संसार भर के विकासवादियों से प्रश्न, क्या मनुष्य पहले बंदर था?
04 फरवरी 2022
azaadbharat.org
🚩कुछ वर्ष पूर्व पूर्व केन्द्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री माननीय डाॅ. सत्यपालसिंहजी के इस कथन कि मनुष्य की उत्पत्ति बन्दर से नहीं हुई, सम्पूर्ण भारत के बुद्धिजीवियों में हलचल मच रही थी । कुछ वैज्ञानिक सोच के महानुभाव इसे साम्प्रदायिक संकीर्णताजन्य रूढ़िवादी सोच की संज्ञा दे रहे थे। मैं उन महानुभावों से निवेदन करता हूँ कि मंत्रीजी का यह विचार रूढ़िवादी नहीं बल्कि सुदृढ़ तर्कों पर आधारित वैदिक विज्ञान का ही पक्ष है। ऐसा नहीं है कि विकासवाद का विरोध कुछ भारतीय विद्वान् ही करते हैं अपितु अनेक यूरोपियन वैज्ञानिक भी इसे नकारते आये हैं। मैं इसका विरोध करने वाले संसारभर के विकासवादियों से प्रश्न करना चाहता हूँ। ये प्रश्न प्रारम्भिक हैं, इनका उत्तर मिलने पर और प्रश्न किये जायेंगे :-
🚩शारीरिक विकास
१. विकासवादी अमीबा से लेकर विकसित होकर बन्दर पुनः शनैः-२ मनुष्य की उत्पत्ति मानते हैं। वे बताएं कि अमीबा की उत्पत्ति कैसे हुई?
२. यदि किसी अन्य ग्रह से जीवन आया, तो वहाँ उत्पत्ति कैसे हुई? जब वहाँ उत्पत्ति हो सकती है, तब इस पृथ्वी पर क्यों नहीं हो सकती?
३. यदि अमीबा की उत्पत्ति रासायनिक क्रियाओं से किसी ग्रह पर हुई, तब मनुष्य के शुक्राणु व अण्डाणु की उत्पत्ति इसी प्रकार क्यों नहीं हो सकती?
४. उड़ने की आवश्यकता होने पर प्राणियों के पंख आने की बात कही जाती है परन्तु मनुष्य जब से उत्पन्न हुआ, उड़ने हेतु हवाई जहाज बनाने का प्रयत्न करता रहा है, परन्तु उसके पंख क्यों नहीं उगे? यदि ऐसा होता, तो हवाई जहाज के अविष्कार की आवश्यकता नहीं होती।
५. शीत प्रदेशों में शरीर पर लम्बे बाल विकसित होने की बात कही जाती है, तब शीत प्रधान देशों में होने वाले मनुष्यों के रीछ जैसे बाल क्यों नहीं उगे? उसे कम्बल आदि की आवश्यकता क्यों पड़ी?
६. जिराफ की गर्दन इसलिए लम्बी हुई कि वह धरती पर घास सूख जाने पर ऊपर पेड़ों की पत्तियां गर्दन ऊँची करके खाता था। जरा बताएं कि कितने वर्ष तक नीचे सूखा और पेड़ों की पत्तियां हरी रहीं? फिर बकरी आज भी पेड़ों पर दो पैर रखकर पत्तियां खाती है, उसकी गर्दन लम्बी क्यों नहीं हुई?
७. बंदर के पूंछ गायब होकर मनुष्य बन गया। जरा कोई बताये कि बंदर की पूंछ कैसे गायब हुई? क्या उसने पूंछ का उपयोग करना बंद कर दिया? कोई बताये कि बन्दर पूंछ का क्या उपयोग करता है और वह उपयोग उसने क्यों बंद किया? यदि ऐसा ही है तो मनुष्य के भी नाक, कान गायब होकर छिद्र ही रह सकते थे। मनुष्य लाखों वर्षोंसे से बाल और नाखून काटता आ रहा है, तब भी बराबर वापिस उगते आ रहे हैं, ऐसा क्यों?
८. सभी बंदरों का विकास होकर मानव क्यों नहीं बने? कुछ तो अमीबा के रूप में ही अब तक चले आ रहे हैं, और हम मनुष्य बन गये, यह क्या है?
९. कहते हैं कि सांपों के पहले पैर होते थे, धीरे-२ वे घिस कर गायब हो गये। जरा विचारों कि पैर कैसे गायब हुए, जबकि अन्य सभी पैर वाले प्राणियों के पैर बिल्कुल नहीं घिसे।
१०. बिना अस्थि वाले जानवरों से अस्थि वाले जानवर कैसे बने? उन्हें अस्थियों की क्या आवश्यकता पड़ी?
११. बंदर व मनुष्य के बीच बनने वाले प्राणियों की श्रंखला कहाँ गई?
१२. विकास मनुष्य पर जाकर क्यों रुक गया? किसने इसे विराम दिया? क्या उसे विकास की कोई
आवश्यकता नहीं है?
🚩बौद्धिक व भाषा सम्बन्धी विकास
1. कहते हैं कि मानव ने धीरे-2 बुद्धि का विकास कर लिया, तब प्रश्न है कि बन्दर व अन्य प्राणियों में बौद्धिक विकास क्यों नहीं हुआ?
2. मानव के जन्म के समय इस धरती पर केवल पशु पक्षी ही थे, तब उसने उनका ही व्यवहार क्यों नहीं सीखा? मानवीय व्यवहार का विकास कैसे हुआ? करोड़ों वनवासियों में अब तक विशेष बौद्धिक विकास क्यों नहीं हुआ?
3. गाय, भैंस, घोड़ा, भेड़, बकरी, ऊंट, हाथी करोड़ों वर्षों से मनुष्य के पालतू पशु रहे हैं पुनरपि उन्होंने न मानवीय भाषा सीखी और न मानवीय व्यवहार, तब मनुष्य में ही यह विकास कहाँ से हुआ?
4. दीपक से जलता पतंगा करोड़ों वर्षों में इतना भी बौद्धिक विकास नहीं कर सका कि स्वयं को जलने से रोक ले, और मानव बन्दर से इतना बुद्धिमान् बन गया कि मंगल की यात्रा करने को तैयार है? क्या इतना जानने की बुद्धि भी विकासवादियों में विकसित नहीं हुई ? पहले सपेरा सांप को बीन बजाकर पकड़ लेता था और आज भी वैसा ही करता है परन्तु सांप में इतने ज्ञान का विकास भी नहीं हुआ कि वह सपेरे की पकड़ में नहीं आये।
5. पहले मनुष्य बल, स्मरण शक्ति एवं शारीरिक प्रतिरोधी क्षमता की दृष्टी से वर्तमान की अपेक्षा बहुत अधिक समृद्ध था, आज यह ह्रास क्यों हुआ, जबकि विकास होना चाहिए था?
04 फरवरी 2022
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🚩कुछ वर्ष पूर्व पूर्व केन्द्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री माननीय डाॅ. सत्यपालसिंहजी के इस कथन कि मनुष्य की उत्पत्ति बन्दर से नहीं हुई, सम्पूर्ण भारत के बुद्धिजीवियों में हलचल मच रही थी । कुछ वैज्ञानिक सोच के महानुभाव इसे साम्प्रदायिक संकीर्णताजन्य रूढ़िवादी सोच की संज्ञा दे रहे थे। मैं उन महानुभावों से निवेदन करता हूँ कि मंत्रीजी का यह विचार रूढ़िवादी नहीं बल्कि सुदृढ़ तर्कों पर आधारित वैदिक विज्ञान का ही पक्ष है। ऐसा नहीं है कि विकासवाद का विरोध कुछ भारतीय विद्वान् ही करते हैं अपितु अनेक यूरोपियन वैज्ञानिक भी इसे नकारते आये हैं। मैं इसका विरोध करने वाले संसारभर के विकासवादियों से प्रश्न करना चाहता हूँ। ये प्रश्न प्रारम्भिक हैं, इनका उत्तर मिलने पर और प्रश्न किये जायेंगे :-
🚩शारीरिक विकास
१. विकासवादी अमीबा से लेकर विकसित होकर बन्दर पुनः शनैः-२ मनुष्य की उत्पत्ति मानते हैं। वे बताएं कि अमीबा की उत्पत्ति कैसे हुई?
२. यदि किसी अन्य ग्रह से जीवन आया, तो वहाँ उत्पत्ति कैसे हुई? जब वहाँ उत्पत्ति हो सकती है, तब इस पृथ्वी पर क्यों नहीं हो सकती?
३. यदि अमीबा की उत्पत्ति रासायनिक क्रियाओं से किसी ग्रह पर हुई, तब मनुष्य के शुक्राणु व अण्डाणु की उत्पत्ति इसी प्रकार क्यों नहीं हो सकती?
४. उड़ने की आवश्यकता होने पर प्राणियों के पंख आने की बात कही जाती है परन्तु मनुष्य जब से उत्पन्न हुआ, उड़ने हेतु हवाई जहाज बनाने का प्रयत्न करता रहा है, परन्तु उसके पंख क्यों नहीं उगे? यदि ऐसा होता, तो हवाई जहाज के अविष्कार की आवश्यकता नहीं होती।
५. शीत प्रदेशों में शरीर पर लम्बे बाल विकसित होने की बात कही जाती है, तब शीत प्रधान देशों में होने वाले मनुष्यों के रीछ जैसे बाल क्यों नहीं उगे? उसे कम्बल आदि की आवश्यकता क्यों पड़ी?
६. जिराफ की गर्दन इसलिए लम्बी हुई कि वह धरती पर घास सूख जाने पर ऊपर पेड़ों की पत्तियां गर्दन ऊँची करके खाता था। जरा बताएं कि कितने वर्ष तक नीचे सूखा और पेड़ों की पत्तियां हरी रहीं? फिर बकरी आज भी पेड़ों पर दो पैर रखकर पत्तियां खाती है, उसकी गर्दन लम्बी क्यों नहीं हुई?
७. बंदर के पूंछ गायब होकर मनुष्य बन गया। जरा कोई बताये कि बंदर की पूंछ कैसे गायब हुई? क्या उसने पूंछ का उपयोग करना बंद कर दिया? कोई बताये कि बन्दर पूंछ का क्या उपयोग करता है और वह उपयोग उसने क्यों बंद किया? यदि ऐसा ही है तो मनुष्य के भी नाक, कान गायब होकर छिद्र ही रह सकते थे। मनुष्य लाखों वर्षोंसे से बाल और नाखून काटता आ रहा है, तब भी बराबर वापिस उगते आ रहे हैं, ऐसा क्यों?
८. सभी बंदरों का विकास होकर मानव क्यों नहीं बने? कुछ तो अमीबा के रूप में ही अब तक चले आ रहे हैं, और हम मनुष्य बन गये, यह क्या है?
९. कहते हैं कि सांपों के पहले पैर होते थे, धीरे-२ वे घिस कर गायब हो गये। जरा विचारों कि पैर कैसे गायब हुए, जबकि अन्य सभी पैर वाले प्राणियों के पैर बिल्कुल नहीं घिसे।
१०. बिना अस्थि वाले जानवरों से अस्थि वाले जानवर कैसे बने? उन्हें अस्थियों की क्या आवश्यकता पड़ी?
११. बंदर व मनुष्य के बीच बनने वाले प्राणियों की श्रंखला कहाँ गई?
१२. विकास मनुष्य पर जाकर क्यों रुक गया? किसने इसे विराम दिया? क्या उसे विकास की कोई
आवश्यकता नहीं है?
🚩बौद्धिक व भाषा सम्बन्धी विकास
1. कहते हैं कि मानव ने धीरे-2 बुद्धि का विकास कर लिया, तब प्रश्न है कि बन्दर व अन्य प्राणियों में बौद्धिक विकास क्यों नहीं हुआ?
2. मानव के जन्म के समय इस धरती पर केवल पशु पक्षी ही थे, तब उसने उनका ही व्यवहार क्यों नहीं सीखा? मानवीय व्यवहार का विकास कैसे हुआ? करोड़ों वनवासियों में अब तक विशेष बौद्धिक विकास क्यों नहीं हुआ?
3. गाय, भैंस, घोड़ा, भेड़, बकरी, ऊंट, हाथी करोड़ों वर्षों से मनुष्य के पालतू पशु रहे हैं पुनरपि उन्होंने न मानवीय भाषा सीखी और न मानवीय व्यवहार, तब मनुष्य में ही यह विकास कहाँ से हुआ?
4. दीपक से जलता पतंगा करोड़ों वर्षों में इतना भी बौद्धिक विकास नहीं कर सका कि स्वयं को जलने से रोक ले, और मानव बन्दर से इतना बुद्धिमान् बन गया कि मंगल की यात्रा करने को तैयार है? क्या इतना जानने की बुद्धि भी विकासवादियों में विकसित नहीं हुई ? पहले सपेरा सांप को बीन बजाकर पकड़ लेता था और आज भी वैसा ही करता है परन्तु सांप में इतने ज्ञान का विकास भी नहीं हुआ कि वह सपेरे की पकड़ में नहीं आये।
5. पहले मनुष्य बल, स्मरण शक्ति एवं शारीरिक प्रतिरोधी क्षमता की दृष्टी से वर्तमान की अपेक्षा बहुत अधिक समृद्ध था, आज यह ह्रास क्यों हुआ, जबकि विकास होना चाहिए था?
6. संस्कृत भाषा, जो सर्वाधिक प्राचीन भाषा है, उस का व्याकरण वर्तमान विश्व की सभी भाषाओं की अपेक्षा अतीव समृद्ध व व्यवस्थित है, तब भाषा की दृष्टी से विकास के स्थान पर ह्रास क्यों हुआ?
