ऐतिहासिक मंदिर और उनकी कथा
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कंबोडिया देश मे विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर🚩
*चौंसठ योगिनियों के बारे में सुना होगा।*
64 योगिनियों के भारत में चार प्रमुख मंदिर है। दो ओडिशा में तथा तीन मध्यप्रदेश में।उड़ीसा में भुवनेश्वर के निकट हीरापुर तथा बोलनगीर के निकट रानीपुर में हैं।मध्यप्रदेश में एक मुरैना जिले के थाना थाना रिठौराकलां में ग्राम पंचायत मितावली में है। इसे 'इकंतेश्वर महादेव मंदिर' के नाम से भी जाना जाता है। दूसरा मंदिर खजूराहो में स्थित है। 875-900 ई. के आसपास बना यह मंदिर खजुराहो के मंदिरों के पश्चिमी समूह में आता है। तीसरा जबलपुर के निकट भेड़ाघाट में हैं।
आपने अष्ट या चौंसठ योगिनियों के बारे में सुना होगा। कुछ लोग तो इनके बारे में जानते भी होंगे। दरअसल ये सभी आदिशक्ति मां काली का अवतार है। घोर नामक दैत्य के साथ युद्ध करते हुए माता ने ये अवतार लिए थे। यह भी माना जाता है कि ये सभी माता पर्वती की सखियां हैं। इन चौंसठ देवियों में से दस महाविद्याएं और सिद्ध विद्याओं की भी गणना की जाती है। ये सभी आद्या शक्ति काली के ही भिन्न-भिन्न अवतारी अंश हैं। कुछ लोग कहते हैं कि समस्त योगिनियों का संबंध मुख्यतः काली कुल से हैं और ये सभी तंत्र तथा योग विद्या से घनिष्ठ सम्बन्ध रखती हैं।
ये मंदिर लम्बे वक्त से परित्यक्त हैं जिनके कारण आज भी रहस्य बने हुए हैं।
कहीं शिव जी तथा भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा बढऩे से इन मंदिरों में सहज रूप से अवनति तो नहीं आ गई थी? इसका कारण ब्रह्मचारी पुरुषों के वर्चस्व वाले वेदांतिक आश्रमों का दबाव तो नहीं था? कहीं ऐसा मुस्लिम आक्रमणकारियों की वजह से तो नहीं हुआ था? इनमें अफगान सेनापति काला पहाड़ भी एक था जिसने उड़ीसा पर हमला करके इसके अधिकतर स्मारकों को तबाह कर दिया था। असलियत न जाने क्या थी क्योंकि इन कारणों के बारे में हम कल्पना ही कर सकते हैं।
हालांकि, पुरातत्वविदों ने इन मंदिरों की खोज और जीर्णोद्धार गत एक सदी के दौरान ही किया।
इन मंदिरों के देवी-देवताओं के बारे में संस्कृत लेख अस्पष्ट हैं। इनमें नामों की कई सूचियां, अनुष्ठानों का जिक्र है लेकिन पौराणिक कथाएं नहीं हैं, केवल युद्ध पर निकलीं दुर्गा और काली मां की कहानियां हैं।
आमतौर पर हिन्दू मंदिर वर्गाकार होते हैं और इनका विन्यास रेखीय होता है। अधिकतर मंदिरों में ईश्वर का मुख पूर्व दिशा की ओर होता है। दूसरी ओर गोलाकार योगिनी मंदिरों में ईश्वर का मुंह हर दिशा की ओर होता है। हालांकि, कुएं जैसी इन संरचनाओं का प्रवेश द्वार पूर्व की ओर ही है। मंदिरों की आम पहचान गुम्बद या विमान इनमें नहीं हैं। वास्तव में इन मंदिरों की तो छत ही नहीं है। उड़ीसा के हीरापुर तथा रानीपुर के योगिनी मंदिरों की अंदरूनी दीवारों पर योगिनियों की प्रतिमाएं हैं, सभी का मुंह केंद्र में बने मंदिर की ओर है।
मध्यप्रदेश के भेड़ाघाट और मितावली मंदिरों में सभी योगिनियों के अलग-अलग मंदिर हैं जिनकी छतें तो हैं परंतु वे सभी गोलाकार प्रांगण की ओर खुलते हैं। योगिनियों की प्रतिमाएं हीरापुर, रानीपुर तथा जबलपुर के मंदिरों में अच्छी हालत में हैं। खजुराहो के मंदिर में केवल तीन प्रतिमाएं बची हैं जबकि मौरेना के मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है। कहीं उन्हें हटा कर शिवलिंगों से तो नहीं बदल दिया गया? शायद कोई नहीं जानता।
हीरापुर में योगिनी प्रतिमाओं में महिलाओं को विभिन्न दशाओं में प्रदर्शित किया गया है। कुछ नृत्य कर रही हैं, कुछ धनुष-बाण से शिकार कर रही हैं, कुछ संगीत वादन कर रही हैं, कुछ खून अथवा मदिरा पी रही हैं, कुछ हाथों में छानना लेकर घरेलू कामकाज कर रही हैं। अधिकतर ने खूब आभूषण पहने हैं और उनके केश भी सुंदर सज्जित हैं। अन्यों के सिर सर्प, भालू, शेर या हाथी के हैं जो इंसानी मस्तक, नर देहों, कौओं, मुर्गों, मोरों, बैलों, भैंसों, गधों, शूकरों, बिच्छुओं, केकड़ों, ऊंटों, कुत्तों, जल पर अथवा अग्नि के मध्य खड़ी हैं।
