Forwarded from PDF WALLAH
[Oct-EN] Speedy current affairs.pdf
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✅OCTOBER 2026 SPEEDY CURRENT AFFAIRS ENGLISH PDF
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Forwarded from Saurabh Chaubey
*प्रेस_की_भूमिका_एवं_प्रभाव*
अकबर इलाहाबादी (1846-1921), अखबार की अहमियत बताते हुए कहते हैं,
*खींचो न कमानों को न तलवार निकालो*
*जब तोप मुकाबिल होतो अखबार निकालो*
राष्ट्रीय भावना के उदय एवं विकास में प्रेस की भूमिका उल्लेखनीय रही है। राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रत्येक पहलू के विषय में चाहे वह आर्थिक हो या सामाजिक, सांस्कृतिक हो या राजनीतिक प्रेस ने आगे बढ़कर जनता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व किया। प्रेस ने ही जनता को आवश्यक राजनीतिक शिक्षा दी तथा जनजागरण फैलाया। ब्रिटिश सरकार की वास्तविक नीति उसकी दोहरी चालों तथा भारतीयों के शोषण को जनता के सामने रखने का कार्य प्रेस ने ही किया। पत्रकारिता के साथ अनेक देशभक्तों तथा जाने-माने नेताओं का नाम जुड़ा था। तिलक, गाँधीजी, अम्बेडकर के लेखों का लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा।
भारतीय भाषाओं के पत्रों का प्रभाव जैसे-जैसे बढ़ता गया उसी अनुपात में भारतियों का असंतोष भी बढ़ता गया। भाषायी समाचार पत्र की कटु आलोचना से परेशान होकर लार्ड लिटन ने *वर्नाक्यूलर_प्रेस_एक्ट* पास किया था। वर्नाक्युलर अधिनियम से बाहरी रूप से प्रेस चुप हो गया परन्तु असंतोष भूमिगत हो गया। यह तो ऐसी ही बात थी जैसे धुएं को समाप्त करने के लिए चिमनी को ही बन्द कर दिया जाए।
लार्ड कर्जन तथा भारत सचिव हैंमिलटन भी इन भाषायी पत्रो से परेशान थे। हैमिलटन का विचार था कि अंग्रेजी शासन की बार-बार निंदा करके लोगों के मन में अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय भाषायी पत्र जनमत तैयार कर रहे हैं। बाद में लार्ड हाडिंग ने भी भारतीय भाषाओं के पत्रों की बढ़ती हुई महत्ता एवं प्रभाव को समझा था।
कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में *लार्ड कर्जन ने कहा कि "सत्य अनिवार्यतः एक पश्चिमी आदर्श है तथा पूरब में छल व चापलूसी को वरीयता दी जाती है। सत्य का उच्चतम आदर्श एक पश्चिमी अवधारणा है, अंग्रेजों ने ही इस आदर्श को भारतीयों तक पहुँचाया है।"* तब अमृतबाजार पत्रिका ने कर्जन की ही पुस्तक *प्रॉब्लम्स_ऑफ_द_फार_ईस्ट* से उदाहरण देकर कर्जन एवं तथाकथित नैतिक श्रेठता की पश्चिमी अवधारणा के पाखण्ड को ध्वस्त कर दिया था।
भारत में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों को नवीन ऊर्जा देने में पत-पत्रिकाओं की महती भूमिका रही। बाग्ला मासिक पत्रिका *तत्वबोधिनी की स्थापना महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर ने 1843 में किया था।* इसके प्रथम संपादक अक्षय कुमार दत्त थे। 1832 में बम्बईं से साप्ताहिक पत्र *दर्पण* की शुरुआत मराठी प्रकारिता के जनक *बालशास्त्री जांभेकर* ने किया था। विधवा विवाह के समर्थन हेतु जांभेकर ने दर्पण की शुरुआत की थी। 1852 में गुजराती में *करसोनदास मलजी ने विधवा विवाह के समर्थन हेतु सत्यप्रकाश* अखबार निकालना प्रारम्भ किया था। उन पर महाराज मानहानि केस, 1862 में चला था जिसमें वह निर्दंष सिद्ध हुए थे। बाद में सत्यप्रकाश का दादाभाई नैरोजी के रास्तगोफ्तार में विलय हो गया था।