7. प्राचीन ऋषियों के ग्रन्थों में भरे विज्ञान के सम्मुख वर्तमान विज्ञान अनेक दृष्टी से पीछे है, यह मैं अभी सिद्ध करने वाला हूँ, तब यह विज्ञान का ह्रास कैसे हुआ? पहले केवल अन्तःप्रज्ञा से सृष्टि का ज्ञान ऋषि कर लेते थे, तब आज वह ज्ञान अनेकों संसाधनों के द्वारा भी नहीं होता। यह यह उलटा क्रम कैसे हुआ?
🚩भला विचारें कि यदि पशु पक्षियों में बौद्धिक विकास हो जाता, तो एक भी पशु पक्षी मनष्य के वश में नहीं आता। यह कैसी अज्ञानता भरी सोच है, जो यह मानती है कि पशु पक्षियों में बौद्धिक विकास नहीं होता परन्तु शारीरिक विकास होकर उन्हें मनुष्य में बदल देता है और मनुष्यों में शारीरिक विकास नहीं होकर केवल भाषा व बौद्धिक विकास ही होता है। इसका कारण क्या विकासवादी मुझे बताएंगे।
🚩आज विकासवाद की भाषा बोलने वाले अथवा पौराणिक बन्धु श्री हनुमान् जी को बन्दर बताएं, उन्हें वाल्मीकीय रामायण का गम्भीर ज्ञान नहीं है। वस्तुतः वानर, ऋक्ष, गृध, किन्नर, असुर, देव, नाग आदि मनुष्य जाति के ही नाना वर्ग थे। ऐतिहासिक ग्रन्थों में प्रक्षेपों (मिलावट) को पहचानना परिश्रम साध्य व बुद्धिगम्य कार्य है।
🚩ऊधर जो प्रबुद्धजन किसी वैज्ञानिक पत्रिका में पेपर प्रकाशित होने को ही प्रामाणिकता की कसौटी मानते हैं, उनसे मेरा अति संक्षिप्त विनम्र निवेदन है-
1. बिग बैंग थ्योरी व इसके विरुद्ध अनादि ब्रह्माण्ड थ्योरी, दोनों ही पक्षों के पत्र इन पत्रिकाओं में छपते हैं, तब कौनसी थ्योरी को सत्य मानें?
2. ब्लैक होल व इसके विरुद्ध ब्लैक होल न होने की थ्योरीज् इन पत्रिकाओं में प्रकाषित हैं, तब किसे सत्य मानें?
3. ब्रह्माण्ड का प्रसार व इसके प्रसार न होने की थ्योरीज् दोनों ही प्रकाषित हैं, तब किसे सत्य मानें?
🚩ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। इस कारण यह आवश्यक नहीं है कि हमें एक वर्गविषेश से सत्यता का प्रमाण लेना अनिवार्य हो? हमारी वैदिक एवं भारतीय दृष्टी में उचित तर्क, पवित्र गम्भीर ऊहा एवं योगसाधना (व्यायाम नहीं) से प्राप्त निष्कर्ष वर्तमान संसाधनों के द्वारा किये गये प्रयोगों, प्रक्षेपणों व गणित से अधिक प्रामाणिक होते हैं। यदि प्रयोग, प्रेक्षण व गणित के साथ सुतर्क, ऊहा का साथ न हो, तो वैज्ञानिकों का सम्पूर्ण श्रम व्यर्थ हो सकता है। यही कारण है कि प्रयोग, परीक्षणों, प्रेक्षणों व गणित को आधार मानने वाले तथा इन संसाधनों पर प्रतिवर्ष खरबों डाॅलर खर्च करने वाले विज्ञान के क्षेत्र में नाना विरोधी थ्योरीज् मनमाने ढंग से फूल-फल रही हैं और सभी अपने को ही सत्य कह रही हैं। यदि विज्ञान सर्वत्र गणित व प्रयोगों को आधार मानता है, तब क्या कोई विकासवाद पर गणित व प्रयोगों का आश्रय लेकर दिखाएगा?
🚩 इस कारण मेरा सम्मान के योग्य वैज्ञानिकों एवं देश व संसार के प्रबुद्ध जनों से अनुरोध है कि प्रत्येक प्राचीन ज्ञान का अन्धविरोध तथा वर्तमान पद्धति का अन्धानुकरण कर बौद्धिक दासत्व का परिचय न दें। तार्किक दृष्टी का सहारा लेकर ही सत्य का ग्रहण व असत्य का परित्याग करने का प्रयास करें। हाँ, अपने साम्प्रदायिक रूढ़िवादी सोच को विज्ञान के समक्ष खड़े करने का प्रयास करना अवश्य आपत्तिजनक है।
- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक
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7. प्राचीन ऋषियों के ग्रन्थों में भरे विज्ञान के सम्मुख वर्तमान विज्ञान अनेक दृष्टी से पीछे है, यह मैं अभी सिद्ध करने वाला हूँ, तब यह विज्ञान का ह्रास कैसे हुआ? पहले केवल अन्तःप्रज्ञा से सृष्टि का ज्ञान ऋषि कर लेते थे, तब आज वह ज्ञान अनेकों संसाधनों के द्वारा भी नहीं होता। यह यह उलटा क्रम कैसे हुआ?
🚩भला विचारें कि यदि पशु पक्षियों में बौद्धिक विकास हो जाता, तो एक भी पशु पक्षी मनष्य के वश में नहीं आता। यह कैसी अज्ञानता भरी सोच है, जो यह मानती है कि पशु पक्षियों में बौद्धिक विकास नहीं होता परन्तु शारीरिक विकास होकर उन्हें मनुष्य में बदल देता है और मनुष्यों में शारीरिक विकास नहीं होकर केवल भाषा व बौद्धिक विकास ही होता है। इसका कारण क्या विकासवादी मुझे बताएंगे।
🚩आज विकासवाद की भाषा बोलने वाले अथवा पौराणिक बन्धु श्री हनुमान् जी को बन्दर बताएं, उन्हें वाल्मीकीय रामायण का गम्भीर ज्ञान नहीं है। वस्तुतः वानर, ऋक्ष, गृध, किन्नर, असुर, देव, नाग आदि मनुष्य जाति के ही नाना वर्ग थे। ऐतिहासिक ग्रन्थों में प्रक्षेपों (मिलावट) को पहचानना परिश्रम साध्य व बुद्धिगम्य कार्य है।
🚩ऊधर जो प्रबुद्धजन किसी वैज्ञानिक पत्रिका में पेपर प्रकाशित होने को ही प्रामाणिकता की कसौटी मानते हैं, उनसे मेरा अति संक्षिप्त विनम्र निवेदन है-
1. बिग बैंग थ्योरी व इसके विरुद्ध अनादि ब्रह्माण्ड थ्योरी, दोनों ही पक्षों के पत्र इन पत्रिकाओं में छपते हैं, तब कौनसी थ्योरी को सत्य मानें?
2. ब्लैक होल व इसके विरुद्ध ब्लैक होल न होने की थ्योरीज् इन पत्रिकाओं में प्रकाषित हैं, तब किसे सत्य मानें?
3. ब्रह्माण्ड का प्रसार व इसके प्रसार न होने की थ्योरीज् दोनों ही प्रकाषित हैं, तब किसे सत्य मानें?
🚩ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। इस कारण यह आवश्यक नहीं है कि हमें एक वर्गविषेश से सत्यता का प्रमाण लेना अनिवार्य हो? हमारी वैदिक एवं भारतीय दृष्टी में उचित तर्क, पवित्र गम्भीर ऊहा एवं योगसाधना (व्यायाम नहीं) से प्राप्त निष्कर्ष वर्तमान संसाधनों के द्वारा किये गये प्रयोगों, प्रक्षेपणों व गणित से अधिक प्रामाणिक होते हैं। यदि प्रयोग, प्रेक्षण व गणित के साथ सुतर्क, ऊहा का साथ न हो, तो वैज्ञानिकों का सम्पूर्ण श्रम व्यर्थ हो सकता है। यही कारण है कि प्रयोग, परीक्षणों, प्रेक्षणों व गणित को आधार मानने वाले तथा इन संसाधनों पर प्रतिवर्ष खरबों डाॅलर खर्च करने वाले विज्ञान के क्षेत्र में नाना विरोधी थ्योरीज् मनमाने ढंग से फूल-फल रही हैं और सभी अपने को ही सत्य कह रही हैं। यदि विज्ञान सर्वत्र गणित व प्रयोगों को आधार मानता है, तब क्या कोई विकासवाद पर गणित व प्रयोगों का आश्रय लेकर दिखाएगा?
🚩 इस कारण मेरा सम्मान के योग्य वैज्ञानिकों एवं देश व संसार के प्रबुद्ध जनों से अनुरोध है कि प्रत्येक प्राचीन ज्ञान का अन्धविरोध तथा वर्तमान पद्धति का अन्धानुकरण कर बौद्धिक दासत्व का परिचय न दें। तार्किक दृष्टी का सहारा लेकर ही सत्य का ग्रहण व असत्य का परित्याग करने का प्रयास करें। हाँ, अपने साम्प्रदायिक रूढ़िवादी सोच को विज्ञान के समक्ष खड़े करने का प्रयास करना अवश्य आपत्तिजनक है।
- आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक
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🚩 आशाराम बापू का एक और संकल्प
पूरा हुआ...
05 फरवरी 2022
azaadbharat.org
🚩मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में कुछ साल पूर्व हिन्दू संत आशारामजी बापू का सत्संग गुप्ता ग्राउण्ड में हुआ था तब बापू आशारामजी ने ही व्यासपीठ से कहा था कि नर्मदापुरम वालों, आप सब लोग मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चिट्ठी लिखना और अपनी चिट्ठी में मेरा नाम भी लिखना कि आशाराम बापू और नर्मदापुरम की जनता को इस्लामिक आततायी होशंगशाह के नाम पर बसे इस नगर के नाम पर आपत्ति है। इस नगर का मूल नाम पूर्व में "नर्मदापुरम" था जिसे अत्याचारी होशंगशाह ने होशंगाबाद कर दिया था जो आज भी हमें आततायी मुग़ल गुलामी व अत्याचार की याद दिलाता है। अतः आप सब लोग मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चिट्ठी लिखकर कहो कि होशंगाबाद का नाम बदलकर "नर्मदापुरम" कीजिये।
🚩उस समय नर्मदापुरम के लोगों ने बापू आशारामजी के कहे अनुसार मुख्यमंत्री शिवराज सिंहजी को चिट्ठियां भी लिखी थीं परंतु किसी भी शहर का नाम बदलने के लिए केंद्र सरकार से अनुमति लेनी होती है। जब केंद्र सरकार अनुमति देती है तब ही किसी शहर का नाम बदला जा सकता है। उस समय मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह की BJP सरकार थी और केंद्र में काँग्रेस की सरकार थी। शिवराजजी ने होशंगाबाद का नाम बदलने के लिए केंद्र की काँग्रेस सरकार के पास प्रस्ताव भेजा तो काँग्रेस सरकार ने नाम बदलने से मना कर दिया और बापू आशारामजी का संकल्प अधूरा ही रह गया। 2014 में केंद्र में मोदी सरकार आयी। लगभग 3 साल बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने मोदी सरकार को होशंगाबाद का नाम बदलने का प्रस्ताव भेजा था। उसके ठीक 1 साल बाद मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए और मध्यप्रदेश से BJP की सरकार चली गई। काँग्रेस की कमलनाथ सरकार आ गई।
🚩बापू आशारामजी का संकल्प तब भी अधूरा रह गया। 1.5 साल बाद ही काँग्रेस की सरकार गिर गई और मध्यप्रदेश में फिर से भाजपा की सरकार बन गई। कोरोना के चलते होशंगाबाद का नाम बदलने के प्रस्ताव पर कोई काम नहीं हुआ। 1 साल पहले होशंगाबाद संभाग को नर्मदापुरम कर दिया गया था और अब केंद्र सरकार ने होशंगाबाद शहर नाम भी "नर्मदापुरम" कर दिया है।
हिंदू संत आशाराम बापू का संकल्प आज पूरा हुआ। इसके लिए मुख्यमंत्री और नर्मदापुरम की धर्मप्रेमी जनता को धन्यवाद। - दुष्यंत साहू (पत्रकार-समाजसेवक)
🚩भारत में जिन स्थानों में लुटेरे, आक्रमणकारी मुगलों और अंग्रेजों के नाम से शहर, सड़कें हैं वहां से उनका नाम हटाकर भारतीय प्राचीन नाम रख लेना चाहिए ऐसी जनता की मांग है।
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पूरा हुआ...
