Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️ (Roshni Pareek)
1862 से 1892 तक: 30 वर्षों में केवल 45 भारतीयों को विधान परिषदों के लिए नामांकित किया गया।
परिषदों में सदस्यता के लिए मुख्यतः रजवाड़ों के शासक/कर्मचारी, बड़े ज़मींदार, बड़े व्यापारी और अवकाशप्राप्त उच्चाधिकारी चुने जाते थे।
प्रमुख भारतीय सदस्य एवं कार्यकाल:
सैयद अहमद खान — 1878–1882
कृष्णदास पाल — 1883
बी. एन. मंडलिक — 1884–1887
के. एल. नुलकर — 1890–1891
रास बिहारी घोष — 1892
राजा दिग्विजय सिंह (बलरामपुर): दो बार परिषद के सदस्य बनाए गए, लेकिन उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती थी। उन्होंने मतदान के बारे में कहा कि वे वायसराय की ओर देखते थे—वायसराय हाथ उठाते तो वे भी उठाते और वायसराय गिराते तो वे भी गिरा देते।
https://t.me/historyfact00
परिषदों में सदस्यता के लिए मुख्यतः रजवाड़ों के शासक/कर्मचारी, बड़े ज़मींदार, बड़े व्यापारी और अवकाशप्राप्त उच्चाधिकारी चुने जाते थे।
प्रमुख भारतीय सदस्य एवं कार्यकाल:
सैयद अहमद खान — 1878–1882
कृष्णदास पाल — 1883
बी. एन. मंडलिक — 1884–1887
के. एल. नुलकर — 1890–1891
रास बिहारी घोष — 1892
राजा दिग्विजय सिंह (बलरामपुर): दो बार परिषद के सदस्य बनाए गए, लेकिन उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती थी। उन्होंने मतदान के बारे में कहा कि वे वायसराय की ओर देखते थे—वायसराय हाथ उठाते तो वे भी उठाते और वायसराय गिराते तो वे भी गिरा देते।
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प्रिय साथियों,
आप सभी शिक्षित, समझदार और परिपक्व हैं। आपको अच्छी तरह पता है कि सोशल मीडिया पर क्या सही है और क्या गलत।
हाल ही में हमारे टेलीग्राम चैनल पर कुछ ऐसे विज्ञापन दिखाई दे रहे हैं, जिनमें आकर्षक तस्वीरों, पैसों और उपहारों का लालच देकर लोगों को क्लिक करने के लिए प्रेरित किया जाता है।
यह आवश्यक नहीं कि हर विज्ञापन सुरक्षित और विश्वसनीय हो। किसी अनजान लिंक पर क्लिक करने से आपकी व्यक्तिगत जानकारी और वित्तीय सुरक्षा को खतरा हो सकता है।
एक बात विशेष रूप से समझें कि टेलीग्राम पर दिखाई देने वाले प्रायोजित विज्ञापनों का हमारे चैनल या उसके एडमिन से कोई संबंध नहीं है।
आप सभी इतने समझदार और मैच्योर हैं कि आपको हर छोटी बात समझाने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी एक जिम्मेदार एडमिन होने के नाते आपको सावधान करना हमारा कर्तव्य है।
याद रखिए — इंटरनेट पर हर चमकती चीज अवसर नहीं होती, कभी-कभी वह धोखे का जाल भी हो सकती है।
सतर्क रहें, सुरक्षित रहें और अपने विवेक का इस्तेमाल करें।
विशेष सूचना - ऐसे विज्ञापन एडमिन को नहीं दिखते है
📚 No Document No History
✍️ श्री रामसिंग राजपूत
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No Document No History
यह विज्ञापन टेलीग्राम के लगभग सभी चैनल पर दिख रहा है....✔️
कुछ दोस्तों के चैनल चेक किया
वहां पर भी विज्ञापन शो हो रहा है
सावधान रहे.... सतर्क रहे...
मिलते हैं
19 नवंबर को लखनऊ में📚 🪴 📚
कुछ दोस्तों के चैनल चेक किया
वहां पर भी विज्ञापन शो हो रहा है
सावधान रहे.... सतर्क रहे...
