बदलते भारत की छवी
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भारत में जो वर्तमान समय कि स्थिति प्रस्थिति हैं उसने बाहर निकलना है

काले अंग्रेजों से मातृ भूमि के मुक्त और गौ हत्या का विरोध करना है
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🙏🌹 *जय श्री महाकाल*🌹🙏
*श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का संध्या आरती श्रृंगार दर्शन*
*24-08-2025 कण-कण में महादेव*💕
🙏3
🕉️ *~ वैदिक पंचांग ~* 🕉️
🌤️ *दिनांक - 24 अगस्त 2025*
🌤️ *दिन - रविवार*
🌤️ *विक्रम संवत - 2082 (गुजरात-महाराष्ट्र अनुसार 2081)*
🌤️ *शक संवत - 1947*
🌤️ *अयन - दक्षिणायन*
🌤️ *ऋतु - शरद ऋतु*
🌤️ *मास - भाद्रपद*
🌤️ *पक्ष - शुक्ल*
🌤️ *तिथि - प्रतिपदा सुबह 11:48 तक तत्पश्चात द्वितीया*
🌤️ *नक्षत्र - पूर्वाफाल्गुनी 25 अगस्त रात्रि 02:05 तक तत्पश्चात उत्तराफाल्गुनी*
🌤️ *योग - शिव दोपहर 12:30 तक तत्पश्चात सिद्ध*
🌤️ *राहुकाल - शाम 05:26 से शाम 07:02 तक*
🌤️ *सूर्योदय - 06:21*
🌤️ *सूर्यास्त - 07:00*
👉 *दिशाशूल - पश्चिम दिशा में*
🚩 *व्रत पर्व विवरण - चंद्र-दर्शन ( शाम 06:52 से रात्रि 07:33 तक)*
💥 *विशेष - प्रतिपदा को कूष्माण्ड (कुम्हड़ा पेठा) न खाएं क्योकि यह धन का नाश करने वाला है (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-38)*
*💥 रविवार के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल खाना और लगाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-38)*
💥 *रविवार के दिन मसूर की दाल, अदरक और लाल रंग का साग नहीं खाना चाहिए।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्ण खंडः 75.90)*
💥 *रविवार के दिन काँसे के पात्र में भोजन नहीं करना चाहिए।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्ण खंडः 75)*
💥 *स्कंद पुराण के अनुसार रविवार के दिन बिल्ववृक्ष का पूजन करना चाहिए। इससे ब्रह्महत्या आदि महापाप भी नष्ट हो जाते हैं।*
🕉️~*वैदिक पंचांग* ~🕉️

➡ *27 अगस्त 2025 बुधवार को भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी है ।*

🙏🏻 *भविष्य पुराण के अनुसार ‘भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का नाम ‘शिवा’ है | इस दिन किये गये स्नान, दान, उपवास, जप आदि सत्कर्म सौ गुना हो जाते हैं |*
👩🏼 *इस दिन जो स्री अपने सास-ससुर को गुड़ के तथा नमकीन पुए खिलाती है वह सौभाग्यवती होती है | पति की कामना करनेवाली कन्या को विशेषरूप से यह व्रत करना चाहिए |’*
🙏🏻
🕉️ ~ *वैदिक पंचाग* ~ 🕉️

🌷 *गणेश-कलंक चतुर्थी* 🌷 🙏🏻 *( ‘ॐ गं गणपतये नम:’ मंत्र का जप करने और गुड़मिश्रित जल से गणेशजी को स्नान कराने एवं दूर्वा व सिंदूर की आहुति देने से विघ्न-निवारण होता है तथा मेधाशक्ति बढ़ती है | )*
🙏🏻
🕉️ ~ *हिन्दू पंचांग* ~ 🕉️

🌷 *गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन कलंक निवारण के उपाय*
➡ *इस वर्ष - 26 अगस्त 2025 मंगलवार को चंद्र दर्शन निषेध चन्द्रास्त : रात्रि 09:06 एवं 27 अगस्त, बुधवार को चंद्र दर्शन निषेध चन्द्रास्त : रात्रि 09:38*
🙏🏻 *भारतीय शास्त्रों में गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन निषेध माना गया है इस दिन चंद्र दर्शन करने से व्यक्ति को एक साल में मिथ्या कलंक लगता है। भगवान श्री कृष्ण को भी चंद्र दर्शन का मिथ्या कलंक लगने के प्रमाण हमारे शास्त्रों में विस्तार से वर्णित है।*
🌷 *भाद्रशुक्लचतुथ्र्यायो ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपिवा।*
*अभिशापीभवेच्चन्द्रदर्शनाद्भृशदु:खभाग्॥*
🙏🏻 *अर्थातः जो जानबूझ कर अथवा अनजाने में ही भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा का दर्शन करेगा, वह अभिशप्त होगा। उसे9 बहुत दुःख उठाना पडेगा।*
🙏🏻 *गणेश पुराण के अनुसार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्रमा देख लेने पर कलंक अवश्य लगता है। ऐसा गणेश जी का वचन है।*
🙏🏻 *भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन न करें यदि भूल से चंद्र दर्शन हो जाये तो उसके निवारण के निमित्त श्रीमद्‌भागवत के १०वें स्कंध, ५६-५७वें अध्याय में उल्लेखित स्यमंतक मणि की चोरी कि कथा का श्रवण करना लाभकारक है। जिससेे चंद्रमा के दर्शन से होने वाले मिथ्या कलंक का ज्यादा खतरा नहीं होगा।*
🌷 *चंद्र-दर्शन दोष निवारण हेतु मंत्र* 🌷
🙏🏻 *यदि अनिच्छा से चंद्र-दर्शन हो जाये तो व्यक्ति को निम्न मंत्र से पवित्र किया हुआ जल ग्रहण करना चाहिये। मंत्र का २१, ५४ या १०८ बार जप करें । ऐसा करने से वह तत्काल शुद्ध हो निष्कलंक बना रहता है। मंत्र निम्न है।*
🌷 *सिंहः प्रसेनमवधीत्‌ , सिंहो जाम्बवता हतः।*
*सुकुमारक मा रोदीस्तव, ह्येष स्यमन्तकः ॥*
🙏🏻 *अर्थात: सुंदर सलोने कुमार! इस मणि के लिये सिंह ने प्रसेन को मारा है और जाम्बवान ने उस सिंह का संहार किया है, अतः तुम रोओ मत। अब इस स्यमंतक मणि पर तुम्हारा ही अधिकार है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, अध्यायः ७८)*
🙏🏻 *चौथ के चन्द्रदर्शन से कलंक लगता है | इस मंत्र-प्रयोग अथवा स्यमन्तक मणि कथा के वचन या श्रवण से उसका प्रभाव कम हो जाता है |*
🙏🏻
🕉️ ~ *वैदिक पंचांग* ~ 🕉️
🙏🏻🌷🌻🌹🍀🌺🌸🍁💐🌷🙏🏻
जिनका आज जन्मदिन है उनको हार्दिक शुभकामनाएं बधाई और शुभ आशीष
दिनांक 24 को जन्मे व्यक्ति का मूलांक 6 होगा। आपमें गजब का आत्मविश्वास है। इसी आत्मविश्वास के कारण आप किसी भी परिस्थिति में डगमगाते नहीं है। आपको सुगंध का शौक होगा। इस अंक से प्रभावित व्यक्ति आकर्षक, विनोदी, कलाप्रेमी होते हैं। आप अपनी महत्वाकांक्षा के प्रति गंभीर होते हैं। अगर आप स्त्री हैं तो पुरुषों के प्रति आपकी दिलचस्पी होगी। लेकिन आप दिल के बुरे नहीं है। 6 मूलांक शुक्र ग्रह द्वारा संचालित होता है। अत: शुक्र से प्रभावित बुराई भी आपमें पाई जा सकती है। जैसे स्त्री जाति के प्रति आपमें सहज झुकाव होगा।

