योग स्वस्थ जीवन की कुंजी है।
21 June 2022
http://azaadbharat.org
🚩21 जून को उत्तरी गोलार्द्ध का सबसे लंबा दिन होता है, जिसे लोग ग्रीष्म संक्रांति भी कहते हैं।
🚩भारतीय परंपरा के मुताबिक, ग्रीष्म संक्रांति के बाद सूर्य दक्षिणायान में प्रवेश करता है।
🚩इस दिन योग करने से कई फायदे मिलते हैं। इसलिए 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है।
🚩"योग भारत की प्राचीन परम्परा का एक अमूल्य उपहार है यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है, मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है,विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है।
🚩यह व्यायाम के बारे में नहीं है, लेकिन अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है। हमारी बदलती जीवन- शैली में यह चेतना बनकर, हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता है। तो आयें एक अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस को गोद लेने की दिशा में काम करते हैं।"
🚩 जो रोजाना योग करते है,उनको हॉस्पिटल का मुँह नही देखना पड़ता ,अर्थात योग करने वाले स्वस्थ रहते ,मजबूत रहते।
🚩वर्तमान समय में अपनी व्यस्त जीवन शैली के कारण लोग संतोष पाने के लिए योग करते हैं। योग से न केवल व्यक्ति का तनाव दूर होता है बल्कि मन और मस्तिष्क को भी शांति मिलती है योग बहुत ही लाभकारी है।
🚩हिन्दू धर्म की शाखाएं जैन धर्म और बौद्ध धर्म में , सिख धर्म में योग के अनेक सम्प्रदाय हैं, योग के विभिन्न लक्ष्य हैं तथा योग के अलग-अलग व्यवहार हैं।परम्परागत योग तथा इसका आधुनिक रूप विश्व भर में प्रसिद्ध हैं।
🚩सबसे पहले 'योग' शब्द का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। इसके बाद अनेक उपनिषदों में इसका उल्लेख आया है। कठोपनिषद में सबसे पहले योग शब्द उसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है जिस अर्थ में इसे आधुनिक समय में समझा जाता है। माना जाता है कि कठोपनिषद की रचना ईसापूर्व पांचवीं और तीसरी शताब्दी ईसापूर्व के बीच के कालखण्ड में हुई थी।
🚩 पतञ्जलि का योगसूत्र योग का सबसे पूर्ण ग्रन्थ है। इसका रचनाकाल ईसा की प्रथम शताब्दी या उसके आसपास माना जाता है। हठ योग के ग्रन्थ ९वीं से लेकर ११वीं शताब्दी में रचे जाने लगे थे। इनका विकास तन्त्र से हुआ।
🚩पश्चिमी जगत में "योग" को हठयोग के आधुनिक रूप में लिया जाता है जिसमें शारीरिक फिटनेस, तनाव-शैथिल्य तथा विश्रान्ति (relaxation) की तकनीकों की प्रधानता है। ये तकनीकें मुख्यतः आसनों पर आधारित हैं जबकि परम्परागत योग का केन्द्र बिन्दु ध्यान है और वह सांसारिक लगावों से छुटकारा दिलाने का प्रयास करता है।
🚩 पश्चिमी जगत में आधुनिक योग का प्रचार-प्रसार भारत से उन देशों में गये गुरुओं ने किया जो प्रायः स्वामी विवेकानन्द की पश्चिमी जगत में प्रसिद्धि के बाद वहाँ गये थे।
🚩योग से मन शांत रहता ,तन निरोग रहता,मोटापा कंट्रोल रहता,अनेक प्रकार की बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए योग करें। मन और दिमाग शांत रहे (Yoga for Mind) ...बीमारियों से करे बचाव (Protect Against Diseases) ...ऊर्जावान और तरोताजा रखे (Energetic and Fresh) ...शरीर को लचीला बनाए (Make Body Flexible) ...फिट रहने में मददगार (Help to Stay Fit) ...तनाव कम करने में सहायक (Helpful in Reducing Stress)
🚩योग मन और तन को संतुष्ट रखने में मदद करता है। एक योग करने वाला व्यक्ति योग न करने वाले व्यक्ति की तुलना में ज्यादा स्वस्थ और खुश रहता है। योग से आंतरिक खुशी मिलती है, आनंद की अनुभूति होती है और मन प्रसन्न रहता है। योग के दौरान ध्यान लगाया जाता है, जो शरीर और मस्तिष्क को मिलाने में मदद करता है।
🚩योग या योगासन करके आप अपने मन और दिमाग को शांत रख सकते हैं। इससे आप मानसिक रूप से एकदम स्वस्थ रह सकते हैं। दरअसल, योग करने से काफी अच्छी नींद आती है जिससे मन शांत रहता है। जिम या एक्सरसाइज से आप शारीरिक रूप से फिट रह सकते हैं, लेकिन योग यानी ध्यान आपको मानसिक सुकून भी देता है। स्वस्थ मन और मस्तिष्क के लिए रोजाना योग का अभ्यास करें।
🚩योग शरीर के लिए काफी फायदेमंद होता है। नियमित रूप से योग करने से बीमारियां आस-पास नहीं भटकती है। योग करने वाला व्यक्ति हमेशा स्वस्थ रहता है। योगाभ्यास रोगों से मुक्ति दिलाने में मदद करता है। योग गंभीर से गंभीर बीमारियों से हमारा बचाव करने में मददगार होता है। इतना ही नहीं अगर कोई व्यक्ति गंभीर बीमारी से पीड़ित है, तो योग उससे भी लड़ने की शक्ति देता है।
🚩रोज सुबह-सुबह के समय करना बेहद फायदेमंद होता है। सुबह योग करने से आप पूरे दिन ऊर्जावान रह सकते हैं। यह शरीर से आलस को दूर कर आपको तरोताजा रखने में भी मदद करता है। योग करने वाला व्यक्ति शारीरिक रूप से सक्रिय रहता है, वह तनावमुक्त रहता है और हमेशा खुश नजर आता है। योग व्यक्ति को प्रकृति के पास ले जाता है।
21 June 2022
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🚩21 जून को उत्तरी गोलार्द्ध का सबसे लंबा दिन होता है, जिसे लोग ग्रीष्म संक्रांति भी कहते हैं।
🚩भारतीय परंपरा के मुताबिक, ग्रीष्म संक्रांति के बाद सूर्य दक्षिणायान में प्रवेश करता है।
🚩इस दिन योग करने से कई फायदे मिलते हैं। इसलिए 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है।
🚩"योग भारत की प्राचीन परम्परा का एक अमूल्य उपहार है यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है, मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है,विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है।
🚩यह व्यायाम के बारे में नहीं है, लेकिन अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है। हमारी बदलती जीवन- शैली में यह चेतना बनकर, हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता है। तो आयें एक अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस को गोद लेने की दिशा में काम करते हैं।"
🚩 जो रोजाना योग करते है,उनको हॉस्पिटल का मुँह नही देखना पड़ता ,अर्थात योग करने वाले स्वस्थ रहते ,मजबूत रहते।
🚩वर्तमान समय में अपनी व्यस्त जीवन शैली के कारण लोग संतोष पाने के लिए योग करते हैं। योग से न केवल व्यक्ति का तनाव दूर होता है बल्कि मन और मस्तिष्क को भी शांति मिलती है योग बहुत ही लाभकारी है।
🚩हिन्दू धर्म की शाखाएं जैन धर्म और बौद्ध धर्म में , सिख धर्म में योग के अनेक सम्प्रदाय हैं, योग के विभिन्न लक्ष्य हैं तथा योग के अलग-अलग व्यवहार हैं।परम्परागत योग तथा इसका आधुनिक रूप विश्व भर में प्रसिद्ध हैं।
🚩सबसे पहले 'योग' शब्द का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। इसके बाद अनेक उपनिषदों में इसका उल्लेख आया है। कठोपनिषद में सबसे पहले योग शब्द उसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है जिस अर्थ में इसे आधुनिक समय में समझा जाता है। माना जाता है कि कठोपनिषद की रचना ईसापूर्व पांचवीं और तीसरी शताब्दी ईसापूर्व के बीच के कालखण्ड में हुई थी।
🚩 पतञ्जलि का योगसूत्र योग का सबसे पूर्ण ग्रन्थ है। इसका रचनाकाल ईसा की प्रथम शताब्दी या उसके आसपास माना जाता है। हठ योग के ग्रन्थ ९वीं से लेकर ११वीं शताब्दी में रचे जाने लगे थे। इनका विकास तन्त्र से हुआ।
🚩पश्चिमी जगत में "योग" को हठयोग के आधुनिक रूप में लिया जाता है जिसमें शारीरिक फिटनेस, तनाव-शैथिल्य तथा विश्रान्ति (relaxation) की तकनीकों की प्रधानता है। ये तकनीकें मुख्यतः आसनों पर आधारित हैं जबकि परम्परागत योग का केन्द्र बिन्दु ध्यान है और वह सांसारिक लगावों से छुटकारा दिलाने का प्रयास करता है।
🚩 पश्चिमी जगत में आधुनिक योग का प्रचार-प्रसार भारत से उन देशों में गये गुरुओं ने किया जो प्रायः स्वामी विवेकानन्द की पश्चिमी जगत में प्रसिद्धि के बाद वहाँ गये थे।
🚩योग से मन शांत रहता ,तन निरोग रहता,मोटापा कंट्रोल रहता,अनेक प्रकार की बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए योग करें। मन और दिमाग शांत रहे (Yoga for Mind) ...बीमारियों से करे बचाव (Protect Against Diseases) ...ऊर्जावान और तरोताजा रखे (Energetic and Fresh) ...शरीर को लचीला बनाए (Make Body Flexible) ...फिट रहने में मददगार (Help to Stay Fit) ...तनाव कम करने में सहायक (Helpful in Reducing Stress)
🚩योग मन और तन को संतुष्ट रखने में मदद करता है। एक योग करने वाला व्यक्ति योग न करने वाले व्यक्ति की तुलना में ज्यादा स्वस्थ और खुश रहता है। योग से आंतरिक खुशी मिलती है, आनंद की अनुभूति होती है और मन प्रसन्न रहता है। योग के दौरान ध्यान लगाया जाता है, जो शरीर और मस्तिष्क को मिलाने में मदद करता है।
🚩योग या योगासन करके आप अपने मन और दिमाग को शांत रख सकते हैं। इससे आप मानसिक रूप से एकदम स्वस्थ रह सकते हैं। दरअसल, योग करने से काफी अच्छी नींद आती है जिससे मन शांत रहता है। जिम या एक्सरसाइज से आप शारीरिक रूप से फिट रह सकते हैं, लेकिन योग यानी ध्यान आपको मानसिक सुकून भी देता है। स्वस्थ मन और मस्तिष्क के लिए रोजाना योग का अभ्यास करें।
🚩योग शरीर के लिए काफी फायदेमंद होता है। नियमित रूप से योग करने से बीमारियां आस-पास नहीं भटकती है। योग करने वाला व्यक्ति हमेशा स्वस्थ रहता है। योगाभ्यास रोगों से मुक्ति दिलाने में मदद करता है। योग गंभीर से गंभीर बीमारियों से हमारा बचाव करने में मददगार होता है। इतना ही नहीं अगर कोई व्यक्ति गंभीर बीमारी से पीड़ित है, तो योग उससे भी लड़ने की शक्ति देता है।
🚩रोज सुबह-सुबह के समय करना बेहद फायदेमंद होता है। सुबह योग करने से आप पूरे दिन ऊर्जावान रह सकते हैं। यह शरीर से आलस को दूर कर आपको तरोताजा रखने में भी मदद करता है। योग करने वाला व्यक्ति शारीरिक रूप से सक्रिय रहता है, वह तनावमुक्त रहता है और हमेशा खुश नजर आता है। योग व्यक्ति को प्रकृति के पास ले जाता है।
🚩अगर आप रोज योग, प्राणायाम या व्यायाम करते हैं, तो इससे आपका शरीर लचीला बन सकता है। योग पूरे शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाता है, जिससे सभी अंग सुचारू रूप से काम करते हैं। एक फ्लैक्सिबल बॉडी पाने की चाहत हर कोई रखता है, ऐसे में योग आपकी मदद कर सकता है।
🚩आजकल लोग शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं रह पाते हैं, जिससे वे कई तरह की लाइफस्टाइल बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। इसमें मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज बेहद सामान्य हैं। अगर आप इन बीमारियों से बचना चाहते हैं, तो रोग को अपनी दिनचर्या में जरूर शामिल करें। यह खराब जीवनशैली से होने वाली बीमारियों से आपको बचाव करने में मदद करता है। इतना ही नहीं अगर आप इन बीमारियों से पीड़ित हैं, तो भी योग करने से आप काफी हद तक इन्हें नियंत्रण में रख सकते हैं।
🚩योग करने से मांसपेशियों को आराम मिलता है, जिससे नींद अच्छी आती है और तनाव भी कम होता है। साथ ही यह व्यक्ति को बीमारियों से दूर और खुश रखता है, जिससे तनाव और अवसाद खुद ही कम हो जाता है। अगर आप इसका नियमित अभ्यास करते हैं, तो इससे धीरे-धीरे आपका तनाव दूर हो सकता है।
🚩स्वस्थ जीवन जीने के लिए रोज करें योग।
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🚩आजकल लोग शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं रह पाते हैं, जिससे वे कई तरह की लाइफस्टाइल बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। इसमें मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज बेहद सामान्य हैं। अगर आप इन बीमारियों से बचना चाहते हैं, तो रोग को अपनी दिनचर्या में जरूर शामिल करें। यह खराब जीवनशैली से होने वाली बीमारियों से आपको बचाव करने में मदद करता है। इतना ही नहीं अगर आप इन बीमारियों से पीड़ित हैं, तो भी योग करने से आप काफी हद तक इन्हें नियंत्रण में रख सकते हैं।
🚩योग करने से मांसपेशियों को आराम मिलता है, जिससे नींद अच्छी आती है और तनाव भी कम होता है। साथ ही यह व्यक्ति को बीमारियों से दूर और खुश रखता है, जिससे तनाव और अवसाद खुद ही कम हो जाता है। अगर आप इसका नियमित अभ्यास करते हैं, तो इससे धीरे-धीरे आपका तनाव दूर हो सकता है।
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ब्रिटिश किसान गाय के गोबर से बिजली पैदा कर रहे, भारत में ऐसा कब होगा ?