इनमें से कुछ पहचानी जा सकती हैं जैसे चामुंडा, वीणाधारी सरस्वती, कलश धारी लक्ष्मी और नरसिम्ही व वाराही जैसे विष्णु भगवान के स्त्री रूप के अलावा इंद्राणी। इतना तो स्पष्ट है कि योगिनियां जीवन से परिपूर्ण हैं। यदि योगी जीवन से दूर होते हैं तो योगिनी जीवन को अपनाती है। योगी अमरता की चाह रखता है तो योगिनी को मृत्यु से भय नहीं। यदि योगी इच्छाओं पर काबू पाना चाहता है तो योगिनी सभी इच्छाओं को आजाद करने में विश्वास रखती है।
चौंसठ ही क्यों?
अहम प्रश्न उठता है कि चौंसठ ही क्यों? इसके बारे में भी हम कल्पना ही कर सकते हैं। शायद यह उन चौंसठ कलाओं की ओर इशारा हो जिनमें अप्सराएं व प्राचीन काल की गणिकाएं पारंगत थीं। हो सकता है कि इनका अर्थ और भी गूढ़ हो और ये दिन के आठ प्रहरों को प्रदर्शित करते हों या भारत में इजाद किए गए शतरंज के खेल की आठ दिशाओं को।
इन सभी गोलाकार संरचनाओं के बीचों-बीच केंद्रीय मंदिर हैं। हीरापुर में केंद्रीय संरचना एक मंडप जैसी है जो आकाश की ओर खुली है। इसकी चार दीवारों पर
चार भैरवों तथा चार योगिनियों की प्रतिमाएं हैं।
रानीपुर में केंद्रीय मंदिर में शिव के क्रोधी स्वरूप भैरव की तीन मस्तक वाली प्रतिमा है। मोरैना में लिंग बना है। भेड़ाघाट वाले मंदिर के केंद्र में असाधारण रूप से नंदी पर बैठे शिव-पार्वती की प्रतिमा है। कहीं इसे वहां बाद में तो नहीं रखा गया क्योंकि आमतौर पर शिव मंदिरों में शिव जी के सम्पूर्ण स्वरूप नहीं, उनके प्रतीकों (शिवलिंग) की ही पूजा की जाती है।
तांत्रिक परम्पराओं में जब समूह रूप में देवी प्रदर्शित होती हैं, चाहे पंक्ति में हों या गोलाकार, उनके साथ एक मर्द यानी भैरव को अक्सर उग्र रूप में दिखाया जाता है। एक रक्षक तथा प्रेमी के रूप में वह उनके साथ होते हैं। महिलाएं उन्हें गोल घेरे होती हैं।
क्यों? क्या दुनिया को त्याग देने वाले योगी पर स्त्रीत्व को स्वीकार करने का जोर डाला जा रहा है? कहीं यह प्रकृति का चित्रण तो नहीं है जहां प्रत्येक कोख पवित्र है और नरों में केवल प्रथम का महत्व होता है, अन्य सभी को उपभोग के बाद फैंका जा सकता है? हम ऐसी कोई भी कल्पना कर सकते हैं।
अगर आपको लगने लगा है कि भारत ने सच में योगिनियों को पूर्णत: भुला दिया तो जान लीजिए कि मितावली के गोलाकार योगिनी मंदिर ने उन अंग्रेज वास्तुविदों को खासा प्रभावित किया था जिन्होंने संसद भवन का निर्माण किया। संसद भवन गोलाकार है, इसमें गोलाकार प्रांगण है और एक केंद्रीय कक्ष (सैंट्रल हॉल) भी है। गौरतलब है कि संसद में आज ‘भैरवों’ की संख्या बहुत ज्यादा है, वहां भी शायद अब ज्यादा ‘योगिनियों’ की जरूरत है।
समस्त योगिनियां अलौकिक शक्तिओं से सम्पन्न हैं तथा इंद्रजाल, जादू, वशीकरण, मारण, स्तंभन इत्यादि कर्म इन्हीं की कृपा द्वारा ही सफल हो पाते हैं। प्रमुख रूप से आठ योगिनियां हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं:- 1.सुर-सुंदरी योगिनी, 2.मनोहरा योगिनी, 3. कनकवती योगिनी, 4.कामेश्वरी योगिनी, 5. रति सुंदरी योगिनी, 6. पद्मिनी योगिनी, 7. नतिनी योगिनी और 8. मधुमती योगिनी।
चौंसठ योगिनियों के नाम :- 1.बहुरूप, 3.तारा, 3.नर्मदा, 4.यमुना, 5.शांति, 6.वारुणी 7.क्षेमंकरी, 8.ऐन्द्री, 9.वाराही, 10.रणवीरा, 11.वानर-मुखी, 12.वैष्णवी, 13.कालरात्रि, 14.वैद्यरूपा, 15.चर्चिका, 16.बेतली, 17.छिन्नमस्तिका, 18.वृषवाहन, 19.ज्वाला कामिनी, 20.घटवार, 21.कराकाली, 22.सरस्वती, 23.बिरूपा, 24.कौवेरी, 25.भलुका, 26.नारसिंही, 27.बिरजा, 28.विकतांना, 29.महालक्ष्मी, 30.कौमारी, 31.महामाया, 32.रति, 33.करकरी, 34.सर्पश्या, 35.यक्षिणी, 36.विनायकी, 37.विंध्यवासिनी, 38. वीर कुमारी, 39. माहेश्वरी, 40.अम्बिका, 41.कामिनी, 42.घटाबरी, 43.स्तुती, 44.काली, 45.उमा, 46.नारायणी, 47.समुद्र, 48.ब्रह्मिनी, 49.ज्वाला मुखी, 50.आग्नेयी, 51.अदिति, 51.चन्द्रकान्ति, 53.वायुवेगा, 54.चामुण्डा, 55.मूरति, 56.गंगा, 57.धूमावती, 58.गांधार, 59.सर्व मंगला, 60.अजिता, 61.सूर्यपुत्री 62.वायु वीणा, 63.अघोर और 64. भद्रकाली।
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*अमरता के लालच में बनवाया गया भगवान विष्णु का अंगकोर वाट मंदिर, विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर है!!!!!!!!*🙏🏻🌹

