चिमी छोर पर पूर्वी दिशा की ओर मुख किए स्थित है। यह मूर्ति 12 ज्योतिर्लिंगों से घिरी है।यह 12 प्रसिद्ध शिव मंदिर पूरे भारत के धार्मिक भूगोल पर फैले हैं। यहां का हर एक शिवलिंग अपने मूल जगह पर स्थापित शिवलिंग की सटीक प्रतिकृति है।
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*उन दुकानदार का भी ध्यान रखे जिनकी औलादे सोशल मिडिया पर राम मंदिर को तोड़ने का कैंपेन चला रही है। इनका आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार करे।*
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सभार:-®.जागले।
🇮🇳🕉️हिन्दुराष्ट्रम🕉️🇮🇳
🇮🇳🕉️जय माँ भारती🕉️🇮🇳
🇮🇳🕉️उत्तिष्ठ भारतः🕉️🇮🇳
🇮🇳🕉️माँ तुझे प्रणाम🕉️🇮🇳
*प्रशासक समिति✊🚩*
(०४/०३)
*📚📚✒️आओ सही इतिहास पढें:- ०३)*
*🤺वीरों/वीरांगनाओं की गाथा ⚔️*
*👉३) महाप्रतापी, 64 सिद्धियों के धनी "राजा भोज"*
*👇आपने वो कहावत ज़रूर सुनी होगी -*
" _कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगुतेली!"_
*👆जिसका अर्थ होता है, दो लोगों के बीच बहुत अधिक अतंर होना या फिर किन्हीं दो लोगों के बीच बेमेल तुलना। आइए आज हम पढ़ते हैं उस राजा के बारे में जिनके साथ ये कहावत जुड़ा हुआ है। आइए हम पढ़ते हैं 'राजा भोज' के बारे में।*
*🤺राजा भोज कौन थे!🚩* *✍️भारतीय इतिहास में सर्वाधिक लोकप्रिय राजाओं की अग्रिम पंक्ति में अपनी पहचान बनाने वाले राजा भोज का नाम भला किसने नहीं सुना होगा! लेकिन अफसोसजनक बात ये है कि उनके बारे में लोगों को ज्यादा कुछ ज्ञात नहीं है। ऐसा हम इसलिए भी कह रहे हैं क्योंकि इतिहास के किताबों में उन्हें वो स्थान दिया ही नहीं गया जिसके वो दावेदार थे।*
*🙏सहनशील, दयालु, प्रजापालक, वीर, प्रतापी आदि गुणों के स्वामी राजा भोज!*
वीरता, साहस और न्यायप्रियता की जीवंत मूरत राजा भोज उस समय केवल भारतवर्ष में ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व में प्रचलित थे।
*✍️वैसे तो 'भोज' नाम से और भी कई राजा हुए हैं। लेकिन हम यहां बात कर रहे हैं उन राजा भोज की जिन्होंने अपनी राजधानी उज्जैनी के बदले धार को बनाया था।*
♦️परमार वंश के इस राजा का जन्म सन् 980 में महाराजा विक्रमादित्य की नगरी उज्जैनी में एक राजपरिवार में हुआ। पन्द्रह वर्ष की छोटी आयु में ही उनका राज्य अभिषेक मालवा के राजसिंहासन पर हो गया था। अल्पायु में सिंहासनारोहण के समय महान राजा भोज चारों ओर से शत्रुओं से घिरे थे। उत्तर में तुर्को से, उत्तर-पश्चिम में राजपूत सामंतों से, दक्षिण में विक्रम चालुक्य से, पूर्व में युवराज कलचुरी से तथा पश्चिम में भीम चालुक्य से उन्हें लोहा लेना पड़ा। उन्होंने एक-एक कर सब को हराया। तेलंगाना के तेलप और तिरहुत के गांगेयदेव को हराने के बाद एक कहावत बनी जिन्हें लोग आज भी प्रयोग करते हैं - ''कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली''
*🤺परमारवंशी इस महाप्रतापी राजा का साम्राज्य मालवा, कोंकण, खानदेश, भिलसा, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़ एवं गोदावरी घाटी तक फैला हुआ था।*
*✊महमूद गजनवी को किया भागने पर मजबूर!*
जब लुटेरा महमूद गजनवी ने सोमनाथ मन्दिर का ध्वंस किया, तो शैव भक्त राजा भोज यह खबर सुनकर बहुत क्षुब्द हुए।
