Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️ (A B)
भारत में कम्युनिस्ट पार्टी –
1920 — ताशकंद: एम. एन. रॉय और अन्य भारतीय क्रांतिकारियों से जुड़े समूह ने कम्युनिस्ट संगठन बनाया।
1923 — लेबर किसान पार्टी: एम. सिंगारवेलु चेट्टियार ने मद्रास में इसकी स्थापना की और मई दिवस आयोजन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1925 — CPI का स्थापना सम्मेलन: 26 दिसंबर को कानपुर में आयोजित हुआ। अध्यक्ष एम. सिंगारवेलु चेट्टियार थे।
1929 — मेरठ षड्यंत्र मुकदमा: एस. ए. डांगे और मुजफ्फर अहमद सहित कम्युनिस्ट नेताओं पर मुकदमा चला; फैसला 1933 में आया।
1936 — अखिल भारतीय किसान सभा: लखनऊ में स्थापना हुई। स्वामी सहजानंद सरस्वती प्रथम अध्यक्ष बने।
1942 — भारत छोड़ो आंदोलन: CPI ने द्वितीय विश्वयुद्ध को फासीवाद-विरोधी ‘जनयुद्ध’ मानते हुए आंदोलन से अलग रुख अपनाया।
1943 — पहली पार्टी कांग्रेस: बंबई में आयोजित हुई। पी. सी. जोशी महासचिव बने रहे।
1946 — तेलंगाना किसान संघर्ष: हैदराबाद रियासत में शुरू हुआ; कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की प्रमुख भूमिका रही।
1948 — दूसरी पार्टी कांग्रेस: कलकत्ता में आयोजित हुई। बी. टी. रणदिवे महासचिव बने।
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1920 — ताशकंद: एम. एन. रॉय और अन्य भारतीय क्रांतिकारियों से जुड़े समूह ने कम्युनिस्ट संगठन बनाया।
1923 — लेबर किसान पार्टी: एम. सिंगारवेलु चेट्टियार ने मद्रास में इसकी स्थापना की और मई दिवस आयोजन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1925 — CPI का स्थापना सम्मेलन: 26 दिसंबर को कानपुर में आयोजित हुआ। अध्यक्ष एम. सिंगारवेलु चेट्टियार थे।
1929 — मेरठ षड्यंत्र मुकदमा: एस. ए. डांगे और मुजफ्फर अहमद सहित कम्युनिस्ट नेताओं पर मुकदमा चला; फैसला 1933 में आया।
1936 — अखिल भारतीय किसान सभा: लखनऊ में स्थापना हुई। स्वामी सहजानंद सरस्वती प्रथम अध्यक्ष बने।
1942 — भारत छोड़ो आंदोलन: CPI ने द्वितीय विश्वयुद्ध को फासीवाद-विरोधी ‘जनयुद्ध’ मानते हुए आंदोलन से अलग रुख अपनाया।
1943 — पहली पार्टी कांग्रेस: बंबई में आयोजित हुई। पी. सी. जोशी महासचिव बने रहे।
1946 — तेलंगाना किसान संघर्ष: हैदराबाद रियासत में शुरू हुआ; कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की प्रमुख भूमिका रही।
1948 — दूसरी पार्टी कांग्रेस: कलकत्ता में आयोजित हुई। बी. टी. रणदिवे महासचिव बने।
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शहीद श्री राजाराम मेघवाल स्मृति स्थल मेहरानगढ़ किला जोधपुर,राजस्थान।
किले की नींव में अपनी स्वेच्छा से जीवित.... बलिदान दिया।💐
किला राव जोधा द्वारा निर्मित ।
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किले की नींव में अपनी स्वेच्छा से जीवित.... बलिदान दिया।💐
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कुंभलगढ़ दुर्ग (राजस्थान )- भैरव मुनि नामक संत ने स्वेच्छा से नरबलि दी थी। जहां उनका सिर गिरा .....💐
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कुंभलगढ़ दुर्ग (राजस्थान )- भैरव मुनि नामक संत ने स्वेच्छा से नरबलि दी थी। जहां उनका सिर गिरा .....💐
जहां भैरव मुनि का धड़ गिरा💐
Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️ (A B)
प्रभाती दास गुप्ता 1928 में कलकत्ता में मैला ढोने वालों की हड़ताल के एक प्रमुख नेता थे।
