हिन्दू दूल्हे ये विवाह संस्कार में मुगलों जैसी दाढ़ी क्यों रखकर आते है.....?
महिलाएं संगीत सन्ध्या के नाम पर भोंडापन क्यों दिखा रही है?
पीठी, उबटन, सांझी गायन के परम्परागत रीति रिवाजों की जगह एकता कपूर के सीरियल की #मेहंदी और #हल्दी हमने क्यों ज़बरदस्ती पकड़ ली?
तोरण द्वार पर, पाणिग्रहण संस्कार के समय, युवक/युवतियों द्वारा हुल्लड़ क्यों किया जाता है?
💥🔥💥
बंदौली में कान फोड़ू "मुन्नी बदनाम.... छत पर सोया बहनोई.." और अन्य अशालीन अभद्र गीत क्यों बज रहे है?
हम सबको सनातन संस्कृति के अनुरूप होने वाले विवाह संस्कारों, रीति रिवाजों से इतनी एलर्जी क्यों हो गई है कि वो सब बकवास लगने लगे है?
पण्डित जी से फेरे जल्दी करवाने की जिद करने वाले लोग बैंड बाजे के आगे नाचने में ही समय क्यों बर्बाद करते है।
आशीर्वाद समारोहों में बड़ी टीवी स्क्रीन पर अपने ही बेटे-बेटी के "प्री वेडिंग शूट" आगन्तुकों को क्यों दिखाए जा रहे हैं?
प्री वेडिंग शूट के नाम पर विवाह पूर्व इस तरह की स्वतंत्रता क्यों दी जा रही है?
उन फोटोज को सार्वजनिक प्रदर्शनी के रूप में क्यो लगाए जा रहे है?
स्टेज पर बड़े बुजुर्गों को भी कैमरामैन/ डांस टीचर ठुमके क्यों लगवा रहे है?
उनसे असभ्य हरकते क्यों करवाई जा रही है?
भोज में दिखावा क्यों किया जा रहा है?
और भी बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जो हिन्दू समाज को पथभ्रष्ट करने हेतु काफी है।
परिवार, समाज सब पतनशील हो गए है, कोई समझाता क्यों नहीं?
महिलाएं गीत भूल गई है, पुरुष परम्पराओं का तर्पण कर चुके है।
किसको फॉलो करते हो ? क्या हमारे आराध्य/ईश्वर, देवी देवताओं के दाढ़ियां लटकती है?
क्या हमारे शास्त्रों, पौराणिक ग्रंथों में ऐसे विवाह समारोहों का वर्णन है?
हमें वैचारिक/मानसिक रूप से धर्मभ्रष्ट किया जा रहा है, हम इसे खुशी-खुशी स्वीकार कर चुके है.....!
परिणाम खतरनाक हो रहे है, और होंगे....
बच सकते हो तो बच जाओ।
आओ सनातनी संस्कृति संस्कारों को बनाये रखने संकल्प ले।
पाणिग्रहण जीवन का सबसे बड़ा संस्कार है।
कुटुंब प्रबोधन 🪷⛳
महिलाएं संगीत सन्ध्या के नाम पर भोंडापन क्यों दिखा रही है?
पीठी, उबटन, सांझी गायन के परम्परागत रीति रिवाजों की जगह एकता कपूर के सीरियल की #मेहंदी और #हल्दी हमने क्यों ज़बरदस्ती पकड़ ली?
तोरण द्वार पर, पाणिग्रहण संस्कार के समय, युवक/युवतियों द्वारा हुल्लड़ क्यों किया जाता है?
💥🔥💥
बंदौली में कान फोड़ू "मुन्नी बदनाम.... छत पर सोया बहनोई.." और अन्य अशालीन अभद्र गीत क्यों बज रहे है?
हम सबको सनातन संस्कृति के अनुरूप होने वाले विवाह संस्कारों, रीति रिवाजों से इतनी एलर्जी क्यों हो गई है कि वो सब बकवास लगने लगे है?
पण्डित जी से फेरे जल्दी करवाने की जिद करने वाले लोग बैंड बाजे के आगे नाचने में ही समय क्यों बर्बाद करते है।
आशीर्वाद समारोहों में बड़ी टीवी स्क्रीन पर अपने ही बेटे-बेटी के "प्री वेडिंग शूट" आगन्तुकों को क्यों दिखाए जा रहे हैं?
प्री वेडिंग शूट के नाम पर विवाह पूर्व इस तरह की स्वतंत्रता क्यों दी जा रही है?
उन फोटोज को सार्वजनिक प्रदर्शनी के रूप में क्यो लगाए जा रहे है?
स्टेज पर बड़े बुजुर्गों को भी कैमरामैन/ डांस टीचर ठुमके क्यों लगवा रहे है?
उनसे असभ्य हरकते क्यों करवाई जा रही है?