शुभ दिनांक : 6, 15, 24

शुभ अंक : 6, 15, 24, 33, 42, 51, 69, 78

शुभ वर्ष : 2026

ईष्टदेव : मां सरस्वती, महालक्ष्मी


शुभ रंग : क्रीम, सफेद, लाल, बैंगनी

जन्मतिथि के अनुसार भविष्यफल :
नौकरीपेशा व्यक्ति अपने परिश्रम के बल पर उन्नति के हकदार होंगे। बैक परीक्षाओं में भी सफलता अर्जित करेंगे। दाम्पत्य जीवन में मिली जुली स्थिति रहेगी। आर्थिक मामलों में सभंलकर चलना होगा। लेखन संबंधी मामलों के लिए उत्तम होती है। जो विद्यार्थी सीए की परीक्षा देंगे उनके लिए शुभ रहेगा। व्यापार-व्यवसाय में भी सफलता रहेगी। विवाह के योग भी बनेंगे। स्त्री पक्ष का सहयोग मिलने से प्रसन्नता रहेगी।

मेष🐐 (चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ)
आपका आज का दिन प्रायः सामान्य ही रहेगा। परन्तु आज फिजूल खर्ची पर नियंत्रण आयवश्यक है अन्यथा आर्थिक संकट में फंस सकते है। आज के दिन आप भावनाओ में बहकर अनुचित कदम उठा सकते हैं। लोगों के बहकावे में ना आये अन्यथा मान हानि कोर्ट-कचहरी की नौबत आ सकती है। प्रेम प्रसंगों से आज दूर रहना ही बेहतर रहेगा। विलासी प्रवृति का लाभ शत्रु उठा सकते है सावधान रहें। परिवार के सदस्यों की मांगें एवं मनोरंजन के पीछे आज अधिक खर्च होगा। कार्य क्षेत्र पर भी आज परिश्रम अधिक रहेगा। पूर्वार्ध के बाद थोड़ा धन लाभ होने से कार्य चलते रहेंगे। यात्रा के भी योग बन रहे है। वाहन चलाने में सावधानी बरतें। घर में स्त्री वर्ग से अनबन हो सकती है।

वृष🐂 (ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो)
आज का दिन अशुभ फलदायक रहेगा।
दिनभर विविध कष्ट रहने से मानसिक एवं आर्थिक स्थिति बिगड़ सकती है। कार्यो में बार-बार प्रयत्न करने पर भी विलम्ब, असफलता मिलने से गुस्सा बढेगा क्रोध की अधिकता एवं वाकपटुता आज बनते कामो को बिगाड़ेगी। अनैतिक कृत्यों में पड़कर बदनामी मिल सकती है। परिवार में फिजूल खर्ची बढ़ने से धन सम्बंधित उलझने बढ़ेंगी व्यवहार शून्यता के कारण प्रियजनों से मन-मुटाव होगा अशांति भी रहेगी। कार्य व्यवसाय मध्यम चलेगा। दिन के समय अत्यादिक आलस्य रहेगा। सेहत अकस्मात ख़राब हो सकती है सावधान रहें। सरकार विरोधी वर्जित कार्यो में समय एवं धन बर्बाद हो सकता है।

मिथुन👫 (का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, हा)
आपका आज का दिन मिलाजुला रहेगा। दिन के पूर्वार्ध में सेहत सम्बंधित समस्या रहने से कार्यो में आलस करेंगे घरेलू कार्यो की व्यस्तता के कारण कार्य क्षेत्र पर ध्यान नहीं दे पाएंगे। मध्यान के बाद थोड़ा सुधार आने लगेगा। कार्य व्यवसाय थोड़े इन्तजार के बाद गति आ जायेगी लेकिन आर्थिक मंदी रहने से धन सम्बंधित आयोजनो में।विलंब होगा आर्थिक एवं पारिवारिक कारणों से मन भारी रहेगा किसी अन्य की खीज कही और उतारेंगे यंत्रों की सार-संभाल एवं परिजनों पर खर्च करना पड़ेगा। भागीदारी के कार्यो में लाभ हो सकता है। खान-पान एवं असंयमित दिनचर्या के कारण उदर शूल अथवा कब्ज सम्बंधित परेशानिया बनेगी।

कर्क🦀 (ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो)
कार्य क्षेत्र का वातावरण सामान्य रहने से रोजगार सही दिशा में चलेगा। दिन नविन व्यापारिक अनुबंधों को क्रिया में लाने के लिए शुभ रहेगा। नौकरी पेशा जातक भी आज कार्य क्षेत्र में बदलाव कर सकते है। किसी खोई वस्तु के मिलने से मन प्रसन्न रहेगा। पारिवारिक संबंधो से आज लाभ के साथ मान बढ़ने की अधिक सम्भावना रहेगी। सेहत का भी ध्यान रखें सर्दी के कारण परेशानी हो सकती है। माँ अथवा किसी स्त्री के सहयोग से दोपहर के बाद आकस्मिक धन लाभ हो सकता है। गृहस्थ जीवन में प्रेम बना रहेगा। ससुराल पक्ष से लाभ की संभावना है। अविवाहितो को विवाह के प्रस्ताव आएंगे।

सिंह🦁 (मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे)
आज आप व्यर्थ के विवादों में ना पड़कर अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करें। हवाई बातों पर यकीन ना करें अपने बुद्धि बल से योजनाएं बनाये सफलता अवश्य मिलेगी प्रलोभनो से बचें। सामाजिक वर्चस्व में वृद्वि होगी परन्तु कल्पना से बाहर निकल यथार्थ की बाते सोचें। आज परिश्रम के बाद लाभदायक सौदे मिलने से आर्थिक स्थिति मजबूत होगी परन्तु खर्चो पर नियंत्रण नहीं रहेगा। आप व्यापार विस्तार के कारण लंबी यात्रा कर सकते है जोकि आगे के लिये लाभदायक रहेगी। सामाजिक क्षेत्र पर वरिष्ठ लोगो से जान-पहचान बढ़ेगी। मनोरंजन के अवसरों को खाली नहीं जाने
देंगे। मित्र परिचितों के साथ आनंद के क्षण बितायेंगे। सेहत सामान्य रहेगी।

कन्या👩 (टो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो)
आज के दिन आपको प्रतिकूल फल मिलने से मानसिक कष्ट होगा। दिन आपके लिए अधिक परिश्रम वाला रहेगा। परिश्रम के बाद भी बनते काम व्यवहार की कमी के कारण बिगाड़ लेंगे। कार्यो की असफलता हताशा बढ़ायेगी। वाणी एवं व्यवहार में कटुता आने से घर एवं बाहर व्यर्थ के वाद-विवाद हो सकते है। वाणी में मधुरता ना ला सकें तो मौन ही रहे मान हानि की प्रबल संभावना है। नए कार्यो को आज आरम्भ न करें। यात्रा में चोटादि का भय है सावधान रहें। परिवार के सदस्यों से मन मुटाव के प्रसंग बनेंगे आवश्यकताओ को नजर अंदाज करने से माहौल बिगड़ सकता है। किसी विदेशी व्यक्ति से लाभ हो सकता है। आर्थिक उलझनों के कारण चिंताग्रस्त रहेंगे।

तुला⚖️ (रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते)
आज का दिन उन्नति कारक रहेगा। आज पारिवारिक प्रतिष्ठा भाग्योन्नति में सहायक बनेगी। सेहत भी साथ देने से लाभ के अवसर हाथ से निकलने नहीं देंगे। घर के बुजुर्गो की कृपा दृष्टि आप पर रहने से आसानी से अपनी बातों को मनवा लेंगे लेकिन घर के वातावरण की अनदेखी के कारण आपकी आलोचना भी हो सकती है। आज आप किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेंगे कार्य क्षेत्र पर आशा के अनुरूप व्यवसाय नहीं हो पाने से थोड़े हताश भी रहेंगे परंतु प्रयास जारी रखे धन लाभ अवश्य होगा। दूर रहने वाले जानकारों से शुभ समाचार मिलेंगे। बेरोजगारों को रोजगार मिल सकता है।

