1 जुलाई जगन्नाथ रथ यात्रा।
30 June 2022
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🚩जगन्नाथ भगवान हिंदु धर्म के चार धामों में जगन्नाथ पुरी का बहुत महत्व है।
🚩ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु रामेश्वरम में स्नान, द्वारका में शयन, बद्रीनाथ में ध्यान और पुरी में भोजन करते हैं।
🚩भगवान जगन्नाथ के दर्शन किए बिना चारों धामों की यात्रा अधूरी मानी जाती है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा प्रारंभ होती है। ऐसा कहा जाता है कि रथ यात्रा के जरिए भगवान मौसी के घर जनकपुर जाते हैं।
🚩रथ यात्रा में बलरामजी के रथ को ‘तालध्वज ’ कहते हैं। देवी सुभद्रा के रथ को ‘दर्पदलन’, जबकि भगवान जगन्नाथ के रथ को ‘नंदीघोष’ या ‘गरुड़ध्वज ’ कहा जाता है। यह सबसे पीछे रहता है। इन तीनों रथों की उंचाई, पहिए और आकृति अलग-अलग होती हैं।
🚩ऐसी मान्यता है कि जो भी इस यात्रा में शामिल होता है, उसके सारे कष्ट सारी समस्याएं दूर हो जाती हैं. रथ खींचने को लेकर भी अलग-अलग धारणाएं हैं. ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति भगवान के रथ को खींचते हैं, उसे 100 यज्ञ करने के फल मिलता है. साथ ही इस यात्रा में शामिल होने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।
🚩ये है तीनों रथों की खासियत:-
🚩इस रथ को गरुड़ध्वज, कपिध्वज या नंदीघोष कहा जाता है। इसमें 16 पहिए होते हैं व ऊंचाई साढ़े 13 मीटर तक होती है। लाल और पीले रंग का लगभग 1100 मीटर कपड़ा रथ को ढंकने के लिए उपयोग में लाया जाता है। इस रथ को बनाने में 832 लकड़ी के टुकड़ों का उपयोग किया जाता है।
🚩इस रथ के सारथी का नाम दारुक है। इस रथ के रक्षक भगवान विष्णु के वाहन पक्षीराज गरुड़ और नृसिंह हैं। रथ पर लगे झंडे को यानी ध्वजा का नाम त्रिलोक्यमोहिनी है। रथ में जय और विजय नाम के दो द्वारपाल होते हैं।
🚩इस रथ के घोड़ों का नाम शंख, बलाहक, श्वेत एवं हरिदाश्व है, जिनका रंग सफेद होता है। इसके अलावा भगवान जगन्नाथ के रथ की रक्षा के लिए शंख और सुदर्शन स्तंभ भी होता है। रथ को जिस रस्सी से खींचा जाता है, वह शंखचूड़ (एक प्रकार का नाग) नाम से जानी जाती है।
🚩इस रथ में भगवान जगन्नाथ के अलावा अन्य सहायक देवता के रूप में वराह, गोवर्धन, कृष्ण, नृसिंह, राम, नारायण, त्रिविक्रम, हनुमान और रूद्र भी होते हैं।
🚩 भगवान जगन्नाथ के रथ के साथ 8 ऋषि भी चलते हैं जिनके नाम नारद, देवल, व्यास, शुक, पाराशर, विशिष्ठ, विश्वामित्र और रूद्र हैं।
🚩इस रथ का नाम तालध्वज है। यह रथ 13.2 मीटर ऊंचा व 14 पहियों का होता है, जो लाल, हरे रंग के कपड़े व लकड़ी के 763 टुकड़ों से बना होता है। इस रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं। इनके रथ की ध्वजा का नाम उनानी हैं।
🚩इस रथ में काले रंग के 4 घोड़े लगे होते हैं। जिनका नाम त्रिब्रा, घोरा, दीर्घशर्मा व स्वर्णनवा है। इस रथ में नंद और सुनंद नाम के 2 द्वारपाल होते हैं। रथ की रक्षा के लिए हल और मुसल भी होते हैं।
🚩 इनके रथ की शक्तियों के नाम ब्रह्म और शिवा है। इनके रथ को खिंचने के लिए वासुकी नाग के रुप में रस्सी होती है।
🚩इस रथ में बलराम जी के अलावा अन्य सहायक देवता के रूप में गणेश, कार्तिकेय, सर्वमंगल, प्रलंबरी, हलायुध, मृत्युंजय, नटवर, मुक्तेश्वर और शेषदेव होते हैं। बलराम जी के रथ के साथ अंगिरा, पौलस्त्य, पुलह, असस्ति, मुद्गल, अत्रेय और कश्यप ऋषि भी चलते हैं।
🚩सुभद्रा के रथ का नाम देवदलन है। इसके अन्य नाम दर्पदलन और पद्मध्वज भी है। 12.9 मीटर ऊंचे 12 पहिए के इस रथ में लाल, काले कपड़े के साथ लकड़ी के 593 टुकड़ों का इस्तेमाल होता है।
🚩इस रथ के रक्षक जयदुर्गा और सारथी अर्जुन होते हैं। इस रथ की द्वारपाल गंगा और यमुना होती हैं। इनके रथ की ध्वजा का नाम नदंबिका है। इनके रथ की रक्षा के लिए पद्म और कल्हर के रुप में शस्त्र होते हैं। इस रथ की शक्तियों के नाम चक्र और भुवनेश्वरी है।
🚩 सुभद्रा जी के रथ में लाल रंग के 4 घोड़े होते हैं। जिनके नाम रोचिक, मोचिक, जिता व अपराजिता है। इस रथ को खींचने वाली रस्सी को स्वर्णचुड़ा कहते हैं। सुभद्रा जी के इनके अलावा रथ में सहायक देवियों के रुप में चंडी, चामुंडा, उग्रतारा, वनदुर्गा, वराही, श्यामा, काली, मंगला और विमला नाम की देवियां होती हैं। इनके रथ के साथ भृगु, सुपर्व, व्रज, श्रृंगी, ध्रुव और उलूक ऋषि चलते हैं।
🚩पुरी जगन्नाथ धाम में 1 जुलाई 2022 को होने वाली विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा के लिए जल, थल एवं आकाश मार्ग में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।
🚩श्रीमंदिर के से सटे इलाके को नो फ्लाइंग जोन घोषित करने के लिए डीजीसीए को पत्र लिखा गया है। तटरक्षी वाहिनी को सतर्क कर दिया गया है। रथयात्रा के समय तटरक्षी वाहिनी को पुरी समुद्र के किनारे गश्त करने को निर्देश जारी किया गया है। इसके साथ ही तटरक्षी वाहिनी के हेलिकाप्टर के जरिए भी रथयात्रा के दिन हवाई मार्ग पर नजर रखी जाएगी।
30 June 2022
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🚩जगन्नाथ भगवान हिंदु धर्म के चार धामों में जगन्नाथ पुरी का बहुत महत्व है।
🚩ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु रामेश्वरम में स्नान, द्वारका में शयन, बद्रीनाथ में ध्यान और पुरी में भोजन करते हैं।
🚩भगवान जगन्नाथ के दर्शन किए बिना चारों धामों की यात्रा अधूरी मानी जाती है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा प्रारंभ होती है। ऐसा कहा जाता है कि रथ यात्रा के जरिए भगवान मौसी के घर जनकपुर जाते हैं।
🚩रथ यात्रा में बलरामजी के रथ को ‘तालध्वज ’ कहते हैं। देवी सुभद्रा के रथ को ‘दर्पदलन’, जबकि भगवान जगन्नाथ के रथ को ‘नंदीघोष’ या ‘गरुड़ध्वज ’ कहा जाता है। यह सबसे पीछे रहता है। इन तीनों रथों की उंचाई, पहिए और आकृति अलग-अलग होती हैं।
🚩ऐसी मान्यता है कि जो भी इस यात्रा में शामिल होता है, उसके सारे कष्ट सारी समस्याएं दूर हो जाती हैं. रथ खींचने को लेकर भी अलग-अलग धारणाएं हैं. ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति भगवान के रथ को खींचते हैं, उसे 100 यज्ञ करने के फल मिलता है. साथ ही इस यात्रा में शामिल होने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।
🚩ये है तीनों रथों की खासियत:-
🚩इस रथ को गरुड़ध्वज, कपिध्वज या नंदीघोष कहा जाता है। इसमें 16 पहिए होते हैं व ऊंचाई साढ़े 13 मीटर तक होती है। लाल और पीले रंग का लगभग 1100 मीटर कपड़ा रथ को ढंकने के लिए उपयोग में लाया जाता है। इस रथ को बनाने में 832 लकड़ी के टुकड़ों का उपयोग किया जाता है।
🚩इस रथ के सारथी का नाम दारुक है। इस रथ के रक्षक भगवान विष्णु के वाहन पक्षीराज गरुड़ और नृसिंह हैं। रथ पर लगे झंडे को यानी ध्वजा का नाम त्रिलोक्यमोहिनी है। रथ में जय और विजय नाम के दो द्वारपाल होते हैं।
🚩इस रथ के घोड़ों का नाम शंख, बलाहक, श्वेत एवं हरिदाश्व है, जिनका रंग सफेद होता है। इसके अलावा भगवान जगन्नाथ के रथ की रक्षा के लिए शंख और सुदर्शन स्तंभ भी होता है। रथ को जिस रस्सी से खींचा जाता है, वह शंखचूड़ (एक प्रकार का नाग) नाम से जानी जाती है।
🚩इस रथ में भगवान जगन्नाथ के अलावा अन्य सहायक देवता के रूप में वराह, गोवर्धन, कृष्ण, नृसिंह, राम, नारायण, त्रिविक्रम, हनुमान और रूद्र भी होते हैं।
🚩 भगवान जगन्नाथ के रथ के साथ 8 ऋषि भी चलते हैं जिनके नाम नारद, देवल, व्यास, शुक, पाराशर, विशिष्ठ, विश्वामित्र और रूद्र हैं।
🚩इस रथ का नाम तालध्वज है। यह रथ 13.2 मीटर ऊंचा व 14 पहियों का होता है, जो लाल, हरे रंग के कपड़े व लकड़ी के 763 टुकड़ों से बना होता है। इस रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं। इनके रथ की ध्वजा का नाम उनानी हैं।
🚩इस रथ में काले रंग के 4 घोड़े लगे होते हैं। जिनका नाम त्रिब्रा, घोरा, दीर्घशर्मा व स्वर्णनवा है। इस रथ में नंद और सुनंद नाम के 2 द्वारपाल होते हैं। रथ की रक्षा के लिए हल और मुसल भी होते हैं।
🚩 इनके रथ की शक्तियों के नाम ब्रह्म और शिवा है। इनके रथ को खिंचने के लिए वासुकी नाग के रुप में रस्सी होती है।
🚩इस रथ में बलराम जी के अलावा अन्य सहायक देवता के रूप में गणेश, कार्तिकेय, सर्वमंगल, प्रलंबरी, हलायुध, मृत्युंजय, नटवर, मुक्तेश्वर और शेषदेव होते हैं। बलराम जी के रथ के साथ अंगिरा, पौलस्त्य, पुलह, असस्ति, मुद्गल, अत्रेय और कश्यप ऋषि भी चलते हैं।
🚩सुभद्रा के रथ का नाम देवदलन है। इसके अन्य नाम दर्पदलन और पद्मध्वज भी है। 12.9 मीटर ऊंचे 12 पहिए के इस रथ में लाल, काले कपड़े के साथ लकड़ी के 593 टुकड़ों का इस्तेमाल होता है।
🚩इस रथ के रक्षक जयदुर्गा और सारथी अर्जुन होते हैं। इस रथ की द्वारपाल गंगा और यमुना होती हैं। इनके रथ की ध्वजा का नाम नदंबिका है। इनके रथ की रक्षा के लिए पद्म और कल्हर के रुप में शस्त्र होते हैं। इस रथ की शक्तियों के नाम चक्र और भुवनेश्वरी है।
🚩 सुभद्रा जी के रथ में लाल रंग के 4 घोड़े होते हैं। जिनके नाम रोचिक, मोचिक, जिता व अपराजिता है। इस रथ को खींचने वाली रस्सी को स्वर्णचुड़ा कहते हैं। सुभद्रा जी के इनके अलावा रथ में सहायक देवियों के रुप में चंडी, चामुंडा, उग्रतारा, वनदुर्गा, वराही, श्यामा, काली, मंगला और विमला नाम की देवियां होती हैं। इनके रथ के साथ भृगु, सुपर्व, व्रज, श्रृंगी, ध्रुव और उलूक ऋषि चलते हैं।
🚩पुरी जगन्नाथ धाम में 1 जुलाई 2022 को होने वाली विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा के लिए जल, थल एवं आकाश मार्ग में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।
🚩श्रीमंदिर के से सटे इलाके को नो फ्लाइंग जोन घोषित करने के लिए डीजीसीए को पत्र लिखा गया है। तटरक्षी वाहिनी को सतर्क कर दिया गया है। रथयात्रा के समय तटरक्षी वाहिनी को पुरी समुद्र के किनारे गश्त करने को निर्देश जारी किया गया है। इसके साथ ही तटरक्षी वाहिनी के हेलिकाप्टर के जरिए भी रथयात्रा के दिन हवाई मार्ग पर नजर रखी जाएगी।
🚩भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा 192 देशों में मनाई जाती है, जो महाद्वीपों में फैली हुई है, जो संयुक्त राष्ट्र के कुल सदस्य राज्यों के बराबर है।
🚩रथयात्रा के इन रथों का निर्माण बहुत ही खास तरीके से किया जाता है। रथ बनाने में किसी भी तरह की धातु का उपयोग नहीं होता है। तीनों रथ पवित्र लकड़ियों से बनाए जाते हैं।
🚩रथ बनाने के लिए स्वस्थ और शुभ पेड़ों की पहचान की जाती है। रथों के लिए लकड़ी का चुनने का काम बसंत पंचमी से शुरू हो जाता है। जब लकड़ियां चुन ली जाती हैं तो अक्षय तृतीया से रथ बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाती है।
🚩भगवान जगन्नाथ के रथ में कुल 16 पहिये होते हैं। जगन्नाथ जी का रथ लाल और पीले रंग का होता है और ये रथ अन्य दो रथों से आकार में थोड़ा बड़ा भी होता है।
🚩जगन्नाथ जी के रथ के पीछे बलभद्र और सुभद्रा के रथ होते हैं। जगन्नाथ के रथ पर हनुमान जी और भगवान नृसिंह का चिह्न बनाया जाता है।
🚩रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी शहर का भ्रमण करते हुए जगन्नाथ मंदिर से जनकपुर के गुंडीचा मंदिर पहुंचते हैं। यहां भगवान की मौसी का घर है। यात्रा के दूसरे दिन रथ पर रखी हुई भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की मूर्तियों को विधि-विधान के साथ उतारा जाता है और मौसी के मंदिर में स्थापित किया जाता है। भगवान मौसी के यहां सात दिन विश्राम करते हैं और 8वें दिन यानी आषाढ़ शुक्ल दशमी पर तीथों देवी-देवताओं को रथ में बैठाकर यात्रा शुरू होती है। रथों की वापसी की इस यात्रा की रस्म को बहुड़ा यात्रा कहा जाता है।
🚩1 जुलाई से उड़ीसा में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा शुरू होने वाली है। हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया से ये यात्रा शुरू होती है। रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा के तीन अलग-अलग रथ होते हैं। इन रथों पर भगवान विराजित होते हैं और यात्रा पर निकलते हैं। आषाढ़ शुक्ल दशमी को ये तीनों रथ फिर से मुख्य मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं।
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🚩रथयात्रा के इन रथों का निर्माण बहुत ही खास तरीके से किया जाता है। रथ बनाने में किसी भी तरह की धातु का उपयोग नहीं होता है। तीनों रथ पवित्र लकड़ियों से बनाए जाते हैं।
🚩रथ बनाने के लिए स्वस्थ और शुभ पेड़ों की पहचान की जाती है। रथों के लिए लकड़ी का चुनने का काम बसंत पंचमी से शुरू हो जाता है। जब लकड़ियां चुन ली जाती हैं तो अक्षय तृतीया से रथ बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाती है।
🚩भगवान जगन्नाथ के रथ में कुल 16 पहिये होते हैं। जगन्नाथ जी का रथ लाल और पीले रंग का होता है और ये रथ अन्य दो रथों से आकार में थोड़ा बड़ा भी होता है।
🚩जगन्नाथ जी के रथ के पीछे बलभद्र और सुभद्रा के रथ होते हैं। जगन्नाथ के रथ पर हनुमान जी और भगवान नृसिंह का चिह्न बनाया जाता है।
🚩रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी शहर का भ्रमण करते हुए जगन्नाथ मंदिर से जनकपुर के गुंडीचा मंदिर पहुंचते हैं। यहां भगवान की मौसी का घर है। यात्रा के दूसरे दिन रथ पर रखी हुई भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की मूर्तियों को विधि-विधान के साथ उतारा जाता है और मौसी के मंदिर में स्थापित किया जाता है। भगवान मौसी के यहां सात दिन विश्राम करते हैं और 8वें दिन यानी आषाढ़ शुक्ल दशमी पर तीथों देवी-देवताओं को रथ में बैठाकर यात्रा शुरू होती है। रथों की वापसी की इस यात्रा की रस्म को बहुड़ा यात्रा कहा जाता है।
🚩1 जुलाई से उड़ीसा में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा शुरू होने वाली है। हर साल आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया से ये यात्रा शुरू होती है। रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और बहन सुभद्रा के तीन अलग-अलग रथ होते हैं। इन रथों पर भगवान विराजित होते हैं और यात्रा पर निकलते हैं। आषाढ़ शुक्ल दशमी को ये तीनों रथ फिर से मुख्य मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं।
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उदयपुर घटना क्यों हुई ?
