ज़िन्दगी जो है.. वो आज ही है !
कल.. कल जो भी है.. वो तो बस इक ख्वाब ही है...
और उस ख्वाब का.. पूरा होना... ना होना...
सब वक्त के इख्तियार ही है...
कल.. कल जो भी है.. वो तो बस इक ख्वाब ही है...
और उस ख्वाब का.. पूरा होना... ना होना...
सब वक्त के इख्तियार ही है...
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✨️𝆺𝅥⃝᪵̽𝆺꯭𝅥̽⟬꯭𝄄꯭꯭꯭꯭𝅥𝆬 𝐃𝚲𝐒𝐓𝚲𝐍-𝚵-𝐌𝐎𝐇𝚲𝐁𝐁𝚲𝐓𝆺꯭𝅥🌼𝆺꯭𝅥༊꯭♡︎࿐ pinned «ज़िन्दगी जो है.. वो आज ही है ! कल.. कल जो भी है.. वो तो बस इक ख्वाब ही है... और उस ख्वाब का.. पूरा होना... ना होना... सब वक्त के इख्तियार ही है...»
Hamne bhi bepanah mohabbat ki hai par😀 kambakkht ye wakt ne sare sapne Tod diye 😀
Ham chahte hai ki unpar apna hak jatay par wakt ne ye izajat chin Li hai🩸
Kash wakt hota unhe batane ki kitni mohabbat hai unse❤️
Kash wakt hota ki kis hadd tak shiddat hai unse😀
Kash wakt hota to apni jindagi unke naam karte😀
Kash wakt hota to har lamha unke sath rehte😀
Kashh wakt hota apni har kimti chiz unke liye😀 kurban karte 😀
Par kashhhh waktt hota....😀
🎁 ❤️ 🩸 🦋 ❣️
Ham chahte hai ki unpar apna hak jatay par wakt ne ye izajat chin Li hai
Kash wakt hota unhe batane ki kitni mohabbat hai unse
Kash wakt hota ki kis hadd tak shiddat hai unse
Kash wakt hota to apni jindagi unke naam karte
Kash wakt hota to har lamha unke sath rehte
Kashh wakt hota apni har kimti chiz unke liye
Par kashhhh waktt hota....
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❤7
बिछड़े भी नहीं, मिले भी नहीं,
अजब फूल थे—खिले भी नहीं।
कुछ बातें थीं आँखों में ठहरी हुई,
लब तक आईं, कही भी नहीं।
रास्ते हमारे एक ही थे,
फिर भी साथ चले भी नहीं।
तुम पास रहे, एहसास रहे,
पर हाथ कभी मिले भी नहीं।
एक रिश्ता था नामहीन-सा,
जिसे खोया भी नहीं, पाया भी नहीं।
हम दोनों मौसम जैसे थे,
बरसे भी नहीं, सूखे भी नहीं।
कितना अजीब था वो अपनापन—
अपने भी थे, अपने हुए भी नहीं।
बिछड़े भी नहीं, मिले भी नहीं,
अजब फूल थे—खिले भी नहीं।
अजब फूल थे—खिले भी नहीं।
कुछ बातें थीं आँखों में ठहरी हुई,
लब तक आईं, कही भी नहीं।
रास्ते हमारे एक ही थे,
फिर भी साथ चले भी नहीं।
तुम पास रहे, एहसास रहे,
पर हाथ कभी मिले भी नहीं।
एक रिश्ता था नामहीन-सा,
जिसे खोया भी नहीं, पाया भी नहीं।
हम दोनों मौसम जैसे थे,
बरसे भी नहीं, सूखे भी नहीं।
कितना अजीब था वो अपनापन—
अपने भी थे, अपने हुए भी नहीं।
बिछड़े भी नहीं, मिले भी नहीं,
