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Photo from Harish Rathore
हर युग का राजा कहता है — “मैं तुम्हारे लिए आया हूँ”
और जनता हर बार सोचती है — बस थोड़ी देर के लिए ही सही!

मैं बात कर रहा हूँ 1911 में राजा आए थे की — जी हाँ, 1911 की विश्वविद्यालयी सुबह, ताज सिर पर, ऐश्वर्य रेख पर और मुस्कान ओढ़े भारत की धरा पर उतरे। नाम दिया गया था शाही राजकीय स्वागत का, और पाव-पुत्रों का राजकीय सम्मान था। झुककर स्वागत के लिए लाइन में जगह मिली तो सही।

राजा के स्वागत के लिए दिल्ली का चेहरा ऐसा दिखा कि यमुना भी शर्मा जाए।
अधिकारी तो गाड़ियों से उतर-उतर कर सड़क, नालों, दीवारों को सजा रहे थे। झुग्गियों को बाँस की दीवारों से ढँक दिया गया था, ताकि गरीबी भी शाही परेड में शर्म न करे।
एक अधिकारी ने तो आदेश दिया — “जहाँ से महाराज का काफिला गुज़रेगा, वहाँ से सच्चाई छिपा दो।”

पर उन अधिकारियों को क्या पता, घपलेबाज़ी में राजा जॉर्ज पंचम तो बादशाह हैं। फिर भी अधिकारी ने कहा — “राजा की जहाँ तक नज़र पड़े, वहीं तक सब अच्छा कर दो।” क्योंकि अधिकारियों को भी पता था — वो अपने दम पर थोड़े न अधिकारी बने हैं, उन्हें तो राजा ने बनाया है।

मुझे वाकया याद है — भव्य दरबार में कवि टैगोर नहीं थे।
हाँ, बाकी कई कवि तो झूठा चाटने के दिन से कतार में लगे रहे होंगे — क्या पता!
पर टैगोर जी ने लिखा —
“यह सजावट गुलामी का ढाँचा है।”

वहीं गुप्त जी भी कहाँ पीछे रहने वाले थे — उन्होंने भी कह दिया —
“हम स्वागत में जाएँगे और कमरे में पीछे छूट जाएँगे।”

पर सब जानते थे — जनता तो ताली बजाती रहेगी,
और नहीं तो पाव-पुत्र तो ताली बजवा ही देंगे।
शायद उन्हें लगता होगा कि ताली बजाने को ही विकास कहते हैं,
तभी तो कवि कहते हैं —
“भारत का सबसे पुराना हथियार है — ताली बजाना और हाथ जोड़ना।”

अब जब जॉर्ज पंचम आए तो ताजपोशी तो पहले से ही थी।
तो किसी ने उन्हें “देवता” कहा, तो किसी ने “विकासपुरुष” का नाम दिया।
अब देवता आ रहे हों तो दिल्ली को सजाया कैसे न जाए — यह तो तौहीन होती।
तो फिर क्या था — पाव-पुत्र लग गए राजधानी में — झंडे, डंडे, नारे, फूल-मालाएँ और न जाने क्या-क्या सब लगा दिए।
कुछ ने तो पत्नी के कंगन बेचकर सजावट में पैसे लगा दिए — भला राजा आए थे तो इतना तो बनता ही था।

ऐसा लग रहा था मानो राजा कह रहे हों —
“गुलाब, ख़्वाब, ज़हर, जाम क्या-क्या है,
मैं आ गया तेरे शहर, बता इंतज़ाम क्या-क्या है!”

अब जॉर्ज पंचम आए तो कुछ नई घोषणाएँ होना तो बनता था।
तो फिर क्या — आम या खास — सब गुलाम ही थे।
तब कवि ने मस्त अंदाज़ में कहा था —
“भारत की धरती पर हर राजा का पुनर्जन्म होता है —
नया नाम, नया वस्त्र, नया मंच, और हाथ की कला से जादू दिखाने की कोशिश।”

बस वैसा ही था जॉर्ज पंचम का मिलना और आना।
इतना होने के बाद टैगोर और गुप्त कहाँ शांत बैठते?
टैगोर ने कह दिया — “हम अपनी आत्मा को सजावट में खो चुके हैं।”
तो गुप्त ने लिखा — “स्वागत की तैयारी में हमने कमरा गिरवी रख दिया।”

यह बौखलाहट इसलिए भी हुई क्योंकि पत्रकारिता पर कई प्रतिबंध और डर के बावजूद, पत्रकारों की नैतिकता जीवित थी।
तब के समाचार में छपा —
“हम भारतीय जिस दिन सबसे ज़्यादा खुशमिज़ाज होते हैं,
उसी दिन सबसे ज़्यादा मौन होते हैं।”

तो दूसरी पंक्ति में लिखा गया —
“यह दरबार नहीं, अस्मिता का उपहार है —
जहाँ हमने अपने प्रश्न गिरवी रख दिए हैं।”

तब बड़े ही मज़ाकिया अंदाज़ में लिखा गया —
“जनता हमेशा स्वागत में विश्वास रखती है, परिवर्तन में नहीं!”