2 July 2022
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🚩उदयपुर की घटना क्यो हुई? समझदार इशारा से ही समझ जाता है।
🚩उदयपुर में हुई घटना पर कुछ लोग कह रहे है कि नूपुर शर्मा को ऐसा बयान नहीं देना चाहिए था। कुछ का कहना है कि जब से बीजेपी देश में सरकार में आयी हैं। तभी से यह दंगे फसाद हो रहे है। कुछ का कहना है कि राजनीति करने वालों के बच्चे तो विदेश में पढ़ते है। सामान्य जनता को दंगों की आग में झोंक देते हैं। दंगों का मूल कारण इनमें से कोई नहीं है। दंगों का मूल कारण इस्लामिक साम्राज्यवाद है। यह रणनीति 1200 वर्षों पहले आरम्भ हुई थी। हमारे पूर्वजों ने तन-मन-धन से उसका विरोध किया। इस पर विद्वान् लेखक डॉ पीटर का शोध पढ़िए:-
🚩2005 में समाजशास्त्री डा. पीटर हैमंड ने गहरे शोध के बाद इस्लाम धर्म के मानने वालों की दुनियाभर में प्रवृत्ति पर एक पुस्तक लिखी, जिसका शीर्षक है ‘स्लेवरी, टैररिज्म एंड इस्लाम-द हिस्टोरिकल रूट्स एंड कंटेम्पररी थ्रैट’। इसके साथ ही ‘द हज’के लेखक लियोन यूरिस ने भी इस विषय पर अपनी पुस्तक में विस्तार से प्रकाश डाला है। जो तथ्य निकल करआए हैं, वे न सिर्फ चौंकाने वाले हैं, बल्कि चिंताजनक हैं।
🚩उपरोक्त शोध ग्रंथों के अनुसार जब तक मुसलमानों की जनसंख्या किसी देश-प्रदेश क्षेत्र में लगभग 2 प्रतिशत के आसपास होती है, तब वे एकदम शांतिप्रिय, कानूनपसंद अल्पसंख्यक बन कर रहते हैं और किसी को विशेष शिकायत का मौका नहीं देते।
🚩जैसे अमरीका में वे (0.6 प्रतिशत) हैं, आस्ट्रेलिया में 1.5, कनाडा में 1.9, चीन में 1.8, इटली में 1.5 और नॉर्वे में मुसलमानों की संख्या 1.8 प्रतिशत है। इसलिए यहां मुसलमानों से किसी को कोई परेशानी नहीं है।
🚩जब मुसलमानों की जनसंख्या 2 से 5 प्रतिशत के बीच तक पहुंच जाती है, तब वे अन्य धर्मावलंबियों में अपना धर्मप्रचार शुरू कर देते हैं। जैसा कि डेनमार्क, जर्मनी, ब्रिटेन, स्पेन और थाईलैंड में जहां क्रमश: 2, 3.7, 2.7, 4 और 4.6 प्रतिशत मुसलमान हैं।
🚩जब मुसलमानों की जनसंख्या किसी देश या क्षेत्र में 5 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है, तब वे अपने अनुपात के हिसाब से अन्य धर्मावलंबियों पर दबाव बढ़ाने लगते हैं और अपना प्रभाव जमाने की कोशिश करने लगते हैं।
🚩उदाहरण के लिए वे सरकारों और शॉपिंग मॉल पर ‘हलाल’ का मांस रखने का दबाव बनाने लगते हैं, वे कहते हैं कि ‘हलाल’ का मांस न खाने से उनकी धार्मिक मान्यताएं प्रभावित होती हैं। इस कदम से कई पश्चिमी देशों में खाद्य वस्तुओं के बाजार में मुसलमानों की तगड़ी पैठ बन गई है। उन्होंने कई देशों के सुपरमार्कीट के मालिकों पर दबाव डालकर उनके यहां ‘हलाल’ का मांस रखने को बाध्य किया ।दुकानदार भी धंधे को देखते हुए उनका कहा मान लेते हैं।
🚩इस तरह अधिक जनसंख्या होने का फैक्टर यहां से मजबूत होना शुरू हो जाता है, जिन देशों में ऐसा हो चुका है, वे फ्रांस, फिलीपींस, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड, त्रिनिदाद और टोबैगो हैं।
🚩 इन देशों में मुसलमानों की संख्या क्रमश: 5 से 8 फीसदी तक है। इस स्थिति पर पहुंचकर मुसलमान उन देशों की सरकारों पर यह दबाव बनाने लगते हैं कि उन्हें उनके क्षेत्रों में शरीयत कानून (इस्लामिक कानून) के मुताबिक चलने दिया जाए। दरअसल, उनका अंतिम लक्ष्य तो यही है कि समूचा विश्व शरीयत कानून के हिसाब से चले।
🚩जब मुस्लिम जनसंख्या किसी देश में 10 प्रतिशत से अधिक हो जाती है, तब वे उस देश, प्रदेश, राज्य, क्षेत्र विशेष में कानून-व्यवस्था के लिए परेशानी पैदा करना शुरू कर देते हैं, शिकायतें करना शुरू कर देते हैं, उनकी ‘आर्थिक परिस्थिति’ का रोना लेकर बैठ जाते हैं, छोटी-छोटी बातों को सहिष्णुता से लेने की बजाय दंगे, तोड़-फोड़ आदि पर उतर आते हैं।
🚩 चाहे वह फ्रांस के दंगे हों डेनमार्क का कार्टून विवाद हो या फिर एम्सटर्डम में कारों का जलाना हो, हरेक विवादको समझबूझ, बातचीत से खत्म करने की बजाय खामख्वाह और गहरा किया जाता है।
🚩ऐसा गुयाना (मुसलमान 10 प्रतिशत), इसराईल (16 प्रतिशत), केन्या (11 प्रतिशत), रूस (15 प्रतिशत) में हो चुका है। जब किसी क्षेत्र में मुसलमानों की संख्या 20 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है तब विभिन्न ‘सैनिक शाखाएं’ जेहाद के नारे लगाने लगती हैं,असहिष्णुता और धार्मिक हत्याओं का दौर शुरू हो जाता है, जैसा इथियोपिया (मुसलमान 32.8 प्रतिशत) और भारत (मुसलमान 22 प्रतिशत) में अक्सर देखा जाता है। मुसलमानों की जनसंख्या के 40 प्रतिशत के स्तर से ऊपर पहुंच जाने पर बड़ी संख्या में सामूहिक हत्याएं, आतंकवादी कार्रवाइयां आदि चलने लगती हैं। जैसा बोस्निया (मुसलमान 40 प्रतिशत), चाड (मुसलमान 54.2 प्रतिशत) और लेबनान (मुसलमान 59 प्रतिशत) में देखा गया है।
2 July 2022
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🚩उदयपुर की घटना क्यो हुई? समझदार इशारा से ही समझ जाता है।
🚩उदयपुर में हुई घटना पर कुछ लोग कह रहे है कि नूपुर शर्मा को ऐसा बयान नहीं देना चाहिए था। कुछ का कहना है कि जब से बीजेपी देश में सरकार में आयी हैं। तभी से यह दंगे फसाद हो रहे है। कुछ का कहना है कि राजनीति करने वालों के बच्चे तो विदेश में पढ़ते है। सामान्य जनता को दंगों की आग में झोंक देते हैं। दंगों का मूल कारण इनमें से कोई नहीं है। दंगों का मूल कारण इस्लामिक साम्राज्यवाद है। यह रणनीति 1200 वर्षों पहले आरम्भ हुई थी। हमारे पूर्वजों ने तन-मन-धन से उसका विरोध किया। इस पर विद्वान् लेखक डॉ पीटर का शोध पढ़िए:-
🚩2005 में समाजशास्त्री डा. पीटर हैमंड ने गहरे शोध के बाद इस्लाम धर्म के मानने वालों की दुनियाभर में प्रवृत्ति पर एक पुस्तक लिखी, जिसका शीर्षक है ‘स्लेवरी, टैररिज्म एंड इस्लाम-द हिस्टोरिकल रूट्स एंड कंटेम्पररी थ्रैट’। इसके साथ ही ‘द हज’के लेखक लियोन यूरिस ने भी इस विषय पर अपनी पुस्तक में विस्तार से प्रकाश डाला है। जो तथ्य निकल करआए हैं, वे न सिर्फ चौंकाने वाले हैं, बल्कि चिंताजनक हैं।
🚩उपरोक्त शोध ग्रंथों के अनुसार जब तक मुसलमानों की जनसंख्या किसी देश-प्रदेश क्षेत्र में लगभग 2 प्रतिशत के आसपास होती है, तब वे एकदम शांतिप्रिय, कानूनपसंद अल्पसंख्यक बन कर रहते हैं और किसी को विशेष शिकायत का मौका नहीं देते।
🚩जैसे अमरीका में वे (0.6 प्रतिशत) हैं, आस्ट्रेलिया में 1.5, कनाडा में 1.9, चीन में 1.8, इटली में 1.5 और नॉर्वे में मुसलमानों की संख्या 1.8 प्रतिशत है। इसलिए यहां मुसलमानों से किसी को कोई परेशानी नहीं है।
🚩जब मुसलमानों की जनसंख्या 2 से 5 प्रतिशत के बीच तक पहुंच जाती है, तब वे अन्य धर्मावलंबियों में अपना धर्मप्रचार शुरू कर देते हैं। जैसा कि डेनमार्क, जर्मनी, ब्रिटेन, स्पेन और थाईलैंड में जहां क्रमश: 2, 3.7, 2.7, 4 और 4.6 प्रतिशत मुसलमान हैं।
🚩जब मुसलमानों की जनसंख्या किसी देश या क्षेत्र में 5 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है, तब वे अपने अनुपात के हिसाब से अन्य धर्मावलंबियों पर दबाव बढ़ाने लगते हैं और अपना प्रभाव जमाने की कोशिश करने लगते हैं।
🚩उदाहरण के लिए वे सरकारों और शॉपिंग मॉल पर ‘हलाल’ का मांस रखने का दबाव बनाने लगते हैं, वे कहते हैं कि ‘हलाल’ का मांस न खाने से उनकी धार्मिक मान्यताएं प्रभावित होती हैं। इस कदम से कई पश्चिमी देशों में खाद्य वस्तुओं के बाजार में मुसलमानों की तगड़ी पैठ बन गई है। उन्होंने कई देशों के सुपरमार्कीट के मालिकों पर दबाव डालकर उनके यहां ‘हलाल’ का मांस रखने को बाध्य किया ।दुकानदार भी धंधे को देखते हुए उनका कहा मान लेते हैं।
🚩इस तरह अधिक जनसंख्या होने का फैक्टर यहां से मजबूत होना शुरू हो जाता है, जिन देशों में ऐसा हो चुका है, वे फ्रांस, फिलीपींस, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड, त्रिनिदाद और टोबैगो हैं।
🚩 इन देशों में मुसलमानों की संख्या क्रमश: 5 से 8 फीसदी तक है। इस स्थिति पर पहुंचकर मुसलमान उन देशों की सरकारों पर यह दबाव बनाने लगते हैं कि उन्हें उनके क्षेत्रों में शरीयत कानून (इस्लामिक कानून) के मुताबिक चलने दिया जाए। दरअसल, उनका अंतिम लक्ष्य तो यही है कि समूचा विश्व शरीयत कानून के हिसाब से चले।
🚩जब मुस्लिम जनसंख्या किसी देश में 10 प्रतिशत से अधिक हो जाती है, तब वे उस देश, प्रदेश, राज्य, क्षेत्र विशेष में कानून-व्यवस्था के लिए परेशानी पैदा करना शुरू कर देते हैं, शिकायतें करना शुरू कर देते हैं, उनकी ‘आर्थिक परिस्थिति’ का रोना लेकर बैठ जाते हैं, छोटी-छोटी बातों को सहिष्णुता से लेने की बजाय दंगे, तोड़-फोड़ आदि पर उतर आते हैं।
🚩 चाहे वह फ्रांस के दंगे हों डेनमार्क का कार्टून विवाद हो या फिर एम्सटर्डम में कारों का जलाना हो, हरेक विवादको समझबूझ, बातचीत से खत्म करने की बजाय खामख्वाह और गहरा किया जाता है।
🚩ऐसा गुयाना (मुसलमान 10 प्रतिशत), इसराईल (16 प्रतिशत), केन्या (11 प्रतिशत), रूस (15 प्रतिशत) में हो चुका है। जब किसी क्षेत्र में मुसलमानों की संख्या 20 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है तब विभिन्न ‘सैनिक शाखाएं’ जेहाद के नारे लगाने लगती हैं,असहिष्णुता और धार्मिक हत्याओं का दौर शुरू हो जाता है, जैसा इथियोपिया (मुसलमान 32.8 प्रतिशत) और भारत (मुसलमान 22 प्रतिशत) में अक्सर देखा जाता है। मुसलमानों की जनसंख्या के 40 प्रतिशत के स्तर से ऊपर पहुंच जाने पर बड़ी संख्या में सामूहिक हत्याएं, आतंकवादी कार्रवाइयां आदि चलने लगती हैं। जैसा बोस्निया (मुसलमान 40 प्रतिशत), चाड (मुसलमान 54.2 प्रतिशत) और लेबनान (मुसलमान 59 प्रतिशत) में देखा गया है।
🚩शोधकर्ता और लेखक डा. पीटर हैमंड बताते हैं कि जब किसी देश में मुसलमानों की जनसंख्या 60 प्रतिशत से ऊपर हो जाती है, तब अन्य धर्मावलंबियों का ‘जातीय सफाया’ शुरू किया जाता है (उदाहरण भारत का कश्मीर), जबरिया मुस्लिम बनाना, अन्य धर्मों के धार्मिक स्थल तोडऩा, जजिया जैसा कोई अन्य कर वसूलना आदि किया जाता है। जैसे अल्बानिया (मुसलमान 70 प्रतिशत), कतर (मुसलमान 78 प्रतिशत) व सूडान (मुसलमान 75 प्रतिशत) में देखा गया है।
🚩किसी देश में जब मुसलमान बाकी आबादी का 80 प्रतिशत हो जाते हैं, तो उस देश में सत्ता या शासन प्रायोजित जातीय सफाई की जाती है। अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों को उनके मूल नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाता है। सभी प्रकार के हथकंडे अपनाकर जनसंख्या को 100 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा जाता है।
🚩जैसे बंगलादेश (मुसलमान 83 प्रतिशत), मिस्र (90 प्रतिशत), गाजापट्टी (98 प्रतिशत), ईरान (98 प्रतिशत), ईराक (97 प्रतिशत), जोर्डन (93 प्रतिशत), मोरक्को (98 प्रतिशत), पाकिस्तान (97 प्रतिशत), सीरिया (90 प्रतिशत) व संयुक्त अरब अमीरात (96 प्रतिशत) में देखा जा रहा है।