भोज में दिखावा क्यों किया जा रहा है?
और भी बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जो हिन्दू समाज को पथभ्रष्ट करने हेतु काफी है।
परिवार, समाज सब पतनशील हो गए है, कोई समझाता क्यों नहीं?
महिलाएं गीत भूल गई है, पुरुष परम्पराओं का तर्पण कर चुके है।
किसको फॉलो करते हो ? क्या हमारे आराध्य/ईश्वर, देवी देवताओं के दाढ़ियां लटकती है?
क्या हमारे शास्त्रों, पौराणिक ग्रंथों में ऐसे विवाह समारोहों का वर्णन है?
हमें वैचारिक/मानसिक रूप से धर्मभ्रष्ट किया जा रहा है, हम इसे खुशी-खुशी स्वीकार कर चुके है.....!
परिणाम खतरनाक हो रहे है, और होंगे....
बच सकते हो तो बच जाओ।
आओ सनातनी संस्कृति संस्कारों को बनाये रखने संकल्प ले।
पाणिग्रहण जीवन का सबसे बड़ा संस्कार है।
कुटुंब प्रबोधन 🪷⛳
🌺🎄🌺🎄🌺🎄🌺🎄🌺
*एक सर्वे के मुताबिक भारत में सालभर में शादियों पर जितना खर्च हो रहा है उतनी कई देशों की GDP भी नहीं है*.
सनातन में शादी एक संस्कार होती थी जो अब एक इवेंट बन कर रह गई हैं.
पहले शादी समारोह मतलब दो लोगों को जुड़ने का एहसास कराते पवित्र विधि विधान, परस्पर दोनों पक्षों की पहचान कराते रीति- रिवाज, नेग भी मान सम्मान होते थे.
पहले हल्दी और मेंहदी यह सब घर अंदर हो जाता था किसी को पता भी नहीं होता था. पहले जो शादियां मंडप में बिना तामझाम के होती थी, वह भी शादियां ही होती थी और तब दाम्पत्य जीवन इससे कहीं ज्यादा सुखी थे. परंतु समाज व सोशल मीडिया पर दिखावे का ऐसा भूत चढ़ा है कि किसी को यह भान ही नहीं है कि क्या करना है क्या नहीं ?
यह एक दूसरे से ज्यादा आधुनिक और अमीर दिखाने के चक्कर में लोग हद से ज्यादा दिखावा करने लगे हैं.
अड़तालिस किलो की बिटिया को
पचास किलो का लहंगा भारी नहीन लगता.
माता पिता की अच्छी सीख की तुलना में कई किलो मेकअप हल्का लगता है. हर इवेंट पर घंटों का फोटो शूट थकान नहीं देता पर शादी की रस्म शुरू होते ही पंडित जी जल्दी करिए, कितना लम्बा पूजा पाठ है, कितनी थकान वाला सिस्टम है" कहते हुए शर्म भी न आती.
वाक़ई, अब की शादियाँ हैरान कर देने वाली हैं. मज़े की बात ये है कि ये एक सामाजिक बाध्यता बनती जा रही है. उत्तर भारत में शादियों में फ़िज़ूल खर्ची धीरे धीरे चरम पर पहुँच रही है.
पहले मंडप में शादी, वरमाला सब हो जाता था. फिर अलग से स्टेज का खर्च बढ़ा, अब हल्दी और मेहंदी में भी स्टेज, खर्च बढ़ गया है.
प्री वेडिंग फोटोशूट, डेस्टिनेशन वेडिंग, रिसेप्शन, अब तो सगाई का भी एक भव्य स्टेज तैयार होने लगा है. टीवी सीरियल देख देख कर सब शौक चढ़े है.
पहले बच्चे हल्दी में पुराने कपड़े पहन कर बैठ जाते थे अब तो हल्दी के कपड़े पांच दस हजार के आते है.
प्री वेडिंग शूट, फर्स्ट कॉपी डिजाइनर लहंगा, हल्दी/मेहंदी के लिए थीम पार्टी, लेडिज संगीत पार्टी, बैचलर'स पार्टी, ये सब तो लडकी वाला नाक उँची करने के लिये करवाता है. यदि लड़की का पिता खर्च मे कमी करता है तो उसकी बेटी कहती है कि शादी एक बार ही होगी और यही हाल लड़के वालो का भी है.
मजे की बात यह है कि स्वयं बेटा-बेटी ही इतना फिल्मी तामझाम चाहते हैं, चाहे वो बात प्री-वेडिंग शूट की हो या महिला संगीत की, कहीं कोई नियंत्रण नहीं है.
लडक़ी का भविष्य सुरक्षित करने के बजाय पैसा पानी की तरह बहाते हैं. अब तो लड़का लड़की खुद माँ बाप से खर्च करवाते हैं.
