प्रेरणा वह होती है जो तुम्हें शुरुआत करने के लिए प्रेरित करती है। आदत वह होती है जो तुम्हें आगे बढ़ते रहने के लिए मजबूर करती है।
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रिजल्ट के लिए 4 फरवरी अनाउंस हुआ है... लेकिन सामान्यत: अनाउंस डेट से एक दिन पहले रिजल्ट आ जाता है यानी 3 फरवरी...अतः जो साथी रिजल्ट को लेकर अति उत्साही है... वो अब जैसे तैसे 2-3 दिन खुद को बांध कर रखे।
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विशेष सूचना - एक से 4 फरवरी तक कभी भी लगा जाएगा😂
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हरियाणा असिस्टेंट प्रोफेसर (इतिहास) साक्षात्कार के लिए चुने गए सभी अभ्यर्थियों को हार्दिक शुभकामनाएँ🌸
अब रहा इतिहास इंटरव्यू के लिए बेहद ज़रूरी बिंदुओं का सार—इन्हें ज़रूर दोहराएँ:
औपनिवेशिक, राष्ट्रवादी, मार्क्सवादी और उपaltern इतिहासलेखन
R.S. Sharma, Romila Thapar, Irfan Habib, Bipan Chandra का योगदान
स्रोतों की प्रकृति: साहित्यिक, पुरातात्विक, विदेशी यात्रियों के विवरण
सिंधु सभ्यता: नवीन निष्कर्ष (Dholavira, Rakhigarhi)
वैदिक काल: सभा–समिति, वर्ण व्यवस्था, अर्थव्यवस्था
मौर्य प्रशासन: अशोक के धम्म की अवधारणा
गुप्त काल: स्वर्ण युग—कला, विज्ञान, प्रशासन
दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक व्यवस्था
मुग़ल प्रशासन: मनसबदारी, जागीरदारी
भक्ति–सूफी आंदोलन: सामाजिक प्रभाव
विजयनगर और बहमनी राज्य
1857 का विद्रोह: कारण और प्रकृति
कांग्रेस का विकास, गांधी युग
क्रांतिकारी आंदोलन
संविधान निर्माण और स्वतंत्र भारत की चुनौतियाँ
राखीगढ़ी सभ्यता
कुरुक्षेत्र का ऐतिहासिक–सांस्कृतिक महत्व
1857 में हरियाणा की भूमिका
क्षेत्रीय लोक-इतिहास और संस्कृति
नई शिक्षा नीति (NEP 2020) और इतिहास
डिजिटल टूल्स का प्रयोग (Maps, PPT, Archives)
इतिहास में आलोचनात्मक सोच (Critical Thinking)
इतिहास और राजनीति का संबंध
पाठ्यक्रम में परिवर्तन और विवाद
Public History और लोक इतिहास
उत्तर संतुलित, तथ्यपरक और आत्मविश्वासपूर्ण हों
“मुझे लगता है” की जगह इतिहासकारों के संदर्भ दें
यदि उत्तर न आए तो ईमानदारी से स्वीकार करें
शिक्षण शैली और शोध रुचि स्पष्ट रखें
आप सभी को उज्ज्वल भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनाएँ 🚩
इतिहास के साथ न्याय करें—इतिहास आपका साथ ज़रूर देगा।
प्रिय मित्र,
श्री.लेखक अखिलेश जी पाण्डेय..❤️ 🍎 🤩
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KVS NVS Answer Key Out
https://cbseit.in/cbse/2026/kvjnvkey
*Answer Key केवल KVS की Official Website पर ही उपलब्ध है।*
👉 *Answer Key के माध्यम से आप अपने उत्तरों का मिलान कर सकते हैं।*
👉 *यदि किसी प्रश्न में आपत्ति है तो निर्धारित तिथि के भीतर Objection भी दर्ज की जा सकती है।*
📌 *सभी साथियों से अनुरोध है कि यह सूचना KVS परीक्षा देने वाले अन्य अभ्यर्थियों के साथ भी जरूर साझा करें।*
✨ *Best of Luck सभी साथियों को!*