🚩आप स्वयं इस शोध का आकलन कीजिये। क्योंकि समझदार को इशारा ही बहुत होता है।
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🚩किसी देश में जब मुसलमान बाकी आबादी का 80 प्रतिशत हो जाते हैं, तो उस देश में सत्ता या शासन प्रायोजित जातीय सफाई की जाती है। अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों को उनके मूल नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाता है। सभी प्रकार के हथकंडे अपनाकर जनसंख्या को 100 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा जाता है।
🚩जैसे बंगलादेश (मुसलमान 83 प्रतिशत), मिस्र (90 प्रतिशत), गाजापट्टी (98 प्रतिशत), ईरान (98 प्रतिशत), ईराक (97 प्रतिशत), जोर्डन (93 प्रतिशत), मोरक्को (98 प्रतिशत), पाकिस्तान (97 प्रतिशत), सीरिया (90 प्रतिशत) व संयुक्त अरब अमीरात (96 प्रतिशत) में देखा जा रहा है।
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क्या भारतीय कानून व्यवस्था में बदलाव तुरन्त और अत्यंत जरूरी है......❓❓
3 July 2022
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🚩झूठे आरोप में कोर्ट के चक्कर में 70 साल के बुजुर्ग ने बीता दी जवानी, 400 तारीखों के बाद बरी।
🚩भारत की न्यायिक व्यवस्था इतनी सड़-गल चुकी है कि एक निर्दोष व्यक्ति को दोषमुक्त साबित करने के लिए कई दशक लग जाते हैं। इस दौरान की आर्थिक, सामाजिक और मानसिक पीड़ा को समझने के लिए भारत की न्याय व्यवस्था के पास कोई उपाय नहीं है।
🚩आज भी हिन्दू संतो और सुप्रसिद्ध हस्तियों पर झूठे केस लगाए जा रहे है,जिस पररोक लगाना अत्यंत जरूरी हैं ।
🚩उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के रहने वाले 70 साल के रामरतन को लगभग तीन दशक तक ऐसी ही पीड़ा से गुजरना पड़ा। न्यायालय ने अपनी कछुआ चाल कारवाही के बाद फैसला सुनाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। इस पर मंथन करने की कभी जरूरत महसूस नहीं की कि आखिर एक सामान्य नागरिक न्याय पाने में तीन दशक क्यों लगे।
🚩बुजुर्ग रामरतन को मुजफ्फरनगर के कोतवाली थाना की पुलिस ने अवैध तमंचा रखने के झूठे आरोप में साल 1996 में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। रामरतन करीब 3 माह तक जेल में रहे और उसके बाद जमानत पर बाहर आने के बाद 26 वर्षों तक कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाते रहे।
🚩पुलिस की झूठी कहानी का प्रमाण तब सामने आया जब, इतने वर्षों में भी उसने बरामद तमंचे को साक्ष्य के रूप में कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत नहीं कर पाई। इतना ही नहीं, विवेचना अधिकारी ने कोर्ट में गवाही तक नहीं दि। इसके बाद जिले की सीजेएम मनोज कुमार जाटव की अदालत ने 24 साल बाद फैसला सुनाते हुए सितंबर 2020 में रामरतन को सबूतों के अभाव में आरोपों से बरी कर दिया।
🚩इसके बाद राज्य सरकार की ओर से जिला शासकीय अधिवक्ता ने जिला जज की अदालत में मुकदमे की सुनवाई फिर से शुरू कर ने की याचिका दी। इसके बाद वहाँ मामले की सुनवाई शुरू की गई। करीब दो साल तक चली सुनवाई में दोनों तरफ से दलीलें सुनने के बाद अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश कोर्ट संख्या-11 के जज शाकिर हसन ने इस अपील को खारिज कर दिया।
🚩इस तरह पुलिस द्वारा लगाए गए झूठे आरोप के कारण 26 सालों में 400 तारीखों के बाद रामरतन 27 जून 2022 को फिर बरी हो गए। इस अवधि में उन्होंने तमाम तरह की परेशानियाँ झेलीं और अपने जीवन के महत्वपूर्ण 26 साल कोर्ट-कचहरी के चक्कर में गँवा दिए।
🚩दिहाड़ी मजदूर रामरतन का कहना है कि पुलिस ने कट्टा और कारतूस की बरामदगी दिखाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इस तरह वे केस के जाल में फँस गए और उनकी आर्थिक स्थिति चरमरा गई। इस कारण उनकी दो बेटियाँ पढ़ नहीं पाईं और ना ही अपनी पितृ धर्म का उचित पालन करते हुए उनकी शादी ढंग के घर में पाए।
🚩रामरतन का कहना है कि उनकी पूरी जवानी मुकदमा लड़ने में बीत गई। उन्होंने कहा कि इस संबंध में राज्य सरकार को पत्र लिखकर फर्जी गिरफ्तारी करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करने की माँग की है। इसके साथ ही उन्होंने सरकार से आर्थिक सहायता की भी माँग की है।
🚩बता दे कि ऐसे कई निर्दोषों को फर्जी केस में फंसाकर सालों से जेल में रखा है। ऐसे तो हजारों केस होंगे जहाँ निर्दोष होते हुए भी आरोपियों को निचली अदालत से सजा हुई और ऊपरी कोर्ट ने निर्दोष बरी किया लेकिन उनको इतने साल प्रताड़ना झेलनी पड़ी, परिवार बिखर गया, उनका परिवार, पैसे, समय व इज्जत गई उसकी भरपाई कौन करेगा❓
🚩आपको बता दें कि आम जनता की तरह हिंदू धर्म के मुख्य साधु-संतों को बदनाम करने के लिए भी झूठे आरोप लगाए जाते हैं जैसे कि सौराष्ट्र (गुजरात) के श्री केशवानन्द स्वामी के ऊपर यौन शोषण का झूठा आरोप थोप कर 12 साल की जेल की सजा करा दी। 7 साल जेल भोगने के बाद ऊपरी कोर्ट से निर्दोष साबित हुए।
🚩ऐसे ही 85 वर्षीय हिंदू संत आशारामजी बापू को झूठे आरोप में पॉक्सो लगाकर जेल भेजा गया है, क्योंकि उन्होंने धर्मांतरण विरोध में कार्य किया, देश समाज और संस्कृति की 55 साल तक सेवा की जो राष्ट्र विरोधी ताकतों को सहन नही हुआ और उनके खिलाफ षडयंत्र करके मीडिया में बदनाम करवाया और जेल भिजवाया और 9 साल में एक दिन भी जमानत नही दी गई।
🚩कानून की आड़ में आम नागरिक से लेकर सुप्रसिद्ध हस्तियों, संत-महापुरुषों को भी ब्लैकमेल कर झूठे आरोप लगाकर जेल में डलवा देते हैं । फर्जी केस करने वालों पर कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए, निर्दोष को मुआवजा मिलना चाहिए और कानूनों में संशोधन होना चाहिए ऐसी जनता की मांग हैं।
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3 July 2022
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🚩झूठे आरोप में कोर्ट के चक्कर में 70 साल के बुजुर्ग ने बीता दी जवानी, 400 तारीखों के बाद बरी।
🚩भारत की न्यायिक व्यवस्था इतनी सड़-गल चुकी है कि एक निर्दोष व्यक्ति को दोषमुक्त साबित करने के लिए कई दशक लग जाते हैं। इस दौरान की आर्थिक, सामाजिक और मानसिक पीड़ा को समझने के लिए भारत की न्याय व्यवस्था के पास कोई उपाय नहीं है।
🚩आज भी हिन्दू संतो और सुप्रसिद्ध हस्तियों पर झूठे केस लगाए जा रहे है,जिस पररोक लगाना अत्यंत जरूरी हैं ।
🚩उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के रहने वाले 70 साल के रामरतन को लगभग तीन दशक तक ऐसी ही पीड़ा से गुजरना पड़ा। न्यायालय ने अपनी कछुआ चाल कारवाही के बाद फैसला सुनाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। इस पर मंथन करने की कभी जरूरत महसूस नहीं की कि आखिर एक सामान्य नागरिक न्याय पाने में तीन दशक क्यों लगे।
🚩बुजुर्ग रामरतन को मुजफ्फरनगर के कोतवाली थाना की पुलिस ने अवैध तमंचा रखने के झूठे आरोप में साल 1996 में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। रामरतन करीब 3 माह तक जेल में रहे और उसके बाद जमानत पर बाहर आने के बाद 26 वर्षों तक कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाते रहे।
🚩पुलिस की झूठी कहानी का प्रमाण तब सामने आया जब, इतने वर्षों में भी उसने बरामद तमंचे को साक्ष्य के रूप में कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत नहीं कर पाई। इतना ही नहीं, विवेचना अधिकारी ने कोर्ट में गवाही तक नहीं दि। इसके बाद जिले की सीजेएम मनोज कुमार जाटव की अदालत ने 24 साल बाद फैसला सुनाते हुए सितंबर 2020 में रामरतन को सबूतों के अभाव में आरोपों से बरी कर दिया।
🚩इसके बाद राज्य सरकार की ओर से जिला शासकीय अधिवक्ता ने जिला जज की अदालत में मुकदमे की सुनवाई फिर से शुरू कर ने की याचिका दी। इसके बाद वहाँ मामले की सुनवाई शुरू की गई। करीब दो साल तक चली सुनवाई में दोनों तरफ से दलीलें सुनने के बाद अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश कोर्ट संख्या-11 के जज शाकिर हसन ने इस अपील को खारिज कर दिया।
🚩इस तरह पुलिस द्वारा लगाए गए झूठे आरोप के कारण 26 सालों में 400 तारीखों के बाद रामरतन 27 जून 2022 को फिर बरी हो गए। इस अवधि में उन्होंने तमाम तरह की परेशानियाँ झेलीं और अपने जीवन के महत्वपूर्ण 26 साल कोर्ट-कचहरी के चक्कर में गँवा दिए।
🚩दिहाड़ी मजदूर रामरतन का कहना है कि पुलिस ने कट्टा और कारतूस की बरामदगी दिखाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। इस तरह वे केस के जाल में फँस गए और उनकी आर्थिक स्थिति चरमरा गई। इस कारण उनकी दो बेटियाँ पढ़ नहीं पाईं और ना ही अपनी पितृ धर्म का उचित पालन करते हुए उनकी शादी ढंग के घर में पाए।
🚩रामरतन का कहना है कि उनकी पूरी जवानी मुकदमा लड़ने में बीत गई। उन्होंने कहा कि इस संबंध में राज्य सरकार को पत्र लिखकर फर्जी गिरफ्तारी करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करने की माँग की है। इसके साथ ही उन्होंने सरकार से आर्थिक सहायता की भी माँग की है।
🚩बता दे कि ऐसे कई निर्दोषों को फर्जी केस में फंसाकर सालों से जेल में रखा है। ऐसे तो हजारों केस होंगे जहाँ निर्दोष होते हुए भी आरोपियों को निचली अदालत से सजा हुई और ऊपरी कोर्ट ने निर्दोष बरी किया लेकिन उनको इतने साल प्रताड़ना झेलनी पड़ी, परिवार बिखर गया, उनका परिवार, पैसे, समय व इज्जत गई उसकी भरपाई कौन करेगा❓
🚩आपको बता दें कि आम जनता की तरह हिंदू धर्म के मुख्य साधु-संतों को बदनाम करने के लिए भी झूठे आरोप लगाए जाते हैं जैसे कि सौराष्ट्र (गुजरात) के श्री केशवानन्द स्वामी के ऊपर यौन शोषण का झूठा आरोप थोप कर 12 साल की जेल की सजा करा दी। 7 साल जेल भोगने के बाद ऊपरी कोर्ट से निर्दोष साबित हुए।
🚩ऐसे ही 85 वर्षीय हिंदू संत आशारामजी बापू को झूठे आरोप में पॉक्सो लगाकर जेल भेजा गया है, क्योंकि उन्होंने धर्मांतरण विरोध में कार्य किया, देश समाज और संस्कृति की 55 साल तक सेवा की जो राष्ट्र विरोधी ताकतों को सहन नही हुआ और उनके खिलाफ षडयंत्र करके मीडिया में बदनाम करवाया और जेल भिजवाया और 9 साल में एक दिन भी जमानत नही दी गई।
🚩कानून की आड़ में आम नागरिक से लेकर सुप्रसिद्ध हस्तियों, संत-महापुरुषों को भी ब्लैकमेल कर झूठे आरोप लगाकर जेल में डलवा देते हैं । फर्जी केस करने वालों पर कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए, निर्दोष को मुआवजा मिलना चाहिए और कानूनों में संशोधन होना चाहिए ऐसी जनता की मांग हैं।
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जानिए जापान में आजाद हिंद सेना बनाकर भारत से अंग्रेजों को कैसे खदेड़ा ?