22 June 2022
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🚩ब्रिटेन के किसान अब गाय के गोबर से बिजली पैदा करके अच्छी कमाई कर रहे हैं। ये किसान गाय के गोबर का इस्तेमाल करके AA साइज की ‘पैटरी (बैटरी)’ तैयार कर रहे हैं। इन ‘Patteries’ को रिचार्ज भी किया जा सकता है। अब माना जा रहा है कि ये रिचार्जेबल ‘पैटरीज’ ब्रिटेन की रिन्यूवेबल एनर्जी की दिशा में एक बड़ा योगदान दे सकते हैं। अनुसंधान में सामने आया है कि 1 किलो गाय के गोबर से 3.75 kWh (किलोवॉट ऑवर) बिजली पैदा की जा सकती है।
🚩इसे कुछ यूँ समझिए कि एक किलो गाय के गोबर से पैदा हुई बिजली से एक वैक्यूम क्लीनर को 5 घंटे तक संचालित किया जा सकता है, या फिर 3.5 घंटे तक आप आयरन का इस्तेमाल करते हुए कपड़ों पर इस्त्री कर सकते हैं। इन बैटरियों को ‘Arla’ नाम की डेयरी कोऑपरेटिव संस्था ने बनाया है। इस कार्य में ‘GP बैटरीज’ नाम की बैटरी कंपनी ने किसानों की मदद की है। दोनों कंपनियों ने बताया है कि एक गाय से मिलने वाले गोबर से 1 साल तक 3 घरों को बिजली दी जा सकती है।
🚩इस हिसाब से देखा जाए तो अगर 4.6 लाख गायों के गोबर को एकत्रित किया जाए और ऊर्जा के उत्पादन में उनका उपयोग किया जाए तो इससे यूनाइटेड किंगडम के (UK) के 12 लाख घरों में साल भर बिजली की कमी नहीं होगी। विशेषज्ञ इसे ‘विश्वसनीय और सुसंगत’ स्रोत बता रहे हैं, जिससे बिजली पैदा हो सकती है। अकेले ‘Arla’ कंपनी की गायों से हर साल 10 लाख टन गोबर मिलता है।
🚩‘Anaerobic Digestion (अवायवीय पाचन)’ की प्रक्रिया द्वारा गोबर से ऊर्जा प्राप्त की जा रही है।
🚩इस प्रक्रिया के तहत गोबर को बायोगैस और बायो-फर्टिलाइजर में तोड़ दिया जाता है। ब्रिटिश किसानों का कहना है कि ये एक इनोवेटिव प्रयास है, जिससे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध गोबर का सदुपयोग करके ब्रिटेन की एक बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है।
🚩 उनका कहना है कि अपने खेतों और पूरे एस्टेट में वो इसी ऊर्जा का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन इसकी क्षमता इससे कहीं ज्यादा है। यहाँ तक कि गोबर से ऊर्जा बनाने के बाद जो वेस्ट बचता है, उसका उपयोग खेतों में खाद के रूप में किया जाता है।
🚩ये न्यूट्रिएंट्स में काफी रिच होता है। साथ ही एमिशन को भी कम करता है। ये एक प्राकृतिक खाद भी है, जो खेत की मिट्टी की गुणवत्ता को कई गुना बढ़ा देता है। इस तरह सस्टेनेबल फार्मिंग होती है, वो भी अधिक एमिशन के बिना। ऊपर बताई गई प्रक्रिया के तहत जब एक बार बायोगैस को निकाल लिया जाता है, इसे ‘कंबाइंड हीट एंड पॉवर (CHP)’ यूनिट में ले जाया जाता है, जहाँ गोबर से ऊर्जा अर्थात बिजली का उत्पादन होता है।
🚩बायोगैस और बायो-फर्टिलाइजर में गोबर को तोड़ने की प्रक्रिया को ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में किया जाता है। इसे एक ‘Anaerobic Digestor’ नाम के सीलबंद ऑक्सीजन रहित टैंक में किया जाता है। इसके एन्ड प्रोडक्ट के रूप में बायोगैस प्राप्त होती हैं।
🚩‘Arla’ के पास फ़िलहाल 4.60 लाख गायें हैं। हालाँकि, अभी छोटी संख्या में किसान ही गाय के गोबर से बिजली उत्पादन की प्रक्रिया में लगे हुए हैं। लेकिन, रिन्यूवेबल एनर्जी की दिशा में ये गेम चेंजर साबित हो सकता है, ऐसा विशेषज्ञों का कहना है।
🚩भारत के पास देशी गाय माता रूपी खजाना है। गाय माता के गोबर, मूत्र, दूध से हर व्यक्ति सुखी, स्वस्थ और धनवान बन सकता है,लेकिन दुःख इस बात का है कि आज भारत में पवित्र गाय माता काटी जा रही है और देशवासी मूक बने हुए हैं यह उचित नहीं है।
🚩अभी कुत्ते की जगह गाय पालन करना होगा तभी गाय माता की रक्षा होगी और देशवासी स्वस्थ रहेंगे और संपत्तिवान बनेंगे।
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22 June 2022
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🚩ब्रिटेन के किसान अब गाय के गोबर से बिजली पैदा करके अच्छी कमाई कर रहे हैं। ये किसान गाय के गोबर का इस्तेमाल करके AA साइज की ‘पैटरी (बैटरी)’ तैयार कर रहे हैं। इन ‘Patteries’ को रिचार्ज भी किया जा सकता है। अब माना जा रहा है कि ये रिचार्जेबल ‘पैटरीज’ ब्रिटेन की रिन्यूवेबल एनर्जी की दिशा में एक बड़ा योगदान दे सकते हैं। अनुसंधान में सामने आया है कि 1 किलो गाय के गोबर से 3.75 kWh (किलोवॉट ऑवर) बिजली पैदा की जा सकती है।
🚩इसे कुछ यूँ समझिए कि एक किलो गाय के गोबर से पैदा हुई बिजली से एक वैक्यूम क्लीनर को 5 घंटे तक संचालित किया जा सकता है, या फिर 3.5 घंटे तक आप आयरन का इस्तेमाल करते हुए कपड़ों पर इस्त्री कर सकते हैं। इन बैटरियों को ‘Arla’ नाम की डेयरी कोऑपरेटिव संस्था ने बनाया है। इस कार्य में ‘GP बैटरीज’ नाम की बैटरी कंपनी ने किसानों की मदद की है। दोनों कंपनियों ने बताया है कि एक गाय से मिलने वाले गोबर से 1 साल तक 3 घरों को बिजली दी जा सकती है।
🚩इस हिसाब से देखा जाए तो अगर 4.6 लाख गायों के गोबर को एकत्रित किया जाए और ऊर्जा के उत्पादन में उनका उपयोग किया जाए तो इससे यूनाइटेड किंगडम के (UK) के 12 लाख घरों में साल भर बिजली की कमी नहीं होगी। विशेषज्ञ इसे ‘विश्वसनीय और सुसंगत’ स्रोत बता रहे हैं, जिससे बिजली पैदा हो सकती है। अकेले ‘Arla’ कंपनी की गायों से हर साल 10 लाख टन गोबर मिलता है।
🚩‘Anaerobic Digestion (अवायवीय पाचन)’ की प्रक्रिया द्वारा गोबर से ऊर्जा प्राप्त की जा रही है।
🚩इस प्रक्रिया के तहत गोबर को बायोगैस और बायो-फर्टिलाइजर में तोड़ दिया जाता है। ब्रिटिश किसानों का कहना है कि ये एक इनोवेटिव प्रयास है, जिससे प्रचुर मात्रा में उपलब्ध गोबर का सदुपयोग करके ब्रिटेन की एक बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है।
🚩 उनका कहना है कि अपने खेतों और पूरे एस्टेट में वो इसी ऊर्जा का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन इसकी क्षमता इससे कहीं ज्यादा है। यहाँ तक कि गोबर से ऊर्जा बनाने के बाद जो वेस्ट बचता है, उसका उपयोग खेतों में खाद के रूप में किया जाता है।
🚩ये न्यूट्रिएंट्स में काफी रिच होता है। साथ ही एमिशन को भी कम करता है। ये एक प्राकृतिक खाद भी है, जो खेत की मिट्टी की गुणवत्ता को कई गुना बढ़ा देता है। इस तरह सस्टेनेबल फार्मिंग होती है, वो भी अधिक एमिशन के बिना। ऊपर बताई गई प्रक्रिया के तहत जब एक बार बायोगैस को निकाल लिया जाता है, इसे ‘कंबाइंड हीट एंड पॉवर (CHP)’ यूनिट में ले जाया जाता है, जहाँ गोबर से ऊर्जा अर्थात बिजली का उत्पादन होता है।
🚩बायोगैस और बायो-फर्टिलाइजर में गोबर को तोड़ने की प्रक्रिया को ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में किया जाता है। इसे एक ‘Anaerobic Digestor’ नाम के सीलबंद ऑक्सीजन रहित टैंक में किया जाता है। इसके एन्ड प्रोडक्ट के रूप में बायोगैस प्राप्त होती हैं।
🚩‘Arla’ के पास फ़िलहाल 4.60 लाख गायें हैं। हालाँकि, अभी छोटी संख्या में किसान ही गाय के गोबर से बिजली उत्पादन की प्रक्रिया में लगे हुए हैं। लेकिन, रिन्यूवेबल एनर्जी की दिशा में ये गेम चेंजर साबित हो सकता है, ऐसा विशेषज्ञों का कहना है।
🚩भारत के पास देशी गाय माता रूपी खजाना है। गाय माता के गोबर, मूत्र, दूध से हर व्यक्ति सुखी, स्वस्थ और धनवान बन सकता है,लेकिन दुःख इस बात का है कि आज भारत में पवित्र गाय माता काटी जा रही है और देशवासी मूक बने हुए हैं यह उचित नहीं है।
🚩अभी कुत्ते की जगह गाय पालन करना होगा तभी गाय माता की रक्षा होगी और देशवासी स्वस्थ रहेंगे और संपत्तिवान बनेंगे।
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क्या आपको मालूम है, मांसाहार करने से कितनी भयंकर हानी होती है....
23 June 2022
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🚩विश्व स्वास्थ्य संगठन रिपोर्ट के अनुसार मांसाहारी भोजन करने वाले को कई तरह की बीमारियां घेर लेती है,जैसे हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटिज, दिल की बीमारी, कैंसर, गुर्दे का रोग, गठिया, अल्सर आदि रोग होते ही हैं, जबकि शाकाहारी भोजन करने वाला स्वस्थ,दीर्घायु,तंदुरुस्त रहता हैं।
🚩यदि विश्व के लोग मांस खाना छोड़ दे तो 70% तक प्रदूषण कम हो सकता हैं।
🚩मांसाहार का सेवन करना हिंदू संस्कृति में वर्जित है क्योंकि यह मनुष्य का नहीं राक्षसी भोजन है। जो तरह-तरह के अमृत पूर्ण शाकाहारी उत्तम पदार्थों को छोड़ घृणित मांस आदि पदार्थों को खाते हैं ऐसे मनुष्य राक्षस के समान होते हैं। धार्मिक ग्रंथों में जीव हत्या को पाप बताया गया है इसलिए बहुत से लोग शाकाहार का अनुसरण करते हैं।
🚩सनातन संस्कृति में गौमांस को खाना पाप माना गया है क्योंकि जब भगवान विष्णु कृष्ण रूप में धरती पर अवतरीत हुए तो उन्होंने गौ प्रेम से लेकर गौ भक्ति तक बहुत सी लीलाएं की जिससे पृथ्वी वासियों को गौ धन की महिमा से अवगत करवाया जा सके। गाय का दूध, घी, गोबर और गोमूत्र अनेक रोगों की एक दवा है। माना जाता है कि गाय के इन बहुमूल्य द्रव्यों को खाने से शरीर में पापों का समावेश नहीं हो पाता। श्री कृष्ण अनेकों गायों को पालन-पोषण करते तथा उन्हें मां समान पूजते तभी तो उनको गोपाल कहा जाता है।
🚩ऋग्वेद में गाय को जगत माता का दर्जा दिया गया है। अनेकों पुराणों के रचियता वेद व्यास जी के अनुसार, “गाय धरती की माता हैं और उनकी रक्षा में ही समाज कि उन्नति है। गाय की देख-भाल करने वाले को ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त होता है।”
🚩महाभारत में वर्णित है, “जो व्यक्ति सौ वर्षों तक लगातार अश्वमेघ यज्ञ करता है और जो व्यक्ति मांस नहीं खाता, उनमें से मांसाहार का त्यागी ही विशेष पुण्यवान माना जाता है।”
🚩मनुस्मृति में वर्णित है, “जो व्यक्ति अपने सुख के लिए निरपराध प्राणियों की हत्या करता है, वह इस लोक और परलोक में कहीं भी सुख प्राप्त नहीं करता। “
🚩इसके अतिरिक्त यदि चमड़े के पात्र में रखा घी, तेल, जल, हींग आदि खाते हैं तो भी आप शाकाहारी नहीं हैं।
🚩अब हम आपको मांसाहार के नुकसान का वैज्ञानिक दृष्टिकोण बताते हैं जिसके अनुसार मांस हमारे शरीर के लिए नुकसानदेय होता है।
🚩1. मांस खाने वाले ज्यादातर लोगों में चिडचिडापन और ज्यादा क्रोध होने के लक्षण पाए जाते हैं। ऐसे लोग स्वभाव से बहुत ज्यादा उग्र होते हैं। मांस खाने से आपके शरीर और मन दोनों अस्वस्थ बन जाते हैं।
🚩2. मांसाहारी खाने वाले लोग शाकाहारी की तुलना में गंभीर बिमारियों की चपेट में ज्यादा आते हैं। इन बीमारियों में हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटिज, दिल की बीमारी, कैंसर, गुर्दे का रोग, गठिया और अल्सर शामिल हैं।
🚩3. विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार मांसाहार का सेवन करना हमारे शरीर के लिए उतना ही नुकसानदायक होता है जितना कि धूम्रपान असर करता है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पका हुआ मांस खाने से कैंसर का खतरा बना रहता है।
🚩4.मांसाहार की तुलना में शाकाहारी भोजन सबसे ज्यादा फायदेमंद होता है। शाकाहारी भोजन करने से मनुष्य स्वस्थ, दीर्घायु, निरोग और तंदरुस्त बनाता है।
🚩5.आप सभी ने बर्ड फ्लू और स्वाइन फ्लू का नाम सुना होगा। यह बीमारी मुर्गे और सुअरों के जरिए मनुष्यों तक पहुंचती है। यह बीमारी हमारे शरीर तक तभी पहुंचती है जब हम इस बीमारी से ग्रस्त जीव को खाते हैं। हर साल इसकी वजह से लाखों लोग मौत की चपेट में आ जाते हैं।
🚩6. दुनिया के एक चौथाई प्रदूषण का कारण मांस है। यदि विश्व के लोग मांस खाना छोड दें तो 70 प्रतिशत तक प्रदूषण कम हो सकता है।
🚩7. मांस खाने से मनुष्य की उम्र भी कम होती है।
🚩8. विज्ञान के अनुसार शाकाहारी लोग मासांहार करने वालों की तुलना में डिप्रेशन का शिकार कम बनते हैं।
🚩9. मांसाहारी भोजन में गरम मसालों को स्वाद बढ़ाने के लिए डाला जाता है। इसे पचाने के लिए शरीर के अंगों पर ज्यादा दबाव पड़ता है।
🚩अनजान फल, बहुत छोटा फल, जिस फल का स्वाद बदल गया हो, खट्टापन आ जाए, बासी दही, मट्ठा, वर्षा के साथ गिरने वाले ओले, द्विदल आदि शाकाहारी व्यक्ति को नहीं खाने चाहिए। इनके खाने से मांसाहार का दोष तो लगता ही है, उदर में पहुंच कर ये अनेक प्रकार के रोग पैदा कर देते हैं। हमारा धर्म हमें जो खाने की अनुमति देता है वो सब भक्ष्य है हमारे लिए शाकाहार है। चाहे वो दही हो या अंकुरित मूंग या दूध, ये सब खाकर भी आप यदि हिन्दू हैं तो शाकाहारी ही रहेंगें।
23 June 2022
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🚩विश्व स्वास्थ्य संगठन रिपोर्ट के अनुसार मांसाहारी भोजन करने वाले को कई तरह की बीमारियां घेर लेती है,जैसे हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटिज, दिल की बीमारी, कैंसर, गुर्दे का रोग, गठिया, अल्सर आदि रोग होते ही हैं, जबकि शाकाहारी भोजन करने वाला स्वस्थ,दीर्घायु,तंदुरुस्त रहता हैं।
🚩यदि विश्व के लोग मांस खाना छोड़ दे तो 70% तक प्रदूषण कम हो सकता हैं।
🚩मांसाहार का सेवन करना हिंदू संस्कृति में वर्जित है क्योंकि यह मनुष्य का नहीं राक्षसी भोजन है। जो तरह-तरह के अमृत पूर्ण शाकाहारी उत्तम पदार्थों को छोड़ घृणित मांस आदि पदार्थों को खाते हैं ऐसे मनुष्य राक्षस के समान होते हैं। धार्मिक ग्रंथों में जीव हत्या को पाप बताया गया है इसलिए बहुत से लोग शाकाहार का अनुसरण करते हैं।
🚩सनातन संस्कृति में गौमांस को खाना पाप माना गया है क्योंकि जब भगवान विष्णु कृष्ण रूप में धरती पर अवतरीत हुए तो उन्होंने गौ प्रेम से लेकर गौ भक्ति तक बहुत सी लीलाएं की जिससे पृथ्वी वासियों को गौ धन की महिमा से अवगत करवाया जा सके। गाय का दूध, घी, गोबर और गोमूत्र अनेक रोगों की एक दवा है। माना जाता है कि गाय के इन बहुमूल्य द्रव्यों को खाने से शरीर में पापों का समावेश नहीं हो पाता। श्री कृष्ण अनेकों गायों को पालन-पोषण करते तथा उन्हें मां समान पूजते तभी तो उनको गोपाल कहा जाता है।
🚩ऋग्वेद में गाय को जगत माता का दर्जा दिया गया है। अनेकों पुराणों के रचियता वेद व्यास जी के अनुसार, “गाय धरती की माता हैं और उनकी रक्षा में ही समाज कि उन्नति है। गाय की देख-भाल करने वाले को ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त होता है।”
🚩महाभारत में वर्णित है, “जो व्यक्ति सौ वर्षों तक लगातार अश्वमेघ यज्ञ करता है और जो व्यक्ति मांस नहीं खाता, उनमें से मांसाहार का त्यागी ही विशेष पुण्यवान माना जाता है।”
🚩मनुस्मृति में वर्णित है, “जो व्यक्ति अपने सुख के लिए निरपराध प्राणियों की हत्या करता है, वह इस लोक और परलोक में कहीं भी सुख प्राप्त नहीं करता। “
🚩इसके अतिरिक्त यदि चमड़े के पात्र में रखा घी, तेल, जल, हींग आदि खाते हैं तो भी आप शाकाहारी नहीं हैं।
🚩अब हम आपको मांसाहार के नुकसान का वैज्ञानिक दृष्टिकोण बताते हैं जिसके अनुसार मांस हमारे शरीर के लिए नुकसानदेय होता है।
🚩1. मांस खाने वाले ज्यादातर लोगों में चिडचिडापन और ज्यादा क्रोध होने के लक्षण पाए जाते हैं। ऐसे लोग स्वभाव से बहुत ज्यादा उग्र होते हैं। मांस खाने से आपके शरीर और मन दोनों अस्वस्थ बन जाते हैं।
🚩2. मांसाहारी खाने वाले लोग शाकाहारी की तुलना में गंभीर बिमारियों की चपेट में ज्यादा आते हैं। इन बीमारियों में हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटिज, दिल की बीमारी, कैंसर, गुर्दे का रोग, गठिया और अल्सर शामिल हैं।
🚩3. विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार मांसाहार का सेवन करना हमारे शरीर के लिए उतना ही नुकसानदायक होता है जितना कि धूम्रपान असर करता है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पका हुआ मांस खाने से कैंसर का खतरा बना रहता है।
🚩4.मांसाहार की तुलना में शाकाहारी भोजन सबसे ज्यादा फायदेमंद होता है। शाकाहारी भोजन करने से मनुष्य स्वस्थ, दीर्घायु, निरोग और तंदरुस्त बनाता है।
🚩5.आप सभी ने बर्ड फ्लू और स्वाइन फ्लू का नाम सुना होगा। यह बीमारी मुर्गे और सुअरों के जरिए मनुष्यों तक पहुंचती है। यह बीमारी हमारे शरीर तक तभी पहुंचती है जब हम इस बीमारी से ग्रस्त जीव को खाते हैं। हर साल इसकी वजह से लाखों लोग मौत की चपेट में आ जाते हैं।
🚩6. दुनिया के एक चौथाई प्रदूषण का कारण मांस है। यदि विश्व के लोग मांस खाना छोड दें तो 70 प्रतिशत तक प्रदूषण कम हो सकता है।
🚩7. मांस खाने से मनुष्य की उम्र भी कम होती है।
🚩8. विज्ञान के अनुसार शाकाहारी लोग मासांहार करने वालों की तुलना में डिप्रेशन का शिकार कम बनते हैं।
🚩9. मांसाहारी भोजन में गरम मसालों को स्वाद बढ़ाने के लिए डाला जाता है। इसे पचाने के लिए शरीर के अंगों पर ज्यादा दबाव पड़ता है।
🚩अनजान फल, बहुत छोटा फल, जिस फल का स्वाद बदल गया हो, खट्टापन आ जाए, बासी दही, मट्ठा, वर्षा के साथ गिरने वाले ओले, द्विदल आदि शाकाहारी व्यक्ति को नहीं खाने चाहिए। इनके खाने से मांसाहार का दोष तो लगता ही है, उदर में पहुंच कर ये अनेक प्रकार के रोग पैदा कर देते हैं। हमारा धर्म हमें जो खाने की अनुमति देता है वो सब भक्ष्य है हमारे लिए शाकाहार है। चाहे वो दही हो या अंकुरित मूंग या दूध, ये सब खाकर भी आप यदि हिन्दू हैं तो शाकाहारी ही रहेंगें।
🚩मनुष्य मूलतः शाकाहारी है। ज्यादा मांसाहार से चिड़चिड़ेपन के साथ स्वभाव उग्र होने लगता है। यह वस्तुतः तन के साथ मन को भी अस्वस्थ कर देता है। प्रकृति ने कितनी चीजें दी हैं जिन्हें खाकर हम स्वस्थ रह सकते हैं फिर मांस ही क्यों ?
