यहाँ टेलीग्राम एडमिन के लिए कुछ प्रमुख नियमावली (Guidelines) दी गई हैं:
📌 मैसेज (Pinned Message): ग्रुप के मुख्य नियमों को हमेशा 'Pin' करके रखें ताकि नए सदस्य उन्हें पढ़ सकें।
विशेष सूचना :-⭐️ पुराने मित्र टेस्ट सीरीज का पोस्ट डाल सकते है...⭐️ चैनल मै कोई भी न्यू एडमिन टेस्ट सीरीज का प्रचार ज्यादा न करे,
टेस्ट सीरीज का मैसेज बार बार डालने से लोग चैनल से लेफ्ट हो जाते है,
बाकी ग्रुप मै आप टेस्ट सीरीज का पोस्ट शेयर कर सकते हो..⭐️
यह नियमावली सिर्फ़ No Document No History चैनल के लिए बनाई गई है...⭐️ 🤩 🍎 ⭐️ कोई भी सदस्य नाराज न होवे,⭐️ यह पोस्ट अन्य ग्रुप मै शेयर करे
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Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (N D)
बहिष्कार ka pahla sujhav
बहिष्कार कार्यक्रम का सुझाव सर्वप्रथम कृष्ण कुमार मित्र की साप्ताहिक पत्रिका संजीवनी में दिया गया था।
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No Document No History pinned «यहाँ टेलीग्राम एडमिन के लिए कुछ प्रमुख नियमावली (Guidelines) दी गई हैं: 1️⃣ सुरक्षा और संयम (Moderation) ⭐️ स्पैम पर नियंत्रण: किसी भी प्रकार के अनचाहे लिंक, विज्ञापन या बार-बार भेजे जाने वाले मैसेज (Spamming) को तुरंत हटाएँ। ⭐️ अभद्र भाषा: गाली-गलौज, व्यक्तिगत…»
No Document No History
यहाँ टेलीग्राम एडमिन के लिए कुछ प्रमुख नियमावली (Guidelines) दी गई हैं: 1️⃣ सुरक्षा और संयम (Moderation) ⭐️ स्पैम पर नियंत्रण: किसी भी प्रकार के अनचाहे लिंक, विज्ञापन या बार-बार भेजे जाने वाले मैसेज (Spamming) को तुरंत हटाएँ। ⭐️ अभद्र भाषा: गाली-गलौज, व्यक्तिगत…
एक ओर नियम जोड़ा जाएं,
जो एडमिन ban करते हैं वहीं एडमिन उस सदस्य को unban कर सकता हैं।
जो एडमिन ban करते हैं वहीं एडमिन उस सदस्य को unban कर सकता हैं।
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
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महात्मा गांधी अगर कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में हस्तक्षेप न करते तो सरदार वल्लभ भाई पटेल स्वतंत्र पहली भारतीय सरकार के अंतरिम प्रधानमंत्री होते.
नेहरू का चुनाव–
देश को 15 अगस्त 1947 को आज़ाद होना था लेकिन उससे एक साल पहले ब्रिटेन ने भारतीय हाथों में सत्ता दे दी थी. अंतरिम सरकार बननी थी.
तय हुआ था कि कांग्रेस का अध्यक्ष ही प्रधानमंत्री बनेगा. उस वक्त कांग्रेस के अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आज़ाद थे. वो पिछले छह साल से इस पद पर थे. अब उनके जाने का वक्त हो गया था.
तब तक गांधी, नेहरू के हाथ में कांग्रेस की कमान देने का मन बना चुके थे. 20 अप्रैल 1946 को उन्होंने मौलाना को पत्र लिखकर कहा कि वे एक वक्तव्य जारी करें कि अब 'वह अध्यक्ष नहीं बने रहना चाहते हैं.'
गांधी ने बिना लागलपेट पर ये भी साफ़ कर दिया कि 'अगर इस बार मुझसे राय मांगी गई तो मैं जवाहरलाल को पसंद करूंगा, इसके कई कारण हैं. उनका मैं ज़िक्र नहीं करना चाहता.' (कलेक्टट वर्क्स खंड 90 पेज 315)
इस पत्र के बाद पूरे कांग्रेस में ख़बर फैल गई कि गांधी नेहरू को प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं. 29 अप्रैल 1946 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी का नया अध्यक्ष चुना जाना था जिसे कुछ महीने बाद ही अंतरिम सरकार में भारत का प्रधानमंत्री बनना था.
