बदलते भारत की छवी
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भारत में जो वर्तमान समय कि स्थिति प्रस्थिति हैं उसने बाहर निकलना है

काले अंग्रेजों से मातृ भूमि के मुक्त और गौ हत्या का विरोध करना है
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नवरात्र उत्सव निमित सर्व नागरिकांना हार्दिक शुभेच्छा।
🎉2🫡1
2️⃣2️⃣‼️0️⃣9️⃣‼️2️⃣0️⃣2️⃣5️⃣

*🌻♦️नवदुर्गा (नवरात्रि) में माँ दुर्गा के प्रथम स्वरूप श्री शैलपुत्री जी की उपासना विधि♦️🌻*

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्द्वकृत शेखराम।
वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम॥

श्री दुर्गा का प्रथम रूप श्री शैलपुत्री हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण ये शैलपुत्री कहलाती हैं। नवरात्र के प्रथम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। गिरिराज हिमालय की पुत्री होने के कारण भगवती का प्रथम स्वरूप शैलपुत्री का है, जिनकी आराधना से प्राणी सभी मनोवांछित फल प्राप्त कर लेता है।
माँ शैलपुत्री दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल का पुष्प लिए अपने वाहन वृषभ पर विराजमान होतीं हैं. नवरात्र के इस प्रथम दिन की उपासना में साधक अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं, शैलपुत्री का पूजन करने से ‘मूलाधार चक्र’ जागृत होता है और यहीं से योग साधना आरंभ होती है जिससे अनेक प्रकार की शक्तियां प्राप्त होती हैं।

मां दुर्गा शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक सनातन काल से मनाया जाता रहा है. आदि-शक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में पूजा की जाती है. अत: इसे नवरात्र के नाम भी जाना जाता है. सभीदेवता, राक्षस, मनुष्य इनकी कृपा-दृष्टि के लिए लालायित रहते हैं. यह हिन्दू समाज का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है जिसका धार्मिक, आध्यात्मिक, नैतिकव सांसारिक इन चारों ही दृष्टिकोण से काफी महत्व है.दुर्गा पूजा का त्यौहार वर्ष में दो बार आता है, एक चैत्र मास में और दूसरा आश्विन मास में चैत्र माह में देवी दुर्गा की पूजा बड़े ही धूम धाम से की जाती है लेकिन आश्विन मास का विशेष महत्व है. दुर्गा सप्तशती में भी आश्विन माह के शारदीयनवरात्रों की महिमा का विशेष बखान किया गया है. दोनों मासों में दुर्गा पूजा का विधान एक जैसा ही है, दोनों ही प्रतिपदा से दशमी तिथि तक मनायी जाती है।

*♦️माता शैलपुत्री की कथा♦️*
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एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा।

अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा- प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है। कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।'

शंकरजी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी।

सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे।

परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है।
वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध होअपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया।

सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे 'शैलपुत्री' नाम से विख्यात हुर्ईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था।

