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No Document No History
दोस्तों
आप सबको जैसे जैसे प्रेमी जोड़े याद आए इसमें ऐड करते चलो
जोड़ो की संख्या बढ़ रही है...प्राचीन भारत में भी प्रेम विवाह बहुत होते थे
कितना आगे था हमारा हिंदुस्तान,
अब तो अंतर जाति विवाह बोले तो झगड़ा हो जाता है 😂😂
आप सबको जैसे जैसे प्रेमी जोड़े याद आए इसमें ऐड करते चलो
जोड़ो की संख्या बढ़ रही है...प्राचीन भारत में भी प्रेम विवाह बहुत होते थे
कितना आगे था हमारा हिंदुस्तान,
अब तो अंतर जाति विवाह बोले तो झगड़ा हो जाता है 😂😂
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मृत्यु उपरांत उपाधियां
🖊बाबर - फिरदौस मकानी
🖍हुमायूं - जन्नत अशियानी
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CG_SET_History_Paper2_Solved_Sumit_Pandey.pdf
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विशेष आभार - मित्र सुमित पांडेय जी⭐
इतिहास की बेहतरीन
क्विज के लिए ज्वाइन करें💙 ⬇️ ⚡
https://t.me/+bqS2kyNkG6I4ZWVl
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️ (Roshni Pareek)
कर्वे और विधवा-विवाह आंदोलन : संगठन, सदस्य एवं प्रमुख घटनाएँ✅
विधवा-विवाह अधिनियम, 1856 के बावजूद विधवा-पुनर्विवाह की संख्या बहुत कम थी। कर्वे ने महसूस किया कि केवल व्यक्तिगत रूप से विधवा-विवाह करना पर्याप्त नहीं है; इसके लिए संगठित प्रयास और जनमत तैयार करना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से उन्होंने विधवा-विवाह के लिए एक संगठन बनाने का निर्णय लिया।
👉🏻संगठन की स्थापना — 1893
• 31 दिसंबर 1893, वर्धा में प्रोफेसर कर्वे ने विधवा-विवाह के समर्थकों की बैठक बुलाई।
• वामनराव कोल्हटकर (विदर्भ) उनके प्रमुख समर्थकों में थे।
• इसी प्रयास से Widow Marriage Association की स्थापना हुई।
• प्रोफेसर कर्वे — सचिव (Secretary)
• डॉ. आर. जी. भांडारकर — अध्यक्ष (President)
• मुख्यालय — पूना
संगठन ने जानबूझकर अपना उद्देश्य सीमित रखा। अंतरजातीय विवाह तथा विवाह की अलग-अलग धार्मिक/सामाजिक विधियों जैसे विवादास्पद मुद्दों को इसके उद्देश्यों से बाहर रखा गया, ताकि समाज का समर्थन आसानी से प्राप्त किया जा सके।
👉🏻सदस्यता
संगठन की सदस्यता केवल ऐसे लोगों के लिए थी जो:
• स्वयं विधवा से विवाह कर चुके हों, या
• विधवा से विवाह करने वाले व्यक्ति के साथ भोजन करने में भी संकोच न करते हों।
इसके अलावा Sympathisers (सहानुभूति रखने वालों) की अलग श्रेणी थी।
➡️ सदस्य या sympathiser को एक दिन की आय subscription के रूप में देनी होती थी।
👉🏻प्रमुख संस्थापक सदस्य
संगठन के कुल 7 founder-members थे। दिए गए पेजों में विशेष रूप से:
• वामनराव कोल्हटकर — विदर्भ
• फड़के — हैदराबाद, डेक्कन
• भास्करराव गोवंडे — पूना
का उल्लेख मिलता है।
भास्करराव गोवंडे ने अपनी बहन के दूसरे विवाह को करवाने में पहल की थी और वे कर्वे के प्रमुख सहयोगियों में थे।
कोल्हटकर स्वयं विधवा से विवाह कर चुके थे और विदर्भ में कई विधवा-विवाह करवाने में सहायक रहे।
⸻
👉🏻 संगठन की पहली सभा — मई 1894
संगठन ने जनता की राय अपने पक्ष में बनाने के लिए सक्रिय समर्थकों के परिवारों की वार्षिक सभाएँ आयोजित करने का निर्णय लिया।
• पहली सभा — मई 1894, पूना
• 5 परिवार
• कुल 22 सदस्य उपस्थित हुए।
• प्रमुख आमंत्रित व्यक्तियों में:
• प्रिंसिपल जी. जी. आगरकर
• प्रोफेसर सी. जी. भानु
