आज का इतिहासः
24 अक्टूबर को हुई थी संयुक्त राष्ट्र की स्थापना
1605 : अकबर के निधन के बाद शहजादे सलीम ने मुगल सल्तनत की बागडोर संभाली। इतिहास में उन्हें जहांगीर के नाम से जाना जाता है।
1775 : भारत के आखिरी मुगल शासक बहादुर शाह जफर का जन्म।
24 अक्टूबर को हुई थी संयुक्त राष्ट्र की स्थापना
1605 : अकबर के निधन के बाद शहजादे सलीम ने मुगल सल्तनत की बागडोर संभाली। इतिहास में उन्हें जहांगीर के नाम से जाना जाता है।
1775 : भारत के आखिरी मुगल शासक बहादुर शाह जफर का जन्म।
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24 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र दिवस मनाया जाता है, जो 1945 में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के लागू होने की वर्षगांठ का प्रतीक है। इस दिन का उद्देश्य दुनिया को संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों और उपलब्धियों से अवगत कराना और उसके कार्यों का समर्थन प्राप्त करना है।
मुख्य कारण:
यह दिवस संयुक्त राष्ट्र चार्टर के लागू होने की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।
शुरुआत:
1947 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसे संयुक्त राष्ट्र के चार्टर की वर्षगांठ के रूप में घोषित किया।
अंतर्राष्ट्रीय अवकाश:
1971 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसे एक अंतर्राष्ट्रीय अवकाश के रूप में घोषित किया और सदस्य देशों से इसे सार्वजनिक अवकाश के रूप में मनाने की सिफारिश की।
संयुक्त राष्ट्र दिवस -
संयुक्त राष्ट्र दिवस एक वार्षिक स्मारक दिवस है, जो 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक निर्माण को दर्शाता है।
1947 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 24 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र के चार्टर की वर्षगांठ के रूप में घोषित किया, जिसका उद्देश्य "
संयुक्त राष्ट्र दिवस
24 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र दिवस, 1945 में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के लागू होने की वर्षगांठ का प्रतीक है।
24 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र दिवस मनाना ! #UN70 - संयुक्त राष्ट्र
Translated — 1948 से 24 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1971 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सिफारिश की कि इस दिन को सदस्य राज्यों द्वारा सार्वजनिक अवकाश के रूप में मनाया जाए।
मुख्य कारण:
यह दिवस संयुक्त राष्ट्र चार्टर के लागू होने की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।
शुरुआत:
1947 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसे संयुक्त राष्ट्र के चार्टर की वर्षगांठ के रूप में घोषित किया।
अंतर्राष्ट्रीय अवकाश:
1971 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसे एक अंतर्राष्ट्रीय अवकाश के रूप में घोषित किया और सदस्य देशों से इसे सार्वजनिक अवकाश के रूप में मनाने की सिफारिश की।
संयुक्त राष्ट्र दिवस -
संयुक्त राष्ट्र दिवस एक वार्षिक स्मारक दिवस है, जो 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र के आधिकारिक निर्माण को दर्शाता है।
1947 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 24 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र के चार्टर की वर्षगांठ के रूप में घोषित किया, जिसका उद्देश्य "
संयुक्त राष्ट्र दिवस
24 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र दिवस, 1945 में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के लागू होने की वर्षगांठ का प्रतीक है।
24 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र दिवस मनाना ! #UN70 - संयुक्त राष्ट्र
