No Document No History pinned «⬇️⭐️UGC NET परिणाम: आगे की राह ⬇️⭐️ UGC NET का रिज़ल्ट आ गया है — सभी को दिल से बधाई!😇🥳 जिसका भी जैसा भी हुआ है, आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं। लेकिन ध्यान रहे — अभी रेस बाकी है। अगर JRF हुआ है तो अब Ph.D. में एडमिशन लेना बाकी है,🥳 और अगर NET या Ph.D. पहले…»
“ज़िंदगी हर मोड़ पर एक जैसा नहीं सिखाती,
कुछ रास्ते सब्र माँगते हैं,
और कुछ रास्ते सबक दे जाते हैं।”
✅ ✅ ✅ ✌ 💐 🌺 👍
कुछ रास्ते सब्र माँगते हैं,
और कुछ रास्ते सबक दे जाते हैं।”
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❤6👍4💯2💔1
बालों तक को बिगड़ने ना देने वाले हम,
कम्बख्त हालातों ने क़िस्मत तक उलझा दी!
कम्बख्त हालातों ने क़िस्मत तक उलझा दी!
❤10💯3💔2
"बर्बाद-ए-गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था,
हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा।"😂
हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा।"😂
💔10💯5
___🪞✰❀ ❁ सत्येंद्र नाथ बोस एक प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ और भौतिक विज्ञानी_✰❀ ❁ ✾ _
🔹*✧➳ 𓀤सत्येंद्र नाथ बोस का जन्म 1 जनवरी 1894 को कलकत्ता में हुआ था। मित्रों के बीच ये सत्येन तथा विज्ञान जगत में एस. एन. बोस से जाने गये। इनके पिता सुरेन्द्र नाथ बोस रेल विभाग में काम करते थे।
महान वैज्ञानिक प्राय: दो तरह के होते हैं। पहले वे जो अपनी स्कूली पढ़ाई में कमजोर होते हैं, तथा दूसरे वे* जो शुरू से ही पढ़ाई में अव्वल होते हैं। आइंस्टाइन पहले वर्ग में आते हैं और सत्येंद्र नाथ बोस दूसरे। ये पढ़ाई में हमेशा से ही अच्छे थे विशेष तौर से गणित में। एक बार इनके गणित के शिक्षक ने इन्हें 100 में 110 अंक दिये थे क्योंकि इन्होंने सभी सवालों को हल करने के साथ-साथ कुछ सवालों को एक से ज्यादा तरीके से हल किया था।
🔹_सीमित संसाधन:_संसाधनों की कमी के बावजूद, उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। उन्होंने एम.एससी. में इतने अंक प्राप्त किए कि कोलकाता विश्वविद्यालय में उनका रिकॉर्ड आज तक नहीं टूटा है। उस समय भारत में आधुनिक भौतिकी पढ़ाने वाले साधन बहुत कम थे,
फिर भी बोस ने खुद पढ़-पढ़कर नए सिद्धांत समझे।**
🔹_शोध पत्र की अस्वीकृति:_1924 में ढाका विश्वविद्यालय में पढ़ाते समय, उन्होंने 'मैक्स प्लैंक' के नियम पर एक क्रांतिकारी शोध पत्र लिखा। जब प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ने इसे छापने से इनकार कर दिया, तो उन्होंने इसे सीधे अल्बर्ट आइंस्टीन को भेजा। आइंस्टीन ने इसके महत्व को समझा, इसका जर्मन अनुवाद किया और इसे प्रकाशित करवाया, जिससे बोस को वैश्विक पहचान मिली।
🔹_पद के लिए अर्हता का अभाव:_ जब उन्होंने ढाका विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद के लिए आवेदन किया, तो उनके पास पीएचडी की डिग्री नहीं थी। आइंस्टीन की सिफारिश के बाद ही उन्हें यह पद मिल सका।
🔹मातृभाषा में शिक्षा के लिए संघर्ष:* बोस का मानना था कि विज्ञान को आम लोगों तक पहुँचाने के लिए उसे मातृभाषा में पढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने 1948 में 'बंगीय विज्ञान परिषद' की स्थापना की और शिक्षा के माध्यम के रूप में बांग्ला भाषा को लागू करने के लिए आजीवन संघर्ष किया।