वृश्चिक🦂 (तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू)
आपका आज का दिन सफलता दायक रहेगा परिस्थितियां आपके अनुकूल बनी रहेंगी। दिन के पहले भाग में किसी बहुप्रतीक्षित कार्य के बनने से प्रसन्नता बढ़ेगी। कार्य क्षेत्र पर धन लाभ के साथ-साथ मान-सम्मान भी बढ़ेगा। नौकरी पेशा जातक विशेष कार्य के लिए नियुक्त किये जा सकते है। उधारी को लेकर चिंतित भी रहेंगे परन्तु मध्यान के बाद धन का आगमन होने से समस्याएं सुलझने लगेंगी। परिवार में किसी सदस्य के बीमार होने से थोड़ी भागदौड़ करनी पड़ सकती है। दाम्पत्य जीवन में प्रेम बना रहेगा। व्यावसायिक यात्रा से लाभ होगा। सामाजिक क्षेत्र में आज चाह कर भी योगदान नहीं कर पाएंगे। अधिक व्यस्तता के कारण थकान अनुभव होगी।

धनु🏹 (ये, यो, भा, भी, भू, ध, फा, ढा, भे)
आज सेहत में सुधार आने से काफी राहत अनुभव करेंगे। रुके हुए कार्यो में गति आएगी फिर भी सरकारी कार्य आज ना करे तो बेहतर रहेगा। किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए आप पूरी तरह से तैयार रहेंगे। परिजनों का सहयोग मिलने से आत्मविश्वाश में बढ़ोतरी होगी। धन सम्बंधित लेन-देन थोड़े विघ्न के बाद पूर्ण होंगे। भागीदारी के कार्य में नुक्सान हो सकता है। मध्यान बाद परिस्थितियां पूर्ण रूप से आपके पक्ष में रहेंगी। समाज के वरिष्ठ व्यक्ति की सहायता से भाग्योदय के अवसर मिलेंगे। घर में धार्मिक पूजा पाठ होने से मांगलिक वातावरण बनेगा। धन लाभ के लिए थोड़ा परिश्रम करना पड़ेगा। जायदाद सम्बंधित कार्यो में आंशिक सफलता मिलेगी। कामुकता भी अधिक रहेगी। अनैतिक कार्यो से दूर रहें।

मकर🐊 (भो, जा, जी, खी, खू, खा, खो, गा, गी)
आज आपको अपने स्वास्थ्य की संभाल करने की अत्यंत आवश्यकता है। मौसमी बीमारियों के कारण शरीर एवं दिमाग कम सक्रीय रहेंगे। आज के दिन परिश्रम से बचें। कार्य क्षेत्र पर गलत निर्णय के कारण हानि हो सकती है। लेकिन संध्या के आस पास थोडी मेहनत से संतोषजनक लाभ कमा लेंगे। परन्तु खर्च भी बराबर बने रहने से बचत मुश्किल से होगी। परिजनों से सम्बन्ध असामान्य रहेंगे। प्रियजनों के स्वभाव में स्वार्थ छलकेगा। आज आप मानसिक शान्ति पाने के लिये आध्यात्म का सहारा ले सकते है। काम के बोझ से दूर रहकर धर्म के रहस्यों को जानने का प्रयास करेंगे। स्त्री से अनबन रहेगी परन्तु सहयोग भी मिलेगा। दान-पुण्य के अवसर हाथ से ना जाने दें।

कुंभ🍯 (गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा)
आज के दिन भी आपके लिए लाभदायक स्थिति बनेगी दिन व्यस्तता से भरा एवं खर्चीला रहेगा। आज आपके अंदर आत्मविश्वाश बढ़-चढ़ कर रहेगा शारीरिक रूप से भी चुस्त रहेंगे। शेयर प्रोपर्टी में निवेश निकट भविष्य में लाभ कराएगा निर्माण के क्षेत्र से जुड़े जातको को नए अनुबंध मिलेंगे। दैनिक उपभोग की वस्तुओ के व्यापार से अधिक लाभ होगा। वैसे तो सभी आवश्यक कार्य मध्यान से पहले पूर्ण करेंगे परंतु धन लाभ के लिए संध्या तक इन्तजार करना पड़ेगा। सामाजिक एवं धार्मिक आयोजन में महत्त्वपूर्ण योगदान देंगे। परिवार में थोड़ी खींचतान युक्त शांति बनी रहेगी। अन्य महिलाओं से निकटता परेशानी कर सकती है। परिवार में सुख के साधनो पर अधिक खर्च करने पर भी शांति का अभाव रहेगा। सर्दी-जुखाम की समस्या हो सकती है।
मीन🐳 (दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची)
आज का दिन भी आपके पक्ष में रहेगा। दिन के आरम्भ थोड़ी परेशानियों के बाद कार्य में गति आने लगेगी। मध्यान के बाद का समय कई सुनहरे अवसर लाएगा। थोड़ा बहुत उतार चढ़ाव भी देखना पड़ सकता है परंतु आज धन एवं परिवार को लेकर संतोषजनक स्थिति बनेगी कंजूसी से खर्च पर नियंत्रण कर लेंगे। परिजनों अथवा रिश्तेदारो विशेष कर स्त्री पक्ष के सहयोग से लाभ अथवा कोई महत्तवपूर्ण काम बनेगा। जोखिम से ना घबराएं आज किये निवेश आगे लाभदायक रहेंगे। सुख के साधनों पर खर्च करेंगे। लघु व्यावसायिक यात्रा करनी पड़ेगी मध्यान बाद अत्यधिक थकान रहेगी।
*મુસ્લિમ માટે, જૈન સમાજે લીધેલું નિર્ણાયક પગલું...*
દરેક હિન્દુભાઈઓએ અપનાવવા જેવું પગલું...

*દક્ષિણ ભારતના નેલ્લોર વિસ્તારમાં ઐક મુસ્લિમ યુવક એક જૈન છોકરીને ફોસલાવી ભગાડી ને લઈ ગયો.*
*સવારે અને પછી બપોરના જૈન સમાજની એક બેઠક મળી. બેઠકમાં બહુંજ ગંભીર નિર્ણય લેવામાં આવ્યો,*
*જેમાં 550 જૈન દુકાનો અને જૈનોની ફેક્ટરીયોમાંથી મુસ્લિમોને કહેવામાં આવ્યું કે તમામને આજ અને અત્યારે આ નોકરીમાંથી છુટા કરવામાં આવે છે.*
*તમામ મુસ્લિમોએ આવતી કાલથી નોકરી પર આવવાની કોઈ જરૂર નથી તમે લોકો બીજી કોઇ જગ્યાએ નોકરી શોધી લો*
*થોડા સમય પછી હિન્દુ સમાજના બીજા લોકોએ એક પછી એક જૈન સમાજને સપોર્ટ કર્યો અને બીજા દિવસની સાંજ સુધીમાં કુલ 1800 મુસ્લિમોની નોકરીયો ઉપર નોબત આવી ગઈ*
*પછી તો ખુદ મુસ્લિમ સમાજ વાળાએ તે જૈન છોકરીને ફક્ત નવ કલાકની અંદર શોધીને તેના ઘરે સહીસલામત મુકી ગયા. અને પોતાના મુસ્લિમ સમાજના છોકરાઓને ધમકી આપી કે ભુલથી પણ આ વિસ્તારની જૈન અને હિંદુ સમાજની છોકરીઓ સામે જોવાની કોશિશ ના કરે...*
*મિત્રો આવી હોય છે એકતાની તાકાત...*
*મિત્રો ત્યાં પણ ઘણા થર્ડ ક્લાસ દયાળુ, કૃપાળુ, મગજ વગરના, સેક્યુલર, ડરપોક, અને મફતની સલાહ આપનારા સલાહ આપી રહ્યા હતા કે ભાઈ આ લોકોથી ઝગડો ના કરશો ભુલ ફક્ત એક મુસ્લિમની છે માટે બધા જ મુસ્લિમોને નોકરીમાંથી ના નિકાળો બાકી બધા મુસ્લિમો નિર્દોષ છે.*
*બાકી .....તે અલગ વાત છે તે જગ્યાના જૈન સમાજે એક પણ સેક્યુલરોની એક પણ વાત સાંભળી નહીં અને તેમના નિર્ણય ઉપર અડગ રહ્યા...*
*હજુ પણ સમય છે...,*
*ત્યાં ના જૈન સમાજે આપણને દાખલો આપ્યો છે એકતા બતાવવાનો.*