शादियों में लड़के वालों का भी लगभग उतना ही खर्चा हो रहा है जितना लड़की वालों का. अब नियंत्रण की आवश्यकता जितना लड़की वाले को है, उतना ही लड़के वाले को भी है. दोनों ही अपनी दिखावे की नाक ऊंची रखने के लिए कर्जा लेकर घी पी रहे हैं.
कभी ये सब अमीरों, रईसों के चोंचले होते थे लेकिन देखा देखी अब मिडिल क्लास और लोअर मिडिल क्लास वाले भी इसे फॉलो करने लगे है. रिश्तों में मिठास खत्म ये सब नौटंकी शुरू हो गई. एक मज़बूत के चक्कर में दूसरा कमजोर भी फंसता जा रहा है.
कुछ वर्षों पहले ही शादी के बाद औकात से भव्य रिसेप्शन का क्रेज तेजी से बढ़ा. धीरे-धीरे एक दूसरे से बड़ा दिखने की होड़ एक सामाजिक बाध्यता बनती जा रही है. इन सबमें मध्यम वर्ग परिवार मुसीबत में फंस रहे हैं कि कहीं अगर ऐसा नहीं किया तो समाज में उपहास का पात्र ना बन जायें. सोशल मीडिया और शादी का व्यापार करने वाली कंपनिया इसमें मुख्य भूमिका निभा रहीं हैं. ऐसा नहीं किया तो लोग क्या कहेंगे / सोचेंगे का डर ही ये सब करवा रहा है.
कोई नही पूछता उस पिता या भाई से जो जीवनभर जी तोड़ मेहनत करके कमाता है ताकि परिवार खुश रह सकें. वो ये सब फिजूलखर्ची भी इसी भय से करता है कि कोई उसे बुढ़ापे में ये ना कहे के आपने हमारे लिए किया क्या ?
दिखावे में बर्बाद होते समाज को इसमें कमी लाने की महती आवश्यकता है वरना अनर्गल पैसों का बोझ बढ़ते बढ़ते वैदिक वैवाहिक संस्कारों को समाप्त कर देगा.
♻️💢♻️💢♻️💢♻️💢💢
*एक सर्वे के मुताबिक भारत में सालभर में शादियों पर जितना खर्च हो रहा है उतनी कई देशों की GDP भी नहीं है*.
सनातन में शादी एक संस्कार होती थी जो अब एक इवेंट बन कर रह गई हैं.
पहले शादी समारोह मतलब दो लोगों को जुड़ने का एहसास कराते पवित्र विधि विधान, परस्पर दोनों पक्षों की पहचान कराते रीति- रिवाज, नेग भी मान सम्मान होते थे.
पहले हल्दी और मेंहदी यह सब घर अंदर हो जाता था किसी को पता भी नहीं होता था. पहले जो शादियां मंडप में बिना तामझाम के होती थी, वह भी शादियां ही होती थी और तब दाम्पत्य जीवन इससे कहीं ज्यादा सुखी थे. परंतु समाज व सोशल मीडिया पर दिखावे का ऐसा भूत चढ़ा है कि किसी को यह भान ही नहीं है कि क्या करना है क्या नहीं ?
यह एक दूसरे से ज्यादा आधुनिक और अमीर दिखाने के चक्कर में लोग हद से ज्यादा दिखावा करने लगे हैं.
अड़तालिस किलो की बिटिया को
पचास किलो का लहंगा भारी नहीन लगता.
माता पिता की अच्छी सीख की तुलना में कई किलो मेकअप हल्का लगता है. हर इवेंट पर घंटों का फोटो शूट थकान नहीं देता पर शादी की रस्म शुरू होते ही पंडित जी जल्दी करिए, कितना लम्बा पूजा पाठ है, कितनी थकान वाला सिस्टम है" कहते हुए शर्म भी न आती.
वाक़ई, अब की शादियाँ हैरान कर देने वाली हैं. मज़े की बात ये है कि ये एक सामाजिक बाध्यता बनती जा रही है. उत्तर भारत में शादियों में फ़िज़ूल खर्ची धीरे धीरे चरम पर पहुँच रही है.
पहले मंडप में शादी, वरमाला सब हो जाता था. फिर अलग से स्टेज का खर्च बढ़ा, अब हल्दी और मेहंदी में भी स्टेज, खर्च बढ़ गया है.
प्री वेडिंग फोटोशूट, डेस्टिनेशन वेडिंग, रिसेप्शन, अब तो सगाई का भी एक भव्य स्टेज तैयार होने लगा है. टीवी सीरियल देख देख कर सब शौक चढ़े है.
पहले बच्चे हल्दी में पुराने कपड़े पहन कर बैठ जाते थे अब तो हल्दी के कपड़े पांच दस हजार के आते है.