4 July 2022
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🚩भारत की स्वतंत्रता संग्राम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले आजाद हिंद सेना का 5 जुलाई 1943 को गठन हुआ था । आजाद हिंद सेना के संस्थापक नेताजी सुभाषचंद्र बोस थे ।
🚩 अंग्रेजों को परास्त करने के लिए भारत की स्वतंत्रता संग्राम की अंतिम लडाई का नेतृत्व नियती ने नेताजी के हाथों सौंपा था । नेताजी ने यह पवित्र कार्य असीम साहस एवं तन, मन, धन तथा प्राण का त्याग करने में तत्पर रहने वाले हिंदी सैनिकों की ‘आजाद हिंद सेना’ संगठन द्वारा पूर्ण किया ।
🚩ब्रिटिश सेना के हिंदी सैनिकों का नेताजी ने बनाया संगठन
🚩अंग्रेजों की स्थान बद्धता से भाग जाने पर नेताजी ने फरवरी 1943 तक जर्मनी में ही वास्तव्य किया । वे जर्मन सर्वसत्ताधीश हिटलर से अनेक बार मिले और उसे हिंदुस्थान की स्वतंत्रता के लिए सहायता का आवाहन भी किया ।
🚩 दूसरे महायुद्ध में विजय की ओर मार्गक्रमण करने वाले हिटलर ने नेताजी को सर्व सहकार्य देना स्वीकार किया । उस अनुसार उन्होंने जर्मनी की शरण में आए अंग्रेजों की सेना के हिंदी सैनिकों का प्रबोधन करके उनका संगठन बनाया । नेताजी के वहां के भाषणों से हिंदी सैनिक देशप्रेम में भाव विभोर होकर स्वतंत्रता के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हो जाते थे ।
🚩आजाद हिंदी सेना की स्थापना और ‘चलो दिल्ली’का नारा
🚩पूर्व एशियाई देशों में जर्मनी का मित्रराष्ट्र जापान की सेना ब्रिटिश सेना को धूल चटा रही थी । उनके पास भी शरण आए हुए, ब्रिटिश सैना के हिंदी सैनिक थे । नेताजी के मार्गदर्शनानुसार वहां पहले से ही रहने वाले रास बिहारी बोसने हिंदी सेना का संगठन किया ।
🚩 इस हिंदी सेना से मिलने नेताजी 90 दिन पनडुब्बी से यात्रा करते समय मृत्यु से जूझते जुलाई वर्ष 1943 में जापान की राजधानी टोकियो पहुंचे। रास बिहारी बोस जी ने इस सेना का नेतृत्व नेताजी के हाथों सौंप दिया । 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर में नेताजी ने ‘आजाद हिंद सेना’की स्थापना की ।
🚩 उस समय सहस्रों सैनिकों के सामने ऐतिहासिक भाषण करते हुए वे बोले, ‘‘सैनिक मित्रों ! आपकी युद्ध घोषणा एक ही रहे ! चलो दिल्ली ! आपमें से कितने लोग इस स्वतंत्रता युद्ध में जीवित रहेंगे, यह तो मैं नहीं जानता,परन्तु मैं इतना अवश्य जानता हूं कि अंतिम विजय अपनी ही है। इसलिए उठो और अपने अपने शस्त्रास्त्र लेकर सुसज्ज हो जाओ । हमारे भारत में आपसे पहले ही क्रांतिकारियो ने हमारे लिए मार्ग बना रखा है और वही मार्ग हमें दिल्ली तक ले जाएगा । ….चलो दिल्ली ।”
🚩भारत के अस्थायी शासन की प्रमुख सेना सहस्रों सशस्त्र हिंदी सैनिकों की सेना सिद्ध होने पर और पूर्व एशियाई देशों की लाखों हिंदी जनता का भारतीय स्वतंत्रता को समर्थन मिलने पर नेताजी ने 21 अक्टूबर 1943 को स्वतंत्र हिंदुस्थान का दूसरा अस्थायी शासन स्थापित किया । इस अस्थायी शासन को जापान, जर्मनी, चीन, इटली, ब्रह्मदेश आदि देशों ने उनकी मान्यता घोषित की ।
🚩इस अस्थायी शासन का आजाद हिंद सेना, यह प्रमुख सेना बन गई ! आजाद हिंद सेना में सर्व जाति-जनजाति, अलग-अलग प्रांत, भाषाओं के सैनिक थे । सेना में एकात्मता की भावना थी । ‘कदम कदम बढाए जा’, इस गीत से समरस होकर नेताजी ने तथा उनकी सेना ने आजाद हिंदुस्थान का स्वप्न साकार करने के लिए विजय यात्रा आरंभ की ।
🚩‘रानी ऑफ झांसी रेजिमेंट’की स्थापना नेताजी ने झांसी की रानी रेजिमेंट के पदचिन्हों पर महिलाओं के लिए ‘रानी ऑफ झांसी रेजिमेंट’की स्थापना की । पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर महिलाओं को भी सैनिक प्रशिक्षण लेना चाहिए, इस भूमिका पर वे दृढ रहे । नेताजी कहते, हिंदुस्थान में 1857 के स्वतंत्रता युद्ध में लडनेवाली झांसी की रानी का आदर्श सामने रखकर महिलाओं को भी स्वतंत्रता संग्राम में अपना सक्रिय योगदान देना चाहिए ।
🚩आजाद हिंद सेना द्वारा धक्का
🚩आजाद हिंद सेना का ब्रिटिश सत्ता के विरोध में सैनिकी आक्रमण आरंभ होते ही जापान का सत्ताधीश जनरल टोजो ने इंग्लैंड से जीते हुए अंदमान एवं निकोबार ये दो द्वीप आजाद हिंद सेना के हाथों सौंप दिए । 29 दिसंबर 1943 को स्वतंत्र हिंदुस्थान के प्रमुख होने के नाते नेताजी अंदमान गए और अपना स्वतंत्र ध्वज वहां लहराकर सेल्युलर कारागृह में दंड भोग चुके क्रांतिकारियो कों आदरांजली समर्पित की । जनवरी 1944 में नेताजी ने अपनी सशस्त्र सेना ब्रह्मदेश में स्थलांतरित की ।
🚩19 मार्च 1944 के ऐतिहासिक दिन आजाद हिंद सेना ने भारत की भूमि पर कदम रखा । इंफाल, कोहिमा आदि स्थानों पर इस सेना ने ब्रिटिश सेना पर विजय प्राप्त की । इस विजयनिमित्त 22 सितंबर 1944 को किए हुए भाषण में नेताजी ने गर्जना की कि, ‘‘अपनी मातृभूमि स्वतंत्रता की मांग कर रही है ! इसलिए मैं आज आपसे आपका रक्त मांग रहा हूं । केवल रक्त से ही हमें स्वतंत्रता मिलेगी । तुम मुझे अपना
4 July 2022
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🚩भारत की स्वतंत्रता संग्राम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले आजाद हिंद सेना का 5 जुलाई 1943 को गठन हुआ था । आजाद हिंद सेना के संस्थापक नेताजी सुभाषचंद्र बोस थे ।
🚩 अंग्रेजों को परास्त करने के लिए भारत की स्वतंत्रता संग्राम की अंतिम लडाई का नेतृत्व नियती ने नेताजी के हाथों सौंपा था । नेताजी ने यह पवित्र कार्य असीम साहस एवं तन, मन, धन तथा प्राण का त्याग करने में तत्पर रहने वाले हिंदी सैनिकों की ‘आजाद हिंद सेना’ संगठन द्वारा पूर्ण किया ।
🚩ब्रिटिश सेना के हिंदी सैनिकों का नेताजी ने बनाया संगठन
🚩अंग्रेजों की स्थान बद्धता से भाग जाने पर नेताजी ने फरवरी 1943 तक जर्मनी में ही वास्तव्य किया । वे जर्मन सर्वसत्ताधीश हिटलर से अनेक बार मिले और उसे हिंदुस्थान की स्वतंत्रता के लिए सहायता का आवाहन भी किया ।
🚩 दूसरे महायुद्ध में विजय की ओर मार्गक्रमण करने वाले हिटलर ने नेताजी को सर्व सहकार्य देना स्वीकार किया । उस अनुसार उन्होंने जर्मनी की शरण में आए अंग्रेजों की सेना के हिंदी सैनिकों का प्रबोधन करके उनका संगठन बनाया । नेताजी के वहां के भाषणों से हिंदी सैनिक देशप्रेम में भाव विभोर होकर स्वतंत्रता के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हो जाते थे ।
🚩आजाद हिंदी सेना की स्थापना और ‘चलो दिल्ली’का नारा
🚩पूर्व एशियाई देशों में जर्मनी का मित्रराष्ट्र जापान की सेना ब्रिटिश सेना को धूल चटा रही थी । उनके पास भी शरण आए हुए, ब्रिटिश सैना के हिंदी सैनिक थे । नेताजी के मार्गदर्शनानुसार वहां पहले से ही रहने वाले रास बिहारी बोसने हिंदी सेना का संगठन किया ।
🚩 इस हिंदी सेना से मिलने नेताजी 90 दिन पनडुब्बी से यात्रा करते समय मृत्यु से जूझते जुलाई वर्ष 1943 में जापान की राजधानी टोकियो पहुंचे। रास बिहारी बोस जी ने इस सेना का नेतृत्व नेताजी के हाथों सौंप दिया । 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर में नेताजी ने ‘आजाद हिंद सेना’की स्थापना की ।
🚩 उस समय सहस्रों सैनिकों के सामने ऐतिहासिक भाषण करते हुए वे बोले, ‘‘सैनिक मित्रों ! आपकी युद्ध घोषणा एक ही रहे ! चलो दिल्ली ! आपमें से कितने लोग इस स्वतंत्रता युद्ध में जीवित रहेंगे, यह तो मैं नहीं जानता,परन्तु मैं इतना अवश्य जानता हूं कि अंतिम विजय अपनी ही है। इसलिए उठो और अपने अपने शस्त्रास्त्र लेकर सुसज्ज हो जाओ । हमारे भारत में आपसे पहले ही क्रांतिकारियो ने हमारे लिए मार्ग बना रखा है और वही मार्ग हमें दिल्ली तक ले जाएगा । ….चलो दिल्ली ।”
🚩भारत के अस्थायी शासन की प्रमुख सेना सहस्रों सशस्त्र हिंदी सैनिकों की सेना सिद्ध होने पर और पूर्व एशियाई देशों की लाखों हिंदी जनता का भारतीय स्वतंत्रता को समर्थन मिलने पर नेताजी ने 21 अक्टूबर 1943 को स्वतंत्र हिंदुस्थान का दूसरा अस्थायी शासन स्थापित किया । इस अस्थायी शासन को जापान, जर्मनी, चीन, इटली, ब्रह्मदेश आदि देशों ने उनकी मान्यता घोषित की ।
🚩इस अस्थायी शासन का आजाद हिंद सेना, यह प्रमुख सेना बन गई ! आजाद हिंद सेना में सर्व जाति-जनजाति, अलग-अलग प्रांत, भाषाओं के सैनिक थे । सेना में एकात्मता की भावना थी । ‘कदम कदम बढाए जा’, इस गीत से समरस होकर नेताजी ने तथा उनकी सेना ने आजाद हिंदुस्थान का स्वप्न साकार करने के लिए विजय यात्रा आरंभ की ।
🚩‘रानी ऑफ झांसी रेजिमेंट’की स्थापना नेताजी ने झांसी की रानी रेजिमेंट के पदचिन्हों पर महिलाओं के लिए ‘रानी ऑफ झांसी रेजिमेंट’की स्थापना की । पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर महिलाओं को भी सैनिक प्रशिक्षण लेना चाहिए, इस भूमिका पर वे दृढ रहे । नेताजी कहते, हिंदुस्थान में 1857 के स्वतंत्रता युद्ध में लडनेवाली झांसी की रानी का आदर्श सामने रखकर महिलाओं को भी स्वतंत्रता संग्राम में अपना सक्रिय योगदान देना चाहिए ।
🚩आजाद हिंद सेना द्वारा धक्का
🚩आजाद हिंद सेना का ब्रिटिश सत्ता के विरोध में सैनिकी आक्रमण आरंभ होते ही जापान का सत्ताधीश जनरल टोजो ने इंग्लैंड से जीते हुए अंदमान एवं निकोबार ये दो द्वीप आजाद हिंद सेना के हाथों सौंप दिए । 29 दिसंबर 1943 को स्वतंत्र हिंदुस्थान के प्रमुख होने के नाते नेताजी अंदमान गए और अपना स्वतंत्र ध्वज वहां लहराकर सेल्युलर कारागृह में दंड भोग चुके क्रांतिकारियो कों आदरांजली समर्पित की । जनवरी 1944 में नेताजी ने अपनी सशस्त्र सेना ब्रह्मदेश में स्थलांतरित की ।