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No Document No History
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OMR SHEET - Download Krne ke Baad Kahi Pr Share krlo us File ko Telegram ya WhatsApp Open ho jaegi Ya Apni Gallery mai check kre
⚠️ महत्वपूर्ण निर्देश: ✔️ केवल Paid Challenges ही स्वीकार किए जाएंगे।
⚠️ ध्यान दें:
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❤3
Forwarded from Tιƙαɱ αɱႦҽԃƙαɾ (History)
राजतंत्र के विकास के साथ बहुत सारे जटिल यज्ञ कर्मकाण्डों को भी जोड़ा गया। वाजपेय यज्ञ में समृद्धि और शक्ति की प्राप्ति के लिए अनुष्ठानों का आयोजन होता था तथा इससे बहुत सारे प्रजनन क्षमता से जुड़े अनुष्ठान भी जोड़ दिये गए थे। इसमें एक औपचारिक, एक अनुष्ठानिक रथदौड़ होती थी जिसमें राजन् अपने बंधु-बांधवों के विरुद्ध रथों की दौड़ में विजयी होता था। अश्वमेध यज्ञ में सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति की प्राप्ति के लिए अनुष्ठान किया जाता था और इस यज्ञ में भी कई अतिरिक्त प्रजनन सम्बंधी अनुष्ठानों को जोड़ दिया गया था। राजसूय यज्ञ राजाभिषेक के अनुष्ठान को कहते हैं। इसमें भी बहुत सारे कृषि की उर्वरा शक्ति और प्रजनन क्षमता से जुड़े अनुष्ठान सम्मिलित थे। इसमें एक अवसर पर राजन अपने बंधु-बांधवों के पशुधन का हरण करता था। दूसरे अवसर पर वह चौसर के खेल में उनमें विजयी होता था। ये सब प्रतीकात्मक स्तर पर किये जाते थे। राजसूय यज्ञ से जुड़ी यह मान्यता थी कि इस सृष्टि के निर्माण और अंत के चक्रीय प्रक्रिया के केंद्र में राजन् खड़ा है (हिस्टेरमैन, 1957)।
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Forwarded from Tιƙαɱ αɱႦҽԃƙαɾ (History)
'झूकर संस्कृति'
उत्तर पश्चिम में परिपक्व हड़प्पा संस्कृति के बाद उत्तर हड़प्पा संस्कृति का विकास हुआ था, जिसको सिन्ध में 'झुकर संस्कृति' तथा पंजाब में 'सिमेट्री-एच संस्कृति' की संज्ञा दी गई है। इस काल में मुख्य परिवर्तन यही हुआ कि हड़प्पा संस्कृति के नगरीकरण के तत्व पूर्ण रूप से गौण हो गए। झूकर संस्कृति की जानकारी झूकर, चन्हूदड़ो तथा आमरी के पुरातात्त्विक उत्खनन से मिली है। परिपक्व हड़प्पा संस्कृति की मुद्भाण्ड पुरम्परा सीमित रूप से विद्यमान रही। घनाकार बटखरे और मातृदेवी की प्रतिमाएं प्रायः नगण्य रूप से मिलने लगीं। आयताकार हडप्पा सील मुहरों की जगह वृत्ताकार सील मुहरों ने ले लीं। लिपि का प्रदर्शन केवल मृद्भाण्डों के ठीकरों में देखा जा सकता है।
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उत्तर पश्चिम में परिपक्व हड़प्पा संस्कृति के बाद उत्तर हड़प्पा संस्कृति का विकास हुआ था, जिसको सिन्ध में 'झुकर संस्कृति' तथा पंजाब में 'सिमेट्री-एच संस्कृति' की संज्ञा दी गई है। इस काल में मुख्य परिवर्तन यही हुआ कि हड़प्पा संस्कृति के नगरीकरण के तत्व पूर्ण रूप से गौण हो गए। झूकर संस्कृति की जानकारी झूकर, चन्हूदड़ो तथा आमरी के पुरातात्त्विक उत्खनन से मिली है। परिपक्व हड़प्पा संस्कृति की मुद्भाण्ड पुरम्परा सीमित रूप से विद्यमान रही। घनाकार बटखरे और मातृदेवी की प्रतिमाएं प्रायः नगण्य रूप से मिलने लगीं। आयताकार हडप्पा सील मुहरों की जगह वृत्ताकार सील मुहरों ने ले लीं। लिपि का प्रदर्शन केवल मृद्भाण्डों के ठीकरों में देखा जा सकता है।