05 फरवरी 2022
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🚩मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में कुछ साल पूर्व हिन्दू संत आशारामजी बापू का सत्संग गुप्ता ग्राउण्ड में हुआ था तब बापू आशारामजी ने ही व्यासपीठ से कहा था कि नर्मदापुरम वालों, आप सब लोग मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चिट्ठी लिखना और अपनी चिट्ठी में मेरा नाम भी लिखना कि आशाराम बापू और नर्मदापुरम की जनता को इस्लामिक आततायी होशंगशाह के नाम पर बसे इस नगर के नाम पर आपत्ति है। इस नगर का मूल नाम पूर्व में "नर्मदापुरम" था जिसे अत्याचारी होशंगशाह ने होशंगाबाद कर दिया था जो आज भी हमें आततायी मुग़ल गुलामी व अत्याचार की याद दिलाता है। अतः आप सब लोग मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चिट्ठी लिखकर कहो कि होशंगाबाद का नाम बदलकर "नर्मदापुरम" कीजिये।
🚩उस समय नर्मदापुरम के लोगों ने बापू आशारामजी के कहे अनुसार मुख्यमंत्री शिवराज सिंहजी को चिट्ठियां भी लिखी थीं परंतु किसी भी शहर का नाम बदलने के लिए केंद्र सरकार से अनुमति लेनी होती है। जब केंद्र सरकार अनुमति देती है तब ही किसी शहर का नाम बदला जा सकता है। उस समय मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह की BJP सरकार थी और केंद्र में काँग्रेस की सरकार थी। शिवराजजी ने होशंगाबाद का नाम बदलने के लिए केंद्र की काँग्रेस सरकार के पास प्रस्ताव भेजा तो काँग्रेस सरकार ने नाम बदलने से मना कर दिया और बापू आशारामजी का संकल्प अधूरा ही रह गया। 2014 में केंद्र में मोदी सरकार आयी। लगभग 3 साल बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने मोदी सरकार को होशंगाबाद का नाम बदलने का प्रस्ताव भेजा था। उसके ठीक 1 साल बाद मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए और मध्यप्रदेश से BJP की सरकार चली गई। काँग्रेस की कमलनाथ सरकार आ गई।
🚩बापू आशारामजी का संकल्प तब भी अधूरा रह गया। 1.5 साल बाद ही काँग्रेस की सरकार गिर गई और मध्यप्रदेश में फिर से भाजपा की सरकार बन गई। कोरोना के चलते होशंगाबाद का नाम बदलने के प्रस्ताव पर कोई काम नहीं हुआ। 1 साल पहले होशंगाबाद संभाग को नर्मदापुरम कर दिया गया था और अब केंद्र सरकार ने होशंगाबाद शहर नाम भी "नर्मदापुरम" कर दिया है।
हिंदू संत आशाराम बापू का संकल्प आज पूरा हुआ। इसके लिए मुख्यमंत्री और नर्मदापुरम की धर्मप्रेमी जनता को धन्यवाद। - दुष्यंत साहू (पत्रकार-समाजसेवक)
🚩भारत में जिन स्थानों में लुटेरे, आक्रमणकारी मुगलों और अंग्रेजों के नाम से शहर, सड़कें हैं वहां से उनका नाम हटाकर भारतीय प्राचीन नाम रख लेना चाहिए ऐसी जनता की मांग है।
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🚩वेलेंटाइन डे का इतिहास जान लेंगे तो छोड़ देंगे वेलेंटाइन मनाना
06 फरवरी 2022
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🚩 भारत में अधिकतर लोग नहीं जानते हैं कि वेलेंटाइन डे की शुरुआत कैसे हुई और यह क्यों मनाया जा रहा है। इससे हमें फायदा होगा या नुकसान, ये हमारी संस्कृति के अनुसार है कि नहीं- इस पर तनिक भी विचार न कर टीवी-सिनेमा मीडिया में दिखाई जाने वाली चीजों से प्रभावित होकर लोग उनकी नकल करने लग जाते हैं।
https://youtu.be/ZG7ipiM8x9M
🚩 आइये आज आपको वैलेंटाइन डे का सच्चा इतिहास बताते हैं...
🚩रोम के राजा क्लाउडियस ब्रह्मचर्य की महिमा से परिचित थे, इसलिए उन्होंने अपने सैनिकों को शादी करने के लिए मना किया था ताकि वे शारीरिक बल और मानसिक दक्षता से युद्ध में विजय प्राप्त कर सकें। रोम के चर्च के ईसाई धर्मगुरु वेलेंटाइन जो स्वयं ईसाई पादरी होने के कारण बाहर से नहीं दिखा सकते थे कि वे ब्रह्मचर्य के विरोधी हैं इसलिए पादरी वेलेंटाइन ने गुप्त ढंग से सैनिकों की शादियाँ कराईं। राजा को जब यह बात पता चली तो उन्हें दोषी घोषित किया और इस पादरी वेलेंटाइन को 14 फरवरी के दिन फाँसी दे दी गयी। सन् 496 से ईसाई पोप गैलेसियस ने उनकी याद में 14 फरवरी के दिन वैलेंटाइन डे मनाना शुरू किया। तब से लेकर अब तक यह प्रथा चली आ रही है।
🚩 एक बड़ी बात यह भी है कि वेलेंटाइन डे मनाने वाले लोग पादरी वेलेंटाइन का ही अपमान करते हैं, क्योंकि वे शादी के पहले ही अपने प्रेमास्पद को वेलेंटाइन कार्ड भेजकर उनसे प्रणय-संबंध स्थापित करने का प्रयास करते हैं। यदि पादरी वेलेंटाइन इससे सहमत होते तो वे शादियाँ कराते ही नहीं। तो ये था वेलेंटाइन डे का इतिहास और इसके पीछे का आधार।
🚩भारत में जब अंग्रेज आये तब वो लोग इस दिन को मनाते थे तो भारत के कुछ लोग जो अंग्रेजों के चाटुकार थे, मूर्ख और लालची थे वे लोग भी इसे मनाने लगे।
🚩भारत में अंग्रेज वेलेंटाइन डे इसलिए मना रहे थे ताकि भारत के लोगों का नैतिक पतन हो जिससे वो अंग्रेजों के सामने लड़ ही न पाएं और लंबे समय तक भारत को गुलाम बनाकर रखा जा सके।
🚩फिर अंग्रेज तो गये लेकिन विदेशी कम्पनियों ने सोचा कि हम अगर भारत में वैलेंटाइन डे को बढ़ावा देते हैं तो हमें अरबों-खरबों रुपये का फायदा होगा तो उन्होंने टीवी, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, अखबार, नॉवेल, सोशल मीडिया, आदि में खूब-प्रचार प्रसार किया जिससे उन्होंने महंगे ग्रीटिंग कार्ड्स, गिफ्ट्स, फूल चॉकलेट्स आदि से अरबों रुपए कमाए। इसके अलावा नशीले पदार्थ, ब्ल्यू फिल्म, गर्भ निरोधक साधन, पोर्नोग्राफी, उत्तेजक पोप म्यूजिक, सेक्स उत्तेजक दवाईयाँ बनाने वाली विदेशी कम्पनियां अपने आर्थिक लाभ हेतु समाज को चरित्रभ्रष्ट करने के लिए करोड़ों अरबों रूपये खर्च कर रही हैैं।
🚩वाणिज्य एवं उद्योग मंडल के एक सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 2016 में वेलेंटाइन डे से जुड़े सप्ताह के दौरान फूल, चॉकलेट, आदि विभिन्न उपहारों की बिक्री का कारोबार करीब 22,000 करोड़ रूपये था। इस बार 50,000 करोड़ रूपये से अधिक का कारोबार होने का अनुमान है। वस्तुत: वैलेंटाइन डे विदेशी बाजारीकरण व वासनापूर्ति को बढ़ावा देने वाला दिन है।
🚩अब ये वैलेंटाइन डे हमारे कुछ स्कूलों तथा कॉलजों में भी मनाया जा रहा है और हमारे यहाँ के लड़के-लड़कियाँ बिना सोचे-समझे एक दूसरे को वैलेंटाइन डे का कार्ड, गिफ्ट, फूल दे रहे हैं।
🚩यह सब विदेशी गन्दगी को देखते हुए हिन्दू संत आशारामजी बापू ने 2006 में 14 फरवरी को मातृ पितृ पूजन दिवस के रूप में मनाना शुरू किया जिसका अभी व्यापक रूप से प्रचार हो रहा है। भारत में उनके करोड़ों अनुयायी, आम जनता, हिन्दू संगठन और कई राज्यों की सरकारें, गांव-गांव, नगर-नगर में इस दिन को मातृ-पितृ पूजन दिवस के रूप में मना रहे हैं। विदेशों में भी उनके अनुयायी इस दिन को मातृ पितृ पूजन दिवस के रूप में मना रहे हैं।
🚩हिन्दू संत बापू आशारामजी का कहना है कि 14 फरवरी को पश्चिमी देशों की नकल कर भारत के युवक-युवतियाँ एक दूसरे को ग्रीटिंग कार्ड्स, फूल आदि देकर वैलेंटाइन डे मनाते हैं तो इस विनाशकारी डे के नाम पर कामविकार का विकास हो रहा है, जो आगे चलकर चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, खोखलापन,जल्दी बुढ़ापा और जल्दी मौत लाने वाला साबित होगा।
https://youtu.be/Zz8got7uUhk
🚩 बापूजी कहते हैं कि हजारों-हजारों युवक-युवतियां तबाही के रास्ते जा रहे हैं। वैलेंटाइन डे के बहाने 'आई लव यू' करते-करते लड़का-लड़की एक दूसरे को छुएंगे तो रज-वीर्य का नाश होगा, आने वाली संतति पर भी इसका बुरा असर पड़ता है और वर्तमान में वे बच्चे-बच्चियां भी तबाही के रास्ते हैं। लाखों-लाखों माता-पिताओं के हृदय की पीड़ा को देखते हुए तथा बच्चे-बच्चियों को इस विदेशी गंदगी से बचाकर भारतीय संस्कृति की सुगंध से सुसज्जित करना है। प्रेम दिवस जरूर मनायें लेकिन प्रेमदिवस में संयम और सच्चा विकास लाना चाहिए। युवक-युवती मिलेंगे तो
06 फरवरी 2022
azaadbharat.org
🚩 भारत में अधिकतर लोग नहीं जानते हैं कि वेलेंटाइन डे की शुरुआत कैसे हुई और यह क्यों मनाया जा रहा है। इससे हमें फायदा होगा या नुकसान, ये हमारी संस्कृति के अनुसार है कि नहीं- इस पर तनिक भी विचार न कर टीवी-सिनेमा मीडिया में दिखाई जाने वाली चीजों से प्रभावित होकर लोग उनकी नकल करने लग जाते हैं।
https://youtu.be/ZG7ipiM8x9M
🚩 आइये आज आपको वैलेंटाइन डे का सच्चा इतिहास बताते हैं...
🚩रोम के राजा क्लाउडियस ब्रह्मचर्य की महिमा से परिचित थे, इसलिए उन्होंने अपने सैनिकों को शादी करने के लिए मना किया था ताकि वे शारीरिक बल और मानसिक दक्षता से युद्ध में विजय प्राप्त कर सकें। रोम के चर्च के ईसाई धर्मगुरु वेलेंटाइन जो स्वयं ईसाई पादरी होने के कारण बाहर से नहीं दिखा सकते थे कि वे ब्रह्मचर्य के विरोधी हैं इसलिए पादरी वेलेंटाइन ने गुप्त ढंग से सैनिकों की शादियाँ कराईं। राजा को जब यह बात पता चली तो उन्हें दोषी घोषित किया और इस पादरी वेलेंटाइन को 14 फरवरी के दिन फाँसी दे दी गयी। सन् 496 से ईसाई पोप गैलेसियस ने उनकी याद में 14 फरवरी के दिन वैलेंटाइन डे मनाना शुरू किया। तब से लेकर अब तक यह प्रथा चली आ रही है।
🚩 एक बड़ी बात यह भी है कि वेलेंटाइन डे मनाने वाले लोग पादरी वेलेंटाइन का ही अपमान करते हैं, क्योंकि वे शादी के पहले ही अपने प्रेमास्पद को वेलेंटाइन कार्ड भेजकर उनसे प्रणय-संबंध स्थापित करने का प्रयास करते हैं। यदि पादरी वेलेंटाइन इससे सहमत होते तो वे शादियाँ कराते ही नहीं। तो ये था वेलेंटाइन डे का इतिहास और इसके पीछे का आधार।
🚩भारत में जब अंग्रेज आये तब वो लोग इस दिन को मनाते थे तो भारत के कुछ लोग जो अंग्रेजों के चाटुकार थे, मूर्ख और लालची थे वे लोग भी इसे मनाने लगे।
🚩भारत में अंग्रेज वेलेंटाइन डे इसलिए मना रहे थे ताकि भारत के लोगों का नैतिक पतन हो जिससे वो अंग्रेजों के सामने लड़ ही न पाएं और लंबे समय तक भारत को गुलाम बनाकर रखा जा सके।
