सनातन धर्म • Sanatan Dharma
10.5K subscribers
394 photos
31 videos
19 files
501 links
🙏 Explore ❛ सनातन धर्म • Sanatana Dharma ❜

🕉️ @HinduStuff • @Geeta_HinduStuff
Download Telegram
शिव तंत्र (२)
------------


भी दुर्लभ महिमा अनंतकाल तक अविरल उत्सर्जित होती रहेगी।

भौतिक सोच और आध्यात्मिक सोच में आकाश पाताल का अंतर है। आध्यात्मिक सोच या चिंतन ब्रह्माण्डीय चिंतन है और भौतिक सोच क्षणिक और प्रतिक्रिया कारक है। आध्यात्मिक चिंतन ही शिव चिंतन है। इसमें अखण्डता एवं सत्य की विशुद्धता है। भौतिक सोच अर्ध सत्य या अशुद्धता का प्रतीक है। आध्यात्मिक ब्रह्माण्डीय चिंतन में मानने या मनवाने या फिर सैद्धांतिक रूप से सहमत कराने की व्यवस्था नहीं है जबकि भौतिक चिंतन तर्कों के अनुसार बनते और बिगड़ते रहते हैं। शिव के प्रतिरूप दिव्य ज्योतिर्लिङ्ग एवं विशिष्ट शिवलिङ्ग समयानुसार इस पृथ्वी पर प्रकट होते रहते हैं। पृथ्वी का तात्पर्य जल, समुद्र, पर्वत, गुफा, वन, हिमशिखर, मरूस्थल इत्यादि इत्यादि सभी जगहों से है। सभी शिवलिङ्ग अलौकिक और दिव्य शक्तियों के दाता होते हैं। शिव मात्र दाता है जो मागोगे मिलेगा इसमें लेश मात्र भी संशय नहीं है और जो नहीं मांगोगे वो भी मिलेगा। यह भी अकाट्य सत्य है। जो सोचा उसकी भी व्यवस्था होगी केवल शिव पर विश्वास रखो शिवलिङ्गों के प्राकट्य का यही रहस्य है।

दाता अपने अनंत वरूपों में अनंत दान देने के लिये सदैव तत्पर रहते हैं। मनुष्य ने बुद्धि मांगी उसे यह दिव्य एवं चमत्कारिक ग्रंथि प्राप्त हो गई। ध्यान रहे बुद्धि मात्र एक ग्रंथि है जो मनुष्यों में अन्यों की अपेक्षा ज्यादा विकसित है पिछले कुछ सौ वर्षो में मनुष्य ने सामूहिक रूप से अनंत भौतिक वस्तुओं की कामनायें की यह प्रक्रिया विश्व स्तर पर हुई और जब कोई प्रक्रिया विश्व स्तर पर होती है तो फल भी वैश्विक स्तर पर ही मिलते हैं। फलों का उपभोग किस प्रकार हो रहा है यह अलग बात है । एक बात आप ध्यान से समझें पूजन का तात्पर्य मात्र देवालय में आरती, मंत्रोच्चारण या शंख बजाना ही नहीं है। पूजन के तो अनंत मार्ग हैं, पूजन का उद्देश्य एकाग्रता के साथ पूर्ण हृदय के साथ अपनी मांगों को संप्रेषित करना है । शिव परमपिता परमेश्वर हैं उन्हें केवल देवालयों के पूजन से आबद्ध नहीं किया जा सकता। मनुष्य देवालयों में भी मांगता है, घर में भी मांगता है, बाजार में भी मांगता है, उसका कार्य मात्र मांगना ही है बाकी सब चमत्कारी निराकार शिव ही करता है।