इस बैठक में महात्मा गांधी के अलावा नेहरू, सरदार पटेल, आचार्य कृपलानी, राजेंद्र प्रसाद, ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान के साथ कई बड़े कांग्रेसी नेता शामिल थे.
कमरे में बैठा हर शख़्स जानता था कि गांधी नेहरू को अध्यक्ष देखना चाहते हैं.
परपंरा के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव प्रांतीय कांग्रेस कमेटियाँ करती थीं और 15 में से 12 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों ने सरदार पटेल का नाम प्रस्तावित किया था. बची हुई तीन कमेटियों ने आचार्य जेबी कृपलानी और पट्टाभी सीतारमैया का नाम प्रस्तावित किया था.
किसी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने अध्यक्ष पद के लिए नेहरू का नाम प्रस्तावित नहीं किया था जबकि सारी कमेटियाँ अच्छी तरह जानती थी कि गांधी नेहरू को चौथी बार अध्यक्ष बनाना चाहते हैं.
पार्टी के महासचिव कृपलानी ने पीसीसी के चुनाव की पर्ची गांधी की तरफ बढ़ा दी. गांधी ने कृपलानी की तरफ देखा. कृपलानी समझ गए कि गाँधी क्या चाहते हैं. उन्होंने नया प्रस्ताव तैयार कर नेहरू का नाम प्रस्तावित किया. उस पर सबने दस्तख़त किए. पटेल ने भी दस्तख़त किए. अब अध्यक्ष पद के दो उम्मीदवार थे. एक नेहरू और दूसरे पटेल.
नेहरू तभी निर्विरोध अध्यक्ष चुने जा सकते थे जब पटेल अपना नाम वापस लें. कृपलानी ने एक कागज पर उनकी नाम वापसी की अर्जी लिखकर दस्तख़त के लिए पटेल की तरफ बढ़ा दी.
मतलब साफ था-चूंकि गांधी चाहते हैं नेहरू अध्यक्ष बनें इसलिए आप अपना नाम वापस लेने के कागज पर साइन कर दें लेकिन आहत पटेल ने दस्तख़त नहीं किए और उन्होंने ये पुर्जा गांधी की तरफ बढ़ा दिया.
गांधी ने नेहरू की तरफ़ देखा और कहा, ''जवाहर वर्किंग कमेटी के अलावा किसी भी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने तुम्हारा नहीं सुझाया है. तुम्हारा क्या कहना है?''
नेहरू ख़ामोश रहे. वहां बैठे सारे लोग ख़ामोश थे. गांधी को शायद उम्मीद थी कि नेहरू कहेंगे, तो ठीक है आप पटेल को ही मौका दें. लेकिन नेहरू ने ऐसा कुछ नहीं कहा. अब अंतिम फैसला गांधी को करना था.
गांधी ने वो कागज फिर पटेल को लौटा दिया. इस बार सरदार ने उस पर दस्तख़त कर दिए. कृपलानी ने ऐलान किया,''तो नेहरू निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाते हैं.''
कृपलानी ने अपनी किताब 'गांधी हिज़ लाइफ एंड थाटॅ्स' में इस पूरी घटना का विस्तार से ज़िक्र किया है.
उन्होंने लिखा है, ''मेरा इस तरह हस्तक्षेप करना पटेल को अच्छा नहीं लगा. पार्टी का महासचिव होने के नाते में गाँधी की मर्ज़ी का काम यंत्रवत कर रहा था और उस वक्त मुझे ये बहुत बड़ी चीज नहीं लगी. आख़िर ये एक अध्यक्ष का ही तो चुनाव था.''
''मुझे लगा अभी बहुत सी लड़ाइयाँ सामने हैं. लेकिन भविष्य कौन जानता है? मालूम होता है ऐसी तुच्छ घटनाओं से ही किसी व्यक्ति या राष्ट्र की किस्मत पर निर्भर होती है.
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नेहरू का चुनाव–
देश को 15 अगस्त 1947 को आज़ाद होना था लेकिन उससे एक साल पहले ब्रिटेन ने भारतीय हाथों में सत्ता दे दी थी. अंतरिम सरकार बननी थी.
तय हुआ था कि कांग्रेस का अध्यक्ष ही प्रधानमंत्री बनेगा. उस वक्त कांग्रेस के अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आज़ाद थे. वो पिछले छह साल से इस पद पर थे. अब उनके जाने का वक्त हो गया था.