कहते हैं कि सृष्टि की रचना करने वाला तो एक ही है, जिसे लोग ईश्वर, अल्लाह, गॉड, रब और जाने कितने अलग-अलग नामों से पूजते हैं. हिन्दू के लिए वही ईश्वर हो जाता है, तो मुसलमानों के लिए ख़ुदा ईसाईयों के लिए यीशु मसीह, तो सिखों के लिए रब हो जाता है. इसीलिए दुनिया में अनेकों धर्म हैं और हर धर्म को मानने वालों की मान्यताएं भी अलग-अलग हैं और भगवान को पूजने का तरीका और स्थान भी अलग-अलग होता है. कहने का तात्पर्य ये है कि जितने धर्म उतने भगवान और उतने ही मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च. मगर आज हम कोई धार्मिक चर्चा नहीं कर रहे हैं, बल्कि आपको दुनिया के सबसे बड़े हिन्दू मंदिर और उसके स्वर्णिम इतिहास के बारे में बताएंगे।

अंगकोर वाट - दक्षिणपूर्व एशिया के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में से एक है - जो शक्तिशाली खमेर साम्राज्य के बाद शताब्दियों तक घने जंगलों में छिपा रहा था. इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में खमेर वंश के राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने करवाया था. इसका प्राचीन नाम यशोधरपुर था. राजा सूर्यवर्मन बहुत ही धार्मिक विचारों वाले राजा थे और उनकी आस्था भगवान विष्णु में थी. इसलिए उन्होंने इस मंदिर का निर्माण भगवान विष्णु को समर्पित करने के उदेश्य से करवाया था।

