🔥 वंदे मातरम् @ 150
📍07 नवंबर से उत्सव की शुरुआत
• राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' को लिखे हुए 150 वर्ष पूर्ण हो गए हैं।
• राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1875 में लिखा, जो उनके उपन्यास 'आनंदमठ' में प्रकाशित हुआ।
• इस गीत को 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा द्वारा राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया गया था।
📍07 नवंबर से उत्सव की शुरुआत
• राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' को लिखे हुए 150 वर्ष पूर्ण हो गए हैं।
• राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1875 में लिखा, जो उनके उपन्यास 'आनंदमठ' में प्रकाशित हुआ।
• इस गीत को 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा द्वारा राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया गया था।
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यह कहानी है एक ऐसी लड़की की, जिसने ज़िंदगी की सबसे मुश्किल राहों को अपने हौसले से आसान बना दिया।
सारिका सासि जन्म से Differently-abled थीं। डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें Cerebral Palsy है। बचपन सर्जरी और इलाज में गुज़रा। दोनों पैरों में रॉड लगी थीं, और चलने के लिए उन्हें स्पेशल जूते पहनने पड़ते थे।
एक सर्जरी के बाद उम्मीद थी कि हालात बेहतर होंगे, लेकिन किस्मत ने दूसरा मोड़ लिया; वह व्हीलचेयर पर आ गईं।
मगर सारिका के माता-पिता ने फिर भी हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी बेटी के इलाज के साथ-साथ उसकी अच्छी शिक्षा जारी रखी और उसे सपने देखना सिखाया।
उनका मानना था, “अगर दवा नहीं चल सकती, तो पढ़ाई चलेगी। अगर पैर नहीं चल सकते, तो दिमाग़ ज़रूर दौड़ेगा।”
पिता विदेश में ड्राइवर थे, और माँ हर दिन उन्हें ऑटोरिक्शा में स्कूल और कॉलेज ले जातीं। उन्हें हमेशा ऐसे संस्थान चुनने पड़ते जो घर के पास हों, क्योंकि हर सफर अपने आप में एक संघर्ष था।
रास्ते में लोग अक्सर कह देते, “इतना खर्च क्यों? लड़की पढ़कर क्या करेगी?”
लेकिन उसके माता-पिता कभी डगमगाए नहीं। सारिका की बहन हर वक्त उनका हौसला बढ़ाती, और माँ स्कूल में उसके साथ दिनभर बैठतीं ताकि बेटी अकेलापन महसूस न करे।
धीरे-धीरे कुछ दोस्त बने जो हर मुश्किल में उनका सहारा बनकर सतह खड़े रहे।
उस समय कोई सुविधा नहीं थी। न रैम्प, न व्हीलचेयर के लिए रास्ते, न खास टॉयलेट। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी।
उन्होंने पढ़ाई में इतना अच्छा प्रदर्शन किया कि डिस्टिंक्शन के साथ ग्रेजुएशन पूरी की।
वह चाहती थीं कि लोग समझें- “एक differently-abled बच्चे की शिक्षा पर किया गया हर प्रयास, समाज के लिए सबसे बड़ा निवेश है।”
पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने UPSC की तैयारी शुरू की। पहली कोशिश में असफल हुईं, लेकिन हिम्मत नहीं छोड़ी। दूसरी बार उसने वही कर दिखाया, जिसे लोग “नामुमकिन” कहते थे।
आज वह Indian Railway Management Service में एक सिविल सर्वेंट हैं। उनकी सफलता ने उसके माता-पिता के त्याग को उनकी सबसे बड़ी शान में बदल दिया है।
उसकी कहानी हमें यही सिखाती है कि सीमाएँ हमें नहीं रोक सकतीं, अगर हौसला हमारे साथ है। जज़्बा, मेहनत और आत्मविश्वास से हर बड़े सपने को पूरा किया जा सकता है।
कभी हार मत मानिए; क्योंकि शायद आपकी कहानी किसी और के लिए उम्मीद की रोशनी बन जाए। :star2:
[Monday Motivation | Inspiring | Never Give Up | Indian Railway ]
सारिका सासि जन्म से Differently-abled थीं। डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें Cerebral Palsy है। बचपन सर्जरी और इलाज में गुज़रा। दोनों पैरों में रॉड लगी थीं, और चलने के लिए उन्हें स्पेशल जूते पहनने पड़ते थे।
एक सर्जरी के बाद उम्मीद थी कि हालात बेहतर होंगे, लेकिन किस्मत ने दूसरा मोड़ लिया; वह व्हीलचेयर पर आ गईं।
मगर सारिका के माता-पिता ने फिर भी हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी बेटी के इलाज के साथ-साथ उसकी अच्छी शिक्षा जारी रखी और उसे सपने देखना सिखाया।
उनका मानना था, “अगर दवा नहीं चल सकती, तो पढ़ाई चलेगी। अगर पैर नहीं चल सकते, तो दिमाग़ ज़रूर दौड़ेगा।”
पिता विदेश में ड्राइवर थे, और माँ हर दिन उन्हें ऑटोरिक्शा में स्कूल और कॉलेज ले जातीं। उन्हें हमेशा ऐसे संस्थान चुनने पड़ते जो घर के पास हों, क्योंकि हर सफर अपने आप में एक संघर्ष था।
रास्ते में लोग अक्सर कह देते, “इतना खर्च क्यों? लड़की पढ़कर क्या करेगी?”