राजा ने अपनी सेना के साथ गजनवी पर हमला कर दिया, लेकिन गजनवी मौका देख सिंध के रेगिस्तान में भाग गया।
गजनवी तो बच गया, लेकिन राजा भोज ने हिंदू राजाओं की संयुक्त सेना एकत्रित करके गजनवी के पुत्र सालार मसूद को बहराइच के पास एक मास के युद्ध में मारकर सोमनाथ का बदला ले लिया, और फिर 1026-1054 की अवधि के बीच भोपाल (जो कि उस समय भोजपाल नाम से जाना जाता था) से 32 किमी पर स्थित भोजपुर में शिव मंदिर का निर्माण करके मालवा में सोमनाथ की स्थापना कर दी। इस मंदिर की ख्याति इतनी अधिक थी कि इसे 'पूर्व का सोमनाथ' कहा जाने लगा।
*🙏महाज्ञानी राजा भोज!*
राजा भोज, लुटेरे मुगल के किसी मूर्ख वंशज की तरह नहीं थे। वो खुद एक विद्वान थे जो काव्यशास्त्र और व्याकरण के बड़े जानकार थे और _उन्होंने बहुत सारी किताबें भी लिखी थीं।_
*🚩मान्यता अनुसार भोज ने 64 प्रकार की सिद्धियां प्राप्त की थीं तथा उन्होंने सभी विषयों पर 84 ग्रंथ लिखे जिसमें धर्म, ज्योतिष, आयुर्वेद, व्याकरण, वास्तुशिल्प, विज्ञान, कला, नाट्यशास्त्र, संगीत, योगशास्त्र, दर्शन, राजनीतिशास्त्र आदि प्रमुख हैं।*
*✍️ये बहुत दुःख की बात है कि इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद राजा भोज को इतिहास में वो स्थान नहीं दिया गया, जो तुर्क, मंगोली लुटेरों एवं उनके मुग़ल वशंजों को मिला है।*
➖➖➖➖➖➖➖➖➖
*👇समिति की सभी ज्ञानवर्धक, आध्यात्मिक और सत्य दर्शाती हुई तथ्यात्मक पोस्ट प्रतिदिन प्राप्त करने हेतु समिति के टेलिग्राम चैनल को जरूर सब्सक्राइब करें, जहां प्रतिदिन कम संख्या में उत्तम पोस्ट समिति द्वारा की जाती हैं*
https://t.me/HarGharBhagwa/2802
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" _कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगुतेली!"_
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*🤺राजा भोज कौन थे!🚩* *✍️भारतीय इतिहास में सर्वाधिक लोकप्रिय राजाओं की अग्रिम पंक्ति में अपनी पहचान बनाने वाले राजा भोज का नाम भला किसने नहीं सुना होगा! लेकिन अफसोसजनक बात ये है कि उनके बारे में लोगों को ज्यादा कुछ ज्ञात नहीं है। ऐसा हम इसलिए भी कह रहे हैं क्योंकि इतिहास के किताबों में उन्हें वो स्थान दिया ही नहीं गया जिसके वो दावेदार थे।*
*🙏सहनशील, दयालु, प्रजापालक, वीर, प्रतापी आदि गुणों के स्वामी राजा भोज!*
वीरता, साहस और न्यायप्रियता की जीवंत मूरत राजा भोज उस समय केवल भारतवर्ष में ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व में प्रचलित थे।
*✍️वैसे तो 'भोज' नाम से और भी कई राजा हुए हैं। लेकिन हम यहां बात कर रहे हैं उन राजा भोज की जिन्होंने अपनी राजधानी उज्जैनी के बदले धार को बनाया था।*
♦️परमार वंश के इस राजा का जन्म सन् 980 में महाराजा विक्रमादित्य की नगरी उज्जैनी में एक राजपरिवार में हुआ। पन्द्रह वर्ष की छोटी आयु में ही उनका राज्य अभिषेक मालवा के राजसिंहासन पर हो गया था। अल्पायु में सिंहासनारोहण के समय महान राजा भोज चारों ओर से शत्रुओं से घिरे थे। उत्तर में तुर्को से, उत्तर-पश्चिम में राजपूत सामंतों से, दक्षिण में विक्रम चालुक्य से, पूर्व में युवराज कलचुरी से तथा पश्चिम में भीम चालुक्य से उन्हें लोहा लेना पड़ा। उन्होंने एक-एक कर सब को हराया। तेलंगाना के तेलप और तिरहुत के गांगेयदेव को हराने के बाद एक कहावत बनी जिन्हें लोग आज भी प्रयोग करते हैं - ''कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली''