इस मंदिर के निर्माण के पीछे का प्रमुख कारण था अमरता का लालच. कहा जाता है कि राजा सूर्यवर्मन हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करके अमर बनना चाहता था. इसलिए उसने अपने लिए इस मंदिर के रूप में पूजा स्थल बनवाया जिसमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश, तीनों की ही पूजा होती थी।

मगर इसके बारे में कई अलग-अलग कहानियां भी प्रचिलित हैं, जैसे मान्यता है कि देवराज इन्द्र ने अपने बेटे के लिए महल के तौर पर इस मंदिर का निर्माण करवाया था. वहीं 13वीं शताब्दी में एक चीनी यात्री का कहना था कि इस मंदिर का निर्माण महज एक ही रात में किसी अलौकिक सत्ता के हाथ से हुआ था. लेकिन असल में इस मंदिर का इतिहास बौद्ध और हिन्दू धर्मों से जुड़ा हुआ है।

विश्व की इस ऐतिहासिक धरोहर अंगकोर वाट मंदिर का संबंध प्राचीनकाल के कंबोदेश, जिसे आज के वक़्त में कंबोडिया के नाम जाना जाता है से है. मौलिक रूप से ये मंदिर हिन्दू धर्म का पवित्र स्थान है, जिसको बाद में बौद्ध धर्म का रूप दे दिया गया था।

इस मंदिर का हिन्दू और बौद्ध दोनों धर्मों से सम्बन्ध होने का प्रमुख कारण भी इसके इतिहास में ही छुपा हुआ है. इतिहास गवाह है कि लगभग 27 शासकों ने कंबोदेश पर राज किया था, जिनमें से कुछ हिन्दू थे, तो कुछ बौद्ध शासक थे. और यही कारण है कि खोजकर्ताओं को आज भी कंबोडिया में हिन्दू और बौद्ध दोनों धर्मों से जुड़ी मूर्तियां मिलती हैं।

वर्तमान में देखा जाए तो कंबोडिया में बौद्ध धर्म के अनुयायियों की संख्या बहुत अधिक है इसलिए यहां जगह-जगह भगवान बुद्ध की प्रतिमायें मिल जाती हैं. लेकिन अंगकोर वाट यहां का एक अकेला ऐसा स्थान है, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की मूर्तियां एक साथ हैं. इतना ही नहीं अंगकोर वाट मंदिर की खासियत ये भी है कि विष्णु भगवान का ये दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर है. इस मंदिर की विशाल दीवारों पर रामायण और महाभारत पवित्र धर्मग्रंथों से जुड़ी कहानियां उकेरी गयीं हैं।