🚩19 मार्च 1944 के ऐतिहासिक दिन आजाद हिंद सेना ने भारत की भूमि पर कदम रखा । इंफाल, कोहिमा आदि स्थानों पर इस सेना ने ब्रिटिश सेना पर विजय प्राप्त की । इस विजयनिमित्त 22 सितंबर 1944 को किए हुए भाषण में नेताजी ने गर्जना की कि, ‘‘अपनी मातृभूमि स्वतंत्रता की मांग कर रही है ! इसलिए मैं आज आपसे आपका रक्त मांग रहा हूं । केवल रक्त से ही हमें स्वतंत्रता मिलेगी । तुम मुझे अपना
रक्त दो । मैं तुमको स्वतंत्रता दूंगा !” (‘‘दिल्ली के लाल किले पर तिरंगा लहराने के लिए तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूंगा”) यह भाषण इतिहास में अजर अमर हुआ । उनके इन हृदय झकझोर देनेवाले उद्गारों से उपस्थित हिंदी युवाओं का मन रोमांचित हुआ और उन्होंने अपने रक्त से प्रतिज्ञा लिखी ।
🚩‘चलो दिल्ली’का स्वप्न अधूरा; परंतु ब्रिटिशों को झटका
🚩मार्च 1945 से दोस्त राष्ट्रों के सामने जापान की पराजय होने लगी । 7 मई 1945 को जर्मनी ने बिना किसी शर्त के शरणागति स्वीकार ली, जापान ने 15 अगस्त को शरणागति की अधिकृत घोषणा की । जापान-जर्मनी के इस अनपेक्षित पराजय से नेताजी की सर्व आकांक्षाएं धूमिल हो गइं । ऐसे में अगले रणक्षेत्र की ओर अर्थात् सयाम जाते समय 18 अगस्त 1945 को फार्मोसा द्वीप पर उनका बॉम्बर विमान गिरकर उनका हदयद्रावक अंत हुआ ।
🚩 आजाद हिंद सेना दिल्ली तक नहीं पहुंच पाई; परंतु उस सेना ने जो प्रचंड आवाहन् बलाढ्य ब्रिटिश साम्राज्य के सामने खडा किया, इतिहास में वैसा अन्य उदाहरण नहीं । इससे ब्रिटिश सत्ता को भयंकर झटका लगा । हिंदी सैनिकों के विद्रोह से आगे चलकर भारत की सत्ता अपने अधिकार में रखना बहुत ही कठिन होगा, इसकी आशंका अंग्रेजों को आई । चतुर और धूर्त अंग्रेज शासन ने भावी संकट ताड लिया । उन्होंने निर्णय लिया कि पराजित होकर जाने से अच्छा है हम स्वयं ही देश छोडकर चले जाएं । तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने अपनी स्वीकृति दे दी ।
🚩ब्रिटिश भयभीत हो गए और नेहरू भी झुके
🚩स्वतंत्रता के लिए सर्वस्व अर्पण करने वाली नेताजी की आजाद हिंद सेना को संपूर्ण भारत वासियों का उत्स्फूर्त समर्थन प्राप्त था । नेताजी ने ब्रिटिश-भारत पर सशस्त्र आक्रमण करने की घोषणा की, तब पंडित नेहरू ने उनका विरोध किया; परंतु नेताजी की एकाएक मृत्यु के उपरांत आजाद हिंद सेना के सेनाधिकारियों पर अभियोग चलते ही, संपूर्ण देश से सेना की ओर से लोकमत प्रकट हुआ ।
🚩 सेना की यह लोकप्रियता देखकर अंत में नेहरू को झुकना पडा, इतना ही नहीं उन्होंने स्वयं सेना के अधिकारियों का अधिवक्तापत्र (वकीलपत्र) लिया । अंततः आरोप लगाए गए सेना के 3 सेनाधिकारी सैनिक न्यायालय के सामने दोषी ठहराए गए; परंतु उनका दंड क्षमा कर दिया; क्योंकि अंग्रेज सत्ताधीशों की ध्यान में आया कि, नेताजी के सहयोगियों को दंड दिया, तो 90 वर्षों में लोक क्षोभ उफन कर आएगा । आजाद हिंद सेना के सैनिकों की निस्वार्थ देश सेवा से ही स्वतंत्रता की आकांक्षा कोट्यवधी देशवासियों के मन में निर्माण हुई ।
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🚩‘चलो दिल्ली’का स्वप्न अधूरा; परंतु ब्रिटिशों को झटका
🚩मार्च 1945 से दोस्त राष्ट्रों के सामने जापान की पराजय होने लगी । 7 मई 1945 को जर्मनी ने बिना किसी शर्त के शरणागति स्वीकार ली, जापान ने 15 अगस्त को शरणागति की अधिकृत घोषणा की । जापान-जर्मनी के इस अनपेक्षित पराजय से नेताजी की सर्व आकांक्षाएं धूमिल हो गइं । ऐसे में अगले रणक्षेत्र की ओर अर्थात् सयाम जाते समय 18 अगस्त 1945 को फार्मोसा द्वीप पर उनका बॉम्बर विमान गिरकर उनका हदयद्रावक अंत हुआ ।
🚩 आजाद हिंद सेना दिल्ली तक नहीं पहुंच पाई; परंतु उस सेना ने जो प्रचंड आवाहन् बलाढ्य ब्रिटिश साम्राज्य के सामने खडा किया, इतिहास में वैसा अन्य उदाहरण नहीं । इससे ब्रिटिश सत्ता को भयंकर झटका लगा । हिंदी सैनिकों के विद्रोह से आगे चलकर भारत की सत्ता अपने अधिकार में रखना बहुत ही कठिन होगा, इसकी आशंका अंग्रेजों को आई । चतुर और धूर्त अंग्रेज शासन ने भावी संकट ताड लिया । उन्होंने निर्णय लिया कि पराजित होकर जाने से अच्छा है हम स्वयं ही देश छोडकर चले जाएं । तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने अपनी स्वीकृति दे दी ।
🚩ब्रिटिश भयभीत हो गए और नेहरू भी झुके
🚩स्वतंत्रता के लिए सर्वस्व अर्पण करने वाली नेताजी की आजाद हिंद सेना को संपूर्ण भारत वासियों का उत्स्फूर्त समर्थन प्राप्त था । नेताजी ने ब्रिटिश-भारत पर सशस्त्र आक्रमण करने की घोषणा की, तब पंडित नेहरू ने उनका विरोध किया; परंतु नेताजी की एकाएक मृत्यु के उपरांत आजाद हिंद सेना के सेनाधिकारियों पर अभियोग चलते ही, संपूर्ण देश से सेना की ओर से लोकमत प्रकट हुआ ।
🚩 सेना की यह लोकप्रियता देखकर अंत में नेहरू को झुकना पडा, इतना ही नहीं उन्होंने स्वयं सेना के अधिकारियों का अधिवक्तापत्र (वकीलपत्र) लिया । अंततः आरोप लगाए गए सेना के 3 सेनाधिकारी सैनिक न्यायालय के सामने दोषी ठहराए गए; परंतु उनका दंड क्षमा कर दिया; क्योंकि अंग्रेज सत्ताधीशों की ध्यान में आया कि, नेताजी के सहयोगियों को दंड दिया, तो 90 वर्षों में लोक क्षोभ उफन कर आएगा । आजाद हिंद सेना के सैनिकों की निस्वार्थ देश सेवा से ही स्वतंत्रता की आकांक्षा कोट्यवधी देशवासियों के मन में निर्माण हुई ।
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हिन्दू राष्ट्र क्यों आवश्यक है ? जानिए:-
5 July 2022
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🚩विश्व में ईसाइयों के 157, मुसलमानों के 52, बौद्धों के 12 जबकि यहूदियों का 1 राष्ट्र है,पर हिन्दुओ का 1 राष्ट्र भी नही है।
🚩छत्रपति शिवाजी महाराज के समय हिन्दू राष्ट्र था,उस समय सारी समस्याएं दूर थी।
🚩सभी के कल्याण हेतु भारत को हिन्दू राष्ट्र स्थापित किया जाना चाहिए।
🚩विश्व में ईसाइयों के 157, मुसलमानों के 52, बौद्धों के 12 जबकि यहूदियों का 1 राष्ट्र है । हिन्दूओं का राष्ट्र इस सौरमंडल में कहा है ? हाँ, हिन्दूओं का एक सनातन राष्ट्र 1947 तक इस पृथ्वी पर था । आज इस राष्ट्र की स्थिति क्या है ?
🚩स्वतंत्रता के समय का एवं आज का भारत !
🚩1947 में जहाँ 1 पैसे का भी ऋण नहीं था, उस भारत में आज प्रत्येक नागरिक अपने सिर पर 32,812 रुपयों के ऋण का भार ढो रहा है ।
🚩 1947 में 33 प्रतिशत से अधिक निर्यात करनेवाला भारत आज 1 प्रतिशत से भी अल्प निर्यात कर रहा है ।
🚩 जहाँ अधिक से अधिक 10 से 20 विदेशी प्रतिष्ठान थे, उस भारत में आज 5,000 से भी अधिक विदेशी प्रतिष्ठानों को सिर पर उठाया जा रहा है ।
🚩जहाँ एक भी संवेदनशील जनपद (जिला) नहीं था, उस भारत में आज 300 से भी अधिक जनपद संवेदनशील बन गए हैं ।
🚩जहाँ प्रति नागरिक के पास एक-दो गाय होती थीं, उस भारत में अबाध गोहत्या के कारण आज 12 व्यक्तियों पर एक गाय है ।
🚩विदेश में जाकर अत्याचारी कर्जन वाइली, ओडवायर जैसे शासकों को ईसावासी करने वाला भारत आज संसद पर आक्रमण करनेवाले अफजल को फांसी देने में कई साल लगा रहा है !
🚩देशाभिमान जागृत रखने वाले भारत से, देशाभिमान गिरवी रखने वाला भारत, निम्नतम भ्रष्टाचार करने वाले भारत से भ्रष्टाचार की उच्चतम सीमा तक पहुंचा भारत, सीमा पार झंडा फहराने वाले भारत से आज नहीं तो कल, कश्मीर से हाथ धो बैठने की प्रतीक्षा करनेवाला भारत… यह सूची लिखते समय भी मन आक्रोशित हो रहा है; परंतु ‘गण की तो दूर, मन की भी लज्जा न रखनेवाले’ शासनकर्ता सर्वत्र गर्व से सीना तानकर घूम रहे हैं ।
🚩 मुसलमान आक्रमणकारियों एवं धूर्त ब्रिटिशों ने भी भारतीय जनता को जितना त्रस्त नहीं किया, उससे सैकडों गुना लोकतंत्र द्वारा उपहार स्वरूप मिले इन शासनकर्ताओं ने मात्र 6 दशकों ( 60 सालों ) में कर दिया है !
🚩‘लोगों द्वारा, लोगों के लिए, लोगों का शासन’, लोकतंत्र की ऐसी व्याख्या, भारत जैसे विश्व के सब से बडे देश के लिए ‘स्वार्थांधों द्वारा स्वार्थ के लिए चयनित (निर्वाचित) स्वार्थी शासनकर्ताओं का शासन’, ऐसी हो चुकी है ।
🚩इस लेखमालिका में भारत की अनेक समस्याएं वर्णित हैं । ये समस्याएं पढकर कुछ लोगों के मन में संदेह उत्पन्न होगा कि ‘हिन्दू राष्ट्र’ में ये समस्याएं दूर कैसे होंगी ? क्या इतिहास में ऐसा कभी हुआ है ? ऐसा समझने वाले लोग यह समझ लें कि – हां, इतिहास में ऐसा हुआ है ! छत्रपति शिवाजी महाराज का ‘हिन्दू राष्ट्र (हिन्दवी स्वराज्य)’ स्थापित होते ही ऐसी तत्कालीन समस्याएं दूर हुई हैं !
🚩छत्रपति शिवाजी महाराज का ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित होते ही सबकुछ कुशल-मंगल हुआ था !
🚩छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म होने के पूर्व भी आज के समान ही हिन्दू स्त्रियों का शील सुरक्षित नहीं था, प्रत्यक्ष जीजामाता की जिठानी को ही पानी लाते समय यवन सरदार ने अगवा कर लिया था । उस समय भी मंदिर भ्रष्ट किए जाते थे एवं गोमाता की गर्दन पर कब कसाई का छुरा चल जाएगा, यह कोई बता नहीं सकता था । छत्रपति शिवाजी महाराज का ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित होते ही मंदिर ढहाना बंद हुआ, इतना ही नहीं; अपितु मंदिर ढहाकर बनाई मस्जिदों का रूपांतरण पूर्ववत मंदिरों में हुआ ।
🚩 मौन रहकर क्रंदन करने वाली गोमाताएं आनंदित होकर रंभाने लगीं । ‘गोहत्या बंद की जाए !’, ऐसी मांग के लिए कभी शासन के पास लाखों हस्ताक्षर नहीं भेजे गए अथवा छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी कोई ‘गोहत्या प्रतिबंधक विधेयक’ मंत्रीमंडल में प्रस्तुत नहीं किया,हिन्दू राष्ट्र घोषित होते ही गौहत्या रुक गई थी और राष्ट्र में गौमाता की पूजा होने लग गई ।
🚩आज हमें महंगाई दिखती है । क्या कभी पढा है कि छत्रपति शिवाजी ‘महाराज के शासनकाल में प्रजा महंगाई से त्रस्त थी’ ?