*♦️कलश स्थापना: विधि♦️*
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नवरात्रा का प्रारम्भ आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापना के साथ होता है. कलश को हिन्दु विधानों में मंगलमूर्ति गणेश कास्वरूप माना जाता है अत: सबसे पहले कलश की स्थान की जाती है. कलश स्थापना के लिए भूमि को सिक्त यानी शुद्ध किया जाता है. भूमि की शुद्धि के लिए गाय के गोबर और गंगा-जल से भूमि को लिपा जाता है।
*🌻शैलपुत्री पूजा विधि:-🌻*
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शारदीय नवरात्र पर कलश स्थापना के साथ ही माँ दुर्गा की पूजा शुरू की जाती है. पहले दिन माँ दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा होती है. दुर्गा को मातृ शक्ति यानी स्नेह, करूणा और ममता का स्वरूप मानकर हम पूजते हैं। अत: इनकी पूजा में सभी तीर्थों, नदियों, समुद्रों, नवग्रहों,दिक्पालों, दिशाओं, नगर देवता, ग्राम देवता सहित सभी योगिनियों को भी आमंत्रित किया जाता और और कलश में उन्हें विराजने हेतु प्रार्थना सहित उनका आहवान किया जाता है। कलश में सप्तमृतिका यानी सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, मुद्रा सादर भेट किया जाता है और पंच प्रकार के पल्लव से कलश को सुशोभित किया जाता है.इस कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और जौ बोये जाते हैं जिन्हें दशमी तिथि को काटा जाता है और इससे सभी देवी-देवता की पूजा होती है. इसे जयन्ती कहते हैं जिसे इस मंत्र के साथ अर्पित किया जाता है “जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा, स्वधा नामोस्तुते”. इसी मंत्र से पुरोहित यजमान के परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर जयंती डालकर सुख, सम्पत्ति एवं आरोग्य का आर्शीवाद देते हैं।कलश स्थापना के पश्चात देवी का आह्वान किया जाता है कि ‘हे मां दुर्गा हमने आपका स्वरूप जैसा सुना है उसी रूप में आपकी प्रतिमा बनवायी है आप उसमें प्रवेश कर हमारी पूजा अर्चना को स्वीकार करें’. देवी दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल पर बीच में स्थापित की जाती है और उनके दोनों तरफ यानी दायीं ओर देवी महालक्ष्मी, गणेश और विजया नामक योगिनी की प्रतिमा रहती है और बायीं ओर कार्तिकेय, देवी महासरस्वती और जया नामक योगिनी रहती है तथा भगवान भोले नाथ की भी पूजा की जाती है. प्रथम पूजन के दिन “शैलपुत्री” के रूप में भगवती दुर्गा दुर्गतिनाशिनी की पूजा फूल, अक्षत, रोली, चंदन से होती हैं।

*🩸शैलपुत्री की ध्यान🩸*
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वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रर्धकृत शेखराम्।
वृशारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥

पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥

प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥

शैलपुत्री की स्तोत्र पाठ:
प्रथम दुर्गा त्वंहिभवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्यदायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥

त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥

चराचरेश्वरी त्वंहिमहामोह: विनाशिन।
मुक्तिभुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥
शैलपुत्री की कवच :
ओमकार: मेंशिर: पातुमूलाधार निवासिनी।
हींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥

श्रींकारपातुवदने लावाण्या महेश्वरी ।
हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।

फट्कार पात सर्वागे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥

*🌻भूमि-भवन वाहन की प्राप्ति हेतु नवरात्रि के प्रथम दिवस के उपाय🌻*
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संपूर्ण प्रयासों के बावजूद भी भूमि-भवन वाहन की प्राप्ति नहीं हो रही है तो नवरात्र के पहले दिन यानी मां शैलपुत्री के दिन रात्रि में 8 बजे के बाद चौकी पर लाल कपड़ा बिछा कर उस पर दुर्गा जी का यंत्र स्थापित करें। तत्पश्चात 1 लौंग, 1गोमती चक्र, एक साबुत सुपारी, एक लाल चंदन का टुकड़ा, 1 रक्त गुंजा, इन समस्त सामग्री को एक पानी से भरे लोटे में रखें। घी का दीपक जला लें। 3 माला ॥ ॐ ह्लीं फट्ï॥ की करें और एक माला ऐं ह्लीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे शैलपुत्री देव्यै नम: की जाप करें। प्रत्येक माला के बाद लोटे पर एक फूंक मारे। फिर उस लोटे के जल को पीपल वृक्ष की जड़ में चढ़ा दें, उन लौंग एवं सुपारी को भी वहीं मिट्टïी में दबा दें। लाल चंदन का टुकड़ा और रक्त गुंजा का अपने ऊपर से उसार करके बहते पानी में बहा दें। अनावश्यक कोर्ट-कचेहरी के मामलों से छुटकारा मिल जाएगा।

यदि अनावश्यक रूप से कोर्ट-कचहरी के मामलें परेशान कर रहे हो तो हर रोज 40 दिन तक 108 मोगरे के पुष्प ॐ ह्लीं श्रीं क्रीं शैलपुत्रिये नम:ï। मंत्र का जाप करते हुए अर्पित करें। प्रारंभ प्रथम नवरात्र को यह उपाय शुभ मुहूर्त में प्रारंभ करें।