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रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस पर शत्-शत् नमन।
24 June 2022
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🚩वीरांगना रानी दुर्गावती के नाम से मुंगलो की सेना काँपती थी,रानी ने अकबर की विशाल सेना को 3 बार रौंद डाला था,रानी दुर्गावती अपनी आखरी सांस तक देश के लिए लड़ती रही।
🚩भारत की नारियों में अथाह सामर्थ्य,शक्ति है। हमारे देश में आज क्रूर,लुटेरे,आक्रमणकारी, बलात्कारी मुंगलो का इतिहास पढ़ाया जाता है,लेकिन देश के लिए प्राण देने वाली वीरांगनाओं के बारे में इतिहास में नहीं पढ़ाया जाता है।
🚩भारत की रक्षा के लिए रानी दुर्गावती ने 3 बार मुस्लिम सेना को खदेड़ दिया था।
🚩रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस पर भारत में शूर, बुद्धिमान और साहसी कई वीरांगनाएँ पैदा हुई, जिनके नाम से ही मुगल सल्तनत काँपने लगती थी पर दुर्भाग्य की बात यह है कि भारत के इतिहास में उनको कहीं स्थान नहीं दिया गया इसके विपरीत क्रूर, लुटेरे, बलात्कारी मुगलों व अंग्रेजो का इतिहास पढ़ाया जाता है । आज अगर सही इतिहास पढ़ाया जाए तो हमारी भावी पीढ़ी पश्चिमी संस्कृति की तरफ मुड़कर भी नही देखेगी इतना महान इतिहास है अपना।
🚩 भारत की नारियों में अथाह सामर्थ्य है, अथाह शक्ति है। भारतीय संस्कृति के बताये हुए मार्ग के अनुसार अपनी छुपी हुई शक्ति को जाग्रत करके अवश्य महान बन सकती है । आज स्वतन्त्रता और फैशन के नाम पर नारियों का शोषण किया जा रहा है। नारी अबला नही बल्कि सबला है। नारी कितनी महान है उसका आपको एक महान नारी की याददाश्त को ताजा कराते हैं।
🚩 रानी दुर्गावती का जन्म 10 जून, 1525 को तथा हिंदु कालगणनानुसार आषाढ शुक्ल द्वितीया को चंदेल राजा कीर्ति सिंह तथा रानी कमलावती के गर्भ से हुआ । वे बाल्यावस्था से ही शूर, बुद्धिमान और साहसी थीं । उन्होंने युद्धकला का प्रशिक्षण भी उसी समय लिया । प्रचाप (बंदूक) भाला, तलवार और धनुष-बाण चलाने में वह प्रवीण थी ।
🚩 गोंड राज्य के शिल्पकार राजा संग्राम सिंह बहुत शूर तथा पराक्रमी थे । उनके सुपुत्र वीरदलपति सिंह का विवाह रानी दुर्गावती के साथ वर्ष 1542 में हुआ । वर्ष 1541 में राजा संग्राम सिंह का निधन होने से राज्य का कार्यकाज वीरदलपति सिंह ही देखते थे । उन दोनों का वैवाहिक जीवन 7-8 वर्ष अच्छे से चल रहा था । इसी कालावधि में उन्हें वीरनारायण सिंह नामक एक सुपुत्र भी हुआ ।
🚩 रानी दुर्गावती ने राजवंशव की बागडोर थाम ली: दलपतशाह की मृत्यु लगभग 1550 ईसवी सदी में हुई । उस समय वीर नारायण की आयु बहुत अल्प होने के कारण, रानी दुर्गावती ने गोंड राज्यकी बागडोर (लगाम) अपने हाथों में थाम ली । अधर कायस्थ एवं मन ठाकुर, इन दो मंत्रियों ने सफलतापूर्वक तथा प्रभावी रूप से राज्य का प्रशासन चलाने में रानी की मदद की । रानी ने सिंगौरगढ से अपनी राजधानी चौरागढ स्थानांतरित की । सातपुडा पर्वत से घिरे इस दुर्ग का (किलेका) रणनीतिकी दृष्टि से बडा महत्त्व था।
🚩 कहा जाता है कि इस कालावधि में व्यापार बडा फूला-फला । प्रजा संपन्न एवं समृद्ध थी । अपने पति के पूर्वजों की तरह रानी ने भी राज्य की सीमा बढाई तथा बडी कुशलता, उदारता एवं साहस के साथ गोंडवन का राजनैतिक एकीकरण ( गर्हा-काटंगा) प्रस्थापित किया । राज्यके 23000 गांवों में से 12000 गांवों का व्यवस्थापन उसकी सरकार करती थी । अच्छी तरह से सुसज्जित सेना में 20,000 घुडसवार तथा 1000 हाथीदल के साध बडी संख्या में पैदल सेना भी अंतर्भूत थी । रानी दुर्गावती में सौंदर्य एवं उदारता का धैर्य एवं बुद्धिमत्ता का सुंदर संगम था । अपनी प्रजा के सुख के लिए उन्होंने राज्य में कई काम करवाए तथा अपनी प्रजा का ह्रदय (दिल) जीत लिया । जबलपुर के निकट ‘रानीताल’ नामका भव्य जलाशय बनवाया । उनकी पहल से प्रेरित होकर उनके अनुयायियों ने चेरीतल का निर्माण किया तथा अधर कायस्थ ने जबलपुर से तीन मील की दूरी पर अधरतल का निर्माण किया । उन्होंने अपने राज्य में अध्ययन को भी बढावा दिया ।
🚩 शक्तिशाली राजा को युद्ध में हराया:राजा दलपति सिंह के निधन के उपरांत कुछ शत्रुओं की कुदृष्टि इस समृद्धशाली राज्य पर पडी । मालवा का मांडलिक राजा बाजबहादुर ने विचार किया, हम एक दिन में गोंडवाना अपने अधिकार में लेंगे । उसने बडी आशा से गोंडवाना पर आक्रमण किया; परंतु रानी ने उसे पराजित किया । उसका कारण था रानी का संगठन चातुर्य । रानी दुर्गावती द्वारा बाजबहादुर जैसे शक्तिशाली राजा को युद्ध में हराने से उसकी कीर्ति सर्वदूर फैल गई ।
🚩 सम्राट अकबर के कानोंतक जब पहुंची तो वह चकित हो गया । रानी का साहस और पराक्रम देखकर उसके प्रति आदर व्यक्त करने के लिए अपनी राजसभा के (दरबार) विद्वान
24 June 2022
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🚩वीरांगना रानी दुर्गावती के नाम से मुंगलो की सेना काँपती थी,रानी ने अकबर की विशाल सेना को 3 बार रौंद डाला था,रानी दुर्गावती अपनी आखरी सांस तक देश के लिए लड़ती रही।
🚩भारत की नारियों में अथाह सामर्थ्य,शक्ति है। हमारे देश में आज क्रूर,लुटेरे,आक्रमणकारी, बलात्कारी मुंगलो का इतिहास पढ़ाया जाता है,लेकिन देश के लिए प्राण देने वाली वीरांगनाओं के बारे में इतिहास में नहीं पढ़ाया जाता है।
🚩भारत की रक्षा के लिए रानी दुर्गावती ने 3 बार मुस्लिम सेना को खदेड़ दिया था।
🚩रानी दुर्गावती के बलिदान दिवस पर भारत में शूर, बुद्धिमान और साहसी कई वीरांगनाएँ पैदा हुई, जिनके नाम से ही मुगल सल्तनत काँपने लगती थी पर दुर्भाग्य की बात यह है कि भारत के इतिहास में उनको कहीं स्थान नहीं दिया गया इसके विपरीत क्रूर, लुटेरे, बलात्कारी मुगलों व अंग्रेजो का इतिहास पढ़ाया जाता है । आज अगर सही इतिहास पढ़ाया जाए तो हमारी भावी पीढ़ी पश्चिमी संस्कृति की तरफ मुड़कर भी नही देखेगी इतना महान इतिहास है अपना।
🚩 भारत की नारियों में अथाह सामर्थ्य है, अथाह शक्ति है। भारतीय संस्कृति के बताये हुए मार्ग के अनुसार अपनी छुपी हुई शक्ति को जाग्रत करके अवश्य महान बन सकती है । आज स्वतन्त्रता और फैशन के नाम पर नारियों का शोषण किया जा रहा है। नारी अबला नही बल्कि सबला है। नारी कितनी महान है उसका आपको एक महान नारी की याददाश्त को ताजा कराते हैं।
🚩 रानी दुर्गावती का जन्म 10 जून, 1525 को तथा हिंदु कालगणनानुसार आषाढ शुक्ल द्वितीया को चंदेल राजा कीर्ति सिंह तथा रानी कमलावती के गर्भ से हुआ । वे बाल्यावस्था से ही शूर, बुद्धिमान और साहसी थीं । उन्होंने युद्धकला का प्रशिक्षण भी उसी समय लिया । प्रचाप (बंदूक) भाला, तलवार और धनुष-बाण चलाने में वह प्रवीण थी ।
🚩 गोंड राज्य के शिल्पकार राजा संग्राम सिंह बहुत शूर तथा पराक्रमी थे । उनके सुपुत्र वीरदलपति सिंह का विवाह रानी दुर्गावती के साथ वर्ष 1542 में हुआ । वर्ष 1541 में राजा संग्राम सिंह का निधन होने से राज्य का कार्यकाज वीरदलपति सिंह ही देखते थे । उन दोनों का वैवाहिक जीवन 7-8 वर्ष अच्छे से चल रहा था । इसी कालावधि में उन्हें वीरनारायण सिंह नामक एक सुपुत्र भी हुआ ।
🚩 रानी दुर्गावती ने राजवंशव की बागडोर थाम ली: दलपतशाह की मृत्यु लगभग 1550 ईसवी सदी में हुई । उस समय वीर नारायण की आयु बहुत अल्प होने के कारण, रानी दुर्गावती ने गोंड राज्यकी बागडोर (लगाम) अपने हाथों में थाम ली । अधर कायस्थ एवं मन ठाकुर, इन दो मंत्रियों ने सफलतापूर्वक तथा प्रभावी रूप से राज्य का प्रशासन चलाने में रानी की मदद की । रानी ने सिंगौरगढ से अपनी राजधानी चौरागढ स्थानांतरित की । सातपुडा पर्वत से घिरे इस दुर्ग का (किलेका) रणनीतिकी दृष्टि से बडा महत्त्व था।
🚩 कहा जाता है कि इस कालावधि में व्यापार बडा फूला-फला । प्रजा संपन्न एवं समृद्ध थी । अपने पति के पूर्वजों की तरह रानी ने भी राज्य की सीमा बढाई तथा बडी कुशलता, उदारता एवं साहस के साथ गोंडवन का राजनैतिक एकीकरण ( गर्हा-काटंगा) प्रस्थापित किया । राज्यके 23000 गांवों में से 12000 गांवों का व्यवस्थापन उसकी सरकार करती थी । अच्छी तरह से सुसज्जित सेना में 20,000 घुडसवार तथा 1000 हाथीदल के साध बडी संख्या में पैदल सेना भी अंतर्भूत थी । रानी दुर्गावती में सौंदर्य एवं उदारता का धैर्य एवं बुद्धिमत्ता का सुंदर संगम था । अपनी प्रजा के सुख के लिए उन्होंने राज्य में कई काम करवाए तथा अपनी प्रजा का ह्रदय (दिल) जीत लिया । जबलपुर के निकट ‘रानीताल’ नामका भव्य जलाशय बनवाया । उनकी पहल से प्रेरित होकर उनके अनुयायियों ने चेरीतल का निर्माण किया तथा अधर कायस्थ ने जबलपुर से तीन मील की दूरी पर अधरतल का निर्माण किया । उन्होंने अपने राज्य में अध्ययन को भी बढावा दिया ।
🚩 शक्तिशाली राजा को युद्ध में हराया:राजा दलपति सिंह के निधन के उपरांत कुछ शत्रुओं की कुदृष्टि इस समृद्धशाली राज्य पर पडी । मालवा का मांडलिक राजा बाजबहादुर ने विचार किया, हम एक दिन में गोंडवाना अपने अधिकार में लेंगे । उसने बडी आशा से गोंडवाना पर आक्रमण किया; परंतु रानी ने उसे पराजित किया । उसका कारण था रानी का संगठन चातुर्य । रानी दुर्गावती द्वारा बाजबहादुर जैसे शक्तिशाली राजा को युद्ध में हराने से उसकी कीर्ति सर्वदूर फैल गई ।
🚩 सम्राट अकबर के कानोंतक जब पहुंची तो वह चकित हो गया । रानी का साहस और पराक्रम देखकर उसके प्रति आदर व्यक्त करने के लिए अपनी राजसभा के (दरबार) विद्वान
गोमहापात्र’ तथा नरहरिमहापात्र’को रानी की राजसभा में भेज दिया । रानी ने भी उन्हें आदर तथा पुरस्कार देकर सम्मानित किया । इससे अकबर ने सन् 1540 में वीर नारायण सिंह को राज्यका शासक मानकर स्वीकार किया । इस प्रकारसे शक्तिशाली राज्य सेमित्रता बढने लगी । रानी तलवार की अपेक्षा बंदूक का प्रयोग अधिक करती थी । बंदूक से लक्ष साधने में वह अधिक दक्ष थी । ‘एक गोली एक बली’, ऐसी उनकी आखेट की पद्धति थी । रानी दुर्गावती राज्यकार्य संभालने में बहुत चतुर, पराक्रमी और दूरदर्शी थी।
🚩 अकबर का सेनानी तीन बार रानि से पराजित: अकबर ने वर्ष 1563 में आसफ खान नामक बलाढ्य सेनानी को (सरदार) गोंडवाना पर आक्रमण करने भेज दिया । यह समाचार मिलते ही रानी ने अपनी व्यूहरचना आरंभ कर दी । सर्वप्रथम अपने विश्वसनीय दूतों द्वारा अपने मांडलिक राजाओं तथा सेनानायकों को सावधान हो जाने की सूचनाएं भेज दीं । अपनी सेना की कुछ टुकडियों को घने जंगल में छिपा रखा और शेष को अपने साथ लेकर रानी निकल पडी । रानी ने सैनिकों को मार्गदर्शन किया । एक पर्वत की तलहटी पर आसफ खान और रानी दुर्गावती का सामना हुआ । बडे आवेश से युद्ध हुआ । मुगल सेना विशाल थी । उसमें बंदूकधारी सैनिक अधिक थे । इस कारण रानी के सैनिक मरने लगे; परंतु इतने में जंगल में छिपी सेना ने अचानक धनुष-बाण से आक्रमण कर, बाणों की वर्षा की । इससे मुगल सेना को भारी क्षति पहुंची और रानी दुर्गावती ने आसफ खान को पराजित किया । आसफ खान ने एक वर्ष की अवधि में 3 बार आक्रमण किया और तीनों ही बार वह पराजित हुआ।
🚩 स्वतंत्रता के लिए आत्मबलिदान:अंतमें वर्ष 1564 में आसफखान ने सिंगारगढ पर घेरा डाला; परंतु रानी वहां से भागने में सफल हुई । यह समाचार पाते ही आसफ खान ने रानी का पीछा किया । पुनः युद्ध आरंभ हो गया । दोनो ओर से सैनिकों को भारी क्षति पहुंची । रानी प्राणों पर खेलकर युद्ध कर रही थीं । इतने में रानी के पुत्र वीरनारायण सिंह के अत्यंत घायल होने का समाचार सुनकर सेना में भगदड मच गई । सैनिक भागने लगे । रानी के पास केवल 300 सैनिक थे । उन्हीं सैनिकों के साथ रानी स्वयं घायल होनेपर भी आसफ खान से शौर्य से लड रही थी ।उसकी अवस्था और परिस्थिति देखकर सैनिकों ने उसे सुरक्षित स्थान पर चलने की विनती की; परंतु रानी ने कहा, ‘‘मैं युद्ध भूमि छोडकर नहीं जाऊंगी, इस युद्ध में मुझे विजय अथवा मृत्यु में से एक चाहिए ।” अंतमें घायल तथा थकी हुई अवस्था में उसने एक सैनिक को पास बुलाकर कहा, “अब हमसे तलवार घुमाना असंभव है; परंतु हमारे शरीर का नख भी शत्रु के हाथ न लगे, यही हमारी अंतिम इच्छा है । इसलिए आप भाले से हमें मार दीजिए । हमें वीरमृत्यु चाहिए और वह आप हमें दीजिए”; परंतु सैनिक वह साहस न कर सका, तो रानी ने स्वयं ही अपनी तलवार गले पर चला ली।
🚩 वह दिन था 24 जून 1564 का, इस प्रकार युद्ध भूमि पर गोंडवाना के लिए अर्थात् अपने देश की स्वतंत्रता के लिए अंतिम क्षण तक वह झूझती रही । गोंडवाना पर वर्ष 1549 से 1564 अर्थात् 15 वर्ष तक रानी दुर्गावती का अधिराज्य था, जो मुगलों ने नष्ट किया । इस प्रकार महान पराक्रमी रानी दुर्गावती का अंत हुआ । इस महान वीरांगना को हमारा शतशः प्रणाम !