🚩फिर अंग्रेज तो गये लेकिन विदेशी कम्पनियों ने सोचा कि हम अगर भारत में वैलेंटाइन डे को बढ़ावा देते हैं तो हमें अरबों-खरबों रुपये का फायदा होगा तो उन्होंने टीवी, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, अखबार, नॉवेल, सोशल मीडिया, आदि में खूब-प्रचार प्रसार किया जिससे उन्होंने महंगे ग्रीटिंग कार्ड्स, गिफ्ट्स, फूल चॉकलेट्स आदि से अरबों रुपए कमाए। इसके अलावा नशीले पदार्थ, ब्ल्यू फिल्म, गर्भ निरोधक साधन, पोर्नोग्राफी, उत्तेजक पोप म्यूजिक, सेक्स उत्तेजक दवाईयाँ बनाने वाली विदेशी कम्पनियां अपने आर्थिक लाभ हेतु समाज को चरित्रभ्रष्ट करने के लिए करोड़ों अरबों रूपये खर्च कर रही हैैं।
🚩वाणिज्य एवं उद्योग मंडल के एक सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 2016 में वेलेंटाइन डे से जुड़े सप्ताह के दौरान फूल, चॉकलेट, आदि विभिन्न उपहारों की बिक्री का कारोबार करीब 22,000 करोड़ रूपये था। इस बार 50,000 करोड़ रूपये से अधिक का कारोबार होने का अनुमान है। वस्तुत: वैलेंटाइन डे विदेशी बाजारीकरण व वासनापूर्ति को बढ़ावा देने वाला दिन है।
🚩अब ये वैलेंटाइन डे हमारे कुछ स्कूलों तथा कॉलजों में भी मनाया जा रहा है और हमारे यहाँ के लड़के-लड़कियाँ बिना सोचे-समझे एक दूसरे को वैलेंटाइन डे का कार्ड, गिफ्ट, फूल दे रहे हैं।
🚩यह सब विदेशी गन्दगी को देखते हुए हिन्दू संत आशारामजी बापू ने 2006 में 14 फरवरी को मातृ पितृ पूजन दिवस के रूप में मनाना शुरू किया जिसका अभी व्यापक रूप से प्रचार हो रहा है। भारत में उनके करोड़ों अनुयायी, आम जनता, हिन्दू संगठन और कई राज्यों की सरकारें, गांव-गांव, नगर-नगर में इस दिन को मातृ-पितृ पूजन दिवस के रूप में मना रहे हैं। विदेशों में भी उनके अनुयायी इस दिन को मातृ पितृ पूजन दिवस के रूप में मना रहे हैं।
🚩हिन्दू संत बापू आशारामजी का कहना है कि 14 फरवरी को पश्चिमी देशों की नकल कर भारत के युवक-युवतियाँ एक दूसरे को ग्रीटिंग कार्ड्स, फूल आदि देकर वैलेंटाइन डे मनाते हैं तो इस विनाशकारी डे के नाम पर कामविकार का विकास हो रहा है, जो आगे चलकर चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, खोखलापन,जल्दी बुढ़ापा और जल्दी मौत लाने वाला साबित होगा।
https://youtu.be/Zz8got7uUhk
🚩 बापूजी कहते हैं कि हजारों-हजारों युवक-युवतियां तबाही के रास्ते जा रहे हैं। वैलेंटाइन डे के बहाने 'आई लव यू' करते-करते लड़का-लड़की एक दूसरे को छुएंगे तो रज-वीर्य का नाश होगा, आने वाली संतति पर भी इसका बुरा असर पड़ता है और वर्तमान में वे बच्चे-बच्चियां भी तबाही के रास्ते हैं। लाखों-लाखों माता-पिताओं के हृदय की पीड़ा को देखते हुए तथा बच्चे-बच्चियों को इस विदेशी गंदगी से बचाकर भारतीय संस्कृति की सुगंध से सुसज्जित करना है। प्रेम दिवस जरूर मनायें लेकिन प्रेमदिवस में संयम और सच्चा विकास लाना चाहिए। युवक-युवती मिलेंगे तो
विनाश-दिवस बनेगा।
🚩इस दिन बच्चे-बच्चियाँ माता-पिता का पूजन करें और उनके सिर पर पुष्प रखें, प्रणाम करें तथा माता-पिता अपनी संतानों को प्रेम करें। संतान अपने माता-पिता के गले लगें। इससे वास्तविक प्रेम का विकास होगा।
🚩तुम भारत के लाल और भारत की लालियाँ (बेटियाँ) हो। प्रेमदिवस मनाओ, बच्चे माता-पिता का सम्मान करें और माता-पिता बच्चों को स्नेह करें। पाश्चात्य संस्कृति के लोग विनाश की ओर जा रहे हैं। वे लोग ऐसे दिवस मनाकर यौन सम्बन्धी रोगों का घर बन रहे हैं, अशांति की आग में तप रहे हैं। उनकी नकल भारत के बच्चे-बच्चियाँ न करें।
🚩आपको बता दें कि बापू आशारामजी ने इस तरीके से करोड़ों लोगों को वैलेंटाइन डे आदि विदेशी प्रथाओं से, व्यसन आदि से बचाया है, जिसके कारण विदेशी कंपनियों का अरबों-खरबों रुपये का घाटा हुआ है तथा इस नुकसान से बचने के लिए ही उन्होंने बापू आशारामजी को साज़िशों के जाल में फंसाकर जेल भेज दिया।
🚩हमारे शास्त्रों में माता-पिता को देवतुल्य माना गया है और इस संसार में अगर कोई हमें निःस्वार्थ और सच्चा प्रेम कर सकता है तो वो हमारे माता-पिता ही हो सकते हैं।
🚩तो क्यों न हम मानवमात्र के परम हितकारी हिन्दू संत आशारामजी बापू प्रेरित #14फरवरी_मातृ_पितृ_पूजन मनाकर अपने माता-पिता के सच्चे प्रेम का सम्मान करें और यौवन-धन, स्वास्थ्य और बुद्धि की सुरक्षा करें।
🚩आओ एक नयी दिशा की ओर कदम बढ़ाएं।
14 फरवरी को वेलेंटाइन डे नहीं, माता-पिता की पूजा करके उनका शुभ आशीष पाएं।
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🚩इस दिन बच्चे-बच्चियाँ माता-पिता का पूजन करें और उनके सिर पर पुष्प रखें, प्रणाम करें तथा माता-पिता अपनी संतानों को प्रेम करें। संतान अपने माता-पिता के गले लगें। इससे वास्तविक प्रेम का विकास होगा।
🚩तुम भारत के लाल और भारत की लालियाँ (बेटियाँ) हो। प्रेमदिवस मनाओ, बच्चे माता-पिता का सम्मान करें और माता-पिता बच्चों को स्नेह करें। पाश्चात्य संस्कृति के लोग विनाश की ओर जा रहे हैं। वे लोग ऐसे दिवस मनाकर यौन सम्बन्धी रोगों का घर बन रहे हैं, अशांति की आग में तप रहे हैं। उनकी नकल भारत के बच्चे-बच्चियाँ न करें।
🚩आपको बता दें कि बापू आशारामजी ने इस तरीके से करोड़ों लोगों को वैलेंटाइन डे आदि विदेशी प्रथाओं से, व्यसन आदि से बचाया है, जिसके कारण विदेशी कंपनियों का अरबों-खरबों रुपये का घाटा हुआ है तथा इस नुकसान से बचने के लिए ही उन्होंने बापू आशारामजी को साज़िशों के जाल में फंसाकर जेल भेज दिया।
🚩हमारे शास्त्रों में माता-पिता को देवतुल्य माना गया है और इस संसार में अगर कोई हमें निःस्वार्थ और सच्चा प्रेम कर सकता है तो वो हमारे माता-पिता ही हो सकते हैं।
🚩तो क्यों न हम मानवमात्र के परम हितकारी हिन्दू संत आशारामजी बापू प्रेरित #14फरवरी_मातृ_पितृ_पूजन मनाकर अपने माता-पिता के सच्चे प्रेम का सम्मान करें और यौवन-धन, स्वास्थ्य और बुद्धि की सुरक्षा करें।
🚩आओ एक नयी दिशा की ओर कदम बढ़ाएं।
14 फरवरी को वेलेंटाइन डे नहीं, माता-पिता की पूजा करके उनका शुभ आशीष पाएं।
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🚩आदिवासी घर-वापसी करके ईसाइयों के चंगुल से हो रहे हैं मुक्त
7 फरवरी 2022
azaadbharat.org
🚩डॉ. एनी बेसेन्ट ने कहा था कि उन्होंने 40 वर्षों तक विश्व के सभी बडे धर्मों का अध्ययन करके पाया कि हिन्दू धर्म के समान पूर्ण, महान और वैज्ञानिक धर्म कोई नहीं है।
🚩शिक्षा से अबतक दूर आदिवासियों में जैसे-जैसे शिक्षा की रौशनी फैल रही है, वे अपने समाज के प्रति होने वाले षड्यंत्रों को पहचानने लगे हैं। उन्हें अहसास होने लगा है कि उन्हें सुविधाओं और धन का लालच सिर्फ उनके धर्म को परिवर्तित कराने के उद्देश्य से दिया जा रहा है। जैसे-जैसे धर्मांतरित आदिवासी समाज में जागृति आ रही है, वे अपनी जड़ों की ओर लौटने लगे हैं।
🚩झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्यों में धर्मांतरण का खेल पूरी गंभीरता के साथ खेला जा रहा है। धर्मांतरण कराने वाले इन गिरोहों के चक्कर में भोले-भाले आदिवासी फँस जाते हैं। राज्य के मझगाँव में भी तीन साल पहले कुछ परिवारों ने ईसाई धर्म अपना लिया था। अब ये परिवार पूरे रीति-रिवाज के साथ अपने धर्म में वापस आ गए हैं।
सरना समाज के इन परिवारों को धर्मांतरण के बाद से ही घरवापसी कराने के प्रयास किए जा रहे थे। आदिवासी समाज युवा महासभा इन परिवारों को सरना धर्म में वापसी कराने का लगातार प्रयास कर रही थी। महासभा का कहना है कि यह बदलाव लोगों में अपने धर्म के प्रति प्रेम और चेतना के कारण हो रहा है।
🚩नवभारत टाइम्स के अनुसार, पश्चिमी सिंहभूम जिले के मझगाँव थाना क्षेत्र के तेतरिया पंचायत के सिरासाई मंगापाट गाँव के 3 परिवारों के 14 सदस्य ईसाईयत में धर्मांतरित हो गए थे। इनमें से 9 लोगों ने घरवापसी कर ली है, जबकि 5 लोग अभी ईसाई धर्म को मान रहे हैं।
🚩सरना धर्म में वापस आने वाले श्रीकांत बांकिरा, उनकी पत्नी, दो बेटी और एक बेटा शामिल हैं। वहीं, दूसरे परिवार के जामुन सिंह कुलडीह, उनकी पत्नी और एक बेटे ने घरवापसी की। तीसरे परिवार से सिर्फ 55 साल के घनश्याम कुलडीह ने घरवापसी की है, जबकि उनकी पत्नी, बेटा एवं बहू और दो पोतियों ने अभी घरवापसी नहीं की है।
🚩आदिवासी समाज युवा महासभा दिउरी (प्रमुख) नरेश पिंगुवा, सह उप-प्रमुख गोवर्धन पिंगुवा ने गाँव के देशाउली का शुद्धिकरण किया। कमेटी का कहना है कि अपने धर्म को छोड़कर अन्य धर्मों में गए लागों का स्वागत है। उन्होंने कहा कि जिस तरीके से उनके पूर्वज रहे, वही उनकी भी जीवनचर्या है।
https://twitter.com/OpIndia_in/status/1490422546218590217?t=cm_S0pwwnip5vsyMnIF6lg&s=19
🚩अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक
श्रीराम शर्मा आचार्य ने कहा था,
‘‘भारत में ईसाई पादरियों का धर्म-प्रचार हिन्दू धर्म को मिटाने का खुला षड्यंत्र है, जो कि एक लम्बे अरसे से चला आ रहा है। हिन्दुओं का तो यह धार्मिक कर्तव्य है कि वे ईसाइयों के षड्यंत्र से आत्मरक्षा में अपने तन-मन-धन को लगा दें और आज जो हिन्दुओं को लपेटती हुई ईसाइयत की लपट परोक्ष रूप से उनकी ओर बढ़ रही है, उसे यहीं पर बुझा दें । ऐसा करने से ही भारत में धर्म-निरपेक्षता, धार्मिक बंधुत्व तथा सच्चे लोकतंत्र की रक्षा हो सकेगी अन्यथा आजादी को पुनः खतरे की सम्भावना हो सकती है।’’
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🚩डॉ. एनी बेसेन्ट ने कहा था कि उन्होंने 40 वर्षों तक विश्व के सभी बडे धर्मों का अध्ययन करके पाया कि हिन्दू धर्म के समान पूर्ण, महान और वैज्ञानिक धर्म कोई नहीं है।
🚩शिक्षा से अबतक दूर आदिवासियों में जैसे-जैसे शिक्षा की रौशनी फैल रही है, वे अपने समाज के प्रति होने वाले षड्यंत्रों को पहचानने लगे हैं। उन्हें अहसास होने लगा है कि उन्हें सुविधाओं और धन का लालच सिर्फ उनके धर्म को परिवर्तित कराने के उद्देश्य से दिया जा रहा है। जैसे-जैसे धर्मांतरित आदिवासी समाज में जागृति आ रही है, वे अपनी जड़ों की ओर लौटने लगे हैं।
🚩झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्यों में धर्मांतरण का खेल पूरी गंभीरता के साथ खेला जा रहा है। धर्मांतरण कराने वाले इन गिरोहों के चक्कर में भोले-भाले आदिवासी फँस जाते हैं। राज्य के मझगाँव में भी तीन साल पहले कुछ परिवारों ने ईसाई धर्म अपना लिया था। अब ये परिवार पूरे रीति-रिवाज के साथ अपने धर्म में वापस आ गए हैं।
