महाराणा प्रताप जयंती पर शत्-शत् नमन।
9 मई 2022
http://azaadbharat.org
🚩महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो था और लंबाई 7 '5'' फिट थी,वे दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे।
🚩हल्दीघाटी युद्ध में राणा के 20,000 सैनिकों ने अकबर के 80,000 सैनिकों को भगा दिया था।
🚩महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन को काट डालते थे।
🚩अकबर महाराणा प्रताप के युद्ध कौशल से इतना घबरा गया था कि वह सपने में भी महाराणा प्रताप का नाम लेकर कांपने लगता था।
🚩महाराणा प्रताप आज भी अमरता के गौरव तथा मानवता के विजय सूर्य है। एक सच्चे शूरवीर ,महान पराक्रमी, देशभक्त ,वीर योद्धा ,मातृ भूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए।
🚩महाराणा प्रताप ने मुगलों को कईं बार युद्ध में हराया और हिंदुस्थान के पुरे मुगल साम्राज्य को घुटनो पर ला दिया था।
🚩दिवेर का महायुद्ध में तो महाराणा प्रताप ने बहलोल खान को घोड़े समेत 2 टुकड़ों में काट दिया था।
🚩आज भी महाराणा प्रताप का नाम असंख्य भारतीयों लिए प्रेरणास्रोत है। महाराणा प्रताप का स्वाभिमान भारत माता की पूंजी है।
🚩वे अजर अमरता के गौरव तथा मानवता के विजय सूर्य है। महाराणा प्रताप की देशभक्ति ,पत्थर की अमिट लकीर है ।
🚩ऐसे पराक्रमी भारत माँ के वीर सपूत महाराणा प्रताप को राष्ट्र का शत्- शत् नमन।
🚩महाराणा प्रताप के जीवनकाल को देखते है,तो देशभक्ति का संचार स्वाभाविक होने लगता है और आँखों में भक्ति के आँसू आ जाते है।
🚩महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया उदयपुर, मेवाड में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता, शौर्य, त्याग, पराक्रम और दृढ प्रण के लिये अमर है।
🚩महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को हुआ था। महाराणा प्रताप के पिता का नाम राणा उदयसिंह एवं माता जयवंताबाई था।
🚩 महाराणा प्रताप का बचपन भील समुदाय के साथ बिता , भीलों के साथ ही वे युद्ध कला सीखते थे , भील अपने पुत्र को कीका कहकर पुकारते है, इसलिए भील महाराणा को कीका नाम से पुकारते थे।
🚩महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए।
🚩जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर 1572 ई. में जलाल खाँ प्रताप के खेमे में गया, इसी क्रम में मानसिंह (1573 ई. में ), भगवानदास ( सितम्बर, 1573 ई. में ) तथा राजा टोडरमल ( दिसम्बर,1573 ई. ) प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया जिसके परिणामस्वरूप हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध हुआ।
🚩हल्दीघाटी युद्ध 18 जून 1576 ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था ।
🚩इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए। अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितनी देर तक टिक पाते, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, ये युद्ध पूरे एक दिन चला ओेैर राजपूतों ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी।
🚩जहां हल्दीघाटी का युद्ध नैतिक विजय और परीक्षण का युद्ध था, वहां दिवेर-छापली का युद्ध एक निर्णायक युद्ध बना। इसी विजय के फलस्वरूप संपूर्ण मेवाड़ पर महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया।
🚩महाराणा प्रताप के सबसे प्रिय और प्रसिद्ध नीलवर्ण ईरानी मूल के घोड़े का नाम चेतक था। चेतक अश्व गुजरात के काठियावाड़ी व्यापारी ईरानी नस्ल के तीन घोडे चेतक,त्राटक और अटक लेकर मारवाड आया।
🚩अटक परीक्षण में काम आ गया। त्राटक महाराणा प्रताप ने उनके छोटे भाई शक्ती सिंह को दे दिया और चेतक को स्वयं रख लिया। हल्दी घाटी-(१५७६) के युद्ध में चेतक ने अपनी अद्वितीय स्वामिभक्ति, बुद्धिमत्ता एवं वीरता का परिचय दिया था। युद्ध में बुरी तरह घायल हो जाने पर भी महाराणा प्रताप को सुरक्षित रणभूमि से निकाल लाने में सफल वह एक बरसाती नाला उलांघ कर अन्ततः वीरगति को प्राप्त हुआ।
🚩हिंदी कवि श्याम नारायण पाण्डेय द्वारा रचित प्रसिद्ध महाकाव्य हल्दी घाटी में चेतक के पराक्रम एवं उसकी स्वामिभक्ति की मार्मिक कथा वर्णित हुई है। आज भी राजसमंद के हल्दी घाटी गांव में चेतक की समाधि बनी हुई है, जहाँ स्वयं प्रताप और उनके भाई शक्तिसिंह ने अपने हाथों से इस अश्व का दाह-संस्कार किया था।
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🚩महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो था और लंबाई 7 '5'' फिट थी,वे दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे।
🚩हल्दीघाटी युद्ध में राणा के 20,000 सैनिकों ने अकबर के 80,000 सैनिकों को भगा दिया था।
🚩महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन को काट डालते थे।
🚩अकबर महाराणा प्रताप के युद्ध कौशल से इतना घबरा गया था कि वह सपने में भी महाराणा प्रताप का नाम लेकर कांपने लगता था।
🚩महाराणा प्रताप आज भी अमरता के गौरव तथा मानवता के विजय सूर्य है। एक सच्चे शूरवीर ,महान पराक्रमी, देशभक्त ,वीर योद्धा ,मातृ भूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए।
🚩महाराणा प्रताप ने मुगलों को कईं बार युद्ध में हराया और हिंदुस्थान के पुरे मुगल साम्राज्य को घुटनो पर ला दिया था।
🚩दिवेर का महायुद्ध में तो महाराणा प्रताप ने बहलोल खान को घोड़े समेत 2 टुकड़ों में काट दिया था।
🚩आज भी महाराणा प्रताप का नाम असंख्य भारतीयों लिए प्रेरणास्रोत है। महाराणा प्रताप का स्वाभिमान भारत माता की पूंजी है।
🚩वे अजर अमरता के गौरव तथा मानवता के विजय सूर्य है। महाराणा प्रताप की देशभक्ति ,पत्थर की अमिट लकीर है ।
🚩ऐसे पराक्रमी भारत माँ के वीर सपूत महाराणा प्रताप को राष्ट्र का शत्- शत् नमन।
🚩महाराणा प्रताप के जीवनकाल को देखते है,तो देशभक्ति का संचार स्वाभाविक होने लगता है और आँखों में भक्ति के आँसू आ जाते है।
🚩महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया उदयपुर, मेवाड में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता, शौर्य, त्याग, पराक्रम और दृढ प्रण के लिये अमर है।
🚩महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को हुआ था। महाराणा प्रताप के पिता का नाम राणा उदयसिंह एवं माता जयवंताबाई था।
🚩 महाराणा प्रताप का बचपन भील समुदाय के साथ बिता , भीलों के साथ ही वे युद्ध कला सीखते थे , भील अपने पुत्र को कीका कहकर पुकारते है, इसलिए भील महाराणा को कीका नाम से पुकारते थे।
🚩महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए।
🚩जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर 1572 ई. में जलाल खाँ प्रताप के खेमे में गया, इसी क्रम में मानसिंह (1573 ई. में ), भगवानदास ( सितम्बर, 1573 ई. में ) तथा राजा टोडरमल ( दिसम्बर,1573 ई. ) प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया जिसके परिणामस्वरूप हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध हुआ।
🚩हल्दीघाटी युद्ध 18 जून 1576 ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था ।
🚩इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए। अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितनी देर तक टिक पाते, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, ये युद्ध पूरे एक दिन चला ओेैर राजपूतों ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी।
🚩जहां हल्दीघाटी का युद्ध नैतिक विजय और परीक्षण का युद्ध था, वहां दिवेर-छापली का युद्ध एक निर्णायक युद्ध बना। इसी विजय के फलस्वरूप संपूर्ण मेवाड़ पर महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया।
🚩महाराणा प्रताप के सबसे प्रिय और प्रसिद्ध नीलवर्ण ईरानी मूल के घोड़े का नाम चेतक था। चेतक अश्व गुजरात के काठियावाड़ी व्यापारी ईरानी नस्ल के तीन घोडे चेतक,त्राटक और अटक लेकर मारवाड आया।
🚩अटक परीक्षण में काम आ गया। त्राटक महाराणा प्रताप ने उनके छोटे भाई शक्ती सिंह को दे दिया और चेतक को स्वयं रख लिया। हल्दी घाटी-(१५७६) के युद्ध में चेतक ने अपनी अद्वितीय स्वामिभक्ति, बुद्धिमत्ता एवं वीरता का परिचय दिया था। युद्ध में बुरी तरह घायल हो जाने पर भी महाराणा प्रताप को सुरक्षित रणभूमि से निकाल लाने में सफल वह एक बरसाती नाला उलांघ कर अन्ततः वीरगति को प्राप्त हुआ।
🚩हिंदी कवि श्याम नारायण पाण्डेय द्वारा रचित प्रसिद्ध महाकाव्य हल्दी घाटी में चेतक के पराक्रम एवं उसकी स्वामिभक्ति की मार्मिक कथा वर्णित हुई है। आज भी राजसमंद के हल्दी घाटी गांव में चेतक की समाधि बनी हुई है, जहाँ स्वयं प्रताप और उनके भाई शक्तिसिंह ने अपने हाथों से इस अश्व का दाह-संस्कार किया था।
🚩 एक अर्थ में हल्दीघाटी का युद्ध में राजपूतो ने रक्त का बदला दिवेर में चुकाया। दिवेर की विजय ने यह प्रमाणित कर दिया कि महाराणा का शौर्य, संकल्प और वंश गौरव अकाट्य और अमिट है, इस युद्ध ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि महाराणा के त्याग और बलिदान की भावना के नैतिक बल ने सत्तावादी नीति को परास्त किया।
🚩कर्नल टाॅड ने जहां हल्दीघाटी को 'थर्मोपाली' कहा है वहां के युद्ध को 'मेरोथान' की संज्ञा दी है।जिस प्रकार एथेन्स जैसी छोटी इकाई ने फारस की बलवती शक्ति को 'मेरोथन' में पराजित किया था, उसी प्रकार मेवाड़ जैसे छोटे राज्य ने मुगल राज्य के वृहत सैन्यबल को दिवेर में परास्त किया। महाराणा की दिवेर विजय की दास्तान सर्वदा हमारे देश की प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी।
🚩मुगल शासक अकबर कभी भी महाराणा प्रताप को अपने अधीन नहीं कर पाया और जब 57 वर्ष की उम्र में 29 जनवरी, 1597 को अपनी राजधानी चावंड मे धनुष की डोर खींचते वक्त आँत में चोट लगने के कारण उनकी मृत्यु हो गई तो कहा जाता है कि अकबर इस खबर को सुनकर बहुत दुखी हुआ था।
🚩भारत के वीर सपूत महाराणा प्रताप के जीवन से हम सभी को प्रेरणा लेनी चाहिए कि कैसे उन्होंने अपनी मातृ भूमि के रक्षा के लिए कितने संघर्ष किये।
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🚩कर्नल टाॅड ने जहां हल्दीघाटी को 'थर्मोपाली' कहा है वहां के युद्ध को 'मेरोथान' की संज्ञा दी है।जिस प्रकार एथेन्स जैसी छोटी इकाई ने फारस की बलवती शक्ति को 'मेरोथन' में पराजित किया था, उसी प्रकार मेवाड़ जैसे छोटे राज्य ने मुगल राज्य के वृहत सैन्यबल को दिवेर में परास्त किया। महाराणा की दिवेर विजय की दास्तान सर्वदा हमारे देश की प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी।
🚩मुगल शासक अकबर कभी भी महाराणा प्रताप को अपने अधीन नहीं कर पाया और जब 57 वर्ष की उम्र में 29 जनवरी, 1597 को अपनी राजधानी चावंड मे धनुष की डोर खींचते वक्त आँत में चोट लगने के कारण उनकी मृत्यु हो गई तो कहा जाता है कि अकबर इस खबर को सुनकर बहुत दुखी हुआ था।
🚩भारत के वीर सपूत महाराणा प्रताप के जीवन से हम सभी को प्रेरणा लेनी चाहिए कि कैसे उन्होंने अपनी मातृ भूमि के रक्षा के लिए कितने संघर्ष किये।
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आखिर क्यों 10 मई 1857 को ब्रिटिश शासन के खिलाफ आजादी की पहली चिंगारी लगी थी❓, ये जानना जरूरी है।
10 मई 2022
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🚩वर्ष 1857 में वह ऐतिहासिक दिन 10 मई ही था, जब देश की आजादी के लिए पहली चिंगारी मेरठ से भड़की थी। अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की नींव साल 1857 में सबसे पहले मेरठ के सदर बाजार में भड़की, जो पूरे देश में फैल गई थी। यह मेरठ के साथ-साथ पूरे देश के लिए गौरव की बात है।
🚩1857 का संग्राम ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक बड़ी और अहम घटना थी। इस क्रांति की शुरुआत 10 मई, 1857 ई. को मेरठ से हुई, जो धीरे-धीरे कानपुर, बरेली, झांसी, दिल्ली, अवध आदि स्थानों पर फैल गई। क्रांति की शुरूआत तो एक सैन्य विद्रोह के रूप में हुई, लेकिन समय के साथ उसका स्वरूप बदल कर ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध एक जनव्यापी विद्रोह के रूप में हो गया, जिसे भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहा गया।
🚩आइये आजादी की पहली लड़ाई के इस वर्षगांठ के मौके पर इससे जुड़ी खास बातें जानते हैं…
🚩19वीं सदी की पहली आधी सदी के दौरान ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा हो चुका था। जैसे-जैसे ब्रिटिश शासन का भारत पर प्रभाव बढ़ता गया, वैसे-वैसे भारतीय जनता के बीच ब्रिटिश शासन के खिलाफ असंतोष फैलता गया। पलासी के युद्ध के एक सौ साल बाद ब्रिटिश राज के दमनकारी और अन्यायपूर्ण शासन के खिलाफ असंतोष विद्रोह के रूप में भड़कने लगा जिसने भारत में ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की बात करें तो इससे पहले देश के अलग-अलग हिस्सों में कई घटनाएं घट चुकी थीं। जैसे कि 18वीं सदी के अंत में उत्तरी बंगाल में संन्यासी आंदोलन और बिहार एवं बंगाल में चुआड़ आंदोलन हो चुका था। 19वीं सदी के मध्य में कई किसान आंदोलन हुए।
🚩19वी सदी के पहले 5 दशकों में कई जनजातीय विद्रोह भी हुए, जैसे- मध्य प्रदेश में भीलों का, बिहार में संथालों और ओडिशा में गोंड़ एवं खोंड़ जनजातियों का विद्रोह अहम था। लेकिन इन सभी आंदोलनों का प्रभाव क्षेत्र बहुत सीमित था यानी ये स्थानीय प्रकृति के थे। अंग्रेजों के खिलाफ जो संगठित पहला विद्रोह भड़का वह 1857 में था। शुरू में तो यह सिपाहियों के विद्रोह के रूप में भड़का लेकिन बाद में यह जनव्यापी क्रांति बन गया।
🚩विद्रोह के कौन-कौन से कारण थे???