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अपने जीवन के
किसी भी दिन को कभी मत पछताओ:
अच्छे दिन खुशी देते हैं,
बुरे दिन अनुभव देते हैं,✅
सबसे बुरे दिन सबक देते हैं,
और
सबसे अच्छे दिन यादें देते हैं।⭐️
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किसी भी दिन को कभी मत पछताओ:
अच्छे दिन खुशी देते हैं,
बुरे दिन अनुभव देते हैं,
सबसे बुरे दिन सबक देते हैं,
और
सबसे अच्छे दिन यादें देते हैं।
मैं हमेशा खुद से कहता हूँ, "ग़लतियों को जाने दो और सबक रखो।"
शुभ रात्रि🍎 🤩
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Forwarded from No Document No History (श्री.रामसिंग राजपूत ⛳)
इतिहास से जुडी विभिन्न प्रकार की पुस्तके, पेपर और सिलेबस के लिए
इतिहास के जुड़े सभी ग्रुप अपना लिंक हमारे ग्रुप में डालते हैं लेकिन हमारा लिंक जिससे सभी के लिए
किताबें अध्ययन को पढ़ने के साथ साथ विषय को समझने में बहुत मदद करती हैं आधे अधूरे ज्ञान से ऊपर उठिए क्योंकि इतिहास को पढ़ने के साथ-साथ समझना भी आवश्यक है नजरिया बदलो सोच बदल जाएगी
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Forwarded from ITIHAS_JUNCTION (🇮🇳♖𝐃𝐞𝐬𝐡𝐛𝐡𝐚𝐤𝐭♖🇮🇳)
📜 ब्रिटिश कालीन भू-धृति पद्धतियां
📖 शब्द की उत्पत्ति (Etymology)
•. 'टेन्योर' (Tenure) शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के 'teneo' शब्द से हुई है।
• इसका अर्थ होता है— 'धारण करना' (to hold)।
🏛️ प्रमुख प्रणालियाँ
• अंग्रेजों ने भारत में मुख्य रूप से तीन भू-धृति पद्धतियां अपनाईं:
1. ज़मींदारी
2. महलवाड़ी
3. रैयतवाड़ी
1️⃣ ज़मींदारी / स्थाई बंदोबस्त
• 🗺️ विस्तार: यह पद्धति बंगाल, बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश के बनारस खंड और उत्तरी कर्नाटक में लागू थी।
• 📊 भू-भाग: ब्रिटिश भारत की लगभग 19% भूमि इस पद्धति के अंतर्गत आती थी।
2️⃣ महलवाड़ी पद्धति
• 🗺️ विस्तार: यह पद्धति उत्तर प्रदेश, मध्य प्रांत और पंजाब (कुछ परिवर्तनों के साथ) में लागू की गई थी।
• 📊 भू-भाग: ब्रिटिश भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग 30% हिस्सा इसके अधीन था।
3️⃣ रैयतवाड़ी पद्धति
• 🗺️ विस्तार: यह पद्धति बॉम्बे और मद्रास के अधिकांश भागों, असम तथा अन्य क्षेत्रों में लागू थी।
• 📊 भू-भाग: यह सबसे बड़े क्षेत्र पर लागू थी, जिसके अंतर्गत ब्रिटिश भारत की लगभग 51% भूमि आती थी।
✍️ Join: @Itihaas_Junction
📖 शब्द की उत्पत्ति (Etymology)
•. 'टेन्योर' (Tenure) शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के 'teneo' शब्द से हुई है।
• इसका अर्थ होता है— 'धारण करना' (to hold)।
🏛️ प्रमुख प्रणालियाँ
• अंग्रेजों ने भारत में मुख्य रूप से तीन भू-धृति पद्धतियां अपनाईं:
1. ज़मींदारी