सरना समाज के इन परिवारों को धर्मांतरण के बाद से ही घरवापसी कराने के प्रयास किए जा रहे थे। आदिवासी समाज युवा महासभा इन परिवारों को सरना धर्म में वापसी कराने का लगातार प्रयास कर रही थी। महासभा का कहना है कि यह बदलाव लोगों में अपने धर्म के प्रति प्रेम और चेतना के कारण हो रहा है।
🚩नवभारत टाइम्स के अनुसार, पश्चिमी सिंहभूम जिले के मझगाँव थाना क्षेत्र के तेतरिया पंचायत के सिरासाई मंगापाट गाँव के 3 परिवारों के 14 सदस्य ईसाईयत में धर्मांतरित हो गए थे। इनमें से 9 लोगों ने घरवापसी कर ली है, जबकि 5 लोग अभी ईसाई धर्म को मान रहे हैं।
🚩सरना धर्म में वापस आने वाले श्रीकांत बांकिरा, उनकी पत्नी, दो बेटी और एक बेटा शामिल हैं। वहीं, दूसरे परिवार के जामुन सिंह कुलडीह, उनकी पत्नी और एक बेटे ने घरवापसी की। तीसरे परिवार से सिर्फ 55 साल के घनश्याम कुलडीह ने घरवापसी की है, जबकि उनकी पत्नी, बेटा एवं बहू और दो पोतियों ने अभी घरवापसी नहीं की है।
🚩आदिवासी समाज युवा महासभा दिउरी (प्रमुख) नरेश पिंगुवा, सह उप-प्रमुख गोवर्धन पिंगुवा ने गाँव के देशाउली का शुद्धिकरण किया। कमेटी का कहना है कि अपने धर्म को छोड़कर अन्य धर्मों में गए लागों का स्वागत है। उन्होंने कहा कि जिस तरीके से उनके पूर्वज रहे, वही उनकी भी जीवनचर्या है।
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श्रीराम शर्मा आचार्य ने कहा था,
‘‘भारत में ईसाई पादरियों का धर्म-प्रचार हिन्दू धर्म को मिटाने का खुला षड्यंत्र है, जो कि एक लम्बे अरसे से चला आ रहा है। हिन्दुओं का तो यह धार्मिक कर्तव्य है कि वे ईसाइयों के षड्यंत्र से आत्मरक्षा में अपने तन-मन-धन को लगा दें और आज जो हिन्दुओं को लपेटती हुई ईसाइयत की लपट परोक्ष रूप से उनकी ओर बढ़ रही है, उसे यहीं पर बुझा दें । ऐसा करने से ही भारत में धर्म-निरपेक्षता, धार्मिक बंधुत्व तथा सच्चे लोकतंत्र की रक्षा हो सकेगी अन्यथा आजादी को पुनः खतरे की सम्भावना हो सकती है।’’
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🚩 राष्ट्र संस्कृति की सेवा करने वालो पर इतना भी भेदभाव नहीं होना चाहिए
8 फ़रवरी 2022
azaadbharat.org
🚩 भारत में समाज, संस्कृति व राष्ट्र उत्थान के लिए कार्य करना गुनाह है- ऐसा जनता को लग रहा है, क्योंकि बड़े-बड़े अपराधियों को जमानत हासिल हो जाती है लेकिन कोई राष्ट्रहित के कार्य कर रहा है और उसपर षड्यंत्र के तहत जूठे आरोप लगे हैं फिर भी उनको बेल नहीं, जेल ही मिलती है। ऐसे कई उदाहरण हैं।
🚩 ऐसे कई नेता हैं जिन्होंने अरबों रुपये के घोटाले किये हैं और उनको आसानी से जमानत मिल गई है, दूसरी ओर जिन्होंने पूरा जीवन तपस्या व समाज, देश और संस्कृति के उत्थान के कार्य में बिताये, धर्मांतरण पर रोक लगाई- ऐसे 85 वर्षीय हिन्दू संत आशारामजी बापू 9 साल से जेल में हैं लेकिन उनको एक दिन के लिए भी जमानत नहीं मिल पाई। इसको लेकर जनता सोच रही है कि राष्ट्र व धर्म की सेवा करने की बजाय घोटाले करो तो पैसे भी मिलेंगे और आसानी से जमानत भी मिल जाएगी।
🚩 देशभर में कोरोना फैलानेवाले मौलाना साद को जमानत मिल गई, देश के 'टुकड़े' करने का नारा लगाने वाले कन्हैया कुमार को जमानत मिल गई, बलात्कार आरोपी बिशप फ्रेंको व तरुण तेजपाल को जमानत मिल गई, 65 गैर जमानती वारंट होने के बाद भी दिल्ली के इमाम बुखारी को आज तक अरेस्ट नहीं कर पाए, सोये हुए गरीबों को कुचलनेवाले सलमान खान को 1 घंटे में जमानत मिल गई, लेकिन भारतीय संस्कृति के उत्थान का कार्य करनेवाले 85 वर्षीय हिंदू संत आशारामजी बापू को 90साल से आज तक न्यायालय जमानत नहीं दे पाया।
🚩 आपको बता दें कि जिस केस में हिंदू संत आशारामजी बापू को सेशन कोर्ट ने सजा सुनाई है जब उनके केस को पढ़ते हैं तो उसमें साफ है कि जिस समय की तथाकथित घटना आरोप लगाने वाली लड़की ने बताई है वह उस समय अपने मित्र से फोन पर बात कर थी जिसकी कॉल डिटेल भी है और आशारामजी बापू एक कार्यक्रम में थे, जहां पर 50-60 लोग भी मौजूद थे जिन्होंने गवाही भी दी है; मेडिकल रिपोर्ट में भी लड़की को एक खरोंच तक नहीं आने का प्रमाण है और एफआईआर में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं है, केवल छेड़छाड़ का आरोप है।
🚩आपको ये भी बता दें कि बापू आशारामजी आश्रम में एक फैक्स भी आया था, जिसमें भेजनेवाले ने साफ लिखा था कि 50 करोड़ दो नहीं तो लड़की के केस में जेल जाने के लिए तैयार रहो।
https://twitter.com/SanganiUday/status/1053870700585377792?s=19
🚩बता दें कि स्वामी विवेकानंदजी के 100 साल बाद शिकागो में विश्व धर्मपरिषद में भारत का नेतृत्व हिंदू संत आसाराम बापू ने किया था। बच्चों को भारतीय संस्कृति के दिव्य संस्कार देने के लिए देश में 17000 बाल संस्कार खोल दिये थे, वेलेंटाइन डे की जगह मातृ-पितृ पूजन शुरू करवाया, क्रिसमस की जगह तुलसी पूजन शुरू करवाया, वैदिक गुरुकुल खोले, करोड़ों लोगों को व्यसनमुक्त किया, ऐसे अनेक भारतीय संस्कृति के उत्थान के कार्य किये हैं जो विस्तार से नहीं बता पा रहे हैं। इसके कारण आज वे जेल में हैं और उन्हें जमानत हासिल नहीं हो पा रही है।
सूत्रो से पता चला है की बापू आशारामजी के करोड़ों साधकों ने अब ठान लिया है की अब हमारे निर्दोष बापूजी की जो रिहाई करवाएगा उसको ही वोट मिलेगा, अब देखते है पार्टियां आगे क्या करती है?
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🚩 भारत में समाज, संस्कृति व राष्ट्र उत्थान के लिए कार्य करना गुनाह है- ऐसा जनता को लग रहा है, क्योंकि बड़े-बड़े अपराधियों को जमानत हासिल हो जाती है लेकिन कोई राष्ट्रहित के कार्य कर रहा है और उसपर षड्यंत्र के तहत जूठे आरोप लगे हैं फिर भी उनको बेल नहीं, जेल ही मिलती है। ऐसे कई उदाहरण हैं।
🚩 ऐसे कई नेता हैं जिन्होंने अरबों रुपये के घोटाले किये हैं और उनको आसानी से जमानत मिल गई है, दूसरी ओर जिन्होंने पूरा जीवन तपस्या व समाज, देश और संस्कृति के उत्थान के कार्य में बिताये, धर्मांतरण पर रोक लगाई- ऐसे 85 वर्षीय हिन्दू संत आशारामजी बापू 9 साल से जेल में हैं लेकिन उनको एक दिन के लिए भी जमानत नहीं मिल पाई। इसको लेकर जनता सोच रही है कि राष्ट्र व धर्म की सेवा करने की बजाय घोटाले करो तो पैसे भी मिलेंगे और आसानी से जमानत भी मिल जाएगी।
🚩 देशभर में कोरोना फैलानेवाले मौलाना साद को जमानत मिल गई, देश के 'टुकड़े' करने का नारा लगाने वाले कन्हैया कुमार को जमानत मिल गई, बलात्कार आरोपी बिशप फ्रेंको व तरुण तेजपाल को जमानत मिल गई, 65 गैर जमानती वारंट होने के बाद भी दिल्ली के इमाम बुखारी को आज तक अरेस्ट नहीं कर पाए, सोये हुए गरीबों को कुचलनेवाले सलमान खान को 1 घंटे में जमानत मिल गई, लेकिन भारतीय संस्कृति के उत्थान का कार्य करनेवाले 85 वर्षीय हिंदू संत आशारामजी बापू को 90साल से आज तक न्यायालय जमानत नहीं दे पाया।
🚩 आपको बता दें कि जिस केस में हिंदू संत आशारामजी बापू को सेशन कोर्ट ने सजा सुनाई है जब उनके केस को पढ़ते हैं तो उसमें साफ है कि जिस समय की तथाकथित घटना आरोप लगाने वाली लड़की ने बताई है वह उस समय अपने मित्र से फोन पर बात कर थी जिसकी कॉल डिटेल भी है और आशारामजी बापू एक कार्यक्रम में थे, जहां पर 50-60 लोग भी मौजूद थे जिन्होंने गवाही भी दी है; मेडिकल रिपोर्ट में भी लड़की को एक खरोंच तक नहीं आने का प्रमाण है और एफआईआर में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं है, केवल छेड़छाड़ का आरोप है।
🚩आपको ये भी बता दें कि बापू आशारामजी आश्रम में एक फैक्स भी आया था, जिसमें भेजनेवाले ने साफ लिखा था कि 50 करोड़ दो नहीं तो लड़की के केस में जेल जाने के लिए तैयार रहो।
https://twitter.com/SanganiUday/status/1053870700585377792?s=19
🚩बता दें कि स्वामी विवेकानंदजी के 100 साल बाद शिकागो में विश्व धर्मपरिषद में भारत का नेतृत्व हिंदू संत आसाराम बापू ने किया था। बच्चों को भारतीय संस्कृति के दिव्य संस्कार देने के लिए देश में 17000 बाल संस्कार खोल दिये थे, वेलेंटाइन डे की जगह मातृ-पितृ पूजन शुरू करवाया, क्रिसमस की जगह तुलसी पूजन शुरू करवाया, वैदिक गुरुकुल खोले, करोड़ों लोगों को व्यसनमुक्त किया, ऐसे अनेक भारतीय संस्कृति के उत्थान के कार्य किये हैं जो विस्तार से नहीं बता पा रहे हैं। इसके कारण आज वे जेल में हैं और उन्हें जमानत हासिल नहीं हो पा रही है।
सूत्रो से पता चला है की बापू आशारामजी के करोड़ों साधकों ने अब ठान लिया है की अब हमारे निर्दोष बापूजी की जो रिहाई करवाएगा उसको ही वोट मिलेगा, अब देखते है पार्टियां आगे क्या करती है?
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🚩 सावधान- वेलेंटाइन डे के बाद लाखों लड़कियों में कैंसर व बांझपन पाया गया!
9 फरवरी 2022
azaadbharat.org
🚩पश्चिमी देशों में 14 फरवरी को युवक-युवतियाँ एक दूसरे को ग्रीटिंग कार्ड्स, फूल आदि देकर वेलेन्टाइन डे मनाते हैं। यौन जीवन संबंधी परम्परागत नैतिक मूल्यों का त्याग करने वाले देशों की चारित्रिक सम्पदा नष्ट होने का मुख्य कारण ऐसे वेलेन्टाइन डे हैं जो लोगों को अनैतिक जीवन जीने को प्रोत्साहित करते हैं। इससे उन देशों का अधःपतन हुआ है। इससे जो समस्याएँ पैदा हुईं, उनको मिटाने के लिए वहाँ की सरकारों को स्कूलों में केवल संयम अभियानों पर करोड़ों डालर खर्च करने पर भी सफलता नहीं मिलती। अब यह कुप्रथा हमारे भारत में भी पैर जमा रही है। हमें अपने परम्परागत नैतिक मूल्यों की रक्षा करने के लिए ऐसे वेलेन्टाइन डे का बहिष्कार करना चाहिए। इन सभी से बचने के लिए हिंदू संत आसाराम बापू ने एक नयी पहल की है- 'मातृ-पितृ पूजन दिवस' मनाने की।
🚩पिछले साल वेलेंटाइन डे से बर्बादी
Panchtatv.org पर लिखा है कि वेलेंटाइन डे के बाद मुश्किल से 10 दिन के अंदर गायनेकोलोजिस्टों के पास लड़कियों की भीड़ लग जाती है और टीवी पर ऐड आता है- सिर्फ एक कैप्सूल से 72 घंटों के अंदर अनचाही प्रेगनेंसी से छुटकारा और बिना दिमाग की लड़कियां ऐसी गोलियां, जिनका न कम्पोजिशन पता होता है न कॉन्सेप्ट, बस निगल लेती हैं।
इन फेक गोलियों में आर्सेनिक भरा होता है जो 72 घंटों के अंदर सिर्फ बनने वाले भ्रूण को खत्म नहीं करता, बल्कि पूरा का पूरा fertility system ही करप्ट कर देता है!