🔹*क्रांतिकारी जुड़ाव: *अपने छात्र जीवन के दौरान, वह अनुशीलन समिति जैसे क्रांतिकारी समूहों के संपर्क में आए और स्वदेशी आंदोलनों में सक्रिय रहे।
🔹*नामांकन (Nominations):* बोस को भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए कई बार नामांकित किया गया था (जैसे 1956, 1959 और 1962 में)। फिर भी, नोबेल समिति ने उन्हें इस पुरस्कार के लिए नहीं चुना।
🔹अन्य वैज्ञानिकों को लाभ:* यह एक विडंबना ही है कि उनके द्वारा प्रतिपादित 'बोस-आइंस्टीन सांख्यिकी' और 'बोस-आइंस्टीन कंडेनसेट' की अवधारणाओं पर काम करने वाले कम से कम सात अन्य वैज्ञानिकों को बाद में नोबेल पुरस्कार दिया गया।
👉उनका दृष्टिकोण: *जब उनसे पुरस्कार न मिलने के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया था, "मुझे वह सारा सम्मान मिल चुका है जिसका मैं हकदार था"।
👉बोसॉन (Boson):* उनके सम्मान में ही परमाणु के मौलिक कणों में से एक वर्ग का नाम 'बोसॉन' रखा गया है।
👉4 फ़रवरी 1974 को सत्येन्द्र नाथ बोस सचमुच हमारे बीच से हमेशा के लिए चले गए।
🔹"यदि एक व्यक्ति अपने जीवन के अनेक वर्ष संघर्ष में व्यतीत कर देता है और अंत में उसे लगता है कि उसके कार्य को सराहा जा रहा है तो फिर वह व्यक्ति सोचता है कि अब उसे और अधिक जीने की आवश्यकता नहीं है।”~सत्येंद्र नाथ बोस
🔹*✧➳ 𓀤सत्येंद्र नाथ बोस का जन्म 1 जनवरी 1894 को कलकत्ता में हुआ था। मित्रों के बीच ये सत्येन तथा विज्ञान जगत में एस. एन. बोस से जाने गये। इनके पिता सुरेन्द्र नाथ बोस रेल विभाग में काम करते थे।
महान वैज्ञानिक प्राय: दो तरह के होते हैं। पहले वे जो अपनी स्कूली पढ़ाई में कमजोर होते हैं, तथा दूसरे वे* जो शुरू से ही पढ़ाई में अव्वल होते हैं। आइंस्टाइन पहले वर्ग में आते हैं और सत्येंद्र नाथ बोस दूसरे। ये पढ़ाई में हमेशा से ही अच्छे थे विशेष तौर से गणित में। एक बार इनके गणित के शिक्षक ने इन्हें 100 में 110 अंक दिये थे क्योंकि इन्होंने सभी सवालों को हल करने के साथ-साथ कुछ सवालों को एक से ज्यादा तरीके से हल किया था।
🔹_सीमित संसाधन:_संसाधनों की कमी के बावजूद, उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। उन्होंने एम.एससी. में इतने अंक प्राप्त किए कि कोलकाता विश्वविद्यालय में उनका रिकॉर्ड आज तक नहीं टूटा है। उस समय भारत में आधुनिक भौतिकी पढ़ाने वाले साधन बहुत कम थे,
फिर भी बोस ने खुद पढ़-पढ़कर नए सिद्धांत समझे।**
🔹_शोध पत्र की अस्वीकृति:_1924 में ढाका विश्वविद्यालय में पढ़ाते समय, उन्होंने 'मैक्स प्लैंक' के नियम पर एक क्रांतिकारी शोध पत्र लिखा। जब प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ने इसे छापने से इनकार कर दिया, तो उन्होंने इसे सीधे अल्बर्ट आइंस्टीन को भेजा। आइंस्टीन ने इसके महत्व को समझा, इसका जर्मन अनुवाद किया और इसे प्रकाशित करवाया, जिससे बोस को वैश्विक पहचान मिली।
🔹_पद के लिए अर्हता का अभाव:_ जब उन्होंने ढाका विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद के लिए आवेदन किया, तो उनके पास पीएचडी की डिग्री नहीं थी। आइंस्टीन की सिफारिश के बाद ही उन्हें यह पद मिल सका।