🚩 जिस स्थान पर उन्होंने अपने प्राण त्याग किए, वह स्थान स्वतंत्रता सेनानियों के लिए निरंतर प्रेरणा का स्रोत रहा है ।
🚩 उनकी स्मृति में 1883 में मध्यप्रदेश सरकार ने जबलपुर विश्वविद्यालय का नाम रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय रखा ।
🚩 इस बहादुर रानी के नामपर भारत सरकार ने 24 जून 1988 को डाकका टिकट प्रचलित कर (जारी कर) उनके बलिदान को श्रद्धांजली अर्पित की ।
🚩 गोंडवाना को स्वतंत्र करने हेतु जिसने प्राणांतिक युद्ध किया और जिसके रुधिर की प्रत्येक बूंद में गोंडवाना के स्वतंत्रता की लालसा थी, वह रणरागिनी थी महारानी दुर्गावती । उनका इतिहास हमें नित्य प्रेरणादायी है।
🚩 आज की भारतीय नारियाँ इन आदर्श नारियों से प्रेरणा पाकर आगे बढ़े, पाश्चात्य संस्कृति की तरफ न भागे । भारत की नारियां अपने बच्चों में सदाचार, संयम आदि उत्तम संस्कारों का सिंचन करें तो वह दिन दूर नहीं, जिस दिन पूरे विश्व में भारतीय सनातन धर्म और संस्कृति की दिव्य पताका पुनः लहरायेगी। भारतकी नारियों आपमें बहुत महानता छुपी है आप चाहे तो शिवाजी, महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह जैसे महान पुत्रो को जन्म देकर अपनी कोख को पावन कर सकती है, आप पाश्चात्य संस्कृति अपनाकर अपने को दिन-हीन नही बनाना बल्कि ऋषि-मुनियों एवं भगवद्गीता के अनुसार आचरन करके अपने को महान बनाना।
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🚩 अकबर का सेनानी तीन बार रानि से पराजित: अकबर ने वर्ष 1563 में आसफ खान नामक बलाढ्य सेनानी को (सरदार) गोंडवाना पर आक्रमण करने भेज दिया । यह समाचार मिलते ही रानी ने अपनी व्यूहरचना आरंभ कर दी । सर्वप्रथम अपने विश्वसनीय दूतों द्वारा अपने मांडलिक राजाओं तथा सेनानायकों को सावधान हो जाने की सूचनाएं भेज दीं । अपनी सेना की कुछ टुकडियों को घने जंगल में छिपा रखा और शेष को अपने साथ लेकर रानी निकल पडी । रानी ने सैनिकों को मार्गदर्शन किया । एक पर्वत की तलहटी पर आसफ खान और रानी दुर्गावती का सामना हुआ । बडे आवेश से युद्ध हुआ । मुगल सेना विशाल थी । उसमें बंदूकधारी सैनिक अधिक थे । इस कारण रानी के सैनिक मरने लगे; परंतु इतने में जंगल में छिपी सेना ने अचानक धनुष-बाण से आक्रमण कर, बाणों की वर्षा की । इससे मुगल सेना को भारी क्षति पहुंची और रानी दुर्गावती ने आसफ खान को पराजित किया । आसफ खान ने एक वर्ष की अवधि में 3 बार आक्रमण किया और तीनों ही बार वह पराजित हुआ।
🚩 स्वतंत्रता के लिए आत्मबलिदान:अंतमें वर्ष 1564 में आसफखान ने सिंगारगढ पर घेरा डाला; परंतु रानी वहां से भागने में सफल हुई । यह समाचार पाते ही आसफ खान ने रानी का पीछा किया । पुनः युद्ध आरंभ हो गया । दोनो ओर से सैनिकों को भारी क्षति पहुंची । रानी प्राणों पर खेलकर युद्ध कर रही थीं । इतने में रानी के पुत्र वीरनारायण सिंह के अत्यंत घायल होने का समाचार सुनकर सेना में भगदड मच गई । सैनिक भागने लगे । रानी के पास केवल 300 सैनिक थे । उन्हीं सैनिकों के साथ रानी स्वयं घायल होनेपर भी आसफ खान से शौर्य से लड रही थी ।उसकी अवस्था और परिस्थिति देखकर सैनिकों ने उसे सुरक्षित स्थान पर चलने की विनती की; परंतु रानी ने कहा, ‘‘मैं युद्ध भूमि छोडकर नहीं जाऊंगी, इस युद्ध में मुझे विजय अथवा मृत्यु में से एक चाहिए ।” अंतमें घायल तथा थकी हुई अवस्था में उसने एक सैनिक को पास बुलाकर कहा, “अब हमसे तलवार घुमाना असंभव है; परंतु हमारे शरीर का नख भी शत्रु के हाथ न लगे, यही हमारी अंतिम इच्छा है । इसलिए आप भाले से हमें मार दीजिए । हमें वीरमृत्यु चाहिए और वह आप हमें दीजिए”; परंतु सैनिक वह साहस न कर सका, तो रानी ने स्वयं ही अपनी तलवार गले पर चला ली।
🚩 वह दिन था 24 जून 1564 का, इस प्रकार युद्ध भूमि पर गोंडवाना के लिए अर्थात् अपने देश की स्वतंत्रता के लिए अंतिम क्षण तक वह झूझती रही । गोंडवाना पर वर्ष 1549 से 1564 अर्थात् 15 वर्ष तक रानी दुर्गावती का अधिराज्य था, जो मुगलों ने नष्ट किया । इस प्रकार महान पराक्रमी रानी दुर्गावती का अंत हुआ । इस महान वीरांगना को हमारा शतशः प्रणाम !
🚩 जिस स्थान पर उन्होंने अपने प्राण त्याग किए, वह स्थान स्वतंत्रता सेनानियों के लिए निरंतर प्रेरणा का स्रोत रहा है ।
🚩 उनकी स्मृति में 1883 में मध्यप्रदेश सरकार ने जबलपुर विश्वविद्यालय का नाम रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय रखा ।
🚩 इस बहादुर रानी के नामपर भारत सरकार ने 24 जून 1988 को डाकका टिकट प्रचलित कर (जारी कर) उनके बलिदान को श्रद्धांजली अर्पित की ।
🚩 गोंडवाना को स्वतंत्र करने हेतु जिसने प्राणांतिक युद्ध किया और जिसके रुधिर की प्रत्येक बूंद में गोंडवाना के स्वतंत्रता की लालसा थी, वह रणरागिनी थी महारानी दुर्गावती । उनका इतिहास हमें नित्य प्रेरणादायी है।
🚩 आज की भारतीय नारियाँ इन आदर्श नारियों से प्रेरणा पाकर आगे बढ़े, पाश्चात्य संस्कृति की तरफ न भागे । भारत की नारियां अपने बच्चों में सदाचार, संयम आदि उत्तम संस्कारों का सिंचन करें तो वह दिन दूर नहीं, जिस दिन पूरे विश्व में भारतीय सनातन धर्म और संस्कृति की दिव्य पताका पुनः लहरायेगी। भारतकी नारियों आपमें बहुत महानता छुपी है आप चाहे तो शिवाजी, महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह जैसे महान पुत्रो को जन्म देकर अपनी कोख को पावन कर सकती है, आप पाश्चात्य संस्कृति अपनाकर अपने को दिन-हीन नही बनाना बल्कि ऋषि-मुनियों एवं भगवद्गीता के अनुसार आचरन करके अपने को महान बनाना।
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27 जून बंकिम चंद्र चटर्जी जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं।
25 June 2022
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🚩बंकिम जी प्रसिद्द गीत वन्दे मातरम के रचियता थे। हमारे देश के कुछ अल्पसंख्यक लोग वन्दे मातरम गान का बहिष्कार करते हैं।
🚩हमारे देश का यह दुर्भाग्य है कि राष्ट्रगीत के अपमान करने वालों को भी छूट दी जा रही हैं।
🚩बंकिमचंद्र चटर्जी का पूरा नाम बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय है,इनका जन्म 27 जून 1838 में नईहाटी नगर (बंगाल) में हुआ। इनके पिता का नाम यादव चंद्रा चट्टोपाध्याय और माता का नाम दुर्गादेबी चट्टोपाध्याय और पत्नी का नाम राजलक्ष्मी देवी।
🚩बंकिम चन्द्र चटर्जी भारत देश के एक महान लेखक, कवी और पत्रकार थे। भारत के राष्ट्रगीत (National Anthem) वन्दे मातरम् को सालों पहले इनके द्वारा ही लिखा गया जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के काल में क्रान्तिकारियों का प्रेरणास्रोत बन गया था। बंकिम चंद्र चटर्जी भारत का राष्ट्रीय गीत 'वन्दे मातरम्' लिखने के के बाद प्रसिद्ध हो गया।
🚩वन्दे मातरम् का इतिहास और उसके अंधे विरोध की हकीकत....