1849 में मराठी भाषी *दयान_प्रकाश_पत्र (मराठी)* के प्रमुख लेखक गोपालहरि देशमुख थे। इस अखबार के संस्थापक के.टी. रानाडे थे। लोकहितवादी के नाम से प्रसिद्ध गोपालहरि देशमुख ने प्रभाकर नामक मराठी साप्ताहिक पत्र में सामाजिक- धार्मिंक सुधार, स्त्री-शिक्षा जैसे मुद्दों पर 1848 से 1850 के दौंरान *शतपत्रे(108 खुले पत्र)* लिखा था। कण्डुकुरी वीर सलिंगम पंतलु 1874 में आंध्र प्रदेश के राजमुंद्री से समाज सुधार पत्र *विवेकवर्धिनी तथा 1883 से मासिक पत्रिका सतीहित_बोधिनी* का प्रकाशन प्रारम्भ किया था। सतीहित बोधिनी तेलगु भाषा में महिलाओं के लिए प्रकाशित होने वाली पत्रिका थी। वीर सलिंगम को रानाडे ने *दक्षिण_का_विद्यासागर* कहा था।
कांग्रेस को एक सशक्त राजनैतिक संस्था बनाने में प्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण थी। *बंगवासी* का विचार था कि जब तक भारतीय अंग्रेजों को भयभीत करने में सफल नहीं होंगे, तब तक उन्हें विजय नहीं मिल सकती। उस काल के सबसे प्रभावकारी तथा पंजाब से प्रकाशित मुसलमान समाचार पत्र *पैसा_अखबार* का मत था कि 'स्वदेशी' हिंदुओं से अधिक मुसलमानों के लिए लाभप्रद होगा। अलीगढ़ इंस्टिट्यूट से मुसलमानों को सतर्क रहने की सलाह देते हुए स्वदेशी आंदोलन को बनाए रखने का सुझाव दिया था।
अंग्रेजों द्वारा भारतीयों का जो आर्थिक शोषण हो रहा था उसके विरुद्ध प्रेस ने आवाज उठायी। *भारतमित्र* ने भारत से चावल निर्यात करने का, (जबकि भारतवासी भूखो मरते थे) विरोध किया और लिखा
"*अपने_को_अन्न_नहीं_पाँच_वीर_संग_चले।"*
भारत से धन के निष्कासन को रोकने का प्रेस ने आह्वान किया। भारतेन्दु हरीशचन्द्र ने लिखा-
"*भीतर_भीतर_सब_रस_चूसे_बाहर_से_तन-मन-धन भूसे।*
*जाहिर_बातन_में_अति_तेज_क्यूं_सखि_साजन?नहिं_अंग्रेज।"*
अकबर इलाहाबादी (1846-1921), अखबार की अहमियत बताते हुए कहते हैं,
*खींचो न कमानों को न तलवार निकालो*
*जब तोप मुकाबिल होतो अखबार निकालो*
राष्ट्रीय भावना के उदय एवं विकास में प्रेस की भूमिका उल्लेखनीय रही है। राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रत्येक पहलू के विषय में चाहे वह आर्थिक हो या सामाजिक, सांस्कृतिक हो या राजनीतिक प्रेस ने आगे बढ़कर जनता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व किया। प्रेस ने ही जनता को आवश्यक राजनीतिक शिक्षा दी तथा जनजागरण फैलाया। ब्रिटिश सरकार की वास्तविक नीति उसकी दोहरी चालों तथा भारतीयों के शोषण को जनता के सामने रखने का कार्य प्रेस ने ही किया। पत्रकारिता के साथ अनेक देशभक्तों तथा जाने-माने नेताओं का नाम जुड़ा था। तिलक, गाँधीजी, अम्बेडकर के लेखों का लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा।
भारतीय भाषाओं के पत्रों का प्रभाव जैसे-जैसे बढ़ता गया उसी अनुपात में भारतियों का असंतोष भी बढ़ता गया। भाषायी समाचार पत्र की कटु आलोचना से परेशान होकर लार्ड लिटन ने *वर्नाक्यूलर_प्रेस_एक्ट* पास किया था। वर्नाक्युलर अधिनियम से बाहरी रूप से प्रेस चुप हो गया परन्तु असंतोष भूमिगत हो गया। यह तो ऐसी ही बात थी जैसे धुएं को समाप्त करने के लिए चिमनी को ही बन्द कर दिया जाए।