🚩‘जय जवान, जय किसान’ की घोषणा करने वाले शासनकर्ता आज जवान एवं किसान, दोनों की नृशंस हत्या करवा रहे हैं । छत्रपति शिवाजी महाराज को तो केवल कृषकों के (किसानों के) प्राण ही नहीं, अपितु उनके द्वारा उपजाई फसल भी अमूल्य लगती थी । उन्होंने ऐसी आज्ञा ही दी थी कि ‘कृषकों द्वारा उपजाई फसल के डंठल को भी कोई हाथ न लगाए ।’ छत्रपति शिवाजी महाराज ने ‘किसानों’ की ही भांति ‘जवानों को’भी संभाला था ।
5 July 2022
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🚩विश्व में ईसाइयों के 157, मुसलमानों के 52, बौद्धों के 12 जबकि यहूदियों का 1 राष्ट्र है,पर हिन्दुओ का 1 राष्ट्र भी नही है।
🚩छत्रपति शिवाजी महाराज के समय हिन्दू राष्ट्र था,उस समय सारी समस्याएं दूर थी।
🚩सभी के कल्याण हेतु भारत को हिन्दू राष्ट्र स्थापित किया जाना चाहिए।
🚩विश्व में ईसाइयों के 157, मुसलमानों के 52, बौद्धों के 12 जबकि यहूदियों का 1 राष्ट्र है । हिन्दूओं का राष्ट्र इस सौरमंडल में कहा है ? हाँ, हिन्दूओं का एक सनातन राष्ट्र 1947 तक इस पृथ्वी पर था । आज इस राष्ट्र की स्थिति क्या है ?
🚩स्वतंत्रता के समय का एवं आज का भारत !
🚩1947 में जहाँ 1 पैसे का भी ऋण नहीं था, उस भारत में आज प्रत्येक नागरिक अपने सिर पर 32,812 रुपयों के ऋण का भार ढो रहा है ।
🚩 1947 में 33 प्रतिशत से अधिक निर्यात करनेवाला भारत आज 1 प्रतिशत से भी अल्प निर्यात कर रहा है ।
🚩 जहाँ अधिक से अधिक 10 से 20 विदेशी प्रतिष्ठान थे, उस भारत में आज 5,000 से भी अधिक विदेशी प्रतिष्ठानों को सिर पर उठाया जा रहा है ।
🚩जहाँ एक भी संवेदनशील जनपद (जिला) नहीं था, उस भारत में आज 300 से भी अधिक जनपद संवेदनशील बन गए हैं ।
🚩जहाँ प्रति नागरिक के पास एक-दो गाय होती थीं, उस भारत में अबाध गोहत्या के कारण आज 12 व्यक्तियों पर एक गाय है ।
🚩विदेश में जाकर अत्याचारी कर्जन वाइली, ओडवायर जैसे शासकों को ईसावासी करने वाला भारत आज संसद पर आक्रमण करनेवाले अफजल को फांसी देने में कई साल लगा रहा है !
🚩देशाभिमान जागृत रखने वाले भारत से, देशाभिमान गिरवी रखने वाला भारत, निम्नतम भ्रष्टाचार करने वाले भारत से भ्रष्टाचार की उच्चतम सीमा तक पहुंचा भारत, सीमा पार झंडा फहराने वाले भारत से आज नहीं तो कल, कश्मीर से हाथ धो बैठने की प्रतीक्षा करनेवाला भारत… यह सूची लिखते समय भी मन आक्रोशित हो रहा है; परंतु ‘गण की तो दूर, मन की भी लज्जा न रखनेवाले’ शासनकर्ता सर्वत्र गर्व से सीना तानकर घूम रहे हैं ।
🚩 मुसलमान आक्रमणकारियों एवं धूर्त ब्रिटिशों ने भी भारतीय जनता को जितना त्रस्त नहीं किया, उससे सैकडों गुना लोकतंत्र द्वारा उपहार स्वरूप मिले इन शासनकर्ताओं ने मात्र 6 दशकों ( 60 सालों ) में कर दिया है !
🚩‘लोगों द्वारा, लोगों के लिए, लोगों का शासन’, लोकतंत्र की ऐसी व्याख्या, भारत जैसे विश्व के सब से बडे देश के लिए ‘स्वार्थांधों द्वारा स्वार्थ के लिए चयनित (निर्वाचित) स्वार्थी शासनकर्ताओं का शासन’, ऐसी हो चुकी है ।
🚩इस लेखमालिका में भारत की अनेक समस्याएं वर्णित हैं । ये समस्याएं पढकर कुछ लोगों के मन में संदेह उत्पन्न होगा कि ‘हिन्दू राष्ट्र’ में ये समस्याएं दूर कैसे होंगी ? क्या इतिहास में ऐसा कभी हुआ है ? ऐसा समझने वाले लोग यह समझ लें कि – हां, इतिहास में ऐसा हुआ है ! छत्रपति शिवाजी महाराज का ‘हिन्दू राष्ट्र (हिन्दवी स्वराज्य)’ स्थापित होते ही ऐसी तत्कालीन समस्याएं दूर हुई हैं !
🚩छत्रपति शिवाजी महाराज का ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित होते ही सबकुछ कुशल-मंगल हुआ था !
🚩छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म होने के पूर्व भी आज के समान ही हिन्दू स्त्रियों का शील सुरक्षित नहीं था, प्रत्यक्ष जीजामाता की जिठानी को ही पानी लाते समय यवन सरदार ने अगवा कर लिया था । उस समय भी मंदिर भ्रष्ट किए जाते थे एवं गोमाता की गर्दन पर कब कसाई का छुरा चल जाएगा, यह कोई बता नहीं सकता था । छत्रपति शिवाजी महाराज का ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित होते ही मंदिर ढहाना बंद हुआ, इतना ही नहीं; अपितु मंदिर ढहाकर बनाई मस्जिदों का रूपांतरण पूर्ववत मंदिरों में हुआ ।
🚩 मौन रहकर क्रंदन करने वाली गोमाताएं आनंदित होकर रंभाने लगीं । ‘गोहत्या बंद की जाए !’, ऐसी मांग के लिए कभी शासन के पास लाखों हस्ताक्षर नहीं भेजे गए अथवा छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी कोई ‘गोहत्या प्रतिबंधक विधेयक’ मंत्रीमंडल में प्रस्तुत नहीं किया,हिन्दू राष्ट्र घोषित होते ही गौहत्या रुक गई थी और राष्ट्र में गौमाता की पूजा होने लग गई ।
🚩आज हमें महंगाई दिखती है । क्या कभी पढा है कि छत्रपति शिवाजी ‘महाराज के शासनकाल में प्रजा महंगाई से त्रस्त थी’ ?
🚩‘जय जवान, जय किसान’ की घोषणा करने वाले शासनकर्ता आज जवान एवं किसान, दोनों की नृशंस हत्या करवा रहे हैं । छत्रपति शिवाजी महाराज को तो केवल कृषकों के (किसानों के) प्राण ही नहीं, अपितु उनके द्वारा उपजाई फसल भी अमूल्य लगती थी । उन्होंने ऐसी आज्ञा ही दी थी कि ‘कृषकों द्वारा उपजाई फसल के डंठल को भी कोई हाथ न लगाए ।’ छत्रपति शिवाजी महाराज ने ‘किसानों’ की ही भांति ‘जवानों को’भी संभाला था ।
🚩 छत्रपति शिवाजी महाराज लडाई में घायल हुए अनेक सैनिकों को पुरस्कार के साथ सोने के आभूषण देकर सम्मानित करते थे । कारगिल युद्ध में वीरगति प्राप्त करनेवाले सैनिकों की विधवाओं के लिए वर्ष 2010 में ‘आदर्श’ सोसाइटी बनाई गई; परंतु उसमें एक भी सैनिक की विधवा को सदनिका (फ्लैट) नहीं मिली । भ्रष्टासुरों ने ही वे सभी सदनिकाएं हडप लीं !
🚩छत्रपति शिवाजी महाराज ने सिंहगढ के युद्ध में वीरगति प्राप्त करने वाले के यहाँ तानाजी के पुत्र का विवाह कर उनके परिजनों को सांत्वना दी थी !
🚩‘हिन्दू राष्ट्र’ में भारत को त्रस्त करने वाली बाह्य समस्याएं भी दूर होंगी !
🚩‘हिन्दू राष्ट्र’ में आंतरिक समस्याएं दूर होंगी, उसी प्रकार बाह्य समस्याएं भी दूर होंगी । इन समस्याओं में मुख्य हैं :-पाकिस्तान एवं चीन द्वारा भारत पर संभावित आक्रमण ।
🚩 शिवकाल में भी ऐसी ही स्थिति थी । औरंगजेब ‘शिवा’का छोटासा राज्य नष्ट करने को तुला था; परंतु छत्रपति शिवाजी ‘महाराज का राज्याभिषेक और विधिवत ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित हुआ’, यह सुनते ही उसके पैरोंतले की भूमि खिसक गई ! तदनंतर आगे छत्रपति शिवाजी महाराज के स्वर्गारोहणतक वह मात्र महाराष्ट्र में ही नहीं; अपितु दक्षिण में भी नहीं आया ! एक बार ‘हिन्दू राष्ट्र’ की स्थापना हुई कि हमारे सर्व पडोसी अपने आप सीधे हो जाएंगे !
🚩‘हिन्दू राष्ट्र’ का विषय निकलते ही एक निरर्थक प्रश्न तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादियों द्वारा पूछा जाता है, ‘हिन्दूराष्ट्र’ में मुसलमानों के साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा ? वास्तव में यह प्रश्न मुसलमानों को पूछना चाहिए । वे नहीं पूछते । वे तो यही कहते हैं, ‘हस के लिया पाकिस्तान, लड के लेंगे हिन्दूस्तान !’ तथापि इस प्रश्न का भी उत्तर है । आगामी ‘हिन्दू राष्ट्र’ में मुसलमानों से ही नहीं; अपितु सभी पंथियों से वैसा ही व्यवहार किया जाएगा जैसा शिवराज्य में किया गया था !
🚩संक्षेप में, सूर्योदय होने से पूर्व सर्वत्र अंधकार छाया रहता है, दुर्गंध आती है; परंतु सूर्य के उगते ही अंधकार अपने आप नष्ट हो जाता है, सर्व दुर्गंध वातावरण में लुप्त हो जाती है । अंधकार अथवा दुर्गंध से कोई नहीं कहता, ‘दूर हटो, सूर्य उग रहा है !’ यह अपने आप ही होता है । उसी प्रकार आज भारत में फैला विविध समस्यारूपी अंधकार एवं दुर्गंध ‘हिन्दू राष्ट्र’ के स्थापित होते ही अपने आप नष्ट हो जाएगी । धर्माचरणी शासनकर्ताओं के कारण भारत की सर्व समस्याएं दूर होंगी तथा सदाचार के कारण सर्व जनता भी सुखी होगी !
🚩किन्हीं एक-दो समस्याओं के विरोध में लडने की अपेक्षा ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित करना आवश्यक है। मात्र भारत के लोगों के लिए ही नहीं; अपितु अखिल मानवजाति के कल्याण हेतु हिन्दू राष्ट्र स्थापित किया जाना चाहिए।
🚩 पांडव मात्र पांच गांव चाहते थे, वे भी उन्हें सहजता से नहीं मिल सके । हमें तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक अखंड ‘हिन्दू राष्ट्र’ चाहिए । इसके लिए बडा संघर्ष करना होगा । भारत की किन्हीं एक-दो समस्याओं के (उदा. गोहत्या, धर्मांतरण, गंगा नदी का प्रदूषण, कश्मीर, मंदिर, स्वभाषारक्षा आदि के) विरोध में पृथक-पृथक लडने की अपेक्षा सर्व समविचारी व्यक्ति एवं संस्थाएं मिलकर ‘हिन्दू राष्ट्र-स्थापना’ का ही ध्येय रखकर कार्य करेंगे, तो यह संघर्ष थोडा सुलभ होगा ।
🚩स्वामी विवेकानंद, योगी अरविंद, वीर सावरकर, प.पू. गोळवलकर गुरुजी जैसे हिन्दू धर्म के महान योद्धाओं को अपेक्षित धर्माधारित ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित होने हेतु आवश्यक शारीरिक, मानसिक, बौदि्धक एवं आध्याति्मक सामथ्र्य हिन्दूनिष्ठों को मिले।
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🚩‘हिन्दू राष्ट्र’ में भारत को त्रस्त करने वाली बाह्य समस्याएं भी दूर होंगी !
🚩‘हिन्दू राष्ट्र’ में आंतरिक समस्याएं दूर होंगी, उसी प्रकार बाह्य समस्याएं भी दूर होंगी । इन समस्याओं में मुख्य हैं :-पाकिस्तान एवं चीन द्वारा भारत पर संभावित आक्रमण ।
🚩 शिवकाल में भी ऐसी ही स्थिति थी । औरंगजेब ‘शिवा’का छोटासा राज्य नष्ट करने को तुला था; परंतु छत्रपति शिवाजी ‘महाराज का राज्याभिषेक और विधिवत ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित हुआ’, यह सुनते ही उसके पैरोंतले की भूमि खिसक गई ! तदनंतर आगे छत्रपति शिवाजी महाराज के स्वर्गारोहणतक वह मात्र महाराष्ट्र में ही नहीं; अपितु दक्षिण में भी नहीं आया ! एक बार ‘हिन्दू राष्ट्र’ की स्थापना हुई कि हमारे सर्व पडोसी अपने आप सीधे हो जाएंगे !
🚩‘हिन्दू राष्ट्र’ का विषय निकलते ही एक निरर्थक प्रश्न तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादियों द्वारा पूछा जाता है, ‘हिन्दूराष्ट्र’ में मुसलमानों के साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा ? वास्तव में यह प्रश्न मुसलमानों को पूछना चाहिए । वे नहीं पूछते । वे तो यही कहते हैं, ‘हस के लिया पाकिस्तान, लड के लेंगे हिन्दूस्तान !’ तथापि इस प्रश्न का भी उत्तर है । आगामी ‘हिन्दू राष्ट्र’ में मुसलमानों से ही नहीं; अपितु सभी पंथियों से वैसा ही व्यवहार किया जाएगा जैसा शिवराज्य में किया गया था !