अजब फूल थे—खिले भी नहीं।
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कहाँ से लाती हो इतना साहस,
ऐसा मनोबल
कि इतना कुछ
अपने भीतर समेटकर भी
मुस्कुराकर मिलती हो सबसे ।।
कितने ही तूफ़ान
चुपचाप गुज़र जाते होंगे तुमसे,
कितनी ही रातें
तकिए में सिर छुपाकर रोती होगी तुम
फिर भी सुबह
चेहरे पर मुस्कान लिए
सबका हाल पूछती हो ।।
सच कहूँ,
तुम्हारी मुस्कान सिर्फ़ मुस्कान नहीं,
तुम्हारे भीतर
हर रोज़ जीते गए
न जाने कितने युद्धों की
गवाही है ।।
ऐसा मनोबल
कि इतना कुछ
अपने भीतर समेटकर भी
मुस्कुराकर मिलती हो सबसे ।।
कितने ही तूफ़ान
चुपचाप गुज़र जाते होंगे तुमसे,
कितनी ही रातें
तकिए में सिर छुपाकर रोती होगी तुम
फिर भी सुबह
चेहरे पर मुस्कान लिए
सबका हाल पूछती हो ।।
सच कहूँ,
तुम्हारी मुस्कान सिर्फ़ मुस्कान नहीं,
तुम्हारे भीतर
हर रोज़ जीते गए
न जाने कितने युद्धों की
गवाही है ।।
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मैं तुम्हें पाना नहीं चाहता—
मैं चाहता हूँ,
जब तुम थककर लौटो,
तो तुम्हारी सारी बेचैनी
मुझमें अपना घर पहचान ले।
हाँ…
मुझे तुम्हारा शरीर प्रिय है।
तुम्हारी गर्दन की वह नर्म वक्रता,
कंधों पर ठहरी हुई शाम,
तुम्हारी कमर की धीमी-सी लय,
और तुम्हारे बालों में बसी
वह अपनी-सी ख़ुशबू—
मुझे सब कुछ प्रिय है।
मगर मैं तुम्हारे बदन को
सिर्फ़ देखने की चीज़ नहीं मानता,
मैं उसे उस भूगोल की तरह पढ़ता हूँ
जिसकी हर राह
आख़िरकार तुम्हारे पास आकर रुकती है।
तुम्हारी त्वचा पर
जब मेरी निगाह ठहरती है,
तो इच्छा जन्म लेती है—
मगर मेरी इच्छा की आख़िरी सीमा
तुम्हारा शरीर नहीं…
वह तुम्हारी रूह तक जाती है।
मैं चाहता हूँ—
तुम्हारे माथे की थकान को चूमूँ,
तुम्हारी पलकों पर ठहरी उदासी
अपने होंठों से धीरे से मिटा दूँ,
और तुम्हारी हथेली में
अपनी हथेली रखकर
कुछ देर तुम्हारी धड़कन सुनता रहूँ।
जब रात
तुम्हारे भीतर की स्त्री को
धीरे-धीरे जगाए,
तो मैं तुम्हारी देह की गर्मी से
पीछे न हटूँ—
बल्कि उसे उसी श्रद्धा से महसूस करूँ
जैसे कोई प्यासा मुसाफ़िर
बरसों बाद नदी के किनारे पहुँचा हो।
मुझे तुम्हारी कमर से प्रेम है,
तुम्हारी साँसों की उस उठती-गिरती लय से प्रेम है,
तुम्हारी त्वचा पर दौड़ती
उस महीन-सी सिहरन से प्रेम है
जो मेरे करीब आने पर
तुम्हारे भीतर जन्म लेती है।
लेकिन इन सबसे अधिक
मुझे उस पल से प्रेम है—
जब तुम अपनी सारी झिझक छोड़कर
मेरे सीने पर सिर रख देती हो।
क्योंकि उसी क्षण
तुम्हारा शरीर
सिर्फ़ शरीर नहीं रहता…
वह मेरा भरोसा बन जाता है।
और मैं?