तब तक गांधी, नेहरू के हाथ में कांग्रेस की कमान देने का मन बना चुके थे. 20 अप्रैल 1946 को उन्होंने मौलाना को पत्र लिखकर कहा कि वे एक वक्तव्य जारी करें कि अब 'वह अध्यक्ष नहीं बने रहना चाहते हैं.'
गांधी ने बिना लागलपेट पर ये भी साफ़ कर दिया कि 'अगर इस बार मुझसे राय मांगी गई तो मैं जवाहरलाल को पसंद करूंगा, इसके कई कारण हैं. उनका मैं ज़िक्र नहीं करना चाहता.' (कलेक्टट वर्क्स खंड 90 पेज 315)
इस पत्र के बाद पूरे कांग्रेस में ख़बर फैल गई कि गांधी नेहरू को प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं. 29 अप्रैल 1946 में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी का नया अध्यक्ष चुना जाना था जिसे कुछ महीने बाद ही अंतरिम सरकार में भारत का प्रधानमंत्री बनना था.
इस बैठक में महात्मा गांधी के अलावा नेहरू, सरदार पटेल, आचार्य कृपलानी, राजेंद्र प्रसाद, ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान के साथ कई बड़े कांग्रेसी नेता शामिल थे.
कमरे में बैठा हर शख़्स जानता था कि गांधी नेहरू को अध्यक्ष देखना चाहते हैं.
परपंरा के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव प्रांतीय कांग्रेस कमेटियाँ करती थीं और 15 में से 12 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों ने सरदार पटेल का नाम प्रस्तावित किया था. बची हुई तीन कमेटियों ने आचार्य जेबी कृपलानी और पट्टाभी सीतारमैया का नाम प्रस्तावित किया था.
किसी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने अध्यक्ष पद के लिए नेहरू का नाम प्रस्तावित नहीं किया था जबकि सारी कमेटियाँ अच्छी तरह जानती थी कि गांधी नेहरू को चौथी बार अध्यक्ष बनाना चाहते हैं.
पार्टी के महासचिव कृपलानी ने पीसीसी के चुनाव की पर्ची गांधी की तरफ बढ़ा दी. गांधी ने कृपलानी की तरफ देखा. कृपलानी समझ गए कि गाँधी क्या चाहते हैं. उन्होंने नया प्रस्ताव तैयार कर नेहरू का नाम प्रस्तावित किया. उस पर सबने दस्तख़त किए. पटेल ने भी दस्तख़त किए. अब अध्यक्ष पद के दो उम्मीदवार थे. एक नेहरू और दूसरे पटेल.
नेहरू तभी निर्विरोध अध्यक्ष चुने जा सकते थे जब पटेल अपना नाम वापस लें. कृपलानी ने एक कागज पर उनकी नाम वापसी की अर्जी लिखकर दस्तख़त के लिए पटेल की तरफ बढ़ा दी.
मतलब साफ था-चूंकि गांधी चाहते हैं नेहरू अध्यक्ष बनें इसलिए आप अपना नाम वापस लेने के कागज पर साइन कर दें लेकिन आहत पटेल ने दस्तख़त नहीं किए और उन्होंने ये पुर्जा गांधी की तरफ बढ़ा दिया.
गांधी ने नेहरू की तरफ़ देखा और कहा, ''जवाहर वर्किंग कमेटी के अलावा किसी भी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने तुम्हारा नहीं सुझाया है. तुम्हारा क्या कहना है?''
नेहरू ख़ामोश रहे. वहां बैठे सारे लोग ख़ामोश थे. गांधी को शायद उम्मीद थी कि नेहरू कहेंगे, तो ठीक है आप पटेल को ही मौका दें. लेकिन नेहरू ने ऐसा कुछ नहीं कहा. अब अंतिम फैसला गांधी को करना था.
गांधी ने वो कागज फिर पटेल को लौटा दिया. इस बार सरदार ने उस पर दस्तख़त कर दिए. कृपलानी ने ऐलान किया,''तो नेहरू निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाते हैं.''
कृपलानी ने अपनी किताब 'गांधी हिज़ लाइफ एंड थाटॅ्स' में इस पूरी घटना का विस्तार से ज़िक्र किया है.
उन्होंने लिखा है, ''मेरा इस तरह हस्तक्षेप करना पटेल को अच्छा नहीं लगा. पार्टी का महासचिव होने के नाते में गाँधी की मर्ज़ी का काम यंत्रवत कर रहा था और उस वक्त मुझे ये बहुत बड़ी चीज नहीं लगी. आख़िर ये एक अध्यक्ष का ही तो चुनाव था.''