लेकिन उसके माता-पिता कभी डगमगाए नहीं। सारिका की बहन हर वक्त उनका हौसला बढ़ाती, और माँ स्कूल में उसके साथ दिनभर बैठतीं ताकि बेटी अकेलापन महसूस न करे।
धीरे-धीरे कुछ दोस्त बने जो हर मुश्किल में उनका सहारा बनकर सतह खड़े रहे।
उस समय कोई सुविधा नहीं थी। न रैम्प, न व्हीलचेयर के लिए रास्ते, न खास टॉयलेट। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी।
उन्होंने पढ़ाई में इतना अच्छा प्रदर्शन किया कि डिस्टिंक्शन के साथ ग्रेजुएशन पूरी की।
वह चाहती थीं कि लोग समझें- “एक differently-abled बच्चे की शिक्षा पर किया गया हर प्रयास, समाज के लिए सबसे बड़ा निवेश है।”
पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने UPSC की तैयारी शुरू की। पहली कोशिश में असफल हुईं, लेकिन हिम्मत नहीं छोड़ी। दूसरी बार उसने वही कर दिखाया, जिसे लोग “नामुमकिन” कहते थे।
आज वह Indian Railway Management Service में एक सिविल सर्वेंट हैं। उनकी सफलता ने उसके माता-पिता के त्याग को उनकी सबसे बड़ी शान में बदल दिया है।
उसकी कहानी हमें यही सिखाती है कि सीमाएँ हमें नहीं रोक सकतीं, अगर हौसला हमारे साथ है। जज़्बा, मेहनत और आत्मविश्वास से हर बड़े सपने को पूरा किया जा सकता है।
कभी हार मत मानिए; क्योंकि शायद आपकी कहानी किसी और के लिए उम्मीद की रोशनी बन जाए। :star2:
[Monday Motivation | Inspiring | Never Give Up | Indian Railway ]
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मोदी की गारंटी के लगभग सभी वादे हमारी सरकार ने पूरे किए- साय
https://www.dailychhattisgarh.com/latest-news/308308/our-government-fulfilled-almost-all-the-promises-guaranteed-by-modi-sai
https://www.dailychhattisgarh.com/latest-news/308308/our-government-fulfilled-almost-all-the-promises-guaranteed-by-modi-sai
मोदी की गारंटी के लगभग सभी वादे हमारी सरकार ने पूरे किए- साय
🎯पूर्वी तिमोर (तिमोर-लेस्ते) आसियान का सबसे नया सदस्य है, जो 14 साल के इंतज़ार के बाद अक्टूबर 2025 में आधिकारिक तौर पर 11वें सदस्य के रूप में शामिल होगा।⛳️
कुआलालंपुर में एक शिखर सम्मेलन में इस सदस्यता को औपचारिक रूप दिया गया, जिससे यह 25 वर्षों में संगठन का पहला नया सदस्य बन गया।
नया सदस्य: पूर्वी तिमोर (तिमोर-लेस्ते) 11वां सदस्य है।
तिथि: आधिकारिक परिग्रहण अक्टूबर 2025 में हुआ।
महत्व: यह 25 वर्षों में इस समूह में शामिल होने वाला पहला नया सदस्य है।
समारोह: आधिकारिक हस्ताक्षर कुआलालंपुर में एक शिखर सम्मेलन में हुआ।
कुआलालंपुर में एक शिखर सम्मेलन में इस सदस्यता को औपचारिक रूप दिया गया, जिससे यह 25 वर्षों में संगठन का पहला नया सदस्य बन गया।
नया सदस्य: पूर्वी तिमोर (तिमोर-लेस्ते) 11वां सदस्य है।
तिथि: आधिकारिक परिग्रहण अक्टूबर 2025 में हुआ।
महत्व: यह 25 वर्षों में इस समूह में शामिल होने वाला पहला नया सदस्य है।
समारोह: आधिकारिक हस्ताक्षर कुआलालंपुर में एक शिखर सम्मेलन में हुआ।
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Timor-Leste
Timor-Leste, or East Timor, a Southeast Asian nation occupying half the island of Timor, is ringed by coral reefs teeming with marine life. Landmarks in the capital, Dili, speak to the country's struggles for independence from Portugal in 1975 and then Indonesia…
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