🚩राजनीतिक कारण
🚩1857 के विद्रोह का प्रमुख राजनीतिक कारण ब्रिटिश सरकार की ‘गोद निषेध प्रथा’ या ‘हड़प नीति’ थी। यह अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति थी जो ब्रिटिश भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी के दिमाग की उपज थी। कंपनी के गवर्नर जनरलों ने भारतीय राज्यों को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाने के उद्देश्य से कई नियम बनाए। उदाहरण के लिए, किसी राजा के निःसंतान होने पर उसका राज्य ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बन जाता था। राज्य हड़प नीति के कारण भारतीय राजाओं में बहुत असंतोष पैदा हुआ था। रानी लक्ष्मी बाई के दत्तक पुत्र को झांसी की गद्दी पर नहीं बैठने दिया गया। हड़प नीति के तहत ब्रिटिश शासन ने सतारा, नागपुर और झांसी को ब्रिटिश राज्य में मिला लिया। अब अन्य राजाओं को भय सताने लगा कि उनका भी विलय थोड़े दिनों की बात रह गई है। इसके अलावा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहेब की पेंशन रोक दी गई जिससे भारत के शासक वर्ग में विद्रोह की भावना मजबूत होने लगी।
🚩आग में घी का काम उस घटना ने किया जब बहादुर शाह द्वितीय के वंशजों को लाल किले में रहने पर पाबंदी लगा दी गई। कुशासन के नाम पर लार्ड डलहौजी ने अवध का विलय करा लिया जिससे बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी, अधिकारी एवं सैनिक बेरोजगार हो गए। इस घटना के बाद जो अवध पहले तक ब्रिटिश शासन का वफादार था, अब विद्रोही बन गया।
🚩सामाजिक एवं धार्मिक कारण
🚩भारत में तेजी से पैर पसारती पश्चिमी सभ्यता को लेकर समाज के बड़े वर्ग में आक्रोश था। 1850 में ब्रिटिश सरकार ने हिंदुओं के उत्तराधिकार कानून में बदलाव कर दिया और अब क्रिस्चन धर्म अपनाने वाला हिंदू ही अपने पूर्वजों की संपत्ति में हकदार बन सकता था। इसके अलावा मिशनरियों को पूरे भारत में धर्म परिवर्तन की छूट मिल गई थी। लोगों को लगा कि ब्रिटिश सरकार भारतीय लोगों को क्रिस्चन बनाना चाहती है। भारतीय समाज में सदियों से चली आ रही कुछ प्रथाओं, जैसे- सती प्रथा आदि को समाप्त करने पर लोगों के मन में असंतोष पैदा हुआ।
🚩आर्थिक कारण
🚩भारी टैक्स और राजस्व संग्रहण के कड़े नियमों के कारण किसान और जमींदार वर्गों में असंतोष था। इन सबमें से बहुत से ब्रिटिश सरकार की टैक्स मांग को पूरा करने में असक्षम थे और वे साहूकारों का कर्ज चुका नहीं पा रहे थे जिससे अंत में उनको अपनी पुश्तैनी जमीन से हाथ धोना पड़ता था। बड़ी संख्या में सिपाहियों का इन किसानों से संबंध था और इसलिए किसानों की पीड़ा से वे भी प्रभावित हुए।
10 मई 2022
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🚩वर्ष 1857 में वह ऐतिहासिक दिन 10 मई ही था, जब देश की आजादी के लिए पहली चिंगारी मेरठ से भड़की थी। अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की नींव साल 1857 में सबसे पहले मेरठ के सदर बाजार में भड़की, जो पूरे देश में फैल गई थी। यह मेरठ के साथ-साथ पूरे देश के लिए गौरव की बात है।
🚩1857 का संग्राम ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक बड़ी और अहम घटना थी। इस क्रांति की शुरुआत 10 मई, 1857 ई. को मेरठ से हुई, जो धीरे-धीरे कानपुर, बरेली, झांसी, दिल्ली, अवध आदि स्थानों पर फैल गई। क्रांति की शुरूआत तो एक सैन्य विद्रोह के रूप में हुई, लेकिन समय के साथ उसका स्वरूप बदल कर ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध एक जनव्यापी विद्रोह के रूप में हो गया, जिसे भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहा गया।
🚩आइये आजादी की पहली लड़ाई के इस वर्षगांठ के मौके पर इससे जुड़ी खास बातें जानते हैं…
🚩19वीं सदी की पहली आधी सदी के दौरान ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा हो चुका था। जैसे-जैसे ब्रिटिश शासन का भारत पर प्रभाव बढ़ता गया, वैसे-वैसे भारतीय जनता के बीच ब्रिटिश शासन के खिलाफ असंतोष फैलता गया। पलासी के युद्ध के एक सौ साल बाद ब्रिटिश राज के दमनकारी और अन्यायपूर्ण शासन के खिलाफ असंतोष विद्रोह के रूप में भड़कने लगा जिसने भारत में ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की बात करें तो इससे पहले देश के अलग-अलग हिस्सों में कई घटनाएं घट चुकी थीं। जैसे कि 18वीं सदी के अंत में उत्तरी बंगाल में संन्यासी आंदोलन और बिहार एवं बंगाल में चुआड़ आंदोलन हो चुका था। 19वीं सदी के मध्य में कई किसान आंदोलन हुए।
🚩19वी सदी के पहले 5 दशकों में कई जनजातीय विद्रोह भी हुए, जैसे- मध्य प्रदेश में भीलों का, बिहार में संथालों और ओडिशा में गोंड़ एवं खोंड़ जनजातियों का विद्रोह अहम था। लेकिन इन सभी आंदोलनों का प्रभाव क्षेत्र बहुत सीमित था यानी ये स्थानीय प्रकृति के थे। अंग्रेजों के खिलाफ जो संगठित पहला विद्रोह भड़का वह 1857 में था। शुरू में तो यह सिपाहियों के विद्रोह के रूप में भड़का लेकिन बाद में यह जनव्यापी क्रांति बन गया।
🚩विद्रोह के कौन-कौन से कारण थे???
🚩राजनीतिक कारण
🚩1857 के विद्रोह का प्रमुख राजनीतिक कारण ब्रिटिश सरकार की ‘गोद निषेध प्रथा’ या ‘हड़प नीति’ थी। यह अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति थी जो ब्रिटिश भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी के दिमाग की उपज थी। कंपनी के गवर्नर जनरलों ने भारतीय राज्यों को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाने के उद्देश्य से कई नियम बनाए। उदाहरण के लिए, किसी राजा के निःसंतान होने पर उसका राज्य ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बन जाता था। राज्य हड़प नीति के कारण भारतीय राजाओं में बहुत असंतोष पैदा हुआ था। रानी लक्ष्मी बाई के दत्तक पुत्र को झांसी की गद्दी पर नहीं बैठने दिया गया। हड़प नीति के तहत ब्रिटिश शासन ने सतारा, नागपुर और झांसी को ब्रिटिश राज्य में मिला लिया। अब अन्य राजाओं को भय सताने लगा कि उनका भी विलय थोड़े दिनों की बात रह गई है। इसके अलावा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहेब की पेंशन रोक दी गई जिससे भारत के शासक वर्ग में विद्रोह की भावना मजबूत होने लगी।
🚩आग में घी का काम उस घटना ने किया जब बहादुर शाह द्वितीय के वंशजों को लाल किले में रहने पर पाबंदी लगा दी गई। कुशासन के नाम पर लार्ड डलहौजी ने अवध का विलय करा लिया जिससे बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी, अधिकारी एवं सैनिक बेरोजगार हो गए। इस घटना के बाद जो अवध पहले तक ब्रिटिश शासन का वफादार था, अब विद्रोही बन गया।
🚩सामाजिक एवं धार्मिक कारण
🚩भारत में तेजी से पैर पसारती पश्चिमी सभ्यता को लेकर समाज के बड़े वर्ग में आक्रोश था। 1850 में ब्रिटिश सरकार ने हिंदुओं के उत्तराधिकार कानून में बदलाव कर दिया और अब क्रिस्चन धर्म अपनाने वाला हिंदू ही अपने पूर्वजों की संपत्ति में हकदार बन सकता था। इसके अलावा मिशनरियों को पूरे भारत में धर्म परिवर्तन की छूट मिल गई थी। लोगों को लगा कि ब्रिटिश सरकार भारतीय लोगों को क्रिस्चन बनाना चाहती है। भारतीय समाज में सदियों से चली आ रही कुछ प्रथाओं, जैसे- सती प्रथा आदि को समाप्त करने पर लोगों के मन में असंतोष पैदा हुआ।
🚩आर्थिक कारण
🚩भारी टैक्स और राजस्व संग्रहण के कड़े नियमों के कारण किसान और जमींदार वर्गों में असंतोष था। इन सबमें से बहुत से ब्रिटिश सरकार की टैक्स मांग को पूरा करने में असक्षम थे और वे साहूकारों का कर्ज चुका नहीं पा रहे थे जिससे अंत में उनको अपनी पुश्तैनी जमीन से हाथ धोना पड़ता था। बड़ी संख्या में सिपाहियों का इन किसानों से संबंध था और इसलिए किसानों की पीड़ा से वे भी प्रभावित हुए।
🚩इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के बाद भारतीय बाजार ब्रिटेन में निर्मित उत्पादों से पट गए। इससे भारत का स्थानीय कपड़ा उद्योग खासतौर पर तबाह हो गया। भारत के हस्तशिल्प उद्योग ब्रिटेन के मशीन से बने सस्ते सामानों का मुकाबला नहीं कर पाए। भारत कच्ची सामग्री का सप्लायर और ब्रिटेन में बने सामानों का उपभोक्ता बन गया। जो लोग अपनी आजीविका के लिए शाही संरक्षण पर आश्रित थे, सभी बेरोजगार हो गए। इसलिए अंग्रेजों के खिलाफ उनमें काफी गुस्सा भरा हुआ था।
🚩सैन्य कारण
🚩भारत में ब्रिटिश सेना में 87 फीसदी से ज्यादा भारतीय सैनिक थे। उनको ब्रिटिश सैनिकों की तुलना में कमतर माना जाता था। एक ही रैंक के भारतीय सिपाही को यूरोपीय सिपाही के मुकाबले कम वेतन दिया जाता था। इसके अलावा भारतीय सिपाही को सूबेदार रैंक के ऊपर प्रोन्नति नहीं मिल सकती थी। इसके अलावा भारत में ब्रिटिश शासन के विस्तार के बाद भारतीय सिपाहियों की स्थिति बुरी तरह प्रभावित हुई। उनको अपने घरों से काफी दूर-दूर सेवा देनी पड़ती थी। 1856 में लार्ड कैनिंग ने एक नियम जारी किया जिसके मुताबिक सैनिकों को भारत के बाहर भी सेवा देनी पड़ सकती थी।
🚩बंगाल आर्मी में अवध के उच्च समुदाय के लोगों की भर्ती की गई थी। उनकी धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, उनका समुद्र (कालापानी) पार करना वर्जित था। उनलोगों को लार्ड कैनिंग के नियम से शक हुआ कि ब्रिटिश सरकार उनलोगों को क्रिस्चन बनाने पर तुली हुई है। अवध के विलय के बाद नवाब की सेना को भंग कर दिया गया। उनके सिपाही बेरोजगार हो गए और ब्रिटिश हुकूमत के कट्टर दुश्मन बन गए।
🚩तात्कालिक कारण
🚩1857 के विद्रोह के तात्कालिक कारणों में यह अफवाह थी कि 1853 की राइफल के कारतूस की खोल पर सूअर और गाय की चर्बी लगी हुई है। यह अफवाह हिन्दू एवं मुस्लिम दोनों धर्म के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचा रही थी। ये राइफलें 1853 के राइफल के जखीरे का हिस्सा थीं।
🚩मंगल पांडे