🚩27 जून को बंकिम चंद्र चटर्जी का जन्मदिवस है। वे प्रसिद्द गीत वन्दे मातरम के रचियता थे। हमारे देश के कुछ मुस्लिम भाई बहकावे में आकर वन्दे मातरम गान का बहिष्कार कर देते हैं। उनका कहना है कि वन्दे मातरम का गान करना इस्लाम की मान्यताओं के खिलाफ है। दुनिया में शायद भारत ही ऐसा पहला देश होगा जिसमें राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान अलग अलग हैं। हमारे देश का यह दुर्भाग्य है कि अल्पसंख्यकों को प्रोत्साहन देने के नाम पर, तुष्टिकरण के नाम पर राष्ट्रगीत के अपमान को कुछ लोग आंख बंदकर स्वीकार कर लेते हैं।
🚩भारत जैसे विशाल देश को हजारों वर्षों की गुलामी के बाद आजादी के दर्शन हुए थे। वन्दे मातरम वह गीत है, जिससे सदियों से सुप्त भारत देश जग उठा और अर्ध शताब्दी तक भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरक बना रहा। इस गीत के कारण बंग-भंग के विरोध की लहर बंगाल की खाड़ी से उठ कर इंग्लिश चैनल को पार करती हुई ब्रिटिश संसद तक गूंजा आई थी। जो गीत गंगा की तरह पवित्र, स्फटिक की तरह निर्मल और देवी की तरह प्रणम्य है उस गीत का तुष्टिकरण की भेंट चढ़ाना, राष्ट्रीयता का परिहास ही तो है। जबकि इतिहास इस बात का गवाह है कि भारत का विभाजन इसी तुष्टिकरण के कारण हुआ था। इस लेख के माध्यम से हम वन्दे मातरम के इतिहास को समझने का प्रयास करेंगे।
🚩1. वन्दे मातरम के रचियता बंकिम चन्द्र
🚩बहुत कम लोग यह जानते हैं की वन्दे मातरम के रचियता बंकिम बाबु का परिवार अंग्रेज भगत था। यहाँ तक की उनके पैतृक गृह के आगे एक सिंह की मूर्ति बनी हुई थी। जिसकी पूँछ को दो बन्दर खिंच रहे थे, पर कुछ भी नहीं कर पा रहे थे। यह सिंह ब्रिटिश साम्राज्य का प्रतीक था। जबकि बन्दर भारतवासी थे। ऐसी मानसिकता वाले घर में बंकिम जैसे राष्ट्रभक्त का पैदा होना। निश्चित रूप से उस समय की क्रांतिकारी विचारधारा का प्रभाव कहा जायेगा। आनंद मठ में बंकिम बाबु ने वन्देमातरम गीत को प्रकाशित किया। आनंद मठ बंगाल में नई क्रांति के सूत्रपात के रूप में उभरा था।
🚩सन 1886 में कोलकाता अधिवेशन के मंच से कविवर हेमचन्द्र द्वारा वन्दे मातरम के कुछ अंश मंच से गाये गए थे। 1896 में रविन्द्र नाथ टैगोर द्वारा गाया गया था। लोकमान्य तिलक को वन्दे मातरम में इतनी श्रद्धा थी कि शिवाजी की समाधी के तोरण पर उन्होंने इसे उत्कीर्ण करवाया था। 1901 के बाद से कांग्रेस के प्रत्येक अधिवेशन में वन्दे मातरम गाया जाने लगा।
🚩6 अगस्त 1905 को बंग भंग के विरोध में टाउन हॉल में सभा हुई। सभा में वन्दे मातरम को विरोध के रूप में करीब तीस हज़ार भारतीयों द्वारा गाया गया था। स्थान स्थान पर विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया और स्वदेशी कपड़ा और अन्य वस्तुओं का उपयोग भारतीय जनमानस द्वारा किया जाने लगा। यहाँ तक की बंग भंग के बाद वन्दे मातरम संप्रदाय की स्थापना भी हो गई थी। वन्दे मातरम की स्वरलिपि रविन्द्र नाथ टैगोर जी ने दी थी।
🚩3. राष्ट्र कवि/लेखक और वन्दे मातरम
🚩राष्ट्रीय कवियों और लेखकों द्वारा अनेक रचनाएँ वन्दे मातरम को प्रसिद्द करने के लिए रची गई जो उसके महत्व को सिद्ध करती हैं।
🚩इनमे से है स्वदेशी आन्दोलन चाई आत्मदान, वन्दे मातरम गाओ रे भाई – श्री सतीश चन्द्र, मागो जाय जेन जीवन चले, शुधु जगत माझे तोमार काजे, वन्दे मातरम बले- श्री कालि प्रसन्न काव्य विशारद, भइया देश का यह क्या हाल, खाक मिटटी जौहर होती सब, जौहर हैं जंजाल बोलो वन्दे मातरम-श्री कालि प्रसन्न काव्य विशारद आदि। अक्टूबर 1905 में ‘वसुधा’ में जितेंदर मोहम बनर्जी ने वन्दे मातरम पर लेख लिखा था। 1906 के चैत्र मास के बम्बई के ‘बिहारी अखबार’ में वीर सावरकर ने वन्दे मातरम पर लेख लिखा था। 22 अप्रैल को मराठा में ‘तिलक महोदय’ ने वन्दे मातरम पर ‘शोउटिंग ऑफ़ वन्दे मातरम’ के नाम से लेख लिखा
25 June 2022
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🚩बंकिम जी प्रसिद्द गीत वन्दे मातरम के रचियता थे। हमारे देश के कुछ अल्पसंख्यक लोग वन्दे मातरम गान का बहिष्कार करते हैं।
🚩हमारे देश का यह दुर्भाग्य है कि राष्ट्रगीत के अपमान करने वालों को भी छूट दी जा रही हैं।
🚩बंकिमचंद्र चटर्जी का पूरा नाम बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय है,इनका जन्म 27 जून 1838 में नईहाटी नगर (बंगाल) में हुआ। इनके पिता का नाम यादव चंद्रा चट्टोपाध्याय और माता का नाम दुर्गादेबी चट्टोपाध्याय और पत्नी का नाम राजलक्ष्मी देवी।
🚩बंकिम चन्द्र चटर्जी भारत देश के एक महान लेखक, कवी और पत्रकार थे। भारत के राष्ट्रगीत (National Anthem) वन्दे मातरम् को सालों पहले इनके द्वारा ही लिखा गया जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के काल में क्रान्तिकारियों का प्रेरणास्रोत बन गया था। बंकिम चंद्र चटर्जी भारत का राष्ट्रीय गीत 'वन्दे मातरम्' लिखने के के बाद प्रसिद्ध हो गया।
🚩वन्दे मातरम् का इतिहास और उसके अंधे विरोध की हकीकत....
🚩27 जून को बंकिम चंद्र चटर्जी का जन्मदिवस है। वे प्रसिद्द गीत वन्दे मातरम के रचियता थे। हमारे देश के कुछ मुस्लिम भाई बहकावे में आकर वन्दे मातरम गान का बहिष्कार कर देते हैं। उनका कहना है कि वन्दे मातरम का गान करना इस्लाम की मान्यताओं के खिलाफ है। दुनिया में शायद भारत ही ऐसा पहला देश होगा जिसमें राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान अलग अलग हैं। हमारे देश का यह दुर्भाग्य है कि अल्पसंख्यकों को प्रोत्साहन देने के नाम पर, तुष्टिकरण के नाम पर राष्ट्रगीत के अपमान को कुछ लोग आंख बंदकर स्वीकार कर लेते हैं।
🚩भारत जैसे विशाल देश को हजारों वर्षों की गुलामी के बाद आजादी के दर्शन हुए थे। वन्दे मातरम वह गीत है, जिससे सदियों से सुप्त भारत देश जग उठा और अर्ध शताब्दी तक भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरक बना रहा। इस गीत के कारण बंग-भंग के विरोध की लहर बंगाल की खाड़ी से उठ कर इंग्लिश चैनल को पार करती हुई ब्रिटिश संसद तक गूंजा आई थी। जो गीत गंगा की तरह पवित्र, स्फटिक की तरह निर्मल और देवी की तरह प्रणम्य है उस गीत का तुष्टिकरण की भेंट चढ़ाना, राष्ट्रीयता का परिहास ही तो है। जबकि इतिहास इस बात का गवाह है कि भारत का विभाजन इसी तुष्टिकरण के कारण हुआ था। इस लेख के माध्यम से हम वन्दे मातरम के इतिहास को समझने का प्रयास करेंगे।
🚩1. वन्दे मातरम के रचियता बंकिम चन्द्र
🚩बहुत कम लोग यह जानते हैं की वन्दे मातरम के रचियता बंकिम बाबु का परिवार अंग्रेज भगत था। यहाँ तक की उनके पैतृक गृह के आगे एक सिंह की मूर्ति बनी हुई थी। जिसकी पूँछ को दो बन्दर खिंच रहे थे, पर कुछ भी नहीं कर पा रहे थे। यह सिंह ब्रिटिश साम्राज्य का प्रतीक था। जबकि बन्दर भारतवासी थे। ऐसी मानसिकता वाले घर में बंकिम जैसे राष्ट्रभक्त का पैदा होना। निश्चित रूप से उस समय की क्रांतिकारी विचारधारा का प्रभाव कहा जायेगा। आनंद मठ में बंकिम बाबु ने वन्देमातरम गीत को प्रकाशित किया। आनंद मठ बंगाल में नई क्रांति के सूत्रपात के रूप में उभरा था।
🚩सन 1886 में कोलकाता अधिवेशन के मंच से कविवर हेमचन्द्र द्वारा वन्दे मातरम के कुछ अंश मंच से गाये गए थे। 1896 में रविन्द्र नाथ टैगोर द्वारा गाया गया था। लोकमान्य तिलक को वन्दे मातरम में इतनी श्रद्धा थी कि शिवाजी की समाधी के तोरण पर उन्होंने इसे उत्कीर्ण करवाया था। 1901 के बाद से कांग्रेस के प्रत्येक अधिवेशन में वन्दे मातरम गाया जाने लगा।
🚩6 अगस्त 1905 को बंग भंग के विरोध में टाउन हॉल में सभा हुई। सभा में वन्दे मातरम को विरोध के रूप में करीब तीस हज़ार भारतीयों द्वारा गाया गया था। स्थान स्थान पर विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया और स्वदेशी कपड़ा और अन्य वस्तुओं का उपयोग भारतीय जनमानस द्वारा किया जाने लगा। यहाँ तक की बंग भंग के बाद वन्दे मातरम संप्रदाय की स्थापना भी हो गई थी। वन्दे मातरम की स्वरलिपि रविन्द्र नाथ टैगोर जी ने दी थी।
🚩3. राष्ट्र कवि/लेखक और वन्दे मातरम
🚩राष्ट्रीय कवियों और लेखकों द्वारा अनेक रचनाएँ वन्दे मातरम को प्रसिद्द करने के लिए रची गई जो उसके महत्व को सिद्ध करती हैं।
🚩इनमे से है स्वदेशी आन्दोलन चाई आत्मदान, वन्दे मातरम गाओ रे भाई – श्री सतीश चन्द्र, मागो जाय जेन जीवन चले, शुधु जगत माझे तोमार काजे, वन्दे मातरम बले- श्री कालि प्रसन्न काव्य विशारद, भइया देश का यह क्या हाल, खाक मिटटी जौहर होती सब, जौहर हैं जंजाल बोलो वन्दे मातरम-श्री कालि प्रसन्न काव्य विशारद आदि। अक्टूबर 1905 में ‘वसुधा’ में जितेंदर मोहम बनर्जी ने वन्दे मातरम पर लेख लिखा था। 1906 के चैत्र मास के बम्बई के ‘बिहारी अखबार’ में वीर सावरकर ने वन्दे मातरम पर लेख लिखा था। 22 अप्रैल को मराठा में ‘तिलक महोदय’ ने वन्दे मातरम पर ‘शोउटिंग ऑफ़ वन्दे मातरम’ के नाम से लेख लिखा
था।
🚩कुछ ईसाई लेखक वन्दे मातरम की प्रसिद्धि से जलभून कर उसके विरुद्ध अपनी लेखनी चलाते हैं जैसे पिअरसन महोदय ने तो यहाँ तक लिख दिया कि मातृभूमि की कल्पना ही हिन्दू विचारधारा के प्रतिकूल है। बंकिम महोदय ने इसे यूरोपियन संस्कृति से प्राप्त किया है।
🚩अपनी जन्म भूमि को माता या जननी कहने की गरिमा तो भारत वर्ष में उस काल से स्थापित है। जब धरती पर ईसाइयत या इस्लाम का जन्म भी नहीं हुआ था।
🚩वेदों में इस तथ्य को इस प्रकार ग्रहण किया गया हैं –
🚩वह माता भूमि मुझ पुत्र के लिए पय यानि दूध आदि पुष्टि प्रद पदार्थ प्रदान करे। – अथर्ववेद १२/१/२०
🚩भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ। – अथर्ववेद १२-१-१५
🚩वाल्मीकि रामायण में “जननी जन्मभूमि ” को स्वर्ग के समान तुल्य कहा गया है।
🚩ईसाई मिशनरियों ने तो यहाँ तक कह डाला कि वन्दे मातरम राजनैतिक डकैतों का गीत हैं।
🚩4. वन्दे मातरम और बंगाल में कहर
🚩बंगाल की अंग्रेजी सरकार ने कुख्यात सर्कुलर जारी किया कि अगर कोई छात्र स्वदेशी सभा में भाग लेगा अथवा वन्दे मातरम का नारा लगाएगा। तो उसे स्कूल से निकाल दिया जायेगा।
🚩बंगाल के रंगपुर के एक स्कूल के सभी 200 छात्रों पर वन्दे मातरम का नारा लगाने के लिए 5-5 रुपये का दंड किया गया था।
🚩पूरे बंगाल में वन्दे मातरम के नाम की क्रांति स्थापित हो गई थी। इस संस्था से जुड़े लोग हर रविवार को वन्दे मातरम गाते हुए चन्दा एकत्र करते थे। उनके साथ रविन्द्र नाथ टैगोर भी होते थे। यह जुलुस इतना बड़ा हो गया कि इसकी संख्या हजारों तक पहुँच गई थी। 16 अक्टूबर 1906 को बंग भंग विरोध दिवस बनाने का फैसला किया गया था। उस दिन कोई भी बंगाली अन्न-जल ग्रहण नहीं करेगा। ऐसा निश्चय किया गया। बंग भंग के विरोध में सभा हुई और यह निश्चय किया गया की जब तक चूँकि सरकार बंगाल की एकता को तोड़ने का प्रयास कर रही है। इसके विरोध में हर बंगाली विदेशी सामान का बहिष्कार करेगा। हर किसी की जबान पर वन्दे मातरम का नारा था।
🚩वन्दे मातरम से आम जनता को कितना प्रेम हो गया था। इसका उदहारण हम इस प्रसंग से समझ सकते है। किसी गाँव में, जो ढाका जिले के अंतर्गत था, एक आदमी गया और कहने लगा कि मैं नवाब सलीमुल्लाह का आदमी हूँ और इसके बाद वह नवाब का आदमी वन्दे मातरम गाने वाले और नारे लगाने वालो की निंदा करने लगा। इतना सुनते ही पास की एक झोपड़ी से एक बुढ़िया झाड़ू लेकर बाहर आई और बोली वन्दे मातरम गाने वाले लड़को ने मुझे बचाया हैं। वे सब राजा बेटा है। उस वक्त तेरा नवाब कहाँ था???
🚩5. अंग्रेज सरकार के मन में वन्दे मातरम को लेकर कितना असंतोष था कि उन्होंने सभी विद्यालयों को सरकारी आदेश जारी किया। सभी छात्र अपनी अपनी नोटबुक में 500 बार यह लिखे कि “वन्दे मातरम चिल्लाने में अपना समय नष्ट करना मुर्खता और अभद्रता हैं।”
🚩6. वारिसाल में कांग्रेस का अधिवेशन और वन्दे मातरम
🚩14 अप्रैल 1906 के दिन वारिसाल में कांग्रेस के जुलुस में वन्दे मातरम का नारा लगाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।
🚩शांतिपूर्वक निकल रहे जुलुस पर पुलिस ने निर्दयता से लाठीचार्ज किया। निर्दयता की हालत यह थी कि एक मकान की खूंटी पर वन्दे मातरम लिखा था। तो उस मकान को गिरा दिया गया।
🚩 10-11 वर्ष का एक बालक रसोई में वन्देमातरम गा रहा था। तो उसे घर से निकलकर कोर्ट के सामने चाबुक से पीटा गया। दो हलवाइयों की दुकान पर यह नारा लिखा था तो उनके सर फोड़ दिए गए। सुरेंदर नाथ बनर्जी की गिरफ्तार कर 200 रुपये जुर्माने और अलग से कोर्ट की अवमानना पर 200 रुपये का दंड लेकर छोड़ दिया गया। इतनी निर्दयता के बावजूद भीड़ वन्दे मातरम का गान करते हुए अपने सभापति महोदय रसूल साहिब को लेकर सभास्थल पर पहुँच गई।
🚩इतने में सुरेंदर नाथ बनर्जी अपने साथियों के साथ सभा स्थल पर जा पहुँचे। जिससे वन्दे मातरम के गगन भेदी नारों के साथ सम्पूर्ण सभा स्थल गूँज उठा। सभा में ब्रिटिश सरकार के द्वारा वन्दे मातरम को लेकर किये जा रहे अत्याचार को घोर निंदा की गई। जिस स्थान पर सुरेंदरनाथ बनर्जी को वन्दे मातरम गाने के लिए गिरफ्तार किया गया था। उस स्थान पर वन्दे मातरम स्तंभ बनाने के प्रस्ताव को सभा में पारित किया गया। अगले दिन के सभी समाचार पत्र वरिसाल के वन्दे मातरम संघर्ष की प्रशंसा और अंग्रेज सरकार की निंदा से भरे पड़े थे। वारिसाल की घटना के कारण लार्ड कर्जन को भारत के वाइसराय के पद से त्याग देना पड़ा।
🚩7. वन्दे मातरम और योगी अरविन्द
🚩वन्दे मातरम के नाम से पत्र आरंभ हुआ जिसे पहले विपिन चन्द्र पाल ने सम्पादित किया बाद में श्री अरविन्द ने। श्री अरविन्द ने इस पत्र से यह भली भांति सिद्ध कर दिया की तलवार से ज्यादा तीखी लेखनी होती है और उसकी ज्वाला से क्रूर शासन भी भस्मीभूत हो सकता है। अरविन्द के पत्र के बारे में स्टेट्समैन अखबार लिखता है कि “अखबार की हर लाइन के बीच भरपूर राजद्रोह दीखता है।
🚩कुछ ईसाई लेखक वन्दे मातरम की प्रसिद्धि से जलभून कर उसके विरुद्ध अपनी लेखनी चलाते हैं जैसे पिअरसन महोदय ने तो यहाँ तक लिख दिया कि मातृभूमि की कल्पना ही हिन्दू विचारधारा के प्रतिकूल है। बंकिम महोदय ने इसे यूरोपियन संस्कृति से प्राप्त किया है।
🚩अपनी जन्म भूमि को माता या जननी कहने की गरिमा तो भारत वर्ष में उस काल से स्थापित है। जब धरती पर ईसाइयत या इस्लाम का जन्म भी नहीं हुआ था।
🚩वेदों में इस तथ्य को इस प्रकार ग्रहण किया गया हैं –
🚩वह माता भूमि मुझ पुत्र के लिए पय यानि दूध आदि पुष्टि प्रद पदार्थ प्रदान करे। – अथर्ववेद १२/१/२०
🚩भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ। – अथर्ववेद १२-१-१५
🚩वाल्मीकि रामायण में “जननी जन्मभूमि ” को स्वर्ग के समान तुल्य कहा गया है।
🚩ईसाई मिशनरियों ने तो यहाँ तक कह डाला कि वन्दे मातरम राजनैतिक डकैतों का गीत हैं।
🚩4. वन्दे मातरम और बंगाल में कहर
🚩बंगाल की अंग्रेजी सरकार ने कुख्यात सर्कुलर जारी किया कि अगर कोई छात्र स्वदेशी सभा में भाग लेगा अथवा वन्दे मातरम का नारा लगाएगा। तो उसे स्कूल से निकाल दिया जायेगा।
🚩बंगाल के रंगपुर के एक स्कूल के सभी 200 छात्रों पर वन्दे मातरम का नारा लगाने के लिए 5-5 रुपये का दंड किया गया था।
🚩पूरे बंगाल में वन्दे मातरम के नाम की क्रांति स्थापित हो गई थी। इस संस्था से जुड़े लोग हर रविवार को वन्दे मातरम गाते हुए चन्दा एकत्र करते थे। उनके साथ रविन्द्र नाथ टैगोर भी होते थे। यह जुलुस इतना बड़ा हो गया कि इसकी संख्या हजारों तक पहुँच गई थी। 16 अक्टूबर 1906 को बंग भंग विरोध दिवस बनाने का फैसला किया गया था। उस दिन कोई भी बंगाली अन्न-जल ग्रहण नहीं करेगा। ऐसा निश्चय किया गया। बंग भंग के विरोध में सभा हुई और यह निश्चय किया गया की जब तक चूँकि सरकार बंगाल की एकता को तोड़ने का प्रयास कर रही है। इसके विरोध में हर बंगाली विदेशी सामान का बहिष्कार करेगा। हर किसी की जबान पर वन्दे मातरम का नारा था।
🚩वन्दे मातरम से आम जनता को कितना प्रेम हो गया था। इसका उदहारण हम इस प्रसंग से समझ सकते है। किसी गाँव में, जो ढाका जिले के अंतर्गत था, एक आदमी गया और कहने लगा कि मैं नवाब सलीमुल्लाह का आदमी हूँ और इसके बाद वह नवाब का आदमी वन्दे मातरम गाने वाले और नारे लगाने वालो की निंदा करने लगा। इतना सुनते ही पास की एक झोपड़ी से एक बुढ़िया झाड़ू लेकर बाहर आई और बोली वन्दे मातरम गाने वाले लड़को ने मुझे बचाया हैं। वे सब राजा बेटा है। उस वक्त तेरा नवाब कहाँ था???