प्री वेडिंग शूट, फर्स्ट कॉपी डिजाइनर लहंगा, हल्दी/मेहंदी के लिए थीम पार्टी, लेडिज संगीत पार्टी, बैचलर'स पार्टी, ये सब तो लडकी वाला नाक उँची करने के लिये करवाता है. यदि लड़की का पिता खर्च मे कमी करता है तो उसकी बेटी कहती है कि शादी एक बार ही होगी और यही हाल लड़के वालो का भी है.
मजे की बात यह है कि स्वयं बेटा-बेटी ही इतना फिल्मी तामझाम चाहते हैं, चाहे वो बात प्री-वेडिंग शूट की हो या महिला संगीत की, कहीं कोई नियंत्रण नहीं है.
लडक़ी का भविष्य सुरक्षित करने के बजाय पैसा पानी की तरह बहाते हैं. अब तो लड़का लड़की खुद माँ बाप से खर्च करवाते हैं.
शादियों में लड़के वालों का भी लगभग उतना ही खर्चा हो रहा है जितना लड़की वालों का. अब नियंत्रण की आवश्यकता जितना लड़की वाले को है, उतना ही लड़के वाले को भी है. दोनों ही अपनी दिखावे की नाक ऊंची रखने के लिए कर्जा लेकर घी पी रहे हैं.
कभी ये सब अमीरों, रईसों के चोंचले होते थे लेकिन देखा देखी अब मिडिल क्लास और लोअर मिडिल क्लास वाले भी इसे फॉलो करने लगे है. रिश्तों में मिठास खत्म ये सब नौटंकी शुरू हो गई. एक मज़बूत के चक्कर में दूसरा कमजोर भी फंसता जा रहा है.
कुछ वर्षों पहले ही शादी के बाद औकात से भव्य रिसेप्शन का क्रेज तेजी से बढ़ा. धीरे-धीरे एक दूसरे से बड़ा दिखने की होड़ एक सामाजिक बाध्यता बनती जा रही है. इन सबमें मध्यम वर्ग परिवार मुसीबत में फंस रहे हैं कि कहीं अगर ऐसा नहीं किया तो समाज में उपहास का पात्र ना बन जायें. सोशल मीडिया और शादी का व्यापार करने वाली कंपनिया इसमें मुख्य भूमिका निभा रहीं हैं. ऐसा नहीं किया तो लोग क्या कहेंगे / सोचेंगे का डर ही ये सब करवा रहा है.
कोई नही पूछता उस पिता या भाई से जो जीवनभर जी तोड़ मेहनत करके कमाता है ताकि परिवार खुश रह सकें. वो ये सब फिजूलखर्ची भी इसी भय से करता है कि कोई उसे बुढ़ापे में ये ना कहे के आपने हमारे लिए किया क्या ?
दिखावे में बर्बाद होते समाज को इसमें कमी लाने की महती आवश्यकता है वरना अनर्गल पैसों का बोझ बढ़ते बढ़ते वैदिक वैवाहिक संस्कारों को समाप्त कर देगा.
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बहुत अच्छा संबोधन, अवश्य सुनें...
विवाह रात में नहीं, दिन में करेंगे !
वर्षों से चल रही दासता की प्रथा को बंद करेंगे !!
विवाह रात में नहीं, दिन में करेंगे !
वर्षों से चल रही दासता की प्रथा को बंद करेंगे !!
बहुत ही विचारणीय प्रश्न
कभी ईद में मुसलमानो को मस्ज़िद के सामने नशा करके अश्लील गानों पर नाचते हुए देखा है क्या ?🧐
कभी ईशु मसीह के सामने क्रिस्चियन लोगो को शांताबाई गाने पर नाचते हुए देखा है क्या ?🤔
कभी सिक्ख लोगो को अपने भगवान के सामने, आला बाबुराव गाना लगाकर नाचते हुए देखा है क्या ?😳
ये सभी समाज अपने अपने इष्ट का मान सम्मान बड़ी ईमानदारी से करते है. क्योकि उनको उनका धर्म उनकी संस्कृति को टिकाना है.
फिर हमारे हिन्दू धर्म के भगवान के सामने नशा करके और डीजे लगाकर अश्लील गाने लगाकर ये भद्दा नाच करने की बीमारी क्यों हो गयी है. 😇
घर मे लाडली बेटी का विवाह है, दूल्हे राजा अपनी होने वाली गृहलक्ष्मी को लेने द्वार पर पहुँचा है और डी जे वाले बजाते हैं - तू चीज बड़ी है मस्त मस्त...
अपनी तो जैसे तैसे... आपका क्या होगा जनाबे आली...
ये कलंक हमारे हिन्दू समाज पर ही क्यों लग गया है या हमने ही लगा लिया. अन्य धर्म के लोग अपने धार्मिक, पारिवारिक, सामाजिक कार्यक्रम में ऐसी फालतूगीरी नहीं करते.
डीजे पर अश्लील गाने लगाकर लाखों रुपया खर्च कर हम अपने ही इष्ट का अपने सनातन संस्कृति पारिवारिक परम्परा का अपमान कर रहे है.