सौ वर्षों की सामूहिक मांग ने आज विश्व स्तर पर सभी भौतिक संसाधनों से मानव जीवन को पाटकर रख दिया है। जो सोचा था उससे असंख्य गुना ज्यादा शिव ने दिया है। सभी जातियों ने अध्यात्म को समझना चाहा, "हम क्या हैं ?" सभी समझना चाहते हैं। आप देखिये सभी जातियों को इस विश्व में अपने अंदर शिवत्व समाहित किये गुरु प्राप्त हो गये। उनके चमत्कारिक स्पर्श से सामूहिक मानव धर्मो का अभ्युदय हुआ। सभी महान गुरुओं ने चाहे वे भारतवर्ष के हों या फिर विश्व के किसी अन्य भाग के अपने जीवन में मात्र विष ही पिया है। शिव पुत्रों की यही नियति है। शिव पुत्र ही ईश्वर पुत्र है। वन में विचरते साधु को लड्डू या पकवान नहीं मिलते हैं, न ही बिस्तर उनके साथ होता है, दो चार दिन में कभी भोजन मिल गया तो ठीक अन्यथा शिव सब व्यवस्था कर ही देते हैं। रामायण, महाभारत या विश्व के अन्य महान ग्रंथों की रचना करने वाले महापुरुषों को जीवन में क्या सुख सुविधायें प्राप्त थीं इसे इतिहास भलीभांति जानता है।

वेद व्यास तो काशी में अपने शिष्यों के साथ सात दिन तक भिक्षा मांगते रहे परन्तु सात रातें भूखे पेट ही सोना पड़ा। उस काशी में जहां माँ अन्नपूर्णा भगवान विश्वनाथ के साथ साक्षात् विराजमान हैं। तुलसीदास तो समाज से ही निष्कासित कर दिये गये थे। भोजन के लिये कोसों दूर जाकर भिक्षा मांगनी पड़ती थी। आदि गुरु शंकराचार्य जी अपनी मां की लाश को अकेले ही उठाकर श्मशान तक ले गये थे। सिद्धियां शिव भक्तों के चरणों में में लोटती हैं तुलसीदास जी ने तो अपने स्पर्श मात्र से ही मृत व्यक्ति को जीवित कर दिया था। सिद्धियां, दीक्षा, ज्ञान ये सब शिव ही प्रदान करते हैं। ये उन्हीं को प्राप्त होती हैं जो कि केवल इनका माध्यम बनकर संप्रेषण कर सकते हैं। दिव्य सिद्धियाँ स्वयं के उपयोग के लिये कदापि नहीं होती हैं ।

ज्योतिर्लिङ्ग पिण्ड स्वरूप हैं इसीलिये उत्सर्जन की प्रक्रिया चर्मोत्कर्ष की होती हैं । पिण्ड ही विशुद्धता के साथ उत्सर्जन कर सकता है। सूर्य पिण्ड स्वरूप साक्षात देव हैं निरंतर जीवनदायी अष्मा का उत्सर्जन करते रहते हैं । चन्द्र भी पिण्ड स्वरूप साक्षात् देव हैं निरंतर शीतलता प्रदान करते रहते हैं। ध्यान रहे हमारी आकाश गंगा में पंचभूतीय जीवन मात्र पृथ्वी पर है। वह भी इसलिये क्योंकि अन्य सभी ग्रह साक्षात् परम ज्योतिर्मय शिवलिङ्ग स्वरूप में आपको दिव्य एवं दुर्लभ ऊर्जायें प्रदान करते रहते हैं । यही शिव संरचना है। इनमें से एक की भी शक्ति के अभाव में आप क्षण भर भी जीवित नहीं रह सकते ।

(क्रमशः)

🙏
@Sanatan
🙏8👍4❤2👏1
शिव तंत्र (३)
------------


द्वादश ज्योतिर्लिङ्गों को समझना है तो फिर ब्रह्माण्डीय ज्योतिर्लिङ्गों को भी समझना होगा । वे भी दाता हैं। पंचभूतीय जीवन तो सिर्फ ग्रहण करता है । भिखमंगा जीवन है पूर्ण रूप से अशुद्ध इसीलिये इस पृथ्वी पर जब जन्म लिया हैं और इन्द्रियां ग्रहण की है तो फिर अपने दाता शिव स्वरूपों के प्रति कम- से-कम आभार तो प्रकट करना ही पड़ेगा। आभार के अलावा और कुछ कर भी नहीं सकते। आभार ही पूजन का आधार है।