मूलरूप से ये मंदिर भगवान शिव को समर्पित था, कुछ समय बाद यहां भगवान विष्णु की पूजा होने लगी. लेकिन जब बौद्ध धर्मावलंबियों ने इस स्थान पर कब्जा किया, तभी से यहां बौद्ध धर्म के आराध्य देवता अवलोकितेश्वर की पूजा होती है।

लेकिन चौदहवीं शताब्दी तक आते-आते यहां बौद्ध धर्म के शासकों का शासन हो गया और फिर मंदिर को बौद्ध रूप दे दिया गया. लेकिन बौद्ध धर्म के शासन काल के बाद कई शताब्दियों तक ये मंदिर लोगों की नज़रों में नहीं आया. 16वीं शताब्दी के आगमन से पहले ही खमेर साम्राज्य पर आक्रमण के दौरान बढ़ने लगे और अंगकोर का सुनहरा अध्याय लगभग समाप्त हो गया और इसके अलावा कई और प्राचीन मंदिर खंडहरों में तब्दील हो गए।

इसके बाद की सदियों में अंगकोर वाट मंदिर जंगल के अंधेरे में गुम हो गया था. 19वीं शताब्दी (जनवरी 1860) के मध्य में एक फ्रांसीसी अंवेषक और प्रकृति विज्ञानी हेनरी महोत की नज़र जब इस पर पड़ी तो वो इस बेशकीमती और आलीशान मंदिर को एक बार फिर दुनिया के सामने लाया. और उसने अंगकोर की गुमशुदा नगरी को फिर से ढूंढ़ निकाला।

खमेर शास्त्रीय शैली से प्रभावित स्थापत्य वाले इस मंदिर का निर्माण मुख्य शिखर करीब 64 मीटर ऊंचा है, इसके अलावा इसमें 8 और शिखर हैं, जो 54 मीटर ऊंचे हैं. इस मंदिर के चारों और साढ़े तीन किलोमीटर लम्बी पत्थर की दीवार है, उसके बाहर 30 मीटर खाली ज़मीन और उसके बाद 190 मीटर चौड़ी खाई है. खोजकर्ताओं के अनुसार, इसकी स्थापत्य कला चोल वंश के मन्दिरों से मिलती-जुलती है।

मंदिर के
निर्माण के कुछ ही सालों बाद चम्पा राज्य ने इसको लूटा. उसके बाद राजा जयवर्मन-7 ने अंकोर नगर को कुछ किलोमीटर उत्तर में पुनर्स्थापित किया. 14वीं या 15वीं शताब्दी में थेरवाद बौद्ध लोगों ने इस पर कब्ज़ा कर लिया।

मंदिर के गलियारों और दीवारों पर तत्कालीन सम्राट, बलि-वामन, स्वर्ग-नरक, समुद्र मंथन, देव-दानव युद्ध, महाभारत, हरिवंश पुराण तथा रामायण से सम्बंधित कई चित्र बने हुए हैं. इन शिलाचित्रों में बहुत संक्षिप्त राम कथा का वर्णन किया गया है. जिसकी शुरुआत रावण वध के लिए देवताओं द्वारा की गयी आराधना से होती है।

उसके बाद सीता स्वयंवर का दृश्य है. मीकांग नदी के किनारे सिमरिप शहर में स्थित इस मंदिर की दीवारों पर समुद्र-मंथन, अप्सराओं, देवी-देवताओं, असुरों और देवताओं के बीच हुए युद्ध से सम्बंधित कई बेहद सुन्दर चित्र और घटनाओं को उकेरा गया है।

साल 1986 से लेकर वर्ष 1993 तक भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने अंगकोर वाट मंदिर के संरक्षण का जिम्मा उठाया था. 12वीं शताब्दी में बनवाये गए इस मंदिर को विश्व की ऐतिहासिक धरोहर की सूची में भी रखा गया है।

उत्थान और पतन के कई दौर देखने के बाद आज ये मंदिर देश-दुनिया के हज़ारों-करोड़ों पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए आस्था और पर्यटन का केंद्र बन चुका है।
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Dwarkadheesh Temple on the Confluence of Gomti river & Arabian Sea in Dwarka, Gujarat.

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