हमें अपने त्यौहर बड़े उत्साह और बड़े पैमाने पर मनाने चाहिए साथ ही पारम्परिक वाद्य, ढोल मजीरो, पारम्परिक पोशाक में बड़े ही शान से प्रत्येक हिन्दू त्यौहारों में दिखनी ही चाहिए.
तभी हमारी सनातन संस्कृति टिकेगी. देखिये आप खुद ही विचार करें, और दूसरों को भी विचार करने लगाइये.
अभी आगे नवरात्रि, गणेशोत्सव, दशहरा आदि त्योहारों में ध्यान रखें और कोई ऐसा करता हो उन्हें समझाए. समाज के जो कर्ता धर्ता बनकर बैठे हैं उनको भी अपने अपने सामाजिक संगठनों के प्रभाव व दबाव पूर्वक ऐसे करने वालो को बलपूर्वक रोकने का प्रयास करना चाहिये.
फूहड़ गानों के जगह हिन्दू भक्ति गीत व संगीत पर आधारित श्लोक व हरि धुन लगाए ।💯🚩
आधे अधूरे, कटे फटे, भड़काऊ वस्त्र पहनना, अंतर्जातीय प्यार और विवाह करना, माता पिता को रूढीवादी बताना, लिव रिलेशनशिप में बिंदास जीवन बिताना, बिना शादी किए अपने होने वाली जीवनसंगिनी के साथ अमर्यादित, अभद्र फोटो विडिओ शूटिंग करा दुनिया को दिखाना आदि अनेक उदाहरण है जो बीमारी केवल और केवल हिन्दू समाज को ही लगी है.
हिंदू संस्कृति का जितना नुकसान स्वयं हमने किया है, उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते है. अफसोस, क्या हम अपने घर परिवार के कोई भी आयोजन में जस मंडली, भजन मंडली, फाग मंडली, महिला मंडली, संस्कृत स्तोत्र उच्चारण करने वाले विद्वानों तथा लोकल व पारंपरिक वाद्य यंत्रों वाले कलाकारों को नही बुला सकते ?????????
जब देश के सबसे बड़े अमीर, अम्बानी अपने बेटे की शादी करते है तो देवी स्तोत्र, देवता आदि की स्तुति में सम्पन्न करते हैं. फिर आप और हम क्यों नहीं ?????
अपने बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ- साथ अपने परिवार, समाज, संस्कृति व धर्म से भी जोड़े.
🙏🙏🙏🙏🙏
कभी ईद में मुसलमानो को मस्ज़िद के सामने नशा करके अश्लील गानों पर नाचते हुए देखा है क्या ?🧐
कभी ईशु मसीह के सामने क्रिस्चियन लोगो को शांताबाई गाने पर नाचते हुए देखा है क्या ?🤔
कभी सिक्ख लोगो को अपने भगवान के सामने, आला बाबुराव गाना लगाकर नाचते हुए देखा है क्या ?😳
ये सभी समाज अपने अपने इष्ट का मान सम्मान बड़ी ईमानदारी से करते है. क्योकि उनको उनका धर्म उनकी संस्कृति को टिकाना है.
फिर हमारे हिन्दू धर्म के भगवान के सामने नशा करके और डीजे लगाकर अश्लील गाने लगाकर ये भद्दा नाच करने की बीमारी क्यों हो गयी है. 😇
घर मे लाडली बेटी का विवाह है, दूल्हे राजा अपनी होने वाली गृहलक्ष्मी को लेने द्वार पर पहुँचा है और डी जे वाले बजाते हैं - तू चीज बड़ी है मस्त मस्त...
अपनी तो जैसे तैसे... आपका क्या होगा जनाबे आली...
ये कलंक हमारे हिन्दू समाज पर ही क्यों लग गया है या हमने ही लगा लिया. अन्य धर्म के लोग अपने धार्मिक, पारिवारिक, सामाजिक कार्यक्रम में ऐसी फालतूगीरी नहीं करते.
डीजे पर अश्लील गाने लगाकर लाखों रुपया खर्च कर हम अपने ही इष्ट का अपने सनातन संस्कृति पारिवारिक परम्परा का अपमान कर रहे है.
हमें अपने त्यौहर बड़े उत्साह और बड़े पैमाने पर मनाने चाहिए साथ ही पारम्परिक वाद्य, ढोल मजीरो, पारम्परिक पोशाक में बड़े ही शान से प्रत्येक हिन्दू त्यौहारों में दिखनी ही चाहिए.
तभी हमारी सनातन संस्कृति टिकेगी. देखिये आप खुद ही विचार करें, और दूसरों को भी विचार करने लगाइये.
