ऐतिहासिक मंदिर और उनकी कथा
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हमारी संस्कृति हमारा अभिमान

*इस चैनल मे हमारे मंदिरों की कथा के आडियो विडियो और हमारी सभ्यता से जुड़ी जगह का प्रसारण किया जाता है*

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*इस मंदिर में नंदी जी के मुख से लगातार जल की धारा निकलते रहती है ।*

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भोजेश्वर महादेव मंदिर, मध्यप्रदेश🛕
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
इस मंदिर का अद्भुत तथ्य यह है कि मंदिर के मीनार की छाया जमीन पर नहीं पड़ती । मंदिर के सुपर स्ट्रक्चर के भीतर छाया ऐसे डिजाइन किया गया है ।
तंजवुर - ब्रिहदीश्वर मंदिर, टीएन ।
तमिल राजा राजा राजा चोल I द्वारा निर्मित 1003 और 1010 ईस्वी के बीच, मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का एक हिस्सा है जिसे ′′ ग्रेट लिविंग चोला मंदिर ′′ के नाम से जाना जाता है, साथ में चोल राजवंश युग गंगाइकोंडा चोलापुरम मंदिर और ऐरावतेस्वरा मंदिर ।🚩🚩
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कोपेश्वर महादेव मंदिर, कोल्हापुर 🛕
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
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☘️ श्रावण विशेष ☘️
महेश्वरम श्री शिवपार्वती मंदिर, चैंकल 🛕
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
*_कोडुम्बलूर, पुदुक्कोताई, तमिलनाडु, भारत...!_*
😍😍😍😱😱😱🚩🚩🚩😮😮😮

*_जय सनातन 🙏🚩_*
जल मंदिर नरसिंहगढ राजगढ़ mp 🚩जय श्री राम🙏
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☘️ श्रावन विशेष ☘️
कालना शिव मंदिर, पश्चिम बंगाल 🛕

पश्चिम बंगाल में भगवान शिव को समर्पित एक अद्वितीय मंदिर अवस्थित है जो कालना शिव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है.

इस मंदिर में 108 शिवलिंग स्थापित है.

यहाँ शिवलिंगों को एक परिधि में बने छोटे मंदिरों में स्थापित किया गया है जहाँ बाह्य परिधि में 74 एवं आंतरिक परिधि में 34 शिवलिंग है.

बाह्य परिधि में स्थित शिवलिंग आधे काले हैं जो भगवान शिव के रुद्र रूप का प्रतीक है एवं आंतरिक परिधि में स्थित शिवलिंग सफेद है जो भगवान की सौम्यता एवं शांति का प्रतीक है.

इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1809 में किया गया था.

मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
कंसुआ शिव मंदिर 🚩🚩

कोटा से 6 किमी. दूर कंसुआ महादेव मंदिर आठवीं शताब्दी का माना गया है। इसकी परिक्रमा में कुटिल लिपि का एक लेख मौजूद है। मंदिर के में एक चतुर्मुख शिवलिंग स्थित है। बाहर चबुतरे पर एक शिवलिंग ऐसा भी हैै जो हजारमुखी है।

वैदिक ऋषि कण्व की तपोस्थली कंसुआ शिव मंदिर

वैदिक ऋषि कण्व की तपोस्थली कंसुआ शिव मंदिर की प्राचीनतम और आध्यात्मिक वैभवता के साथ कई ऐसे प्रसंग जुड़े हैं, जिनकी सत्यता प्रामाणिकता इतिहास के पन्नों पर दर्ज है। देश के कुछेक प्राचीनतम धार्मिक स्थलों की सूची में दर्ज कंसुआ धाम शिवालय और इसके आसपास मौजूद सैकडों साल पुरानी पुरासंपदा वह अनमोल धरोहर है, जिस पर इस शहर को गर्व होना चाहिए। दुष्यंत-शकुंतला के प्रणय प्रसंग और उससे जन्मे महाप्रतापी भरत की क्रीड़ा स्थली है यह। वे ही भरत, जिनके नाम पर हमारे देश का नामकरण हुआ। भला इससे बड़ा गौरव और क्या हो सकता है। प्रत्येक शहरवासी का दायित्व है कि वह न केवल इसे सहेजे बल्कि दुनिया को इसके बारे में बताए भी।