🚩29 मार्च, 1857 ई. को मंगल पांडे नाम के एक सैनिक ने ‘बैरकपुर छावनी’ में अपने अफसरों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया, लेकिन ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों ने इस सैनिक विद्रोह को सरलता से नियंत्रित कर लिया और साथ ही उसकी बटालियन ’34 एन.आई.’ को भंग कर दिया। 24 अप्रैल को 3 एल.सी. परेड मेरठ में 90 घुड़सवारों में से 85 सैनिकों ने नए कारतूस लेने से इंकार कर दिया। आज्ञा की अवहेलना के कारण इन 85 घुड़सवारों को कोर्ट मार्शल द्वारा 5 वर्ष का कारावास दिया गया। ‘खुला विद्रोह’ 10 मई, दिन रविवार को सांयकाल 5 व 6 बजे के मध्य प्रारम्भ हुआ। सर्वप्रथम पैदल टुकड़ी ’20 एन.आई.’ में विद्रोह की शुरूआत हुई, उसके बाद ‘3 एल.सी.’ में भी विद्रोह फैल गया। इन विद्रोहियों ने अपने अधिकारियों के ऊपर गोलियां चलाई। मंगल पांडे ने ‘ह्यूसन’ को गोली मारी थी, जबकि ‘अफसर बाग’ की हत्या कर दी गई थी। मंगल पांडे को 8 अप्रैल को फांसी दे दी गई। 9 मई को मेरठ में 85 सैनिकों ने नई राइफल इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया जिनको नौ साल जेल की सजा सुनाई गई।
🚩विद्रोह का प्रसार
🚩इस घटना के बाद मेरठ छावनी में विद्रोह की आग भड़क गई। 9 मई को मेरठ विद्रोह 1857 के संग्राम की शुरूआत का प्रतीक था। मेरठ में भारतीय सिपाहियों ने ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या कर दी और जेल को तोड़ दिया। 10 मई को वे दिल्ली के लिए आगे बढ़े। 11 मई को मेरठ के क्रांतिकारी सैनिकों ने दिल्ली पहुंचकर, 12 मई को दिल्ली पर अधिकार कर लिया। इन सैनिकों ने मुगल सम्राट बहादुरशाह द्वितीय को दिल्ली का सम्राट घोषित कर दिया। शीघ्र ही विद्रोह लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, बरेली, बनारस, बिहार और झांसी में भी फैल गया। अंग्रेजों ने पंजाब से सेना बुलाकर सबसे पहले दिल्ली पर अधिकार किया। 21 सितंबर, 1857 ई. को दिल्ली पर अंग्रेजों ने पुनः अधिकार कर लिया, परन्तु संघर्ष में ‘जॉन निकोलसन’ मारा गया और लेफ्टिनेंट ‘हडसन’ ने धोखे से बहादुरशाह द्वितीय के दो पुत्रों ‘मिर्जा मुगल’ और ‘मिर्जा ख्वाजा सुल्तान’ एवं एक पोते ‘मिर्जा अबूबक्र’ को गोली मरवा दी। लखनऊ में विद्रोह की शुरुआत 4 जून, 1857 ई. को हुई। यहां के क्रांतिकारी सैनिकों द्वारा ब्रिटिश रेजिडेंसी के घेराव के बाद ब्रिटिश रेजिडेंट ‘हेनरी लॉरेन्स’ की मृत्यु हो गई। हैवलॉक और आउट्रम ने लखनऊ को दबाने का भरकस प्रयत्न किया, लेकिन वे असफल रहे। आखिर में कॉलिन कैंपवेल’ ने गोरखा रेजिमेंट के सहयोग से मार्च, 1858 ई. में शहर पर अधिकार कर लिया। वैसे यहां क्रांति का असर सितंबर तक रहा।
🚩बगावत को कुचलना
🚩1857 का संग्राम एक साल से ज्यादा समय तक चला। इसे 1858 के मध्य में कुचला गया। मेरठ में विद्रोह भड़कने के चौदह महीने बाद 8 जुलाई, 1858 को आखिरकार कैनिंग ने घोषणा किया कि विद्रोह को पूरी तरह दबा दिया गया है।
🚩विद्रोह की असफलता के कारण
🚩सैन्य कारण
🚩भारत में ब्रिटिश सेना में 87 फीसदी से ज्यादा भारतीय सैनिक थे। उनको ब्रिटिश सैनिकों की तुलना में कमतर माना जाता था। एक ही रैंक के भारतीय सिपाही को यूरोपीय सिपाही के मुकाबले कम वेतन दिया जाता था। इसके अलावा भारतीय सिपाही को सूबेदार रैंक के ऊपर प्रोन्नति नहीं मिल सकती थी। इसके अलावा भारत में ब्रिटिश शासन के विस्तार के बाद भारतीय सिपाहियों की स्थिति बुरी तरह प्रभावित हुई। उनको अपने घरों से काफी दूर-दूर सेवा देनी पड़ती थी। 1856 में लार्ड कैनिंग ने एक नियम जारी किया जिसके मुताबिक सैनिकों को भारत के बाहर भी सेवा देनी पड़ सकती थी।
🚩बंगाल आर्मी में अवध के उच्च समुदाय के लोगों की भर्ती की गई थी। उनकी धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, उनका समुद्र (कालापानी) पार करना वर्जित था। उनलोगों को लार्ड कैनिंग के नियम से शक हुआ कि ब्रिटिश सरकार उनलोगों को क्रिस्चन बनाने पर तुली हुई है। अवध के विलय के बाद नवाब की सेना को भंग कर दिया गया। उनके सिपाही बेरोजगार हो गए और ब्रिटिश हुकूमत के कट्टर दुश्मन बन गए।
🚩तात्कालिक कारण
🚩1857 के विद्रोह के तात्कालिक कारणों में यह अफवाह थी कि 1853 की राइफल के कारतूस की खोल पर सूअर और गाय की चर्बी लगी हुई है। यह अफवाह हिन्दू एवं मुस्लिम दोनों धर्म के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचा रही थी। ये राइफलें 1853 के राइफल के जखीरे का हिस्सा थीं।
🚩मंगल पांडे
🚩29 मार्च, 1857 ई. को मंगल पांडे नाम के एक सैनिक ने ‘बैरकपुर छावनी’ में अपने अफसरों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया, लेकिन ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों ने इस सैनिक विद्रोह को सरलता से नियंत्रित कर लिया और साथ ही उसकी बटालियन ’34 एन.आई.’ को भंग कर दिया। 24 अप्रैल को 3 एल.सी. परेड मेरठ में 90 घुड़सवारों में से 85 सैनिकों ने नए कारतूस लेने से इंकार कर दिया। आज्ञा की अवहेलना के कारण इन 85 घुड़सवारों को कोर्ट मार्शल द्वारा 5 वर्ष का कारावास दिया गया। ‘खुला विद्रोह’ 10 मई, दिन रविवार को सांयकाल 5 व 6 बजे के मध्य प्रारम्भ हुआ। सर्वप्रथम पैदल टुकड़ी ’20 एन.आई.’ में विद्रोह की शुरूआत हुई, उसके बाद ‘3 एल.सी.’ में भी विद्रोह फैल गया। इन विद्रोहियों ने अपने अधिकारियों के ऊपर गोलियां चलाई। मंगल पांडे ने ‘ह्यूसन’ को गोली मारी थी, जबकि ‘अफसर बाग’ की हत्या कर दी गई थी। मंगल पांडे को 8 अप्रैल को फांसी दे दी गई। 9 मई को मेरठ में 85 सैनिकों ने नई राइफल इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया जिनको नौ साल जेल की सजा सुनाई गई।
🚩विद्रोह का प्रसार
🚩इस घटना के बाद मेरठ छावनी में विद्रोह की आग भड़क गई। 9 मई को मेरठ विद्रोह 1857 के संग्राम की शुरूआत का प्रतीक था। मेरठ में भारतीय सिपाहियों ने ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या कर दी और जेल को तोड़ दिया। 10 मई को वे दिल्ली के लिए आगे बढ़े। 11 मई को मेरठ के क्रांतिकारी सैनिकों ने दिल्ली पहुंचकर, 12 मई को दिल्ली पर अधिकार कर लिया। इन सैनिकों ने मुगल सम्राट बहादुरशाह द्वितीय को दिल्ली का सम्राट घोषित कर दिया। शीघ्र ही विद्रोह लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, बरेली, बनारस, बिहार और झांसी में भी फैल गया। अंग्रेजों ने पंजाब से सेना बुलाकर सबसे पहले दिल्ली पर अधिकार किया। 21 सितंबर, 1857 ई. को दिल्ली पर अंग्रेजों ने पुनः अधिकार कर लिया, परन्तु संघर्ष में ‘जॉन निकोलसन’ मारा गया और लेफ्टिनेंट ‘हडसन’ ने धोखे से बहादुरशाह द्वितीय के दो पुत्रों ‘मिर्जा मुगल’ और ‘मिर्जा ख्वाजा सुल्तान’ एवं एक पोते ‘मिर्जा अबूबक्र’ को गोली मरवा दी। लखनऊ में विद्रोह की शुरुआत 4 जून, 1857 ई. को हुई। यहां के क्रांतिकारी सैनिकों द्वारा ब्रिटिश रेजिडेंसी के घेराव के बाद ब्रिटिश रेजिडेंट ‘हेनरी लॉरेन्स’ की मृत्यु हो गई। हैवलॉक और आउट्रम ने लखनऊ को दबाने का भरकस प्रयत्न किया, लेकिन वे असफल रहे। आखिर में कॉलिन कैंपवेल’ ने गोरखा रेजिमेंट के सहयोग से मार्च, 1858 ई. में शहर पर अधिकार कर लिया। वैसे यहां क्रांति का असर सितंबर तक रहा।
🚩बगावत को कुचलना
🚩1857 का संग्राम एक साल से ज्यादा समय तक चला। इसे 1858 के मध्य में कुचला गया। मेरठ में विद्रोह भड़कने के चौदह महीने बाद 8 जुलाई, 1858 को आखिरकार कैनिंग ने घोषणा किया कि विद्रोह को पूरी तरह दबा दिया गया है।
🚩विद्रोह की असफलता के कारण
🚩सीमित आंदोलन
हालांकि, बहुत कम समय में आंदोलन देश के कई हिस्सों तक पहुंच गया लेकिन देश के एक बड़े हिस्से पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। खासतौर पर दोआब क्षेत्र में इसका असर रहा। दक्षिण के प्रांतों ने इसमें कोई हिस्सा नहीं लिया। अहम शासकों, जैसे- सिंधिया, होल्कर, जोधपुर के राणा और अन्यों ने विद्रोह का समर्थन नहीं किया।
🚩प्रभावी नेतृत्व का अभाव
🚩विद्रोह के लिए असरदार नेतृत्व का अभाव था। नाना साहेब, तांत्या टोपे और रानी लक्ष्मी बाई की बहादुरी पर कोई शक नहीं है लेकिन वे आंदोलन को पूरे देश में असरदार नेतृत्व नहीं दे सके। इसके अलावा विद्रोहियों में अनुभव, संगठन क्षमता व मिलकर कार्य करने की शक्ति की कमी थी। विद्रोही क्रांतिकारियों के पास ठोस लक्ष्य एवं स्पष्ट योजना का अभाव था। उन्हें अगले क्षण क्या करना होगा और क्या नहीं- यह भी निश्चित नहीं था। वे मात्र भावावेश एवं परिस्थितिवश आगे बढ़े जा रहे थे। सैनिक दुर्बलता का विद्रोह की असफलता में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। बहादुरशाह जफर और नाना साहब एक कुशल संगठनकर्ता अवश्य थे, पर उनमें सैन्य नेतृत्व की क्षमता की कमी थी, जबकि अंग्रेजी सेना के पास लॉरेन्स ब्रदर्स, निकोलसन, हेवलॉक, आउट्रम एवं एडवर्ड जैसे कुशल सेनानायक थे।
🚩सीमित संसाधन
🚩विद्रोहियों के पास न संख्याबल था और न पैसा। उसके उलट ब्रिटिश सेना के पास बड़ी संख्या में सैनिक, पैसा और हथियार थे जिसके बल पर वे विद्रोह को कुचलने में सफल रहे।
🚩मध्य वर्ग का हिस्सा नहीं लेना
🚩1857 ई. के इस विद्रोह के प्रति ‘शिक्षित वर्ग’ पूर्ण रूप से उदासीन रहा। व्यापारियों एवं शिक्षित वर्ग ने कलकत्ता एवं बंबई में सभाएं कर अंग्रेजों की सफलता के लिए प्रार्थना भी की थी। अगर इस वर्ग ने अपने लेखों एवं भाषणों द्वारा लोगों में उत्साह का संचार किया होता, तो निःसंदेह ही क्रांति के इस विद्रोह का परिणाम कुछ ओर ही होता।
🚩विद्रोह के परिणाम
🚩विद्रोह के समाप्त होने के बाद 1858 ई. में ब्रिटिश संसद ने एक कानून पारित कर ईस्ट इंडिया कंपनी के अस्तित्व को समाप्त कर दिया और अब भारत पर शासन का पूरा अधिकार महारानी विक्टोरिया के हाथों में आ गया। इंग्लैंड में 1858 ई. के अधिनियम के तहत एक ‘भारतीय राज्य सचिव’ की व्यवस्था की गयी, जिसकी सहायता के लिए 15 सदस्यों की एक ‘मंत्रणा परिषद्’ बनाई गई। इन 15 सदस्यों में 8 की नियुक्ति सरकार द्वारा करने तथा 7 की ‘कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स’ द्वारा चुनने की व्यवस्था की गई।
🚩हड़प नीति की समाप्ति