अभी आगे नवरात्रि, गणेशोत्सव, दशहरा आदि त्योहारों में ध्यान रखें और कोई ऐसा करता हो उन्हें समझाए. समाज के जो कर्ता धर्ता बनकर बैठे हैं उनको भी अपने अपने सामाजिक संगठनों के प्रभाव व दबाव पूर्वक ऐसे करने वालो को बलपूर्वक रोकने का प्रयास करना चाहिये.
फूहड़ गानों के जगह हिन्दू भक्ति गीत व संगीत पर आधारित श्लोक व हरि धुन लगाए ।💯🚩
आधे अधूरे, कटे फटे, भड़काऊ वस्त्र पहनना, अंतर्जातीय प्यार और विवाह करना, माता पिता को रूढीवादी बताना, लिव रिलेशनशिप में बिंदास जीवन बिताना, बिना शादी किए अपने होने वाली जीवनसंगिनी के साथ अमर्यादित, अभद्र फोटो विडिओ शूटिंग करा दुनिया को दिखाना आदि अनेक उदाहरण है जो बीमारी केवल और केवल हिन्दू समाज को ही लगी है.
हिंदू संस्कृति का जितना नुकसान स्वयं हमने किया है, उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते है. अफसोस, क्या हम अपने घर परिवार के कोई भी आयोजन में जस मंडली, भजन मंडली, फाग मंडली, महिला मंडली, संस्कृत स्तोत्र उच्चारण करने वाले विद्वानों तथा लोकल व पारंपरिक वाद्य यंत्रों वाले कलाकारों को नही बुला सकते ?????????
जब देश के सबसे बड़े अमीर, अम्बानी अपने बेटे की शादी करते है तो देवी स्तोत्र, देवता आदि की स्तुति में सम्पन्न करते हैं. फिर आप और हम क्यों नहीं ?????
अपने बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ- साथ अपने परिवार, समाज, संस्कृति व धर्म से भी जोड़े.
🙏🙏🙏🙏🙏
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दिखावे में बर्बाद होते समाज को सोचना बहुत आवश्यक है
एक सर्वे के मुताबिक भारत में साल भर में शादियों पर जितना खर्च हो रहा है, उतनी कई देशों की GDP भी नहीं है.
सनातन में शादी एक संस्कार होती थी जो अब एक इवेंट बन कर रह गई हैं. पहले शादी समारोह मतलब दो लोगों को जुड़ने का एहसास कराते पवित्र विधि विधान, परस्पर दोनों पक्षों की पहचान कराते रीति- रिवाज, नेग भी मान सम्मान होते थे.
पहले हल्दी और मेंहदी यह सब घर अंदर हो जाता था किसी को पता भी नहीं होता था. पहले जो शादियां मंडप में बिना तामझाम के होती थी, वह भी शादियां ही होती थी और तब दाम्पत्य जीवन इससे कहीं ज्यादा सुखी थे. परंतु समाज व सोशल मीडिया पर दिखावे का ऐसा भूत चढ़ा है कि किसी को यह भान ही नहीं है कि क्या करना है क्या नहीं ?
यह एक दूसरे से ज्यादा आधुनिक और अमीर दिखाने के चक्कर में लोग हद से ज्यादा दिखावा करने लगे हैं.
अड़तालिस किलो की बिटिया को पचास किलो का लहंगा भारी न लगता. माता पिता की अच्छी सीख की तुलना में कई किलो मेकअप हल्का लगता है. हर इवेंट पर घंटों का फोटो शूट थकान नहीं देता पर शादी की रस्म शुरू होते ही पंडित जी जल्दी करिए, कितना लम्बा पूजा पाठ है, कितनी थकान वाला सिस्टम है" कहते हुए शर्म भी नहीं आती.
वाक़ई, अब की शादियाँ हैरान कर देने वाली हैं. मज़े की बात ये है कि ये एक सामाजिक बाध्यता बनती जा रही है. उत्तर भारत में शादियों में फ़िज़ूल खर्ची धीरे धीरे चरम पर पहुँच रही है.
पहले मंडप में शादी, वरमाला सब हो जाता था. फिर अलग से स्टेज का खर्च बढ़ा, अब हल्दी और मेहंदी में भी स्टेज, खर्च बढ़ गया है. प्री वेडिंग फोटोशूट, डेस्टिनेशन वेडिंग, रिसेप्शन, अब तो सगाई का भी एक भव्य स्टेज तैयार होने लगा है. टीवी सीरियल देख देख कर सब शौक चढ़े है. पहले बच्चे हल्दी में पुराने कपड़े पहन कर बैठ जाते थे अब तो हल्दी के कपड़े पांच दस हजार के आते है.
प्री वेडिंग शूट, फर्स्ट कॉपी डिजाइनर लहंगा, हल्दी/ मेहंदी के लिए थीम पार्टी, लेडिज संगीत पार्टी, बैचलर'स पार्टी, ये सब तो लडकी वाला नाक उँची करने के लिये करवाता है. यदि लड़की का पिता खर्च मे कमी करता है तो उसकी बेटी कहती है कि शादी एक बार ही होगी और यही हाल लड़के वालो का भी है.