हम में अशुद्धता है, विकृतियां हैं इसीलिये पूजने की कला सिखानी पड़ती है । इन्द्रियां हैं इसीलिये भ्रम का उत्पन्न होना निश्चित है। इंद्रियां भटकाव का मुख्य कारण है। 50 वर्ष या 60 वर्ष को सम्पूर्णता समझते हो तो जीवन की तह तक पहुंचना असम्भव है । जीवन यात्रा की अनंत कड़ी में 50-60 वर्ष मात्र एक कड़ी को निरूपित करते हैं। वह कड़ी जो कि दुधारी है। दुधारी इसलिये है क्योंकि इसी कड़ी में इंद्रियां साथ हैं। इन्द्रियां जहां गई वहां फिर ज्योतिर्लिङ्ग स्वरूप ही बचता है। इन्द्रियों के साथ शिव पूजन आपके वास्तविक स्वरूप के निकट आपको हमेशा बनाये रखेगा। आगे की यात्रा इससे आसान ही होगी। किसी जीव विज्ञानी से आप पूछिये शरीर के अंदर मौजूद अंतःस्त्रावी ग्रंथियों में इन्द्रियां क्यों नहीं होती । पिट्युटरी ग्रंथि हो, नासिका ग्रंथि हो, आंतों के उपर लगी पेन-क्रियाज हो इत्यादि-इत्यादि इन सब में इन्द्रियां क्यों नहीं है ? हृदय में स्वयं के लिये कितने न्यून तंत्रिका तंत्र लगे हैं, ऐसा क्यों ? ऐसा इसलिये क्योंकि ये सब केवल उत्सर्जन ही करते हैं दिव्य पद्धति, औषधियों, वनस्पतियों इत्यादि सबका तंत्र रूपी ज्ञान शिव ही अपने साधकों को प्रदान कर देते हैं। शिव के साधक हिम भूमि पर भी मंत्रों के द्वारा अग्नि प्रज्वलित कर लेते हैं । शिव साधक का तात्पर्य जीवन की अनंत सम्भावनाओं से हैं। असम्भव उनके लिये कुछ भी नहीं है।

शिव ही भागीरथी को संकल्प शक्ति देते हैं गंगा के अवतरण के लिये। कठिन से कठिन परिस्थितियों में जीवन निर्वाह एवं लक्ष्य प्राप्ति शिव तंत्र के बिना सम्भव नहीं है। तंत्र क्या है ? मात्र एक व्यवस्था ऐसी सहज व्यवस्था जिसके द्वारा न्यून से न्यून ऊर्जा के बल पर उत्कृष्ट परिणामों की प्राप्ति हो। शिव तंत्र शिव रहस्यों को समझने का विधान है। एक बार तंत्र के द्वारा रहस्य को समझ लिया तो फिर उस शक्ति विशेष को भी आप जागृत या आत्मसात कर सकते हैं। गूढ़ता सिर्फ इसलिये है कि अंदर कहीं न कहीं असहजता है। शिव तंत्र से सहज कुछ भी नहीं है। एक साधक गंगा तट पर वर्षों से जीवन यापन कर रहे हैं उनकी जितनी भी जरूरतें हैं वह सब नदी की धारा पूर्ण कर देती है। उन्हें ज्ञान है उसमें बहती हुई वनस्पतियों का, फलों का एवं अन्य दिव्य तत्वों का।