🚩5. अंग्रेज सरकार के मन में वन्दे मातरम को लेकर कितना असंतोष था कि उन्होंने सभी विद्यालयों को सरकारी आदेश जारी किया। सभी छात्र अपनी अपनी नोटबुक में 500 बार यह लिखे कि “वन्दे मातरम चिल्लाने में अपना समय नष्ट करना मुर्खता और अभद्रता हैं।”
🚩6. वारिसाल में कांग्रेस का अधिवेशन और वन्दे मातरम
🚩14 अप्रैल 1906 के दिन वारिसाल में कांग्रेस के जुलुस में वन्दे मातरम का नारा लगाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।
🚩शांतिपूर्वक निकल रहे जुलुस पर पुलिस ने निर्दयता से लाठीचार्ज किया। निर्दयता की हालत यह थी कि एक मकान की खूंटी पर वन्दे मातरम लिखा था। तो उस मकान को गिरा दिया गया।
🚩 10-11 वर्ष का एक बालक रसोई में वन्देमातरम गा रहा था। तो उसे घर से निकलकर कोर्ट के सामने चाबुक से पीटा गया। दो हलवाइयों की दुकान पर यह नारा लिखा था तो उनके सर फोड़ दिए गए। सुरेंदर नाथ बनर्जी की गिरफ्तार कर 200 रुपये जुर्माने और अलग से कोर्ट की अवमानना पर 200 रुपये का दंड लेकर छोड़ दिया गया। इतनी निर्दयता के बावजूद भीड़ वन्दे मातरम का गान करते हुए अपने सभापति महोदय रसूल साहिब को लेकर सभास्थल पर पहुँच गई।
🚩इतने में सुरेंदर नाथ बनर्जी अपने साथियों के साथ सभा स्थल पर जा पहुँचे। जिससे वन्दे मातरम के गगन भेदी नारों के साथ सम्पूर्ण सभा स्थल गूँज उठा। सभा में ब्रिटिश सरकार के द्वारा वन्दे मातरम को लेकर किये जा रहे अत्याचार को घोर निंदा की गई। जिस स्थान पर सुरेंदरनाथ बनर्जी को वन्दे मातरम गाने के लिए गिरफ्तार किया गया था। उस स्थान पर वन्दे मातरम स्तंभ बनाने के प्रस्ताव को सभा में पारित किया गया। अगले दिन के सभी समाचार पत्र वरिसाल के वन्दे मातरम संघर्ष की प्रशंसा और अंग्रेज सरकार की निंदा से भरे पड़े थे। वारिसाल की घटना के कारण लार्ड कर्जन को भारत के वाइसराय के पद से त्याग देना पड़ा।
🚩7. वन्दे मातरम और योगी अरविन्द
🚩वन्दे मातरम के नाम से पत्र आरंभ हुआ जिसे पहले विपिन चन्द्र पाल ने सम्पादित किया बाद में श्री अरविन्द ने। श्री अरविन्द ने इस पत्र से यह भली भांति सिद्ध कर दिया की तलवार से ज्यादा तीखी लेखनी होती है और उसकी ज्वाला से क्रूर शासन भी भस्मीभूत हो सकता है। अरविन्द के पत्र के बारे में स्टेट्समैन अखबार लिखता है कि “अखबार की हर लाइन के बीच भरपूर राजद्रोह दीखता है।
पर वह इतनी दक्षता से लिखा होता है कि उस पर क़ानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती।”
🚩श्री अरविन्द ने वन्दे मातरम गीत के बारे में कहा है कि बंकिम ने ही स्वदेश को माता की संज्ञा दी है। वन्दे मातरम संजीवनी मंत्र है। हमारी स्वाधीनता का हथियार वन्दे मातरम है। उन्होंने कहा कि वन्दे मातरम साधारण गीत नहीं है। बल्कि एक ऐसा मंत्र है जो हमें मातृभूमि की वंदना करने की सीख देता है। उनकें इस व्यक्तव्य के कारण ही बंग-भंग के क्रांतिकारियों के लिए वन्दे मातरम का यह नारा वह गीत मंत्र बन गया।
🚩अपनी पत्नी को 30 अगस्त 1908 को एक पत्र में श्री अरविन्द लिखते है- “मेरा तीसरा पागलपन यह है कि जहाँ दुसरे लोग स्वदेश को जड़ पदार्थ, खेत, मैदान, पहाड़, जंगल और नदी समझते हैं। वहां मैं अपनी मातृभूमि को अपनी माँ समझता हूँ। उसे अपनी भक्ति अर्पित करता हूँ और उसकी पूजा करता हूँ।माँ की छाती पर बैठ कर अगर कोई उसका खून चूसने लगे तो बेटा क्या करता है? क्या वह चुपचाप बैठा हुआ भोजन करता है? या स्त्री पुरुष के साथ रंगरलिया बनता है? या माँ को बचाने के लिए दौड़ जाता है?”
🚩श्री अरविन्द को गिरफ्तार कर लिया गया। उससे देश में वन्दे मातरम की लहर चल पड़ी।
🚩1906 को धुलिया, महाराष्ट्र में वन्दे मातरम के नारे से सभा ही रूक गयी। नासिक में वन्दे मातरम पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जिस जिस ने प्रतिबन्ध को तोड़ा, तो उसे पीटा गया गया। कई गिरफ्तारियाँ हुई। इस कांड का तो नाम ही वन्दे मातरम कांड बन गया।
🚩फरवरी 1907 को तमिलनाडू में मजदूरों ने हड़ताल कर दी और ब्रिटिश नागरिकों को घेर कर उन्हें भी वन्दे मातरम के नारे लगाने को बाध्य किया।
🚩मई 1907 को रावलपिंडी में भी स्वदेशी के नेताओं की गिरफ़्तारी के विरोध में युवकों ने वन्दे मातरम के नारे को लगाते हुए लाठियाँ खाई।
🚩26 अगस्त,1907 को वन्दे मातरम के एक लेख के कारण बिपिन चन्द्र पाल को अदालत में सजा हुई। तो उनका स्वागत हजारों की भीड़ ने वन्दे मातरम से किया। यह देखकर पुलिस अँधाधुंध लाठीचार्ज करने लगी। यह देखकर एक 15 वर्षीय बालक सुशील चन्द्र सेन ने एक पुलिस वाले मुँह पर मुक्का मार दिया। उस वीर बालक को 15 बेतों की सजा सुनाई गई थी। सुशील की इस सजा की प्रशंसा करते हुए संध्या में एक लेख छपा “सुशील की कुदान भरी, फिरंगी की नानी मरी”
🚩सुशील युगांतर पार्टी के सदस्य थे। उनकी चर्चा सुरेंदर नाथ बनर्जी तक पहुँची तो उन्होंने उसे सोने का तमगा देकर सम्मानित किया।
🚩अब युगांतर पार्टी के सदस्यों ने सुशील को सजा देने वाले अत्याचारी किंग्स्फोर्ड को यमालय भेजने की ठानी। यह कार्य प्रफुल्ल चन्द्र चाकी और खुदी राम बोस को सोंपा गया। षड़यंत्र असफल हो जाने पर चाकी ने आत्महत्या कर ली और खुदीराम ने फाँसी का फन्दा चूम कर सबसे कम उम्र में शहीद होने का सम्मान प्राप्त किया। इसी केस में श्री अरविन्द को भी सजा हुई थी।
🚩8. वन्दे मातरम और राष्ट्रीय झंडा
🚩 1906 में कोलकता में भगिनी निवेदिता ने सबसे पहले वज्र अंकित झंडे का निर्माण किया जिस पर वन्दे मातरम लिखा हुआ था। उसके बाद 18 अक्टूबर, 1907 को जर्मनी के स्टुअर्ट नगर में मैडम बीकाजी कामा ने वन्दे मातरम गीत के बाद राष्ट्रीय झंडा फहराया जिस पर वन्दे मातरम अंकित था। अपने भाषण में मैडम कामा ने पहले अंग्रेजों द्वारा भारत में किये जा रहे अत्याचारों का विवरण दिया जिससे की सुनने वालो के रोंगटे खड़े हो गए। उसके बाद भारत का झंडा निकालती हुई वह बोली ” यह है भारतीय राष्ट्र का स्वतंत्र झंडा। यह देखिये फहरा रहा है। भारतीय देश भक्तों के रक्त से यह पवित्र हो चूका है। सदस्यगण, मैं आपसे अनुरोध करती हूँ कि आप खड़े होकर भारत की इस स्वतंत्र पताका का अभिवादन करे।”
🚩सर्व प्रथम झंडे पर वन्दे मातरम को अंकित करने से पाठक उस काल में वन्दे मातरम के भारतीय जन समुदाय पर प्रभाव को समझ सकते है।
🚩9. वन्दे मातरम का भारत व्यापी प्रभाव
🚩25 नवम्बर 1905 को ट्रिब्यून अखबार लिखता है कि “बंगाल में लोगो ने वन्दे मातरम का जयघोष शुरू किया हैं। इन शब्दों का अर्थ है माता की वन्दना। इसमें कुछ भी भयंकर नहीं है। फिर दमनशाही द्वारा वन्दे मातरम की मनाही क्यूँ है? अब तो पंजाब में सुशिक्षित लोग एक दुसरे से भेंट होने पर वन्दे मातरम कहकर अभिनन्दन करते है। इस प्रकार सारे हिंदुस्तान में असंख्य मुखों से निरन्तर निकलते वन्दे मातरम को बंद करने में सरकार को कितने सिपाहियों और अधिकारीयों की आवश्यकता होगी? पूर्वी बंगाल की जनता के साथ सारे हिंदुस्तान की सहानभूति हैं।
🚩जब हैदराबाद के निज़ाम के धर्मान्ध अत्याचारों के विरुद्ध आर्य समाज ने 1939 में हैदराबाद सत्याग्रह किया था तब जेल में रामचन्द्र के नाम से एक आर्यवीर को बंद कर दिया गया था। अपनी क्रूरता की धाक जमाने के लिए जेल में आर्य सत्याग्रहियों पर अत्याचार किया जाता था। जेल में दरोगा जब भी वीर रामचंद्र को बेंत मारते
🚩श्री अरविन्द ने वन्दे मातरम गीत के बारे में कहा है कि बंकिम ने ही स्वदेश को माता की संज्ञा दी है। वन्दे मातरम संजीवनी मंत्र है। हमारी स्वाधीनता का हथियार वन्दे मातरम है। उन्होंने कहा कि वन्दे मातरम साधारण गीत नहीं है। बल्कि एक ऐसा मंत्र है जो हमें मातृभूमि की वंदना करने की सीख देता है। उनकें इस व्यक्तव्य के कारण ही बंग-भंग के क्रांतिकारियों के लिए वन्दे मातरम का यह नारा वह गीत मंत्र बन गया।
🚩अपनी पत्नी को 30 अगस्त 1908 को एक पत्र में श्री अरविन्द लिखते है- “मेरा तीसरा पागलपन यह है कि जहाँ दुसरे लोग स्वदेश को जड़ पदार्थ, खेत, मैदान, पहाड़, जंगल और नदी समझते हैं। वहां मैं अपनी मातृभूमि को अपनी माँ समझता हूँ। उसे अपनी भक्ति अर्पित करता हूँ और उसकी पूजा करता हूँ।माँ की छाती पर बैठ कर अगर कोई उसका खून चूसने लगे तो बेटा क्या करता है? क्या वह चुपचाप बैठा हुआ भोजन करता है? या स्त्री पुरुष के साथ रंगरलिया बनता है? या माँ को बचाने के लिए दौड़ जाता है?”
