Forwarded from No Document No History (AɳƚαႦყα ʂιɳɠԋ)
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इतिहास की महत्त्वपूर्ण पुस्तकें (UGC NET/ PGT/TGT)
💐प्राचीन भारत–के सी श्रीवास्तव, पप्पू सिंह प्रजापत, सौरभ चौबे।
💐मध्यकालीन भारत–सौरभ चौबे, पप्पू सिंह प्रजापत।
💐आधुनिक भारत–परिक्षावाणी, अरविंद भास्कर।
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UGC NET. इतिहास
इतिहास की महत्त्वपूर्ण पुस्तकें (UGC NET/ PGT/TGT)
💐प्राचीन भारत–के सी श्रीवास्तव, पप्पू सिंह प्रजापत, सौरभ चौबे।
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No Document No History
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Forwarded from No Document No History (श्री.रामसिंग राजपूत⛳)
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इतिहास का विद्यार्थी होना केवल इतिहास पढ़ना नहीं, बल्कि हर तथ्य के पीछे छिपे सत्य को खोजने की क्षमता विकसित करना भी है।
प्राचीन काल से आधुनिक काल तक इतिहास में ऐसे अनेक व्यक्तित्व रहे हैं, जिनके विचारों, कार्यों और निर्णयों पर इतिहासकारों के अलग-अलग मत रहे हैं। लेकिन सवाल यह नहीं है कि कोई विषय विवादित क्यों है, बल्कि सवाल यह है कि वह विवादित है क्यों? उसके पीछे कौन-से तथ्य, संदर्भ और ऐतिहासिक व्याख्याएँ हैं?
आज स्थिति यह है कि यदि आप किसी व्यक्तित्व से जुड़ा कोई तथ्य प्रमाणित संदर्भों और पुस्तक के स्रोत के साथ साझा कर दें, तब भी कुछ लोग उसे स्वीकार करने के बजाय सीधे नकारने लगते हैं। विशेषकर गांधी, अंबेडकर जैसे व्यक्तित्वों के मामले में तो कई बार लोग तथ्यों को समझने से पहले ही समर्थन और विरोध के खाँचों में बँट जाते हैं। जबकि किसी व्यक्तित्व की प्रशंसा करना उसकी आलोचना से परे मान लेना नहीं है, और आलोचना करना उसका विरोधी होना नहीं है।
इतिहास में किसी तथ्य को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह हमारी पसंद के व्यक्तित्व के पक्ष में है, और केवल इसलिए नकारा भी नहीं जा सकता कि वह हमारे विचारों के विरुद्ध है। तथ्य को उसके स्रोत, संदर्भ और प्रमाणों के आधार पर परखना ही इतिहासबोध है। अधूरी जानकारी से बनी छवि हमेशा पूरी सच्चाई नहीं होती।
और हाँ, किसी से यह पूछने से पहले कि "तुम विरोधी हो या समर्थक?" एक बार खुद से भी पूछिए कि क्या आपने उस विषय को पढ़ा है, उसके संदर्भों को समझा है और उसके पक्ष-विपक्ष के तर्कों का अध्ययन किया है?
शोध का अर्थ अपनी मान्यताओं को सही सिद्ध करना नहीं, बल्कि प्रमाणों के आधार पर सत्य के निकट पहुँचना है। असहमति शोध का हिस्सा है, लेकिन बिना तर्क के कटाक्ष करना, किसी को नीचा दिखाना और हर अलग मत को व्यक्तिगत विरोध समझना बौद्धिकता नहीं है।
क्योंकि इतिहास में सबसे बड़ा संकट किसी तथ्य का विवादित होना नहीं, बल्कि बिना पढ़े उसे स्वीकार या अस्वीकार कर देना है।
प्राचीन काल से आधुनिक काल तक इतिहास में ऐसे अनेक व्यक्तित्व रहे हैं, जिनके विचारों, कार्यों और निर्णयों पर इतिहासकारों के अलग-अलग मत रहे हैं। लेकिन सवाल यह नहीं है कि कोई विषय विवादित क्यों है, बल्कि सवाल यह है कि वह विवादित है क्यों? उसके पीछे कौन-से तथ्य, संदर्भ और ऐतिहासिक व्याख्याएँ हैं?
आज स्थिति यह है कि यदि आप किसी व्यक्तित्व से जुड़ा कोई तथ्य प्रमाणित संदर्भों और पुस्तक के स्रोत के साथ साझा कर दें, तब भी कुछ लोग उसे स्वीकार करने के बजाय सीधे नकारने लगते हैं। विशेषकर गांधी, अंबेडकर जैसे व्यक्तित्वों के मामले में तो कई बार लोग तथ्यों को समझने से पहले ही समर्थन और विरोध के खाँचों में बँट जाते हैं। जबकि किसी व्यक्तित्व की प्रशंसा करना उसकी आलोचना से परे मान लेना नहीं है, और आलोचना करना उसका विरोधी होना नहीं है।
इतिहास में किसी तथ्य को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह हमारी पसंद के व्यक्तित्व के पक्ष में है, और केवल इसलिए नकारा भी नहीं जा सकता कि वह हमारे विचारों के विरुद्ध है। तथ्य को उसके स्रोत, संदर्भ और प्रमाणों के आधार पर परखना ही इतिहासबोध है। अधूरी जानकारी से बनी छवि हमेशा पूरी सच्चाई नहीं होती।
और हाँ, किसी से यह पूछने से पहले कि "तुम विरोधी हो या समर्थक?" एक बार खुद से भी पूछिए कि क्या आपने उस विषय को पढ़ा है, उसके संदर्भों को समझा है और उसके पक्ष-विपक्ष के तर्कों का अध्ययन किया है?