भगवान श्री राम की शिव तंत्र में अत्यन्त ही पारंगतता थी। उनके राज में कभी भी अकाल नहीं पड़ा, कभी भी वर्षा ने फसलों को नुकसान नहीं पहुंचाया, कभी ओला वृष्टि नहीं हुई। यहां तक की किसानों ने भूमि को जोतना ही बंद कर दिया । एक बार जो बो दिया बस उसे ही प्रतिवर्ष जाकर पुनः काट लेते थे । विभिन्न अनुष्ठानों, प्रयोगों, साधनाओं और अनुभव के साथ-साथ शिव की विशेष कृपा ने ही उन्हें इसमें निपुणता प्रदान की थी। आखिरकार उन्हीं के पवित्र हाथों से रामेश्वरम में ज्योतिर्लिङ्ग की स्थापना हुई है । प्रकृति में छेड़छाड़, असामान्य दोहन, बे सिर पैर की योजनायें, शित्र पूजन में अविश्वास इत्यादि शिव के कार्यों में छेड़छाड़ है। जो व्यक्ति ऐसा करते हैं उन्हें शिव तंत्र कभी सिद्ध नहीं होता है और शिवतंत्र के अभाव में जीवन घोर विपत्तियों से घिर जाता है। श्री राम के जीवन का एक हिस्सा राजा के रूप में भी है अर्थात वे पालक भी हैं, कहां अयोध्या और कहां दक्षिण में रामेश्वर । रामेश्वर में शिवलिङ्ग की स्थापना की, ठीक समुद्र के किनारे । ध्यान रहे समुद्र ही जीवनदायी वर्षा का केन्द्र है उसका परिणाम अयोध्या तक आया । राम राज्य की सीमा में कभी भी इन्द्र ने ताण्डव नहीं मचाया। समुद्र भी उनके प्रति कृतज्ञ है। प्रतिदिन उसे भी भगवान शिव के ज्योतिर्मय स्वरूप के दर्शन जो प्राप्त होते हैं। यही शिव तंत्र रहस्य है अति सूक्ष्म ।
शिव शासनत: शिव शासनत: 🌹

🙏 @Sanatan
👍5🙏4❤1
This media is not supported in your browser
VIEW IN TELEGRAM
🥰9🙏6❤4👍2👏1
🥰5👏1
This media is not supported in your browser
VIEW IN TELEGRAM
🙏🏼🌹जय गुरु देव🙇🏻‍♂️ 😊
महाशिवरात्रि की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं 😊

@Sanatan
🙏32❤15👍3🔥2
दधिची ऋषि ने धर्म की रक्षा के लिए अस्थि दान किया था !

उनकी हड्डियों से तीन धनुष बने-

१. गांडीव,
२. पिनाक
३. सारंग !
जिसमे से गांडीव अर्जुन को मिला था जिसके बल पर अर्जुन ने महाभारत का युद्ध जीता !

सारंग से भगवान राम ने युद्ध किया था और रावण के अत्याचारी राज्य को ध्वस्त किया था !

और, पिनाक था भगवान शिव जी के पास जिसे तपस्या के माध्यम से खुश भगवान शिव से रावण ने मांग लिया था !

परन्तु वह उसका भार लम्बे समय तक नहीं उठा पाने के कारण बीच रास्ते में जनकपुरी में छोड़ आया था !

इसी पिनाक की नित्य सेवा सीताजी किया करती थी ! पिनाक का भंजन करके ही भगवान राम ने सीता जी का वरण किया था !

ब्रह्मर्षि दधिची की हड्डियों से ही एकघ्नी नामक वज्र भी बना था जो भगवान इन्द्र को प्राप्त हुआ था !

इस एकघ्नी वज्र को इन्द्र ने कर्ण की तपस्या से खुश होकर उन्होंने कर्ण को दे दिया था! इसी एकघ्नी से महाभारत के युद्ध में भीम का महाप्रतापी पुत्र घटोत्कच कर्ण के हाथों मारा गया था ! और भी कई अश्त्र-शस्त्रों का निर्माण हुआ था उनकी हड्डियों से !

दधिची के इस अस्थि-दान का एक मात्र संदेश था
'' हे भारतीय वीरो शस्त्र उठाओ और अन्याय तथा अत्याचार के विरुद्ध युद्ध करो और अपने धर्म की रक्षा करो ! सत्य सनातन धर्म की जय हो!

@Sanatan
👍43❤16🙏10👏2
दन्तिनि दारु-विकारे दारु तिरोभवति सोऽपि तत्रैव।
जगति तथा परमात्मा परमात्मनि अपि जगत्तिरोधत्ते।।


लकड़ी के बने हाथी में हाथी दिखाई देता है तो लकड़ी लुप्त हो जाती है और लकड़ी दिखाई देती है तो हाथी लुप्त हो जाता है। ठीक इसी प्रकार जगत में परमात्मा और परमात्मा में जगत लुप्त हो जाता है।

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।
अनेन वेद्यं सच्छास्त्रं इति वेदान्त-डिण्डिमः।।


ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है। जीव ब्रह्म ही है, भिन्न नहीं है। इसी के अनुसार सत्-शास्त्र को जानना चाहिए। यह वेदान्त का डंका है।

भगवान श्री आदिशंकराचार्य

@Sanatan
👍26❤12🙏6
This media is not supported in your browser
VIEW IN TELEGRAM
🙏2
प्रश्न
गुरुजी! साधना करते समय यदि कभी - कभी मन से बुरे विचार आते हैं, तो क्या वह साधना में विघ्न डालता है ? और यह साधना के फल में बाधा डालता है क्या ?