*🩸आरती माता शैलपुत्री जी की🩸*
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शैलपुत्री मां बैल असवार।
करें देवता जय जयकार।
शिव शंकर की प्रिय भवानी।
तेरी महिमा किसी ने ना जानी।
पार्वती तू उमा कहलावे।
जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।
ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू।
दया करे धनवान करे तू।
सोमवार को शिव संग प्यारी।
आरती तेरी जिसने उतारी।
उसकी सगरी आस पुजा दो।
सगरे दुख तकलीफ मिला दो।
घी का सुंदर दीप जला के।
गोला गरी का भोग लगा के।
श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं।
प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।
जय गिरिराज किशोरी अंबे।
शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।
मनोकामना पूर्ण कर दो।
भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।
*♦️माँ दुर्गा की आरती♦️*
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जय अंबे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ ॐ जय…

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को ।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको ॥ ॐ जय…

कनक समान कलेवर, रक्तांबर राजै ।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै ॥ ॐ जय…

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी ।
सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी ॥ ॐ जय…

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती ।
कोटिक चंद्र दिवाकर, राजत सम ज्योती ॥ ॐ जय…

शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती ।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥ॐ जय…

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे ।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भय दूर करे ॥ॐ जय…

ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी ।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥ॐ जय…

चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैंरू ।
बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू ॥ॐ जय…

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता ।
भक्तन की दुख हरता, सुख संपति करता ॥ॐ जय…

भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी ।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥ॐ जय…

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती ।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती ॥ॐ जय…

श्री अंबेजी की आरति, जो कोइ नर गावे ।
कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे ॥ॐ जय

पूजन के बाद श्री दुर्गा सप्तशती पाठ एवं निर्वाण मन्त्र "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे"
का यथा सामर्थ जप अवश्य करें।

*(((जय माता दी )))*
*🌞 🚩 । l ॐ l । 🚩 🌞*
🕉 ।। *श्री गणेशाय नमः* ।। 🕉
 *सुप्रभातम् स्नेह वंदनम्* 
🌐 *आज का पंचांग* 🌐

🙏🙏🙏 शारदीय नवरात्र 🙏🙏🙏

⛳ *तिथि*……( ०२ ) द्वितीया ⛳️
🙏 भारतीय आश्विन मास आरंभ 🙏
🌝 चंद्रदर्शन 🌝
2️⃣3️⃣-0️⃣9️⃣-2⃣0⃣2️⃣5️⃣
🔔 *वार*……..मंगलवार 🔔
🦚 *नक्षत्र*…..हस्त 🦚
🪔 *योग*……..ब्रह्मा 🪔
✳️*करण*…….बालव ✳️
🌅 *सूर्योदय* :-०६ः२९ 🌅
🌌 *सूर्यास्त* :-०६ः३४ 🌌
🌓 *पक्ष*....………शुक्ल 🌓
🌝 *चन्द्र राशि*…. कन्या / २६ः५८ से तुला 🌝
⏺️ *ऋतु*.......…..शरद ⏺️
🍀 *अयन*………दक्षिण 🍀
🪷 *मास*.……….आश्विन 🪷
🌻*कलियुगाब्द*….५१२७🌻
🌎 *विक्रम संवत्*.....२०८१ 🌎
⭐️ *शक संवत्*...... १९४७ ⭐️
🪻अभिजीत …..मध्याह्न १२ः११ से १२ः५१ तक 🪻
🌚 राहुकाल …..सायं ०३ः३३ से ०५ः०३ तक 🌚

💐*।। आपका दिन मंगलमय हो ।।* 💐

🌺🌺 कल २४-०९-२५ बुधवार 🌺🌺

🪻 तृतीया वृद्धितिथि 🪻

🙏 🌹 *जय श्री कृष्ण* 🌹🙏
🌷🌷 आश्विन नवरात्रि द्वितीया 🌷🌷
आश्विन नवरात्रि का दूसरा दिन
23 सितम्बर 2025 मंगलवार .
द्वितीया तिथि,
मां ब्रह्मचारिणी पूजन दिवस