*જો આમાં સહમત હોવ તો બીજા લોકો ને શેર જરૂર થી કરજો*
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🕉 ।। *श्री गणेशाय नमः* ।। 🕉
 *सुप्रभातम् स्नेह वंदनम्* 
🌐 *आज का पंचांग* 🌐
⛳ *तिथि*……( ०४ ) चतुर्थी ⛳️
🙏 श्रीगणेश चतुर्थी 🙏
💐 श्रीगणेशोत्सव प्रारंभ 💐
🦚 श्रीगणेश स्थापना प्रातः ०६ः२१ से ०९ः३० , ११ः१० से १२ः४० 🦚
🌝 चंद्रास्त रात्रि ०९ः२५ 🌝
🌺 वरद चतुर्थी 🌺
🍀 सरस्वती पूजन ( उड़ीसा ) 🍀
🌸 सौभाग्य चतुर्थी ( बंगाल ) 🌸
🌼 संवत्सरी - चतुर्थी पक्ष ( जैन ) 🌼
🪻 भद्रा समाप्त दोपहर ०३ः४५🪻
2️⃣7️⃣-0️⃣8️⃣-2⃣0⃣2️⃣5️⃣
🔔 *वार*……..बुधवार 🔔
🦚 *नक्षत्र*…..चित्रा 🦚
🪔 *योग*…….शुभ 🪔
✳️ *करण*…..बव ✳️
🌅 *सूर्योदय* :-०६ः२१ 🌅
🌌 *सूर्यास्त* :-०७ः०१ 🌌
🌓 *पक्ष*....………शुक्ल 🌓
🌝 *चन्द्र राशि*…. कन्या / सायं ०७ः२३ से तुला 🌝
⏺️ *ऋतु*.......…..शरद ⏺️
🍀 *अयन*………दक्षिण🍀
🪷 *मास*.……….भाद्रपद 🪷
🌻*कलियुगाब्द*….५१२५🌻
🌎 *विक्रम संवत्*.....२०८१🌎
⭐️ *शक संवत्*...... १९४७ ⭐️
🪻अभिजीत ….✖️✖️✖️🪻
🌚 राहुकाल ….मध्याह्न १२ः३८ से ०२ः१८ तक 🌚

💐*।। आपका दिन मंगलमय हो ।।* 💐

🌺🌺 कल २८-०८-२५ गुरुवार 🌺🌺

🙏 ऋषि पंचमी 🙏
🌼 रक्षापंचमी 🌼
🪻 संवत्सरी - पंचमी पक्ष ( जैन ) 🪻

🙏 🌹 *जय श्री कृष्ण* 🌹🙏
❤1
#स्यमंतक_मणि_की_कथा (गणेश चतुर्थी पर चन्द्र-दर्शन करने पर अभिशापित हुए मनुष्य को दोष-मुक्त करने वाली कथा )
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
श्रीमद्भागवत पुराण के दसवें स्कंध के अध्याय ५६ और ५७ में श्री शुकदेव जी महाराज कहते हैं,'' परीक्षित ! सत्राजित ने श्री कृष्ण पर मणि चोरी का झूठा कलंक लगाया था और फिर अपने उस अपराध का मार्जन करने के लिए उसने स्वयं स्यमंतक मणि सहित अपनी कन्या सत्यभामा भगवान श्री कृष्ण को सौंप दी। ''

राजा परीक्षित ने पूछा," भगवन् ! सत्राजित ने भगवान श्री कृष्ण का क्या अपराध किया था ? उसे स्यमंतक मणि कहाँ से मिली ? और उसने अपनी कन्या श्री कृष्ण को क्यों सौंप दी ? ''

श्री शुकदेव जी कहते है- परीक्षित ! सत्राजित ने श्रीकृष्ण को झूठा कलंक लगाया था। फिर उस अपराध का मार्जन करने के लिए उसने स्वयं स्यमन्तक मणि सहित अपनी कन्या सत्याभामा भगवान श्रीकृष्ण को सौंप दी।
राजा परीक्षित ने पूछाः भगवन् ! सत्राजित ने भगवान श्रीकृष्ण का क्या अपराध किया था ? उसे स्यमंतक मणि कहाँ से मिली ? और उसने अपनी कन्या उन्हें क्यों दी ?

श्रीशुकदेव जी ने कहाः परीक्षित! सत्राजित भगवान सूर्य का बहुत बड़ा भक्त था। वे उसकी भक्ती से प्रसन्न होकर उसके बहुत बड़े मित्र बन गये थे। सूर्य भगवान ने ही प्रसन्न होकर बड़े प्रेम से उसे स्यमंतक मणि दी थी। सत्राजित उस मणि को गले में धारण कर ऐसा चमकने लगा, मानो स्वयं सूर्य ही हो। परीक्षित !जब सत्राजित द्वारका आया, तब अत्यन्त तेजस्विता के कारण लोग उसे पहचान न सके। दूर से ही उसे देखकर लोगों की आँखें उसके तेज से चौंधिया गईं। लोगों ने समझा कि कदाचित स्वयं भगवान सूर्य आ रहे हैं। उन लोगों ने भगवान के पास आकर उन्हें इस बात की सूचना दी। उस समय भगवान चौसर खेल रहे थे।

लोगों ने कहाः 'शंख-चक्र-गदाधारी नारायण! कमलनयन दामोदर! यदुवंशशिरोमणि गोविन्द! आपको नमस्कार है। जगदीश्वर देखिये, अपनी चमकीली किरणों से लोगों के नेत्रों को चौंधियाते हुए प्रचण्डरश्मि भगवान सूर्य आपका दर्शन करने आ रहे हैं। प्रभो ! सभी श्रेष्ठ देवता त्रिलोकी में आपकी प्राप्ति का मार्ग ढूँढते रहते हैं, किन्तु उसे पाते नहीं। आज आपको यदुवंश में छिपा हुआ जानकर स्वयं सूर्यनारायण आपका दर्शन करने आ रहे हैं।