• राव बहादुर सी. एन. भट
बाद के वर्षों में जब भी ऐसी सभाएँ हुईं, उनमें काफी लोग आने लगे और उन्हें अच्छा समर्थन मिला। हालांकि बाद में इन वार्षिक सभाओं की परंपरा बंद कर दी गई।
इसके स्थान पर संगठन ने हर वर्ष 25 जुलाई को Widow Remarriage Day मनाना शुरू किया, क्योंकि 25 जुलाई 1856 को Widow Remarriage Act पारित हुआ था।
👉🏻संगठन का नाम बदला — 1895
1895 में Widow Marriage Association का नाम बदलकर:
“The Association for the Removal of Restrictions to the Marriage of Widows”
कर दिया गया।
यह नाम स्वयं प्रोफेसर कर्वे ने सुझाया था।
कारण यह था कि केवल “Widow Marriage” की बात करने की अपेक्षा “विधवा-विवाह पर लगे प्रतिबंधों को हटाने” की बात समाज को कम विवादास्पद लगती और संगठन को अधिक सामाजिक समर्थन मिल सकता था।
👉🏻कर्वे का व्यक्तिगत योगदान
कर्वे केवल संगठन चलाने और भाषण देने तक सीमित नहीं रहे। वे स्वयं विधवा-विवाह करवाने के प्रयास करते रहे।
19वीं शताब्दी के अंतिम सात वर्षों में वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पाँच विधवा-विवाह करवाने में सहायक रहे।
इनमें अंतिम विवाह विशेष रूप से महत्वपूर्ण था:
• दुल्हन — मनु, कर्वे की अपनी भतीजी।
• कर्वे ने दादा को मनु का विवाह एक गरीब लेकिन बुद्धिमान युवक भिकू बिवलकर से करने के लिए प्रेरित किया।
• बाद में भिकू की मृत्यु हो गई।
• 1899 में मनु का विवाह प्रोफेसर जी. सी. भाटे से हुआ, जो कर्वे के फर्ग्यूसन कॉलेज के सहकर्मी थे और अपनी पहली पत्नी को खो चुके थे।
https://t.me/historyfact00
विधवा-विवाह अधिनियम, 1856 के बावजूद विधवा-पुनर्विवाह की संख्या बहुत कम थी। कर्वे ने महसूस किया कि केवल व्यक्तिगत रूप से विधवा-विवाह करना पर्याप्त नहीं है; इसके लिए संगठित प्रयास और जनमत तैयार करना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से उन्होंने विधवा-विवाह के लिए एक संगठन बनाने का निर्णय लिया।
👉🏻संगठन की स्थापना — 1893
• 31 दिसंबर 1893, वर्धा में प्रोफेसर कर्वे ने विधवा-विवाह के समर्थकों की बैठक बुलाई।
• वामनराव कोल्हटकर (विदर्भ) उनके प्रमुख समर्थकों में थे।
• इसी प्रयास से Widow Marriage Association की स्थापना हुई।
• प्रोफेसर कर्वे — सचिव (Secretary)
• डॉ. आर. जी. भांडारकर — अध्यक्ष (President)
• मुख्यालय — पूना
संगठन ने जानबूझकर अपना उद्देश्य सीमित रखा। अंतरजातीय विवाह तथा विवाह की अलग-अलग धार्मिक/सामाजिक विधियों जैसे विवादास्पद मुद्दों को इसके उद्देश्यों से बाहर रखा गया, ताकि समाज का समर्थन आसानी से प्राप्त किया जा सके।
👉🏻सदस्यता
संगठन की सदस्यता केवल ऐसे लोगों के लिए थी जो:
• स्वयं विधवा से विवाह कर चुके हों, या
• विधवा से विवाह करने वाले व्यक्ति के साथ भोजन करने में भी संकोच न करते हों।
इसके अलावा Sympathisers (सहानुभूति रखने वालों) की अलग श्रेणी थी।
➡️ सदस्य या sympathiser को एक दिन की आय subscription के रूप में देनी होती थी।
👉🏻प्रमुख संस्थापक सदस्य
संगठन के कुल 7 founder-members थे। दिए गए पेजों में विशेष रूप से:
• वामनराव कोल्हटकर — विदर्भ
• फड़के — हैदराबाद, डेक्कन
• भास्करराव गोवंडे — पूना
का उल्लेख मिलता है।
भास्करराव गोवंडे ने अपनी बहन के दूसरे विवाह को करवाने में पहल की थी और वे कर्वे के प्रमुख सहयोगियों में थे।
कोल्हटकर स्वयं विधवा से विवाह कर चुके थे और विदर्भ में कई विधवा-विवाह करवाने में सहायक रहे।
