ऐतिहासिक मंदिर और उनकी कथा
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हमारी संस्कृति हमारा अभिमान

*इस चैनल मे हमारे मंदिरों की कथा के आडियो विडियो और हमारी सभ्यता से जुड़ी जगह का प्रसारण किया जाता है*

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*हम्पी , कर्नाटक*

हम्पी मध्यकालीन हिंदू राज्य विजयनगर साम्राज्य की राजधानी थी। तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित यह नगर अब हम्पी (पम्पा से निकला हुआ) नाम से जाना जाता है और अब केवल खंडहरों के रूप में ही अवशेष है। इन्हें देखने से प्रतीत होता है कि किसी समय में यहाँ एक समृद्धशाली सभ्यता निवास करती होगी। भारत के कर्नाटक राज्य में स्थित यह नगर यूनेस्को के विश्व के विरासत स्थलों में शामिल किया गया है।
हर साल यहाँ हज़ारों की संख्या में पर्यटक और तीर्थयात्री आते हैं। हम्पी का विशाल फैलाव गोल चट्टानों के टीलों में विस्तृत है। घाटियों और टीलों के बीच पाँच सौ से भी अधिक स्मारक चिह्न हैं। इनमें मंदिर, महल, तहख़ाने, जल-खंडहर, पुराने बाज़ार, शाही मंडप, गढ़, चबूतरे, राजकोष आदि असंख्य इमारतें हैं।

*मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩*

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यह साधु कभी विश्व का सबसे धनवान व्यक्ति था ............
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चित्र में जिन्हें आप देख रहे है, यह व्यक्ति कोई साधारण व्यक्ति नही, बल्कि अपने समय मे सबसे अधिक रियासतों के स्वामी आमेर के महाराजा रामसिंहदित्य है। कांग्रेस काल में जब आमेर किले से खजाना निकाला गया था, तब उस समय जयपुर से लेकर दिल्ली तक के मार्ग में सिर्फ सोना ही सोना था ।
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ऐसा धनवान व्यक्ति, अतुल सम्पति का स्वामी, साधु था। शायद साधु होना इसे ही कहते है।
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आमेर का इतिहास बिगड़ने का सबसे बड़ा कारण यही रहा। कर्नल टॉड अंग्रेज काल में जहां जागरूक लोग कागजों में अपना इतिहास मजबूत कर रहे थे, वही सबसे अच्छा इतिहास होने के बाद भी, जयपुर राजवंश इतिहास लेखन को लेकर जागरूक नही रहें।
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जयपुर के राजा तो इतिहास-वर्तमान-भविष्य सबकी चिंता छोड़ धूणी लगाकर बैठते थे।
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महाराज बड़ी कम आयु में ही स्वर्ग को भी प्रस्थान कर गए । कहते है जब आपका देहान्त हुआ, पूरे आमेरवासियों ने अपने सिर का मुंडन करवाया था । यह राजा और प्रजा के बीच का सम्बन्ध था।
*चम्फाई नगर , मिजोरम*

चम्फाई भारतीय राज्य मिज़ोरम का एक सीमावर्ती कस्बा है। यह राज्य के आठ ज़िलों में से एक चम्फाई ज़िले का मुख्यालय भी है। भारत-म्यांमार सीमा पर स्थित होने के कारण इस कस्बे का सामरिक महत्व भी है। इस कारण से यह भारत म्यांमार के मध्य प्रमुख व्यापार गलियारा भी है।

चम्फाई की जलवायु न ज्यादा गर्म न ही ज्यादा सर्द है। ग्रीष्मकाल में तापमान १०°C से २०°C के मध्य तथा शीतकाल में १५°C से ३०°C के मध्य रहता है।

*मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🇮🇳*

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*जटोली शिव मंदिर, हिमाचल प्रदेश*

देवभूमि हिमाचल में आदिदेव महादेव को समर्पित एशिया का सबसे ऊँचा शिव मंदिर अवस्थित है. प्रांत के सोलन क्षेत्र में स्थित यह मंदिर जटोली शिव मंदिर के नाम से जाना जाता है.

आश्चर्य की बात यह है कि भारत के उत्तरी क्षेत्र में स्थित इस मंदिर को द्रविड़ शैली में निर्मित किया गया है.

मान्यता है कि भगवान शिव ने इस स्थान पर एक दिन विश्राम किया था और उनके बाद एक परम सिद्ध योगी स्वामी कृष्णानंद परमहंस ने यहाँ आकर तपस्या की.

स्वामी जी के मार्गदर्शन और दिशानिर्देश के बाद इस मंदिर का निर्माण किया गया.

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*ट्यूलिप उद्यान, श्रीनगर*

60 से अधिक प्रजातियों के 15 लाख से अधिक पौधों के साथ एशिया का सबसे बड़ा ट्यूलिप उद्यान श्रीनगर में स्थित है जो अपने मनोरम सुंदरता और अद्भुत विशालता से सभी का ध्यान आकर्षित करता है.

