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"UP TET और STET का फ़र्ज़ी सिलेबस वायरल हो रहा है"😂 - चयन आयोग
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Forwarded from Tιƙαɱ αɱႦҽԃƙαɾ (History)
महाजनपदयुगीन 300 ईसा.पूर्व -300ई. में राजस्थान से प्राप्त प्रमुख स्थापत्य!
वैराट के विहार, रेड के ईंटों के मकान, बीजक पहाड़ी का गोलाकार मन्दिर, नगरी का गरुड़ स्तम्भ, शिला प्राकार, स्तूप तथा वास्तविक और त्रिरत्न के चिह्न उस समय के स्थापत्य के अवशेष के अच्छे उदाहरण हैं।
https://t.me/tikam_ambedakr00
वैराट के विहार, रेड के ईंटों के मकान, बीजक पहाड़ी का गोलाकार मन्दिर, नगरी का गरुड़ स्तम्भ, शिला प्राकार, स्तूप तथा वास्तविक और त्रिरत्न के चिह्न उस समय के स्थापत्य के अवशेष के अच्छे उदाहरण हैं।
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
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हरिलाल ने इस्लाम धर्म अपनाया–
सीबी दलाल हरिलाल की जीवनी 'हरिलाल गांधी: अ लाइफ़' में हरिलाल की बहू सरस्वती गांधी के हवाले से लिखते हैं, "मेरे ससुर बहुत मज़ाकिया, उदार और मेहमाननवाज़ व्यक्ति थे. वो हमारे साथ छह महीने रहे थे. तब उन्होंने अपने पिता के लिए अपना आख़िरी पत्र बोल कर लिखवाया था, जिसका शीर्षक था 'मेरे पिता के प्रति मेरी शिकायतें.' ये पत्र वो पूरा नहीं कर पाए थे."
अप्रैल 1936 में हरिलाल अपने पिता और माँ कस्तूरबा से नागपुर में मिले थे. तब उन्होंने कारोबार चलाने के लिए गांधी से कुछ पैसों की माँग की थी. गांधी ने पैसे देने से इनकार कर दिया था. हरिलाल इससे इतने नाराज़ हुए कि संभवत: इसी कारण उन्होंने इस्लाम धर्म अपनाने का फ़ैसला कर लिया.
29 मई, 1936 को उन्होंने बंबई (अब मुंबई) की जामा मस्जिद में इस्लाम कबूल करने और नया नाम अब्दुल्लाह रखने की घोषणा की. गांधी को इससे बहुत धक्का लगा, लेकिन सबसे अधिक सदमा उनकी माँ कस्तूरबा को लगा.
हरिलाल ने वापस हिंदू धर्म अपनाया
कस्तूरबा ने हरिलाल की बेटी रामी को पत्र लिख कर कहा, "मैं बहुत नाख़ुश हूँ लेकिन मैं क्या कर सकती हूँ? दरअसल, मैं बहुत शर्मिंदा भी हूँ. हमने अपना एक रत्न खो दिया है. वो रत्न अब मुसलमानों के हाथ में चला गया है." (नीलम पारीख, महात्मा गांधीज़ लास्ट ज्वेल हरिलाल गांधी).
गांधी ने एक सार्वजनिक बयान जारी करके हरिजन के 6 जून, 1936 के अंक में लिखा, "अगर ये धर्मांतरण दिल से हुआ है और किसी सांसारिक सोच के बिना हुआ है तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है. मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उसे अब्दुल्लाह के नाम से जाना जाए या हरिलाल के नाम से. सब मायनों में वो ईश्वर का भक्त है क्योंकि दोनों नामों का अर्थ ईश्वर है."
लेकिन कस्तूरबा ने अपनी निराशा को छिपाने की कोशिश नहीं की.
उन्होंने अपने बेटे को खुला पत्र लिख कर कहा, "मेरे लिए अब जीवित रहना भी बहुत कठिन हो गया है. इस बारे में सोचो कि तुम अपने माता-पिता को उनके जीवन के अंतिम चरण में कितना दुख दे रहे हो. तुम्हारे पिता इस बारे में किसी से कुछ नहीं कहते. लेकिन इस धक्के ने उनके दिल को तार-तार कर दिया है. ईश्वर ने उनको मज़बूत इच्छा शक्ति दी है. लेकिन मैं तो एक कमज़ोर बूढ़ी महिला हूँ और इस मानसिक यातना को बर्दाश्त करने की हालत में नहीं हूँ. तुम्हारे पिता ने तो तुम्हें माफ़ कर दिया है लेकिन ईश्वर तुम्हारे इस काम के लिए तुम्हें कभी माफ़ नहीं करेगा."
लेकिन हरिलाल का धर्मांतरण 'वास्तविक' नहीं था क्योंकि साल ख़त्म होते-होते उन्होंने आर्य समाज रीति से फिर से हिंदू धर्म अपना लिया था और अपना नया नाम रखा था हीरालाल.