🚩ब्रिटिश सरकार की हड़प नीति को समाप्त कर दिया गया। कानूनी वारिस के तौर पर पुत्र गोद लेने के अधिकार को स्वीकार किया गया।
🚩1857 का विद्रोह इसलिए भी अहम था क्योंकि भारत की आजादी की लड़ाई के लिए इसकी वजह से मार्ग प्रशस्त हुआ।
🚩इस आंदोलन से हमें समझना चाहिए कि वर्तमान में जिस तरह देश की स्थिति है उसमें भी कहीं न कहीं आज़ादी को खतरा है- ऐसा लग रहा है, इसलिए देश में रहते हुए देश के साथ गद्दारी करनेवालों की पहचान होनी चाहिए और उनके फन कुचलने चाहिए जिससे हमारा देश सुरक्षित रहे।
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हालांकि, बहुत कम समय में आंदोलन देश के कई हिस्सों तक पहुंच गया लेकिन देश के एक बड़े हिस्से पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। खासतौर पर दोआब क्षेत्र में इसका असर रहा। दक्षिण के प्रांतों ने इसमें कोई हिस्सा नहीं लिया। अहम शासकों, जैसे- सिंधिया, होल्कर, जोधपुर के राणा और अन्यों ने विद्रोह का समर्थन नहीं किया।
🚩प्रभावी नेतृत्व का अभाव
🚩विद्रोह के लिए असरदार नेतृत्व का अभाव था। नाना साहेब, तांत्या टोपे और रानी लक्ष्मी बाई की बहादुरी पर कोई शक नहीं है लेकिन वे आंदोलन को पूरे देश में असरदार नेतृत्व नहीं दे सके। इसके अलावा विद्रोहियों में अनुभव, संगठन क्षमता व मिलकर कार्य करने की शक्ति की कमी थी। विद्रोही क्रांतिकारियों के पास ठोस लक्ष्य एवं स्पष्ट योजना का अभाव था। उन्हें अगले क्षण क्या करना होगा और क्या नहीं- यह भी निश्चित नहीं था। वे मात्र भावावेश एवं परिस्थितिवश आगे बढ़े जा रहे थे। सैनिक दुर्बलता का विद्रोह की असफलता में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। बहादुरशाह जफर और नाना साहब एक कुशल संगठनकर्ता अवश्य थे, पर उनमें सैन्य नेतृत्व की क्षमता की कमी थी, जबकि अंग्रेजी सेना के पास लॉरेन्स ब्रदर्स, निकोलसन, हेवलॉक, आउट्रम एवं एडवर्ड जैसे कुशल सेनानायक थे।
🚩सीमित संसाधन
🚩विद्रोहियों के पास न संख्याबल था और न पैसा। उसके उलट ब्रिटिश सेना के पास बड़ी संख्या में सैनिक, पैसा और हथियार थे जिसके बल पर वे विद्रोह को कुचलने में सफल रहे।
🚩मध्य वर्ग का हिस्सा नहीं लेना
🚩1857 ई. के इस विद्रोह के प्रति ‘शिक्षित वर्ग’ पूर्ण रूप से उदासीन रहा। व्यापारियों एवं शिक्षित वर्ग ने कलकत्ता एवं बंबई में सभाएं कर अंग्रेजों की सफलता के लिए प्रार्थना भी की थी। अगर इस वर्ग ने अपने लेखों एवं भाषणों द्वारा लोगों में उत्साह का संचार किया होता, तो निःसंदेह ही क्रांति के इस विद्रोह का परिणाम कुछ ओर ही होता।
🚩विद्रोह के परिणाम
🚩विद्रोह के समाप्त होने के बाद 1858 ई. में ब्रिटिश संसद ने एक कानून पारित कर ईस्ट इंडिया कंपनी के अस्तित्व को समाप्त कर दिया और अब भारत पर शासन का पूरा अधिकार महारानी विक्टोरिया के हाथों में आ गया। इंग्लैंड में 1858 ई. के अधिनियम के तहत एक ‘भारतीय राज्य सचिव’ की व्यवस्था की गयी, जिसकी सहायता के लिए 15 सदस्यों की एक ‘मंत्रणा परिषद्’ बनाई गई। इन 15 सदस्यों में 8 की नियुक्ति सरकार द्वारा करने तथा 7 की ‘कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स’ द्वारा चुनने की व्यवस्था की गई।
🚩हड़प नीति की समाप्ति
🚩ब्रिटिश सरकार की हड़प नीति को समाप्त कर दिया गया। कानूनी वारिस के तौर पर पुत्र गोद लेने के अधिकार को स्वीकार किया गया।
🚩1857 का विद्रोह इसलिए भी अहम था क्योंकि भारत की आजादी की लड़ाई के लिए इसकी वजह से मार्ग प्रशस्त हुआ।
🚩इस आंदोलन से हमें समझना चाहिए कि वर्तमान में जिस तरह देश की स्थिति है उसमें भी कहीं न कहीं आज़ादी को खतरा है- ऐसा लग रहा है, इसलिए देश में रहते हुए देश के साथ गद्दारी करनेवालों की पहचान होनी चाहिए और उनके फन कुचलने चाहिए जिससे हमारा देश सुरक्षित रहे।
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मज़हबी लोगों के लिए संविधान नहीं है क्या???
11 मई 2022
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🚩शाहीन बाग वालो ने कोर्ट के फैसले की धज्जियां उड़ाई।
🚩शाहीन बाग में देश का नही,मजहबी धर्म का कानून
🚩9 मई 2022 को कोर्ट ने शाहीन बाग में अतिक्रमण हटाने के लिए जब बुलडोजर भेजा तो शाहीन बाग के मजहबी लोगों ने बुलडोजर को रोक लिया और बुलडोजर को वापस पहुँचा दिया।
🚩क्या शाहीन बाग में भारत का संविधान लागू नही होता???
🚩दक्षिणी दिल्ली नगर निगम (एसडीएमसी ) ने पुलिस को शाहीन बाग में अतिक्रमण रोधी अभियान में बाधा डालने के आरोप में आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक अमानतुल्लाह खान और उनके समर्थकों के खिलाफ FIR दर्ज की।
🚩ईशा पांडे ने कहा, 'एसडीएमसी से प्राप्त शिकायत के आधार पर अमानतुल्लाह खान और उनके समर्थकों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 186 , 353 और 34 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है।
🚩 शाहीन बाग के थाना प्रभारी को दी गई एक शिकायत में एसडीएमसी के सेंट्रल जोन लाइसेंसिंग इंस्पेक्टर ने कहा है कि शाहीन बाग में मुख्य सड़क पर सोमवार को अतिक्रमण हटाने का अभियान तय किया गया था और कार्रवाई को अंजाम देने के लिए उसके कर्मचारी और पुलिस कर्मी मौके पर मौजूद थे, शिकायत में कहा गया, 'विधायक (ओखला) अमानतुल्लाह खान ने अपने समर्थकों के साथ एसडीएमसी के कर्मियों को अतिक्रमण नहीं हटाने दिया।
🚩शाहीन बाग में बुलडोजर कार्रवाई पर सेंट्रल जन के चेयरमैन राजपाल सिंह ने कहा कि हम कार्रवाई के लिए तैयार हैं।
🚩दिल्ली के कई हिन्दू संगठनों की मांग है कि शाहीन बाग मजहबी लोगों पर सख्ती बनाना अनिवार्य है,क्योंकि जो मजहबी लोग कोर्ट के आदेशों की धज्जिया उड़ा देते है ,वे इंसान कहलाने लायक नहीं है।
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11 मई 2022
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🚩शाहीन बाग वालो ने कोर्ट के फैसले की धज्जियां उड़ाई।
🚩शाहीन बाग में देश का नही,मजहबी धर्म का कानून
🚩9 मई 2022 को कोर्ट ने शाहीन बाग में अतिक्रमण हटाने के लिए जब बुलडोजर भेजा तो शाहीन बाग के मजहबी लोगों ने बुलडोजर को रोक लिया और बुलडोजर को वापस पहुँचा दिया।
🚩क्या शाहीन बाग में भारत का संविधान लागू नही होता???
🚩दक्षिणी दिल्ली नगर निगम (एसडीएमसी ) ने पुलिस को शाहीन बाग में अतिक्रमण रोधी अभियान में बाधा डालने के आरोप में आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक अमानतुल्लाह खान और उनके समर्थकों के खिलाफ FIR दर्ज की।
🚩ईशा पांडे ने कहा, 'एसडीएमसी से प्राप्त शिकायत के आधार पर अमानतुल्लाह खान और उनके समर्थकों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 186 , 353 और 34 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है।
🚩 शाहीन बाग के थाना प्रभारी को दी गई एक शिकायत में एसडीएमसी के सेंट्रल जोन लाइसेंसिंग इंस्पेक्टर ने कहा है कि शाहीन बाग में मुख्य सड़क पर सोमवार को अतिक्रमण हटाने का अभियान तय किया गया था और कार्रवाई को अंजाम देने के लिए उसके कर्मचारी और पुलिस कर्मी मौके पर मौजूद थे, शिकायत में कहा गया, 'विधायक (ओखला) अमानतुल्लाह खान ने अपने समर्थकों के साथ एसडीएमसी के कर्मियों को अतिक्रमण नहीं हटाने दिया।
🚩शाहीन बाग में बुलडोजर कार्रवाई पर सेंट्रल जन के चेयरमैन राजपाल सिंह ने कहा कि हम कार्रवाई के लिए तैयार हैं।
🚩दिल्ली के कई हिन्दू संगठनों की मांग है कि शाहीन बाग मजहबी लोगों पर सख्ती बनाना अनिवार्य है,क्योंकि जो मजहबी लोग कोर्ट के आदेशों की धज्जिया उड़ा देते है ,वे इंसान कहलाने लायक नहीं है।
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भारत के महान राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन को नमन
12 मई 2022
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🚩13 मई 1962 को सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन देश के दूसरे राष्ट्रपति बने थे।
🚩सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के पहले उपराष्ट्रपति (1952-1962) और 1962 से 1967 तक भारत के दूसरे राष्ट्रपति थे। इनका कार्यकाल 13 मई 1962 से 13 मई 1967 तक रहा।
🚩वे भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक ,देशभक्त, एवं महान हिन्दू विचारक थे।
🚩डॉ॰ राधाकृष्णन का जन्म तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेन्सी के चित्तूर जिले के तिरूत्तनी ग्राम के एक तेलुगुभाषी ब्राह्मण परिवार में 5 सितम्बर 1888 को हुआ था।
🚩सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन की यह प्रतिभा थी कि स्वतन्त्रता के बाद इन्हें संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया। वे 1947 से 1949 तक इसके सदस्य रहे। इसी समय वे कई विश्वविद्यालयों के चेयरमैन भी नियुक्त किये गये।
🚩यद्यपि उन्हें 1931 में ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा "सर" की उपाधि प्रदान की गयी थी लेकिन स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात उसका औचित्य डॉ॰ राधाकृष्णन के लिये समाप्त हो चुका था।
🚩जब वे उपराष्ट्रपति बन गये तो स्वतन्त्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद जी ने 1954 में उन्हें उनकी महान दार्शनिक व शैक्षिक उपलब्धियों के लिये देश का सर्वोच्च अलंकरण भारत रत्न प्रदान किया।
🚩उनका जन्मदिन (5 सितम्बर) भारत में शिक्षक दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।
🚩डॉ॰ राधाकृष्णन ने यह भली भाँति जान लिया था कि जीवन बहुत ही छोटा है परन्तु इसमें व्याप्त खुशियाँ अनिश्चित हैं। इस कारण व्यक्ति को सुख-दुख में समभाव से रहना चाहिये।
🚩उनका कहना है कि वस्तुतः मृत्यु एक अटल सच्चाई है, जो अमीर ग़रीब सभी को अपना ग्रास बनाती है तथा किसी प्रकार का वर्ग भेद नहीं करती। सच्चा ज्ञान वही है जो आपके अन्दर के अज्ञान को समाप्त कर सकता है।
🚩ऐसे महापुरूषों के कारण ही आज भारत की संस्कृति जीवित है,अन्यथा ईसाई मिशनरी वाले कब से खत्म कर देते!
