*CGPSC घोटाला…2021 का पेपर 2020 में हो गया था लीक:* आरती वासनिक ने ध्रुव से पेपर-लीक कराया; नीतेश-निशा ने इंटरव्यू नहीं दिया, फिर भी चयन
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Bhaskar
CGPSC घोटाला…2021 का पेपर 2020 में हो गया था...
आरती वासनिक ने ध्रुव से पेपर-लीक कराया;...
आज गांधी जयंती और विजयादशमी दोनों का संयोग है। इस अवसर पर हमें एक गूढ़ बात अवश्य स्मरण करनी चाहिए।
एल्विन टॉफ्लर ने कहा था कि 21वीं सदी में समस्या यह नहीं होगी कि लोग पढ़ना-लिखना नहीं जानते, बल्कि असली कठिनाई यह होगी कि वे पुरानी, रूढ़ शिक्षा (डॉक्ट्रिनल लर्निंग) को त्याग नहीं पाएंगे और नई बातों को अपनाने में असमर्थ होंगे। यानी, शिक्षा यदि जड़ हो जाए तो मनुष्य को सीखे हुए को भूलना और उलट दृष्टिकोण सीखना सबसे कठिन काम लगता है।
गांधी को लेकर मत-मतांतर रहे हैं। जिन्होंने उन्हें गहराई से पढ़ा है, वे समझते हैं कि गांधी को एक ही दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। विचारों की इस व्यापक दुनिया में कोई भी पूरी तरह "सही" नहीं हो सकता।
जिन्होंने वाल्मीकि रामायण पढ़ी होगी, वे जानते हैं कि वाल्मीकि ने राम को एक साधारण मनुष्य के रूप में प्रस्तुत किया था, ऐसे मनुष्य के रूप में, जो गुण-दोषों से युक्त होकर भी आत्मानुशासन, त्याग और मर्यादा से ईश्वरत्व की ओर बढ़ते हैं। राम वही हैं जिन्होंने मरणासन्न रावण से भी अपने भाइयों को राजनीति और धर्मनीति की शिक्षा लेने भेजा। उन्होंने रावण को अवसर दिए, पर रावण स्वयं जानता था कि उसका अंत राम के हाथों होना ही उसकी मुक्ति है। यही कारण है कि महाकाव्य अपने नायक के साथ-साथ खलनायक को भी जीवंत और प्रेरणादायी बना देता है।
गांधी ने भी राम के नाम को लोक-एकता का साधन बनाया। उन्होंने जनमानस की बिखरी हुई ऊर्जा को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया। परंतु जब संकीर्ण मानसिकता वाले लोग उनके विचारों को न समझ पाए और वैचारिक रूप से उनसे हार गए, तो उन्होंने गांधी के शरीर को ही नष्ट करने की चेष्टा की।
गांधी वास्तव में मनुष्य के इड (id) और सुपर-ईगो के मध्य चलने वाली अनवरत जद्दोजहद का प्रतीक हैं। उनकी व्यापकता को संकीर्ण दृष्टि से आंकना संभव नहीं है। गांधी हर युग में प्रासंगिक रहेंगे।
गांधी के दर्शन पर अब तक हजारों शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं और हजारों पुस्तकें लिखी गई हैं
और अंत में, आप किसी भी व्यक्ति में वही देखेंगे जो आपके भीतर है। जैसे राम ने रावण में एक महान योद्धा और असाधारण ज्ञान-संपदा देखी। व्यक्ति पर प्रश्न करना उचित है, पर उसके दर्शन को पढ़े बिना प्रश्न करना अज्ञानता और मूढ़ता का प्रतीक है।
एल्विन टॉफ्लर ने कहा था कि 21वीं सदी में समस्या यह नहीं होगी कि लोग पढ़ना-लिखना नहीं जानते, बल्कि असली कठिनाई यह होगी कि वे पुरानी, रूढ़ शिक्षा (डॉक्ट्रिनल लर्निंग) को त्याग नहीं पाएंगे और नई बातों को अपनाने में असमर्थ होंगे। यानी, शिक्षा यदि जड़ हो जाए तो मनुष्य को सीखे हुए को भूलना और उलट दृष्टिकोण सीखना सबसे कठिन काम लगता है।
गांधी को लेकर मत-मतांतर रहे हैं। जिन्होंने उन्हें गहराई से पढ़ा है, वे समझते हैं कि गांधी को एक ही दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। विचारों की इस व्यापक दुनिया में कोई भी पूरी तरह "सही" नहीं हो सकता।
जिन्होंने वाल्मीकि रामायण पढ़ी होगी, वे जानते हैं कि वाल्मीकि ने राम को एक साधारण मनुष्य के रूप में प्रस्तुत किया था, ऐसे मनुष्य के रूप में, जो गुण-दोषों से युक्त होकर भी आत्मानुशासन, त्याग और मर्यादा से ईश्वरत्व की ओर बढ़ते हैं। राम वही हैं जिन्होंने मरणासन्न रावण से भी अपने भाइयों को राजनीति और धर्मनीति की शिक्षा लेने भेजा। उन्होंने रावण को अवसर दिए, पर रावण स्वयं जानता था कि उसका अंत राम के हाथों होना ही उसकी मुक्ति है। यही कारण है कि महाकाव्य अपने नायक के साथ-साथ खलनायक को भी जीवंत और प्रेरणादायी बना देता है।
गांधी ने भी राम के नाम को लोक-एकता का साधन बनाया। उन्होंने जनमानस की बिखरी हुई ऊर्जा को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया। परंतु जब संकीर्ण मानसिकता वाले लोग उनके विचारों को न समझ पाए और वैचारिक रूप से उनसे हार गए, तो उन्होंने गांधी के शरीर को ही नष्ट करने की चेष्टा की।
गांधी वास्तव में मनुष्य के इड (id) और सुपर-ईगो के मध्य चलने वाली अनवरत जद्दोजहद का प्रतीक हैं। उनकी व्यापकता को संकीर्ण दृष्टि से आंकना संभव नहीं है। गांधी हर युग में प्रासंगिक रहेंगे।
गांधी के दर्शन पर अब तक हजारों शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं और हजारों पुस्तकें लिखी गई हैं
और अंत में, आप किसी भी व्यक्ति में वही देखेंगे जो आपके भीतर है। जैसे राम ने रावण में एक महान योद्धा और असाधारण ज्ञान-संपदा देखी। व्यक्ति पर प्रश्न करना उचित है, पर उसके दर्शन को पढ़े बिना प्रश्न करना अज्ञानता और मूढ़ता का प्रतीक है।
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