Translated — 1948 से 24 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। 1971 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सिफारिश की कि इस दिन को सदस्य राज्यों द्वारा सार्वजनिक अवकाश के रूप में मनाया जाए।
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एड गुरु पीयूष पांडे का गुरुवार को निधन हो गया। 70 साल की उम्र में मुंबई में उन्होंने अंतिम सांस ली। पीयूष ने 'अबकी बार मोदी सरकार' नारा लिखा था। इसके अलावा, 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' गाना लिखा था।
"भारतीय विज्ञापन को भारत की झलक दिखानी चाहिए, सिर्फ पश्चिम की नकल नहीं।” - पीयूष पांडे के इस कथन ने भारत की विज्ञापन दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया।
दो बूंद ज़िंदगी की’, ‘ठंडा मतलब…’ और ‘दम लगा के हइसा’ जैसी यादगार लाइनों के जनक, भारतीय विज्ञापन जगत के दिग्गज पीयूष पांडे का 70 साल की उम्र में निधन हो गया।
जयपुर के घर में हिन्दी और कला से घिरे बचपन, दिल्ली के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज में आर्ट्स की पढ़ाई और फिर मुंबई में ओगिल्वी इंडिया तक का उनका सफ़र प्रेरणादायक रहा। उनके घर का माहौल ही क्रिएटिविटी से भरा था—पिता की सुरीली आवाज़, माँ की किताबें और बहनों के साथ रेडियो जिंगल्स।
फ़ेविकोल, कैडबरीज़, लूना, SBI लाइफ़… उनके विज्ञापन सिर्फ़ प्रोडक्ट नहीं, बल्कि लोगों के दिलों तक पहुँचने वाली कहानियाँ थे। बच्चों जैसा उत्साह, जिंदगी के छोटे अनुभव और मज़ेदार वन लाइनर्स उनकी हर रचना में झलकते थे।
उनकी बहन ने लिखा, "हमारे प्रिय भाई, पीयूष पांडे – आज सुबह इस दुनिया को अलविदा कह गए। वह सिर्फ़ भारतीय विज्ञापन जगत के सितारे नहीं थे, बल्कि उन लाखों दिलों में चमकते रहेंगे, जिन्हें उनकी संवेदनशील लाइनों ने छू लिया था।"
पीयूष पांडे ने साबित किया कि क्रिएटिविटी सिर्फ़ काम नहीं, बल्कि जिंदगी का अंदाज़ होती है। उनके शब्द, उनके विज्ञापन और उनकी मुस्कान हमेशा हमारे साथ रहेंगे।
दो बूंद ज़िंदगी की’, ‘ठंडा मतलब…’ और ‘दम लगा के हइसा’ जैसी यादगार लाइनों के जनक, भारतीय विज्ञापन जगत के दिग्गज पीयूष पांडे का 70 साल की उम्र में निधन हो गया।
जयपुर के घर में हिन्दी और कला से घिरे बचपन, दिल्ली के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज में आर्ट्स की पढ़ाई और फिर मुंबई में ओगिल्वी इंडिया तक का उनका सफ़र प्रेरणादायक रहा। उनके घर का माहौल ही क्रिएटिविटी से भरा था—पिता की सुरीली आवाज़, माँ की किताबें और बहनों के साथ रेडियो जिंगल्स।
फ़ेविकोल, कैडबरीज़, लूना, SBI लाइफ़… उनके विज्ञापन सिर्फ़ प्रोडक्ट नहीं, बल्कि लोगों के दिलों तक पहुँचने वाली कहानियाँ थे। बच्चों जैसा उत्साह, जिंदगी के छोटे अनुभव और मज़ेदार वन लाइनर्स उनकी हर रचना में झलकते थे।
उनकी बहन ने लिखा, "हमारे प्रिय भाई, पीयूष पांडे – आज सुबह इस दुनिया को अलविदा कह गए। वह सिर्फ़ भारतीय विज्ञापन जगत के सितारे नहीं थे, बल्कि उन लाखों दिलों में चमकते रहेंगे, जिन्हें उनकी संवेदनशील लाइनों ने छू लिया था।"
पीयूष पांडे ने साबित किया कि क्रिएटिविटी सिर्फ़ काम नहीं, बल्कि जिंदगी का अंदाज़ होती है। उनके शब्द, उनके विज्ञापन और उनकी मुस्कान हमेशा हमारे साथ रहेंगे।
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"सुप्रभात 🌞 🙏
अंधकार नाम की कोई चीज़ नहीं होती,
यह तो केवल प्रकाश की अनुपस्थिति है।
इसी तरह,
समस्या नाम की कोई चीज़ नहीं होती,
यह तो केवल समाधान खोजने के विचार की अनुपस्थिति है।" ☝️
😊😇
अंधकार नाम की कोई चीज़ नहीं होती,
यह तो केवल प्रकाश की अनुपस्थिति है।
इसी तरह,
समस्या नाम की कोई चीज़ नहीं होती,
यह तो केवल समाधान खोजने के विचार की अनुपस्थिति है।" ☝️
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