04 August वर्ष 2009 में स्वर्गीय डॉ. मनमोहन सिंह जी के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) लागू कर हर बच्चे के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित किया।
यह ऐतिहासिक कानून करोड़ों बच्चों के सपनों को नई उड़ान देने और समान अवसर वाला भारत बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ।
यह ऐतिहासिक कानून करोड़ों बच्चों के सपनों को नई उड़ान देने और समान अवसर वाला भारत बनाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुआ।
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भारत में "हरित क्रांति के जनक" प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक
डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन ने 1960 के दशक में भारत में हरित क्रांति का नेतृत्व किया; गेहूँ और चावल की उच्च उपज वाली किस्मों का विकास किया जिससे देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बना।
भारतीय कृषि को वैज्ञानिक आधार, नई फसल किस्में, और किसानों के लिए स्थायी नीति सुझाव दिए जिससे देश हमेशा के लिए खाद्यान्न संकट से बाहर निकल पाया और कृषि क्षेत्र में नया युग शुरू हुआ।
जयंती पर सादर नमन🙏
डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन ने 1960 के दशक में भारत में हरित क्रांति का नेतृत्व किया; गेहूँ और चावल की उच्च उपज वाली किस्मों का विकास किया जिससे देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बना।
भारतीय कृषि को वैज्ञानिक आधार, नई फसल किस्में, और किसानों के लिए स्थायी नीति सुझाव दिए जिससे देश हमेशा के लिए खाद्यान्न संकट से बाहर निकल पाया और कृषि क्षेत्र में नया युग शुरू हुआ।
जयंती पर सादर नमन🙏
9 अगस्त
International Day of The World's Indigenous Peoples पर आप सभी को ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं💐
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International Day of The World's Indigenous Peoples पर आप सभी को ढेर सारी बधाई व शुभकामनाएं💐
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18 साल की उम्र में फांसी के फंदे तक पहुंचे, लेकिन चेहरे पर डर नहीं था…
11 अगस्त 1908 को खुदीराम बोस ने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
जिस उम्र में एक युवा अपनी ज़िंदगी के सपने बुनता है, उस उम्र में खुदीराम ने आज़ाद भारत का सपना देखा और उसके लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया।
एक माँ ने अपना बेटा खोया, लेकिन भारत ने एक ऐसा वीर पाया, जिसकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को साहस, देशभक्ति और बलिदान की सीख देती रहेगी।
खुदीराम बोस सिर्फ़ इतिहास का एक नाम नहीं—वो उस जज़्बे का नाम हैं, जो देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करना सिखाता है।
आज उनकी शहादत को नमन करें और याद रखें—
आज़ादी हमें विरासत में नहीं, बल्कि ऐसे अनगिनत वीरों के बलिदान से मिली है।
11 अगस्त 1908 को खुदीराम बोस ने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
जिस उम्र में एक युवा अपनी ज़िंदगी के सपने बुनता है, उस उम्र में खुदीराम ने आज़ाद भारत का सपना देखा और उसके लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया।
एक माँ ने अपना बेटा खोया, लेकिन भारत ने एक ऐसा वीर पाया, जिसकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को साहस, देशभक्ति और बलिदान की सीख देती रहेगी।
खुदीराम बोस सिर्फ़ इतिहास का एक नाम नहीं—वो उस जज़्बे का नाम हैं, जो देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करना सिखाता है।
आज उनकी शहादत को नमन करें और याद रखें—
आज़ादी हमें विरासत में नहीं, बल्कि ऐसे अनगिनत वीरों के बलिदान से मिली है।
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