प्रसिद्ध डल झील के आमने स्थित यह ट्यूलिप उद्यान लगभग 12 हेक्टेयर क्षेत्र में जहाँ विश्वभर के पौधों की दुर्लभ प्रजातियां उपस्थित हैं.

कश्मीर का वसंत ही उसे स्वर्ग की अनुभूति कराता है और इस उद्यान उगने वाले फूल वसंत के आगमन का संकेत देते हैं. यह उद्यान वर्ष में केवल एक माह के लिए पर्यटकों के लिए खोला जाता है.

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Forwarded from Ishaan
महाभारत में चक्रव्यूह क्या था, इस युद्ध मे और कितने प्रकार के व्यूहों का उपयोग हुआ? आइये बताते हैं :--

चक्रव्यूह का उल्लेख हिन्दू पौराणिक ग्रंथ
महाभारत में हुआ है। इस व्यूह की रचना गुरु द्रोणाचार्य ने युद्ध के तेरहवें दिन की थी। अर्जुन के अतिरिक्त और कोई भी चक्रव्यूह भेदन नहीं जानता था। युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए चक्रव्यूह की रचना की गयी थी। दुर्योधन इस चक्रव्यूह के बिलकुल मध्य में था। इस व्यूह में बाकी सात महारथी व्यूह की विभिन्न परतों में थे। व्यूह के द्वार पर जयद्रथ था।

अभिमन्यु ही इस व्यूह को भेदने में सफल हो पाया पर वह भी अंतिम द्वार(यानी परत) को पार नहीं कर सका तथा बाद में सात महारथियों द्वारा उसकी हत्या कर दी गयी।

महाभारत युद्ध में पांडवों और कौरवों द्वारा कुछ और व्यूह रचे गए थे जो निम्न हैं :-
महाभारत ग्रंथ के अनुसार व्यूह-रचना
1. गरुड़-व्यूह
2. क्रौंच व्यूह
3. श्येन व्यूह
4. सुपर्ण(गरुड़) व्यूह
5. सारंग व्यूह
6. सर्प व्यूह
7. खड्ग सर्प व्यूह
8. शेषनाग व्यूह
9. मकर व्यूह,
10. कुर्मा(कछुआ) व्यूह,
11. वराह व्यूह
12. महिष व्यूह
13. त्रिशूल व्यूह,
14. चक्र व्यूह,
15. अर्धचन्द्र व्यूह
16. कमल व्यूह,
17. उर्मि व्यूह,
18. मंडल व्यूह,
19. वज्र व्यूह,
20. चक्रशकट व्यूह
21. शकट व्यूह,
22. सर्वतोभद्र व्यूह
23. शृंगघटक व्यूह
24. चन्द्रकाल व्यूह
25. कमल व्यूह
26. देव व्यूह,
27. असुर व्यूह,
28. सूचि व्यूह,
29. श्रीन्गातका व्यूह,
30. चन्द्र कला
31. माला व्यूह
32. पद्म व्यूह ,
33. सूर्य व्यूह ,
34. दण्डव्यूह
35. गर्भव्यूह
36. शंखव्यूह
37. मंण्डलार्ध व्यूह
38. हष्ट व्यूह
39. नक्षत्र मण्डल व्यूह
40. भोग व्यूह
41. प्रणाल व्यूह
42. मण्डलार्द्ध व्यूह
43. मयूर व्यूह
44. मंगलब्यूह
45. असह्मव्यूह
46. असंहतव्यूह
47. विजय व्यूह
भगवान #शिव की अर्ध परिक्रमा क्यों.. ?

शिवजी की आधी परिक्रमा करने का विधान है। वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है।

''अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत ।।
इति वाचनान्तरात।''

सोमसूत्र :

शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है। शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है, वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है।

क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र :

सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे देवदत्त और धनंजय वायु के प्रवाह में रुकावट पैदा हो जाती है। जिससे शरीर और मन पर बुरा असर पड़ता है। अत: शिव की अर्ध चंद्राकार प्रदशिक्षा ही करने का शास्त्र का आदेश है।

तब लांघ सकते हैं :

शास्त्रों में अन्य स्थानों पर मिलता है कि तृण, काष्ठ, पत्ता, पत्थर, ईंट आदि से ढके हुए सोम सूत्र का उल्लंघन करने से दोष नहीं लगता है,

लेकिन
‘शिवस्यार्ध प्रदक्षिणा’ का मतलब शिव की आधी ही प्रदक्षिणा करनी चाहिए।

किस ओर से करनी चाहिये परिक्रमा

भगवान शिवलिंग की परिक्रमा हमेशा बांई ओर से शुरू कर जलाधारी के आगे निकले हुए भाग यानी जल स्रोत तक जाकर फिर विपरीत दिशा में लौटकर दूसरे सिरे तक आकर परिक्रमा पूरी करें।

!! ॐ नमः शिवाय !!
Forwarded from वैश्नव सेवन SANJAY DHINGRA संजय ढींगरा
VID-20210111-WA0180.mp4
13 MB
Video from SANJAY DHINGRA