*🤺परमारवंशी इस महाप्रतापी राजा का साम्राज्य मालवा, कोंकण, खानदेश, भिलसा, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़ एवं गोदावरी घाटी तक फैला हुआ था।*
*✊महमूद गजनवी को किया भागने पर मजबूर!*
जब लुटेरा महमूद गजनवी ने सोमनाथ मन्दिर का ध्वंस किया, तो शैव भक्त राजा भोज यह खबर सुनकर बहुत क्षुब्द हुए।
राजा ने अपनी सेना के साथ गजनवी पर हमला कर दिया, लेकिन गजनवी मौका देख सिंध के रेगिस्तान में भाग गया।
गजनवी तो बच गया, लेकिन राजा भोज ने हिंदू राजाओं की संयुक्त सेना एकत्रित करके गजनवी के पुत्र सालार मसूद को बहराइच के पास एक मास के युद्ध में मारकर सोमनाथ का बदला ले लिया, और फिर 1026-1054 की अवधि के बीच भोपाल (जो कि उस समय भोजपाल नाम से जाना जाता था) से 32 किमी पर स्थित भोजपुर में शिव मंदिर का निर्माण करके मालवा में सोमनाथ की स्थापना कर दी। इस मंदिर की ख्याति इतनी अधिक थी कि इसे 'पूर्व का सोमनाथ' कहा जाने लगा।
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राजा भोज, लुटेरे मुगल के किसी मूर्ख वंशज की तरह नहीं थे। वो खुद एक विद्वान थे जो काव्यशास्त्र और व्याकरण के बड़े जानकार थे और _उन्होंने बहुत सारी किताबें भी लिखी थीं।_
*🚩मान्यता अनुसार भोज ने 64 प्रकार की सिद्धियां प्राप्त की थीं तथा उन्होंने सभी विषयों पर 84 ग्रंथ लिखे जिसमें धर्म, ज्योतिष, आयुर्वेद, व्याकरण, वास्तुशिल्प, विज्ञान, कला, नाट्यशास्त्र, संगीत, योगशास्त्र, दर्शन, राजनीतिशास्त्र आदि प्रमुख हैं।*
*✍️ये बहुत दुःख की बात है कि इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद राजा भोज को इतिहास में वो स्थान नहीं दिया गया, जो तुर्क, मंगोली लुटेरों एवं उनके मुग़ल वशंजों को मिला है।*
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३) राजा भोज
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जिसका अर्थ होता है, दो लोगों के बीच बहुत अधिक अतंर होना या फिर किन्हीं दो लोगों के बीच बेमेल तुलना।…
◆◆◆● *महर्षि चरक* ●◆◆◆
*♦️चरक महान आर्युवदाचार्थ थे। आप कुषाण सम्राट कनिष्क प्रथम के राजवैद्य थे। कनिष्क प्रथम का काल सन 200का है । आपका जन्म शल्यक्रिया के जनक महर्षि सुश्रुत तथा व्याकरणाचार्य महर्षि पतत्रजलि के भी पूर्व हुआ था । आपका प्रसिद्ध ग्रन्थ चरक संहिता है। इस ग्रन्थ मूल पाठ वैद्य अग्निवेश ने लिखा था। चरक जी ने उसमें संशोधन कर तथा उसमें नए प्रकरण जोड कर उसे अधिक उपयोगी एवं प्रभावशाली बनाया।*
*♦️आपने आयुर्वेद के क्षेत्र में अनेक शोधकिए तथा अनेकों संशोधन आलेख लिखे, जो बादमें चरक संहिता नाम से प्रसिद्ध हुई । चरक संहिता मूल में संस्कृत भाषा में लिखी गई है । वर्तमान में उसका हिन्दी अनुवाद भी उपलब्धहोता है । आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करने के लिए यह ग्रन्थ अत्यन्त उपयोगी होने से इसे पाठयक्रम में भी स्थान दिया गया है ।*