🌷🌷🌷ब्रह्मचारिणी देवी🌷🌷

नवरात्र की द्वितीया तिथि को मां दुर्गा के ‘देवी ब्रह्मचारिणी’ रूप की पूजा करने का विधान है। मां ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में माला और बाएं हाथ में कमण्डल है।

दधाना कर पद्माभ्यामक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

ध्यान
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालङ्कार भूषिताम्॥
परम वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

ब्रह्मचारिणी महामाला मन्त्र 🌺

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं ब्रह्मचारिण्यै तपस्विन्यै कमण्डलुधारिण्यै
अक्षमालाधारिण्यै शान्तस्वभावायै विद्यामय्यै योगिनीश्वरीyai
सत्यस्वरूपिण्यै ज्ञानप्रदायै नमो नमः।

सकलतपःफलप्रदायिन्यै वैराग्यदायिन्यै श्रद्धालक्ष्म्यै
धैर्यप्रदायिन्यै पापविनाशिन्यै क्लेशमोचन्यै
भक्तजनाभीष्टफलप्रदायिन्यै नमः।

त्रैलोक्यपूजितायै ब्रह्मविद्यायै योगमातायै जगन्मातर्यै
महाशक्त्यै महामायायै कल्याणरूपिण्यै
सर्वमङ्गलमङ्गल्यै शरणागतवत्सलायै नमोऽस्तु ते नमः नमः।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं ब्रह्मचारिण्यै परमेश्वर्यै तपोधनायै
सर्वाभीष्टफलप्रदायै सर्वसिद्धिप्रदायै नमो नमः॥

गायत्री मंत्र
१..ॐ ब्रह्मचारिण्यै विदमहे ज्ञानमालायै च धीमहि तन्नो देवी
प्रचोदयात् ।

२..ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै ॐ ब्रह्मचारिणी दैव्यै
नमः।
३..ॐ श्रीं पूर्ण भाग्योदयं ब्रहमचारिण्यै श्रीं नमः।
४ ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं ब्रह्मचारिण्यै नमः।
५...ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥
६..या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
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🌷🌷ब्रह्मचारिणी देवी कवच स्तोत्र🌷🌷

त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी॥

🌷🌷ब्रह्मचारिणी माता की कथा 🌷🌷

ब्रह्मचारिणी मां ज्ञान, विशेषज्ञता, अविवाहित मन की इच्छाशक्ति की प्रतीक हैं
प्रेम और निष्ठा का प्रतीक हैं। ब्रह्मचारिणी मां ज्ञान, विशेषज्ञता, अविवाहित मन की इच्छाशक्ति की प्रतीक हैं और उन्हें नव दुर्गाओं में सबसे शक्तिशाली कहा जाता है।

भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए मां ब्रह्मचारिणी ने घोर तपस्या की थी। उन्होंने कठोर तपस्या की और जिसके कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया।

ऐसा कहा जाता है कि भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए अपनी तपस्या के दौरान उन्होंने फूलों और फलों के आहार और जमींन पर सोते हुए पर हज़ारों साल बिताए।
इसके अलावा, उन्होंने भीषण गर्मी, कठोर सर्दियों और तूफानी बारिश में खुले स्थान पर रहने के दौरान सख्त उपवास का पालन किया। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार हज़ारों वर्षों तक बिल्वपत्र के आहार पर उन्होंने तपस्या की और भगवान शंकर को पाने की प्रार्थना की थी। बाद में उन्होंने बिल्वपत्र खाना भी बंद कर दिया और बिना अन्न-जल के अपनी तपस्या जारी रखी। जब उन्होंने बिल्व पत्र खाना छोड़ दिया तो उन्हें अपर्णा के नाम से जाना गया।
भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए अपनी तपस्या के दौरान उन्होंने फूलों और फलों के आहार और जमींन पर सोते हुए पर हज़ारों साल बिताए।
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🍀मां ब्रह्मचारिणी को पसंद है ये भोग🍀🍀