मिलते हैं
19 नवंबर को लखनऊ में
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कुछ भी हो लेकिन वेस्ट इंडीज़ क्रिकेट टीम अपने पुराने दौर में लौट रही हैं।🤣
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️ (A B)
लखनऊ में कांग्रेस के दो प्रमुख अधिवेशन–
1. लखनऊ अधिवेशन, 1916
अध्यक्ष: अंबिका चरण मजूमदार।
अधिवेशन संख्या: 31वाँ।
नरमपंथियों एवं गरमपंथियों में पुनर्मिलन हुआ। 1907 के सूरत विभाजन के बाद यह महत्त्वपूर्ण एकता थी।
लखनऊ समझौता (1916): कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता हुआ।
कांग्रेस ने मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था स्वीकार की।
महत्त्व: हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक सहयोग तथा स्वशासन की माँग को बल मिला।
2. लखनऊ अधिवेशन, 1936
अध्यक्ष: जवाहरलाल नेहरू।
अधिवेशन संख्या: 49वाँ।
समाजवादी विचारों पर जोर: नेहरू ने गरीबी, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता जैसे प्रश्नों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने पर बल दिया।
कृषि कार्यक्रम: किसानों की गरीबी, कर्ज और भूमि-राजस्व व्यवस्था की समस्याओं पर ध्यान दिया गया।
भारत शासन अधिनियम, 1935 का विरोध किया गया, लेकिन कांग्रेस ने प्रांतीय चुनाव लड़ने का निर्णय लिया।
नागरिक स्वतंत्रता: सुभाषचंद्र बोस की गिरफ्तारी और नागरिक स्वतंत्रताओं के दमन की निंदा की गई।
महत्त्व: राष्ट्रीय आंदोलन में किसान प्रश्न और आर्थिक-सामाजिक समस्याओं को अधिक महत्त्व मिला।
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1. लखनऊ अधिवेशन, 1916
अध्यक्ष: अंबिका चरण मजूमदार।
अधिवेशन संख्या: 31वाँ।
नरमपंथियों एवं गरमपंथियों में पुनर्मिलन हुआ। 1907 के सूरत विभाजन के बाद यह महत्त्वपूर्ण एकता थी।
लखनऊ समझौता (1916): कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता हुआ।
कांग्रेस ने मुस्लिमों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था स्वीकार की।
महत्त्व: हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक सहयोग तथा स्वशासन की माँग को बल मिला।
2. लखनऊ अधिवेशन, 1936
अध्यक्ष: जवाहरलाल नेहरू।
अधिवेशन संख्या: 49वाँ।
समाजवादी विचारों पर जोर: नेहरू ने गरीबी, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता जैसे प्रश्नों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने पर बल दिया।
कृषि कार्यक्रम: किसानों की गरीबी, कर्ज और भूमि-राजस्व व्यवस्था की समस्याओं पर ध्यान दिया गया।
भारत शासन अधिनियम, 1935 का विरोध किया गया, लेकिन कांग्रेस ने प्रांतीय चुनाव लड़ने का निर्णय लिया।
नागरिक स्वतंत्रता: सुभाषचंद्र बोस की गिरफ्तारी और नागरिक स्वतंत्रताओं के दमन की निंदा की गई।
महत्त्व: राष्ट्रीय आंदोलन में किसान प्रश्न और आर्थिक-सामाजिक समस्याओं को अधिक महत्त्व मिला।
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नीट पेपर लीक के बाद धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के लिए पूरा देश साथ था, हम सभी लोग उनके इस्तीफे की मांग कर रहे थे!! 🇮🇳 परन्तु कल होने वाला आंदोलन मुख्यतः जो CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर है, ऐसा प्रतीत हो रहा है उसमें देशभर के आम नागरिकों का खुला सपोर्ट नहीं है। यही आंदोलन इस तरह से लग रहा है जैसे BJP के सभी विरोधी देश दुनिया से इकट्ठा हो गए हैं और अपना गुस्सा निकाल रहे हैं... 📢 बाकी कल की स्थिति ही बताएगी कि इस आंदोलन में जनसमर्थन कितना है...? 😊❤️👍
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असिस्टेंट प्रोफेसर 2026 📚
आवेदन में त्रुटि में सुधार प्रारंभ ✍️
https://apply.upessc.org/
अंतिम तिथि - 11 अक्टूबर 📅
आवेदन में त्रुटि में सुधार प्रारंभ ✍️
https://apply.upessc.org/
अंतिम तिथि - 11 अक्टूबर 📅
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Dear Prime Minister Ambnai
स्टारलिंक की भारत में एंट्री को लेकर जारी विवाद के बीच एलन मस्क ने मुकेश अंबानी को 'प्रधानमंत्री अंबानी' कहकर संबोधित करते हुए उनसे माफी मांगी और उन्हें भारत का 'असली बॉस' बताया है।
मस्क ने कहा, "आप एकाधिकार के ज़रिए भारतीयों का शोषण जारी रखना चाहेंगे लेकिन फिर भी...क्या आप स्टारलिंक को प्रतिस्पर्धा की अनुमति देने पर विचार करेंगे?"