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👉🏻 संगठन की पहली सभा — मई 1894
संगठन ने जनता की राय अपने पक्ष में बनाने के लिए सक्रिय समर्थकों के परिवारों की वार्षिक सभाएँ आयोजित करने का निर्णय लिया।
• पहली सभा — मई 1894, पूना
• 5 परिवार
• कुल 22 सदस्य उपस्थित हुए।
• प्रमुख आमंत्रित व्यक्तियों में:
• प्रिंसिपल जी. जी. आगरकर
• प्रोफेसर सी. जी. भानु
• राव बहादुर सी. एन. भट
बाद के वर्षों में जब भी ऐसी सभाएँ हुईं, उनमें काफी लोग आने लगे और उन्हें अच्छा समर्थन मिला। हालांकि बाद में इन वार्षिक सभाओं की परंपरा बंद कर दी गई।
इसके स्थान पर संगठन ने हर वर्ष 25 जुलाई को Widow Remarriage Day मनाना शुरू किया, क्योंकि 25 जुलाई 1856 को Widow Remarriage Act पारित हुआ था।
👉🏻संगठन का नाम बदला — 1895
1895 में Widow Marriage Association का नाम बदलकर:
“The Association for the Removal of Restrictions to the Marriage of Widows”
कर दिया गया।
यह नाम स्वयं प्रोफेसर कर्वे ने सुझाया था।
कारण यह था कि केवल “Widow Marriage” की बात करने की अपेक्षा “विधवा-विवाह पर लगे प्रतिबंधों को हटाने” की बात समाज को कम विवादास्पद लगती और संगठन को अधिक सामाजिक समर्थन मिल सकता था।
👉🏻कर्वे का व्यक्तिगत योगदान
कर्वे केवल संगठन चलाने और भाषण देने तक सीमित नहीं रहे। वे स्वयं विधवा-विवाह करवाने के प्रयास करते रहे।
19वीं शताब्दी के अंतिम सात वर्षों में वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पाँच विधवा-विवाह करवाने में सहायक रहे।
इनमें अंतिम विवाह विशेष रूप से महत्वपूर्ण था:
• दुल्हन — मनु, कर्वे की अपनी भतीजी।
• कर्वे ने दादा को मनु का विवाह एक गरीब लेकिन बुद्धिमान युवक भिकू बिवलकर से करने के लिए प्रेरित किया।
• बाद में भिकू की मृत्यु हो गई।
• 1899 में मनु का विवाह प्रोफेसर जी. सी. भाटे से हुआ, जो कर्वे के फर्ग्यूसन कॉलेज के सहकर्मी थे और अपनी पहली पत्नी को खो चुके थे।
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️ (Roshni Pareek)
ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
कर्वे और विधवा-विवाह आंदोलन : संगठन, सदस्य एवं प्रमुख घटनाएँ✅ विधवा-विवाह अधिनियम, 1856 के बावजूद विधवा-पुनर्विवाह की संख्या बहुत कम थी। कर्वे ने महसूस किया कि केवल व्यक्तिगत रूप से विधवा-विवाह करना पर्याप्त नहीं है; इसके लिए संगठित प्रयास और जनमत तैयार करना…
📌रानाडे वाला महत्वपूर्ण प्रसंग
इसी संगठन के काम के दौरान कर्वे को बंबई की Winter Lectures Series (हेमंत-व्याख्यान माला) में बोलने के लिए बुलाया गया।
विषय: “Twenty-five Years of the Widow Remarriage Movement”
• स्थान — आर्य समाज मंदिर, बंबई
• अध्यक्ष — मिस्टर जस्टिस रानाडे
• कर्वे ने लगभग एक घंटे भाषण दिया।
कर्वे ने कहा कि गृहस्थाश्रम पुरुष और महिला दोनों के लिए सबसे अच्छा और वांछनीय जीवन है। ब्रह्मचर्य का जीवन बहुत कम लोग अपना सकते हैं—शायद हजार में एक—जो पूरी निष्ठा से मानवता की सेवा में अपना जीवन लगा दें। इसलिए ऐसी महिलाओं पर आजीवन विधवापन थोपना उचित नहीं है, जिनकी स्वाभाविक इच्छा फिर से गृहिणी बनने की हो।
फिर गजानन भास्कर वैद्य का भाषण
कर्वे के बाद गजानन भास्कर वैद्य ने भाषण दिया। उन्होंने विधवा-विवाह आंदोलन की धीमी प्रगति के लिए जिम्मेदार लोगों की तीखी आलोचना की।