''मुझे लगा अभी बहुत सी लड़ाइयाँ सामने हैं. लेकिन भविष्य कौन जानता है? मालूम होता है ऐसी तुच्छ घटनाओं से ही किसी व्यक्ति या राष्ट्र की किस्मत पर निर्भर होती है.
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"UP TET और STET का फ़र्ज़ी सिलेबस वायरल हो रहा है"😂 - चयन आयोग
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Forwarded from Tιƙαɱ αɱႦҽԃƙαɾ (History)
महाजनपदयुगीन 300 ईसा.पूर्व -300ई. में राजस्थान से प्राप्त प्रमुख स्थापत्य!
वैराट के विहार, रेड के ईंटों के मकान, बीजक पहाड़ी का गोलाकार मन्दिर, नगरी का गरुड़ स्तम्भ, शिला प्राकार, स्तूप तथा वास्तविक और त्रिरत्न के चिह्न उस समय के स्थापत्य के अवशेष के अच्छे उदाहरण हैं।
https://t.me/tikam_ambedakr00
वैराट के विहार, रेड के ईंटों के मकान, बीजक पहाड़ी का गोलाकार मन्दिर, नगरी का गरुड़ स्तम्भ, शिला प्राकार, स्तूप तथा वास्तविक और त्रिरत्न के चिह्न उस समय के स्थापत्य के अवशेष के अच्छे उदाहरण हैं।
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
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हरिलाल ने इस्लाम धर्म अपनाया–
सीबी दलाल हरिलाल की जीवनी 'हरिलाल गांधी: अ लाइफ़' में हरिलाल की बहू सरस्वती गांधी के हवाले से लिखते हैं, "मेरे ससुर बहुत मज़ाकिया, उदार और मेहमाननवाज़ व्यक्ति थे. वो हमारे साथ छह महीने रहे थे. तब उन्होंने अपने पिता के लिए अपना आख़िरी पत्र बोल कर लिखवाया था, जिसका शीर्षक था 'मेरे पिता के प्रति मेरी शिकायतें.' ये पत्र वो पूरा नहीं कर पाए थे."
अप्रैल 1936 में हरिलाल अपने पिता और माँ कस्तूरबा से नागपुर में मिले थे. तब उन्होंने कारोबार चलाने के लिए गांधी से कुछ पैसों की माँग की थी. गांधी ने पैसे देने से इनकार कर दिया था. हरिलाल इससे इतने नाराज़ हुए कि संभवत: इसी कारण उन्होंने इस्लाम धर्म अपनाने का फ़ैसला कर लिया.
29 मई, 1936 को उन्होंने बंबई (अब मुंबई) की जामा मस्जिद में इस्लाम कबूल करने और नया नाम अब्दुल्लाह रखने की घोषणा की. गांधी को इससे बहुत धक्का लगा, लेकिन सबसे अधिक सदमा उनकी माँ कस्तूरबा को लगा.
हरिलाल ने वापस हिंदू धर्म अपनाया
कस्तूरबा ने हरिलाल की बेटी रामी को पत्र लिख कर कहा, "मैं बहुत नाख़ुश हूँ लेकिन मैं क्या कर सकती हूँ? दरअसल, मैं बहुत शर्मिंदा भी हूँ. हमने अपना एक रत्न खो दिया है. वो रत्न अब मुसलमानों के हाथ में चला गया है." (नीलम पारीख, महात्मा गांधीज़ लास्ट ज्वेल हरिलाल गांधी).
गांधी ने एक सार्वजनिक बयान जारी करके हरिजन के 6 जून, 1936 के अंक में लिखा, "अगर ये धर्मांतरण दिल से हुआ है और किसी सांसारिक सोच के बिना हुआ है तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है. मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उसे अब्दुल्लाह के नाम से जाना जाए या हरिलाल के नाम से. सब मायनों में वो ईश्वर का भक्त है क्योंकि दोनों नामों का अर्थ ईश्वर है."
लेकिन कस्तूरबा ने अपनी निराशा को छिपाने की कोशिश नहीं की.