शोध का अर्थ अपनी मान्यताओं को सही सिद्ध करना नहीं, बल्कि प्रमाणों के आधार पर सत्य के निकट पहुँचना है। असहमति शोध का हिस्सा है, लेकिन बिना तर्क के कटाक्ष करना, किसी को नीचा दिखाना और हर अलग मत को व्यक्तिगत विरोध समझना बौद्धिकता नहीं है।
क्योंकि इतिहास में सबसे बड़ा संकट किसी तथ्य का विवादित होना नहीं, बल्कि बिना पढ़े उसे स्वीकार या अस्वीकार कर देना है।
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Forwarded from ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️ (A B)
ऐतिहासिक तथ्य 📖✍️
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यशवंत नरसिंह केलकर (Y. N. Kelkar) और डॉ. भीमराव अंबेडकर के बीच हुआ था। यह विवाद 1930 के दशक में उठा था और इसका संबंध पेशवा काल में अस्पृश्यों की स्थिति के बारे में अंबेडकर द्वारा किए गए एक ऐतिहासिक दावे से था।
डॉ. अंबेडकर ने अपने भाषण "Annihilation of Caste" (1936) तथा अन्य लेखों में यह उल्लेख किया कि पेशवा शासन में महार और अन्य तथाकथित अछूतों को अपमानजनक नियमों का पालन करना पड़ता था, जैसे—
गले में मिट्टी का बर्तन (थूकने के लिए) लटकाना,
कमर में झाड़ू बाँधना ताकि उनके पैरों के निशान मिट जाएँ,
आदि।
यशवंत नरसिंह केलकर ने इस दावे पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि इन विशिष्ट प्रथाओं के समर्थन में समकालीन सरकारी अभिलेखों या ऐतिहासिक दस्तावेज़ों का पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं है, इसलिए अंबेडकर को अपने दावे का स्रोत बताना चाहिए।
भीमराव अंबेडकर और यशवंत नारहर (Y. N.) केलकर के बीच हुए उस विवाद से है, जिसमें पेशवा काल में महरों के साथ हुए कथित व्यवहार पर बहस हुई थी, तो उसके स्रोत उपलब्ध हैं। यह केवल मौखिक परंपरा नहीं है।
मुख्य स्रोत:
'केसरी' (Kesari) समाचारपत्र, 1936–
यशवंत नारहर केलकर ने केसरी में डॉ. अंबेडकर के दावों पर प्रश्न उठाते हुए लेख लिखा और उनसे ऐतिहासिक प्रमाण माँगे। इसके उत्तर में डॉ. अंबेडकर ने भी केसरी में अपना पक्ष रखा। यह पूरा विवाद समाचारपत्र में प्रकाशित हुआ था।
य. न. केलकर की पुस्तक – भूतावर भ्रमण (Bhutavar Bhraman)
इस पुस्तक में केलकर ने इस विवाद तथा अपने तर्कों का उल्लेख किया है।
Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches (Government of Maharashtra / Dr. Ambedkar Foundation)
अंबेडकर के लेखन और पत्राचार के आधिकारिक संकलनों में उनके समकालीन लेखों और सार्वजनिक विवादों की सामग्री उपलब्ध है। शोध के लिए यह सबसे प्रामाणिक सरकारी स्रोतों में से एक माना जाता है।
https://t.me/historyfact00
डॉ. अंबेडकर ने अपने भाषण "Annihilation of Caste" (1936) तथा अन्य लेखों में यह उल्लेख किया कि पेशवा शासन में महार और अन्य तथाकथित अछूतों को अपमानजनक नियमों का पालन करना पड़ता था, जैसे—
गले में मिट्टी का बर्तन (थूकने के लिए) लटकाना,
कमर में झाड़ू बाँधना ताकि उनके पैरों के निशान मिट जाएँ,
आदि।
यशवंत नरसिंह केलकर ने इस दावे पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि इन विशिष्ट प्रथाओं के समर्थन में समकालीन सरकारी अभिलेखों या ऐतिहासिक दस्तावेज़ों का पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं है, इसलिए अंबेडकर को अपने दावे का स्रोत बताना चाहिए।
भीमराव अंबेडकर और यशवंत नारहर (Y. N.) केलकर के बीच हुए उस विवाद से है, जिसमें पेशवा काल में महरों के साथ हुए कथित व्यवहार पर बहस हुई थी, तो उसके स्रोत उपलब्ध हैं। यह केवल मौखिक परंपरा नहीं है।
मुख्य स्रोत:
'केसरी' (Kesari) समाचारपत्र, 1936–
यशवंत नारहर केलकर ने केसरी में डॉ. अंबेडकर के दावों पर प्रश्न उठाते हुए लेख लिखा और उनसे ऐतिहासिक प्रमाण माँगे। इसके उत्तर में डॉ. अंबेडकर ने भी केसरी में अपना पक्ष रखा। यह पूरा विवाद समाचारपत्र में प्रकाशित हुआ था।
य. न. केलकर की पुस्तक – भूतावर भ्रमण (Bhutavar Bhraman)
इस पुस्तक में केलकर ने इस विवाद तथा अपने तर्कों का उल्लेख किया है।
Dr. Babasaheb Ambedkar: Writings and Speeches (Government of Maharashtra / Dr. Ambedkar Foundation)
अंबेडकर के लेखन और पत्राचार के आधिकारिक संकलनों में उनके समकालीन लेखों और सार्वजनिक विवादों की सामग्री उपलब्ध है। शोध के लिए यह सबसे प्रामाणिक सरकारी स्रोतों में से एक माना जाता है।
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