🚩संक्षेप में, सूर्योदय होने से पूर्व सर्वत्र अंधकार छाया रहता है, दुर्गंध आती है; परंतु सूर्य के उगते ही अंधकार अपने आप नष्ट हो जाता है, सर्व दुर्गंध वातावरण में लुप्त हो जाती है । अंधकार अथवा दुर्गंध से कोई नहीं कहता, ‘दूर हटो, सूर्य उग रहा है !’ यह अपने आप ही होता है । उसी प्रकार आज भारत में फैला विविध समस्यारूपी अंधकार एवं दुर्गंध ‘हिन्दू राष्ट्र’ के स्थापित होते ही अपने आप नष्ट हो जाएगी । धर्माचरणी शासनकर्ताओं के कारण भारत की सर्व समस्याएं दूर होंगी तथा सदाचार के कारण सर्व जनता भी सुखी होगी !
🚩किन्हीं एक-दो समस्याओं के विरोध में लडने की अपेक्षा ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित करना आवश्यक है। मात्र भारत के लोगों के लिए ही नहीं; अपितु अखिल मानवजाति के कल्याण हेतु हिन्दू राष्ट्र स्थापित किया जाना चाहिए।
🚩 पांडव मात्र पांच गांव चाहते थे, वे भी उन्हें सहजता से नहीं मिल सके । हमें तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक अखंड ‘हिन्दू राष्ट्र’ चाहिए । इसके लिए बडा संघर्ष करना होगा । भारत की किन्हीं एक-दो समस्याओं के (उदा. गोहत्या, धर्मांतरण, गंगा नदी का प्रदूषण, कश्मीर, मंदिर, स्वभाषारक्षा आदि के) विरोध में पृथक-पृथक लडने की अपेक्षा सर्व समविचारी व्यक्ति एवं संस्थाएं मिलकर ‘हिन्दू राष्ट्र-स्थापना’ का ही ध्येय रखकर कार्य करेंगे, तो यह संघर्ष थोडा सुलभ होगा ।
🚩स्वामी विवेकानंद, योगी अरविंद, वीर सावरकर, प.पू. गोळवलकर गुरुजी जैसे हिन्दू धर्म के महान योद्धाओं को अपेक्षित धर्माधारित ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित होने हेतु आवश्यक शारीरिक, मानसिक, बौदि्धक एवं आध्याति्मक सामथ्र्य हिन्दूनिष्ठों को मिले।
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संत थॉमस, एक षड्यंत्र, एक गप्प।
6 July 2022
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🚩हर शहर में सेंट थॉमस नाम से एक स्कूल है। हिंदुओं को लगता है कि अवश्य यह कोई सन्त रहा होगा। पुरानी कहानियों में इसे केरल के मालाबार तट पर आया बताया तो नई कहानी में इसे बनारस पहुंचा दिया गया। कहीं इसे ईसामसीह का भाई कहा गया तो कहीं इसे उसका शिष्य। सत्य यह है कि हिंदुओं को मूर्ख बनाने के लिए यह गप्प बनाई गई।
🚩ईसा की तीसरी शताब्दी में लिखी गई एक गल्प पुस्तक Acts of Thomas में लिखा है कि जीसस क्राइस्ट का जुड़वा भाई थॉमस दासत्व में बेच दिया जाता है और वह अन्द्रोपोलिस नामक पश्चिम एशियाई नगर में आता है, राजा को धोखा देता है, सुन्दर लौण्डे के लिये शैतान से भिड़ जाता है तथा अन्त में एक लम्बी विधिक प्रक्रिया के पश्चात मृत्युदंड पाता है।
🚩 उसकी मृत्यु के पश्चात पर्सिया, सीरिया आदि में उसके अनुयायी इसाई पैदा हो जाते हैं। जब उस क्षेत्र से उन सीरियाई ईसाइयों को भगा दिए जाते है तब चौथी सदी में वे लोग एक 'थॉमस काना' नामक व्यक्ति के नेतृत्व में दक्षिण भारत में शरण लेते हैं।
🚩सदियाँ बीतती हैं तथा दक्षिण भारत के कुछ भागों पर पुर्तगाली अधिकार होता है। तब कृतघ्नता की सेमेटिक परम्परा का निर्वाह करते हुये उन ईसाईयों द्वारा झूठ का संचार आरम्भ होता है, जिसके दो उद्देश्य होते हैं:
🚩(1) पुर्तगालियों द्वारा मन्दिर ध्वंस एवं धार्मिक अत्याचारों को छिपाना तथा
(2) लोगों को मसीही / ईसाई बनाना।
🚩इस झूठ के तहत थॉमस के नाम का एक मालाबरी चर्च दिखा कर उसे 52 ई. में भारत आया बताया जाने लगता है। मालाबार से पूर्वी तट पर आकर तमिल क्षेत्र में घुसपैठ कर मइलापुर के प्रसिद्ध प्राचीन कपालीश्वर शिव मन्दिर को पुर्तगाली लोग तोड़ देते हैं तथा उसी स्थान पर चर्च बना कर तथा वहाँ थॉमस शहीद हुआ था ऐसा झूठ फैलाकर उसकी कब्र भी बना दी जाती है! और उसे मारने वाला किसे बताया जाता है? एक ब्राह्मण को!!!
🚩जो थॉमस तीसरी सदी का गल्प है, जो दक्षिण भारत तक कभी नहीं आया, जो कहानी में भी सदियों पहले भारत के पश्चिमी सीमांत प्रदेश के पारसियों के सम्पर्क में आया बताया जाता है, जिसकी पुष्टि स्वयं पोप वेनेडिक्ट करता है, वह सुदूर दक्षिण में ‘सदियों पश्चात’ एक ब्राह्मण द्वारा मारा जा कर मन्दिर के गर्भ गृह में शहीद होकर विराजमान हो जाता है!! और भारत की सेकुलर जमात के समस्त वामपंथी इतिहासकार उसे 52 ई. का भारतीय बताने लगते हैं!!! सदियों की दूरी के एक कल्पित एवं एक समनामधारी, दो थॉमसों मिलाकर तथा एक बना कर एक ऐसा लुभावना मिथक गढ़ा जाता है जो भारत की आत्मघाती सेकुलर शिक्षा तंत्र से निकले लोगों को पसन्द आए और जिस पर वे सहज ही विश्वास कर लें।
🚩इस थॉमस मिथक को वास्तविकता बताकर इतना प्रचारित किया जाता है कि कपालीश्वर मन्दिर के ध्वंस की कोई बात ही नहीं करता, लेकिन थॉमस को शहीद बताकर इसाई सहानुभूति बटोर रहा है तथा दक्षिणी ब्राह्मण पर 'अत्याचारी’ का घृणित लेबल लगा दिया जाता है!! यह आज के तमिलनाडु का यथार्थ है। समूचा दक्षिण भारत इसाई मिशनरियों की चपेट में है।
🚩यह वास्तविकता है कि जीसस के काल्पनिक जन्मदिन (25 दिसम्बर - क्रिसमस) को ईसाईयों से अधिक हिंदू सेलिब्रेट करने लगे हैं। वे ‘बच्चे’ जो सेण्ट थॉमस, सेण्ट पॉल, सेण्ट जेवियर्स आदि स्कूलों में पढ़कर निकले है या पढ़ते हैं, वे क्रिसमस पर प्रसन्नता के मारे फूले नहीं समाते!
🚩संत (?) थॉमस के मिथक और कपालीश्वर शिव मंदिर के विध्वंस की रोचक कहानी को जानने के लिए प्रस्तुत है...
🚩इस पुस्तक के सम्पादक ईश्वर शरण (स्वामी देवानन्द) कनाडा में जन्मे एक पूर्व-ईसाई (Ex-Christian) है। पुस्तक आंग्ल भाषा में है।
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6 July 2022
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🚩हर शहर में सेंट थॉमस नाम से एक स्कूल है। हिंदुओं को लगता है कि अवश्य यह कोई सन्त रहा होगा। पुरानी कहानियों में इसे केरल के मालाबार तट पर आया बताया तो नई कहानी में इसे बनारस पहुंचा दिया गया। कहीं इसे ईसामसीह का भाई कहा गया तो कहीं इसे उसका शिष्य। सत्य यह है कि हिंदुओं को मूर्ख बनाने के लिए यह गप्प बनाई गई।
🚩ईसा की तीसरी शताब्दी में लिखी गई एक गल्प पुस्तक Acts of Thomas में लिखा है कि जीसस क्राइस्ट का जुड़वा भाई थॉमस दासत्व में बेच दिया जाता है और वह अन्द्रोपोलिस नामक पश्चिम एशियाई नगर में आता है, राजा को धोखा देता है, सुन्दर लौण्डे के लिये शैतान से भिड़ जाता है तथा अन्त में एक लम्बी विधिक प्रक्रिया के पश्चात मृत्युदंड पाता है।
🚩 उसकी मृत्यु के पश्चात पर्सिया, सीरिया आदि में उसके अनुयायी इसाई पैदा हो जाते हैं। जब उस क्षेत्र से उन सीरियाई ईसाइयों को भगा दिए जाते है तब चौथी सदी में वे लोग एक 'थॉमस काना' नामक व्यक्ति के नेतृत्व में दक्षिण भारत में शरण लेते हैं।
🚩सदियाँ बीतती हैं तथा दक्षिण भारत के कुछ भागों पर पुर्तगाली अधिकार होता है। तब कृतघ्नता की सेमेटिक परम्परा का निर्वाह करते हुये उन ईसाईयों द्वारा झूठ का संचार आरम्भ होता है, जिसके दो उद्देश्य होते हैं:
🚩(1) पुर्तगालियों द्वारा मन्दिर ध्वंस एवं धार्मिक अत्याचारों को छिपाना तथा
(2) लोगों को मसीही / ईसाई बनाना।
🚩इस झूठ के तहत थॉमस के नाम का एक मालाबरी चर्च दिखा कर उसे 52 ई. में भारत आया बताया जाने लगता है। मालाबार से पूर्वी तट पर आकर तमिल क्षेत्र में घुसपैठ कर मइलापुर के प्रसिद्ध प्राचीन कपालीश्वर शिव मन्दिर को पुर्तगाली लोग तोड़ देते हैं तथा उसी स्थान पर चर्च बना कर तथा वहाँ थॉमस शहीद हुआ था ऐसा झूठ फैलाकर उसकी कब्र भी बना दी जाती है! और उसे मारने वाला किसे बताया जाता है? एक ब्राह्मण को!!!
🚩जो थॉमस तीसरी सदी का गल्प है, जो दक्षिण भारत तक कभी नहीं आया, जो कहानी में भी सदियों पहले भारत के पश्चिमी सीमांत प्रदेश के पारसियों के सम्पर्क में आया बताया जाता है, जिसकी पुष्टि स्वयं पोप वेनेडिक्ट करता है, वह सुदूर दक्षिण में ‘सदियों पश्चात’ एक ब्राह्मण द्वारा मारा जा कर मन्दिर के गर्भ गृह में शहीद होकर विराजमान हो जाता है!! और भारत की सेकुलर जमात के समस्त वामपंथी इतिहासकार उसे 52 ई. का भारतीय बताने लगते हैं!!! सदियों की दूरी के एक कल्पित एवं एक समनामधारी, दो थॉमसों मिलाकर तथा एक बना कर एक ऐसा लुभावना मिथक गढ़ा जाता है जो भारत की आत्मघाती सेकुलर शिक्षा तंत्र से निकले लोगों को पसन्द आए और जिस पर वे सहज ही विश्वास कर लें।
🚩इस थॉमस मिथक को वास्तविकता बताकर इतना प्रचारित किया जाता है कि कपालीश्वर मन्दिर के ध्वंस की कोई बात ही नहीं करता, लेकिन थॉमस को शहीद बताकर इसाई सहानुभूति बटोर रहा है तथा दक्षिणी ब्राह्मण पर 'अत्याचारी’ का घृणित लेबल लगा दिया जाता है!! यह आज के तमिलनाडु का यथार्थ है। समूचा दक्षिण भारत इसाई मिशनरियों की चपेट में है।
🚩यह वास्तविकता है कि जीसस के काल्पनिक जन्मदिन (25 दिसम्बर - क्रिसमस) को ईसाईयों से अधिक हिंदू सेलिब्रेट करने लगे हैं। वे ‘बच्चे’ जो सेण्ट थॉमस, सेण्ट पॉल, सेण्ट जेवियर्स आदि स्कूलों में पढ़कर निकले है या पढ़ते हैं, वे क्रिसमस पर प्रसन्नता के मारे फूले नहीं समाते!
🚩संत (?) थॉमस के मिथक और कपालीश्वर शिव मंदिर के विध्वंस की रोचक कहानी को जानने के लिए प्रस्तुत है...
🚩इस पुस्तक के सम्पादक ईश्वर शरण (स्वामी देवानन्द) कनाडा में जन्मे एक पूर्व-ईसाई (Ex-Christian) है। पुस्तक आंग्ल भाषा में है।
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हिंदुओं की सहिष्णुता का हो रहा दुरुपयोग....
7 July 2022
http://azaadbharat.org
🚩लीना मणिमेकलाई की डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘काली’ के पोस्टर पर मध्य प्रदेश में भी विरोध हुआ है।
🚩प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा जी ने कहा कि “मैं डायरेक्टर लीना मणिमेकलाई से पूछना चाहता हूँ कि आखिर हिन्दू देवी-देवताओं और हिन्दू संतो पर ही गलत फिल्में क्यों बनाई जाती है ?
🚩किसी और मजहब पर ऐसी फिल्में क्यों नहीं बनती ?
🚩हिंदू-घृणा से सना है हॉलीवुड,
रिहाना के अलावा 5 और हैं नाम
🚩बॉलीवुड में पसरा हिंदूफोबिया अक्सर सिनेमा और वेबसीरीज के माध्यम से दर्शकों में देखा जाता रहा है, लेकिन हाल में अमेरिकी पॉप सिंगर रिहाना के टॉपलेस तस्वीर के साथ भगवान गणेश के लॉकेट ने इस बात को चर्चा में ला दिया है कि क्या ऐसी कोशिश हॉलीवुड ने भी शुरू कर दी है?