वह एक प्रगतिशील राष्ट्रवादी और कम्युनिस्ट थीं, जो सामाजिक न्याय के लिए गहराई से प्रतिबद्ध थीं।
जर्मनी में फ्रैंकफर्ट विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने वाली वह एक उच्च शिक्षित महिला भी थीं।
कलकत्ता के मैला ढोने वाले सामाजिक सीढ़ी के सबसे निचले पायदान पर थे।
उन्हें अछूत माना जाता था और उनके साथ भेदभाव और दुर्व्यवहार किया जाता था।
उन्हें कम वेतन भी मिलता था और उनके पास नौकरी की कोई सुरक्षा नहीं थी।
1928 में, कलकत्ता के मैला ढोने वाले बेहतर वेतन, काम करने की स्थिति और आवास की मांग को लेकर हड़ताल पर चले गए।
हड़ताल का नेतृत्व प्रभाती दास गुप्ता और अन्य कम्युनिस्ट नेताओं ने किया था।
हड़ताल कई महीनों तक चली और अंततः कर्मचारियों की कुछ मांगों को प्राप्त करने में सफल रही।
हड़ताल का नेतृत्व करने में उनकी भूमिका के लिए, प्रभाती दास गुप्ता को "धंगरमा" (मैला ढोने वालों की माँ) की उपाधि दी गई।
वह मजदूर वर्ग की सच्ची चैंपियन थीं और उनकी विरासत आज भी लोगों को प्रेरित करती है।
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वह एक प्रगतिशील राष्ट्रवादी और कम्युनिस्ट थीं, जो सामाजिक न्याय के लिए गहराई से प्रतिबद्ध थीं।
जर्मनी में फ्रैंकफर्ट विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने वाली वह एक उच्च शिक्षित महिला भी थीं।
कलकत्ता के मैला ढोने वाले सामाजिक सीढ़ी के सबसे निचले पायदान पर थे।
उन्हें अछूत माना जाता था और उनके साथ भेदभाव और दुर्व्यवहार किया जाता था।
उन्हें कम वेतन भी मिलता था और उनके पास नौकरी की कोई सुरक्षा नहीं थी।
1928 में, कलकत्ता के मैला ढोने वाले बेहतर वेतन, काम करने की स्थिति और आवास की मांग को लेकर हड़ताल पर चले गए।
हड़ताल का नेतृत्व प्रभाती दास गुप्ता और अन्य कम्युनिस्ट नेताओं ने किया था।
हड़ताल कई महीनों तक चली और अंततः कर्मचारियों की कुछ मांगों को प्राप्त करने में सफल रही।
हड़ताल का नेतृत्व करने में उनकी भूमिका के लिए, प्रभाती दास गुप्ता को "धंगरमा" (मैला ढोने वालों की माँ) की उपाधि दी गई।
वह मजदूर वर्ग की सच्ची चैंपियन थीं और उनकी विरासत आज भी लोगों को प्रेरित करती है।
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
इस भजन की पंक्तियों में गांधी जी द्वारा बदलाव किया गया था, इसका मूलरूप 👇
’रघुपति राघव राजाराम |
पतित पावन सीताराम ॥
सुंदर विग्रह मेघश्याम |
गंगा तुलसी शालग्राम ॥
प्राथना सभा में कुरान का भी पाठ होता था लेकिन बाद में इसको पढ़ने से आपत्ति जताई गई📖✍️
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’रघुपति राघव राजाराम |
पतित पावन सीताराम ॥
सुंदर विग्रह मेघश्याम |
गंगा तुलसी शालग्राम ॥
प्राथना सभा में कुरान का भी पाठ होता था लेकिन बाद में इसको पढ़ने से आपत्ति जताई गई📖✍️
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
भारत के संविधान से जुड़े तथ्य–
1924 →संविधान सभा का विचार पहली बार स्वराज पार्टी द्वारा दिया गया था।
1934 →संविधान सभा के गठन का विचार एम.एन.रॉय द्वारा रखा गया था।
1935 →भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस द्वारा पहली बार भारत के संविधान के निर्माण हेतु आधिकारिक रूप से संविधान सभा के गठन की माँग की गयी।
1940 →इस माँग को अंततः ब्रिटिश सरकार ने सैद्धान्तिक रूप से स्वीकार कर लिया। इसे ‘अगस्त प्रस्ताव’ (August Offer)के नाम से जाना जाता है।