‘हमारे माता और पिता अगर बूढ़े हो जाएं, उनके बाल सफेद और दांत गिर जाएं तो क्या हम उनके पास जाना छोड़ देते हैं? तब क्या हम उनके अस्तित्व को नकार देते हैं? बिल्कुल नहीं, बल्कि हम उनकी ज्यादा देखभाल और फिक्र करते हैं। आश्चर्य की बात है कि मेरे नगरवासी यहां की इतिहास प्रसिद्ध महान थाती से अपरिचित हैं। हां, हम चर्चा कर रहे हैं, कोटा स्थित पवित्र कण्वाश्रम तीर्थ की महत्ता की। जिसके नाम पर आज कंसुआ बस्ती बसी हुई है। यह सही है कि आज यह स्थान इसके आसपास गंदगी और टूटफूट से विकृत नजर आता है लेकिन इसके अंतरंग में जो प्राचीनतम भव्य गौरवशाली स्मारक है उसको जानने का कोई प्रयास नहीं करता।

आज की कंसुआ बस्ती जो एक नाले के किनारे बसी हुई है। उसका इतना चौड़ा पाट है कि यह अवश्य कभी कोई नदी रही होगी। यह नदी दक्षिण पश्चिम दिशा से आती हुई जहां पूर्वमुखी होती है, वहीं पर एक प्राचीन मंदिर है। हमारे धर्मग्रंथों में यह कहा जाता है कि जहां नदी पूर्वमुखी होती है वहां बनाए गए मंदिर को तीर्थ माना जाता है। इसलिए इस मंदिर को पुरातनकाल से कंसुआ तीर्थ कहा जाता है। यहां जो प्राचीन शिवमंदिर खड़ा हुआ है इसका निर्माण विक्रमी संवत 795 यानि 738 ईस्वी में हुआ था। इस हिसाब से यह मंदिर 1274 साल पुराना है। कभी किसी आक्रांता द्वारा या हमारी लापरवाही के कारण यह मंदिर भग्न हो गया था और इसका शिखर टूट गया था। बाद में जब इसका पुनरुद्धार किया गया तो छावना (लेंटल) स्तर तक यह मूल मंदिर था और इसका शिखर बाद में बनाया गया। इस मंदिर के दाहिनी दीवार पर एक शिलालेख लगा हुआ है, जिसमें इस मंदिर के निर्माण का उल्लेख हुआ है।

हिंदी के महाकवि जयशंकर प्रसाद ने अपने नाटक ‘चंद्रगुप्तÓ की भूमिका में इस शिलालेख का उल्लेख किया है। इस शिलालेख को कुटिल लिपि में लिखे गए देश के श्रेष्ठतम शिलालेखों में से शीर्ष माना जाता है। शिलालेख में इस स्थान को प्राचीनतम धार्मिक तीर्थस्थल उल्लेखित करने के साथ ही लिखा हुआ है कि यह प्राचीनतम कण्व आश्रम है। इसलिए ही इस स्थान की महत्ता को समझकर चित्तौड़ के राजा धवल मौर्य के सामंत शिवगण ने विक्रमी संवत 795 में इस मंदिर का निर्माण कराया था। शिवगण ब्राह्मण था और उसने शिवमंदिर का निर्माण कराके वैदिक ऋषि महर्षि कण्व के आश्रम को हमेशा के लिए अमर बना दिया। हमारी कोटा नगरी धन्य है, जहां कि वैदिक कालीन महर्षि कण्व ने अपना आश्रम बनाया था। मंदिर का समय समय पर कोटा के हाड़ा वंशीय शासकों ने भी जीर्णोद्धार कराया।

मूर्तिकला की बेजोड़ मिसाल है कंसुआधाम
कंसुआधाम में छावना तक जो मूल मंदिर है, वह आठवीं शताब्दी की मंदिर व मूर्तिकला की बेजोड़ मिसाल है। हमारे स्थापत्य और मंदिर निर्माण में जिन पुरातन शास्त्रसम्मत विधान का उल्लेख है, उसका इस मंदिर निर्माण में पूर्णतया पालन हुआ है। इसकी पत्थरों की पॉलिश मूर्तियों की सुघड़ता भव्य होने के साथ ही बड़ी ही भव्य आकर्षक महसूस होती है। मुख्य मंदिर के सामने जो पंचमुखी शिवलिंग है वह मूर्तिकला का अनुपम उदाहरण है। यूं तो पूरा परिसर शिवलिंग से भरा हुआ है। लगता है हर काल में प्रमुख श्रद्धालुओं ने यहां एक-एक शिवलिंग की स्थापना की होगी। नाले के किनारे चबूतरे पर सहस्त्र शिवलिंग बना हुआ है, जिसमें मुख्य शिवलिंग पर 999 छोटे शिवलिंग उत्कीर्ण हैं।

