कोई सुकून नहीं है गांव में। सब दारूबाज, चरसी, लंपट जिनको शहर के 9 से 5 वाली नौकरी ने दुत्कार कर भगा दिया अब गांव में अशांति फैलाए हुए हैं।
हर सुबह 4 बजे कोई लाउडस्पीकर चालू कर देता है।
लगन के समय डीजे पर बजते अश्लील गाने आपके कान में छेद कर रहे होते हैं।
रोज 2 इंच जमीन फ़रियाने के लिए कोई अपने पड़ोसी से लड़ रहा होता है।
रोज कहीं न कहीं मातम चल रहा होता है, कोई जहरीली शराब पीने से मर गया, किसी का रोड एक्सीडेंट हो गया तो कोई गुजरात की फैक्ट्री में जल कर मर गया।
गांव को रोमांटिसाइज नहीं करना चाहिए। गांव के जीवन में बहुत परिश्रम है, बहुत सारी त्रासदी है, जातिगत हिंसाए हैं, भोले भाले लोगों को ठगे जाने की कहानियां हैं, बीमारियों की इलाज न करवा पाने से धीरे धीरे मरते लोग हैं। भोज में जाति के आधार पर खाना खाने की पंक्ति है। वो सब कुछ है जिसे हमने प्रीमिटिव मान लिया है।
पर हां, सुकून है, अपने लोगों के पास रहने का, अपने मां बाप, भाई बहन, बा बाबा के साथ रहने का। साथ हीं अपने गाछी में अपने आम के पेड़ के नीचे सोने का भी अपना आनंद है।
#copied 🫠
हर सुबह 4 बजे कोई लाउडस्पीकर चालू कर देता है।
लगन के समय डीजे पर बजते अश्लील गाने आपके कान में छेद कर रहे होते हैं।
रोज 2 इंच जमीन फ़रियाने के लिए कोई अपने पड़ोसी से लड़ रहा होता है।
रोज कहीं न कहीं मातम चल रहा होता है, कोई जहरीली शराब पीने से मर गया, किसी का रोड एक्सीडेंट हो गया तो कोई गुजरात की फैक्ट्री में जल कर मर गया।
गांव को रोमांटिसाइज नहीं करना चाहिए। गांव के जीवन में बहुत परिश्रम है, बहुत सारी त्रासदी है, जातिगत हिंसाए हैं, भोले भाले लोगों को ठगे जाने की कहानियां हैं, बीमारियों की इलाज न करवा पाने से धीरे धीरे मरते लोग हैं। भोज में जाति के आधार पर खाना खाने की पंक्ति है। वो सब कुछ है जिसे हमने प्रीमिटिव मान लिया है।
पर हां, सुकून है, अपने लोगों के पास रहने का, अपने मां बाप, भाई बहन, बा बाबा के साथ रहने का। साथ हीं अपने गाछी में अपने आम के पेड़ के नीचे सोने का भी अपना आनंद है।
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