मां ब्रह्मचारिणी को गुड़हल और कमल का फूल बेहद पसंद है और इसलिए इनकी पूजा के दौरान इन्हीं फूलों को देवी मां के चरणों में अर्पित करें। चूंकि मां को चीनी और मिश्री काफी पसंद है इसलिए मां को भोग में चीनी, मिश्री और पंचामृत का भोग लगाएं। इस भोग से देवी ब्रह्मचारिणी प्रसन्न हो जाएंगी। इन्हीं चीजों का दान करने से लंबी आयु का सौभाग्य भी पाया जा सकता है।

🌷माँ ब्रह्मचारिणी स्तुति 🌷🌷🌷🌷

जै अम्बे ब्रह्मचारिणी माता । जै चतुराणन प्रिय सुख दाता ।
ब्रह्मा जी के मन भाती हो। ज्ञान सभी को सिखलाती हो ।
ब्रह्म मन्त्र है जाप तुम्हारा । जिस को जपे सकल संसारा।
जै गायत्री वेद की माता । जो जन निस दिन तुम्हें ध्याता ।
चमन लालकमी कोई रहने न पाए।कोई भी दुःख सहने न पाए।
उसकी विरति रहे ठिकाने । जो तेरी महिमा को जाने ।
रुद्राक्ष की माला लेकर। जपे जो मन्त्र श्रद्धा देकर।
आलस छोड़ करे गुणगाना ।मां तुम उसको सुख पहुंचाना।
ब्रह्मचारिणी तेरो नाम । पूर्ण करो सब मेरे काम ।
चमन’ तेरे चरणों का पुजारी। रखना लाज मेरी महतारी ।
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🌷स्तोत्र
तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शङ्करप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

🌷कवचम्
त्रिपुरा में हृदयम् पातु ललाटे पातु शङ्करभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पञ्चदशी कण्ठे पातु मध्यदेशे पातु महेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अङ्ग प्रत्यङ्ग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

🌷🌷 श्रीब्रह्मचारिणी स्तवन हिन्दी अर्थ सहित 🌷🌷

१.
कपाळं जटिलां ध्यायेत्कमण्डलुधरां शुभाम् ।
जपमालां करस्थां च तपस्विनीं नमाम्यहम् ॥१॥
हिन्दी अर्थ: जटाधारी, कमण्डलु और जपमाला धारण करनेवाली तपस्विनी ब्रह्मचारिणी देवी का ध्यान करता हूँ।

२.
अखण्डानन्दमयीं देवीं ब्रह्मज्ञानप्रदायिनीम् ।
अनघां तपसा तुष्टां ब्रह्मचारिण्युपास्महे ॥२॥
हिन्दी अर्थ: अखण्ड आनन्दमयी, ब्रह्मज्ञान देनेवाली, तपस्या से प्रसन्न ब्रह्मचारिणी देवी की उपासना करता हूँ।

३.
दुर्गमं पापसम्भूतं दुःखसागरमुत्तमम् ।
तारयत्येषा भक्तानां ब्रह्मचारिण्यनामया ॥३॥
हिन्दी अर्थ: जो भक्तों को पाप और दुःख के सागर से पार कराती हैं, ब्रह्मचारिणी देवी।

४.
कृपया भक्तिकामेष्टां सौभाग्यं सुखमेव च ।
ददाति योगिनी नित्यं ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ॥४॥
हिन्दी अर्थ: भक्तों को भक्ति, सौभाग्य और सुख देनेवाली, कृपालु ब्रह्मचारिणी।

५.
स्तोत्रेणानेन ये नित्यं ब्रह्मचारिण्यनुस्मरन् ।
सर्वपापविनिर्मुक्ताः सर्वान् कामानवाप्नुयुः ॥५॥
हिन्दी अर्थ: जो इस स्तोत्र का नित्य पाठ करते हैं, सभी पापों से मुक्त होकर मनोवांछित फल पाते हैं।
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🌷🌷🌷 ब्रह्मचारिणी अष्टोत्तरशतनामावलि 🌷🌷🌷

(ब्रह्मचारिणी के १०८ नाम)

ॐ ब्रह्मचारिण्यै नमः
ॐ तपस्विन्यै नमः
ॐ अक्षमालाधारिण्यै नमः
ॐ कमण्डलुधारिण्यै नमः
ॐ शान्तस्वरूपिण्यै नमः
ॐ सत्यरूपिण्यै नमः
ॐ धर्मचर्यायै नमः
ॐ योगिनीश्वरीyai नमः
ॐ साध्वीश्वरीyai नमः
ॐ ब्रह्मविद्यायै नमः (10)