🚩आज देश को पुनः डॉ. राधाकृष्णन जैसे महान देशभक्तों की आवश्यकता है।
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🚩वे भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक ,देशभक्त, एवं महान हिन्दू विचारक थे।
🚩डॉ॰ राधाकृष्णन का जन्म तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेन्सी के चित्तूर जिले के तिरूत्तनी ग्राम के एक तेलुगुभाषी ब्राह्मण परिवार में 5 सितम्बर 1888 को हुआ था।
🚩सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन की यह प्रतिभा थी कि स्वतन्त्रता के बाद इन्हें संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया। वे 1947 से 1949 तक इसके सदस्य रहे। इसी समय वे कई विश्वविद्यालयों के चेयरमैन भी नियुक्त किये गये।
🚩यद्यपि उन्हें 1931 में ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा "सर" की उपाधि प्रदान की गयी थी लेकिन स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात उसका औचित्य डॉ॰ राधाकृष्णन के लिये समाप्त हो चुका था।
🚩जब वे उपराष्ट्रपति बन गये तो स्वतन्त्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद जी ने 1954 में उन्हें उनकी महान दार्शनिक व शैक्षिक उपलब्धियों के लिये देश का सर्वोच्च अलंकरण भारत रत्न प्रदान किया।
🚩उनका जन्मदिन (5 सितम्बर) भारत में शिक्षक दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।
🚩डॉ॰ राधाकृष्णन ने यह भली भाँति जान लिया था कि जीवन बहुत ही छोटा है परन्तु इसमें व्याप्त खुशियाँ अनिश्चित हैं। इस कारण व्यक्ति को सुख-दुख में समभाव से रहना चाहिये।
🚩उनका कहना है कि वस्तुतः मृत्यु एक अटल सच्चाई है, जो अमीर ग़रीब सभी को अपना ग्रास बनाती है तथा किसी प्रकार का वर्ग भेद नहीं करती। सच्चा ज्ञान वही है जो आपके अन्दर के अज्ञान को समाप्त कर सकता है।
🚩ऐसे महापुरूषों के कारण ही आज भारत की संस्कृति जीवित है,अन्यथा ईसाई मिशनरी वाले कब से खत्म कर देते!
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वास्कोडिगामा खोजी नहीं, बल्कि ईसाई डाकू था।
14 मई 2022
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🚩वास्कोडिगामा ने भारत को जमकर लुटा
🚩भारतवासियों को आज गलत इतिहास पढ़ाया जाता है कि वास्कोडिगामा ने भारत को खोजा और उन्नत किया।
🚩सत्य ये है कि वास्कोडिगामा ने भारत को बर्बाद किया.....
🚩वास्कोडिगामा को भारत के आधुनिक लेखक उसे भारत की खोज करने वाला लिखते हैं। भारत तो पहले से सम्रद्ध व्यापारी देश के रूप में संसार भर में प्रसिद्ध था।
🚩वास्कोडिगामा ने भारत की नहीं बल्कि यूरोप और भारत के बीच के समुद्री रास्ते की खोज की थी।
🚩उसके बाद वास्कोडिगामा और पुर्तगालियों ने भारत में हत्याएं की,अमानवीय अत्याचार किया, संपति को लूटा,केरल से गोवा तक पहुँचकर अपना शासन स्थापित किया और ईसाई धर्मान्तरण शुरू किया।
🚩भारत के जिन महापुरूषों ने,ऋषि,मुनियो ने भारत का उत्थान किया उनकी बाते इतिहास में उतनी नही पढ़ाई जाती,जितनी भारत के लुटेरों की महिमा पढ़ाई जा रही हैं।
🚩ऐसे तो भारत लुटेरों में कई नाम की लिस्ट है,पर यहाँ आपको वास्कोडिगामा लुटेरे के बारे में बताया जा रहा हैं।
🚩वास्कोडिगामा पहली बार भारत आया तो 1 जहाज में 5 लाख टन समान आता है,ऐसे 7 जहाज सोने के भर के यूरोप ले गया।
🚩वास्कोडिगामा जब दूसरी बार भारत आया तो 11 जहाज सोना भर के यूरोप ले गया।
🚩वास्कोडिगामा जब तीसरी बार भारत आया तो 17 जहाज सोने के भर के यूरोप ले गया।
🚩भारत से वास्कोडिगामा ऐसे तीनो बार मे टोटल मिलाकर 35 जहाज सोना भरकर यूरोप ले गया।
🚩वास्कोडिगामा 1498 में समुद्र के रास्ते पूर्वी हिस्से से भारत आया और भारत को लूटा चालू किया और करोड़ो-अरबो-खरबों रुपये के हीरे जवाहरात लूट कर यूरोप ले गया।
🚩यूरोप में ईसाई मिशनरियों के धर्म गुरु पॉप ने वास्कोडिगामा को आदेश दिया कि पूर्वी भारत से भारत को लूटना चालू करो और फिर वास्कोडिगामा ने जमकर भारत को लूटा।
🚩यूरोप में ईसाई मिशनरियों के धर्म गुरु पॉप ने उसी समय कोलम्बस को भी आदेश दिया था कि कोलम्बस तुम जाकर अमेरिका को लूटना चालू करो और फिर कोलम्बस ने भी जमकर अमेरिका को लूटा था।
🚩लेकिन भारतीयों के भोलेपन ने और कुछ लोगों के अंदर के अंदर टांग खिंचने की आदत ने सोने की चिड़िया कहाने वाले भारत को लुटेरों से बचा नहीं पाए।
🚩भारतीय संस्कृति कहती है कि शरीर आपका तंदुरुस्त रहे,मन आपका प्रसन्न रहे और बुद्धि में आपकी समता रहे,सब मानव मात्र का भला हो ।
🚩लेकिन विधर्मी लोग सदैव हिन्दू संस्कृति और हिन्दुस्तान को कोसते रहे है,ओर लूटते रहे हैं,इसलिए भारतीयों को एकजुट होना पड़ेगा और विधर्मी लोगों को दिन के तारे दिखाना होगा।
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14 मई 2022
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🚩वास्कोडिगामा ने भारत को जमकर लुटा
🚩भारतवासियों को आज गलत इतिहास पढ़ाया जाता है कि वास्कोडिगामा ने भारत को खोजा और उन्नत किया।
🚩सत्य ये है कि वास्कोडिगामा ने भारत को बर्बाद किया.....
🚩वास्कोडिगामा को भारत के आधुनिक लेखक उसे भारत की खोज करने वाला लिखते हैं। भारत तो पहले से सम्रद्ध व्यापारी देश के रूप में संसार भर में प्रसिद्ध था।
🚩वास्कोडिगामा ने भारत की नहीं बल्कि यूरोप और भारत के बीच के समुद्री रास्ते की खोज की थी।
🚩उसके बाद वास्कोडिगामा और पुर्तगालियों ने भारत में हत्याएं की,अमानवीय अत्याचार किया, संपति को लूटा,केरल से गोवा तक पहुँचकर अपना शासन स्थापित किया और ईसाई धर्मान्तरण शुरू किया।
🚩भारत के जिन महापुरूषों ने,ऋषि,मुनियो ने भारत का उत्थान किया उनकी बाते इतिहास में उतनी नही पढ़ाई जाती,जितनी भारत के लुटेरों की महिमा पढ़ाई जा रही हैं।
🚩ऐसे तो भारत लुटेरों में कई नाम की लिस्ट है,पर यहाँ आपको वास्कोडिगामा लुटेरे के बारे में बताया जा रहा हैं।
🚩वास्कोडिगामा पहली बार भारत आया तो 1 जहाज में 5 लाख टन समान आता है,ऐसे 7 जहाज सोने के भर के यूरोप ले गया।
🚩वास्कोडिगामा जब दूसरी बार भारत आया तो 11 जहाज सोना भर के यूरोप ले गया।
🚩वास्कोडिगामा जब तीसरी बार भारत आया तो 17 जहाज सोने के भर के यूरोप ले गया।
🚩भारत से वास्कोडिगामा ऐसे तीनो बार मे टोटल मिलाकर 35 जहाज सोना भरकर यूरोप ले गया।
🚩वास्कोडिगामा 1498 में समुद्र के रास्ते पूर्वी हिस्से से भारत आया और भारत को लूटा चालू किया और करोड़ो-अरबो-खरबों रुपये के हीरे जवाहरात लूट कर यूरोप ले गया।
🚩यूरोप में ईसाई मिशनरियों के धर्म गुरु पॉप ने वास्कोडिगामा को आदेश दिया कि पूर्वी भारत से भारत को लूटना चालू करो और फिर वास्कोडिगामा ने जमकर भारत को लूटा।
🚩यूरोप में ईसाई मिशनरियों के धर्म गुरु पॉप ने उसी समय कोलम्बस को भी आदेश दिया था कि कोलम्बस तुम जाकर अमेरिका को लूटना चालू करो और फिर कोलम्बस ने भी जमकर अमेरिका को लूटा था।
🚩लेकिन भारतीयों के भोलेपन ने और कुछ लोगों के अंदर के अंदर टांग खिंचने की आदत ने सोने की चिड़िया कहाने वाले भारत को लुटेरों से बचा नहीं पाए।
🚩भारतीय संस्कृति कहती है कि शरीर आपका तंदुरुस्त रहे,मन आपका प्रसन्न रहे और बुद्धि में आपकी समता रहे,सब मानव मात्र का भला हो ।
🚩लेकिन विधर्मी लोग सदैव हिन्दू संस्कृति और हिन्दुस्तान को कोसते रहे है,ओर लूटते रहे हैं,इसलिए भारतीयों को एकजुट होना पड़ेगा और विधर्मी लोगों को दिन के तारे दिखाना होगा।
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भगवान बुद्ध जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं...
15 मई 2022
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🚩भगवान बुद्ध ने जवानी में राजपाट छोड़कर साधना करके परमात्मा प्राप्ति कर ली।
🚩उनका यश चहु ओर फैलने लगा,उनको देखकर दुर्जन लोग जलने लगे और उनके खिलाफ वैश्या से दुष्कर्म का झूठा आरोप लगाकर खूब बदनाम किया पर आज उनकी जय जयकार हो रही है।
🚩वर्तमान समय में भी साधु-संतों पर यही सिलसिला जारी है।पर सत्य की ही जीत होगी।
🚩भगवान बुद्ध ने समाज को जगाया पर उनके खिलाफ ही रचा गया षड्यंत्र।
🚩 भगवान बुद्ध का जन्म 483 और 563 ईस्वी पूर्व के बीच शाक्यगणराज्य की तत्कालीन राजधानी कपिलवस्तु के निकटलुंबिनी, नेपाल में हुआ था । लुम्बिनी वन नेपाल के तराई क्षेत्र में कपिलवस्तु और देवदह के बीच नौतनवा स्टेशन से 8 मील दूर पश्चिम में रुक्मिनदेई नामक स्थान के पास स्थित था ।
🚩 कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी को अपने नैहर देवदह जाते हुए रास्ते में प्रसव पीड़ा हुई और वहीं उन्होंने एक बालक को जन्म दिया । शिशु का नाम सिद्धार्थ रखा गया ।
🚩कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन का युवराज था सिद्धार्थ! यौवन में कदम रखते ही विवेक और वैराग्य जाग उठा। युवान पत्नी यशोधरा और नवजात शिशु राहुल की मोह-ममता की रेशमी जंजीर काटकर महाभीनिष्क्रमण (गृहत्याग) किया। एकान्त अरण्य में जाकर गहन ध्यान साधना करके अपने साध्य तत्त्व को प्राप्त कर लिया।
🚩एकान्त में तपश्चर्या और ध्यान साधना से खिले हुए इस आध्यात्मिक कुसुम की मधुर सौरभ लोगों में फैलने लगी। अब सिद्धार्थ भगवान बुद्ध के नाम से जन-समूह में प्रसिद्ध हुए। हजारों हजारों लोग उनके उपदिष्ट मार्ग पर चलने लगे और अपनी अपनी योग्यता के मुताबिक आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ते हुए आत्मिक शांति प्राप्त करने लगे। असंख्य लोग बौद्ध भिक्षुक बनकर भगवान बुद्ध के सान्निध्य में रहने लगे। उनके पीछे चलने वाले अनुयायियों का एक संघ स्थापित हो गया।
🚩चहुँ ओर नाद गूँजने लगे :
बुद्धं शरणं गच्छामि।
धम्मं शरणं गच्छामि।
संघं शरणं गच्छामि।
🚩श्रावस्ती नगरी में भगवान बुद्ध का बहुत यश फैला। लोगों में उनकी जय-जयकार होने लगी। लोगों की भीड़-भाड़ से विरक्त होकर बुद्ध नगर से बाहर जेतवन में आम के बगीचे में रहने लगे। नगर के पिपासु जन बड़ी तादाद में वहाँ हररोज निश्चित समय पर पहुँच जाते और उपदेश-प्रवचन सुनते। बड़े-बड़े राजा महाराजा भगवान बुद्ध के सान्निध्य में आने जाने लगे।
🚩समाज में तो हर प्रकार के लोग होते हैं। अनादि काल से दैवी सम्पदा के लोग एवं आसुरी सम्पदा के लोग हुआ करते हैं। बुद्ध का फैलता हुआ यश देखकर उनका तेजोद्वेष करने वाले लोग जलने लगे। और जैसा कि संतों के साथ हमेशा से होता आ रहा है ऐसे उन दुष्ट तत्त्वों ने बुद्ध को बदनाम करने के लिए कुप्रचार किया। विभिन्न प्रकार की युक्ति-प्रयुक्तियाँ लड़ाकर बुद्ध के यश को हानि पहुँचे ऐसी बातें समाज में वे लोग फैलाने लगे। उन दुष्टों ने अपने षड्यंत्र में एक वेश्या को समझा-बुझाकर शामिल कर लिया।
🚩वेश्या बन-ठनकर जेतवन में भगवान बुद्ध के निवास-स्थान वाले बगीचे में जाने लगी। धनराशि के साथ दुष्टों का हर प्रकार से सहारा एवं प्रोत्साहन उसे मिल रहा था। रात्रि को वहीं रहकर सुबह नगर में वापिस लौट आती। अपनी सखियों में भी उसने बात फैलाई।
🚩लोग उससे पूछने लगेः “अरी! आजकल तू दिखती नहीं है?कहाँ जा रही है रोज रात को?”
