पहले वो निगाह इक किरन थी
अब बर्क़-सिफ़ात हो गई है
घटते घटते तिरी इनायत
मेरी औक़ात हो गई है
~फ़िराक़ गोरखपुरी
अब बर्क़-सिफ़ात हो गई है
घटते घटते तिरी इनायत
मेरी औक़ात हो गई है
~फ़िराक़ गोरखपुरी
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रफ़्ता रफ़्ता ग़ैर अपनी ही नज़र में हो गए
वाह-री ग़फ़्लत तुझे अपना समझ बैठे थे हम
~ आदरणीय फ़िराक साहब
वाह-री ग़फ़्लत तुझे अपना समझ बैठे थे हम
~ आदरणीय फ़िराक साहब
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