Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (Narvada Dubey)
महालवाड़ी व्यवस्था
महालवाड़ी व्यवस्था का प्रस्ताव सर्वप्रथम 1819 ई. में 'हॉल्ट मैकेंजी' द्वारा लाया गया था।
इस प्रस्ताव को 1822 ई. के रेग्यूलेशन-7 द्वारा क़ानूनी रूप प्रदान किया गया।
यह व्यवस्था उत्तर प्रदेश, मध्य प्रान्त तथा पंजाब में सर्वप्रथम लागू की गई।
महालवाड़ी व्यवस्था के अंतर्गत ब्रिटिश भारत की भूमि का लगभग 30% भाग सम्मिलित था।
इस व्यवस्था में प्रारम्भ में लगान की दर कुल उपज का 80% निश्चित की गई थी।
कालान्तर में लॉर्ड विलियम बैंटिक ने मार्टिन बर्ड, जिन्हें उत्तरी भारत में भूमि कर व्यवस्था का प्रवर्तक माना जाता है, के सहयोग से 1833 ई. का रेग्यूलेशन-9 पारित करवाया।
इसके अनुसार इस दर को कम करके 66% कर दिया गया।
1855 ई. में पुन: सहारनपुर नियम के अनुसार लॉर्ड डलहौज़ी ने लगान की दर को 50% निश्चित किया।
Iske alva iske bare m koi or information ho to btana
🤣🤣🤣
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️ (A B)
विभाजन को पढ़ना आसान नहीं होता ✍️
एक इतिहास के विद्यार्थी के रूप में हम न जाने कितने युद्ध पढ़ते हैं, लाखों मौतों के आँकड़े याद करते हैं, लेकिन भारत के विभाजन को पढ़ते समय मन कहीं न कहीं ठहर जाता है।
सवाल उठता है कि आखिर इंसान की ज़िंदगी की कीमत इतनी कम कैसे हो गई थी?
1947 में विभाजन के दौरान लाखों लोगों की जान गई और लगभग डेढ़ करोड़ लोग विस्थापित हुए। हिंदू हों या मुसलमान न जाने कितनों ने अपने घर रिश्ते और पुश्तैनी ज़मीन खो दी। बच्चों, बूढ़ों और औरतों तक को इसकी कीमत चुकानी पड़ी।
इतिहास के आँकड़ों के पीछे न जाने कितनी कहानियाँ, कितने सपने और कितने उजड़े परिवार थे।
शायद कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जिन्हें केवल पढ़ा नहीं जा सकता, महसूस भी करना पड़ता है। विभाजन उन्हीं में से एक है, क्योंकि देश का बँटवारा एक दिन में हो सकता है लेकिन उजड़े जीवन को सँभलने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं।
आज जब हम आज़ादी का उत्सव मनाते हैं, तो उसकी कीमत भी याद रखनी चाहिए। आज़ादी का वास्तविक सम्मान केवल जश्न मनाना नहीं, बल्कि उस इंसानियत को बचाए रखना है, जिसकी कीमत कभी लाखों लोगों ने अपना सब कुछ खोकर चुकाई थी।
https://t.me/historyfact00
एक इतिहास के विद्यार्थी के रूप में हम न जाने कितने युद्ध पढ़ते हैं, लाखों मौतों के आँकड़े याद करते हैं, लेकिन भारत के विभाजन को पढ़ते समय मन कहीं न कहीं ठहर जाता है।
सवाल उठता है कि आखिर इंसान की ज़िंदगी की कीमत इतनी कम कैसे हो गई थी?
1947 में विभाजन के दौरान लाखों लोगों की जान गई और लगभग डेढ़ करोड़ लोग विस्थापित हुए। हिंदू हों या मुसलमान न जाने कितनों ने अपने घर रिश्ते और पुश्तैनी ज़मीन खो दी। बच्चों, बूढ़ों और औरतों तक को इसकी कीमत चुकानी पड़ी।
इतिहास के आँकड़ों के पीछे न जाने कितनी कहानियाँ, कितने सपने और कितने उजड़े परिवार थे।
शायद कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जिन्हें केवल पढ़ा नहीं जा सकता, महसूस भी करना पड़ता है। विभाजन उन्हीं में से एक है, क्योंकि देश का बँटवारा एक दिन में हो सकता है लेकिन उजड़े जीवन को सँभलने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं।
आज जब हम आज़ादी का उत्सव मनाते हैं, तो उसकी कीमत भी याद रखनी चाहिए। आज़ादी का वास्तविक सम्मान केवल जश्न मनाना नहीं, बल्कि उस इंसानियत को बचाए रखना है, जिसकी कीमत कभी लाखों लोगों ने अपना सब कुछ खोकर चुकाई थी।
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Forwarded from आदित्य राय
◼️आधार और इन्फोसिस के संस्थापक और पेपर लीक रोकने के लिए बनी समिति के अध्यक्ष नंदन नीलेकणी ने पेपर लीक को रोकने के लिए परीक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव का सुझाव दिया है
◼️नीलेकणी के अनुसार प्रश्न पत्र परीक्षा के दिन ही AI की मदद से तैयार किया जा सकते हैं।
◼️इसके लिए एक प्रश्न बैंक तैयार किया जा सकता है। सभी परीक्षाओं को कंप्यूटर आधारित परीक्षा में बदलने की जरूरत भी बताई।
◼️नीलेकणी के अनुसार प्रश्न पत्र परीक्षा के दिन ही AI की मदद से तैयार किया जा सकते हैं।
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Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (Jack Sparrow)
Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (Jack Sparrow)
कंपनी शासन में विभिन्न भू राजस्व प्रणालियों के अधीन क्षेत्र
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Forwarded from Gurukul History Education (History PYQs) (Narvada Dubey)
1935 के अधिनियम पर प्रभाव
साइमन रिपोर्ट
गोलमेज सम्मेलन
नेहरू रिपोर्ट
जिन्ना के सूत्र
लिनलिथगो समिति
व्हाइट पेपर
व्हाइट पेपर -सरकार किसी विषय पर जनता के सुझाव लेती है।
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