❤5
Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️ (Roshni Pareek)
📚 ईश्वर चंद्र विद्यासागर की प्रमुख पुस्तकें, प्रकाशन-वर्ष एवं विषय—
स्रोत: Partha Chattopadhyay, “Preparation of a Bibliography on and by Pandit Iswar Chandra Vidyasagar: An Informetric Analysis,” Heritage Journal, Bethune College, Vol. VII (2020).
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शैक्षिक एवं भाषाई पुस्तकें
1. बोधोदय (Bodhoday) — 1851 — प्रारंभिक ज्ञान एवं शिक्षाप्रद पाठ्यपुस्तक।
2. संस्कृत व्याकरण की उपक्रमणिका — 1851 — संस्कृत व्याकरण की प्रारंभिक शिक्षा।
3. ऋजुपाठ (भाग 1–3) — 1851, 1852, 1853 — संस्कृत भाषा एवं व्याकरण का शिक्षण।
4. व्याकरण कौमुदी (भाग 1–4) — 1853–1862 — संस्कृत व्याकरण।
5. वर्णपरिचय (भाग 1–2) — 1855 — बंगाली वर्णमाला एवं प्रारंभिक भाषा-शिक्षा।
6. कथामाला — 1856 — शिक्षाप्रद कहानियाँ एवं भाषा-शिक्षा।
7. पाठमाला — 1859 — भाषा-शिक्षा की पाठ्यपुस्तक।
8. शब्दमंजरी — 1864 — बंगाली शब्दकोश।
अनुवाद एवं साहित्यिक रचनाएँ
1. बेताल पंचविंशति — 1847 — बेताल पच्चीसी पर आधारित बंगाली रूपांतरण।
2. बांग्लार इतिहास — 1848 — मार्शमैन की History of Bengal का बंगाली अनुवाद।
3. जीवनचरित — 1849 — महान व्यक्तियों के जीवन-चरित्र।
4. शकुंतला — 1854 — कालिदास के अभिज्ञानशाकुंतलम् का बंगाली रूपांतरण।
5. चरितावली — 1856 — महान व्यक्तियों के जीवन-चरित्र।
6. महाभारत: उपक्रमणिका — 1860 — महाभारत का बंगाली अनुवाद।
7. सीतार वनवास — 1860 — संस्कृत साहित्य की रामकथा पर आधारित बंगाली रूपांतरण।(भवभूति के उत्तररामचरित की कथा पर आधारित बंगाली रचन)
8. आख्यान मंजरी — 1863 — कथात्मक एवं शिक्षाप्रद साहित्य।
9. भ्रांतिविलास — 1869 — शेक्सपियर के The Comedy of Errors पर आधारित बंगाली रूपांतरण।
10. वामनाख्यान — 1873 — पौराणिक आख्यान।
समाज सुधार संबंधी रचनाएँ
1. विधवा विवाह प्रचलित होना उचित है या नहीं — इस विषयक प्रस्ताव — 1855 — विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में।
2. बहुविवाह रहित होना उचित है या नहीं — इस विषयक विचार — भाग 1: 1871; भाग 2: 1873 — बहुविवाह का विरोध।
3. अति अल्प होइलो — 1873 — सामाजिक सुधार एवं समकालीन विवादों पर व्यंग्यात्मक लेखन।
4. आबार अति अल्प होइलो — 1873 — सामाजिक सुधार संबंधी आलोचनात्मक लेखन।
स्रोत: Partha Chattopadhyay, “Preparation of a Bibliography on and by Pandit Iswar Chandra Vidyasagar: An Informetric Analysis,” Heritage Journal, Bethune College, Vol. VII (2020).
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