लार्ड कर्जन तथा भारत सचिव हैंमिलटन भी इन भाषायी पत्रो से परेशान थे। हैमिलटन का विचार था कि अंग्रेजी शासन की बार-बार निंदा करके लोगों के मन में अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय भाषायी पत्र जनमत तैयार कर रहे हैं। बाद में लार्ड हाडिंग ने भी भारतीय भाषाओं के पत्रों की बढ़ती हुई महत्ता एवं प्रभाव को समझा था।
कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में *लार्ड कर्जन ने कहा कि "सत्य अनिवार्यतः एक पश्चिमी आदर्श है तथा पूरब में छल व चापलूसी को वरीयता दी जाती है। सत्य का उच्चतम आदर्श एक पश्चिमी अवधारणा है, अंग्रेजों ने ही इस आदर्श को भारतीयों तक पहुँचाया है।"* तब अमृतबाजार पत्रिका ने कर्जन की ही पुस्तक *प्रॉब्लम्स_ऑफ_द_फार_ईस्ट* से उदाहरण देकर कर्जन एवं तथाकथित नैतिक श्रेठता की पश्चिमी अवधारणा के पाखण्ड को ध्वस्त कर दिया था।
भारत में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों को नवीन ऊर्जा देने में पत-पत्रिकाओं की महती भूमिका रही। बाग्ला मासिक पत्रिका *तत्वबोधिनी की स्थापना महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर ने 1843 में किया था।* इसके प्रथम संपादक अक्षय कुमार दत्त थे। 1832 में बम्बईं से साप्ताहिक पत्र *दर्पण* की शुरुआत मराठी प्रकारिता के जनक *बालशास्त्री जांभेकर* ने किया था। विधवा विवाह के समर्थन हेतु जांभेकर ने दर्पण की शुरुआत की थी। 1852 में गुजराती में *करसोनदास मलजी ने विधवा विवाह के समर्थन हेतु सत्यप्रकाश* अखबार निकालना प्रारम्भ किया था। उन पर महाराज मानहानि केस, 1862 में चला था जिसमें वह निर्दंष सिद्ध हुए थे। बाद में सत्यप्रकाश का दादाभाई नैरोजी के रास्तगोफ्तार में विलय हो गया था।
1849 में मराठी भाषी *दयान_प्रकाश_पत्र (मराठी)* के प्रमुख लेखक गोपालहरि देशमुख थे। इस अखबार के संस्थापक के.टी. रानाडे थे। लोकहितवादी के नाम से प्रसिद्ध गोपालहरि देशमुख ने प्रभाकर नामक मराठी साप्ताहिक पत्र में सामाजिक- धार्मिंक सुधार, स्त्री-शिक्षा जैसे मुद्दों पर 1848 से 1850 के दौंरान *शतपत्रे(108 खुले पत्र)* लिखा था। कण्डुकुरी वीर सलिंगम पंतलु 1874 में आंध्र प्रदेश के राजमुंद्री से समाज सुधार पत्र *विवेकवर्धिनी तथा 1883 से मासिक पत्रिका सतीहित_बोधिनी* का प्रकाशन प्रारम्भ किया था। सतीहित बोधिनी तेलगु भाषा में महिलाओं के लिए प्रकाशित होने वाली पत्रिका थी। वीर सलिंगम को रानाडे ने *दक्षिण_का_विद्यासागर* कहा था।
कांग्रेस को एक सशक्त राजनैतिक संस्था बनाने में प्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण थी। *बंगवासी* का विचार था कि जब तक भारतीय अंग्रेजों को भयभीत करने में सफल नहीं होंगे, तब तक उन्हें विजय नहीं मिल सकती। उस काल के सबसे प्रभावकारी तथा पंजाब से प्रकाशित मुसलमान समाचार पत्र *पैसा_अखबार* का मत था कि 'स्वदेशी' हिंदुओं से अधिक मुसलमानों के लिए लाभप्रद होगा। अलीगढ़ इंस्टिट्यूट से मुसलमानों को सतर्क रहने की सलाह देते हुए स्वदेशी आंदोलन को बनाए रखने का सुझाव दिया था।
अंग्रेजों द्वारा भारतीयों का जो आर्थिक शोषण हो रहा था उसके विरुद्ध प्रेस ने आवाज उठायी। *भारतमित्र* ने भारत से चावल निर्यात करने का, (जबकि भारतवासी भूखो मरते थे) विरोध किया और लिखा
"*अपने_को_अन्न_नहीं_पाँच_वीर_संग_चले।"*
भारत से धन के निष्कासन को रोकने का प्रेस ने आह्वान किया। भारतेन्दु हरीशचन्द्र ने लिखा-
"*भीतर_भीतर_सब_रस_चूसे_बाहर_से_तन-मन-धन भूसे।*
*जाहिर_बातन_में_अति_तेज_क्यूं_सखि_साजन?नहिं_अंग्रेज।"*