🔹मातृभाषा में शिक्षा के लिए संघर्ष:* बोस का मानना था कि विज्ञान को आम लोगों तक पहुँचाने के लिए उसे मातृभाषा में पढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने 1948 में 'बंगीय विज्ञान परिषद' की स्थापना की और शिक्षा के माध्यम के रूप में बांग्ला भाषा को लागू करने के लिए आजीवन संघर्ष किया।
🔹*क्रांतिकारी जुड़ाव: *अपने छात्र जीवन के दौरान, वह अनुशीलन समिति जैसे क्रांतिकारी समूहों के संपर्क में आए और स्वदेशी आंदोलनों में सक्रिय रहे।
🔹*नामांकन (Nominations):* बोस को भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए कई बार नामांकित किया गया था (जैसे 1956, 1959 और 1962 में)। फिर भी, नोबेल समिति ने उन्हें इस पुरस्कार के लिए नहीं चुना।
🔹अन्य वैज्ञानिकों को लाभ:* यह एक विडंबना ही है कि उनके द्वारा प्रतिपादित 'बोस-आइंस्टीन सांख्यिकी' और 'बोस-आइंस्टीन कंडेनसेट' की अवधारणाओं पर काम करने वाले कम से कम सात अन्य वैज्ञानिकों को बाद में नोबेल पुरस्कार दिया गया।
👉उनका दृष्टिकोण: *जब उनसे पुरस्कार न मिलने के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया था, "मुझे वह सारा सम्मान मिल चुका है जिसका मैं हकदार था"।
👉बोसॉन (Boson):* उनके सम्मान में ही परमाणु के मौलिक कणों में से एक वर्ग का नाम 'बोसॉन' रखा गया है।
👉4 फ़रवरी 1974 को सत्येन्द्र नाथ बोस सचमुच हमारे बीच से हमेशा के लिए चले गए।
🔹"यदि एक व्यक्ति अपने जीवन के अनेक वर्ष संघर्ष में व्यतीत कर देता है और अंत में उसे लगता है कि उसके कार्य को सराहा जा रहा है तो फिर वह व्यक्ति सोचता है कि अब उसे और अधिक जीने की आवश्यकता नहीं है।”~सत्येंद्र नाथ बोस
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Forwarded from Kumar Bharat - UGC-NET-Paper1
कल्पना ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण है। क्योंकि ज्ञान सभी चीज़ों को परिभाषित करता है जो हम वर्तमान में जानते और समझते हैं, जबकि कल्पना उन सभी चीज़ों की ओर इशारा करती है जो हम अभी तक खोज सकते हैं और बना सकते हैं।
- अल्बर्ट आइंस्टीन
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Forwarded from No Document No History (श्री.रामसिंग राजपूत ⛳)
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202602041762035910.PDF
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कट ऑफ 26 ✅ ✅
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Forwarded from No Document No History (Abhishek)
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Forwarded from No Document No History (श्री.रामसिंग राजपूत ⛳)
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Forwarded from No Document No History (श्री.रामसिंग राजपूत ⛳)
प्रिय दोस्तों,
ugc net इंडियन कल्चर और archaeology की अंतिम उत्तर कुंजी...✅ ✅
इन दोनो मै कुछ प्रश्न डिलीट हुए है,
लेकिन इतिहास का एक भी डिलीट नहीं हुवा...🌸 ✨
ugc net इंडियन कल्चर और archaeology की अंतिम उत्तर कुंजी...
इन दोनो मै कुछ प्रश्न डिलीट हुए है,
लेकिन इतिहास का एक भी डिलीट नहीं हुवा...
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कल कट ऑफ देखकर शैतान सिंग और तुफान की याद आ गई,
14 साल की तपस्या...😂 😂 ✅ ✌
14 साल की तपस्या...
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