🚩वास्तविकता में हॉलीवुड में हिंदूफोबिया कोई नई बात नहीं है। इससे पहले अमेरिका की एक महिला रैपर कार्डी बी ने रिबॉक के स्निकर्स को प्रमोट करने के लिए माँ दुर्गा देवी का मजाक उड़ाया था।
🚩नेक लेस टॉप के साथ वह हाथ में लाल रंग के जूते लिए नजर आई थी और उनका अवतार बिलकुल ऐसा था जैसे हिंदू ग्रंथों में देवी दुर्गा के लिए दर्शाया जाता रहा है। उनकी वह तस्वीर देखने के बाद कई हिन्दू संगठनों और भारतीयों ने इसका विरोध किया था, जिसके चलते उन्हें माफी माँगनी पड़ी थी।
🚩ऐसे ही साल 2008 में हेदी क्लम (Heidi Klum) ने एक हैलोवीन पार्टी में काली माँ का रूप धारण कर हिंदुओं की भावनाओं को आहत किया था। उनके इस रूप की तस्वीरें वायरल होने के बाद कई हिंदू नेताओं ने उनका विरोध किया था और उनसे सार्वजनिक तौर पर माफी माँगने को कहा गया था। हिंदू नेताओं का कहना था कि काली की पूजा हिंदू मंदिर में करते हैं, पब्लिसिटी स्टंट के लिए क्लब में नहीं लाया जा सकता।
🚩साल 2017 में कैटी पैरी का एक सोशल मीडिया पोस्ट इसी तरह वायरल हुआ था। उसमें अपने मूड की तुलना उन्होंने काली माँ की तस्वीर से शेयर करके की थी। कैटी के ऐसे प्रयासों को हिंदुओं ने अभद्र करार दिया था।
🚩इसी तरह डीजे ओ कार्ली ने भी अपनी आस्था के नाम पर देवी काली के रूप का इस्तेमाल हैलोवीन कार्यक्रम में शामिल होने के लिए किया था। लोगों ने इसे देख उन पर गुस्सा जाहिर किया था और कहा था कि हमारा धर्म तुम्हारा हैलोईन कॉस्ट्यूम नहीं है।
🚩उक्त घटनाओं से ये साफ है कि हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाना या उन्हें गलत तरह से प्रस्तुत करना हॉलीवुड के लिए कोई नई बात नहीं है। रिहाना ने भी नग्न तस्वीर के साथ गणेश लॉकेट की तस्वीर साझा करके सिर्फ़ उसी परंपरा को आगे बढ़ाया है, जहाँ हिंदुओं की आस्था से ख़िलवाड़ सामान्य माना जाने लगा है।
🚩दिलचस्प बात यह है कि हिंदू देवताओं का लॉकेट गले में टाँग अपनी टॉपलेस तस्वीर ख़िंचाने वाली रिहाना वही खुले विचारों की महिला हैं, जिन्हें जब मस्जिद के बाहर फोटोशूट कराना था तो वह नकाब ओढ़ कर गई थीं, जबकि उससे पहले तक उन्हें उनके सेक्सी पोज और न्यूड फोटोशूट के लिए जाना जाता था।
🚩शायद, रिहाना को मालूम था कि यदि वो एक निश्चित समुदाय के प्रति इतना सम्मान नहीं दिखाएँगी तो उनका क्या होगा। लेकिन फिर भी हालत देखिए, अपनी तरफ से सामान्य पहनावा पहनने के बावजूद शेख जायद शाही मस्जिद के अधिकारियों ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था, वो भी सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने फोटोशूट के दौरान कोई गलत पोज देने की कोशिश की थी। उससे पूर्व मस्जिद के कंपाउंड में खड़े होकर पोज देने के लिए भी बहुत हंगामा मचा था।
🚩मालूम हो कि रिहाना अकेली ऐसी हस्ती नहीं हैं, जिन्हें इस्लामी रिवाज के कारण मस्जिद के बाहर या फिर इस्लामी देश में उटपटांग फोटोशूट कराने के लिए चलता किया गया हो। अभी हाल में मुस्लिम देश दुबई में एक प्लेबॉय मॉडल ल्युआना सैंडियन को टॉपलेस तस्वीर खिंचवाना भारी पड़ गया था। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यूज़र्स आलोचनाओं के साथ उन्हें धमकी भरे मैसेज भेजे जाने लगे थे।
🚩हालाँकि, इस मामले को लेकर मॉडल का कहना था कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है। शूट के दौरान उन्होंने हाथों से अपने ब्रेस्ट को ढक लिया था। उनके अलावा पॉप स्टार सेलेना गोमेज के आबू धाबी की ग्रैंड मस्जिद में ड्रेस उठाकर टखने दिखाते तस्वीर पर विवाद हुआ था। बात इतनी बढ़ गई थी कि सेलेना को लोगों की नाराजगी और बढ़ते विवाद को देख कर अपनी ये दोनों तस्वीरें अपने अकाउंट से हटानी पड़ी थी।
🚩नंगे शरीर पर गणेश जी का लॉकेट लटका कर फोटो खिंचवाने का क्या मतलब हो सकता है? हिंदुओं को आहत करने से अधिक कुछ भी नहीं। प्रोग्रेसिव फोटोशूट की बात थी तो लॉकेट के रूप में कोई और चीज भी गले में लटकाई जा सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया, क्योंकि उसे हिंदू समुदाय, महिला की निजता का मामला मानता और भावनाओं को ठेस दूर-दूर तक नहीं पहुँचती।
7 July 2022
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🚩लीना मणिमेकलाई की डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘काली’ के पोस्टर पर मध्य प्रदेश में भी विरोध हुआ है।
🚩प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा जी ने कहा कि “मैं डायरेक्टर लीना मणिमेकलाई से पूछना चाहता हूँ कि आखिर हिन्दू देवी-देवताओं और हिन्दू संतो पर ही गलत फिल्में क्यों बनाई जाती है ?
🚩किसी और मजहब पर ऐसी फिल्में क्यों नहीं बनती ?
🚩हिंदू-घृणा से सना है हॉलीवुड,
रिहाना के अलावा 5 और हैं नाम
🚩बॉलीवुड में पसरा हिंदूफोबिया अक्सर सिनेमा और वेबसीरीज के माध्यम से दर्शकों में देखा जाता रहा है, लेकिन हाल में अमेरिकी पॉप सिंगर रिहाना के टॉपलेस तस्वीर के साथ भगवान गणेश के लॉकेट ने इस बात को चर्चा में ला दिया है कि क्या ऐसी कोशिश हॉलीवुड ने भी शुरू कर दी है?
🚩वास्तविकता में हॉलीवुड में हिंदूफोबिया कोई नई बात नहीं है। इससे पहले अमेरिका की एक महिला रैपर कार्डी बी ने रिबॉक के स्निकर्स को प्रमोट करने के लिए माँ दुर्गा देवी का मजाक उड़ाया था।
🚩नेक लेस टॉप के साथ वह हाथ में लाल रंग के जूते लिए नजर आई थी और उनका अवतार बिलकुल ऐसा था जैसे हिंदू ग्रंथों में देवी दुर्गा के लिए दर्शाया जाता रहा है। उनकी वह तस्वीर देखने के बाद कई हिन्दू संगठनों और भारतीयों ने इसका विरोध किया था, जिसके चलते उन्हें माफी माँगनी पड़ी थी।
🚩ऐसे ही साल 2008 में हेदी क्लम (Heidi Klum) ने एक हैलोवीन पार्टी में काली माँ का रूप धारण कर हिंदुओं की भावनाओं को आहत किया था। उनके इस रूप की तस्वीरें वायरल होने के बाद कई हिंदू नेताओं ने उनका विरोध किया था और उनसे सार्वजनिक तौर पर माफी माँगने को कहा गया था। हिंदू नेताओं का कहना था कि काली की पूजा हिंदू मंदिर में करते हैं, पब्लिसिटी स्टंट के लिए क्लब में नहीं लाया जा सकता।
🚩साल 2017 में कैटी पैरी का एक सोशल मीडिया पोस्ट इसी तरह वायरल हुआ था। उसमें अपने मूड की तुलना उन्होंने काली माँ की तस्वीर से शेयर करके की थी। कैटी के ऐसे प्रयासों को हिंदुओं ने अभद्र करार दिया था।
🚩इसी तरह डीजे ओ कार्ली ने भी अपनी आस्था के नाम पर देवी काली के रूप का इस्तेमाल हैलोवीन कार्यक्रम में शामिल होने के लिए किया था। लोगों ने इसे देख उन पर गुस्सा जाहिर किया था और कहा था कि हमारा धर्म तुम्हारा हैलोईन कॉस्ट्यूम नहीं है।
🚩उक्त घटनाओं से ये साफ है कि हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाना या उन्हें गलत तरह से प्रस्तुत करना हॉलीवुड के लिए कोई नई बात नहीं है। रिहाना ने भी नग्न तस्वीर के साथ गणेश लॉकेट की तस्वीर साझा करके सिर्फ़ उसी परंपरा को आगे बढ़ाया है, जहाँ हिंदुओं की आस्था से ख़िलवाड़ सामान्य माना जाने लगा है।
🚩दिलचस्प बात यह है कि हिंदू देवताओं का लॉकेट गले में टाँग अपनी टॉपलेस तस्वीर ख़िंचाने वाली रिहाना वही खुले विचारों की महिला हैं, जिन्हें जब मस्जिद के बाहर फोटोशूट कराना था तो वह नकाब ओढ़ कर गई थीं, जबकि उससे पहले तक उन्हें उनके सेक्सी पोज और न्यूड फोटोशूट के लिए जाना जाता था।
🚩शायद, रिहाना को मालूम था कि यदि वो एक निश्चित समुदाय के प्रति इतना सम्मान नहीं दिखाएँगी तो उनका क्या होगा। लेकिन फिर भी हालत देखिए, अपनी तरफ से सामान्य पहनावा पहनने के बावजूद शेख जायद शाही मस्जिद के अधिकारियों ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था, वो भी सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने फोटोशूट के दौरान कोई गलत पोज देने की कोशिश की थी। उससे पूर्व मस्जिद के कंपाउंड में खड़े होकर पोज देने के लिए भी बहुत हंगामा मचा था।
🚩मालूम हो कि रिहाना अकेली ऐसी हस्ती नहीं हैं, जिन्हें इस्लामी रिवाज के कारण मस्जिद के बाहर या फिर इस्लामी देश में उटपटांग फोटोशूट कराने के लिए चलता किया गया हो। अभी हाल में मुस्लिम देश दुबई में एक प्लेबॉय मॉडल ल्युआना सैंडियन को टॉपलेस तस्वीर खिंचवाना भारी पड़ गया था। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यूज़र्स आलोचनाओं के साथ उन्हें धमकी भरे मैसेज भेजे जाने लगे थे।
🚩हालाँकि, इस मामले को लेकर मॉडल का कहना था कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है। शूट के दौरान उन्होंने हाथों से अपने ब्रेस्ट को ढक लिया था। उनके अलावा पॉप स्टार सेलेना गोमेज के आबू धाबी की ग्रैंड मस्जिद में ड्रेस उठाकर टखने दिखाते तस्वीर पर विवाद हुआ था। बात इतनी बढ़ गई थी कि सेलेना को लोगों की नाराजगी और बढ़ते विवाद को देख कर अपनी ये दोनों तस्वीरें अपने अकाउंट से हटानी पड़ी थी।
🚩नंगे शरीर पर गणेश जी का लॉकेट लटका कर फोटो खिंचवाने का क्या मतलब हो सकता है? हिंदुओं को आहत करने से अधिक कुछ भी नहीं। प्रोग्रेसिव फोटोशूट की बात थी तो लॉकेट के रूप में कोई और चीज भी गले में लटकाई जा सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया, क्योंकि उसे हिंदू समुदाय, महिला की निजता का मामला मानता और भावनाओं को ठेस दूर-दूर तक नहीं पहुँचती।
🚩किसी और मजहब पर ऐसी फिल्म क्यों नहीं बनती?’
🚩लीना मणिमेकलाई की डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘काली’ के पोस्टर पर मध्य प्रदेश में भी विवाद गहरा गया है। प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने ट्वीट किया, “डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘काली’ में काली माता को सिगरेट पीते हुए दिखाना काफी आपत्तिजनक है। इस मामले में FIR करवाने के लिए बोलूँगा और फिल्म मध्य प्रदेश में कैसे बैन हो इस पर विचार किया जाएगा। माँ काली का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अगर तत्काल फिल्म के पोस्टर नहीं हटाए तो आगे कड़ी कानूनी कार्रवाई करेंगे।
🚩उन्होंने कहा, “मैं डायरेक्टर लीना मणिमेकलाई से पूछना चाहता हूँ कि आखिर हमारे देवी देवताओं पर ही फिल्म क्यों बनाई जाती है? किसी और धर्म के देवी देवताओं पर फिल्म बनाने की हिम्मत क्यों नहीं हो पाती है। यह बेहद आपत्तिजनक है। तत्काल पोस्टर नहीं हटाए, तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
🚩लीना मणिमेकलई ने 2 जुलाई 2022 को अपनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘काली’ का पोस्टर ट्विटर पर रिलीज किया था। इस पोस्टर में एक्ट्रेस को ‘काली’ के रूप में दिखाया गया है। इसमें उसने एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में LGBT समुदाय का झंडा पकड़ा हुआ। इसके साथ ही उसे सिगरेट पीते हुए भी दिखाया गया है। पोस्टर रिलीज होने के बाद सोशल मीडिया पर इस फिल्म का विरोध किया जा रहा है।
🚩भारत सरकार , प्रसाशन से हिन्दू समाज की मांग हैं कि हिन्दू देवी-देवताओं , हिन्दू संतो के ऊपर गलत टिप्पणी, पोस्ट या फ़िल्म बनाने वालो को कड़ी से कड़ी सजा हो ।
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🚩उन्होंने कहा, “मैं डायरेक्टर लीना मणिमेकलाई से पूछना चाहता हूँ कि आखिर हमारे देवी देवताओं पर ही फिल्म क्यों बनाई जाती है? किसी और धर्म के देवी देवताओं पर फिल्म बनाने की हिम्मत क्यों नहीं हो पाती है। यह बेहद आपत्तिजनक है। तत्काल पोस्टर नहीं हटाए, तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
🚩लीना मणिमेकलई ने 2 जुलाई 2022 को अपनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘काली’ का पोस्टर ट्विटर पर रिलीज किया था। इस पोस्टर में एक्ट्रेस को ‘काली’ के रूप में दिखाया गया है। इसमें उसने एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में LGBT समुदाय का झंडा पकड़ा हुआ। इसके साथ ही उसे सिगरेट पीते हुए भी दिखाया गया है। पोस्टर रिलीज होने के बाद सोशल मीडिया पर इस फिल्म का विरोध किया जा रहा है।
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