ऐतिहासिक मंदिर और उनकी कथा
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हमारी संस्कृति हमारा अभिमान

*इस चैनल मे हमारे मंदिरों की कथा के आडियो विडियो और हमारी सभ्यता से जुड़ी जगह का प्रसारण किया जाता है*

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*_लोहागढ़ किला, पुणे, महाराष्ट्र, भारत...!_*
😍😍😍🗾 🗾🗾🚩🚩🚩⚔️⚔️⚔️

*_जय सनातन धर्म ☸🙏🚩_*
# *मैं_हूं_भारत* 🇮🇳

श्रीधर जोशी जी की पोस्ट:

यह इजिप्ट के किसी मूर्ति का चित्र है, जिसमे एक भक्त भगवान नन्दी के आगे प्रार्थना कर रहा है।।

इजिप्ट के प्राचीन राजाओं के नाम तक "रामशेष प्रथम - रामशेष द्वितीय" आदि होते थे।

इजिप्ट नाम ही "अजपति" का अपभ्रंश है, जो कि श्रीराम के दादोजी थे।।

स्वयं अंग्रेजी इतिहासकार मानते हैं, प्राचीन इजिप्ट उर्फ मिस्र की संस्कृति वैदिक संस्कृति थी।।


# *सनातन_संस्कृति* 🚩
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लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी मंदिर, आंध्रप्रदेश 🛕
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
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कालूदिया पोकुना, श्रीलंका
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
# *मैं_हूं_भारत* 🇮🇳

#नागासाधू 🤔

जब अहमद शाह अब्दाली दिल्ली और
मथुरा में मार काट करता गोकुल तक
आ गया और लोगों को बर्बरतापूर्वक
काटता जा रहा था।

महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहे थे,
तब गोकुल में अहमदशाह अब्दाली का
सामना नागा साधुओं से हो गया।

कुछ 5 हजार चिमटाधारी पूज्य नागा
साधु तत्काल सेना में तब्दील होकर
लाखों की हबसी,जाहिल जेहादी
सेना से भिड गए।

पहले तो अब्दाली साधुओं को मजाक
में ले रहा था किन्तु कुछ देर में ही अपने
सैनिकों के चिथड़े उड़ते देख अब्दाली
को एहसास हो गया कि ये साधू तो
अपनी धरती की अस्मिता के लिए
साक्षात महाकाल बन रण में उतर
गए।

तोप तलवारों के सम्मुख चिमटा त्रिशूल
लेकर पहाड़ बनकर खड़े 2000 नागा
साधू इस भीषण संग्राम में वीरगति को
प्राप्त हो गए लेकिन सबसे बड़ी बात ये
रही कि दुश्मनों की सेना चार कदम भी
आगे नहीं बढ़ा पाई,जो जहाँ था वहीं ढेर
कर दिया गया या फिर पीछे हटकर भाग
गया..।

इसके बाद से ऐसा आतंक उठा कि अगर
किसी जिहादी आक्रांता को यह पता चलता
कि युद्ध में नागा साधू भाग ले रहे हैं तो वह
आक्रांता लड़ता ही नहीं था।
डर कर दुम दबा कर भाग जाता था।

हमारा इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ नहीं है कि
आज हम औरंगजेब,तैमूर,अकबर जैसे
बर्बर लुटेरो को तो याद रखते हैं,
पर इन भारतीय वीर योद्धाओं के बारें में
कुछ नहीं जानते जिन्होंने पग पग पर देश
धर्म के लिए अपने बलिदान दिए हैं....

अरविन्द मिश्र 🙏

जयति सनातन 🚩
जयतु भारतं 🇮🇳
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कीसरगुट्टा मंदिर, तेलंगाना 🛕
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
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चतुर्मुख ब्रह्मलिंगेश्वर मंदिर, आंध्र प्रदेश 🛕
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
*देहरादून लाखामंडल मंदिर मे एक ऐंसा शिवलिंग है जिसपर जल चढ़ाने के बाद आप अपना प्रतिबिम्ब शिवलिंग मैं स्पष्ट देख सकते है ।

वैसे तो भगवान श‌िव के मंद‌िर कई जगह हैं। लेक‌िन भारत में एक जगह ऐसी है जहां करोड़ों साल पुराना शिवलिंग है। माना जाता है क‌ि इस शिवलिंग में पूरा 'संसार' दिखाई देता है।