श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! अनजान पुरूषों की यह बात सुनकर कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण हँसने लगे। उन्होंने कहा- 'अरे, ये सूर्यदेव नहीं है। यह तो सत्राजित है, जो मणि के कारण इतना चमक रहा है। इसके बाद सत्राजित अपने समृद्ध घर में चला आया। घर पर उसके शुभागमन के उपलक्ष्य में मंगल-उत्सव मनाया जा रहा था। उसने ब्राह्मणों द्वारा स्यमंतक मणि को एक देवमन्दिर में स्थापित करा दिया। परीक्षित ! वह मणि प्रतिदिन आठ भार सोना दिया करती थी। और जहाँ वह पूजित होकर रहती थी, वहाँ दुर्भिक्ष, महामारी, ग्रहपीड़ा, सर्पभय, मानसिक और शारीरिक व्यथा तथा मायावियों का उपद्रव आदि कोई भी अशुभ नहीं होता था। एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसंगवश कहा-'सत्राजित ! तुम अपनी मणि राजा उग्रसेन को दे दो।'परन्तु वह इतना अर्थलोलुप-लोभी था कि भगवान की आज्ञा का उल्लंघन होगा, इसका कुछ भी विचार न करके उसे अस्वीकार कर दिया।
एक दिन सत्राजित के भाई प्रसेन ने उस परम प्रकाशमयी मणि को अपने गले में धारण कर लिया और फिर वह घोड़े पर सवार होकर शिकार खेलने वन में चला गया। वहाँ एक सिंह ने घोड़े सहित प्रसेन को मार डाला और उस मणि को छीन लिया। वह अभी पर्वत की गुफा में प्रवेश कर ही रहा था कि मणि के लिए ऋक्षराज जाम्बवान् ने उसे मार डाला। उन्होंने वह मणि अपनी गुफा में ले जाकर बच्चे को खेलने के लिए दे दी। अपने भाई प्रसेन के न लौटने से उसके भाई सत्राजित को बड़ा दुःख हुआ। वह कहने लगा, 'बहुत सम्भव है श्रीकृष्ण ने ही मेरे भाई को मार डाला हो, क्योंकि वह मणि गले में डालकर वन में गया था।' सत्राजित की यह बात सुनकर लोग आपस में काना-फूँसी करने लगे। जब भगवान श्रीकृष्ण ने सुना कि यह कलंक का टीका मेरे सिर लगाया गया है, तब वे उसे धो-बहाने के उद्देश्य से नगर के कुछ सभ्य पुरूषों को साथ लेकर प्रसेन को ढूँढने के लिए वन में गये। वहाँ खोजते-खोजते लोगों ने देखा कि घोर जंगल में सिंह ने प्रसेन और उसके घोड़े को मार डाला है। जब वे लोग सिंह के पैरों का चिन्ह देखते हुए आगे बढ़े, तब उन लोगों ने यह भी देखा कि पर्वत पर रीछ ने सिंह को भी मार डाला है।
भगवान श्रीकृष्ण ने सब लोगों को बाहर ही बिठा दिया और अकेले ही घोर अन्धकार से भरी हुई ऋक्षराज की भयंकर गुफा में प्रवेश किया। भगवान ने वहाँ जाकर देखा कि श्रेष्ठ मणि स्यमन्तक को बच्चों का खिलौना बना दिया गया है। वे उसे हर लेने की इच्छा से बच्चे के पास जा खड़े हुए। उस गुफा में एक अपरिचित मनुष्य को देखकर बच्चे की धाय भयभीत की भाँति चिल्ला उठी। उसकी चिल्लाहट सुनकर परम बली ऋक्षराज जाम्बवान क्रोधित होकर वहाँ दौड़
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आये। परीक्षित !जाम्बवान उस समय कुपित हो रहे थे। उन्हें भगवान की महिमा, उनके प्रभाव का पता न चला। उन्होंने एक साधारण मनुष्य समझ लिया और वे अपने स्वामी भगवान श्रीकृष्ण से युद्ध करने लगे। जिस प्रकार मांस के लिये दो बाज आपस में लड़ते हैं, वैसे ही विजयाभिलाषी भगवान श्रीकृष्ण और जाम्बवान आपस में घमासान युद्ध करने लगे। पहले तो उन्होंने अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार किया, फिर शिलाओं का तत्पश्चात वे वृक्ष उखाड़कर एक दूसरे पर फेंकने लगे। अन्त में उनमें बाहुयुद्ध होने लगा। परीक्षित ! वज्र-प्रहार के समान कठोर घूँसों की चोट से जाम्बवान के शरीर की एक एक गाँठ टूट गयी। उत्साह जाता रहा। शरीर पसीने से लथपथ हो गया। तब उन्होंने अत्यंत विस्मित-चकित होकर भगवान श्रीकृष्ण से कहा- 'प्रभो ! मैं जान गया। आप ही समस्त प्राणियों के स्वामी, रक्षक, पुराणपुरूष भगवान विष्णु हैं। आप ही सबके प्राण, इन्द्रियबल, मनोबल और शरीर बल हैं। आप विश्व के रचयिता ब्रह्मा आदि को भी बनाने वाले हैं। बनाये हुए पदार्थों में भी सत्तारूप से आप ही विराजमान हैं। काल के कितने भी अवयव है, उनके नियामक परम काल आप ही हैं और शरीर भेद से भिन्न-भिन्न प्रतीयमान अन्तरात्माओं के परम आत्मा भी आप ही हैं। प्रभो ! मुझे स्मरण है, आपने अपने नेत्रों में तनिक सा क्रोध का भाव लेकर तिरछी दृष्टि से समुद्र की ओर देखा था। उस समय समुद्र के अंदर रहने वाल बड़े-बड़े नाक (घड़ियाल) और मगरमच्छ क्षुब्ध हो गये थे और समुद्र ने आपको मार्ग दे दिया था। तब आपने उस पर सेतु बाँधकर सुन्दर यश की स्थापना की तथा लंका का विध्वंस किया। आपके बाणों से कट-कटकर राक्षसों के सिर पृथ्वी पर लोट रहे थे। (अवश्य ही आप मेरे वे ही राम जी श्रीकृष्ण के रूप में आये हैं।) परीक्षित ! जब ऋक्षराज जाम्बवान ने भगवान को पहचान लिया, तब कमलनयन श्रीकृष्ण ने अपने परम कल्याणकारी शीतल करकमल को उनके शरीर पर फेर दिया और फिर अहैतुकी कृपा से भरकर प्रेम गम्भीर वाणी से अपने भक्त जाम्बवान जी से कहा- ऋक्षराज ! हम मणि के लिए ही तुम्हारी इस गुफा में आये हैं। इस मणि के द्वारा मैं अपने पर लगे झूठे कलंक को मिटाना चाहता हूँ। भगवान के ऐसा कहने पर जाम्बवान बड़े आनन्द से उनकी पूजा करने के लिए अपनी कन्या कुमारी जाम्बवती को मणि के साथ उनके चरणों में समर्पित कर दिया।

भगवान श्रीकृष्ण जिन लोगों को गुफा के बाहर छोड़ गये थे, उन्होंने बारह दिन तक उनकी प्रतीक्षा की। परन्तु जब उन्होंने देखा कि अब तक वे गुफा से नहीं निकले, तब वे अत्यंत दुःखी होकर द्वारका लौट गये। वहाँ जब माता देवकी, रूक्मणि, वसुदेव जी तथा अन्य सम्बन्धियों और कुटुम्बियों को यह मालूम हुआ कि श्रीकृष्ण गुफा से नहीं निकले, तब उन्हें बड़ा शोक हुआ। सभी द्वारकावासी अत्यंत दुःखित होकर सत्राजित को भला बुरा कहने लगे और भगवान श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए महामाया दुगदिवी की शरण गये, उनकी उपासना करने लगे। उनकी उपासना से दुगदिवी प्रसन्न हुई और उन्होंने आशीर्वाद दिया। उसी समय उनके बीच में मणि और अपनी नववधू जाम्बवती के साथ सफलमनोरथ होकर श्रीकृष्ण होकर श्रीकृष्ण सबको प्रसन्न करते हुए प्रकट हो गये। सभी द्वारकावासी भगवान श्रीकृष्ण को पत्नी के साथ और गले में मणि धारण किये हुए देखकर परमानन्द में मग्न हो गये, मानो कोई मरकर लौट आया हो।
तदनन्तर भगवान ने सत्राजित को राजसभा में महाराज उग्रसेन के पास बुलवाया और जिस प्रकार मणि प्राप्त हुई थी, वह सब कथा सुनाकर उन्होंने वह मणि सत्राजित को सौंप दी। सत्राजित अत्यंत लज्जित हो गया। मणि तो उसने ले ली, परन्तु उसका मुँह नीचे की ओर लटक गया। अपने अपराध पर उसे बड़ा पश्चाताप हो रहा था, किसी प्रकार वह अपने घर पहुँचा। उसके मन की आँखों के सामने निरन्तर अपना अपराध नाचता रहता। बलवान के साथ विरोध करने के कारण वह भयभीत भी हो गया था। अब वह यही सोचता रहता कि 'मैं अपने अपराध का मार्जन कैसे करूँ ? मुझ पर भगवान श्रीकृष्ण कैसे प्रसन्न हों ? मैं ऐसा कौन सा काम करूँ, जिससे मेरा कल्याण हो और लोग मुझे कोसे नहीं। सचमुच मैं अदूरदर्शी, क्षुद्र हूँ। धन के लोभ से मैं बड़ी मूढ़ता का काम कर बैठा। अब मैं रमणियों में रत्न के समान अपनी कन्या सत्याभामा और वह स्यमंतक मणि दोनों ही श्रीकृष्ण को दे दूँ। यह उपाय बहुत अच्छा है। इसी से मेरे अपराध का मार्जन हो सकता है, और कोई उपाय नहीं है। सत्राजित ने अपनी विवेक बुद्धि से ऐसा निश्चय करके स्वयं ही इसके लिए उद्योग किया और अपनी कन्या तथा स्यमन्तक मणि दोनों ही ले जाकर श्रीकृष्ण को अर्पण कर दीं। सत्यभामा शील स्वभाव, सुन्दरता, उदारता आदि सदगुणों से सम्पन्न थी। बहुत से लोग चाहते थे कि सत्यभामा हमें मिले और उन लोगों ने उन्हें माँगा भी था। परन्तु अब भगवान श्रीकृष्ण ने विधिपूर्वक उनका पाणिग्रहण किया। परीक्षित !भगवान श्रीकृष्ण ने सत्राजित से कहा- 'हम स्यमन्तक मणि न लेंगे। आप सूर्य भगवान के भक्त हैं,
इसलिए वह आपके ही पास रहे। हम तो केवल उसके फल के अर्थात उससे निकले हुए सोने के अधिकारी हैं। वही आप हमें दे दिया करें।