उन्होंने अपने बेटे को खुला पत्र लिख कर कहा, "मेरे लिए अब जीवित रहना भी बहुत कठिन हो गया है. इस बारे में सोचो कि तुम अपने माता-पिता को उनके जीवन के अंतिम चरण में कितना दुख दे रहे हो. तुम्हारे पिता इस बारे में किसी से कुछ नहीं कहते. लेकिन इस धक्के ने उनके दिल को तार-तार कर दिया है. ईश्वर ने उनको मज़बूत इच्छा शक्ति दी है. लेकिन मैं तो एक कमज़ोर बूढ़ी महिला हूँ और इस मानसिक यातना को बर्दाश्त करने की हालत में नहीं हूँ. तुम्हारे पिता ने तो तुम्हें माफ़ कर दिया है लेकिन ईश्वर तुम्हारे इस काम के लिए तुम्हें कभी माफ़ नहीं करेगा."
लेकिन हरिलाल का धर्मांतरण 'वास्तविक' नहीं था क्योंकि साल ख़त्म होते-होते उन्होंने आर्य समाज रीति से फिर से हिंदू धर्म अपना लिया था और अपना नया नाम रखा था हीरालाल.
'कस्तूरबा माता की जय'
एक बार जब हरिलाल को पता चला कि महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी ट्रेन से कटनी स्टेशन से गुज़र रहे हैं तो हरिलाल अपने माता-पिता की झलक पाने से अपने-आप को नहीं रोक सके.
प्रमोद कपूर लिखते हैं, "हरिलाल कटनी स्टेशन पहुंच गए जहाँ सब लोग महात्मा गांधी की जय-जयकार कर रहे थे. वो अकेले शख़्स थे जो 'कस्तूरबा माता की जय' चिल्ला रहे थे."
अपना नाम सुनकर कस्तूरबा ने उस तरफ़ देखा जहाँ से ये आवाज़ आई थी. वो ये देखकर दंग रह गईं कि वहाँ उनका बेटा खड़ा था.
हरिलाल ने अपनी जेब से एक संतरा निकाला और कहा, 'बा, ये मैं तुम्हारे लिए लाया हूँ.'
ये सुन कर गांधी बोले, 'मेरे लिए भी कुछ लाए हो क्या?'
इस पर हरिलाल ने कहा, 'नहीं ये बा के लिए है.' जैसे ही ट्रेन चली कस्तूरबा ने अपने बेटे के मुँह से सुना, 'बा, इस संतरे को तुम ही खाओगी.'
कस्तूरबा से आख़िरी मुलाक़ात
सन 1944 आते-आते कस्तूरबा की तबीयत बहुत ख़राब हो गई. तब उन्होंने इच्छा प्रकट की कि वो अपने सबसे बड़े बेटे को देखना चाहती हैं.
उनकी मृत्यु से पाँच दिन पहले हरिलाल उन्हें देखने पुणे के आगा ख़ाँ पैलेस पहुंचे. कस्तूरबा की मृत्यु से एक दिन पहले हरिलाल उनको एक बार फिर देखने गए.
उस समय उन्होंने शराब पी रखी थी. उनकी ये हालत देखकर कस्तूरबा बहुत दुखी हुईं. जब उनकी मृत्यु हुई तो हरिलाल वहाँ मौजूद थे.
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सीबी दलाल हरिलाल की जीवनी 'हरिलाल गांधी: अ लाइफ़' में हरिलाल की बहू सरस्वती गांधी के हवाले से लिखते हैं, "मेरे ससुर बहुत मज़ाकिया, उदार और मेहमाननवाज़ व्यक्ति थे. वो हमारे साथ छह महीने रहे थे. तब उन्होंने अपने पिता के लिए अपना आख़िरी पत्र बोल कर लिखवाया था, जिसका शीर्षक था 'मेरे पिता के प्रति मेरी शिकायतें.' ये पत्र वो पूरा नहीं कर पाए थे."
अप्रैल 1936 में हरिलाल अपने पिता और माँ कस्तूरबा से नागपुर में मिले थे. तब उन्होंने कारोबार चलाने के लिए गांधी से कुछ पैसों की माँग की थी. गांधी ने पैसे देने से इनकार कर दिया था. हरिलाल इससे इतने नाराज़ हुए कि संभवत: इसी कारण उन्होंने इस्लाम धर्म अपनाने का फ़ैसला कर लिया.
29 मई, 1936 को उन्होंने बंबई (अब मुंबई) की जामा मस्जिद में इस्लाम कबूल करने और नया नाम अब्दुल्लाह रखने की घोषणा की. गांधी को इससे बहुत धक्का लगा, लेकिन सबसे अधिक सदमा उनकी माँ कस्तूरबा को लगा.