1942 →क्रिप्स के संविधान के प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया।
1946 → ‘कैबिनेट मिशन योजना’ (Cabinet Mission Plan-CMP) को सभी दलों द्वारा स्वीकार किया गया। इसके सदस्य लॉर्ड पैट्रिक लॉरेंस, सर स्टैफ़ोर्ड क्रिप्स और ए. वी. एलेक्जेंडर थे। कैबिनेट मिशन ने द्वि-राष्ट्र एवं दो संविधान सभा की माँग को अस्वीकार कर दिया।
संविधान सभा का गठन
कैबिनेट मिशन योजना के आधार पर नवंबर 1946 में संविधान सभा का गठन हुआ।
सीटों का बँटवारा जनसंख्या के आधार पर किया गया।
ब्रिटिश प्रान्तों से संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली एवं एकल संक्रमणीय मत पद्धति के आधार पर हुआ।
संविधान सभा का गठन अंशतः निर्वाचित(ब्रिटिश प्रान्तों) एवं नामित सदस्यों(रियासतों के प्रमुखों द्वारा) द्वारा किया गया था।
ब्रिटिश प्रान्तों से संविधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन वहाँ की विधायिका से हुआ था।
महात्मा गाँधी संविधान सभा का हिस्सा नहीं थे।
देशी रियासतों को आवंटित 93 सीटें नहीं भर पायीं थीं, क्योंकि उन्होंने संविधान सभा से अलग रहने का फैसला किया था।
संविधान सभा की कार्यवाही
9 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक आयोजित हुई (मुस्लिम लीग ने बैठक का बहिष्कार किया) ।
वरिष्ठतम सदस्य डॉ. सचिदानंद सिन्हा को संविधान सभा का अस्थाई अध्यक्ष चुना गया। अस्थाई अध्यक्ष की नियुक्ति फ्रेंच परम्परा के अनुसार की गई थी।
बाद में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थाई अध्यक्ष चुना गया।
उपाध्यक्ष (दो)→ एच.सी. मुखर्जी और वी.टी. कृष्णामाचारी।
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1924 →संविधान सभा का विचार पहली बार स्वराज पार्टी द्वारा दिया गया था।
1934 →संविधान सभा के गठन का विचार एम.एन.रॉय द्वारा रखा गया था।
1935 →भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस द्वारा पहली बार भारत के संविधान के निर्माण हेतु आधिकारिक रूप से संविधान सभा के गठन की माँग की गयी।
1940 →इस माँग को अंततः ब्रिटिश सरकार ने सैद्धान्तिक रूप से स्वीकार कर लिया। इसे ‘अगस्त प्रस्ताव’ (August Offer)के नाम से जाना जाता है।
1942 →क्रिप्स के संविधान के प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया।
1946 → ‘कैबिनेट मिशन योजना’ (Cabinet Mission Plan-CMP) को सभी दलों द्वारा स्वीकार किया गया। इसके सदस्य लॉर्ड पैट्रिक लॉरेंस, सर स्टैफ़ोर्ड क्रिप्स और ए. वी. एलेक्जेंडर थे। कैबिनेट मिशन ने द्वि-राष्ट्र एवं दो संविधान सभा की माँग को अस्वीकार कर दिया।
संविधान सभा का गठन
कैबिनेट मिशन योजना के आधार पर नवंबर 1946 में संविधान सभा का गठन हुआ।
सीटों का बँटवारा जनसंख्या के आधार पर किया गया।
ब्रिटिश प्रान्तों से संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली एवं एकल संक्रमणीय मत पद्धति के आधार पर हुआ।
संविधान सभा का गठन अंशतः निर्वाचित(ब्रिटिश प्रान्तों) एवं नामित सदस्यों(रियासतों के प्रमुखों द्वारा) द्वारा किया गया था।
ब्रिटिश प्रान्तों से संविधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन वहाँ की विधायिका से हुआ था।
महात्मा गाँधी संविधान सभा का हिस्सा नहीं थे।
देशी रियासतों को आवंटित 93 सीटें नहीं भर पायीं थीं, क्योंकि उन्होंने संविधान सभा से अलग रहने का फैसला किया था।