शुरू में तो गोलियां खाकर सती-सावित्री बन जाती हैं लेकिन शादी के बाद पता चलता है- वे अब माँ नहीं बन सकतीं।
🚩पिछले साल के डाटा अनुसार 43 लाख लड़कियों में बांझपन और 30 लाख में कैंसर पाया गया।
🚩तो सबको पता चल जाता है इनका भूतकाल कैसा रहा है, पर कोई बोलता नहीं; जिन्दगी खुद अभिशाप बन जाती है।
सरकार हर साल मातृत्व-सुरक्षा, जननी सुरक्षा, 'बेटी बचाओ' जैसी योजनाओं के नाम पर करोड़ों रुपए फूंक देती है।
🚩आज हालत ये है कि 13-14 साल की कुछ बच्चिया बैग में i-pill लेकर घूम रही हैं। ये मरेंगी नहीं तो क्या होगा और ऐसी जहरीली चीज़ें valentine पर medical mafia भारतीय बाजारों में जानबूझकर उतारता है।
क्योंकि सबको पता है, भारत में बुद्धिजीवी वर्ग का कोई मान नहीं होता। पहले ये लड़कियों को जहर खिलाकर बीमारी देते हैं...फिर उसकी दवाई बेचकर अरबों रूपये कमाते हैं... जिसमें नेता भी कमाई करते हैं... क्योंकि ऐसे जहर को बेचने का परमिट और उनकी चेकिंग न करवाने का काम नेता ही कर सकते हैं।
🚩बेटी आपकी, तो उसकी जिम्मेदारी भी आपकी! इस valentine उसके पीछे और कोई ही नहीं बल्कि आप खुद सजग रहोगे, गलत देखने पर विरोध करोगे।
समय है- वेलेंटाइन जैसे कुकर्म को बढ़ावा देने वाली घटिया मानसिकता का त्याग कर अपने माता पिता का पूजन कर देश की युवा पीढी को सुदृढ़ बनाने का।
या फिर अगर चाहते हो- आपकी बेटियां जमके अय्याशी करें और बाद में कैंसर, बांझपन की वजह से मर जाएं और आपका बोझ हल्का हो तो एक ही बार में सल्फास दे दो।
समस्या आपके बेटी की अय्याशी और उसके मरने से नहीं, समस्या होती है, जो दवाइयां बेचकर विदेशी कम्पनियां हर साल हमारे देश का अरबों रुपया लुट लेती हैं उससे है।
shorturl.at/wMPUW
🚩वेलेंटाइन डे नहीं मातृ-पितृ पूजन दिवस
इस वेलेंटाइन डे को रोकने के लिए हिंदू संत आशाराम बापू ने बताया कि तुम भारत के लाल और भारत की लालियाँ (बेटियाँ) हो। प्रेमदिवस मनाओ, अपने माता-पिता का सम्मान करो और माता-पिता बच्चों को स्नेह करें।
वे बच्चों को प्रेरित करते हैं- करोगे न बेटे ऐसा! पाश्चात्य लोग विनाश की ओर जा रहे हैं। वे लोग ऐसे दिवस मनाकर यौन रोगों का घर बन रहे हैं, अशांति की आग में तप रहे हैं। उनकी नकल तो नहीं करोगे?
https://youtu.be/jyvhEQZXav0
मेरे प्यारे युवक-युवतियों और उनके माता-पिता! आप भारतवासी हैं। दूरदृष्टि के धनी ऋषि-मुनियों की संतान हैं। प्रेमदिवस (वेलेन्टाइन डे) के नाम पर बच्चों, युवान-युवतियों के ओज-तेज का नाश हो, ऐसे दिवस का त्याग करके माता-पिता और संतानों प्रभु के नाते एक-दूसरे को प्रेम करके अपने दिल के परमेश्वर को छलकने दें। काम विकार नहीं, रामरस, प्रभुप्रेम, प्रभुरस....
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। बालिकादेवो भव। कन्यादेवो भव। पुत्रदेवो भव।
माता पिता का पूजन करने से काम राम में बदलेगा, अहंकार प्रेम में बदलेगा, माता-पिता के आशीर्वाद से बच्चों का मंगल होगा।
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9 फरवरी 2022
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🚩पिछले साल वेलेंटाइन डे से बर्बादी
Panchtatv.org पर लिखा है कि वेलेंटाइन डे के बाद मुश्किल से 10 दिन के अंदर गायनेकोलोजिस्टों के पास लड़कियों की भीड़ लग जाती है और टीवी पर ऐड आता है- सिर्फ एक कैप्सूल से 72 घंटों के अंदर अनचाही प्रेगनेंसी से छुटकारा और बिना दिमाग की लड़कियां ऐसी गोलियां, जिनका न कम्पोजिशन पता होता है न कॉन्सेप्ट, बस निगल लेती हैं।
इन फेक गोलियों में आर्सेनिक भरा होता है जो 72 घंटों के अंदर सिर्फ बनने वाले भ्रूण को खत्म नहीं करता, बल्कि पूरा का पूरा fertility system ही करप्ट कर देता है!
शुरू में तो गोलियां खाकर सती-सावित्री बन जाती हैं लेकिन शादी के बाद पता चलता है- वे अब माँ नहीं बन सकतीं।
🚩पिछले साल के डाटा अनुसार 43 लाख लड़कियों में बांझपन और 30 लाख में कैंसर पाया गया।
🚩तो सबको पता चल जाता है इनका भूतकाल कैसा रहा है, पर कोई बोलता नहीं; जिन्दगी खुद अभिशाप बन जाती है।
सरकार हर साल मातृत्व-सुरक्षा, जननी सुरक्षा, 'बेटी बचाओ' जैसी योजनाओं के नाम पर करोड़ों रुपए फूंक देती है।
🚩आज हालत ये है कि 13-14 साल की कुछ बच्चिया बैग में i-pill लेकर घूम रही हैं। ये मरेंगी नहीं तो क्या होगा और ऐसी जहरीली चीज़ें valentine पर medical mafia भारतीय बाजारों में जानबूझकर उतारता है।
क्योंकि सबको पता है, भारत में बुद्धिजीवी वर्ग का कोई मान नहीं होता। पहले ये लड़कियों को जहर खिलाकर बीमारी देते हैं...फिर उसकी दवाई बेचकर अरबों रूपये कमाते हैं... जिसमें नेता भी कमाई करते हैं... क्योंकि ऐसे जहर को बेचने का परमिट और उनकी चेकिंग न करवाने का काम नेता ही कर सकते हैं।
🚩बेटी आपकी, तो उसकी जिम्मेदारी भी आपकी! इस valentine उसके पीछे और कोई ही नहीं बल्कि आप खुद सजग रहोगे, गलत देखने पर विरोध करोगे।
समय है- वेलेंटाइन जैसे कुकर्म को बढ़ावा देने वाली घटिया मानसिकता का त्याग कर अपने माता पिता का पूजन कर देश की युवा पीढी को सुदृढ़ बनाने का।
या फिर अगर चाहते हो- आपकी बेटियां जमके अय्याशी करें और बाद में कैंसर, बांझपन की वजह से मर जाएं और आपका बोझ हल्का हो तो एक ही बार में सल्फास दे दो।
समस्या आपके बेटी की अय्याशी और उसके मरने से नहीं, समस्या होती है, जो दवाइयां बेचकर विदेशी कम्पनियां हर साल हमारे देश का अरबों रुपया लुट लेती हैं उससे है।
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इस वेलेंटाइन डे को रोकने के लिए हिंदू संत आशाराम बापू ने बताया कि तुम भारत के लाल और भारत की लालियाँ (बेटियाँ) हो। प्रेमदिवस मनाओ, अपने माता-पिता का सम्मान करो और माता-पिता बच्चों को स्नेह करें।
वे बच्चों को प्रेरित करते हैं- करोगे न बेटे ऐसा! पाश्चात्य लोग विनाश की ओर जा रहे हैं। वे लोग ऐसे दिवस मनाकर यौन रोगों का घर बन रहे हैं, अशांति की आग में तप रहे हैं। उनकी नकल तो नहीं करोगे?
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मेरे प्यारे युवक-युवतियों और उनके माता-पिता! आप भारतवासी हैं। दूरदृष्टि के धनी ऋषि-मुनियों की संतान हैं। प्रेमदिवस (वेलेन्टाइन डे) के नाम पर बच्चों, युवान-युवतियों के ओज-तेज का नाश हो, ऐसे दिवस का त्याग करके माता-पिता और संतानों प्रभु के नाते एक-दूसरे को प्रेम करके अपने दिल के परमेश्वर को छलकने दें। काम विकार नहीं, रामरस, प्रभुप्रेम, प्रभुरस....
मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। बालिकादेवो भव। कन्यादेवो भव। पुत्रदेवो भव।
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🚩मातृ-पितृ पूजन दिवस क्यों मनाना चाहिए? वैज्ञानिकों ने क्या कहा?
10 फरवरी 2022
azaadbharat.org
🚩माता-पिता ने हमसे अधिक वर्ष दुनिया में गुजारे हैं, उनका अनुभव हमसे अधिक है और सद्गुरु ने जो महान अनुभव किया है उसकी तो हमारे छोटे अनुभव से तुलना ही नहीं हो सकती। इन तीनों के आदर से उनका अनुभव हमें सहज में ही मिलता है। अतः जो भी व्यक्ति अपनी उन्नति चाहता है, उस सज्जन को माता-पिता और सद्गुरु का आदर, पूजन, आज्ञापालन तो करना चाहिए, चाहिए और चाहिए ही!
🚩14 फरवरी को ʹवेलेंटाइन डेʹ मनाकर युवक-युवतियाँ प्रेमी-प्रेमिका के संबंध में फँसते हैं। वासना के कारण उनका ओज-तेज दिन दहाड़े नीचे के केन्द्रों में आकर नष्ट होता है। उस दिन ʹमातृ-पितृ पूजनʹ काम-विकार की बुराई व दुश्चरित्रता की दलदल से ऊपर उठाकर उज्ज्वल भविष्य, सच्चरित्रता, सदाचारी जीवन की ओर ले जायेगा।
🚩अनादिकाल से महापुरुषों ने अपने जीवन में माता-पिता और सद्गुरु का आदर-सम्मान किया है।
🚩कोई हिन्दू, ईसाई, मुसलमान, यहूदी नहीं चाहते कि हमारे बच्चे विकारों में खोखले हो जायें, माता-पिता व समाज की अवज्ञा करके विकारी और स्वार्थी जीवन जीकर तुच्छ हो जायें और बुढ़ापे में कराहते रहें। बच्चे माता-पिता व गुरुजन का सम्मान करें तो उनके हृदय से विशेष मंगलकारी आशीर्वाद उभरेगा, जो देश के इन भावी कर्णधारों को ʹवेलेन्टाइन डेʹ जैसे विकारों से बचाकर गणेशजी की नाईं इंद्रिय-संयम व आत्मसामर्थ्य विकसित करने में मददरूप होगा।
🚩माता, पिता एवं गुरुजनों का आदर करना हमारी संस्कृति की शोभा है। माता-पिता इतना आग्रह नहीं रखते कि संतानें उनका सम्मान-पूजन करें परंतु बुद्धिमान, शिष्ट संतानें माता-पिता का आदर पूजन करके उनके शुभ संकल्पमय आशीर्वाद से लाभ उठाती हैं।
🚩14 विकसित और विकासशील देशों के बच्चों व युवाओं पर किये गये सर्वेक्षण में भारतीय बच्चे व युवक सबसे अधिक सुखी और स्नेही पाये गये। लंदन व न्यूयार्क में प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इसका एक बड़ा कारण है- भारतीय लोगों का पारिवारिक स्नेह एवं निष्ठा! भारतीय युवाओं ने कहा, ʹउनकी जीवन में प्रसन्नता लाने तथा समस्याओं को सुलझाने में उनके माता-पिता का सर्वाधिक योगदान है।ʹ
🚩भारत में माता-पिता हर प्रकार से अपने बच्चों का पोषण करते हैं और माता-पिताओं का पोषण संतजनों से होता है। माता-पिता, बच्चे-युवक सभी को पोषित करने वाला हिंदू संत आशारामजी बापू द्वारा प्रेरित ʹमातृ-पितृ पूजन दिवसʹ इस निष्कर्ष की पुष्टि करता है।
🚩आधुनिक वैज्ञानिकों का मत
🚩माता-पिता के पूजने से अच्छी पढाई का क्या संबंध- ऐसा सोचने वालों को अमेरिका की ʹयूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनियाʹ के सर्जन व क्लिनिकल असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सू किम और ʹचिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल ऑफ फिलाडेल्फिया, पेंसिल्वेनियाʹ के एटर्नी एवं इमिग्रेशन स्पेशलिस्ट जेन किम के शोधपत्र के निष्कर्ष पर ध्यान देना चाहिए।
🚩अमेरिका में एशियन मूल के विद्यार्थी क्यों पढ़ाई में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करते हैं? इस विषय पर शोध करते हुए उन्होंने यह पाया कि वे अपने बड़ों का आदर करते हैं और माता-पिता की आज्ञा का पालन करते हैं तथा उज्ज्वल भविष्य-निर्माण के लिए गम्भीरता से श्रेष्ठ परिणाम पाने हेतु अध्ययन करते हैं।
🚩भारतीय संस्कृति के शास्त्रों और संतों में श्रद्धा न रखने वालों को भी अब उनकी इस बात को स्वीकार करके पाश्चात्य विद्यार्थियों को सिखाना पड़ता है कि माता-पिता का आदर करने वाले विद्यार्थी पढ़ाई में श्रेष्ठ परिणाम पा सकते हैं।
🚩जो विद्यार्थी माता-पिता का आदर करेंगे वे ʹवेलेन्टाइन डेʹ मनाकर अपना चरित्र भ्रष्ट नहीं कर सकते। संयम से उनके ब्रह्मचर्य की रक्षा होने से उनकी बुद्धिशक्ति विकसित होगी, जिससे उनकी पढ़ाई के परिणाम अच्छे आयेंगे। स्रोत: संत श्री आशारामजी बापू के प्रवचन से
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10 फरवरी 2022
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🚩माता-पिता ने हमसे अधिक वर्ष दुनिया में गुजारे हैं, उनका अनुभव हमसे अधिक है और सद्गुरु ने जो महान अनुभव किया है उसकी तो हमारे छोटे अनुभव से तुलना ही नहीं हो सकती। इन तीनों के आदर से उनका अनुभव हमें सहज में ही मिलता है। अतः जो भी व्यक्ति अपनी उन्नति चाहता है, उस सज्जन को माता-पिता और सद्गुरु का आदर, पूजन, आज्ञापालन तो करना चाहिए, चाहिए और चाहिए ही!