उनका मुख्य निशाना जस्टिस रानाडे थे, क्योंकि रानाडे ने अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद विधवा से विवाह करने के बजाय एक कम उम्र की अविवाहित लड़की से दूसरा विवाह किया था।
वैद्य ने रानाडे की बहुत तीखी आलोचना की। उनका भाषण इतना आक्रामक हो गया कि श्रोता बेचैन होने लगे।
रानाडे का जवाब — इसके बाद रानाडे स्वयं बोलने के लिए खड़े हुए।
उन्होंने बिल्कुल शांत और विनम्र तरीके से कहा कि वे अपने से पहले बोलने वाले वक्ता की बातों से सहमत हैं। उन्होंने यह भी माना कि सदाशिवराव केलकर, जिन्होंने दूसरी पत्नी के रूप में एक विधवा को अपनाया था, को अध्यक्ष की कुर्सी पर होना चाहिए था।
रानाडे के शब्दों का भाव था:
“हम कमजोर और असहाय लोग हैं। इसलिए, मेरे युवा मित्र, आप हमारा नेतृत्व कीजिए और हम अपनी कमजोरी के बावजूद जितनी शक्ति और क्षमता रखते हैं, उससे आपका अनुसरण करेंगे।”
कर्वे इस विनम्र स्वीकारोक्ति और उदारता से बहुत प्रभावित हुए।
इसके बाद रानाडे ने लगभग आधे घंटे तक भाषण दिया और अपने प्रभावशाली वक्तृत्व से पूरे श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। जब वे बैठे, तो श्रोता पहले हुई तीखी बहस को लगभग भूल चुके थे।
https://t.me/historyfact00
इसी संगठन के काम के दौरान कर्वे को बंबई की Winter Lectures Series (हेमंत-व्याख्यान माला) में बोलने के लिए बुलाया गया।
विषय: “Twenty-five Years of the Widow Remarriage Movement”
• स्थान — आर्य समाज मंदिर, बंबई
• अध्यक्ष — मिस्टर जस्टिस रानाडे
• कर्वे ने लगभग एक घंटे भाषण दिया।
कर्वे ने कहा कि गृहस्थाश्रम पुरुष और महिला दोनों के लिए सबसे अच्छा और वांछनीय जीवन है। ब्रह्मचर्य का जीवन बहुत कम लोग अपना सकते हैं—शायद हजार में एक—जो पूरी निष्ठा से मानवता की सेवा में अपना जीवन लगा दें। इसलिए ऐसी महिलाओं पर आजीवन विधवापन थोपना उचित नहीं है, जिनकी स्वाभाविक इच्छा फिर से गृहिणी बनने की हो।
फिर गजानन भास्कर वैद्य का भाषण
कर्वे के बाद गजानन भास्कर वैद्य ने भाषण दिया। उन्होंने विधवा-विवाह आंदोलन की धीमी प्रगति के लिए जिम्मेदार लोगों की तीखी आलोचना की।
उनका मुख्य निशाना जस्टिस रानाडे थे, क्योंकि रानाडे ने अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद विधवा से विवाह करने के बजाय एक कम उम्र की अविवाहित लड़की से दूसरा विवाह किया था।
वैद्य ने रानाडे की बहुत तीखी आलोचना की। उनका भाषण इतना आक्रामक हो गया कि श्रोता बेचैन होने लगे।
रानाडे का जवाब — इसके बाद रानाडे स्वयं बोलने के लिए खड़े हुए।
उन्होंने बिल्कुल शांत और विनम्र तरीके से कहा कि वे अपने से पहले बोलने वाले वक्ता की बातों से सहमत हैं। उन्होंने यह भी माना कि सदाशिवराव केलकर, जिन्होंने दूसरी पत्नी के रूप में एक विधवा को अपनाया था, को अध्यक्ष की कुर्सी पर होना चाहिए था।
रानाडे के शब्दों का भाव था:
“हम कमजोर और असहाय लोग हैं। इसलिए, मेरे युवा मित्र, आप हमारा नेतृत्व कीजिए और हम अपनी कमजोरी के बावजूद जितनी शक्ति और क्षमता रखते हैं, उससे आपका अनुसरण करेंगे।”
कर्वे इस विनम्र स्वीकारोक्ति और उदारता से बहुत प्रभावित हुए।
इसके बाद रानाडे ने लगभग आधे घंटे तक भाषण दिया और अपने प्रभावशाली वक्तृत्व से पूरे श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। जब वे बैठे, तो श्रोता पहले हुई तीखी बहस को लगभग भूल चुके थे।
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Forwarded from 𝗧𝗵𝗲 𝗚𝕐𝗮𝗻𝗱𝗮𝘆𝗻𝗶 𝗩αυLƚ••°
Ek hi topic se question aaya hai... Alg alg tareeke se.