संविधान सभा की कार्यवाही
9 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा की पहली बैठक आयोजित हुई (मुस्लिम लीग ने बैठक का बहिष्कार किया) ।
वरिष्ठतम सदस्य डॉ. सचिदानंद सिन्हा को संविधान सभा का अस्थाई अध्यक्ष चुना गया। अस्थाई अध्यक्ष की नियुक्ति फ्रेंच परम्परा के अनुसार की गई थी।
बाद में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थाई अध्यक्ष चुना गया।
उपाध्यक्ष (दो)→ एच.सी. मुखर्जी और वी.टी. कृष्णामाचारी।
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
संविधान निर्माण से जुड़े तथ्य–
उद्देश्य प्रस्ताव
जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा के ऐतिहासिक प्रस्ताव को प्रस्तुत किया था।
इसमें संवैधानिक संरचना के मूल तत्व और दर्शन निहित थे।
इस प्रस्ताव को 22 जनवरी, 1947 को संविधान सभा द्वारा स्वीकार किया गया था।
वर्तमान में भारतीय संविधान की उद्देशिका(Preamble), इसी उद्देश्य प्रस्ताव का संशोधित रूप है।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के अनुसार परिवर्तन
देशी रियासतों और बचे हुए मुस्लिम लीग (इंडियन डोमिनियन से) के सदस्य धीरे-धीरे संविधान सभा से जुड़ने लगे।
3 जून, 1947 को माउंटबेटन योजना (Mountbatten plan) को स्वीकृति मिली (यह योजना भारत के विभाजन हेतु थी) ।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ने संविधान सभा की स्थिति में दो बदलाव किए –
संविधान सभा एक संप्रभु संस्था बन गयी, जो स्वेच्छा से संविधान का निर्माण कर सकती थी।
संविधान सभा को दो प्रकार का कार्यों सौंपा गया (दोनों कार्यों को अलग-अलग रूप से करना था) → भारत के लिए आम कानून का निर्माण व उन्हें लागू करना (जी.वी. मावलंकर की अध्यक्षता में) और स्वतंत्र भारत के लिए संविधान का निर्माण करना (डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में); ये 26 नवंबर, 1949 तक जारी रहे।
संविधान सभा से मुस्लिम लीग के सदस्य अलग हो गए थे। इसलिए संविधान सभा की सदस्य संख्या 389 से घटकर 299 रह गयी।
संविधान सभा के अन्य कार्य
मई, 1949 → राष्ट्रमंडल में भारत की सदस्यता की पुष्टि।
22 जुलाई, 1947 → राष्ट्रीय ध्वज को अपनाया गया।
24 जनवरी, 1950 → राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान को अपनाया गया।
24 जनवरी, 1950 → डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में चुना गया।
24 जनवरी, 1950 → संविधान सभा की अंतिम बैठक हुई। हालांकि इस संविधान सभा ने ही यह 26 जनवरी,1950 से लेकर आम चुनावों के बाद नयी संसद के गठन(मई, 1952) तक अन्तरिम संसद के रूप में कार्य किया।
कुल सत्र – 11
कुल समय – 2 वर्ष, 11 महीने, 18 दिन
मुख्य समितियाँ–
संघ शक्ति समिति / संघ संविधान समिति / राज्य समिति (राज्यों से समझौते हेतु) →जवाहरलाल नेहरू
प्रक्रिया नियम समिति / संचालन समिति → डॉ. राजेंद्र प्रसाद
प्रांतीय संविधान समिति → सरदार पटेल
प्रारूप समिति → डॉ. बी.आर. अम्बेडकर
मूल अधिकारों, अल्पसंख्यकों और जनजातियों और बहिष्कृत क्षेत्रों हेतु परामर्शी समिति → सरदार पटेल
संविधान सभा की सभी समितियों में प्रारूप समिति सबसे महत्वपूर्ण थी। इसका गठन 29 अगस्त, 1947 को किया गया था। इसमें 7 सदस्य शामिल थे।
संविधान का प्रभाव में आना