🚩श्री अरविन्द को गिरफ्तार कर लिया गया। उससे देश में वन्दे मातरम की लहर चल पड़ी।
🚩1906 को धुलिया, महाराष्ट्र में वन्दे मातरम के नारे से सभा ही रूक गयी। नासिक में वन्दे मातरम पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जिस जिस ने प्रतिबन्ध को तोड़ा, तो उसे पीटा गया गया। कई गिरफ्तारियाँ हुई। इस कांड का तो नाम ही वन्दे मातरम कांड बन गया।
🚩फरवरी 1907 को तमिलनाडू में मजदूरों ने हड़ताल कर दी और ब्रिटिश नागरिकों को घेर कर उन्हें भी वन्दे मातरम के नारे लगाने को बाध्य किया।
🚩मई 1907 को रावलपिंडी में भी स्वदेशी के नेताओं की गिरफ़्तारी के विरोध में युवकों ने वन्दे मातरम के नारे को लगाते हुए लाठियाँ खाई।
🚩26 अगस्त,1907 को वन्दे मातरम के एक लेख के कारण बिपिन चन्द्र पाल को अदालत में सजा हुई। तो उनका स्वागत हजारों की भीड़ ने वन्दे मातरम से किया। यह देखकर पुलिस अँधाधुंध लाठीचार्ज करने लगी। यह देखकर एक 15 वर्षीय बालक सुशील चन्द्र सेन ने एक पुलिस वाले मुँह पर मुक्का मार दिया। उस वीर बालक को 15 बेतों की सजा सुनाई गई थी। सुशील की इस सजा की प्रशंसा करते हुए संध्या में एक लेख छपा “सुशील की कुदान भरी, फिरंगी की नानी मरी”
🚩सुशील युगांतर पार्टी के सदस्य थे। उनकी चर्चा सुरेंदर नाथ बनर्जी तक पहुँची तो उन्होंने उसे सोने का तमगा देकर सम्मानित किया।
🚩अब युगांतर पार्टी के सदस्यों ने सुशील को सजा देने वाले अत्याचारी किंग्स्फोर्ड को यमालय भेजने की ठानी। यह कार्य प्रफुल्ल चन्द्र चाकी और खुदी राम बोस को सोंपा गया। षड़यंत्र असफल हो जाने पर चाकी ने आत्महत्या कर ली और खुदीराम ने फाँसी का फन्दा चूम कर सबसे कम उम्र में शहीद होने का सम्मान प्राप्त किया। इसी केस में श्री अरविन्द को भी सजा हुई थी।
🚩8. वन्दे मातरम और राष्ट्रीय झंडा
🚩 1906 में कोलकता में भगिनी निवेदिता ने सबसे पहले वज्र अंकित झंडे का निर्माण किया जिस पर वन्दे मातरम लिखा हुआ था। उसके बाद 18 अक्टूबर, 1907 को जर्मनी के स्टुअर्ट नगर में मैडम बीकाजी कामा ने वन्दे मातरम गीत के बाद राष्ट्रीय झंडा फहराया जिस पर वन्दे मातरम अंकित था। अपने भाषण में मैडम कामा ने पहले अंग्रेजों द्वारा भारत में किये जा रहे अत्याचारों का विवरण दिया जिससे की सुनने वालो के रोंगटे खड़े हो गए। उसके बाद भारत का झंडा निकालती हुई वह बोली ” यह है भारतीय राष्ट्र का स्वतंत्र झंडा। यह देखिये फहरा रहा है। भारतीय देश भक्तों के रक्त से यह पवित्र हो चूका है। सदस्यगण, मैं आपसे अनुरोध करती हूँ कि आप खड़े होकर भारत की इस स्वतंत्र पताका का अभिवादन करे।”
🚩सर्व प्रथम झंडे पर वन्दे मातरम को अंकित करने से पाठक उस काल में वन्दे मातरम के भारतीय जन समुदाय पर प्रभाव को समझ सकते है।
🚩9. वन्दे मातरम का भारत व्यापी प्रभाव
🚩25 नवम्बर 1905 को ट्रिब्यून अखबार लिखता है कि “बंगाल में लोगो ने वन्दे मातरम का जयघोष शुरू किया हैं। इन शब्दों का अर्थ है माता की वन्दना। इसमें कुछ भी भयंकर नहीं है। फिर दमनशाही द्वारा वन्दे मातरम की मनाही क्यूँ है? अब तो पंजाब में सुशिक्षित लोग एक दुसरे से भेंट होने पर वन्दे मातरम कहकर अभिनन्दन करते है। इस प्रकार सारे हिंदुस्तान में असंख्य मुखों से निरन्तर निकलते वन्दे मातरम को बंद करने में सरकार को कितने सिपाहियों और अधिकारीयों की आवश्यकता होगी? पूर्वी बंगाल की जनता के साथ सारे हिंदुस्तान की सहानभूति हैं।
🚩जब हैदराबाद के निज़ाम के धर्मान्ध अत्याचारों के विरुद्ध आर्य समाज ने 1939 में हैदराबाद सत्याग्रह किया था तब जेल में रामचन्द्र के नाम से एक आर्यवीर को बंद कर दिया गया था। अपनी क्रूरता की धाक जमाने के लिए जेल में आर्य सत्याग्रहियों पर अत्याचार किया जाता था। जेल में दरोगा जब भी वीर रामचंद्र को बेंत मारते
तो उनके मुख से वन्दे मातरम का नारा निकलता था। दरोगा जब तक मारते रहते जब तक की रामचंद्र बेहोश न हो गए पर उनके मुख से बेहोशी में भी नारा निकलता रहा। उनका जेल से छूटने के बाद आजीवन नाम ही रामचंद्र वन्देमातरम हो गया। ऐसा अनुराग था देश और धर्म प्रेमियों को वन्दे मातरम के साथ।
🚩10. वन्दे मातरम विदेश में
🚩जुलाई 1909 को मदन लाल धींगरा को लन्दन में जब फाँसी दी गई तो उनके अंतिम शब्द थे “वन्दे मातरम”।
🚩1909 को जिनेवा से एक पत्रिका वन्दे मातरम का का प्रकाशन आरंभ हुआ। अपने प्रथम अंक में पत्रिका ने कहा ‘विदेशी अत्याचार के विरुद्ध हमारे बहादुर और बुद्धिमान नेताओं ने बंगाल में जो यशस्वी अभियान शुरू किया है। वन्दे मातरम के माध्यम से हम उसे पूर्ण शक्ति और दृढ़ता के साथ में चलायेगे।
🚩कनाडा से आ रहे जहाज कमागातामारू के झंडे पर वन्दे मातरम, सत श्री अकाल और अल्लाह हो अकबर के नारे लिखे थे।
🚩साउथ अफ्रीका से जब महात्मा गाँधी भारत लौटे तो उन्होंने भारत आकर वन्दे मातरम गीत की प्रशंसा करी थी।(हरिजन 1 जुलाई 1938)
🚩1922 में जब गोखले अफ्रीका गए तो हजारों भारत वासियों ने उनका स्वागत वन्दे मातरम से किया था।
11. भारतीय क्रांतिकारी और वन्दे मातरम
🚩सन 1920 में लाला लाजपत राय ने दिल्ली से दैनिक वन्दे मातरम का प्रकाशन शुरू किया था।
🚩सन 1930 में चन्द्र शेखर आजाद अपने पिता को पत्र लिखने समय वन्दे मातरम सबसे ऊपर लिखते हैं।
🚩सन 1920 का असहयोग आन्दोलन, नमक सत्याग्रह में भी वन्दे मातरम का बोलबाला था।
🚩रामचंद्र बिस्मिल ने काकोरी कांड में फाँसी पर लटकने से पहले वन्दे मातरम कहा था।
🚩चटगांव सशस्त्र संघर्ष में वीर सूर्यसेन को फाँसी देने से पहले जब भी मार पड़ती तो वे वन्दे मातरम का जय घोष करते थे। उन्हें इतना मार गया था कि वे बेहोश हो गए और अचेत अवस्था में ही उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया गया था।
🚩इसके अतिरिक्त अनेक सन्दर्भ हमें भारत की आज़ादी की लड़ाई में वन्दे मातरम को प्रेरणा के स्रोत्र के रूप में पाते हैं- डॉ . विवेक आर्य
🚩इस लेख से स्पष्ट होता है कि अगर कोई वन्दे मातरम का विरोध करता है तो वे भी देश विरोधी में ही गिना जाएगा क्योंकि अंग्रेज भी वन्दे मातरम को पसंद नही करते थे इसलिए वन्दे मातरम का विरोध करने वाले लोगो से सावधान रहें वे देशहित में कार्य नही कर सकते।
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🚩10. वन्दे मातरम विदेश में
🚩जुलाई 1909 को मदन लाल धींगरा को लन्दन में जब फाँसी दी गई तो उनके अंतिम शब्द थे “वन्दे मातरम”।
🚩1909 को जिनेवा से एक पत्रिका वन्दे मातरम का का प्रकाशन आरंभ हुआ। अपने प्रथम अंक में पत्रिका ने कहा ‘विदेशी अत्याचार के विरुद्ध हमारे बहादुर और बुद्धिमान नेताओं ने बंगाल में जो यशस्वी अभियान शुरू किया है। वन्दे मातरम के माध्यम से हम उसे पूर्ण शक्ति और दृढ़ता के साथ में चलायेगे।
🚩कनाडा से आ रहे जहाज कमागातामारू के झंडे पर वन्दे मातरम, सत श्री अकाल और अल्लाह हो अकबर के नारे लिखे थे।
🚩साउथ अफ्रीका से जब महात्मा गाँधी भारत लौटे तो उन्होंने भारत आकर वन्दे मातरम गीत की प्रशंसा करी थी।(हरिजन 1 जुलाई 1938)
🚩1922 में जब गोखले अफ्रीका गए तो हजारों भारत वासियों ने उनका स्वागत वन्दे मातरम से किया था।
11. भारतीय क्रांतिकारी और वन्दे मातरम
🚩सन 1920 में लाला लाजपत राय ने दिल्ली से दैनिक वन्दे मातरम का प्रकाशन शुरू किया था।
🚩सन 1930 में चन्द्र शेखर आजाद अपने पिता को पत्र लिखने समय वन्दे मातरम सबसे ऊपर लिखते हैं।
🚩सन 1920 का असहयोग आन्दोलन, नमक सत्याग्रह में भी वन्दे मातरम का बोलबाला था।
🚩रामचंद्र बिस्मिल ने काकोरी कांड में फाँसी पर लटकने से पहले वन्दे मातरम कहा था।
🚩चटगांव सशस्त्र संघर्ष में वीर सूर्यसेन को फाँसी देने से पहले जब भी मार पड़ती तो वे वन्दे मातरम का जय घोष करते थे। उन्हें इतना मार गया था कि वे बेहोश हो गए और अचेत अवस्था में ही उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया गया था।
🚩इसके अतिरिक्त अनेक सन्दर्भ हमें भारत की आज़ादी की लड़ाई में वन्दे मातरम को प्रेरणा के स्रोत्र के रूप में पाते हैं- डॉ . विवेक आर्य
🚩इस लेख से स्पष्ट होता है कि अगर कोई वन्दे मातरम का विरोध करता है तो वे भी देश विरोधी में ही गिना जाएगा क्योंकि अंग्रेज भी वन्दे मातरम को पसंद नही करते थे इसलिए वन्दे मातरम का विरोध करने वाले लोगो से सावधान रहें वे देशहित में कार्य नही कर सकते।
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व्यसन का शौक, कुत्ते की मौत।
26 June 2022
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🚩नशा एक खतरनाक दुर्व्यसन है । यह दुर्व्यसन जब किसी के जीवन में आ जाता है , तो उसे खोखला कर देता है और उसे विनाश की कगार पर लाकर खड़ा कर देता है ।
🚩 व्यसन व्यक्ति की प्रगति के सभी मार्गों को अवरुद्ध कर देता है । प्रारंभ में मनुष्य उसे आनंद की वस्तु समझकर अपनाता है , उसे मनोरंजन का साधन मानता है तथा उसे उच्चस्तर एवं गौरव का प्रतीक मानकर गले लगाता है परन्तु बाद में सिवाय पश्चाताप के उसके पास कुछ भी शेष नहीं रहता ।
🚩संत श्री आशारामजी आश्रमों द्वारा युवा सेवा संघ के माध्यम से समय- समय पर व्यसन मुक्ति अभियान चलाए जाते है ।
🚩शराब शैतान की खोज है,शराब का सुख मृगतृष्णा के सुख के समान है,शराब पीना मानो मौत को बुलाना,ड्रग्स मानो मौत को निमंत्रण देना,व्यसनी स्वयं को करें दुःखी साथ मे परिवार को भी दुःख देता है।
🚩ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के कैन्सर रिसर्च संस्था ने यह सिद्ध किया है की तम्बाकू के सेवन से मनुष्य अपने जीवन के 22 वर्ष नष्ट कर देता है,अर्थात वह 22 वर्ष पहले ही मर जाता है ।
🚩 तम्बाकू खाने से नष्ट होनेवाले यही 22 वर्ष यदि सत्संग तथा सत्कर्मों में लगायें जाय तो मानव में से महामानव का प्रागट्य हो सकता है ।
🚩सभी तरह के व्यसन शरीर को हानि पहुँचाते हैं , और इससे भी बढ़कर तो ये सर्वोत्तम एवं दुर्लभ मनुष्य जन्म को व्यर्थ में ही नष्ट कर डालते है !
🚩मादक पदार्थों में दारू सबसे अधिक भयानक है। इससे लाखों घर बर्बाद हुए हैं। भारत भर में दारूबन्दी के लिए विस्तृत स्तर पर प्रयत्न हो रहे हैं। अमेरिका और रूस जैसे देशों में भी दारू का इस्तेमाल कम होता जा रहा है।
🚩दारू में एक प्रकार का विष होता है। उसमें कुछ अनुपात में अल्कोहल होता है। जिस कक्षा का दारू होता है उसमें उतनी मात्रा में विष भी होता है। वाइन में 10 प्रतिशत, बीयर जो साधारण कक्षा दारू माना जाता है उसमें 30 प्रतिशत, व्हिस्की तथा ब्रान्डी में 40 से 50 प्रतिशत तक अर्थात आधा हिस्सा अल्कोहल होता है।
🚩आश्चर्य की बात यह है कि जिस दारू में अधिक मात्रा में अल्कोहल होता है उतना वह अधिक अच्छी किस्म का दारू माना जाता है, क्योंकि उससे अधिक नशा उत्पन्न होता है। सुविख्यात डॉक्टर डॉक का अभिप्राय है कि अल्कोहल एक प्रकार का सूक्ष्म विष है जो क्षण मात्र में सारे शरीर में फैल जाता है। रक्त, नाड़ियों तथा दिमाग के कार्यों में विघ्न डालता है। शरीर के कुछ अंगों सूजन आती है। तदुपरांत, शरीर के विविध गोलकों (चक्रों) को बिगाड़ देता है। कई बार वह सारे शरीर को बेकार बना देता है। कभी पक्षाघात भी हो जाता है।
🚩थोड़ा सा विष खाने से मृत्यु हो जाती है। दारू के रूप में हर रोज विषपान किया जाये तो कितनी हानि होती है, इसका विचार करना चाहिए। कुछ डॉक्टरों ने शराबियों के शरीर को चीरकर देखा है कि उसके सब अंग विषाक्त हो जाते हैं। आँतें प्रायः सड़ जाती हैं। दिमाग कमजोर हो जाता है। रक्त की नाडियाँ आवश्यकता से अधिक चौड़ी हो जाती हैं। दिमाग शरीर का राजा है। उसके संचालन में खाना-पीना, उठना बैठना, चलना फिरना जैसी क्रियाओं में मन्दता आ जाती है। इस प्रकार सारा शरीर प्रायः बेकार हो जाता है।
🚩आदमी जब दारू पीता है,तब दिमाग उसके नियन्त्रण में नहीं रहता। कुछ का कुछ बोलने लगता है। लड़खड़ाता है। उसके मुँह से खराब दुर्गन्ध निकलती है। वह रास्ते में कहीं भी गिर पड़ता है।इस प्रकार नशे का बुरा प्रभाव दिमाग पर पड़ता है। दिमाग की संचालन शक्ति धीरे-धीरे नष्ट होती जाती है। कुछ लोग पागल बन जाते हैं। कभी अकाल मृत्यु का शिकार हो जाते हैं। इंग्लैंड, जर्मनी, अमेरिका आदि देशों में जहाँ अधिक मात्रा में दारू पिया जाता है वहाँ के डॉक्टरों का अभिप्राय है कि अधिकतर रोग दारू पीने वालों को सताते हैं। प्लेटिन महोदय इस विषय पर लिखते हैं कि शरीर के केन्द्रस्थान पर अल्कोहल की बहुत भयानक असर पड़ती है। इसी कारण से दारू पीने वालों में कई लोग पागल हो जाते हैं।
🚩 शराबियों के बच्चे प्रायः मूर्खता, पागलपन, पक्षाघात, क्षय आदि रोगों के शिकार बनते हैं। दारू तथा मांसाहार में होनेवाली अशांति, उद्वेग और भयंकर रोगों को विदेशी लोग अब समझने लगे हैं। करीब पाँच लाख लोगों ने दारू, मांस जैसे आसुरी आहार का त्याग करके भारतीय शाकाहारी व्यंजन लेना शुरु किया है। शराबी लोग स्वयं तो डूबते हैं साथ ही साथ अपने बच्चों को भी डुबोते हैं। आगे चलकर उपरोक्त महोदय कहते हैं कि दारू पीने वाले लोग अत्यन्त दुर्बल होते हैं। ऐसे लोगों को रोग अधिकाधिक परेशान करते हैं।
🚩दारू के शौकीन लोग कहते हैं कि दारू पीने से शरीर में शक्ति, स्फूर्ति और उत्तेजना आती है। परन्तु उनका यह तर्क बिल्कुल असंगत और गलत है। थोड़ी देर के लिए कुछ उत्तेजना आती है लेकिन अन्त में भयंकर दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
26 June 2022
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🚩नशा एक खतरनाक दुर्व्यसन है । यह दुर्व्यसन जब किसी के जीवन में आ जाता है , तो उसे खोखला कर देता है और उसे विनाश की कगार पर लाकर खड़ा कर देता है ।
🚩 व्यसन व्यक्ति की प्रगति के सभी मार्गों को अवरुद्ध कर देता है । प्रारंभ में मनुष्य उसे आनंद की वस्तु समझकर अपनाता है , उसे मनोरंजन का साधन मानता है तथा उसे उच्चस्तर एवं गौरव का प्रतीक मानकर गले लगाता है परन्तु बाद में सिवाय पश्चाताप के उसके पास कुछ भी शेष नहीं रहता ।
🚩संत श्री आशारामजी आश्रमों द्वारा युवा सेवा संघ के माध्यम से समय- समय पर व्यसन मुक्ति अभियान चलाए जाते है ।
🚩शराब शैतान की खोज है,शराब का सुख मृगतृष्णा के सुख के समान है,शराब पीना मानो मौत को बुलाना,ड्रग्स मानो मौत को निमंत्रण देना,व्यसनी स्वयं को करें दुःखी साथ मे परिवार को भी दुःख देता है।
🚩ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के कैन्सर रिसर्च संस्था ने यह सिद्ध किया है की तम्बाकू के सेवन से मनुष्य अपने जीवन के 22 वर्ष नष्ट कर देता है,अर्थात वह 22 वर्ष पहले ही मर जाता है ।
🚩 तम्बाकू खाने से नष्ट होनेवाले यही 22 वर्ष यदि सत्संग तथा सत्कर्मों में लगायें जाय तो मानव में से महामानव का प्रागट्य हो सकता है ।
🚩सभी तरह के व्यसन शरीर को हानि पहुँचाते हैं , और इससे भी बढ़कर तो ये सर्वोत्तम एवं दुर्लभ मनुष्य जन्म को व्यर्थ में ही नष्ट कर डालते है !