ॐ ज्ञानप्रदायै नमः
ॐ श्रद्धारूपिण्यै नमः
ॐ धैर्यदायै नमः
ॐ शीलमय्यै नमः
ॐ संयमात्मिकायै नमः
ॐ तपोधनायै नमः
ॐ वैराग्यप्रदायै नमः
ॐ क्लेशहरायै नमः
ॐ भक्तवत्सलायै नमः
ॐ पापविनाशिन्यै नमः (20)

ॐ दुर्गतिनाशिन्यै नमः
ॐ योगमातायै नमः
ॐ महाशक्त्यै नमः
ॐ महामायायै नमः
ॐ कल्याणरूपिण्यै नमः
ॐ सर्वमङ्गलायै नमः
ॐ सौम्यायै नमः
ॐ चन्द्रप्रभायै नमः
ॐ सुषमायै नमः
ॐ तपोधनायै नमः (30)

ॐ ब्रह्मवर्चस्विन्यै नमः
ॐ योगिन्यै नमः
ॐ विद्याधारिण्यै नमः
ॐ शुद्धसत्त्वायै नमः
ॐ अनघायै नमः
ॐ मनोबुद्धिप्रदायै नमः
ॐ आद्यायै नमः
ॐ त्रैलोक्यपूजितायै नमः
ॐ तपःशक्त्यै नमः
ॐ तपोमय्यै नमः (40)

ॐ शीलसम्पन्नायै नमः
ॐ सदाशिवप्रियायै नमः
ॐ त्रिनेत्रायै नमः
ॐ ज्ञानगम्यायै नमः
ॐ निर्विकारायै नमः
ॐ अक्षय्यायै नमः
ॐ निरामय्यै नमः
ॐ सौभाग्यदायै नमः
ॐ शरणागतवत्सलायै नमः
ॐ भव्यायै नमः (50)

ॐ चिरंजीविन्यै नमः
ॐ ब्रह्मतेजस्विन्यै नमः
ॐ भक्ताभीष्टफलप्रदायै नमः
ॐ शान्तिदायिन्यै नमः
ॐ सिद्धिदायिन्यै नमः
ॐ योगप्रवर्तिन्यै नमः
ॐ ध्यानगम्यायै नमः
ॐ समाधिस्थायै नमः
ॐ तपश्चर्यायै नमः
ॐ सत्यप्रतिज्ञायै नमः (60)

ॐ अनन्तशक्त्यै नमः
ॐ नित्यानन्दायै नमः
ॐ ब्रह्मलक्ष्म्यै नमः
ॐ निर्मलायै नमः
ॐ सत्यमय्यै नमः
ॐ ज्योतिरूपिण्यै नमः
ॐ ज्ञानमय्यै नमः
ॐ विज्ञानमय्यै नमः
ॐ ब्रह्मरूपिण्यै नमः
ॐ वेदविद्यायै नमः (70)

ॐ तपोवत्यै नमः
ॐ तपोधारिण्यै नमः
ॐ नित्यमुक्तायै नमः
ॐ योगमय्यै नमः
ॐ परमानन्दायै नमः
ॐ सर्वज्ञायै नमः
ॐ जगन्मातर्यै नमः
ॐ सर्वेश्वर्यै नमः
ॐ अखण्डरूपिण्यै नमः
ॐ सर्वसिद्धिप्रदायै नमः (80)

ॐ मोक्षदायिन्यै नमः
ॐ भवरोगहरायै नमः
ॐ सर्वदुःखनिवारिण्यै नमः
ॐ त्रैलोक्यरक्षिण्यै नमः
ॐ त्रैलोक्यधारिण्यै नमः
ॐ महेश्वर्यै नमः
ॐ सर्वकारणकारिण्यै नमः
ॐ अनादिनिदनायै नमः
ॐ अनन्तरूपिण्यै नमः
ॐ परब्रह्मस्वरूपिण्यै नमः (90)