2. महलवाड़ी
3. रैयतवाड़ी
1️⃣ ज़मींदारी / स्थाई बंदोबस्त
• 🗺️ विस्तार: यह पद्धति बंगाल, बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश के बनारस खंड और उत्तरी कर्नाटक में लागू थी।
• 📊 भू-भाग: ब्रिटिश भारत की लगभग 19% भूमि इस पद्धति के अंतर्गत आती थी।
2️⃣ महलवाड़ी पद्धति
• 🗺️ विस्तार: यह पद्धति उत्तर प्रदेश, मध्य प्रांत और पंजाब (कुछ परिवर्तनों के साथ) में लागू की गई थी।
• 📊 भू-भाग: ब्रिटिश भारत के कुल क्षेत्रफल का लगभग 30% हिस्सा इसके अधीन था।
3️⃣ रैयतवाड़ी पद्धति
• 🗺️ विस्तार: यह पद्धति बॉम्बे और मद्रास के अधिकांश भागों, असम तथा अन्य क्षेत्रों में लागू थी।
• 📊 भू-भाग: यह सबसे बड़े क्षेत्र पर लागू थी, जिसके अंतर्गत ब्रिटिश भारत की लगभग 51% भूमि आती थी।
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Forwarded from No Document No History (श्री.रामसिंग राजपूत ⛳)
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Forwarded from No Document No History (श्री.रामसिंग राजपूत ⛳)
No Document No History
UPPSC_GDC_Assistant_Professor_Government_Degree_College_History.pdf
उत्तर प्रदेश असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए किताब बहुत अच्छी है
हमें पता है आप लोगों को रिएक्शन देना पसंद नहीं है❤️ ✅
हमें पता है आप लोगों को रिएक्शन देना पसंद नहीं है
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Forwarded from Tιƙαɱ αɱႦҽԃƙαɾ (History)
सन् 1905 में तंजौर तहसील के एक ब्राह्मण ने मैसूर के ओरिएंटल रिसर्च लाइब्रेरी के पुस्तकाध्यक्ष आर. शामाशास्त्री को 168 पृष्ठों की एक पांडुलिपि सौंप दी। यह पांडुलिपि संस्कृत भाषा में ग्रंथ लिपि में लिखी गई थी। मूल ग्रंथ के साथ भट्टस्वामी नामक विद्वान की टीकाएँ (व्याख्याएँ) भी सम्मिलित थीं। पूरा ग्रंथ पंद्रह अध्यायों और कई उपखंडों में विभाजित था। इसमें विषय का वर्णन संक्षिप्त सूत्रों के रूप में किया गया था, जिनका अर्थ समझना आसान नहीं था।
यह पांडुलिपि बड़ी सावधानी से लिखी गई थी, किंतु कुछ स्थानों पर त्रुटियाँ भी दिखाई देती थीं। ग्रंथ के प्रारंभ में “ॐ” लिखा हुआ था और उसके बाद शुक्र और बृहस्पति की, क्रमशः दानवों और देवताओं के आचार्य के रूप में, स्तुति की गई थी। इसके बाद उल्लेख था कि अर्थशास्त्र वास्तव में प्राचीन आचार्यों की श्रेष्ठ रचनाओं का संग्रह है, जिसके माध्यम से पूरी पृथ्वी को जीता और उसकी रक्षा की जा सकती है।
आगे ग्रंथ में अध्ययन किए गए विषयों की सूची दी गई थी। प्रस्तावना में यह कहा गया था कि विचार और अर्थ की सहज अभिव्यक्ति की दृष्टि से यह रचना अत्यंत सरल और बोधगम्य है, तथा इसके संकलनकर्ता कौटिल्य हैं।
आर. शामाशास्त्री ने अनुमान लगाया कि यह पांडुलिपि लगभग 100 से 200 वर्ष पुरानी है, लेकिन इसकी विषय-वस्तु इससे कहीं अधिक प्राचीन है, जो प्राचीन राज्यशास्त्र की परिपक्व परंपरा को आगे बढ़ाती है।