परीक्षित ! यद्यपि भगवान श्रीकृष्ण को इस बात का पता था कि लाक्षागृह की आग से पाण्डवों का बाल भी बाँका न हुआ है, तथापि जब उन्होंने सुना कि कुन्ती और पाण्डव जल मरे, तब उस समय का कुल परम्परोचित व्यवहार करने के लिए वे बलराम जी के साथ हस्तिनापुर गये। वहाँ जाकर भीष्मपितामह, कृपाचार्य, विदुर, गान्धारी और द्रोणाचार्य से मिलकर उनके साथ समवेदना-सहानुभूति प्रकट की और उन लोगों से कहने लगे- 'हाय-हाय ! यह तो बड़े दुःख की बात हुई।'

भगवान श्रीकृष्ण के हस्तिनापुर चले जाने से द्वारका में अक्रूर और कृतवर्मा को अवसर मिल गया। उन लोगों ने शतधन्वा से आकर कहा – ‘तुम सत्राजित से मणि क्यों नहीं छीन लेते ? सत्राजित ने अपनी श्रेष्ठ कन्या का विवाह हमसे करने का वचन दिया था और अब उसने हमलोगों का तिरस्कार करके उसे श्रीकृष्ण के साथ ब्याह दिया है। अब सत्राजित भी अपने भाई प्रसेन की तरह क्यों न यमपुरी में जाय ?' शतधन्वा पापी था और अब तो उसकी मृत्यु भी उसके सिर पर नाच रही थी। अक्रूर और कृतवर्मा इस प्रकार बहकाने पर शतधन्वा उनकी बातों में आ गया और उस महादुष्ट ने लोभवश सोये हुए सत्राजित को मार डाला। इस समय स्त्रियाँ अनाथ के समान रोने चिल्लाने लगीं, परन्तु शतधन्वा ने उनकी ओर तनिक भी ध्यान न दिया, जैसे कसाई पशुओं की हत्या कर डालता है, वैसे ही वह सत्राजित को मारकर और मणि लेकर वहाँ से चम्पत हो गया।
सत्यभामा जी को यह देखकर कि मेरे पिता मार डाले गये हैं, बड़ा शोक हुआ और वे हाय पिता जी ! हाय पिता जी ! मैं मारी गयी – इस प्रकार पुकार पुकार कर विलाप करने लगीं। बीच बीच में बेहोश हो जातीं और होश में आने पर फिर विलाप करने लगतीं। इसके बाद उन्होंने अपने पिता के शव को तेल के कड़ाहे में रखवा दिया और आप हस्तिनापुर गयीं। उन्होंने बड़े दुःख से भगवान श्रीकृष्ण को अपने पिता की हत्या का वृत्तान्त सुनाया – यद्यपि इन बातों को भगवान श्रीकृष्ण पहले से ही जानते थे। परीक्षित ! सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी ने सब सुनकर मनुष्यों की सी लीला करते हुए अपनी आँखों में आँसू भर लिये और विलाप करने लगे कि 'अहो ! हम लोगों पर तो बहुत बड़ी विपत्ती आ पड़ी !' इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण सत्यभामाजी और बलरामजी के साथ हस्तिनापुर से द्वारका लौट आये और शतधन्वा मारने तथा उससे मणि छीनने का उद्योग करने लगे।

जब शतधन्वा को यह मालूम हुआ कि भगवान श्रीकृष्ण मुझे मारने का उद्योग कर रहे हैं, तब वह बहुत डर गया और अपने प्राण बचाने के लिए उसने कृतवर्मा से सहायता माँगी। तब कृतवर्मा ने कहा - 'भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं। मैं उनका सामना नहीं कर सकता। भला, ऐसा कौन है, जो उनके साथ वैर बाँधकर इस लोक और परलोक में सकुशल रह सके ? तुम जानते हो कि कंस उन्हीं से द्वेष करने के कारण राज्यलक्ष्मी को खो बैठा और अपने अनुयायियों के साथ मारा गया। जरासन्ध जैसे शूरवीर को भी उनके सामने सत्रह बार मैदान में हारकर बिना रथ के ही अपनी राजधानी लौट जाना पड़ा था।' जब कृतवर्मा ने उसे इस प्रकार टका सा जवाब दे दिया, तब शतधन्वा ने सहायता के लिए अक्रूर जी से प्रार्थना की। उन्होंने कहा - 'भाई ! ऐसा कौन है, जो सर्वशक्तिमान भगवान का बल पौरूष जानकर भी उनसे वैर विरोध ठाने। जो भगवान खेल-खेल में ही इस विश्व की रचना, रक्षा और संहार करते हैं तथा जो कब क्या करना चाहते है – इस बात को माया से मोहित ब्रह्मा आदि विश्व विधाता भी नहीं समझ पाते, जिन्होंने सात वर्ष की अवस्था में – जब वे निरे बालक थे, एक हाथ से ही गिरिराज गोवर्द्धन को उखाड़ लिया और जैसे नन्हें-नन्हें बच्चे बरसाती छत्ते को उखाड़ हाथ में रख लेते हैं, वैसे ही खेल-खेल में सात दिनों तक उसे उठाय रखा, मैं तो उन भगवान श्रीकृष्ण को नमस्कार करता हूँ। उनके कर्म अदभुत हैं। वे अनन्त अनादि, एकरस और आत्मस्वरूप हैं। मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ। जब इस प्रकार अक्रूर जी ने भी उसे कोरा जवाब दे दिया, तब शतधन्वा ने स्यमन्तक मणि उन्हीं के पास रख दी और आप चार सौ कोस लगातार चलने वाले घोड़े पर सवार होकर वहाँ से बड़ी फुर्ती से भागा।