'कस्तूरबा माता की जय'
एक बार जब हरिलाल को पता चला कि महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी ट्रेन से कटनी स्टेशन से गुज़र रहे हैं तो हरिलाल अपने माता-पिता की झलक पाने से अपने-आप को नहीं रोक सके.
प्रमोद कपूर लिखते हैं, "हरिलाल कटनी स्टेशन पहुंच गए जहाँ सब लोग महात्मा गांधी की जय-जयकार कर रहे थे. वो अकेले शख़्स थे जो 'कस्तूरबा माता की जय' चिल्ला रहे थे."
अपना नाम सुनकर कस्तूरबा ने उस तरफ़ देखा जहाँ से ये आवाज़ आई थी. वो ये देखकर दंग रह गईं कि वहाँ उनका बेटा खड़ा था.
हरिलाल ने अपनी जेब से एक संतरा निकाला और कहा, 'बा, ये मैं तुम्हारे लिए लाया हूँ.'
ये सुन कर गांधी बोले, 'मेरे लिए भी कुछ लाए हो क्या?'
इस पर हरिलाल ने कहा, 'नहीं ये बा के लिए है.' जैसे ही ट्रेन चली कस्तूरबा ने अपने बेटे के मुँह से सुना, 'बा, इस संतरे को तुम ही खाओगी.'
कस्तूरबा से आख़िरी मुलाक़ात
सन 1944 आते-आते कस्तूरबा की तबीयत बहुत ख़राब हो गई. तब उन्होंने इच्छा प्रकट की कि वो अपने सबसे बड़े बेटे को देखना चाहती हैं.
उनकी मृत्यु से पाँच दिन पहले हरिलाल उन्हें देखने पुणे के आगा ख़ाँ पैलेस पहुंचे. कस्तूरबा की मृत्यु से एक दिन पहले हरिलाल उनको एक बार फिर देखने गए.
उस समय उन्होंने शराब पी रखी थी. उनकी ये हालत देखकर कस्तूरबा बहुत दुखी हुईं. जब उनकी मृत्यु हुई तो हरिलाल वहाँ मौजूद थे.
https://t.me/historyfact00
सीबी दलाल हरिलाल की जीवनी 'हरिलाल गांधी: अ लाइफ़' में हरिलाल की बहू सरस्वती गांधी के हवाले से लिखते हैं, "मेरे ससुर बहुत मज़ाकिया, उदार और मेहमाननवाज़ व्यक्ति थे. वो हमारे साथ छह महीने रहे थे. तब उन्होंने अपने पिता के लिए अपना आख़िरी पत्र बोल कर लिखवाया था, जिसका शीर्षक था 'मेरे पिता के प्रति मेरी शिकायतें.' ये पत्र वो पूरा नहीं कर पाए थे."
अप्रैल 1936 में हरिलाल अपने पिता और माँ कस्तूरबा से नागपुर में मिले थे. तब उन्होंने कारोबार चलाने के लिए गांधी से कुछ पैसों की माँग की थी. गांधी ने पैसे देने से इनकार कर दिया था. हरिलाल इससे इतने नाराज़ हुए कि संभवत: इसी कारण उन्होंने इस्लाम धर्म अपनाने का फ़ैसला कर लिया.
29 मई, 1936 को उन्होंने बंबई (अब मुंबई) की जामा मस्जिद में इस्लाम कबूल करने और नया नाम अब्दुल्लाह रखने की घोषणा की. गांधी को इससे बहुत धक्का लगा, लेकिन सबसे अधिक सदमा उनकी माँ कस्तूरबा को लगा.
हरिलाल ने वापस हिंदू धर्म अपनाया
कस्तूरबा ने हरिलाल की बेटी रामी को पत्र लिख कर कहा, "मैं बहुत नाख़ुश हूँ लेकिन मैं क्या कर सकती हूँ? दरअसल, मैं बहुत शर्मिंदा भी हूँ. हमने अपना एक रत्न खो दिया है. वो रत्न अब मुसलमानों के हाथ में चला गया है." (नीलम पारीख, महात्मा गांधीज़ लास्ट ज्वेल हरिलाल गांधी).
गांधी ने एक सार्वजनिक बयान जारी करके हरिजन के 6 जून, 1936 के अंक में लिखा, "अगर ये धर्मांतरण दिल से हुआ है और किसी सांसारिक सोच के बिना हुआ है तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है. मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उसे अब्दुल्लाह के नाम से जाना जाए या हरिलाल के नाम से. सब मायनों में वो ईश्वर का भक्त है क्योंकि दोनों नामों का अर्थ ईश्वर है."
लेकिन कस्तूरबा ने अपनी निराशा को छिपाने की कोशिश नहीं की.