🚩मादक पदार्थों में दारू सबसे अधिक भयानक है। इससे लाखों घर बर्बाद हुए हैं। भारत भर में दारूबन्दी के लिए विस्तृत स्तर पर प्रयत्न हो रहे हैं। अमेरिका और रूस जैसे देशों में भी दारू का इस्तेमाल कम होता जा रहा है।
🚩दारू में एक प्रकार का विष होता है। उसमें कुछ अनुपात में अल्कोहल होता है। जिस कक्षा का दारू होता है उसमें उतनी मात्रा में विष भी होता है। वाइन में 10 प्रतिशत, बीयर जो साधारण कक्षा दारू माना जाता है उसमें 30 प्रतिशत, व्हिस्की तथा ब्रान्डी में 40 से 50 प्रतिशत तक अर्थात आधा हिस्सा अल्कोहल होता है।
🚩आश्चर्य की बात यह है कि जिस दारू में अधिक मात्रा में अल्कोहल होता है उतना वह अधिक अच्छी किस्म का दारू माना जाता है, क्योंकि उससे अधिक नशा उत्पन्न होता है। सुविख्यात डॉक्टर डॉक का अभिप्राय है कि अल्कोहल एक प्रकार का सूक्ष्म विष है जो क्षण मात्र में सारे शरीर में फैल जाता है। रक्त, नाड़ियों तथा दिमाग के कार्यों में विघ्न डालता है। शरीर के कुछ अंगों सूजन आती है। तदुपरांत, शरीर के विविध गोलकों (चक्रों) को बिगाड़ देता है। कई बार वह सारे शरीर को बेकार बना देता है। कभी पक्षाघात भी हो जाता है।
🚩थोड़ा सा विष खाने से मृत्यु हो जाती है। दारू के रूप में हर रोज विषपान किया जाये तो कितनी हानि होती है, इसका विचार करना चाहिए। कुछ डॉक्टरों ने शराबियों के शरीर को चीरकर देखा है कि उसके सब अंग विषाक्त हो जाते हैं। आँतें प्रायः सड़ जाती हैं। दिमाग कमजोर हो जाता है। रक्त की नाडियाँ आवश्यकता से अधिक चौड़ी हो जाती हैं। दिमाग शरीर का राजा है। उसके संचालन में खाना-पीना, उठना बैठना, चलना फिरना जैसी क्रियाओं में मन्दता आ जाती है। इस प्रकार सारा शरीर प्रायः बेकार हो जाता है।
🚩आदमी जब दारू पीता है,तब दिमाग उसके नियन्त्रण में नहीं रहता। कुछ का कुछ बोलने लगता है। लड़खड़ाता है। उसके मुँह से खराब दुर्गन्ध निकलती है। वह रास्ते में कहीं भी गिर पड़ता है।इस प्रकार नशे का बुरा प्रभाव दिमाग पर पड़ता है। दिमाग की संचालन शक्ति धीरे-धीरे नष्ट होती जाती है। कुछ लोग पागल बन जाते हैं। कभी अकाल मृत्यु का शिकार हो जाते हैं। इंग्लैंड, जर्मनी, अमेरिका आदि देशों में जहाँ अधिक मात्रा में दारू पिया जाता है वहाँ के डॉक्टरों का अभिप्राय है कि अधिकतर रोग दारू पीने वालों को सताते हैं। प्लेटिन महोदय इस विषय पर लिखते हैं कि शरीर के केन्द्रस्थान पर अल्कोहल की बहुत भयानक असर पड़ती है। इसी कारण से दारू पीने वालों में कई लोग पागल हो जाते हैं।
🚩 शराबियों के बच्चे प्रायः मूर्खता, पागलपन, पक्षाघात, क्षय आदि रोगों के शिकार बनते हैं। दारू तथा मांसाहार में होनेवाली अशांति, उद्वेग और भयंकर रोगों को विदेशी लोग अब समझने लगे हैं। करीब पाँच लाख लोगों ने दारू, मांस जैसे आसुरी आहार का त्याग करके भारतीय शाकाहारी व्यंजन लेना शुरु किया है। शराबी लोग स्वयं तो डूबते हैं साथ ही साथ अपने बच्चों को भी डुबोते हैं। आगे चलकर उपरोक्त महोदय कहते हैं कि दारू पीने वाले लोग अत्यन्त दुर्बल होते हैं। ऐसे लोगों को रोग अधिकाधिक परेशान करते हैं।
🚩दारू के शौकीन लोग कहते हैं कि दारू पीने से शरीर में शक्ति, स्फूर्ति और उत्तेजना आती है। परन्तु उनका यह तर्क बिल्कुल असंगत और गलत है। थोड़ी देर के लिए कुछ उत्तेजना आती है लेकिन अन्त में भयंकर दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
🚩दारू पीने वालों की स्त्रियों की कल्पना करो। उनको कितने दुःख सहन करना पड़ता है। शराबी लोग अपनी पत्नी के साथ क्रूरता पूर्ण बर्ताव करते हैं। दारू पीने वाला मनुष्य मिटकर राक्षस बन जाता है। वह राक्षस भी शक्ति एवं तेज से रहित। उसके बच्चे भी कई प्रकार से निराशा महसूस करते हैं। सारा परिवार पूर्णतया परेशान होता है। दारू पीने वालों की इज्जत समाज में कम होती है। ये लोग भक्ति, योग तथा आत्मज्ञान के मार्ग पर नहीं चल सकते। आदमी ज्यों-ज्यों अधिक दारू पीता है त्यों-त्यों अधिकाधिक कमजोर बनता है।
🚩पाश्चात्य शिक्षा के रंग में हुए लोग कई बार मानते हैं कि दारू का थोड़ा इस्तेमाल आवश्यक और लाभप्रद है। वे अपने आपको सुधरे हुए मानते हैं। लेकिन यह उनकी भ्रांति है। डॉ. टी.एल. निकल्स लिखते हैं-“जीवन के लिए किसी भी प्रकार और किसी भी मात्रा में अल्कोहल की आवश्यकता नहीं है। दारू से कोई भी लाभ होना असंभव है। दारू से नशा उत्पन्न होता है लेकिन साथ ही साथ अनेक रोग भी पैदा होते हैं। जो लोग सयाने हैं और सोच समझ सकते हैं, वे लोग मादक पदार्थों से दूर रहते हैं। भगवान ने मनुष्य को बुद्धि दी है, इससे बुद्धिपूर्वक सोचकर उसे दारू से दूर रहना चाहिए।”
🚩जीव विज्ञान के ज्ञाताओं का कहना है कि शराबियों के रक्त में अल्कोहल मिल जाता है अतः उसके बच्चे को आँख का कैन्सर होने की संभावना है। दस पीढ़ी तक की कोई भी संतान इसका शिकार हो सकती है। शराबी अपनी खाना-खराबी तो करता ही है, दस पीढ़ियों के लिए भी विनाश को आमंत्रित करता है।
🚩बोतल का दारू दस पीढ़ी तक विनाशकारी प्रभाव रखता है तो राम नाम की प्यालियाँ इक्कीस पीढ़ियों को पार लगाने का सामर्थ्य रखे, यह स्वाभाविक है।
🚩जाम पर जाम पीने से क्या फायदा
रात बीती सुबह को उतर जायेगी।
तू हरि रस की प्यालियाँ पी ले
तेरी सारी ज़िन्दगी सुधर जाएगी।।
🚩डायोजिनीज को उनके मित्रों ने महँगे शराब का जाम भर दिया। डायोजिनीज ने कचरापेटी में डाल दिया। मित्रों ने कहाः “इतनी कीमती शराब आपने बिगाड़ दी?”
🚩“तुम क्या कर रहे हो?” डायोजिनीज ने पूछा।
“हम पी रहे हैं।” जवाब मिला।
🚩“मैंने जो चीज कचरापेटी में उड़ेली वही चीज तुम अपने मुँह में उड़ेलकर अपना विनाश कर रहे हो। मैंने तो शराब ही बिगाड़ी लेकिन तुम शराब और जीवन दोनों बिगाड़ रहे हो।”
🚩दुर्बल मनवाला व्यक्ति विकारों-दुर्व्यसनों में फँसता जाता है । ऐसी परिस्थिति में व्यसनों से मुक्ति इस प्रकार हो सकती है |
🚩यदि अपने पास संकल्पबल न हो तो जिनके पास अपूर्व संकल्पबल हो उनका सहारा लेना चाहिए । संत-महापुरुष , आत्मज्ञानी महात्मा उनके समक्ष प्रार्थना करने से , व्रत लेने से उनके संकल्प और आशीर्वाद मदद रूप होते है ।
🚩शराब छोड़ने का प्रयोग :- प्रातःकाल उठकर दोनों हाथों को देखों । पांच बार मन –ही –मन कहो : “आज मै अपने मुँह में इस जहर को नहीं डालूँगा …. दारू नहीं पिऊँगा …. नहीं पिऊँगा ।”
🚩प्रातः स्नानादि के बाद कटोरी में थोडा जल लो । ललाट पर उस पानी का तिलक करो । दृढ़ संकल्प करो की अब मैं अपना भाग्य बदलूँगा । ‘हरी ॐ…. हरी ॐ….हरी ॐ’ लगभग सवा सौ बार इस मंत्र का जप करो । पानी में निहारो और तीन घूँट वह पानी पी जाओ । रात्रि को सोते समय भी ऐसा करो ।चमत्कारिक ईश्वरीय सहायता अवश्य मिलेगी ।
🚩बीडी , सिगरेट , गुटखा – पानमसाला छोड़ने का प्रयोग :- सौंफ 100 ग्राम , अजवायन 100 ग्राम , सेंधा नमक 30 ग्राम , दो बड़े निम्बू का रस मिश्रीत करके तवे पर सेंक लो । जब बीडी , सिगरेट , गुटखा अथवा पानमसाले की तलब लगे तब इसका मुखवास लो । इससे रक्त की शुद्धि होगी तथा तम्बाकू के व्यसन से मुक्ति मिलेगी ।
🚩संत श्री आशारामजी आश्रम द्वारा प्रकाशित ‘ व्यसन का शौक ….कुत्ते की मौत ’ पोस्टर अथवा कैलेण्डर को अपने कार्यालय एवं शयनकक्ष में टाँगे ।
🚩 इससे भी व्यसन छोड़ने में आपको मदद मिलेगी । यह मानव जीवन बड़ा दुर्लभ है । ईश्वर जीव पर कृपा करके उसे जन्म – मरण के दुःख से मुक्त होने के लिए मनुष्य शरीर देता है ।
🚩आओ अपने और अपने परिवार के खुशियों के लिए ,अपने और अपने परिवार के अच्छे स्वास्थ्य के लिए आज ही व्यसन मुक्ति बनें।
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🚩पाश्चात्य शिक्षा के रंग में हुए लोग कई बार मानते हैं कि दारू का थोड़ा इस्तेमाल आवश्यक और लाभप्रद है। वे अपने आपको सुधरे हुए मानते हैं। लेकिन यह उनकी भ्रांति है। डॉ. टी.एल. निकल्स लिखते हैं-“जीवन के लिए किसी भी प्रकार और किसी भी मात्रा में अल्कोहल की आवश्यकता नहीं है। दारू से कोई भी लाभ होना असंभव है। दारू से नशा उत्पन्न होता है लेकिन साथ ही साथ अनेक रोग भी पैदा होते हैं। जो लोग सयाने हैं और सोच समझ सकते हैं, वे लोग मादक पदार्थों से दूर रहते हैं। भगवान ने मनुष्य को बुद्धि दी है, इससे बुद्धिपूर्वक सोचकर उसे दारू से दूर रहना चाहिए।”
🚩जीव विज्ञान के ज्ञाताओं का कहना है कि शराबियों के रक्त में अल्कोहल मिल जाता है अतः उसके बच्चे को आँख का कैन्सर होने की संभावना है। दस पीढ़ी तक की कोई भी संतान इसका शिकार हो सकती है। शराबी अपनी खाना-खराबी तो करता ही है, दस पीढ़ियों के लिए भी विनाश को आमंत्रित करता है।
🚩बोतल का दारू दस पीढ़ी तक विनाशकारी प्रभाव रखता है तो राम नाम की प्यालियाँ इक्कीस पीढ़ियों को पार लगाने का सामर्थ्य रखे, यह स्वाभाविक है।
🚩जाम पर जाम पीने से क्या फायदा
रात बीती सुबह को उतर जायेगी।
तू हरि रस की प्यालियाँ पी ले
तेरी सारी ज़िन्दगी सुधर जाएगी।।
🚩डायोजिनीज को उनके मित्रों ने महँगे शराब का जाम भर दिया। डायोजिनीज ने कचरापेटी में डाल दिया। मित्रों ने कहाः “इतनी कीमती शराब आपने बिगाड़ दी?”
🚩“तुम क्या कर रहे हो?” डायोजिनीज ने पूछा।
“हम पी रहे हैं।” जवाब मिला।
🚩“मैंने जो चीज कचरापेटी में उड़ेली वही चीज तुम अपने मुँह में उड़ेलकर अपना विनाश कर रहे हो। मैंने तो शराब ही बिगाड़ी लेकिन तुम शराब और जीवन दोनों बिगाड़ रहे हो।”
🚩दुर्बल मनवाला व्यक्ति विकारों-दुर्व्यसनों में फँसता जाता है । ऐसी परिस्थिति में व्यसनों से मुक्ति इस प्रकार हो सकती है |
🚩यदि अपने पास संकल्पबल न हो तो जिनके पास अपूर्व संकल्पबल हो उनका सहारा लेना चाहिए । संत-महापुरुष , आत्मज्ञानी महात्मा उनके समक्ष प्रार्थना करने से , व्रत लेने से उनके संकल्प और आशीर्वाद मदद रूप होते है ।
🚩शराब छोड़ने का प्रयोग :- प्रातःकाल उठकर दोनों हाथों को देखों । पांच बार मन –ही –मन कहो : “आज मै अपने मुँह में इस जहर को नहीं डालूँगा …. दारू नहीं पिऊँगा …. नहीं पिऊँगा ।”
🚩प्रातः स्नानादि के बाद कटोरी में थोडा जल लो । ललाट पर उस पानी का तिलक करो । दृढ़ संकल्प करो की अब मैं अपना भाग्य बदलूँगा । ‘हरी ॐ…. हरी ॐ….हरी ॐ’ लगभग सवा सौ बार इस मंत्र का जप करो । पानी में निहारो और तीन घूँट वह पानी पी जाओ । रात्रि को सोते समय भी ऐसा करो ।चमत्कारिक ईश्वरीय सहायता अवश्य मिलेगी ।
🚩बीडी , सिगरेट , गुटखा – पानमसाला छोड़ने का प्रयोग :- सौंफ 100 ग्राम , अजवायन 100 ग्राम , सेंधा नमक 30 ग्राम , दो बड़े निम्बू का रस मिश्रीत करके तवे पर सेंक लो । जब बीडी , सिगरेट , गुटखा अथवा पानमसाले की तलब लगे तब इसका मुखवास लो । इससे रक्त की शुद्धि होगी तथा तम्बाकू के व्यसन से मुक्ति मिलेगी ।
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