“मैं तो रोज रात को जेतवन जाती हूँ। वे बुद्ध दिन में लोगों को उपदेश देते हैं और रात्रि के समय मेरे साथ रंगरलियाँ मनाते हैं। सारी रात वहाँ बिताकर सुबह लौटती हूँ।”
🚩वेश्या ने पूरा स्त्रीचरित्र आजमाकर षड्यंत्र करने वालों का साथ दिया । लोगों में पहले तो हल्की कानाफूसी हुई लेकिन ज्यों-ज्यों बात फैलती गई त्यों-त्यों लोगों में जोरदार विरोध होने लगा। लोग बुद्ध के नाम पर फटकार बरसाने लगे। बुद्ध के भिक्षुक बस्ती में भिक्षा लेने जाते तो लोग उन्हें गालियाँ देने लगे। बुद्ध के संघ के लोग सेवा-प्रवृत्ति में संलग्न थे। उन लोगों के सामने भी उँगली उठाकर लोग बकवास करने लगे।
🚩बुद्ध के शिष्य जरा असावधान रहे थे। #कुप्रचार के समय साथ ही साथ सुप्रचार होता तो कुप्रचार का इतना प्रभाव नहीं होता।
🚩शिष्य अगर निष्क्रिय रहकर सोचते रह जाएं कि ‘करेगा सो भरेगा… भगवान उनका नाश करेंगे..’ तो कुप्रचार करने वालों को खुला मैदान मिल जाता है।
🚩 संत के सान्निध्य में आने वाले लोग श्रद्धालु, सज्जन, सीधे सादे होते हैं, जबकि दुष्ट प्रवृत्ति करने वाले लोग कुटिलतापूर्वक कुप्रचार करने में कुशल होते हैं। फिर भी जिन संतों के पीछे सजग समाज होता है उन संतों के पीछे उठने वाले कुप्रचार के तूफान समय पाकर शांत हो जाते हैं और उनकी सत्प्रवृत्तियाँ प्रकाशमान हो उठती हैं।
15 मई 2022
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🚩भगवान बुद्ध ने जवानी में राजपाट छोड़कर साधना करके परमात्मा प्राप्ति कर ली।
🚩उनका यश चहु ओर फैलने लगा,उनको देखकर दुर्जन लोग जलने लगे और उनके खिलाफ वैश्या से दुष्कर्म का झूठा आरोप लगाकर खूब बदनाम किया पर आज उनकी जय जयकार हो रही है।
🚩वर्तमान समय में भी साधु-संतों पर यही सिलसिला जारी है।पर सत्य की ही जीत होगी।
🚩भगवान बुद्ध ने समाज को जगाया पर उनके खिलाफ ही रचा गया षड्यंत्र।
🚩 भगवान बुद्ध का जन्म 483 और 563 ईस्वी पूर्व के बीच शाक्यगणराज्य की तत्कालीन राजधानी कपिलवस्तु के निकटलुंबिनी, नेपाल में हुआ था । लुम्बिनी वन नेपाल के तराई क्षेत्र में कपिलवस्तु और देवदह के बीच नौतनवा स्टेशन से 8 मील दूर पश्चिम में रुक्मिनदेई नामक स्थान के पास स्थित था ।
🚩 कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी को अपने नैहर देवदह जाते हुए रास्ते में प्रसव पीड़ा हुई और वहीं उन्होंने एक बालक को जन्म दिया । शिशु का नाम सिद्धार्थ रखा गया ।
🚩कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन का युवराज था सिद्धार्थ! यौवन में कदम रखते ही विवेक और वैराग्य जाग उठा। युवान पत्नी यशोधरा और नवजात शिशु राहुल की मोह-ममता की रेशमी जंजीर काटकर महाभीनिष्क्रमण (गृहत्याग) किया। एकान्त अरण्य में जाकर गहन ध्यान साधना करके अपने साध्य तत्त्व को प्राप्त कर लिया।
🚩एकान्त में तपश्चर्या और ध्यान साधना से खिले हुए इस आध्यात्मिक कुसुम की मधुर सौरभ लोगों में फैलने लगी। अब सिद्धार्थ भगवान बुद्ध के नाम से जन-समूह में प्रसिद्ध हुए। हजारों हजारों लोग उनके उपदिष्ट मार्ग पर चलने लगे और अपनी अपनी योग्यता के मुताबिक आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ते हुए आत्मिक शांति प्राप्त करने लगे। असंख्य लोग बौद्ध भिक्षुक बनकर भगवान बुद्ध के सान्निध्य में रहने लगे। उनके पीछे चलने वाले अनुयायियों का एक संघ स्थापित हो गया।
🚩चहुँ ओर नाद गूँजने लगे :
बुद्धं शरणं गच्छामि।
धम्मं शरणं गच्छामि।
संघं शरणं गच्छामि।
🚩श्रावस्ती नगरी में भगवान बुद्ध का बहुत यश फैला। लोगों में उनकी जय-जयकार होने लगी। लोगों की भीड़-भाड़ से विरक्त होकर बुद्ध नगर से बाहर जेतवन में आम के बगीचे में रहने लगे। नगर के पिपासु जन बड़ी तादाद में वहाँ हररोज निश्चित समय पर पहुँच जाते और उपदेश-प्रवचन सुनते। बड़े-बड़े राजा महाराजा भगवान बुद्ध के सान्निध्य में आने जाने लगे।
🚩समाज में तो हर प्रकार के लोग होते हैं। अनादि काल से दैवी सम्पदा के लोग एवं आसुरी सम्पदा के लोग हुआ करते हैं। बुद्ध का फैलता हुआ यश देखकर उनका तेजोद्वेष करने वाले लोग जलने लगे। और जैसा कि संतों के साथ हमेशा से होता आ रहा है ऐसे उन दुष्ट तत्त्वों ने बुद्ध को बदनाम करने के लिए कुप्रचार किया। विभिन्न प्रकार की युक्ति-प्रयुक्तियाँ लड़ाकर बुद्ध के यश को हानि पहुँचे ऐसी बातें समाज में वे लोग फैलाने लगे। उन दुष्टों ने अपने षड्यंत्र में एक वेश्या को समझा-बुझाकर शामिल कर लिया।
🚩वेश्या बन-ठनकर जेतवन में भगवान बुद्ध के निवास-स्थान वाले बगीचे में जाने लगी। धनराशि के साथ दुष्टों का हर प्रकार से सहारा एवं प्रोत्साहन उसे मिल रहा था। रात्रि को वहीं रहकर सुबह नगर में वापिस लौट आती। अपनी सखियों में भी उसने बात फैलाई।
🚩लोग उससे पूछने लगेः “अरी! आजकल तू दिखती नहीं है?कहाँ जा रही है रोज रात को?”
“मैं तो रोज रात को जेतवन जाती हूँ। वे बुद्ध दिन में लोगों को उपदेश देते हैं और रात्रि के समय मेरे साथ रंगरलियाँ मनाते हैं। सारी रात वहाँ बिताकर सुबह लौटती हूँ।”
🚩वेश्या ने पूरा स्त्रीचरित्र आजमाकर षड्यंत्र करने वालों का साथ दिया । लोगों में पहले तो हल्की कानाफूसी हुई लेकिन ज्यों-ज्यों बात फैलती गई त्यों-त्यों लोगों में जोरदार विरोध होने लगा। लोग बुद्ध के नाम पर फटकार बरसाने लगे। बुद्ध के भिक्षुक बस्ती में भिक्षा लेने जाते तो लोग उन्हें गालियाँ देने लगे। बुद्ध के संघ के लोग सेवा-प्रवृत्ति में संलग्न थे। उन लोगों के सामने भी उँगली उठाकर लोग बकवास करने लगे।
🚩बुद्ध के शिष्य जरा असावधान रहे थे। #कुप्रचार के समय साथ ही साथ सुप्रचार होता तो कुप्रचार का इतना प्रभाव नहीं होता।
🚩शिष्य अगर निष्क्रिय रहकर सोचते रह जाएं कि ‘करेगा सो भरेगा… भगवान उनका नाश करेंगे..’ तो कुप्रचार करने वालों को खुला मैदान मिल जाता है।
🚩 संत के सान्निध्य में आने वाले लोग श्रद्धालु, सज्जन, सीधे सादे होते हैं, जबकि दुष्ट प्रवृत्ति करने वाले लोग कुटिलतापूर्वक कुप्रचार करने में कुशल होते हैं। फिर भी जिन संतों के पीछे सजग समाज होता है उन संतों के पीछे उठने वाले कुप्रचार के तूफान समय पाकर शांत हो जाते हैं और उनकी सत्प्रवृत्तियाँ प्रकाशमान हो उठती हैं।
🚩कुप्रचार ने इतना जोर पकड़ा कि बुद्ध के निकटवर्ती लोगों ने ‘त्राहिमाम्’ पुकार लिया। वे समझ गये कि यह व्यवस्थित आयोजन पूर्वक षड्यंत्र किया गया है। बुद्ध स्वयं तो पारमार्थिक सत्य में जागे हुए थे। वे बोलतेः “सब ठीक है, चलने दो। व्यवहारिक सत्य में वाहवाही देख ली। अब निन्दा भी देख लें। क्या फर्क पड़ता है?
🚩शिष्य कहने लगेः “भन्ते! अब सहा नहीं जाता। संघ के निकटवर्ती भक्त भी अफवाहों के शिकार हो रहे हैं। समाज के लोग अफवाहों की बातों को सत्य मानने लग गये हैं।”
🚩बुद्धः “धैर्य रखो। हम पारमार्थिक सत्य में विश्रांति पाते हैं। यह विरोध की आँधी चली है तो शांत भी हो जाएगी। समय पाकर सत्य ही बाहर आयेगा। आखिर में लोग हमें जानेंगे और मानेंगे।”
🚩कुछ लोगों ने अगवानी का झण्डा उठाया और राज्यसत्ता के समक्ष जोर-शोर से माँग की कि बुद्ध की जाँच करवाई जाये। लोग बातें कर रहे हैं और वेश्या भी कहती है कि बुद्ध रात्रि को मेरे साथ होते हैं और दिन में सत्संग करते हैं।
🚩बुद्ध के बारे में जाँच करने के लिए राजा ने अपने आदमियों को फरमान दिया। अब षड्यंत्र करनेवालों ने सोचा कि इस जाँच करने वाले पंच में अगर सच्चा आदमी आ जाएगा तो अफवाहों का सीना चीरकर सत्य बाहर आ जाएगा। अतः उन्होंने अपने षड्यंत्र को आखिरी पराकाष्ठा पर पहुँचाया। अब ऐसे ठोस सबूत खड़ा करना चाहिए कि बुद्ध की प्रतिभा का अस्त हो जाये।
🚩षडयंत्रकारियों ने वेश्या को दारु पिलाकर जेतवन भेज दिया। पीछे से गुण्डों की टोली वहाँ गई। वेश्या के साथ बलात्कार आदि सब दुष्ट कृत्य करके उसका गला घोंट दिया और लाश को बुद्ध के बगीचे में गाड़कर पलायन हो गये।
🚩लोगों ने राज्यसत्ता के द्वार खटखटाये थे लेकिन सत्तावाले भी कुछ लोग दुष्टों के साथ जुड़े हुए थे। ऐसा थोड़े ही है कि सत्ता में बैठे हुए सब लोग दूध में धोये हुए व्यक्ति होते हैं।
🚩राजा के अधिकारियों के द्वारा जाँच करने पर वेश्या की लाश हाथ लगी। अब दुष्टों ने जोर-शोर से चिल्लाना शुरु कर दिया।
🚩“देखो, हम पहले ही कह रहे थे। वेश्या भी बोल रही थी लेकिन तुम भगतड़े लोग मानते ही नहीं थे। अब देख लिया न? बुद्ध ने सही बात खुल जाने के भय से वेश्या को मरवाकर बगीचे में गड़वा दिया। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी। लेकिन सत्य कहाँ तक छिप सकता है? मुद्दामाल हाथ लग गया। इस ठोस सबूत से बुद्ध की असलियत सिद्ध हो गई। सत्य बाहर आ गया।”
🚩लेकिन उन मूर्खों को पता नहीं कि तुम्हारा बनाया हुआ कल्पित सत्य बाहर आया, वास्तविक सत्य तो आज ढाई हजार वर्ष के बाद भी वैसा ही चमक रहा है। आज बुद्ध भगवान को लाखों लोग जानते हैं, आदरपूर्वक मानते हैं। उनका तेजोद्वेष करने वाले दुष्ट लोग कौन-से नरकों में जलते होंगे क्या पता!