*♦️चरक संहिता के आठ विभाग है।*
*(1) सूत्र स्थान (2) निदानस्थान (3) विमानस्थान (4) शारीरस्थान (5) इन्द्रियस्थान (6) चिकित्सास्थान (7) कल्पस्थान एवं (8) सिद्धिस्थान*
*🔶इन आठ विभागों में शरीर के भिन्न भिन्न अंगो की बनावट, वनस्पतियों के गुण तथा परिचय आदि का वर्णन है।*
*♦️महर्षि चरक की यह मान्यता थी कि एक चिकित्सक के लिए महज ज्ञानी या विद्धान होना ही पर्याप्त नहीं है अपितु उसे दयालु और सदाचारी भी होना चाहिए । चिकित्सक बनने से पूर्व ली जानेवाली प्रतिज्ञाओं का उल्लेख चरक संहिता में मिलता है । वैदिक काल में इन प्रतिज्ञाओं का पालन करना सभी वैद्यों के लिए आवश्यक माना जाता था ।*
*♦️चरक संहिता का अनुवाद अरबी तथा युरोपीय भाषाओं में भी हो चुका है । उन उन भाषाओं के विद्धानों ने इस ग्रन्थ पर टीकाएं भी लिखी हैं आयुर्वेद में महर्षि चरक अभूतपूर्व योगदान के लिए ही आपको आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान के महान सम्राट की उपाधी से सन्मानित किया गया था।*
*♦️चरक महान आर्युवदाचार्थ थे। आप कुषाण सम्राट कनिष्क प्रथम के राजवैद्य थे। कनिष्क प्रथम का काल सन 200का है । आपका जन्म शल्यक्रिया के जनक महर्षि सुश्रुत तथा व्याकरणाचार्य महर्षि पतत्रजलि के भी पूर्व हुआ था । आपका प्रसिद्ध ग्रन्थ चरक संहिता है। इस ग्रन्थ मूल पाठ वैद्य अग्निवेश ने लिखा था। चरक जी ने उसमें संशोधन कर तथा उसमें नए प्रकरण जोड कर उसे अधिक उपयोगी एवं प्रभावशाली बनाया।*
*♦️आपने आयुर्वेद के क्षेत्र में अनेक शोधकिए तथा अनेकों संशोधन आलेख लिखे, जो बादमें चरक संहिता नाम से प्रसिद्ध हुई । चरक संहिता मूल में संस्कृत भाषा में लिखी गई है । वर्तमान में उसका हिन्दी अनुवाद भी उपलब्धहोता है । आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करने के लिए यह ग्रन्थ अत्यन्त उपयोगी होने से इसे पाठयक्रम में भी स्थान दिया गया है ।*
*♦️चरक संहिता के आठ विभाग है।*
*(1) सूत्र स्थान (2) निदानस्थान (3) विमानस्थान (4) शारीरस्थान (5) इन्द्रियस्थान (6) चिकित्सास्थान (7) कल्पस्थान एवं (8) सिद्धिस्थान*
*🔶इन आठ विभागों में शरीर के भिन्न भिन्न अंगो की बनावट, वनस्पतियों के गुण तथा परिचय आदि का वर्णन है।*
*♦️महर्षि चरक की यह मान्यता थी कि एक चिकित्सक के लिए महज ज्ञानी या विद्धान होना ही पर्याप्त नहीं है अपितु उसे दयालु और सदाचारी भी होना चाहिए । चिकित्सक बनने से पूर्व ली जानेवाली प्रतिज्ञाओं का उल्लेख चरक संहिता में मिलता है । वैदिक काल में इन प्रतिज्ञाओं का पालन करना सभी वैद्यों के लिए आवश्यक माना जाता था ।*
*♦️चरक संहिता का अनुवाद अरबी तथा युरोपीय भाषाओं में भी हो चुका है । उन उन भाषाओं के विद्धानों ने इस ग्रन्थ पर टीकाएं भी लिखी हैं आयुर्वेद में महर्षि चरक अभूतपूर्व योगदान के लिए ही आपको आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान के महान सम्राट की उपाधी से सन्मानित किया गया था।*
रहस्यमयी जंगल --
यह रहस्यमयी पेड़ Crooked Forest Poland से है, अजीबोगरीब तरीके से इस जंगल के सारे पेड़ मुड़े हुए है ।। ऐसा नही है, की इससे इन पेड़ों की मजबूती पर कोई फर्क पड़ा है, यह पेड़ 50-50 फुट तक बड़े होते है ।।
