*भोजपुर मंदिर भोपाल,,*
शिवजी दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ..
*रहस्य:* कभी पूरा नहीं बन पाया मंदिर का शिखर
शिवलिंग की ऊंचाई 7.5 फीट और परिधि 17.8 फीट है, जो स्थापत्य कला का एक बेमिसाल नमूना है। यह शिवलिंग एक वर्गाकार और विस्तृत फलक वाले चबूतरे पर त्रिस्तरीय चूने-पत्थर की पाषाण-खंडों पर स्थापित है। कहते हैं इस मंदिर का शिखर निर्माण का काम कभी भी पूर्ण नहीं हो सका 💐💐
शिवजी दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ..
*रहस्य:* कभी पूरा नहीं बन पाया मंदिर का शिखर
शिवलिंग की ऊंचाई 7.5 फीट और परिधि 17.8 फीट है, जो स्थापत्य कला का एक बेमिसाल नमूना है। यह शिवलिंग एक वर्गाकार और विस्तृत फलक वाले चबूतरे पर त्रिस्तरीय चूने-पत्थर की पाषाण-खंडों पर स्थापित है। कहते हैं इस मंदिर का शिखर निर्माण का काम कभी भी पूर्ण नहीं हो सका 💐💐
नेपाल का न्यातपोल मंदिर, जिसका निर्माण नरेश भूपतिंद्र मल्ल ने करवाया था।
इस मंदिर पर चित्तौड़गढ़ के तीसरे शाके में अकबर की विशाल सेना से लड़ते हुए वीरगति पाने वाले मेड़ता के वीर योद्धा जयमल जी राठौड़ व मेवाड़ के वीर रावत पत्ताजी चुंडावत की मूर्तियां सुसज्जित हैं।
मेवाड़ के रावल रतनसिंह के भाई कुंभकर्ण के वंशज ही नेपाल के 'राणा' हुए थे।
1837 ई. में नेपाल नरेश राजेन्द्र विक्रमशाह ने अपने कुल के रीति रिवाजों के बारे में अधिक जानकारी के लिए प्रतिष्ठित स्त्री-पुरुषों के एक समूह को महाराणा जवानसिंह जी के शासनकाल में मेवाड़ भेजा था।
इस मंदिर पर चित्तौड़गढ़ के तीसरे शाके में अकबर की विशाल सेना से लड़ते हुए वीरगति पाने वाले मेड़ता के वीर योद्धा जयमल जी राठौड़ व मेवाड़ के वीर रावत पत्ताजी चुंडावत की मूर्तियां सुसज्जित हैं।
मेवाड़ के रावल रतनसिंह के भाई कुंभकर्ण के वंशज ही नेपाल के 'राणा' हुए थे।
1837 ई. में नेपाल नरेश राजेन्द्र विक्रमशाह ने अपने कुल के रीति रिवाजों के बारे में अधिक जानकारी के लिए प्रतिष्ठित स्त्री-पुरुषों के एक समूह को महाराणा जवानसिंह जी के शासनकाल में मेवाड़ भेजा था।
🚩
*#स्वयं खुद ही देंखे*
*तब सनातन सत्य की पहचान होगी...*
युद्ध ग्रस्त अज़रबैजान देश मे
#माँ #भवानी की शक्तिपीठ में
आज भी 3000 वर्षों से इस मंदिर में
जल रही है माँ भवानी की अखंड ज्वाला ।
सोवियत रूस के पूर्व देश
अर्मेनिया और मुस्लिम देश अजरबेजान
वर्तमान में युद्धग्रस्त है।
इसी अज़रबैजान की ईरान सीमा के निकट
एक माँ भवानी की शक्तिपीठ है।
इस शक्तिपीठ में अखंड ज्वाला आज से 3 हजार साल से यू हीं जल रही है। ऐसा हम नहीं कह रहे हैं, ऐसा उस देश का विज्ञान और वैज्ञानिक कह रहे हैं जिसकी 90% आबादी मुस्लिम है यानी अजरबेजान।
1860 तक यहाँ हिन्दू और फ़ारसी
इस मंदिर में पूजा किया करते थे।
आज यह मंदिर खण्डर है,
पर इसकी ज्वाला आज भी जल रही है।
जिसे मिटाने की या बुझाने, नष्ट करने की कोशिश
कई सौ सालों से की गई
पर ज्वाला को कोई बुझा नहीं सका ।
मंदिर के खंडहरों के शिलालेखों पर
आज भी श्री गणेश भगवान, शिव,
माता पार्वती के चित्र हैं
और
संस्कृत में श्लोक लिखे हुये
कोई भी जाकर देख सकता है।
1998 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित किया
और
2007 में अजरबेजान सरकार ने इसे राष्टीय धरोहर घोषित किया।
... कोपीपेस्ट...