🚩 वर्तमान में जिन संतों के ऊपर आरोप लग रहे हैं उनके भक्त अगर सच्चाई किसी को बताने जाएंगे तो दुष्ट प्रकृति के लोग तो बोलेंगे ही, लेकिन जो हिंदूवादी और राष्ट्रवादी कहलाने वाले लोग है वे भी यही बोलेंगे की कि बुद्ध तो भगवान थे।
🚩 आजकल के संत ऐसे ही है, उनको इतने पैसे की क्या जरूत है? लड़कियों से क्यों मिलते हैं..??? ऐसे कपड़े क्यों पहनते हैं..??? आदि आदि…।
🚩पर उनको पता नही है कि पहले ऋषि मुनियों के पास इतनी सम्पत्ति होती थी कि राजकोष में धन कम पड़ जाता था तो ऋषि मुनियों से लोन लिया जाता था और रही कपड़े की बात तो कई भक्तों की भावना होती है तो पहन लेते हैं और लड़कियां दुःखी होती हैं तो उनके मां-बाप लेकर आते हैं तो कोई दुःख होता है तो मिल लेते हैं,उनके घर थोड़े ही बुलाने जाते हैं और भी कई तर्क वितर्क करेगे लेकिन भक्तों को दुःखी नहीं होना चाहिए। सबके बस की बात नही है कि महापुरुषों को पहचान पाये, आप अपने गुरूदेव का प्रचार प्रसार करते रहें, एक दिन ऐसा आएगा कि निंदा करने वाले भी आपके पास आयेंगे और बोलेंगे कि मुझे भी अपने गुरु के पास ले चलो।
🚩विदेशी फंडेड मीडिया ने हिंदू साधु-संतों की झूठी कहानी बनाकर समाज को परोसी, जिससे समाज गुमराह हो गया और सच्चाई न जानकर झूठ को ही सच मान बैठे, कुछ स्वार्थी नेता राष्ट्रविरोधी ताकतों से मिलकर झूठे केस में संतो को जेल भिजवा रहे हैं पर उसका भी देर सवेर खुलासा होगा क्योंकि सत्य को परेशान किया जाता है पराजित कभी नहीं…।
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🚩शिष्य कहने लगेः “भन्ते! अब सहा नहीं जाता। संघ के निकटवर्ती भक्त भी अफवाहों के शिकार हो रहे हैं। समाज के लोग अफवाहों की बातों को सत्य मानने लग गये हैं।”
🚩बुद्धः “धैर्य रखो। हम पारमार्थिक सत्य में विश्रांति पाते हैं। यह विरोध की आँधी चली है तो शांत भी हो जाएगी। समय पाकर सत्य ही बाहर आयेगा। आखिर में लोग हमें जानेंगे और मानेंगे।”
🚩कुछ लोगों ने अगवानी का झण्डा उठाया और राज्यसत्ता के समक्ष जोर-शोर से माँग की कि बुद्ध की जाँच करवाई जाये। लोग बातें कर रहे हैं और वेश्या भी कहती है कि बुद्ध रात्रि को मेरे साथ होते हैं और दिन में सत्संग करते हैं।
🚩बुद्ध के बारे में जाँच करने के लिए राजा ने अपने आदमियों को फरमान दिया। अब षड्यंत्र करनेवालों ने सोचा कि इस जाँच करने वाले पंच में अगर सच्चा आदमी आ जाएगा तो अफवाहों का सीना चीरकर सत्य बाहर आ जाएगा। अतः उन्होंने अपने षड्यंत्र को आखिरी पराकाष्ठा पर पहुँचाया। अब ऐसे ठोस सबूत खड़ा करना चाहिए कि बुद्ध की प्रतिभा का अस्त हो जाये।
🚩षडयंत्रकारियों ने वेश्या को दारु पिलाकर जेतवन भेज दिया। पीछे से गुण्डों की टोली वहाँ गई। वेश्या के साथ बलात्कार आदि सब दुष्ट कृत्य करके उसका गला घोंट दिया और लाश को बुद्ध के बगीचे में गाड़कर पलायन हो गये।
🚩लोगों ने राज्यसत्ता के द्वार खटखटाये थे लेकिन सत्तावाले भी कुछ लोग दुष्टों के साथ जुड़े हुए थे। ऐसा थोड़े ही है कि सत्ता में बैठे हुए सब लोग दूध में धोये हुए व्यक्ति होते हैं।
🚩राजा के अधिकारियों के द्वारा जाँच करने पर वेश्या की लाश हाथ लगी। अब दुष्टों ने जोर-शोर से चिल्लाना शुरु कर दिया।
🚩“देखो, हम पहले ही कह रहे थे। वेश्या भी बोल रही थी लेकिन तुम भगतड़े लोग मानते ही नहीं थे। अब देख लिया न? बुद्ध ने सही बात खुल जाने के भय से वेश्या को मरवाकर बगीचे में गड़वा दिया। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी। लेकिन सत्य कहाँ तक छिप सकता है? मुद्दामाल हाथ लग गया। इस ठोस सबूत से बुद्ध की असलियत सिद्ध हो गई। सत्य बाहर आ गया।”
🚩लेकिन उन मूर्खों को पता नहीं कि तुम्हारा बनाया हुआ कल्पित सत्य बाहर आया, वास्तविक सत्य तो आज ढाई हजार वर्ष के बाद भी वैसा ही चमक रहा है। आज बुद्ध भगवान को लाखों लोग जानते हैं, आदरपूर्वक मानते हैं। उनका तेजोद्वेष करने वाले दुष्ट लोग कौन-से नरकों में जलते होंगे क्या पता!
🚩 वर्तमान में जिन संतों के ऊपर आरोप लग रहे हैं उनके भक्त अगर सच्चाई किसी को बताने जाएंगे तो दुष्ट प्रकृति के लोग तो बोलेंगे ही, लेकिन जो हिंदूवादी और राष्ट्रवादी कहलाने वाले लोग है वे भी यही बोलेंगे की कि बुद्ध तो भगवान थे।
🚩 आजकल के संत ऐसे ही है, उनको इतने पैसे की क्या जरूत है? लड़कियों से क्यों मिलते हैं..??? ऐसे कपड़े क्यों पहनते हैं..??? आदि आदि…।
🚩पर उनको पता नही है कि पहले ऋषि मुनियों के पास इतनी सम्पत्ति होती थी कि राजकोष में धन कम पड़ जाता था तो ऋषि मुनियों से लोन लिया जाता था और रही कपड़े की बात तो कई भक्तों की भावना होती है तो पहन लेते हैं और लड़कियां दुःखी होती हैं तो उनके मां-बाप लेकर आते हैं तो कोई दुःख होता है तो मिल लेते हैं,उनके घर थोड़े ही बुलाने जाते हैं और भी कई तर्क वितर्क करेगे लेकिन भक्तों को दुःखी नहीं होना चाहिए। सबके बस की बात नही है कि महापुरुषों को पहचान पाये, आप अपने गुरूदेव का प्रचार प्रसार करते रहें, एक दिन ऐसा आएगा कि निंदा करने वाले भी आपके पास आयेंगे और बोलेंगे कि मुझे भी अपने गुरु के पास ले चलो।
🚩विदेशी फंडेड मीडिया ने हिंदू साधु-संतों की झूठी कहानी बनाकर समाज को परोसी, जिससे समाज गुमराह हो गया और सच्चाई न जानकर झूठ को ही सच मान बैठे, कुछ स्वार्थी नेता राष्ट्रविरोधी ताकतों से मिलकर झूठे केस में संतो को जेल भिजवा रहे हैं पर उसका भी देर सवेर खुलासा होगा क्योंकि सत्य को परेशान किया जाता है पराजित कभी नहीं…।
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🚩🍉 तरबूज के ये फायदे जानकर आप हो जाएंगे हैरान......केवल तरबूज ही नहीं इसके छिलके के भी हैं ढेरों फायदे.......
16 मई 2022
http://azaadbharat.org
🚩🍉 केवल तरबूज ही नहीं इसके छिलके के भी हैं ढेरों फायदे तरबूज के छिलकों की सब्जी बनाकर सभी को खाना चाहिए और इसका प्रचार भी हो ताकि अन्य को भी इसका लाभ मिले।
🚩 सब्जी बनाने में आमचूर का उपयाेग नहीं करना है। यह त्रिदोष कारक होता है। इसकी जगह टमाटर, इमली, आमला पाउडर गुणकारी है।
🚩 तरबूज के छिलके (Watermelon Peel) में भी तरबूज की तरह ही बहुत सारे गुण होते हैं. इसके सेवन से शरीर को कई फायदे मिलते हैं।
🚩 अभी तक आपने तरबूज खाने के फायदे के बारे में पढ़ा और सुना होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं, कि तरबूज की तरह ही इसके छिलके (Melon peel) में भी एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन सी, ए, बी6, जिंक, पोटेशियम और खनिज के साथ-साथ लाइकोपीन, सिट्रूललाइन, क्लोरोफिल और फेनोलिक जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं और इतने सारे गुण (Many qualities) होने के चलते इसके सेवन से शरीर को कई तरह के फायदे (Benefits) मिलते हैं ? इसलिए अगर आप भी तरबूज खाने के बाद इसके छिलके को फेंक देते हैं, तो ऐसा करने से पहले यहां बताए जा रहे तरबूज के छिलकों के फायदों के बारे में जरूर पढ़ लें
🚩 तो आइए जानते हैं कि तरबूज का छिलका हमारे शरीर के लिए किस तरह से फायदेमंद है। अगर आप चाहें तो छिलकों की टूटी-फ्रूटी या अचार बनाकर भी इसका सेवन कर सकते हैं।
👉 इम्यूनिटी बढ़ाता है :
🚩 इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए तरबूज के छिलके का सेवन काफी मदद करता है। इसमें काफी मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है जो इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिकारक शक्ति) को मजबूत बनाने में सहायक है। साथ ही ये वाइट ब्लड सेल्स के उत्पादन को भी प्रोत्साहित करता है, जिससे शरीर में इंफेक्शन नहीं होता और इम्यूनिटी बढ़ती है।
👉 ब्लड प्रेशर कंट्रोल करता है :
🚩 तरबूज के छिलके के सेवन से ब्लड प्रेशर को भी नियंत्रित करने में मदद मिलती है। अगर आप भी अपना ब्लड प्रेशर कंट्रोल करना चाहते हैं तो इस सीजन में तरबूज के साथ इसके छिलकों का सेवन भी जरूर करें।
👉 कब्ज़ दूर करता है :
🚩 : कब्ज़ को दूर करने के लिए भी तरबूज के छिलके का सेवन किया जा सकता है। इसमें काफी मात्रा में फाइबर होता है जो कब्ज से राहत देकर मोशन को सही करने में मदद करता है।
👉 ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करता है:
🚩 : तरबूज का छिलका खाने से ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल लेवल को कंट्रोल करने में भी मदद मिलती है। अगर आप चाहते हैं कि आपका ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल सही रहे, तो आप भी इस गर्मी तरबूज के साथ ही इसके छिलके का सेवन भी ज़रूर करें।
👉 एनर्जी बढ़ाता है :
🚩 : तरबूज के छिलके का सेवन आपकी एनर्जी बढ़ाने का भी काम करता है। इसके छिलके में सिट्रूललाइन एमिनो एसिड पाया जाता है जो मांसपेशियों में ऑक्सीजन की आपूर्ति करता है। इससे शरीर को भरपूर शक्ति मिलती है और शरीर की कार्यक्षमता बढाने में मदद मिलती है।
👉 वजन कम करता है :
🚩 : जिनका वजन बहुत अधिक हो, वे भी वजन कम करने के लिए तरबूज के छिलके का सेवन कर सकते हैं। इसके छिलके के सेवन से फैट को बर्न करने में मदद मिलती है। इसके लिए इसमें मौजूद सिट्रूललाइन एमिनो एसिड सहायता करता है।
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16 मई 2022
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🚩🍉 केवल तरबूज ही नहीं इसके छिलके के भी हैं ढेरों फायदे तरबूज के छिलकों की सब्जी बनाकर सभी को खाना चाहिए और इसका प्रचार भी हो ताकि अन्य को भी इसका लाभ मिले।
🚩 सब्जी बनाने में आमचूर का उपयाेग नहीं करना है। यह त्रिदोष कारक होता है। इसकी जगह टमाटर, इमली, आमला पाउडर गुणकारी है।
🚩 तरबूज के छिलके (Watermelon Peel) में भी तरबूज की तरह ही बहुत सारे गुण होते हैं. इसके सेवन से शरीर को कई फायदे मिलते हैं।
🚩 अभी तक आपने तरबूज खाने के फायदे के बारे में पढ़ा और सुना होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं, कि तरबूज की तरह ही इसके छिलके (Melon peel) में भी एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन सी, ए, बी6, जिंक, पोटेशियम और खनिज के साथ-साथ लाइकोपीन, सिट्रूललाइन, क्लोरोफिल और फेनोलिक जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं और इतने सारे गुण (Many qualities) होने के चलते इसके सेवन से शरीर को कई तरह के फायदे (Benefits) मिलते हैं ? इसलिए अगर आप भी तरबूज खाने के बाद इसके छिलके को फेंक देते हैं, तो ऐसा करने से पहले यहां बताए जा रहे तरबूज के छिलकों के फायदों के बारे में जरूर पढ़ लें