मजे की बात यह है कि स्वयं बेटा-बेटी ही इतना फिल्मी तामझाम चाहते हैं, चाहे वो बात प्री-वेडिंग शूट की हो या महिला संगीत की, कहीं कोई नियंत्रण नहीं है. लडक़ी का भविष्य सुरक्षित करने के बजाय पैसा पानी की तरह बहाते हैं. अब तो लड़का लड़की खुद माँ बाप से खर्च करवाते हैं.
शादियों में लड़के वालों का भी लगभग उतना ही खर्चा हो रहा है जितना लड़की वालों का. अब नियंत्रण की आवश्यकता जितना लड़की वाले को है, उतना ही लड़के वाले को भी है. दोनों ही अपनी दिखावे की नाक ऊंची रखने के लिए कर्जा लेकर घी पी रहे हैं.
कभी ये सब अमीरों, रईसों के चोंचले होते थे लेकिन देखा देखी अब मिडिल क्लास और लोअर मिडिल क्लास वाले भी इसे फॉलो करने लगे है. रिश्तों में मिठास खत्म ये सब नौटंकी शुरू हो गई. एक मज़बूत के चक्कर में दूसरा कमजोर भी फंसता जा रहा है.
कुछ वर्षों पहले ही शादी के बाद औकात से भव्य रिसेप्शन का क्रेज तेजी से बढ़ा. धीरे-धीरे एक दूसरे से बड़ा दिखने की होड़ एक सामाजिक बाध्यता बनती जा रही है. इन सबमें मध्यम वर्ग परिवार मुसीबत में फंस रहे हैं कि कहीं अगर ऐसा नहीं किया तो समाज में उपहास का पात्र ना बन जायें. सोशल मीडिया और शादी का व्यापार करने वाली कंपनिया इसमें मुख्य भूमिका निभा रहीं हैं. ऐसा नहीं किया तो लोग क्या कहेंगे/ सोचेंगे का डर ही ये सब करवा रहा है.
कोई नही पूछता उस पिता या भाई से जो जीवनभर जी तोड़ मेहनत करके कमाता है ताकि परिवार खुश रह सकें. वो ये सब फिजूलखर्ची भी इसी भय से करता है कि कोई उसे बुढ़ापे में ये ना कहे के आपने हमारे लिए किया क्या.
दिखावे में बर्बाद होते समाज को इसमें कमी लाने की महती आवश्यकता है वरना अनर्गल पैसों का बोझ बढ़ते बढ़ते वैदिक वैवाहिक संस्कारों को समाप्त कर देगा.
एक सर्वे के मुताबिक भारत में साल भर में शादियों पर जितना खर्च हो रहा है, उतनी कई देशों की GDP भी नहीं है.
सनातन में शादी एक संस्कार होती थी जो अब एक इवेंट बन कर रह गई हैं. पहले शादी समारोह मतलब दो लोगों को जुड़ने का एहसास कराते पवित्र विधि विधान, परस्पर दोनों पक्षों की पहचान कराते रीति- रिवाज, नेग भी मान सम्मान होते थे.
पहले हल्दी और मेंहदी यह सब घर अंदर हो जाता था किसी को पता भी नहीं होता था. पहले जो शादियां मंडप में बिना तामझाम के होती थी, वह भी शादियां ही होती थी और तब दाम्पत्य जीवन इससे कहीं ज्यादा सुखी थे. परंतु समाज व सोशल मीडिया पर दिखावे का ऐसा भूत चढ़ा है कि किसी को यह भान ही नहीं है कि क्या करना है क्या नहीं ?
यह एक दूसरे से ज्यादा आधुनिक और अमीर दिखाने के चक्कर में लोग हद से ज्यादा दिखावा करने लगे हैं.
अड़तालिस किलो की बिटिया को पचास किलो का लहंगा भारी न लगता. माता पिता की अच्छी सीख की तुलना में कई किलो मेकअप हल्का लगता है. हर इवेंट पर घंटों का फोटो शूट थकान नहीं देता पर शादी की रस्म शुरू होते ही पंडित जी जल्दी करिए, कितना लम्बा पूजा पाठ है, कितनी थकान वाला सिस्टम है" कहते हुए शर्म भी नहीं आती.
वाक़ई, अब की शादियाँ हैरान कर देने वाली हैं. मज़े की बात ये है कि ये एक सामाजिक बाध्यता बनती जा रही है. उत्तर भारत में शादियों में फ़िज़ूल खर्ची धीरे धीरे चरम पर पहुँच रही है.
