विज्ञान ज्ञान के ही अंतर्गत आता है
सनातन धर्मियों का, हमारा-आपका प्रमाद ही विश्व में जितने तन्त्र हैं उनका जीवन है। यह वाक्य कुछ रहस्यात्मक है। फिर से सुनिए- हम न मुस्लिम तन्त्र को, न कम्युनिस्ट तन्त्र को, न क्रिश्चियन तन्त्र को, किसी तन्त्र को कोसते नहीं हम। क्यों नहीं कोसते? हम इस बात को अच्छी प्रकार समझते हैं कि धर्म को, अध्यात्म को समझने में, उसके अनुपालन में जो त्रुटि हुई, उस त्रुटि के गर्भ से ही ये सब तन्त्र उत्पन्न हुए हैं।
सनातन धर्मियों का जो प्रमाद है उसी ने समय-समय पर विभिन्न तन्त्रों को उद्भासित किया है। मैं संकेत करता हूँ - मुस्लिम तन्त्र की, क्रिश्चियन तन्त्र की, कम्युनिस्ट तन्त्र की उपयोगिता कब समझ में आई? ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अन्त्यज... जो भी महानुभाव हैं वर्णाश्रम से सम्बद्ध, उन्होंने अपने दायित्व को ठीक से समझा नहीं, उसके पालन में जब प्रमाद हुआ तब जाकर इन तन्त्रों की उद्भावना हुई।
आज अगर उस प्रमाद का निवारण हो जाए तो विश्व में कोई तन्त्र शेष नहीं रहेगा। अपने आप लाठी, गोली के बिना ही सभी तन्त्र हमारे तन्त्र में जाकर खप जाएंगे समा जाएंगे, जैसे समुद्र में गङ्गा, यमुना इन सब जलधाराओं का अपने आप द्रुतगति से विलय हो जाता है। किसी तन्त्र को कोसने की आवश्यकता नहीं है। प्रमाणिक रीति से आत्मनिरीक्षण करने पर धर्म, अध्यात्म को समझने, उसके अनुपालन में जो प्रमाद हुआ है उसी का यह सब विस्फोटक परिणाम है।
सनातन धर्मियों का जो प्रमाद है उसी ने समय-समय पर विभिन्न तन्त्रों को उद्भासित किया है। मैं संकेत करता हूँ - मुस्लिम तन्त्र की, क्रिश्चियन तन्त्र की, कम्युनिस्ट तन्त्र की उपयोगिता कब समझ में आई? ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अन्त्यज... जो भी महानुभाव हैं वर्णाश्रम से सम्बद्ध, उन्होंने अपने दायित्व को ठीक से समझा नहीं, उसके पालन में जब प्रमाद हुआ तब जाकर इन तन्त्रों की उद्भावना हुई।
आज अगर उस प्रमाद का निवारण हो जाए तो विश्व में कोई तन्त्र शेष नहीं रहेगा। अपने आप लाठी, गोली के बिना ही सभी तन्त्र हमारे तन्त्र में जाकर खप जाएंगे समा जाएंगे, जैसे समुद्र में गङ्गा, यमुना इन सब जलधाराओं का अपने आप द्रुतगति से विलय हो जाता है। किसी तन्त्र को कोसने की आवश्यकता नहीं है। प्रमाणिक रीति से आत्मनिरीक्षण करने पर धर्म, अध्यात्म को समझने, उसके अनुपालन में जो प्रमाद हुआ है उसी का यह सब विस्फोटक परिणाम है।