अब जॉर्ज पंचम ने दरबार में घोषणा की —
“भारत की राजधानी अब दिल्ली होगी।”
सब तालियाँ, ढोल-नगाड़े बजाने लगे।
पर आज़ादी तक किसी ने यह नहीं पूछा कि राजधानी क्यों बदली गई।
हाँ, कुछ पत्तलछाट लोगों ने अपनी-अपनी व्याख्या दी, पर वह नाकाफी थी।
जनता के मन में एक प्रश्न हमेशा के लिए बैठ गया —
राजा तो चले गए, पर उन्होंने जो मिट्टी देखी,
उसमें से कभी अपनी आँखों से भारत को नहीं देखा, और न ही देख पाएँगे।

शायद यह वाक्य भारतीय मानस का स्थायी चरित्र बन गया।

ख़ैर, शाही दरबार तो चला गया, देश आज़ाद हो गया,
और हमने राहत की साँस ली —
कहा, “अब कोई दरबार नहीं रहेगा, कोई सम्राट नहीं रहेगा, कोई तानाशाही नहीं चलेगी —
बस सेवक और जनता का नाता रहेगा।”

अब राजा नहीं होगा — अब जनता ही सेवक चुनेगी,
जो जनता के अनुरूप, जनता की इच्छा और आदेश पर काम करेगी।

पर दरबार में जो हुआ — हुआ;
दरबार खत्म हो गया, फूल मुरझा गए,
राजा चला गया, और दिल्ली फिर उसी कूड़े में लौट आई —
ज़िन्दगी वैसी ही रह गई।

यह बात तो आज़ादी के पहले की थी,
पर अब तो जनता का शासन है — जनता ही राजा है, जनता ही सर्वोपरि है।
और नेता तो सेवक हैं — जो “जनता देंगे, वही खाएँगे” —
शायद ऐसा ही लिखा होगा किताबों में!
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अब तो नेता आते हैं सार्वजनिक वाहनों में, हेलीकॉप्टरों में to
जनता घूमती है. सड़कों पर — पशु, कीचड़ और गड्ढों में नेता पर जनता के लिए गुलाब के फूल बिछाए जाते हैं।

अब लोकतंत्र आयोजन पर नहीं, तमाशे और झाँकियों पर kahan टिका है।
चारों तरफ विकास की गंगा बहा दी गई है,
यमुना को “बिसलेरी के पानी” जैसा बना दिया गया है।

अब तो गाँव-शहर “स्मार्ट” हो गए हैं,
इतने कि पकड़-पकड़कर नौकरी देनी पड़ रही है —
कोई बेरोज़गार ही नहीं!

और होगी भी kyun nahi? जनता राजा है!
अब तो तिहार से घर लौटते समय ट्रेन-बस में शाही सीट लगाई जाती है,
कोई “टॉयलेट सीट” में थोड़ी न बैठकर आता है —
क्योंकि जनता राजा है।

अब जनता सिर्फ ताली बजाने और हाथ जोड़ने वाली थोड़ी न है —
वो तो राजा बन गई है।
अब तो नेता जो सेवक हैं, उन्हें माता-पिता थोड़े पैदा करते हैं —
वो तो अवतरित होते हैं, या भगवान के दूत होते हैं!

आज़ादी के बाद ऐसा लग रहा है — इन 75 वर्षों के बाद —
कि इतना विकास हम kar liye कि कहीं ऐसा न हो जाए
कि अमेरिका-यूरोप वाले हमारे घरों में नौकर-चाकर बनने न आ जाएँ!
फिर हम जब चाहें, तब बेड़ियाँ बाँधकर
उन्हें उनके देश वापस भगा दें।

कोई विदेशी टैक्सी चलाने दिल्ली या रायपुर आए,
पढ़ने-पढ़ाने हमारे “विश्वगुरु” विश्वविद्यालयों में
लाइन लगाकर वर्षों तक इंतज़ार करे!

ख़ैर, अत्यंत खुशी है,
पर हर भारतीय के मन में एक ही बात है —
राजा आए थे तब भी जनता मूर्ख बनी थी,
राजा अब भी आए हैं — फर्क बस इतना है —
तब ताज चमक रहा था, अब टेलीप्रॉम्प्टर।

— ✍️ मुरली एम. देवांगन
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