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*#स्वयं खुद ही देंखे*
*तब सनातन सत्य की पहचान होगी...*
युद्ध ग्रस्त अज़रबैजान देश मे
#माँ #भवानी की शक्तिपीठ में
आज भी 3000 वर्षों से इस मंदिर में
जल रही है माँ भवानी की अखंड ज्वाला ।
सोवियत रूस के पूर्व देश
अर्मेनिया और मुस्लिम देश अजरबेजान
वर्तमान में युद्धग्रस्त है।
इसी अज़रबैजान की ईरान सीमा के निकट
एक माँ भवानी की शक्तिपीठ है।
इस शक्तिपीठ में अखंड ज्वाला आज से 3 हजार साल से यू हीं जल रही है। ऐसा हम नहीं कह रहे हैं, ऐसा उस देश का विज्ञान और वैज्ञानिक कह रहे हैं जिसकी 90% आबादी मुस्लिम है यानी अजरबेजान।
1860 तक यहाँ हिन्दू और फ़ारसी
इस मंदिर में पूजा किया करते थे।
आज यह मंदिर खण्डर है,
पर इसकी ज्वाला आज भी जल रही है।
जिसे मिटाने की या बुझाने, नष्ट करने की कोशिश
कई सौ सालों से की गई
पर ज्वाला को कोई बुझा नहीं सका ।
मंदिर के खंडहरों के शिलालेखों पर
आज भी श्री गणेश भगवान, शिव,
माता पार्वती के चित्र हैं
और
संस्कृत में श्लोक लिखे हुये
कोई भी जाकर देख सकता है।
1998 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित किया
और
2007 में अजरबेजान सरकार ने इसे राष्टीय धरोहर घोषित किया।
... कोपीपेस्ट...
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कालिका माता मंदिर राजस्थान
में 14 वीं शताब्दी का है। इसमें कहा गया है कि जिस दंपति को पद्मिनी पैलेस में रखा गया है, वह मूल रूप से भगवान का था जो यहां 8 वीं शताब्दी के दौरान बनाया गया था। यह अब नष्ट हो गया है, यह वास्तु रत्न है जो पृथ्वी काल से संबंधित है।
में 14 वीं शताब्दी का है। इसमें कहा गया है कि जिस दंपति को पद्मिनी पैलेस में रखा गया है, वह मूल रूप से भगवान का था जो यहां 8 वीं शताब्दी के दौरान बनाया गया था। यह अब नष्ट हो गया है, यह वास्तु रत्न है जो पृथ्वी काल से संबंधित है।
*🛕सुरकंडा देवी मंदिर,टिहरी(उत्तराखंड)*
*🔶 सुरकंडा देवी एक हिन्दूओं का प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर देवी दुर्गो को समर्पित है जो कि नौ देवी के रूपों में से एक है। सुरकंडा देवी मंदिर 51 शक्ति पीठ में से है। सुरकंडा देवी मंदिर में देवी काली की प्रतिमा स्थापित है। यह मंदिर यूलिसाल गांव, धानाल्टी, टिहरी जिला, उत्तराखंड में स्थित है।*
*🔶 यह मंदिर लगभग 2,757 मीटर की ऊंचाई पर है। सुरकंडा देवी मंदिर घने जंगलों से घिरा हुआ है और इस स्थान से उत्तर दिशा में हिमालय का सुन्दर दृश्य दिखाई देता है। दक्षिण दिशा में देहरादून और ऋ़षिकेश शहरों का सुन्दर नजारा देखा जा सकता है। यह मंदिर साल में ज्यादा दर समय कोहरे से डका रहता है।*