🚩14 फरवरी को ʹवेलेंटाइन डेʹ मनाकर युवक-युवतियाँ प्रेमी-प्रेमिका के संबंध में फँसते हैं। वासना के कारण उनका ओज-तेज दिन दहाड़े नीचे के केन्द्रों में आकर नष्ट होता है। उस दिन ʹमातृ-पितृ पूजनʹ काम-विकार की बुराई व दुश्चरित्रता की दलदल से ऊपर उठाकर उज्ज्वल भविष्य, सच्चरित्रता, सदाचारी जीवन की ओर ले जायेगा।
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🚩14 विकसित और विकासशील देशों के बच्चों व युवाओं पर किये गये सर्वेक्षण में भारतीय बच्चे व युवक सबसे अधिक सुखी और स्नेही पाये गये। लंदन व न्यूयार्क में प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इसका एक बड़ा कारण है- भारतीय लोगों का पारिवारिक स्नेह एवं निष्ठा! भारतीय युवाओं ने कहा, ʹउनकी जीवन में प्रसन्नता लाने तथा समस्याओं को सुलझाने में उनके माता-पिता का सर्वाधिक योगदान है।ʹ
🚩भारत में माता-पिता हर प्रकार से अपने बच्चों का पोषण करते हैं और माता-पिताओं का पोषण संतजनों से होता है। माता-पिता, बच्चे-युवक सभी को पोषित करने वाला हिंदू संत आशारामजी बापू द्वारा प्रेरित ʹमातृ-पितृ पूजन दिवसʹ इस निष्कर्ष की पुष्टि करता है।
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🚩वेलेंटाइन डे पर मातृ-पितृ पूजन दिवस से कैसे होगा समाज का उत्थान?
11 फरवरी 2022
azaadbharat.org
🚩सदियों से भारत वर्ष में 'मातृ देवो भव! पितृ देवो भव! आचार्य देवो भव!' का उद्घोष होता आया है। हमारी सनातन संस्कृति की नींव बहुत गहरी है। इसकी सुवास से सारा विश्व आन्दोलित हो सकता है। किन्तु आज देश में पाश्चात्य अंधानुकरण इस कदर फैल चुका है की युवा पीढ़ी को भौतिकवाद के सिवा कुछ सूझता ही नहीं।
🚩फैशनपरस्ती करना, फिल्मों, क्लबों में जाना, पार्टी-डांस करना, नशाखोरी करना, मनमानी में पैसे बर्बाद करना इतने तक ही नई पीढी का जीवन सीमित हो चुका है। हमारा समाज इससे प्रभावित हो रहा है। आज कितने घरों में माता-पिता या बुजुर्गों का आदर होता है? कितने घरों में नवजवान अपने परिवार और समाज के प्रति दायित्व को समझते हैं? इसपर विचार करें तो आप को हमारी सामाजिक स्थिति पर खेद होगा।
🚩आजकल ज्यादातर घरों में माता-पिता को नजरअंदाज किया जाता है। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे घरखर्च के लिए निश्चित राशि देते हैं, व्याधियाँ होते हुए भी नाती-पोतों को संभालते हैं। यहाँ तक कि नौजवान घर के दैनिक कार्यों की जिम्मेदारी भी अपने बुज़ुर्गों पर डाल नौकरी-धंधे पर निकल जाते हैं। क्या यह उनकी उपेक्षा नहीं है? उनका शोषण नहीं?
🚩इसी कड़ी में 14 फरवरी को वैलेंटाईन-डे का उत्सव मनाना भी मैं अपने ज्येष्ठों की उपेक्षा समझती हूँ। इस तथाकथित उत्सव के प्रभाव में समाज और खंडित होता जा रहा है। ऐसे उच्छृंखल एवं उत्तेजक पर्व को मनाने से क्या हमारी संतानें हमसे दूर नहीं जा रही? युवा पीढ़ी के इस नैतिक पतन के बाद क्या दया, प्रेम, आदर और कर्तव्यनिष्ठता के दैविक भाव उनमें पनप सकेंगे?
🚩समाज को सही मायने में ऊर्ध्वगामी करने के प्रकल्प संतों के ही होते हैं। उनके उपदेश और आदर्श जीवनशैली हमारे प्रेरणास्रोत हैं। जो समाज से कुछ न लेकर भी उसकी मंगलकामना करते हैं, दीनों को आश्रय देते हैं और युवाओं को उत्साह, वे ही हमारे सामाजिक-संरचना के आधार हैं। फिर उनकी अनसुनी करके, उन्हें ही कष्ट देकर हमारा समाज कैसे ऊपर उठ सकता है। अपने पूज्यों की बात हमें माननी चाहिए। ऐसे ही एक संतात्मा श्री आशारामजी बापू ने वैलेन्टाईन-डे के प्रभाव से समाज को मुक्त करने के लिए मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाने का आह्वान किया। उनका यह लोक-मांगल्य का संकल्प आज एक विश्वयापी अभियान बन चुका है। देश-विदेश के अधिनायक, नेता और नागरिक इसका समर्थन करते हैं। आप mppd.ashram.org की वेबसाईट पर जाकर अनेकों प्रमाण देख सकते हैं।
🚩आप सभी पाठकों से मैं भी यह निवेदन करती हूँ कि 14 फरवरी को राष्ट्रहित एवं समाज-हित की दृष्टि से आप भी अपने परिवार में मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाएँ और अपने बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त करें। आईये अपनी संस्कृति के बल से विश्वपटल पर भारत को अग्रणी बनाएँ। लेखिका– रेणुका हरने
🚩भारत में वैलेंटाइन डे की गंदगी अपने व्यापार का स्तर बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कम्पनियां लेकर आई हैं और वो ही कम्पनियां मीडिया में पैसा देकर वैलेंटाइन डे का खूब प्रचार प्रसार करवाती हैं। जिसके कारण उनका व्यापार लाखों नहीं, करोड़ों नहीं, अरबों नहीं बल्कि खरबों में हो जाता है, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया जनवरी से ही वैलेंटाइन डे यानि पश्चिमी संस्कृति का प्रचार करने लगता है, जिसके कारण विदेशी कम्पनियों के गिफ्ट, गर्भनिरोधक सामग्री, नशीले पदार्थ आदि 10 गुना बिकते हैं और उन्हें खरबों रुपये का फायदा होता है।
🚩वैलेंटाइन डे से युवाओं का अत्यधिक पतन हो रहा है इसलिए अब तो ऐसा समय आ गया है कि वैलेंटाइन डे की जगह लोगों ने अभी से 14 फरवरी के दिन "मातृ-पितृ पूजन दिवस" निमित्त मातृ-पितृ पूजन कार्यक्रम शुरू कर दिया है।
https://twitter.com/Asharamjiashrm?s=09
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🚩आजकल ज्यादातर घरों में माता-पिता को नजरअंदाज किया जाता है। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे घरखर्च के लिए निश्चित राशि देते हैं, व्याधियाँ होते हुए भी नाती-पोतों को संभालते हैं। यहाँ तक कि नौजवान घर के दैनिक कार्यों की जिम्मेदारी भी अपने बुज़ुर्गों पर डाल नौकरी-धंधे पर निकल जाते हैं। क्या यह उनकी उपेक्षा नहीं है? उनका शोषण नहीं?
🚩इसी कड़ी में 14 फरवरी को वैलेंटाईन-डे का उत्सव मनाना भी मैं अपने ज्येष्ठों की उपेक्षा समझती हूँ। इस तथाकथित उत्सव के प्रभाव में समाज और खंडित होता जा रहा है। ऐसे उच्छृंखल एवं उत्तेजक पर्व को मनाने से क्या हमारी संतानें हमसे दूर नहीं जा रही? युवा पीढ़ी के इस नैतिक पतन के बाद क्या दया, प्रेम, आदर और कर्तव्यनिष्ठता के दैविक भाव उनमें पनप सकेंगे?
🚩समाज को सही मायने में ऊर्ध्वगामी करने के प्रकल्प संतों के ही होते हैं। उनके उपदेश और आदर्श जीवनशैली हमारे प्रेरणास्रोत हैं। जो समाज से कुछ न लेकर भी उसकी मंगलकामना करते हैं, दीनों को आश्रय देते हैं और युवाओं को उत्साह, वे ही हमारे सामाजिक-संरचना के आधार हैं। फिर उनकी अनसुनी करके, उन्हें ही कष्ट देकर हमारा समाज कैसे ऊपर उठ सकता है। अपने पूज्यों की बात हमें माननी चाहिए। ऐसे ही एक संतात्मा श्री आशारामजी बापू ने वैलेन्टाईन-डे के प्रभाव से समाज को मुक्त करने के लिए मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाने का आह्वान किया। उनका यह लोक-मांगल्य का संकल्प आज एक विश्वयापी अभियान बन चुका है। देश-विदेश के अधिनायक, नेता और नागरिक इसका समर्थन करते हैं। आप mppd.ashram.org की वेबसाईट पर जाकर अनेकों प्रमाण देख सकते हैं।
🚩आप सभी पाठकों से मैं भी यह निवेदन करती हूँ कि 14 फरवरी को राष्ट्रहित एवं समाज-हित की दृष्टि से आप भी अपने परिवार में मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाएँ और अपने बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त करें। आईये अपनी संस्कृति के बल से विश्वपटल पर भारत को अग्रणी बनाएँ। लेखिका– रेणुका हरने
🚩भारत में वैलेंटाइन डे की गंदगी अपने व्यापार का स्तर बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कम्पनियां लेकर आई हैं और वो ही कम्पनियां मीडिया में पैसा देकर वैलेंटाइन डे का खूब प्रचार प्रसार करवाती हैं। जिसके कारण उनका व्यापार लाखों नहीं, करोड़ों नहीं, अरबों नहीं बल्कि खरबों में हो जाता है, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया जनवरी से ही वैलेंटाइन डे यानि पश्चिमी संस्कृति का प्रचार करने लगता है, जिसके कारण विदेशी कम्पनियों के गिफ्ट, गर्भनिरोधक सामग्री, नशीले पदार्थ आदि 10 गुना बिकते हैं और उन्हें खरबों रुपये का फायदा होता है।
🚩वैलेंटाइन डे से युवाओं का अत्यधिक पतन हो रहा है इसलिए अब तो ऐसा समय आ गया है कि वैलेंटाइन डे की जगह लोगों ने अभी से 14 फरवरी के दिन "मातृ-पितृ पूजन दिवस" निमित्त मातृ-पितृ पूजन कार्यक्रम शुरू कर दिया है।
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🚩मातृ-पितृ पूजन का इतिहास एवं माँ-बाप की महिमा जानें, कैसे करें मातृ-पितृ पूजन?
12 फरवरी 2022
azaadbharat.org
🚩एक बार भगवान शंकर के यहाँ उनके दोनों पुत्रों में होड़ लगी कि कौन बड़ा?
निर्णय लेने के लिए दोनों गये शिव-पार्वती के पास। शिव-पार्वती ने कहाः जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले पहुँचेगा, उसीका बड़प्पन माना जाएगा।
कार्तिकेय तुरन्त अपने वाहन मयूर पर निकल गये पृथ्वी की परिक्रमा करने। गणपतिजी चुपके-से एकांत में चले गये। थोड़ी देर शांत होकर उपाय खोजा तो झट से उन्हें उपाय मिल गया। जो ध्यान करते हैं, शांत बैठते हैं उन्हें अंतर्यामी परमात्मा सत्प्रेरणा देते हैं। अतः किसी कठिनाई के समय घबराना नहीं चाहिए बल्कि भगवान का ध्यान करके थोड़ी देर शांत बैठो तो आपको जल्द ही उस समस्या का समाधान मिल जायेगा।
फिर गणपतिजी आये शिव-पार्वती के पास। माता-पिता का हाथ पकड़ कर दोनों को ऊँचे आसन पर बिठाया, पत्र-पुष्प से उनके श्रीचरणों की पूजा की और प्रदक्षिणा करने लगे। एक चक्कर पूरा हुआ तो प्रणाम किया... दूसरा चक्कर लगाकर प्रणाम किया... इस प्रकार माता-पिता की सात प्रदक्षिणा कर ली।
शिव-पार्वती ने पूछाः वत्स! ये प्रदक्षिणाएँ क्यों की?
गणपतिजीः सर्वतीर्थमयी माता... सर्वदेवमयो पिता... सारी पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो पुण्य होता है, वही पुण्य माता की प्रदक्षिणा करने से हो जाता है, यह शास्त्रवचन है। पिता का पूजन करने से सब देवताओं का पूजन हो जाता है। पिता देवस्वरूप हैं। अतः आपकी परिक्रमा करके मैंने संपूर्ण पृथ्वी की सात परिक्रमाएँ कर लीं हैं। तब से गणपतिजी प्रथम पूज्य हो गये।
🚩शिव-पुराण में आता हैः
मातापित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रक्रान्तिं च करोति यः।
तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम्।।
"जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी-परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है।"
"प्रेम दिवस जरूर मनायें लेकिन प्रेम दिवस में संयम और सच्चा विकास लाना चाहिए।" वेलेंटाइन डे की जगह मातृ-पितृ पूजन मनाना चाहिए। बता दें कि साल 2006 से वेलेंटाइन डे की जगह मातृ-पितृ पूजन शुरू किया गया था जो आज करोड़ों लोगों द्वारा मनाया जा रहा है।
🚩14 फरवरी को माता-पिता के पूजन की विधिः
माता-पिता को स्वच्छ तथा ऊँचे आसन पर बिठायें।
आसने स्थापिते ह्यत्र पूजार्थं भवरोरिह।
भवन्तौ संस्थितौ तातौ पूर्यतां मे मनोरथः।।
अर्थात् ʹहे मेरे माता पिता ! आपके पूजन के लिए यह आसन मैंने स्थापित किया है। इसे आप ग्रहण करें और मेरा मनोरथ पूर्ण करें।ʹ
बच्चे-बच्चियाँ माता-पिता के माथे पर कुंकुम का तिलक करें। तत्पश्चात् माता-पिता के सिर पर पुष्प एवं अक्षत रखें तथा फूलमाला पहनायें। अब माता-पिता की सात परिक्रमा करें। इससे उन्हें पृथ्वी परिक्रमा का फल प्राप्त होता है।
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे।।
बच्चे-बच्चियाँ माता-पिता को झुककर विधिवत् प्रणाम करें।
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्।।
अर्थात् जो माता पिता और गुरु जनों को प्रणाम करता है और उनकी सेवा करता है, उसकी आयु, विद्या, यश और बल चारों बढ़ते हैं। (मनुस्मृतिः 2.121)
आरतीः बच्चे-बच्चियाँ थाली में दीपक जलाकर माता-पिता की आरती करें और अपने माता-पिता एवं गुरु में ईश्वरीय भाव जगाते हुए उनकी सेवा करने का दृढ़ संकल्प करें।
दीपज्योतिः परं ब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोઽस्तु ते।।
(आरती की तर्ज - ૐ जय जगदीश हरे...)