हरिलाल ने वापस हिंदू धर्म अपनाया
कस्तूरबा ने हरिलाल की बेटी रामी को पत्र लिख कर कहा, "मैं बहुत नाख़ुश हूँ लेकिन मैं क्या कर सकती हूँ? दरअसल, मैं बहुत शर्मिंदा भी हूँ. हमने अपना एक रत्न खो दिया है. वो रत्न अब मुसलमानों के हाथ में चला गया है." (नीलम पारीख, महात्मा गांधीज़ लास्ट ज्वेल हरिलाल गांधी).
गांधी ने एक सार्वजनिक बयान जारी करके हरिजन के 6 जून, 1936 के अंक में लिखा, "अगर ये धर्मांतरण दिल से हुआ है और किसी सांसारिक सोच के बिना हुआ है तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है. मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उसे अब्दुल्लाह के नाम से जाना जाए या हरिलाल के नाम से. सब मायनों में वो ईश्वर का भक्त है क्योंकि दोनों नामों का अर्थ ईश्वर है."
लेकिन कस्तूरबा ने अपनी निराशा को छिपाने की कोशिश नहीं की.
उन्होंने अपने बेटे को खुला पत्र लिख कर कहा, "मेरे लिए अब जीवित रहना भी बहुत कठिन हो गया है. इस बारे में सोचो कि तुम अपने माता-पिता को उनके जीवन के अंतिम चरण में कितना दुख दे रहे हो. तुम्हारे पिता इस बारे में किसी से कुछ नहीं कहते. लेकिन इस धक्के ने उनके दिल को तार-तार कर दिया है. ईश्वर ने उनको मज़बूत इच्छा शक्ति दी है. लेकिन मैं तो एक कमज़ोर बूढ़ी महिला हूँ और इस मानसिक यातना को बर्दाश्त करने की हालत में नहीं हूँ. तुम्हारे पिता ने तो तुम्हें माफ़ कर दिया है लेकिन ईश्वर तुम्हारे इस काम के लिए तुम्हें कभी माफ़ नहीं करेगा."
लेकिन हरिलाल का धर्मांतरण 'वास्तविक' नहीं था क्योंकि साल ख़त्म होते-होते उन्होंने आर्य समाज रीति से फिर से हिंदू धर्म अपना लिया था और अपना नया नाम रखा था हीरालाल.
'कस्तूरबा माता की जय'
एक बार जब हरिलाल को पता चला कि महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी ट्रेन से कटनी स्टेशन से गुज़र रहे हैं तो हरिलाल अपने माता-पिता की झलक पाने से अपने-आप को नहीं रोक सके.
प्रमोद कपूर लिखते हैं, "हरिलाल कटनी स्टेशन पहुंच गए जहाँ सब लोग महात्मा गांधी की जय-जयकार कर रहे थे. वो अकेले शख़्स थे जो 'कस्तूरबा माता की जय' चिल्ला रहे थे."
अपना नाम सुनकर कस्तूरबा ने उस तरफ़ देखा जहाँ से ये आवाज़ आई थी. वो ये देखकर दंग रह गईं कि वहाँ उनका बेटा खड़ा था.
हरिलाल ने अपनी जेब से एक संतरा निकाला और कहा, 'बा, ये मैं तुम्हारे लिए लाया हूँ.'
ये सुन कर गांधी बोले, 'मेरे लिए भी कुछ लाए हो क्या?'
इस पर हरिलाल ने कहा, 'नहीं ये बा के लिए है.' जैसे ही ट्रेन चली कस्तूरबा ने अपने बेटे के मुँह से सुना, 'बा, इस संतरे को तुम ही खाओगी.'
कस्तूरबा से आख़िरी मुलाक़ात
सन 1944 आते-आते कस्तूरबा की तबीयत बहुत ख़राब हो गई. तब उन्होंने इच्छा प्रकट की कि वो अपने सबसे बड़े बेटे को देखना चाहती हैं.
उनकी मृत्यु से पाँच दिन पहले हरिलाल उन्हें देखने पुणे के आगा ख़ाँ पैलेस पहुंचे. कस्तूरबा की मृत्यु से एक दिन पहले हरिलाल उनको एक बार फिर देखने गए.
उस समय उन्होंने शराब पी रखी थी. उनकी ये हालत देखकर कस्तूरबा बहुत दुखी हुईं. जब उनकी मृत्यु हुई तो हरिलाल वहाँ मौजूद थे.
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