*🔶 पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शंकर देवी सती के मृत शरीर को लेकर पूरे ब्रह्मांड के चक्कर लगा रहे थे, उसी दौरान भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया था, जिसमें सती का सिर इस स्थान पर गिरा था, इसलिए इसे मंदिर को श्री सुरकंडा देवी मंदिर भी कहा जाता है।*
*🔶 सुरकंडा देवी एक हिन्दूओं का प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर देवी दुर्गो को समर्पित है जो कि नौ देवी के रूपों में से एक है। सुरकंडा देवी मंदिर 51 शक्ति पीठ में से है। सुरकंडा देवी मंदिर में देवी काली की प्रतिमा स्थापित है। यह मंदिर यूलिसाल गांव, धानाल्टी, टिहरी जिला, उत्तराखंड में स्थित है।*
*🔶 यह मंदिर लगभग 2,757 मीटर की ऊंचाई पर है। सुरकंडा देवी मंदिर घने जंगलों से घिरा हुआ है और इस स्थान से उत्तर दिशा में हिमालय का सुन्दर दृश्य दिखाई देता है। दक्षिण दिशा में देहरादून और ऋ़षिकेश शहरों का सुन्दर नजारा देखा जा सकता है। यह मंदिर साल में ज्यादा दर समय कोहरे से डका रहता है।*
*🔶 पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शंकर देवी सती के मृत शरीर को लेकर पूरे ब्रह्मांड के चक्कर लगा रहे थे, उसी दौरान भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को 51 भागों में विभाजित कर दिया था, जिसमें सती का सिर इस स्थान पर गिरा था, इसलिए इसे मंदिर को श्री सुरकंडा देवी मंदिर भी कहा जाता है।*
कोंडाना गुफाएँ कोंडाना के छोटे से गाँव में, लोनावाला के उत्तर में 33 किमी और कार्ला गुफाओं के उत्तर-पश्चिम में 16 किमी की दूरी पर स्थित हैं। इस गुफा समूह में 16 बौद्ध गुफाएं हैं। गुफाओं की खुदाई पहली शताब्दी ई.पू. लकड़ी के पैटर्न पर निर्माण उल्लेखनीय है। राजमाची गाँव से उतर कर कोई भी गुफा तक पहुँच सकता है।
गुफा चैत्य के सामने केवल एक शिलालेख है, जो दाताओं के बारे में जानकारी देता है।
गुफा चैत्य के सामने केवल एक शिलालेख है, जो दाताओं के बारे में जानकारी देता है।
यह गणेश जी की मूर्ति बिरला संग्रालय में रखी है 5000 साल पुरानी
#नारी_लता
हिमालय मे 20 वर्ष में एक बार स्त्री के आकार के फूल खिलते हैं जिसे नारी लता कहते हैं।
इसकी बनावट की वजह से इसे #नारीलता के नाम से जाना जाता है और ये रहस्यों की भूमि यानि हिमालय में पाया जाता है...
क्या कभी आपने किसी पेड़ पर महिलायें उगती हैं ऐसा सुना है नहीं ना...