उत्तराखंड के देहरादून स्थित लाखामंडल में बने इस शिवलिंग का जब भक्त जलाभिषेक करते हैं तो उन्हें सृष्टि का स्वरूप दिखता है। यहां के लोगों का मानना है कि इस शिवलिंग पर अपनी तस्वीर देखने मात्र से सारे पाप कट जाते हैं।

प्रकृति की वादियों में बसा यह गांव लाखामंडल देहरादून से 128 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यमुना नदी की तट पर है। दिल को लुभाने वाली यह जगह गुफाओं और भगवान शिव के मंदिर के प्राचीन अवशेषों से घिरा हुआ है। माना जाता है कि इस मंदिर में प्रार्थना करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिल जाती है। यहां पर खुदाई करते वक्त विभिन्न आकार के और विभिन्न ऐतिहासिक काल के शिवलिंग मिले हैं।
हर हर महादेव 🙏🙏🙏 ओम् नमः शिवाय।
🚩🔱 श्री शिवाय नमस्तुभ्यम् 🔱🚩🙏🙏*
लोग यहां से विदेश नायग्रा वॉटरफॉल देखने जाते है। यह देखो मां नर्मदे ।

भेडा घाट जबलपुर में पतित पावनी मां नर्मदा का अद्भुत दर्शन ।
🙏🏻 *नमामि देवी नर्मदे* 🙏🏻
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भारत का पहला साउंडप्रूफ राजमार्ग 🛣️
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🇮🇳
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श्री कालेश्वर मंदिर, नांदेड़ 🛕
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इन्द्रदेव, नेल्लीगाला मन्दिर 🙏 श्रीलंका
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वडकुनाथन मंदिर, तृश्शूर (त्रिशूर) 🛕
मेरी संस्कृति ..मेरा देश ..मेरा अभिमान 🚩
क्या आप 1500 वर्ष पुराने सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में खड़े बाणस्तम्भ की विलक्षणता के विषय मे जानते हैं? ‘

वैसे भी सोमनाथ मंदिर का इतिहास बड़ा ही विलक्षण और गौरवशाली रहा है। 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग है सोमनाथ। एक वैभवशाली सुंदर शिवलिंग। इतना समृध्द कि उत्तर-पश्चिम से आने वाले प्रत्येक आक्रांता की पहली नजर सोमनाथ पर जाती थी। अनेकों बार सोमनाथ मंदिर पर हमले हुए उसे लूटा गया। सोना, चांदी, हिरा, माणिक, मोती आदि गाड़ियाँ भर-भर कर आक्रांता ले गए।

इतनी संपत्ति लुटने के बाद भी हर बार सोमनाथ का शिवालय उसी वैभव के साथ खड़ा रहता था। लेकिन केवल इस वैभव के कारण ही सोमनाथ का महत्व नहीं है। सोमनाथ का मंदिर भारत के पश्चिम समुद्र तट पर है और हजारों वर्षों के ज्ञात इतिहास में इस अरब सागर ने कभी भी अपनी मर्यादा नहीं लांघी है! न जाने कितने आंधी, तूफ़ान आये, चक्रवात आये लेकिन किसी भी आंधी, तूफ़ान, चक्रवात से मंदिर की कोई हानि नहीं हुई है।

इस मंदिर के प्रांगण में एक स्तंभ (खंबा) है। यह ‘बाणस्तंभ’ नाम से जाना जाता है। यह स्तंभ कब से वहां पर हैं बता पाना कठिन है लगभग छठी शताब्दी से इस बाणस्तंभ का इतिहास में नाम आता है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं की बाणस्तंभ का निर्माण छठवे शतक में हुआ है उस के सैकड़ों वर्ष पहले इसका निर्माण हुआ माना जाता है।

यह एक दिशादर्शक स्तंभ है जिस पर समुद्र की ओर इंगित करता एक बाण है इस बाणस्तंभ पर लिखा है -

‘आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिरमार्ग’

इसका अर्थ हुआ कि
‘इस बिंदु से दक्षिण धृव तक सीधी रेखा में एक भी अवरोध या बाधा नहीं है।’
अर्थात
‘इस समूची दूरी में जमीन का एक भी टुकड़ा नहीं है। जब मैंने पहली बार इस स्तंभ के बारे में पढ़ा तो सिर चकरा गया।
यह ज्ञान इतने वर्षों पहले हम भारतीयों को था। कैसे संभव है? और यदि यह सच हैं तो कितने समृध्दशाली ज्ञान की वैश्विक धरोहर हम संजोये हैं।
संस्कृत में लिखे हुए इस पंक्ति के अर्थ में अनेक गूढ़ अर्थ समाहित हैं इस पंक्ति का सरल अर्थ यह है, कि
‘सोमनाथ मंदिर के इस बिंदु से लेकर दक्षिण ध्रुव तक (अर्थात अंटार्टिका तक) एक सीधी रेखा खिंची जाए, तो बीच में एक भी भूखंड नहीं आता है।'