ॐ ब्रह्मसंस्थायै नमः
ॐ अखिलेश्वर्यै नमः
ॐ सच्चिदानन्दरूपिण्यै नमः
ॐ शरण्यायै नमः
ॐ भक्तिगम्यायै नमः
ॐ अनन्तगुणायै नमः
ॐ सर्वगुणायै नमः
ॐ अद्वितीयायै नमः
ॐ तपःस्वरूपिण्यै नमः
ॐ ध्यानरूपिण्यै नमः (100)

ॐ ब्रह्मविद्यायै नमः
ॐ धर्मरूपिण्यै नमः
ॐ योगलक्ष्म्यै नमः
ॐ श्रद्धाशक्त्यै नमः
ॐ अखण्डतेजस्विन्यै नमः
ॐ साधनारूपिण्यै नमः
ॐ शुद्धात्मायै नमः
ॐ परमशक्त्यै नमः
ॐ अखिलसिद्धिदायिन्यै नमः
ॐ सर्वमङ्गलरूपिण्यै नमः (108)
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🌹 ब्रह्मचारिणी देवी कीआरती 🌹
जय अम्बे ब्रह्मचारिणी माता। जय चतुरानन प्रिय सुख दाता॥
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ब्रह्मा जी के मन भाती हो। ज्ञान सभी को सिखलाती हो॥
ब्रह्म मन्त्र है जाप तुम्हारा। जिसको जपे सरल संसारा॥
जय गायत्री वेद की माता। जो जन जिस दिन तुम्हें ध्याता॥
कमी कोई रहने ना पाए। उसकी विरति रहे ठिकाने॥
जो तेरी महिमा को जाने। रद्रक्षा की माला ले कर॥
जपे जो मन्त्र श्रद्धा दे कर। आलस छोड़ करे गुणगाना॥
माँ तुम उसको सुख पहुँचाना। ब्रह्मचारिणी तेरो नाम॥
पूर्ण करो सब मेरे काम। भक्त तेरे चरणों का पुजारी॥
रखना लाज मेरी महतारी।
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*अंक ज्योतिष विशेषज्ञ*

*आपके जीवन की संख्याओं का रहस्य उजागर करें!*

- *जन्म तिथि और नाम संख्या विश्लेषण*
- *व्यक्तिगत संख्या का अर्थ और प्रभाव*
- *जीवन में सफलता और समृद्धि के तरीके*

*मिलें और जानें अपने जीवन की संख्याओं का रहस्य!*


*नाम:मीत महाकाल महादेव*
☎️7575091399
🪀94263 60094
📧Geereejaaptiaastropoint@gmail.com

*अंक ज्योतिष से अपने जीवन को बेहतर बनाएं!*
🌸 *नवरात्रि का गूढ़ संदेश*

देवी के नौ रूप केवल पूजन का विषय नहीं, बल्कि *जीवन जीने की प्रेरणा* हैं।
1. *शैलपुत्री* – धैर्य और स्थिरता का प्रतीक।
2. *ब्रह्मचारिणी* – आत्मसंयम और साधना का संदेश।
3. *चंद्रघंटा* – साहस और निर्भयता की प्रेरणा।
4. *कूष्मांडा* – सृजन और सकारात्मकता का प्रतीक।
5. *स्कंदमाता* – मातृत्व और करुणा का संदेश।
6. *कात्यायनी* – न्याय और धर्म की रक्षा का भाव।
7. *कालरात्रि* – बुराई के विरुद्ध संघर्ष का साहस।
8. *महागौरी* – शुद्धता और सरलता का प्रतीक।
9. *सिद्धिदात्री* – सिद्धि और पूर्णता की प्राप्ति का मार्ग।

🌿 *इन रूपों को जीवन में अपनाकर हम शक्ति, करुणा और संतुलन से परिपूर्ण जीवन जी सकते हैं*


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हिम्मत करके नवरात्रि में लव जिहाद पर प्रस्तुति दी है,

अगर यह वीडियो आप हर किसी के मोबाइल में नहीं भेजते तो आप हिंदू होने पर कलंक हो। आपको सभी बहनों व रिश्तेदारों को शेयर करना है 🙏🚩

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