परीक्षित! भगवान श्रीकृष्ण और बलराम दोनों भाई अपने उस रथ पर सवार हुए, जिस पर गरूड़चिन्ह से चिन्हित ध्वजा फहरा रही थी और बड़े वेगवाले घोड़े जुते हुए थे। अब उन्होंने अपने श्वसुर सत्राजित को मारने वाले शतधन्वा का पीछा किया। मिथिलापुरी के निकट एक उपवन में शतधन्वा का घोड़ा गिर पड़ा, अब वह उसे छोड़कर पैदल ही भागा। वह अत्यन्त भयभीत हो गया था। भगवान श्रीकृष्ण भी क्रोध करके उसके पीछे दौड़े। शतधन्वा पैदल ही भाग रहा था, इसलिए भगवान ने पैदल ही दौड़कर अपने तीक्ष्ण धार वाले चक्र से उसका सिर उतार लिया और उसके वस्त्रों में स्यमंतक मणि को ढूँढा। परन्तु जब मणि नहीं मिली तब
भगवान श्रीकृष्ण ने बड़े भाई बलराम जी के पास आकर कहा - 'हमने शतधन्वा को व्यर्थ ही मारा। क्योंकि उसके पास स्यमंतक मणि तो है ही नहीं। बलराम जी ने कहा - 'इसमे सन्देह नहीं कि शतधन्वा ने स्यमंतक मणि को किसी न किसी के पास रख दिया है। अब तुम द्वारका जाओ और उसका पता लगाओ। मैं विदेहराज से मिलना चाहता हूँ, क्योंकि वे मेरे बहुत ही प्रिय मित्र हैं।'परीक्षित ! यह कहकर यदुवंश शिरोमणि बलराम जी मिथिला नगरी में चले गये। जब मिथिला नरेश ने देखा कि पूजनीय बलरामजी महाराज पधारे हैं, तब उनका हृदय आनन्द से भर गया। उन्होंने झटपट अपने आसन से उठकर अनेक सामग्रियों से उनकी पूजा की। इसके बाद भगवान बलराम जी कई वर्षों तक मिथिला पुरी में ही रहे। महात्मा जनक ने बड़े प्रेम और सम्मान से उन्हें रखा। इसके बाद समय पर धृतराष्ट के पुत्र दुर्योधन ने बलराम जी से गदायुद्ध की शिक्षा ग्रहण की। अपनी प्रिय सत्यभामा का प्रिय कार्य करके भगवानश्रीकृष्ण द्वारका लौट आये और उनको यह समाचार सुना दिया कि शतधन्वा को मार डाला गया, परन्तु स्यमंतकमणि उसके पास न मिली। इसके बाद उन्होंने भाई बन्धुओं के साथ अपने श्वसुर सत्राजित की वे सब और्ध्वदेहिक क्रियाएँ करवायीं, जिनसे मृतक प्राणी का परलोक सुधरता है।
अक्रूर और कृतवर्मा ने शतधन्वा को सत्राजित के वध के लिए उत्तेजित किया था। इसलिए जब उन्होंने सुना कि भगवान श्रीकृष्ण ने शतधन्वा को मार डाला है, तब वे अत्यंत भयभीत होकर द्वारका से भाग खड़े हुए।

परिक्षित! कुछ लोग ऐसा मानते है कि अक्रूर के द्वारका से चले जाने पर द्वारकावासियों को बहुत प्रकार के अनिष्टों और अरिष्टों का सामना करना पड़ा। परन्तु जो लोग ऐसा कहते हैं, वे पहले कही हुई बातों को भूल जाते हैं। भला, यह भी कभी सम्भव है कि जिन भगवान श्रीकृष्ण में समस्त ऋषि-मुनि निवास करते हैं, उनके निवासस्थान द्वारका में उनके रहते कोई उपद्रव खड़ा हो जाय। उस समय नगर के बड़े-बूढ़े लोगों ने कहा - 'एक बार काशी नरेश के राज्य में वर्षा नहीं हो रही थी, सूखा पड़ गया था। तब उन्होंने अपने राज्य में आये हुए अक्रूर के पिता श्वफल्क को अपनी पुत्री गान्दिनी ब्याह दी। तब उस प्रदेश में वर्षा हुई। अक्रूर भी श्वफल्क के ही पुत्र हैं और इनका प्रभाव भी वैसा ही है। इसलिए जहाँ-जहाँ अक्रूर रहते हैं, वहाँ-वहाँ खूब वर्षा होती है तथा किसी प्रकार का कष्ट और महामारी आदि उपद्रव नहीं होते।

परीक्षित! उन लोगों की बात सुनकर भगवान ने सोचा कि 'इस उपद्रव का यही कारण नहीं है' यह जानकर भी भगवान ने दूत भेजकर अक्रूर को ढुँढवाया और आने पर उनसे बातचीत की। भगवान ने उनका खूब स्वागत सत्कार किया और मीठी-मीठी प्रेम की बातें कहकर उनसे सम्भाषण किया। परीक्षित ! भगवान सबके चित्त का एक-एक संकल्प देखते रहते हैं। इसलिए उन्होंने मुस्कराते हुए अक्रूर से कहा - 'चाचा जी ! आप दान धर्म के पालक हैं। हमें यह बात पहले से ही मालूम है कि शतधन्वा आपके पास वह स्यमन्तक मणि छोड़ गया है, जो बड़ी ही प्रकाशमान और धन देने वाली है। आप जानते ही हैं कि सत्राजित के कोई पुत्र नहीं है। इसलिए उनकी लड़की के लड़के – उनके नाती ही उन्हें तिलाँजली और पिण्डदान करेंगे, उनका ऋण चुकायेंगे और जो कुछ बच रहेगा उसके उत्तराधिकारी होंगे। इस प्रकार शास्त्रीय दृष्टि से यद्यपि स्यमन्तक मणि हमारे पुत्रों को ही मिलनी चाहिए, तथापि वह मणि आपके ही पास रहे। क्योंकि आप बड़े व्रतनिष्ठ और पवित्रात्मा हैं तथा दूसरों के लिए उस मणि को रखना अत्यन्त कठिन भी है। परन्तु हमारे सामने एक बहुत बड़ी कठिनाई यह आ गयी है कि हमारे बड़े भाई बलराम जी मणि के सम्बन्ध में मेरी बात का पूरा विश्वास नहीं करते। इसलिए महाभाग्यवान अक्रूर जी ! आप वह मणि दिखाकर हमारे इष्टमित्र – बलराम जी, सत्यभामा और जाम्बती का सन्देह दूर कर दीजिए और उनके हृदय में शान्ति का संचार कीजिए। हमें पता है कि उसी मणि के प्रताप से आजकल आप लगातार ही ऐसे यज्ञ करते रहते हैं, जिसमें सोने की वेदियाँ बनती हैं। परीक्षित ! जब भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार सान्तवना देकर उन्हें समझाया-बुझाया, तब अक्रूर जी ने वस्त्र में लपेटी हुई सूर्य के समान प्रकाशमान वह मणि निकाली और भगवान श्रीकृष्ण को दे दी। भगवान श्रीकृष्ण ने वह स्यमंतक मणि अपने जाति-भाईयों को दिखाकर अपना कलंक दूर कर दिया और उसे अपने पास रखने में समर्थ होने पर भी पुनः अक्रूर जी को लौटा दिया।

स्कंद पुराण में भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं कहा है कि भादव के शुक्ल पक्ष के चन्द्र दर्शन मैंने गोखुर के जल में किए, जिसके फलस्वरूप मुझ पर मणि की चोरी का झूठा कलंक लगा।

" मया भाद्रपदे शुक्लचतुर्थ्यां चंद्रदर्शनं गोष्पदाम्बुनि वै राजन् कृतं दिवमपश्यता "

देवर्षि नारदजी ने भी श्री कृष्ण को भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को चन्द्र दर्शन करने के फलस्वरूप व्यर्थ कलंक लगने की बात कही है-
" त्वया भाद्रपदे शुक्लचतुर्थ्यां चन्द्रदर्शनम् ।
कृतं येनेह भगवन् वृथाशापमवाप्तवानम् ।। "

इसके अतिरिक्त श्री रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी इस तिथि को चन्द्रमा के दर्शन ना किए जाने के संकेत दिए हैं-