मैं तुम्हारा मालिक नहीं बनना चाहता,
मैं तुम्हारा आश्रय बनना चाहता हूँ।
एक ऐसी जगह,
जहाँ तुम्हारी इच्छाएँ
बिना शर्म साँस ले सकें,
जहाँ तुम्हारी ख़ामोशियाँ
बिना शब्दों के सुनी जा सकें,
जहाँ तुम अपने होने को
किसी सफ़ाई के बिना जी सको।
तुम चाहो
तो मेरे और करीब आओ,
और अगर कभी न चाहो—
तो मेरी बाँहें
तुम्हें रोकने वाली दीवार नहीं,
तुम्हें सुरक्षित रखने वाला आसमान बनें।
मेरी सबसे बड़ी चाहत
तुम्हें भोगना नहीं है…
तुम्हारे लिए वह जगह बनना है
जहाँ तुम्हारा तन भी निश्चिंत हो
और तुम्हारी रूह भी।
मैं चाहता हूँ,
कभी मेरी बाँहों में
तुम्हें ऐसा सुकून मिले
जैसे बारिश के बाद
मिट्टी को अपनी ख़ुशबू मिलती है।
कभी मेरे होंठ
तुम्हारे माथे पर ठहरें
और तुम्हें महसूस हो—
दुनिया चाहे जितनी कठोर हो,
मेरे पास तुम सुरक्षित हो।
कभी हमारी साँसें
एक-दूसरे में घुलती रहें,
रात हमारी नज़दीकियों में
धीरे-धीरे पिघलती रहे,
और उसके बाद
तुम मेरी बाँहों में
आँखें बंद करके
इतनी शांत हो जाओ
जैसे कोई नदी
समुद्र तक पहुँचकर
अपना बहना भूल गई हो।
मुझे तुम्हारा शरीर चाहिए—
हाँ…
मगर उस तरह
जैसे किसी घर की दीवारें प्रिय होती हैं,
क्योंकि उनके भीतर
कोई अपना रहता है।
तुम्हारी देह
मेरे लिए मंज़िल नहीं—
वह वह दरवाज़ा है
जिससे होकर
मैं तुम्हारी रूह तक पहुँचना चाहता हूँ।
और अगर कभी
प्रेम मुझसे पूछे—
“तुम्हें उससे आखिर चाहिए क्या?”
तो मेरा जवाब बस इतना होगा—
“मैं तुम्हें छूकर
तुम्हारी रूह तक पहुँचना चाहता हूँ,
और तुम्हारी रूह तक पहुँचकर
इतना अपना हो जाना चाहता हूँ
कि एक दिन
तुम मुझे सिर्फ़ अपना प्रेमी नहीं…
अपना घर कहो।”
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मैं चाहता हूँ,
जब तुम थककर लौटो,
तो तुम्हारी सारी बेचैनी
मुझमें अपना घर पहचान ले।
हाँ…
मुझे तुम्हारा शरीर प्रिय है।
तुम्हारी गर्दन की वह नर्म वक्रता,
कंधों पर ठहरी हुई शाम,
तुम्हारी कमर की धीमी-सी लय,
और तुम्हारे बालों में बसी
वह अपनी-सी ख़ुशबू—
मुझे सब कुछ प्रिय है।
मगर मैं तुम्हारे बदन को
सिर्फ़ देखने की चीज़ नहीं मानता,
मैं उसे उस भूगोल की तरह पढ़ता हूँ
जिसकी हर राह
आख़िरकार तुम्हारे पास आकर रुकती है।
तुम्हारी त्वचा पर
जब मेरी निगाह ठहरती है,
तो इच्छा जन्म लेती है—
मगर मेरी इच्छा की आख़िरी सीमा
तुम्हारा शरीर नहीं…
वह तुम्हारी रूह तक जाती है।
मैं चाहता हूँ—
तुम्हारे माथे की थकान को चूमूँ,
तुम्हारी पलकों पर ठहरी उदासी
अपने होंठों से धीरे से मिटा दूँ,
और तुम्हारी हथेली में
अपनी हथेली रखकर
कुछ देर तुम्हारी धड़कन सुनता रहूँ।
जब रात
तुम्हारे भीतर की स्त्री को
धीरे-धीरे जगाए,
तो मैं तुम्हारी देह की गर्मी से
पीछे न हटूँ—
बल्कि उसे उसी श्रद्धा से महसूस करूँ
जैसे कोई प्यासा मुसाफ़िर
बरसों बाद नदी के किनारे पहुँचा हो।
मुझे तुम्हारी कमर से प्रेम है,
तुम्हारी साँसों की उस उठती-गिरती लय से प्रेम है,
तुम्हारी त्वचा पर दौड़ती
उस महीन-सी सिहरन से प्रेम है
जो मेरे करीब आने पर
तुम्हारे भीतर जन्म लेती है।
लेकिन इन सबसे अधिक
मुझे उस पल से प्रेम है—
जब तुम अपनी सारी झिझक छोड़कर
मेरे सीने पर सिर रख देती हो।
क्योंकि उसी क्षण
तुम्हारा शरीर
सिर्फ़ शरीर नहीं रहता…
वह मेरा भरोसा बन जाता है।
और मैं?