सन् 1905 के बाद इस दुर्लभ ग्रंथ को इंडियन एंटिक्वरी नामक शोध पत्रिका में क्रमशः कई अंकों में प्रकाशित किया गया। सन् 1909 में पहली बार इसका संपूर्ण भाषांतरण सामने आया और 1915 में इसका पहला अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित हुआ।
आर. शामाशास्त्री के अनुवाद के प्रकाशित होने के बाद कौटिल्य के अर्थशास्त्र के प्रति विद्वानों की रुचि बढ़ी, जिससे अन्य पांडुलिपियों और टीकाओं को भी एकत्र किया जाने लगा।
यह ग्रंथ केवल अंग्रेज़ी ही नहीं, बल्कि बंगला, हिंदी, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, मराठी, उड़िया, तमिल, जर्मन, इटालियन और रूसी भाषाओं में भी अनूदित हुआ।
अर्थशास्त्र का सबसे प्रमाणिक संस्करण आर. पी. कांग्ले द्वारा सन् 1960–63 के बीच प्रकाशित किया गया, जिसमें अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ-साथ अर्थशास्त्र की विभिन्न पांडुलिपियों और मध्यकालीन टीकाकारों की व्याख्याएँ भी सम्मिलित थी।
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यह पांडुलिपि बड़ी सावधानी से लिखी गई थी, किंतु कुछ स्थानों पर त्रुटियाँ भी दिखाई देती थीं। ग्रंथ के प्रारंभ में “ॐ” लिखा हुआ था और उसके बाद शुक्र और बृहस्पति की, क्रमशः दानवों और देवताओं के आचार्य के रूप में, स्तुति की गई थी। इसके बाद उल्लेख था कि अर्थशास्त्र वास्तव में प्राचीन आचार्यों की श्रेष्ठ रचनाओं का संग्रह है, जिसके माध्यम से पूरी पृथ्वी को जीता और उसकी रक्षा की जा सकती है।
आगे ग्रंथ में अध्ययन किए गए विषयों की सूची दी गई थी। प्रस्तावना में यह कहा गया था कि विचार और अर्थ की सहज अभिव्यक्ति की दृष्टि से यह रचना अत्यंत सरल और बोधगम्य है, तथा इसके संकलनकर्ता कौटिल्य हैं।
आर. शामाशास्त्री ने अनुमान लगाया कि यह पांडुलिपि लगभग 100 से 200 वर्ष पुरानी है, लेकिन इसकी विषय-वस्तु इससे कहीं अधिक प्राचीन है, जो प्राचीन राज्यशास्त्र की परिपक्व परंपरा को आगे बढ़ाती है।
सन् 1905 के बाद इस दुर्लभ ग्रंथ को इंडियन एंटिक्वरी नामक शोध पत्रिका में क्रमशः कई अंकों में प्रकाशित किया गया। सन् 1909 में पहली बार इसका संपूर्ण भाषांतरण सामने आया और 1915 में इसका पहला अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित हुआ।
आर. शामाशास्त्री के अनुवाद के प्रकाशित होने के बाद कौटिल्य के अर्थशास्त्र के प्रति विद्वानों की रुचि बढ़ी, जिससे अन्य पांडुलिपियों और टीकाओं को भी एकत्र किया जाने लगा।
यह ग्रंथ केवल अंग्रेज़ी ही नहीं, बल्कि बंगला, हिंदी, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, मराठी, उड़िया, तमिल, जर्मन, इटालियन और रूसी भाषाओं में भी अनूदित हुआ।
अर्थशास्त्र का सबसे प्रमाणिक संस्करण आर. पी. कांग्ले द्वारा सन् 1960–63 के बीच प्रकाशित किया गया, जिसमें अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ-साथ अर्थशास्त्र की विभिन्न पांडुलिपियों और मध्यकालीन टीकाकारों की व्याख्याएँ भी सम्मिलित थी।
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की एक बहुत बड़ी श्रृंखला
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