" सो परनारि लिलार गोसाईं । तजउ चौथि कै चंद की नाईं ।। "
सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापक भगवान श्रीकृष्ण के पराक्रम से परिपूर्ण यह आख्यान समस्त पापों, अपराधों और कलंकों का मार्जन करने वाला तथा परम मंगलमय है। जो इसे पढ़ता, सुनता अथवा स्मरण करता है, वह हर प्रकार की अपकीर्ति और पापों से छूटकर शान्ति का अनुभव करता है।
❗जय महादेव❗
⭕प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️



गिरिजापति एस्ट्रो पोइंट
ज्योतिष आचार्या मीत महाकाल महादेव
7575091399
. ऋषि पंचमी”

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का प्रारम्भ बुधवार 27 अगस्त 2025 को सायं 03:44 पर हो रहा है, जो अगले दिन गुरुवार 28 अगस्त 2025 को सायं 05:56 तक रहेगी।
धार्मिक मान्यतानुसार, ऋषि पंचमी का अवसर मुख्य रूप से सप्तर्षि के रूप में प्रसिद्ध सात महान ऋषियों को समर्पित है। ऋषि पंचमी के दिन पूरे विधि-विधान के साथ ऋषियों के पूजन के बाद कथापाठ और व्रत रखा जाता है।
ऋषि पंचमी का पवित्र दिन महान भारतीय ऋषियों की स्मृति में मनाया जाता है। सप्तर्षि से जुड़े हुए सात ऋषियों के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने पृथ्वी से बुराई को खत्म करने के लिए स्वयं के जीवन का त्याग किया और मानव जाति के सुधार के लिए काम किया। हिंदू मान्यताओं और शास्त्रों में, यह उल्लेख किया गया है कि ये संत अपने भक्तों को अपने ज्ञान और बुद्धि से शिक्षित करते हैं ताकि हर कोई दान, मानवता और ज्ञान के मार्ग का पालन कर सके।

ऋषि पंचमी का महत्व और पूजाविधि

मान्यता है कि इस दिन व्रत रखना काफी ज्यादा फलदायी होता है इस व्रत को भक्ति और श्रद्धा के साथ किया जाता है। इस दिन ऋषियों का पूर्ण विधि-विधान से पूजन के बाद कथा सुनने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि यह व्रत लोगों के पापों का नाश करता है और अच्छे फल देता है। यह व्रत और ऋषियों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता, समर्पण और सम्मान की भावना को दर्शाता है।
ऋषि पंचमी के दिन महिलाएं सरोवर या नदी विशेषकर गंगा में स्नान करती हैं। ऐसी मान्यता है कि रजस्वला के समय होने वाली तकलीफ तथा अन्य दोष के निवारण के लिए महिलाएं ऋषि पंचमी का व्रत करती हैं और स्नान करती हैं। आज के दिन महिलाएं सप्तऋषियों की पूजा करती हैं और दोष निवारण के लिए कामना करती हैं।
पहले यह व्रत सभी वर्णों के पुरुषों के लिए बताया गया था लेकिन समय के साथ-साथ अब यह व्रत अधिकतर महिलाएँ करती है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व बताया गया है।
ऋषि पंचमी की पूजा में महिलाएं सप्त ऋषियों की मूर्ति बनाती हैं और उसकी पूजा करती हैं। इसमें प्रथम पूज्य श्री गणेश जी की पूजा भी की जाती है। उसके बाद ऋषि पंचमी की कथा सुनती हैं। ऋषि पंचमी के व्रत में महिलाएं फलाहार करती हैं और अन्य व्रत के नियमों का पालन करती हैं। दिन के अंत में ब्राह्मणों को भोजन कराती हैं और स्वयं पारण कर व्रत को पूर्ण करती हैं। ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पढ़ने के लिये हमारा फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को लाईक एवं फॉलो करें। अब आप हमारी पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी देख सकते हैं। चैनल लिंक हमारी फेसबुक पोस्टों में देखें। इस व्रत में दिन में एक बार भोजन करना चाहिए।
ऋषि पंचमी की पूजा के लिए सप्तऋषियों की प्रतिमाओं की स्थापना कर उन्हें पंचामृत स्नान दें, जिसके बाद उनपर चंदन का लेप लगाएँ और फूलों एवं सुगंधित पदार्थों, दीप, धूप आदि अर्पण करें इसके साथ ही श्वेत वस्त्रों, यज्ञोपवीतों और नैवेद्य से पूजा और मंत्र का जाप करें।

ऋषि पंचमी व्रत की कथा

काफी समय पहले विदर्भ नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहते थे, उनके परिवार में एक पुत्र व पुत्री थी। ब्राह्मण पुत्री का विवाह अच्छे ब्राह्मण कुल में कर देता है लेकिन काल के प्रभाव स्वरूप कन्या का पति अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है। जिसके बाद विधवा अपने घर लौट जाती है।
एक दिन आधी रात में विधवा के शरीर में कीड़े पैदा होने लगते हैं। ऐसी हालत देखकर उसके पिता एक ऋषि के पास ले जाते हैं। ऋषि कहते हैं कि कन्या पूर्व जन्म में ब्राह्मणी थी और इसनें एक बार रजस्वला होने पर भी घर के बर्तन छू लिए और काम करने लगी। बस इसी पाप की वजह से इसके शरीर में कीड़े पड़ गए।
दरअसल, शास्त्रों में रजस्वला स्त्री का कार्य निषेध बताया गया है लेकिन इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया और इसका दण्ड भोगना पड़ रहा है। तब ऋषि कहते हैं कि अगर वह कन्या ऋषि पंचमी का व्रत करें और पूरे श्रद्धा भाव के साथ पूजा और क्षमा प्रार्थना करे और उसे अपने पापों से मुक्ति मिल जाएगी।
इस प्रकार कन्या द्वारा ऋषि पंचमी का व्रत करने से उसे पापों से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।
० ० ०

॥जय जय श्री राधे॥

**शुभ प्रभात नमस्कार *
*🌞 🚩 । l ॐ l । 🚩 🌞*
🕉 ।। *श्री गणेशाय नमः* ।। 🕉
 *सुप्रभातम् स्नेह वंदनम्* 
🌐 *आज का पंचांग* 🌐
⛳ *तिथि*……( ०५ ) पंचमी ⛳️
💐 श्रीगणेशोत्सव 💐
🙏 ऋषि पंचमी 🙏
🍀 गुरु पंचमी 🍀
🌺 रक्षा पंचमी ( बंगाल ) 🌺
🌸 मेलापाट ( कश्मीर ) 🌸
🌼 संवत्सरी - पंचमी पक्ष ( जैन ) 🌼
2️⃣8️⃣-0️⃣8️⃣-2⃣0⃣2️⃣5️⃣
🔔 *वार*……..गुरुवार 🔔
🦚 *नक्षत्र*…..चित्रा 🦚
🪔 *योग*…….शुक्ल 🪔
✳️ *करण*…..बव ✳️
🌅 *सूर्योदय* :-०६ः२२ 🌅
🌌 *सूर्यास्त* :-०७ः०० 🌌
🌓 *पक्ष*....………शुक्ल 🌓
🌝 *चन्द्र राशि*…. तुला 🌝
⏺️ *ऋतु*.......…..शरद ⏺️
🍀 *अयन*………दक्षिण🍀
🪷 *मास*.……….भाद्रपद 🪷
🌻*कलियुगाब्द*….५१२५🌻
🌎 *विक्रम संवत्*.....२०८१🌎
⭐️ *शक संवत्*...... १९४७ ⭐️
🪻अभिजीत ….मध्याह्न १२ः१८ से ०१ः०४ तक 🪻
🌚 राहुकाल ….दोपहर ०२ः१७ से ०३ः५२ 🌚

💐*।। आपका दिन मंगलमय हो ।।* 💐

🌺🌺 कल २९-०८-२५ शुक्रवार 🌺🌺

🌞 सूर्य षष्ठी 🌞

🙏 🌹 *जय श्री कृष्ण* 🌹🙏
*विवरण:*
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