Popular singer-actor Prashant Tamang passed away at the age of 43, reportedly due to cardiac arrest in Delhi today. The news has left the entertainment industry in shock. He was known for winning Indian Idol season 3 and his performance in shows like Paatal Lok 2.
स्वामी विवेकानंद : जयंती पर सादर नमन 🙏🌺
12 जनवरी, 1863 को कलकत्ता में जन्मे स्वामी विवेकानंद न सिर्फ अपने समय में, बल्कि आज भी अपने क्रांतिकारी विचारों से नौजवानों के दिलो-दिमाग को उद्वेलित करते हैं। देश के लाखों-लाख युवा तरुणाई के लिए उनके विचार, आज भी प्रेरणा स्त्रोत हैं। स्वामी विवेकानंद का कहना था कि युवा राष्ट्र की असली शक्ति हैं।
विवेकानंद के दर्शन के तीन मुख्य स्त्रोत रहे हैं-पहला, वेद तथा वेदान्त की महान परम्परा, दूसरा श्रीरामकृष्णदेव का शिष्यत्व और तीसरा अपने जीवन का अनुभव। विवेकानंद ने कहा था,‘‘किसी की भी कोई बात या सिद्धांत को तर्क और बहस-मुबाहिसे के जरिए परखे बिना नहीं मानना चाहिए।’’ विवेकानंद पुरोहितवाद, धार्मिक आडंबरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था। उनका कहना था,‘‘मैं उस ईश्वर का उपासक हूँ, जिसे अज्ञानी लोग मनुष्य कहते हैं।’’ स्वामी विवेकानंद स्वभाव से ही विद्रोही प्रकृति के थे। उनके बगावती तेवर अक्सर उनके भाषणों से झलकते थे।
उन्होंने ही यह विद्रोही बयान दिया था, ‘‘इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मंदिरों में स्थापित कर दिया जाए और मंदिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाए।’’ उन्होंने अपनी किताबों और भाषणों में पुरोहितवाद, ब्राम्हणवाद, धार्मिक कर्मकांड और रूढ़ियों की जमकर आलोचना की और लगभग आक्रमणकारी भाषा में ऐसी विसंगतियों के खिलाफ हल्ला बोला। उनका कहना था,‘‘जब पड़ोसी भूख से मरता हो, तब मंदिर में भोग चढ़ाना पुण्य नहीं पाप है। जब मनुष्य दुर्बल और क्षीण हो तब हवन में घी डालना अमानवीय कर्म है। जो व्यक्ति रोटी को तरस रहा हो उसके हाथ में धर्म ग्रंथ रखना उसका मजाक उड़ाना है।”
स्वामी विवेकानंद मानव धर्म को ही सर्वोपरि समझते थे। वे बेलूर में रामकृष्ण परमहंस मठ की स्थापना के लिए धन एकत्र कर रहे थे। इसके लिए जमीन पहले ही खरीदी जा चुकी थी। उन्हीं दिनों कोलकाता में प्लेग की महामारी फैल गई। स्वामी जी ने तुरंत मठ निर्माण की योजना टाल दी और एकत्रित धनराशि से रोगियों की सेवा करने लगे। किसी ने उनसे पूछा, अब मठ का निर्माण कैसे होगा? स्वामी जी ने कहा, इस समय मठ निर्माण से अधिक मानव सेवा की आवश्यकता है। मठ तो फिर बन सकता है, लेकिन गया हुआ मानव हाथ नहीं आएगा।
12 जनवरी, 1863 को कलकत्ता में जन्मे स्वामी विवेकानंद न सिर्फ अपने समय में, बल्कि आज भी अपने क्रांतिकारी विचारों से नौजवानों के दिलो-दिमाग को उद्वेलित करते हैं। देश के लाखों-लाख युवा तरुणाई के लिए उनके विचार, आज भी प्रेरणा स्त्रोत हैं। स्वामी विवेकानंद का कहना था कि युवा राष्ट्र की असली शक्ति हैं।
विवेकानंद के दर्शन के तीन मुख्य स्त्रोत रहे हैं-पहला, वेद तथा वेदान्त की महान परम्परा, दूसरा श्रीरामकृष्णदेव का शिष्यत्व और तीसरा अपने जीवन का अनुभव। विवेकानंद ने कहा था,‘‘किसी की भी कोई बात या सिद्धांत को तर्क और बहस-मुबाहिसे के जरिए परखे बिना नहीं मानना चाहिए।’’ विवेकानंद पुरोहितवाद, धार्मिक आडंबरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था। उनका कहना था,‘‘मैं उस ईश्वर का उपासक हूँ, जिसे अज्ञानी लोग मनुष्य कहते हैं।’’ स्वामी विवेकानंद स्वभाव से ही विद्रोही प्रकृति के थे। उनके बगावती तेवर अक्सर उनके भाषणों से झलकते थे।
उन्होंने ही यह विद्रोही बयान दिया था, ‘‘इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मंदिरों में स्थापित कर दिया जाए और मंदिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाए।’’ उन्होंने अपनी किताबों और भाषणों में पुरोहितवाद, ब्राम्हणवाद, धार्मिक कर्मकांड और रूढ़ियों की जमकर आलोचना की और लगभग आक्रमणकारी भाषा में ऐसी विसंगतियों के खिलाफ हल्ला बोला। उनका कहना था,‘‘जब पड़ोसी भूख से मरता हो, तब मंदिर में भोग चढ़ाना पुण्य नहीं पाप है। जब मनुष्य दुर्बल और क्षीण हो तब हवन में घी डालना अमानवीय कर्म है। जो व्यक्ति रोटी को तरस रहा हो उसके हाथ में धर्म ग्रंथ रखना उसका मजाक उड़ाना है।”
स्वामी विवेकानंद मानव धर्म को ही सर्वोपरि समझते थे। वे बेलूर में रामकृष्ण परमहंस मठ की स्थापना के लिए धन एकत्र कर रहे थे। इसके लिए जमीन पहले ही खरीदी जा चुकी थी। उन्हीं दिनों कोलकाता में प्लेग की महामारी फैल गई। स्वामी जी ने तुरंत मठ निर्माण की योजना टाल दी और एकत्रित धनराशि से रोगियों की सेवा करने लगे। किसी ने उनसे पूछा, अब मठ का निर्माण कैसे होगा? स्वामी जी ने कहा, इस समय मठ निर्माण से अधिक मानव सेवा की आवश्यकता है। मठ तो फिर बन सकता है, लेकिन गया हुआ मानव हाथ नहीं आएगा।
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