मैं तुम्हारा मालिक नहीं बनना चाहता,
मैं तुम्हारा आश्रय बनना चाहता हूँ।
एक ऐसी जगह,
जहाँ तुम्हारी इच्छाएँ
बिना शर्म साँस ले सकें,
जहाँ तुम्हारी ख़ामोशियाँ
बिना शब्दों के सुनी जा सकें,
जहाँ तुम अपने होने को
किसी सफ़ाई के बिना जी सको।
तुम चाहो
तो मेरे और करीब आओ,
और अगर कभी न चाहो—
तो मेरी बाँहें
तुम्हें रोकने वाली दीवार नहीं,
तुम्हें सुरक्षित रखने वाला आसमान बनें।
मेरी सबसे बड़ी चाहत
तुम्हें भोगना नहीं है…
तुम्हारे लिए वह जगह बनना है
जहाँ तुम्हारा तन भी निश्चिंत हो
और तुम्हारी रूह भी।
मैं चाहता हूँ,
कभी मेरी बाँहों में
तुम्हें ऐसा सुकून मिले
जैसे बारिश के बाद
मिट्टी को अपनी ख़ुशबू मिलती है।
कभी मेरे होंठ
तुम्हारे माथे पर ठहरें
और तुम्हें महसूस हो—
दुनिया चाहे जितनी कठोर हो,
मेरे पास तुम सुरक्षित हो।
कभी हमारी साँसें
एक-दूसरे में घुलती रहें,
रात हमारी नज़दीकियों में
धीरे-धीरे पिघलती रहे,
और उसके बाद
तुम मेरी बाँहों में
आँखें बंद करके
इतनी शांत हो जाओ
जैसे कोई नदी
समुद्र तक पहुँचकर
अपना बहना भूल गई हो।
मुझे तुम्हारा शरीर चाहिए—
हाँ…
मगर उस तरह
जैसे किसी घर की दीवारें प्रिय होती हैं,
क्योंकि उनके भीतर
कोई अपना रहता है।
तुम्हारी देह
मेरे लिए मंज़िल नहीं—
वह वह दरवाज़ा है
जिससे होकर
मैं तुम्हारी रूह तक पहुँचना चाहता हूँ।
और अगर कभी
प्रेम मुझसे पूछे—
“तुम्हें उससे आखिर चाहिए क्या?”
तो मेरा जवाब बस इतना होगा—
“मैं तुम्हें छूकर
तुम्हारी रूह तक पहुँचना चाहता हूँ,
और तुम्हारी रूह तक पहुँचकर
इतना अपना हो जाना चाहता हूँ
कि एक दिन
तुम मुझे सिर्फ़ अपना प्रेमी नहीं…
अपना घर कहो।”
........ ✍️
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माना कि तुम जैसे किस्मत से मिलते हैं लेकिन हम जैसे किस्मत वालो को मिलते हैं
👏3
✨️𝆺𝅥⃝᪵̽𝆺꯭𝅥̽⟬꯭𝄄꯭꯭꯭꯭𝅥𝆬 𝐃𝚲𝐒𝐓𝚲𝐍-𝚵-𝐌𝐎𝐇𝚲𝐁𝐁𝚲𝐓𝆺꯭𝅥🌼𝆺꯭𝅥༊꯭♡︎࿐ pinned «माना कि तुम जैसे किस्मत से मिलते हैं लेकिन हम जैसे किस्मत वालो को मिलते हैं»
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