संसार मे ऐसा बहुत कुछ है, जो मानवों की समझ से परे है ।। जब तक देवता खुद आकर नही बताते, हम बहुत से रहस्य शायद नही जान पाए। ।
*दिपावली आ रही है दोस्तो.सामान ऐसी जगह से खरीदे जिसका दूकानदार आपकी वजह से दशहरा दिपावली मना सके और उन दुकानदारो का विशेष ध्यान रखे जिन्होने CAA के विरोध मे दुकान बंद की थी।*
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संसार मे ऐसा बहुत कुछ है, जो मानवों की समझ से परे है ।। जब तक देवता खुद आकर नही बताते, हम बहुत से रहस्य शायद नही जान पाए। ।
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*आपकी वजह से कोई दिपावली मना सके ऐसे दुकानदार से सामान ले ऐसे दुकान से कभी नही जो अपनी कमाई का एक हिस्सा आतंकी संगठनो को देता हो।*
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सभार:-®.जागले।
🇮🇳🕉️हिन्दुराष्ट्रम🕉️🇮🇳
🇮🇳🕉️जय माँ भारती🕉️🇮🇳
🇮🇳🕉️उत्तिष्ठ भारतः🕉️🇮🇳
🇮🇳🕉️माँ तुझे प्रणाम🕉️🇮🇳,
*🛕 अंबाबाई मंदिर, कोल्हापुर(महाराष्ट्र)*
*🔶श्री अंबाबाई मंदिर भारत के विभिन्न शक्ति पीठों मैं एक है जो महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है। चालुक्य साम्राज्य के समय में या लगभग 700 AD में इस मंदिर का निर्माण होने का अनुमान किया गया है।*
*🔶 एक काला पत्थर के मंच पर, देवी अंबाबाई की चार हस्थों वाली प्रतिमा, सिर पर मकुट पहने हुए बनाया गया है और गहनों से सजाया हुआ मुकुट लगभग चालीस किलोग्राम वजन का अद्भुत प्रदर्शन है। काले पत्थर में निर्मित अंबाबाई की प्रतिमा की ऊंचाई करीब 3 फीट है।*
*🔶 इसी मंदिर के अन्दर नवग्रहों, भगवान सूर्य, महिषासुर मर्दिनी, विठ्ठल रखमाई, शिवजी, विष्णु, तुलजा भवानी आदी देवी देवताओं को पूजा करने का स्थल भी दिखाई देते हैं।*
*🔶 अन्य पवित्र मंदिरों में देवीजी पूर्व या उत्तर दिशा को देखते हुए मिलते हैं लेकिन यहाँ देवी अंबाबाई पश्चिम दिशा को निरीक्षण करते हुए मिलते है। वहाँ पश्चिमी दीवार पर एक छोटी सी खुली खिड़की मिलती है, जिसके माध्यम से सूरज की किरणें हर साल मार्च और सितंबर महीनों के 21 तारीख के आसपास तीन दिनों के लिए देवीजी की मुख मंडल को रोशनी करते हुए इनके पद कमलों में शरण प्राप्त करते हैं।*
*🔶श्री अंबाबाई मंदिर भारत के विभिन्न शक्ति पीठों मैं एक है जो महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है। चालुक्य साम्राज्य के समय में या लगभग 700 AD में इस मंदिर का निर्माण होने का अनुमान किया गया है।*
*🔶 एक काला पत्थर के मंच पर, देवी अंबाबाई की चार हस्थों वाली प्रतिमा, सिर पर मकुट पहने हुए बनाया गया है और गहनों से सजाया हुआ मुकुट लगभग चालीस किलोग्राम वजन का अद्भुत प्रदर्शन है। काले पत्थर में निर्मित अंबाबाई की प्रतिमा की ऊंचाई करीब 3 फीट है।*
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🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे गोविंद*🙏🏻🌹
🙏🏻🌹 *जय जय श्री राधे* 🙏🏻🌹
*वीडियो👆🏻👆🏻👇🏻👇🏻*
🕰➡️2.20
*🙏🏻💐*🛕 श्री गंगेश्वर मंदिर, दमन एंड दियू*