शायद आपको जानकर यकीन नहीं होगा पर ये सच्चाई है।
ये रहस्यों की भूमि यानि #हिमालय में पाया जाता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि ये फूल 20 साल में एक बार खिलते हैं और देखने पर प्रकृति की अनोखी कलाकृति जैसे मालूम होते हैं।
जब आप इन्हें देखेंगे तो पेड़ पर लटकी हुई गुड़िया की तरह मालूम होती हैं परंतु वास्तव में ये फूल ही होते हैं।
बताया जाता है कि ये श्रीलंका और #थाईलैंड में भी पाये जाते हैं।
जबकि दुर्लभ होने के कारण इन्हें आमतौर पर देखना असंभव होता है।
हिमालय की वादियां अनेक और विचित्र रहस्यों के लिये प्रसिद्ध हैं।
क्योकि ये भगवान शिव का घर कहा जाता है जिसके कारण से यहां करोड़ों वर्षों से ऋषि मुनियों के तपस्या करने की जानकारियां भी सामने आती हैं।
जिनका सम्पूर्ण उल्लेख पुराणों में भी मिलता है।
जबकि इस वृक्ष और फूल के बारे में फिलहाल अभी कुछ अधिक शोध नहीं हुआ है मगर ये बीस साल के अंतर को वैज्ञानिक भी प्रकृति का एक और आश्चर्य ही मानते हैं।
ऑर्किडासिए परिवार का ये फूल हाबेनरिया प्रजाति का है।
हाबेनरिया की सभी प्रजातियों के फूल ट्यूबर युक्त स्थलीय ऑर्किड होते हैं।
ये फूल #श्रीलंका में #लियाथाबरा_माला के नाम से जाना जाता है, जिसकी 10 अलग-अलग प्रजातियां पाई जाती हैं।
वहीं थाईलैंड में इस फूल को #नारीपोल कहा जाता है।
हिमालय मे 20 वर्ष में एक बार स्त्री के आकार के फूल खिलते हैं जिसे नारी लता कहते हैं।
इसकी बनावट की वजह से इसे #नारीलता के नाम से जाना जाता है और ये रहस्यों की भूमि यानि हिमालय में पाया जाता है...
क्या कभी आपने किसी पेड़ पर महिलायें उगती हैं ऐसा सुना है नहीं ना...
शायद आपको जानकर यकीन नहीं होगा पर ये सच्चाई है।
ये रहस्यों की भूमि यानि #हिमालय में पाया जाता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि ये फूल 20 साल में एक बार खिलते हैं और देखने पर प्रकृति की अनोखी कलाकृति जैसे मालूम होते हैं।
जब आप इन्हें देखेंगे तो पेड़ पर लटकी हुई गुड़िया की तरह मालूम होती हैं परंतु वास्तव में ये फूल ही होते हैं।
बताया जाता है कि ये श्रीलंका और #थाईलैंड में भी पाये जाते हैं।
जबकि दुर्लभ होने के कारण इन्हें आमतौर पर देखना असंभव होता है।
हिमालय की वादियां अनेक और विचित्र रहस्यों के लिये प्रसिद्ध हैं।
क्योकि ये भगवान शिव का घर कहा जाता है जिसके कारण से यहां करोड़ों वर्षों से ऋषि मुनियों के तपस्या करने की जानकारियां भी सामने आती हैं।
जिनका सम्पूर्ण उल्लेख पुराणों में भी मिलता है।
जबकि इस वृक्ष और फूल के बारे में फिलहाल अभी कुछ अधिक शोध नहीं हुआ है मगर ये बीस साल के अंतर को वैज्ञानिक भी प्रकृति का एक और आश्चर्य ही मानते हैं।
ऑर्किडासिए परिवार का ये फूल हाबेनरिया प्रजाति का है।
हाबेनरिया की सभी प्रजातियों के फूल ट्यूबर युक्त स्थलीय ऑर्किड होते हैं।
ये फूल #श्रीलंका में #लियाथाबरा_माला के नाम से जाना जाता है, जिसकी 10 अलग-अलग प्रजातियां पाई जाती हैं।
वहीं थाईलैंड में इस फूल को #नारीपोल कहा जाता है।