Dono exam bhi ek hi din huye...
Dono exam bhi ek hi din huye...
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Forwarded from Abhishek Lakhera
ब्रिटिश यात्री जहाज,
7 मई 1915
7 मई 1915
❤2👍2👏1
Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️ (A B)
C✅
Vedic Index of Names and Subjects — 1912
(The Wonder That Was India — 1954
A History of South India — 1955
Kings and Cults — 1993
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Vedic Index of Names and Subjects — 1912
(The Wonder That Was India — 1954
A History of South India — 1955
Kings and Cults — 1993
https://t.me/historyfact00
❤1
Forwarded from Achrya
UGC NET AGP JRF BY No Document No History.pdf
7.6 MB
2009 से 2015 तक का pdf है agp पब्लिकेशन
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https://t.me/Ramsing2023
जिसको आगे की pdf चाहिए dil जरूर भेजे ❤️✅💓
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जिसको आगे की pdf चाहिए dil जरूर भेजे ❤️✅💓
❤27👍1👏1
Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️ (A B)
मुहम्मद अली जिन्ना :
1904—कांग्रेस के बंबई अधिवेशन में भाग लिया
1906—कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी के सचिव के रूप में कार्य किया
1909—बंबई विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित हुए
1910—इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य बने
1913—मुस्लिम लीग में शामिल हुए
1916—लखनऊ समझौते में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई
1919—रॉलेट एक्ट के विरोध में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल से इस्तीफा दिया
1920—कांग्रेस से अलग हुए
1928—नेहरू रिपोर्ट का विरोध किया
1929—नेहरू रिपोर्ट के जवाब में जिन्ना के 14 सूत्र प्रस्तुत किए
1934—भारत लौटकर मुस्लिम लीग के पुनर्गठन में सक्रिय हुए
23 मार्च 1940—लाहौर प्रस्ताव पारित हुआ; जिन्ना ने अधिवेशन की अध्यक्षता की और फ़ज़लुल हक ने प्रस्ताव पेश किया।
1941—दिल्ली से अंग्रेज़ी साप्ताहिक Dawn का प्रकाशन शुरू हुआ, 1942 में दैनिक बना
1944—गांधी-जिन्ना वार्ता हुई।
1946—चुनावों में मुस्लिम लीग का नेतृत्व किया और मुस्लिम निर्वाचन क्षेत्रों में सफलता प्राप्त की।
1946—प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस के बाद कलकत्ता में सांप्रदायिक हिंसा हुई।
15 अगस्त 1947—पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर-जनरल बने।
https://t.me/historyfact00
1904—कांग्रेस के बंबई अधिवेशन में भाग लिया
1906—कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी के सचिव के रूप में कार्य किया
1909—बंबई विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित हुए
1910—इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य बने
1913—मुस्लिम लीग में शामिल हुए
1916—लखनऊ समझौते में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई
1919—रॉलेट एक्ट के विरोध में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल से इस्तीफा दिया
1920—कांग्रेस से अलग हुए
1928—नेहरू रिपोर्ट का विरोध किया
1929—नेहरू रिपोर्ट के जवाब में जिन्ना के 14 सूत्र प्रस्तुत किए
1934—भारत लौटकर मुस्लिम लीग के पुनर्गठन में सक्रिय हुए
23 मार्च 1940—लाहौर प्रस्ताव पारित हुआ; जिन्ना ने अधिवेशन की अध्यक्षता की और फ़ज़लुल हक ने प्रस्ताव पेश किया।
1941—दिल्ली से अंग्रेज़ी साप्ताहिक Dawn का प्रकाशन शुरू हुआ, 1942 में दैनिक बना
1944—गांधी-जिन्ना वार्ता हुई।
1946—चुनावों में मुस्लिम लीग का नेतृत्व किया और मुस्लिम निर्वाचन क्षेत्रों में सफलता प्राप्त की।
1946—प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस के बाद कलकत्ता में सांप्रदायिक हिंसा हुई।
15 अगस्त 1947—पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर-जनरल बने।
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❤2🔥1