*🔶 श्री गंगेश्वर मंदिर भारत के गुजरात के दीव शहर से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर फदुम गांव में है। इस मंदिर को गुजरात के सबसे प्राचीन शिव मंदिरों में से एक माना जाता है। यह मंदिर पूर्ण रूप से भगवान शिव को समर्पित है।*
*🔶 गंगेश्वर शब्द का अर्थ भगवान शिव होता है जो अपनी जटाओं में गंगा समेटे हुए हैं। यह मंदिर अपने आप में अद्भुत मंदिर है। यह मंदिर गुफा में स्थित है, जो समुद्र तट पर है और समुद्र की लहरें शिवलिंग पर आती रहती हैं।*
*🔶 पौराणिक कथाओं के अनुसार जब पांचों पांडव अपने वनवास में थे, तो उसी दौरान इस मंदिर का निर्माण किया था। पांचों पांडव यहां प्रतिदिन भगवान शिव की पूजा करने आते थे। गंगेश्वर मंदिर में शिव रात्रि का त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।💐🙏🏻*
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*🙏🏻🌹 हरे कृष्ण 🙏🏻🌹*
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*🔶 गंगेश्वर शब्द का अर्थ भगवान शिव होता है जो अपनी जटाओं में गंगा समेटे हुए हैं। यह मंदिर अपने आप में अद्भुत मंदिर है। यह मंदिर गुफा में स्थित है, जो समुद्र तट पर है और समुद्र की लहरें शिवलिंग पर आती रहती हैं।*
*🔶 पौराणिक कथाओं के अनुसार जब पांचों पांडव अपने वनवास में थे, तो उसी दौरान इस मंदिर का निर्माण किया था। पांचों पांडव यहां प्रतिदिन भगवान शिव की पूजा करने आते थे। गंगेश्वर मंदिर में शिव रात्रि का त्योहार बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।💐🙏🏻*
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हजारो सालों पहले बना यह #शिवमंदिर, क्या वास्तव में मानवों द्वारा निर्मित है ??
यह मंदिर तमिलनाडु के Kulumalagai पंचायत में स्थित है । यह मंदिर एक ही पहाड़ को काटकर बना है । पहाड़ो पर तो यह मंदिर है ही ....लेकिन यह मंदिर पहाड़ो को काटकर भी उससे भी 25 फिट गहरा है ।
क्या यह मंदिर किसी मानव द्वारा निर्मित लगता भी है ?? या फिर यह कोई UFO है ??
अंग्रेजी चैनल पर एक सीरीज चलाई गई थी #Ancient_alians अर्थात प्राचीन परग्रही ।। जो धरती पर आते थे । हमारे प्रत्येक पुराणों में देवताओं का अन्य लोको से आना लिखा है, हमारे प्रत्येक पुराणों धर्मग्रंथों आदि में वर्णित है, देवता अपना विमान लेकर आते थे, ओर वह हवा से भी ज़्यादा तेज गति से चलने वाले होते थे, की पलक झपकते ही आंखों से ओझल । महाभारत में वेदव्यास पांडवों से जब भी मिलने आते है, उनका आना भी अचानक, ओर जाना भी अचानक ही होता था ।
*दिपावली आ रही है दोस्तो.सामान ऐसी जगह से खरीदे जिसका दूकानदार आपकी वजह से दशहरा दिपावली मना सके और उन दुकानदारो का विशेष ध्यान रखे जिन्होने CAA के विरोध मे दुकान बंद की थी।*
*उन दुकानदार का भी ध्यान रखे जिनकी औलादे सोशल मिडिया पर राम मंदिर को तोड़ने का कैंपेन चला रही है। इनका आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार करे।*
*आपकी वजह से कोई दिपावली मना सके ऐसे दुकानदार से सामान ले ऐसे दुकान से कभी नही जो अपनी कमाई का एक हिस्सा आतंकी संगठनो को देता हो।*
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क्या यह मंदिर किसी मानव द्वारा निर्मित लगता भी है ?? या फिर यह कोई UFO है ??
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