उन्होंने अपने बेटे को खुला पत्र लिख कर कहा, "मेरे लिए अब जीवित रहना भी बहुत कठिन हो गया है. इस बारे में सोचो कि तुम अपने माता-पिता को उनके जीवन के अंतिम चरण में कितना दुख दे रहे हो. तुम्हारे पिता इस बारे में किसी से कुछ नहीं कहते. लेकिन इस धक्के ने उनके दिल को तार-तार कर दिया है. ईश्वर ने उनको मज़बूत इच्छा शक्ति दी है. लेकिन मैं तो एक कमज़ोर बूढ़ी महिला हूँ और इस मानसिक यातना को बर्दाश्त करने की हालत में नहीं हूँ. तुम्हारे पिता ने तो तुम्हें माफ़ कर दिया है लेकिन ईश्वर तुम्हारे इस काम के लिए तुम्हें कभी माफ़ नहीं करेगा."
लेकिन हरिलाल का धर्मांतरण 'वास्तविक' नहीं था क्योंकि साल ख़त्म होते-होते उन्होंने आर्य समाज रीति से फिर से हिंदू धर्म अपना लिया था और अपना नया नाम रखा था हीरालाल.
'कस्तूरबा माता की जय'
एक बार जब हरिलाल को पता चला कि महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी ट्रेन से कटनी स्टेशन से गुज़र रहे हैं तो हरिलाल अपने माता-पिता की झलक पाने से अपने-आप को नहीं रोक सके.
प्रमोद कपूर लिखते हैं, "हरिलाल कटनी स्टेशन पहुंच गए जहाँ सब लोग महात्मा गांधी की जय-जयकार कर रहे थे. वो अकेले शख़्स थे जो 'कस्तूरबा माता की जय' चिल्ला रहे थे."
अपना नाम सुनकर कस्तूरबा ने उस तरफ़ देखा जहाँ से ये आवाज़ आई थी. वो ये देखकर दंग रह गईं कि वहाँ उनका बेटा खड़ा था.
हरिलाल ने अपनी जेब से एक संतरा निकाला और कहा, 'बा, ये मैं तुम्हारे लिए लाया हूँ.'
ये सुन कर गांधी बोले, 'मेरे लिए भी कुछ लाए हो क्या?'
इस पर हरिलाल ने कहा, 'नहीं ये बा के लिए है.' जैसे ही ट्रेन चली कस्तूरबा ने अपने बेटे के मुँह से सुना, 'बा, इस संतरे को तुम ही खाओगी.'
कस्तूरबा से आख़िरी मुलाक़ात
सन 1944 आते-आते कस्तूरबा की तबीयत बहुत ख़राब हो गई. तब उन्होंने इच्छा प्रकट की कि वो अपने सबसे बड़े बेटे को देखना चाहती हैं.
उनकी मृत्यु से पाँच दिन पहले हरिलाल उन्हें देखने पुणे के आगा ख़ाँ पैलेस पहुंचे. कस्तूरबा की मृत्यु से एक दिन पहले हरिलाल उनको एक बार फिर देखने गए.
उस समय उन्होंने शराब पी रखी थी. उनकी ये हालत देखकर कस्तूरबा बहुत दुखी हुईं. जब उनकी मृत्यु हुई तो हरिलाल वहाँ मौजूद थे.
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Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (N D)
होमरूल आंदोलन आरम्भ होने के कारण (Causes of The Beginning of Movement)
Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
एक तरफ जहां जलियांवाला बाग में नरसंहार हुआ दूसरी तरफ अकाल तख्त के प्रमुख अरूर सिंह ने डायर को स्वर्ण मंदिर में आमंत्रित किया और उसे सरोपा भेट किया 🫣📖✍️
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
डॉ. बालकृष्ण शिवराम मूंजे, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के कट्टर अनुयायी थे। 1872 में जन्मे मूंजे ने 1898 में चिकित्सा की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने दो वर्षों तक बंबई में चिकित्सक के रूप में प्रैक्टिस की, और फिर ब्रिटिश भारतीय सेना के साथ दक्षिण अफ्रीका जाकर बोअर युद्ध में शामिल हुए 📖✍️
गांधी जी का उल्लेख तो सभी पढ़ते है कि उन्होंने बोअर के युद्ध में अंग्रेजों की मदद की थी, लेकिन हिंदू महासभा के सदस्य मुंजे ने भी अंग्रेजों की सेनाओं की मदद इस युद्ध में थी 📖✍️
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गांधी जी का उल्लेख तो सभी पढ़ते है कि उन्होंने बोअर के युद्ध में अंग्रेजों की मदद की थी, लेकिन हिंदू महासभा के सदस्य मुंजे ने भी अंग्रेजों की सेनाओं की मदद इस युद्ध में थी 📖✍️
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Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (N D)
पिछले 50 से 100 वर्षों के दौरान हम जो हासिल नहीं कर सकें, वह हमने छह महीनों में ही हासिल कर लिया है।
बारीसाल सम्मेलन (1906 ई.) के अध्यक्ष एस. अब्दुल रसूल ने स्वदेशी आंदोलन के सम्बंध में कहा था कि "पिछले 50 से 100 वर्षों के दौरान हम जो हासिल नहीं कर सकें, वह हमने छह महीनों में ही हासिल कर लिया है। हमें यहाँ तक पहुँचाया है, बंगाल विभाजन ने। विभाजन जैसी शर्मनाक घटना ने महान राष्ट्रीय आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन को जन्म दिया है।"