पहले मंडप में शादी, वरमाला सब हो जाता था. फिर अलग से स्टेज का खर्च बढ़ा, अब हल्दी और मेहंदी में भी स्टेज, खर्च बढ़ गया है. प्री वेडिंग फोटोशूट, डेस्टिनेशन वेडिंग, रिसेप्शन, अब तो सगाई का भी एक भव्य स्टेज तैयार होने लगा है. टीवी सीरियल देख देख कर सब शौक चढ़े है. पहले बच्चे हल्दी में पुराने कपड़े पहन कर बैठ जाते थे अब तो हल्दी के कपड़े पांच दस हजार के आते है.
प्री वेडिंग शूट, फर्स्ट कॉपी डिजाइनर लहंगा, हल्दी/ मेहंदी के लिए थीम पार्टी, लेडिज संगीत पार्टी, बैचलर'स पार्टी, ये सब तो लडकी वाला नाक उँची करने के लिये करवाता है. यदि लड़की का पिता खर्च मे कमी करता है तो उसकी बेटी कहती है कि शादी एक बार ही होगी और यही हाल लड़के वालो का भी है.
मजे की बात यह है कि स्वयं बेटा-बेटी ही इतना फिल्मी तामझाम चाहते हैं, चाहे वो बात प्री-वेडिंग शूट की हो या महिला संगीत की, कहीं कोई नियंत्रण नहीं है. लडक़ी का भविष्य सुरक्षित करने के बजाय पैसा पानी की तरह बहाते हैं. अब तो लड़का लड़की खुद माँ बाप से खर्च करवाते हैं.
शादियों में लड़के वालों का भी लगभग उतना ही खर्चा हो रहा है जितना लड़की वालों का. अब नियंत्रण की आवश्यकता जितना लड़की वाले को है, उतना ही लड़के वाले को भी है. दोनों ही अपनी दिखावे की नाक ऊंची रखने के लिए कर्जा लेकर घी पी रहे हैं.
कभी ये सब अमीरों, रईसों के चोंचले होते थे लेकिन देखा देखी अब मिडिल क्लास और लोअर मिडिल क्लास वाले भी इसे फॉलो करने लगे है. रिश्तों में मिठास खत्म ये सब नौटंकी शुरू हो गई. एक मज़बूत के चक्कर में दूसरा कमजोर भी फंसता जा रहा है.
कुछ वर्षों पहले ही शादी के बाद औकात से भव्य रिसेप्शन का क्रेज तेजी से बढ़ा. धीरे-धीरे एक दूसरे से बड़ा दिखने की होड़ एक सामाजिक बाध्यता बनती जा रही है. इन सबमें मध्यम वर्ग परिवार मुसीबत में फंस रहे हैं कि कहीं अगर ऐसा नहीं किया तो समाज में उपहास का पात्र ना बन जायें. सोशल मीडिया और शादी का व्यापार करने वाली कंपनिया इसमें मुख्य भूमिका निभा रहीं हैं. ऐसा नहीं किया तो लोग क्या कहेंगे/ सोचेंगे का डर ही ये सब करवा रहा है.
कोई नही पूछता उस पिता या भाई से जो जीवनभर जी तोड़ मेहनत करके कमाता है ताकि परिवार खुश रह सकें. वो ये सब फिजूलखर्ची भी इसी भय से करता है कि कोई उसे बुढ़ापे में ये ना कहे के आपने हमारे लिए किया क्या.
दिखावे में बर्बाद होते समाज को इसमें कमी लाने की महती आवश्यकता है वरना अनर्गल पैसों का बोझ बढ़ते बढ़ते वैदिक वैवाहिक संस्कारों को समाप्त कर देगा.
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आजकल की लड़कियों के ख्वाब बड़े ऊंचे हो गए हैं...
कमोबेश ऐसी परिस्थिति अधिकांशतः देखने को मिल रही है, इसी कारण रिश्ते बनने में, समय बहुत लग रहा है....
रेडियो मिर्ची वालों ने ये मज़ाक के तौर पर बनाया है, परंतु ये वास्तविक हकीकत है, प्रत्येक को विशेष तौर पर लड़कीयों एवं उनके परिजनों को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है...
☝️🧐🤔🙄😁
कमोबेश ऐसी परिस्थिति अधिकांशतः देखने को मिल रही है, इसी कारण रिश्ते बनने में, समय बहुत लग रहा है....
रेडियो मिर्ची वालों ने ये मज़ाक के तौर पर बनाया है, परंतु ये वास्तविक हकीकत है, प्रत्येक को विशेष तौर पर लड़कीयों एवं उनके परिजनों को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है...
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Ram Nuwal, MBA, Service, Native of Bhilwara, DOB: 30 SEP 1995
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This group is only meant for Maheshwari families who want to share biodata of their children/ known & relatives for marriage purpose. Others are requested to leave this group/ it's channel, else we will BLOCK them.
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घर की बहु हरदम परफेक्ट ही क्यूं रहे, आखिर वह भी तो एक इंसान है…