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Forwarded from Saurabh Chaubey
*अमृतबाजार* पत्रिका ने ही धननिकासी को सबसे ज्यादा छापा एवं समझाया था। सरकार की विदेश नीति पर भी प्रेस में पर्याप्त चर्चा होती थी। बर्मा युद को यह कहकर ग्लैडस्टन ने न्यायसंगत ठहराया था कि बर्मा में जो भारतीय थे उनकी रक्षा के लिए यह युद्ध लड़ा गया था। भारतीय प्रेस ने यह जानना चाहा कि वे कौन से 'भाग्यशाली भारतीय थे जिनके लिए यह युद्ध लड़ा गया ? प्रेस ने यह स्पष्ट कर दिया था कि युद्ध इंग्लैंड के साम्राज्यवादी हितों की रक्षा के लिए लड़ा गया था न कि भारतीयों की सुरक्षा के लिए। प्रेस का क्रांतिकारी विचारों को फैलाने तथा जनमत बनाने में भी महत्वूर्ण योगदान रहा है। *युगान्तर अखबार ने अंग्रेजी दमन को रोकने के लिए भारत की 30 करोड़ जनता को अपने 60 करोड़ हाथ उठाने को कहा था।* गणेश शंकर विद्यर्थीं को क्रांतिकारी लेखनी के कारण ही ब्रिटिश सरकार ने उनको पांच बार कारावास एवं अर्थदंड की सजा दी थी।
इस प्रकार भारतीय प्रेस ने राष्ट्रयता के प्रचार-प्रसार में अभूतपूर्व योगदान दिया। वह जनमत का प्रबल उत्प्रेरक एवं साम्राज्य विरोधी भावना का मुखर वाहक बन गया। कानून के संकुचित दायरे और सरकारी दमन के बावजूद इसने अभिव्यक्ति के नए- नए मार्ग ढूंढ़कर लोगों में राजनीतिक चेतना फैलाई और अन्याय से लड़ने के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया।
आगे फिर कभी..जय जय🙏🙏
इस प्रकार भारतीय प्रेस ने राष्ट्रयता के प्रचार-प्रसार में अभूतपूर्व योगदान दिया। वह जनमत का प्रबल उत्प्रेरक एवं साम्राज्य विरोधी भावना का मुखर वाहक बन गया। कानून के संकुचित दायरे और सरकारी दमन के बावजूद इसने अभिव्यक्ति के नए- नए मार्ग ढूंढ़कर लोगों में राजनीतिक चेतना फैलाई और अन्याय से लड़ने के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया।
आगे फिर कभी..जय जय🙏🙏
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️ (Roshni Pareek)
📌भारत शासन अधिनियम, 1935: संघीय व्यवस्था की विफलता एवं ब्रिटिश नियंत्रण की निरंतरता—
https://t.me/historyfact00
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️ (Roshni Pareek)
“Some books tell us what happened; others make us pause and think about the stories, struggles, and choices that shaped our past.” 📚
📌विभाजन की असली कहानी — नरेंद्र सिंह सरिला की यह पुस्तक भारत के विभाजन के पीछे की राजनीतिक परिस्थितियों, ब्रिटिश नीतियों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की पड़ताल करती है। यह समझने में मदद करती है कि 1947 का विभाजन केवल भारत की आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें वैश्विक राजनीतिक घटनाक्रमों की भी भूमिका थी।
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📌विभाजन की असली कहानी — नरेंद्र सिंह सरिला की यह पुस्तक भारत के विभाजन के पीछे की राजनीतिक परिस्थितियों, ब्रिटिश नीतियों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की पड़ताल करती है। यह समझने में मदद करती है कि 1947 का विभाजन केवल भारत की आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें वैश्विक राजनीतिक घटनाक्रमों की भी भूमिका थी।
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