ૐ जय जय मात-पिता, प्रभु गुरु जी मात-पिता।
सद्भाव देख तुम्हारा-2, मस्तक झुक जाता।। ૐ जय जय मात-पिता...
कितने कष्ट उठाये हमको जनम दिया, मइया पाला-बड़ा किया।
सुख देती, दुःख सहती-2, पालनहारी माँ।। ૐ जय जय मात-पिता...
अनुशासित कर आपने उन्नत हमें किया, पिता आपने जो है दिया।
कैसे ऋण चुकाऊँ -2, कुछ न समझ आता।। ૐ जय जय मात-पिता...
सर्वतीर्थमयी माता सर्व देवमय पिता, ૐ सर्वदेवमय पिता।
जो कोई इनको पूजे-2, पूजित हो जाता।। ૐ जय जय मात-पिता...
मात-पिता की पूजा गणेशजी ने की, श्रीगणेशजी ने की।
सर्वप्रथम गणपति को-2, ही पूजा जाता।। ૐ जय जय मात-पिता...
बलिहारी सदगुरु की मारग दिखा दिया, सच्चा मारग दिखा दिया।
मातृ-पितृ पूजन कर–2, जग जय जय गाता।। ૐ जय जय मात-पिता...
मात-पिता प्रभु गुरु की आरती जो गाता, है प्रेम सहित गाता।
वो संयमी हो जाता, सदाचारी हो जाता, भव से तर जाता।। ૐ जय जय मात-पिता...
लफंगे-लफंगियों की नकल छोड़, गुरु सा संयमी होता, गणेश सा संयमी होता।
स्वयं आत्मसुख पाता-2, औरों को भी पवाता।। ૐ जय जय मात-पिता..
12 फरवरी 2022
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🚩एक बार भगवान शंकर के यहाँ उनके दोनों पुत्रों में होड़ लगी कि कौन बड़ा?
निर्णय लेने के लिए दोनों गये शिव-पार्वती के पास। शिव-पार्वती ने कहाः जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले पहुँचेगा, उसीका बड़प्पन माना जाएगा।
कार्तिकेय तुरन्त अपने वाहन मयूर पर निकल गये पृथ्वी की परिक्रमा करने। गणपतिजी चुपके-से एकांत में चले गये। थोड़ी देर शांत होकर उपाय खोजा तो झट से उन्हें उपाय मिल गया। जो ध्यान करते हैं, शांत बैठते हैं उन्हें अंतर्यामी परमात्मा सत्प्रेरणा देते हैं। अतः किसी कठिनाई के समय घबराना नहीं चाहिए बल्कि भगवान का ध्यान करके थोड़ी देर शांत बैठो तो आपको जल्द ही उस समस्या का समाधान मिल जायेगा।
फिर गणपतिजी आये शिव-पार्वती के पास। माता-पिता का हाथ पकड़ कर दोनों को ऊँचे आसन पर बिठाया, पत्र-पुष्प से उनके श्रीचरणों की पूजा की और प्रदक्षिणा करने लगे। एक चक्कर पूरा हुआ तो प्रणाम किया... दूसरा चक्कर लगाकर प्रणाम किया... इस प्रकार माता-पिता की सात प्रदक्षिणा कर ली।
शिव-पार्वती ने पूछाः वत्स! ये प्रदक्षिणाएँ क्यों की?
गणपतिजीः सर्वतीर्थमयी माता... सर्वदेवमयो पिता... सारी पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो पुण्य होता है, वही पुण्य माता की प्रदक्षिणा करने से हो जाता है, यह शास्त्रवचन है। पिता का पूजन करने से सब देवताओं का पूजन हो जाता है। पिता देवस्वरूप हैं। अतः आपकी परिक्रमा करके मैंने संपूर्ण पृथ्वी की सात परिक्रमाएँ कर लीं हैं। तब से गणपतिजी प्रथम पूज्य हो गये।
🚩शिव-पुराण में आता हैः
मातापित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रक्रान्तिं च करोति यः।
तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम्।।
"जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी-परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है।"
"प्रेम दिवस जरूर मनायें लेकिन प्रेम दिवस में संयम और सच्चा विकास लाना चाहिए।" वेलेंटाइन डे की जगह मातृ-पितृ पूजन मनाना चाहिए। बता दें कि साल 2006 से वेलेंटाइन डे की जगह मातृ-पितृ पूजन शुरू किया गया था जो आज करोड़ों लोगों द्वारा मनाया जा रहा है।
🚩14 फरवरी को माता-पिता के पूजन की विधिः
माता-पिता को स्वच्छ तथा ऊँचे आसन पर बिठायें।
आसने स्थापिते ह्यत्र पूजार्थं भवरोरिह।
भवन्तौ संस्थितौ तातौ पूर्यतां मे मनोरथः।।
अर्थात् ʹहे मेरे माता पिता ! आपके पूजन के लिए यह आसन मैंने स्थापित किया है। इसे आप ग्रहण करें और मेरा मनोरथ पूर्ण करें।ʹ
बच्चे-बच्चियाँ माता-पिता के माथे पर कुंकुम का तिलक करें। तत्पश्चात् माता-पिता के सिर पर पुष्प एवं अक्षत रखें तथा फूलमाला पहनायें। अब माता-पिता की सात परिक्रमा करें। इससे उन्हें पृथ्वी परिक्रमा का फल प्राप्त होता है।
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे।।
बच्चे-बच्चियाँ माता-पिता को झुककर विधिवत् प्रणाम करें।
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्।।
अर्थात् जो माता पिता और गुरु जनों को प्रणाम करता है और उनकी सेवा करता है, उसकी आयु, विद्या, यश और बल चारों बढ़ते हैं। (मनुस्मृतिः 2.121)
आरतीः बच्चे-बच्चियाँ थाली में दीपक जलाकर माता-पिता की आरती करें और अपने माता-पिता एवं गुरु में ईश्वरीय भाव जगाते हुए उनकी सेवा करने का दृढ़ संकल्प करें।
दीपज्योतिः परं ब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोઽस्तु ते।।
(आरती की तर्ज - ૐ जय जगदीश हरे...)
ૐ जय जय मात-पिता, प्रभु गुरु जी मात-पिता।
सद्भाव देख तुम्हारा-2, मस्तक झुक जाता।। ૐ जय जय मात-पिता...
कितने कष्ट उठाये हमको जनम दिया, मइया पाला-बड़ा किया।
सुख देती, दुःख सहती-2, पालनहारी माँ।। ૐ जय जय मात-पिता...
अनुशासित कर आपने उन्नत हमें किया, पिता आपने जो है दिया।
कैसे ऋण चुकाऊँ -2, कुछ न समझ आता।। ૐ जय जय मात-पिता...
सर्वतीर्थमयी माता सर्व देवमय पिता, ૐ सर्वदेवमय पिता।
जो कोई इनको पूजे-2, पूजित हो जाता।। ૐ जय जय मात-पिता...
मात-पिता की पूजा गणेशजी ने की, श्रीगणेशजी ने की।
सर्वप्रथम गणपति को-2, ही पूजा जाता।। ૐ जय जय मात-पिता...
बलिहारी सदगुरु की मारग दिखा दिया, सच्चा मारग दिखा दिया।
मातृ-पितृ पूजन कर–2, जग जय जय गाता।। ૐ जय जय मात-पिता...
मात-पिता प्रभु गुरु की आरती जो गाता, है प्रेम सहित गाता।
वो संयमी हो जाता, सदाचारी हो जाता, भव से तर जाता।। ૐ जय जय मात-पिता...
लफंगे-लफंगियों की नकल छोड़, गुरु सा संयमी होता, गणेश सा संयमी होता।
स्वयं आत्मसुख पाता-2, औरों को भी पवाता।। ૐ जय जय मात-पिता..
इस समय माता-पिता अपने बच्चों के सिर पर हाथ रखकर स्नेहमय आशीष बरसायें एवं उनके मंगलमय जीवन के लिए इस प्रकार शुभ संकल्प करें- "तुम्हारे जीवन में उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति व पराक्रम की वृद्धि हो। तुम्हारा जीवन माता-पिता एवं गुरु की भक्ति से महक उठे। तुम्हारे कर्मों में धर्म, सज्जनता और कुशलता आये। तुम त्रिलोचन बनो, तुम्हारी बाहर की आँख के साथ भीतरी, विवेक की कल्याणकारी आँख जागृत हो। तुम पुरुषार्थी बनो और हर क्षेत्र में सफलता तुम्हारे चरण चूमे।"
आयुष्मान भव– ʹतुम दीर्घायु बनोʹ। श्रद्धावान भव– ʹतुम श्रद्धावान बनो।ʹ विद्यावान भव- ʹतुम विद्यावान बनो।ʹ ब्रह्मविद् भव- ʹतुम ब्रह्मवेत्ता बनो।ʹ
🚩यही है असली प्रेम दिवस! इस दिन बच्चे-बच्चियाँ पवित्र संकल्प करें कि ʹमैं अपने माता-पिता व गुरुजनों का आदर करूँगा/करूँगी। उन्हें रोज प्रणाम करूँगा/करूँगी। मेरे जीवन को महानता के रास्ते ले जाने वाली उनकी आज्ञाओं का पालन करना मेरा कर्तव्य है और मैं उसे अवश्य पूरा करूँगा/करूँगी।
बच्चे बच्चियाँ माता-पिता को मधुर प्रसाद खिलायें एवं माता-पिता अपने बच्चों को प्रसाद खिलायें।
🚩शास्त्र-वचनामृत
यन्मातापितरौ वृत्तं तनये कुरुतः सदा।
न सुप्रतिकरं तत्तु मात्रा पित्रा च यत्कृतम्।।
'माता और पिता पुत्र के प्रति जो सर्वदा स्नेहपूर्ण व्यवहार करते हैं, उपकार करते हैं, उसका प्रत्युपकार सहज ही नहीं चुकाया जा सकता है।'
(वाल्मीकि रामायणः 2.111.9)
माता गुरुतरा भूमेः खात् पितोच्चतरस्तथा।
'माता का गौरव पृथ्वी से भी अधिक है और पिता आकाश से भी ऊँचे (श्रेष्ठ) हैं।'
(महाभारत, वनपर्वणि, आरण्येव पर्वः 313.60)
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्।।
'जो माता-पिता और गुरुजनों को प्रणाम करता है और उनकी सेवा करता है, उसकी आयु, विद्या, यश और बल चारों बढ़ते हैं।'
(मनुस्मृतिः 2.121)
मातापित्रोस्तु यः पादौ नित्यं प्रक्षालयेत् सुतः।
तस्य भागीरथीस्नानं अहन्यहनि जायते।।
'जो पुत्र प्रतिदिन माता और पिता के चरण पखारता है, उसका नित्यप्रति गंगा-स्नान हो जाता है।' (पद्म पुराण, भूमि खंडः 62.74)
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आयुष्मान भव– ʹतुम दीर्घायु बनोʹ। श्रद्धावान भव– ʹतुम श्रद्धावान बनो।ʹ विद्यावान भव- ʹतुम विद्यावान बनो।ʹ ब्रह्मविद् भव- ʹतुम ब्रह्मवेत्ता बनो।ʹ
🚩यही है असली प्रेम दिवस! इस दिन बच्चे-बच्चियाँ पवित्र संकल्प करें कि ʹमैं अपने माता-पिता व गुरुजनों का आदर करूँगा/करूँगी। उन्हें रोज प्रणाम करूँगा/करूँगी। मेरे जीवन को महानता के रास्ते ले जाने वाली उनकी आज्ञाओं का पालन करना मेरा कर्तव्य है और मैं उसे अवश्य पूरा करूँगा/करूँगी।
बच्चे बच्चियाँ माता-पिता को मधुर प्रसाद खिलायें एवं माता-पिता अपने बच्चों को प्रसाद खिलायें।
🚩शास्त्र-वचनामृत
यन्मातापितरौ वृत्तं तनये कुरुतः सदा।
न सुप्रतिकरं तत्तु मात्रा पित्रा च यत्कृतम्।।
'माता और पिता पुत्र के प्रति जो सर्वदा स्नेहपूर्ण व्यवहार करते हैं, उपकार करते हैं, उसका प्रत्युपकार सहज ही नहीं चुकाया जा सकता है।'
(वाल्मीकि रामायणः 2.111.9)
माता गुरुतरा भूमेः खात् पितोच्चतरस्तथा।
'माता का गौरव पृथ्वी से भी अधिक है और पिता आकाश से भी ऊँचे (श्रेष्ठ) हैं।'
(महाभारत, वनपर्वणि, आरण्येव पर्वः 313.60)
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्।।
'जो माता-पिता और गुरुजनों को प्रणाम करता है और उनकी सेवा करता है, उसकी आयु, विद्या, यश और बल चारों बढ़ते हैं।'
(मनुस्मृतिः 2.121)
मातापित्रोस्तु यः पादौ नित्यं प्रक्षालयेत् सुतः।
तस्य भागीरथीस्नानं अहन्यहनि जायते।।
'जो पुत्र प्रतिदिन माता और पिता के चरण पखारता है, उसका नित्यप्रति गंगा-स्नान हो जाता है।' (पद्म पुराण, भूमि खंडः 62.74)
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