भरत की जन्मस्थली शोध का विषय
पहले जब हमें ज्ञात था कि देश में केवल यही कोटा का कंसुआ धाम महर्षि कण्व का आश्रम था। तब हम बड़े दावे से कहते थे कि शकुंतला इसी आश्रम में रहती थी और उनकी कोख से भारत के प्रतापी नरेश भरत का जन्म इसी जगह हुआ था। लेकिन अब देश के कुछेक स्थानों से महर्षि कण्व का आश्रम होने के समाचार आने लगे तो हमारे लिए यह शोध का विषय हो गया कि भरत का जन्म किस कण्व आश्रम में हुआ था। शकुंतला का जन्म अजमेर के पुष्कर में महर्षि विश्वामित्र और
अप्सरा मेनका के संसर्ग से हुआ था। पुष्कर से वापस लौटते समय मेनका अपनी नवजात पुत्री शकुंतला को पालन पोषण के लिए कण्व ऋषि के आश्रम के समीप छोड़ गई थी।
कोटा पुष्कर के नजदीक होने से हमारा एक ध्यान यह भी जाता है कि शायद इसी स्थान पर शकुंतला रही हो।
पवित्र स्नान का पुण्य और गोठ का मजा था यहां
कंसुआधाम का स्मारक (शिवालय) तो सुरक्षित है लेकिन बाहर का ऐतिहासिक परिसर गंदगी से अटा है। पुराने समय में यह परिसर कोटा क्षेत्र के लोगों के लिए पवित्र स्नान और गोठ का स्थान था। परिसर के बीच में बहुत ही सुंदर चौकोर कुंड बना हुआ है, जिसमें किसी समय स्वच्छ निर्मल जल भरा रहता था। एक झरने के रूप में यह पानी गिरता था। यह झरना इस नदी के ऊपर बनाए गए बंधे से गिरता था। वहां विपुल जलराशि रहती थी जिससे नाला निरंतर भरता रहता था। बाद में इस तीर्थ स्थली के आसपास अनेक कारखाने लगने और बस्ती की गंदगी से इस जलराशि के जल संग्रहण स्थल को पूरी तरह पाट दिया गया। बरसात के पानी को भी लोग गंदगी डालकर दूषित कर देते हैं जो 12 माह इस जगह भरा रहता है। प्राचीन नदी व नाले का उपयोग खुले शौचालय के रूप में किया जा रहा है। विडंबना है कि प्रशासन इस गौरवमयी तीर्थस्थली के रखरखाव व सौंदर्यीकरण का जिम्मा नहीं निभाता। कुंड के आसपास जो गोठ करने, भोजन बनाने के कक्ष थे वे भी भग्न अवस्था में हैं और उनकी मरम्मत पर कोई ध्यान नहीं देता।
जय महादेव
(चतुर्वेदी जे पी एन)
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☘️ श्रावन विशेष ☘️
मुरुदेश्वर मंदिर , कर्नाटक 🛕

मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
दर्शन कर लीजिए..

प्रभु राम, माता सीता और लक्ष्मण जी की उन मूर्तियों के जो सदियों तक अयोध्या के रामलला मंदिर में पूजी जाती रहीं हैं, औरंगज़ेब ने जब अयोध्या पर आक्रमण किया तब मंदिर के पुजारी पंडित श्यामानन्द महाराज मूर्तियों को लेकर अयोध्या छोड़कर चले गए और पैठन के स्वामी एकनाथ महाराज को सौंप दीं, क्योंकि औरंगज़ेब शिवाजी महाराज के ही क़ाबू में आता था अतः वहाँ से मूर्तियाँ शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास को मिलीं जिन्होंने कर्नाटक के हरिहर नाम की जगह पर तुंगभद्रा नदी के किनारे प्रतिष्ठापित कर दीं।तब से इन मूर्तियों की पूजा कर्नाटक के नारायण आश्रम में अनवरत जारी है और अब अयोध्या में वापस लाने की तैयारी हैं...
इन छोटी छोटी बातों को अपनी स्मृति कोश में जगह दीजिए क्योंकि यहीं से आपको अहसास होगा कि श्रीराम का इस देश के लिए क्या अर्थ है, इसलिए राम को गुनिये, राम का भजिए और जीवन सफल बनाइए...राम ही राम
सब मे राम..जयश्रीराम..राम लखन सिया जानकी,जय
बोलो हनुमान की..
सियावर रामचंद्रजी की जय🚩🚩🙏🙏
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हलासुरु सोमेश्वर स्वामी मंदिर, बंगलुरू 🛕

मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