संविधान के प्रारूप के प्रत्येक प्रावधान(clause by clause) पर चर्चा के बाद इसे 26 नवंबर, 1949 को अपनाया गया। उस समय इसमें उद्देशिका, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां शामिल थीं।
संविधान के पूर्ण रूप से अधिनियमित होने के बाद उसके उद्देशिका को लागू किया गया था।
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उद्देश्य प्रस्ताव
जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा के ऐतिहासिक प्रस्ताव को प्रस्तुत किया था।
इसमें संवैधानिक संरचना के मूल तत्व और दर्शन निहित थे।
इस प्रस्ताव को 22 जनवरी, 1947 को संविधान सभा द्वारा स्वीकार किया गया था।
वर्तमान में भारतीय संविधान की उद्देशिका(Preamble), इसी उद्देश्य प्रस्ताव का संशोधित रूप है।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के अनुसार परिवर्तन
देशी रियासतों और बचे हुए मुस्लिम लीग (इंडियन डोमिनियन से) के सदस्य धीरे-धीरे संविधान सभा से जुड़ने लगे।
3 जून, 1947 को माउंटबेटन योजना (Mountbatten plan) को स्वीकृति मिली (यह योजना भारत के विभाजन हेतु थी) ।
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 ने संविधान सभा की स्थिति में दो बदलाव किए –
संविधान सभा एक संप्रभु संस्था बन गयी, जो स्वेच्छा से संविधान का निर्माण कर सकती थी।
संविधान सभा को दो प्रकार का कार्यों सौंपा गया (दोनों कार्यों को अलग-अलग रूप से करना था) → भारत के लिए आम कानून का निर्माण व उन्हें लागू करना (जी.वी. मावलंकर की अध्यक्षता में) और स्वतंत्र भारत के लिए संविधान का निर्माण करना (डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में); ये 26 नवंबर, 1949 तक जारी रहे।
संविधान सभा से मुस्लिम लीग के सदस्य अलग हो गए थे। इसलिए संविधान सभा की सदस्य संख्या 389 से घटकर 299 रह गयी।
संविधान सभा के अन्य कार्य
मई, 1949 → राष्ट्रमंडल में भारत की सदस्यता की पुष्टि।
22 जुलाई, 1947 → राष्ट्रीय ध्वज को अपनाया गया।
24 जनवरी, 1950 → राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान को अपनाया गया।
24 जनवरी, 1950 → डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत के पहले राष्ट्रपति के रूप में चुना गया।
24 जनवरी, 1950 → संविधान सभा की अंतिम बैठक हुई। हालांकि इस संविधान सभा ने ही यह 26 जनवरी,1950 से लेकर आम चुनावों के बाद नयी संसद के गठन(मई, 1952) तक अन्तरिम संसद के रूप में कार्य किया।
कुल सत्र – 11
कुल समय – 2 वर्ष, 11 महीने, 18 दिन
मुख्य समितियाँ–
संघ शक्ति समिति / संघ संविधान समिति / राज्य समिति (राज्यों से समझौते हेतु) →जवाहरलाल नेहरू
प्रक्रिया नियम समिति / संचालन समिति → डॉ. राजेंद्र प्रसाद
प्रांतीय संविधान समिति → सरदार पटेल
प्रारूप समिति → डॉ. बी.आर. अम्बेडकर
मूल अधिकारों, अल्पसंख्यकों और जनजातियों और बहिष्कृत क्षेत्रों हेतु परामर्शी समिति → सरदार पटेल
संविधान सभा की सभी समितियों में प्रारूप समिति सबसे महत्वपूर्ण थी। इसका गठन 29 अगस्त, 1947 को किया गया था। इसमें 7 सदस्य शामिल थे।
संविधान का प्रभाव में आना
संविधान के प्रारूप के प्रत्येक प्रावधान(clause by clause) पर चर्चा के बाद इसे 26 नवंबर, 1949 को अपनाया गया। उस समय इसमें उद्देशिका, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां शामिल थीं।
संविधान के पूर्ण रूप से अधिनियमित होने के बाद उसके उद्देशिका को लागू किया गया था।
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