क्या यह सच है?
आज के इस तंत्र विज्ञान के युग में यह ढूँढना संभव तो है, लेकिन उतना आसान नहीं।
गूगल मैप में ढूंढने के बाद भूखंड नहीं दिखता है लेकिन वह बड़ा भूखंड. छोटे, छोटे भूखंडों को देखने के लिए मैप को ‘एनलार्ज’ करते हुए आगे गये। यह बड़ा ही ‘बोरिंग’ सा काम है लेकिन धीरज रख कर धीरे-धीरे देखते गए तो रास्ते में एक भी भूखंड (अर्थात 10 किलोमीटर X 10 किलोमीटर से बड़ा भूखंड) नहीं आता है। अर्थात हम पूर्ण रूप से मान कर चलें कि उस संस्कृत श्लोक में सत्यता है!

किन्तु फिर भी मूल प्रश्न वैसा ही रहता है अगर मान कर भी चलते हैं कि सन 600 ई० में इस बाण स्तंभ का निर्माण हुआ था,।
तो भी उस जमाने में पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव है यह ज्ञान हमारे पास कहां से आया?
अच्छा दक्षिण ध्रुव ज्ञात था, यह मान भी लिया तो भी सोमनाथ मंदिर से दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में एक भी भूखंड नहीं आता है यह ‘मैपिंग’ किसने किया?
कैसे किया?
सब कुछ अद्भुत।।

इसका अर्थ यह हैं की ‘बाण स्तंभ’ के निर्माण काल में भारतीयों को पृथ्वी गोल है इसका ज्ञान था। इतना ही नहीं पृथ्वी का दक्षिण ध्रुव है (अर्थात उत्तर धृव भी है) यह भी ज्ञान था।
यह कैसे संभव हुआ?
इसके लिए पृथ्वी का ‘एरिअल व्यू’ लेने का कौन सा साधन उपलब्ध था?
अथवा पृथ्वी का विकसित नक्शा बना था?
नक़्शे बनाने का एक शास्त्र होता है अंग्रेजी में इसे ‘कार्टोग्राफी’ (यह मूलतः फ्रेंच शब्द हैं) कहते है।
यह प्राचीन शास्त्र है ईसा से पहले छह से आठ हजार वर्ष पूर्व की गुफाओं में आकाश के ग्रह तारों के नक़्शे मिले थे।
परन्तु पृथ्वी का पहला नक्शा किसने बनाया इस पर एकमत नहीं है। हमारे भारतीय ज्ञान का कोई सबूत न मिलने के कारण यह सम्मान ‘एनेक्झिमेंडर’ इस ग्रीक वैज्ञानिक को दिया जाता है।

इनका कालखंड ईसा पूर्व 611 से 546 वर्ष था किन्तु इन्होने बनाया हुआ नक्शा अत्यंत प्राथमिक अवस्था में था। उस कालखंड में जहां जहां मनुष्यों की बसाहट का ज्ञान था बस वही हिस्सा नक़्शे में दिखाया गया है। इसलिए उस नक़्शे में उत्तर और दक्षिण ध्रुव दिखने का कोई कारण ही नहीं था। आज की दुनिया के वास्तविक रूप के करीब जाने वाला नक्शा ‘हेनरिक्स मार्टेलस’ ने साधारणतः सन 1490 के आसपास तैयार किया था। ऐसा माना जाता हैं की कोलंबस और वास्कोडिगामा ने इसी नक़्शे के आधार पर अपना समुद्री सफर तय किया था।

‘पृथ्वी गोल है’ इस प्रकार का विचार यूरोप के कुछ वैज्ञानिकों ने व्यक्त किया था! ‘एनेक्सिमेंडर’ ईशा के पूर्व 600 वर्ष पृथ्वी को सिलेंडर के रूप में माना था! ‘एरिस्टोटल’ (ईसा पूर्व 384– ईसा पूर्व 322) ने भी पृथ्वी को गोल माना था।