🚩 तो आइए जानते हैं कि तरबूज का छिलका हमारे शरीर के लिए किस तरह से फायदेमंद है। अगर आप चाहें तो छिलकों की टूटी-फ्रूटी या अचार बनाकर भी इसका सेवन कर सकते हैं।
👉 इम्यूनिटी बढ़ाता है :
🚩 इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए तरबूज के छिलके का सेवन काफी मदद करता है। इसमें काफी मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है जो इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिकारक शक्ति) को मजबूत बनाने में सहायक है। साथ ही ये वाइट ब्लड सेल्स के उत्पादन को भी प्रोत्साहित करता है, जिससे शरीर में इंफेक्शन नहीं होता और इम्यूनिटी बढ़ती है।
👉 ब्लड प्रेशर कंट्रोल करता है :
🚩 तरबूज के छिलके के सेवन से ब्लड प्रेशर को भी नियंत्रित करने में मदद मिलती है। अगर आप भी अपना ब्लड प्रेशर कंट्रोल करना चाहते हैं तो इस सीजन में तरबूज के साथ इसके छिलकों का सेवन भी जरूर करें।
👉 कब्ज़ दूर करता है :
🚩 : कब्ज़ को दूर करने के लिए भी तरबूज के छिलके का सेवन किया जा सकता है। इसमें काफी मात्रा में फाइबर होता है जो कब्ज से राहत देकर मोशन को सही करने में मदद करता है।
👉 ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करता है:
🚩 : तरबूज का छिलका खाने से ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल लेवल को कंट्रोल करने में भी मदद मिलती है। अगर आप चाहते हैं कि आपका ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल सही रहे, तो आप भी इस गर्मी तरबूज के साथ ही इसके छिलके का सेवन भी ज़रूर करें।
👉 एनर्जी बढ़ाता है :
🚩 : तरबूज के छिलके का सेवन आपकी एनर्जी बढ़ाने का भी काम करता है। इसके छिलके में सिट्रूललाइन एमिनो एसिड पाया जाता है जो मांसपेशियों में ऑक्सीजन की आपूर्ति करता है। इससे शरीर को भरपूर शक्ति मिलती है और शरीर की कार्यक्षमता बढाने में मदद मिलती है।
👉 वजन कम करता है :
🚩 : जिनका वजन बहुत अधिक हो, वे भी वजन कम करने के लिए तरबूज के छिलके का सेवन कर सकते हैं। इसके छिलके के सेवन से फैट को बर्न करने में मदद मिलती है। इसके लिए इसमें मौजूद सिट्रूललाइन एमिनो एसिड सहायता करता है।
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ज्ञानवापी खाली करो
17 मई 2022
http://azaadbharat.org
🚩मस्जिद और काशी विश्वनाथ मंदिर के बीच 10 फिट का गहरा कुआं है,जिसे ज्ञानवापी कहा जाता है।
🚩मुसलमानों ने कब्जा कर , इस कुएं के नाम पर मस्जिद का नाम कर दिया।
🚩स्कंद पुराण में कहा गया है कि भगवान शिव ने स्वयं लिंगाभिषेक के लिए अपने त्रिशूल से ये कुआं बनाया था।
🚩ज्ञानवापी मंदिर भगवान शिव का प्राचीन मंदिर था,जिसे मुस्लिम आक्रांत औरंगजेब ने 1669 मैं मंदिर तोड़कर वहां पर मस्जिद बनवाई, इसी अनगिनत जगह है जहां मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाई हुई है। इस घटना का वर्णन इसिहास में मिलता है तथा सर्वे के दौरान मस्जिद में मूर्तियों के अवशेष भी मिले हैं।
🚩ज्ञानवापी परिसर के अंदर नंदी की प्रतिमा मौजूद है,नंदी की प्रतिमा मस्जिद या ढांचे की तरफ देख रही है । इतिहासकारों ने कहा उसके अंदर हनुमान जी और गणेश जी की भी प्रतिमा है।
🚩जिसे ज्ञानवापी का तहखाना कहा जा रहा है दरअसल वो पुराने तोड़े गए विश्वनाथ मंदिर का गर्भगृह है । विश्वनाथ मंदिर के पक्षकार विजय शंकर रस्तोगी जी ने दावा किया है कि मस्जिद में एक तहखाना है और तहखाने में अत्यंत विशाल शिवलिंग आज भी विद्यमान है।
🚩काशी ज्ञानवापी मस्जिद पहले मंदिर था उसको मुसलमानों ने कब्जा कर मस्जिद का रूप दिया अभी भी उसमें देवी देवताओं के मूर्ति के चिन्ह मिलते हैं इससे साफ होता है कि ज्ञानवापी मस्जिद नहीं मंदिर है।
🚩ज्ञानवापी को लेकर चौंकाने वाले रहस्य उजागर होना लगातार जारी।
🚩ज्ञानवापी परिसर को लेकर जब से वीडियोग्राफी और सर्वे की बात की जा रही है पूरे भारत के अखबारों में तरह तरह के दावे और रहस्योद्धाटन लगातार छापे जा रहे हैं ।
🚩मुसलमानों ने कई शिवलिंग को तोड़ा था, महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने जब शिवलिंग को यहां स्थापित करवाया तो उनके मन में ये था कि आगे भी शिवलिंग पर हमला करके मुसलमान शिवलिंग तोड़ सकते हैं इसलिए शिवलिंग को जमीन के अंदर गहरे में स्थापित किया जाए ताकी इसको तोड़ पाना आसान ना हो ।
🚩ज्ञानवापी वाले पुराने विश्वनाथ मंदिर का भी जब निर्माण हुआ हो तो इसी भय की वजह से शिवलिंग जमीन की सतह के नीचे स्थापित करवाया गया हो ताकी मुस्लिम आक्रांता शिवलिंग को ना तोड़ सकें और क्योंकि वो शिवलिंग विशाल रहा होगा तो उसने जमीन के नीचे काफी जगह ली होगी जिसे संभवत: अब तहखाना कहा जा रहा है , वही गर्भगृह है।
🚩 साल 1669 में जब औरंगजेब ने इस मंदिर का विध्वंस किया था । पूरी घटना का जिक्र डॉ मोतीचंद्र की किताब काशी का इतिहास में है । मंदिर का पुराना नक्शा देखने पर साफ पता चलता है कि प्राचीन मंदिर अष्टकोणीय था और उसके चारों तरफ भी छोटे मंदिरों की श्रृंखला थी ।
🚩डॉ मोतीचंद्र की किताब के मुताबिक इन छोटे मंदिरों को तोड़वा दिया गया और अष्टकोण मंदिर को चीरते हुए तीन तरफ से एक दीवार उठा दी गई । कुछ लोग ये भी दावा करते हैं कि औरंगजेब के सेनापतियों ने जानबूझकर मस्जिद की पश्चिमी दीवार को मंदिर की ही दीवार रहने दिया ताकी सदैव हिंदुओं को अपमानित होने का बोध सालता रहे । डॉ मोतीचंद्र की किताब काशी का इतिहास के मुताबिक गर्भगृह और आगे के परिसर को बढाकर और मंदिरों को तोड़कर मस्जिद के दालान में बदल दिया गया ।
🚩इस संबंध में कुछ और ही चौंकाने वाले खुलासे यूट्यूब चैनल यूपी तक पर उन महिलाओं ने किए जिन्होंने मां श्रृंगार गौरी का केस दायर किया था । इन महिलाओं ने यू्ट्यूब चैनल पर कहा कि अंजुमन इंतजामिया ने जो बैरीकेड्स लगाए हैं उन बैरीकेड्स के अंदर साल में एक बार दर्शन करने के लिए ये महिलाएं गई थीं और उन महिलाओं ने दावा किया कि आज भी ज्ञानवापी परिसर के अंदर नंदी की प्रतिमा मौजूद है जो कि कथित मस्जिद या ढांचे की तरफ देख रही है । महिलाओं ने कहा उसके अंदर हनुमान जी और गणेश जी की भी प्रतिमा है ।
🚩इस संबंध में एक और वकीर हरिशंकर जैन ने एक टीवी न्यूज चैनल पर दिए गए बयान में आशंका जताई की इस पर भी निगाह रखी जानी चाहिए कि क्या ज्ञानवापी परिसर में प्राचीन निशानों को हटाने के लिए कोई तोड़फोड़ भी की गई है ।
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17 मई 2022
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🚩मस्जिद और काशी विश्वनाथ मंदिर के बीच 10 फिट का गहरा कुआं है,जिसे ज्ञानवापी कहा जाता है।
🚩मुसलमानों ने कब्जा कर , इस कुएं के नाम पर मस्जिद का नाम कर दिया।
🚩स्कंद पुराण में कहा गया है कि भगवान शिव ने स्वयं लिंगाभिषेक के लिए अपने त्रिशूल से ये कुआं बनाया था।
🚩ज्ञानवापी मंदिर भगवान शिव का प्राचीन मंदिर था,जिसे मुस्लिम आक्रांत औरंगजेब ने 1669 मैं मंदिर तोड़कर वहां पर मस्जिद बनवाई, इसी अनगिनत जगह है जहां मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाई हुई है। इस घटना का वर्णन इसिहास में मिलता है तथा सर्वे के दौरान मस्जिद में मूर्तियों के अवशेष भी मिले हैं।
🚩ज्ञानवापी परिसर के अंदर नंदी की प्रतिमा मौजूद है,नंदी की प्रतिमा मस्जिद या ढांचे की तरफ देख रही है । इतिहासकारों ने कहा उसके अंदर हनुमान जी और गणेश जी की भी प्रतिमा है।
🚩जिसे ज्ञानवापी का तहखाना कहा जा रहा है दरअसल वो पुराने तोड़े गए विश्वनाथ मंदिर का गर्भगृह है । विश्वनाथ मंदिर के पक्षकार विजय शंकर रस्तोगी जी ने दावा किया है कि मस्जिद में एक तहखाना है और तहखाने में अत्यंत विशाल शिवलिंग आज भी विद्यमान है।
🚩काशी ज्ञानवापी मस्जिद पहले मंदिर था उसको मुसलमानों ने कब्जा कर मस्जिद का रूप दिया अभी भी उसमें देवी देवताओं के मूर्ति के चिन्ह मिलते हैं इससे साफ होता है कि ज्ञानवापी मस्जिद नहीं मंदिर है।
🚩ज्ञानवापी को लेकर चौंकाने वाले रहस्य उजागर होना लगातार जारी।
🚩ज्ञानवापी परिसर को लेकर जब से वीडियोग्राफी और सर्वे की बात की जा रही है पूरे भारत के अखबारों में तरह तरह के दावे और रहस्योद्धाटन लगातार छापे जा रहे हैं ।
🚩मुसलमानों ने कई शिवलिंग को तोड़ा था, महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने जब शिवलिंग को यहां स्थापित करवाया तो उनके मन में ये था कि आगे भी शिवलिंग पर हमला करके मुसलमान शिवलिंग तोड़ सकते हैं इसलिए शिवलिंग को जमीन के अंदर गहरे में स्थापित किया जाए ताकी इसको तोड़ पाना आसान ना हो ।
🚩ज्ञानवापी वाले पुराने विश्वनाथ मंदिर का भी जब निर्माण हुआ हो तो इसी भय की वजह से शिवलिंग जमीन की सतह के नीचे स्थापित करवाया गया हो ताकी मुस्लिम आक्रांता शिवलिंग को ना तोड़ सकें और क्योंकि वो शिवलिंग विशाल रहा होगा तो उसने जमीन के नीचे काफी जगह ली होगी जिसे संभवत: अब तहखाना कहा जा रहा है , वही गर्भगृह है।
🚩 साल 1669 में जब औरंगजेब ने इस मंदिर का विध्वंस किया था । पूरी घटना का जिक्र डॉ मोतीचंद्र की किताब काशी का इतिहास में है । मंदिर का पुराना नक्शा देखने पर साफ पता चलता है कि प्राचीन मंदिर अष्टकोणीय था और उसके चारों तरफ भी छोटे मंदिरों की श्रृंखला थी ।
🚩डॉ मोतीचंद्र की किताब के मुताबिक इन छोटे मंदिरों को तोड़वा दिया गया और अष्टकोण मंदिर को चीरते हुए तीन तरफ से एक दीवार उठा दी गई । कुछ लोग ये भी दावा करते हैं कि औरंगजेब के सेनापतियों ने जानबूझकर मस्जिद की पश्चिमी दीवार को मंदिर की ही दीवार रहने दिया ताकी सदैव हिंदुओं को अपमानित होने का बोध सालता रहे । डॉ मोतीचंद्र की किताब काशी का इतिहास के मुताबिक गर्भगृह और आगे के परिसर को बढाकर और मंदिरों को तोड़कर मस्जिद के दालान में बदल दिया गया ।
🚩इस संबंध में कुछ और ही चौंकाने वाले खुलासे यूट्यूब चैनल यूपी तक पर उन महिलाओं ने किए जिन्होंने मां श्रृंगार गौरी का केस दायर किया था । इन महिलाओं ने यू्ट्यूब चैनल पर कहा कि अंजुमन इंतजामिया ने जो बैरीकेड्स लगाए हैं उन बैरीकेड्स के अंदर साल में एक बार दर्शन करने के लिए ये महिलाएं गई थीं और उन महिलाओं ने दावा किया कि आज भी ज्ञानवापी परिसर के अंदर नंदी की प्रतिमा मौजूद है जो कि कथित मस्जिद या ढांचे की तरफ देख रही है । महिलाओं ने कहा उसके अंदर हनुमान जी और गणेश जी की भी प्रतिमा है ।
🚩इस संबंध में एक और वकीर हरिशंकर जैन ने एक टीवी न्यूज चैनल पर दिए गए बयान में आशंका जताई की इस पर भी निगाह रखी जानी चाहिए कि क्या ज्ञानवापी परिसर में प्राचीन निशानों को हटाने के लिए कोई तोड़फोड़ भी की गई है ।
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