उत्तर
साधना करते समय अपने मन, भाव और बुद्धि को सद्गुरु के चरणों में या इष्ट के चरणों में रखकर समर्पण भाव से भजन करना चाहिए। योगी कहते हैं कि साधक का सूक्ष्म मन जिस व्यक्ति का स्मरण करता है। उसका सूक्ष्म रूप वहां मौजूद होता है, लेकिन एक सक्षम गुरु होने के कारण साधक के मन को शुद्ध करके पुनः उसे गुरुचरण में लाकर रख देंते हैं।

मैं मन नहीं हूँ, मैं चित्त नहीं हूँ, मैं बुद्धि नहीं हूँ, मैं तो आत्मा हूँ। सोचना और संकल्प विकल्प करना मन और बुद्धि का काम है । इसकी सहायता से अन्य इन्द्रियाँ अपनी - अपनी क्रियाओं में लग जाती हैं, यदि साधक निरंतर यह सोचकर जप करता रहे कि, मेरा इससे कोई लेना - देना नहीं है, तो कुछ ही दिनों में मन, बुद्धि और इन्द्रियों का अशुद्ध व्यापार कम हो जाएगा, और एक अच्छी स्थिति प्राप्त हो जाएगी । कई साधक मन - बुद्धि के साथ - साथ इन्द्रियों से भी व्याकुल रहते हैं, और उचित मार्गदर्शक के अभाव में साधक साधना से विमुख हो जाता है।

सभी विरोधी तत्त्वों की उपस्थिति में और साथ ही आंदोलन में, यदि सच्चा साधक स्वयं को गुरुप्राप्त मंत्र, गुरुचरण में समर्पित करके चलता है, तो लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। साधक साधना में या किसी भी समय जिस किसी को भी याद करता है। वह सूक्ष्म शरीर उसके पास होता है। आसन के ऊपर केवल उसका स्थूल शरीर दिखाई देता है। इसलिए सद्गुरु सूक्ष्म रूप से सदैव सदशिष्य के पीछे खड़े रहते हैं, और उसके चंचल मन को पकड़कर खींचते हैं और अपने चरणों में रख देते हैं। योग्य गुरु के अभाव में या गुरु के न होने पर साधक कितनी भी साधना कर ले फिर भी उसे लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती क्योंकि, गुरुकृपा के बिना मन और बुद्धि की एक्य की स्थिति प्राप्त नहीं की जा सकती है, और इस अवस्था को प्राप्त किये बिना लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। भटकते हुए मन को जहां साधना से विमुख कर दिया गया है, वहां गुरु के अतिरिक्त और कौन पहुंचा सकता है ? साधक बिना गुरु के कितनी ही साधना कर ले उसका फल नहीं मिलता, अगर मिलता है तो फल के अनेक रूप प्रकट होते हैं। क्योंकि साधना के दौरान जो भी विचार आए हैं उनका फल मिलता है। अर्थात् शांति, अशांति, सुख, दु:ख सभी की अनुभूति होती है। लेकिन एक योग्य गुरु होने के कारण वह सदशिष्य सकाम कर्म नहीं करता है,और उसका चंचल मन तृप्त नहीं होता।

कलियुग के बारे में महापुरुष कहते हैं कि, यदि मानसिक साधन, पूजा और सद्विचार किया जाए तो, उसका अनंतगुणा फल मिलता है, और यदि मन में कोई बुरा विचार आए और उन विचारों पर सीधे अमल न करे तो उसे कोई पाप या दोष नही लगता । तो अंत में मैंने इस प्रश्न का समाधान कर दिया कि, कोई भी मानसिक विचार विघ्न नहीं डाल सकता, समस्त संकल्प विकल्प जो बुद्धि से सोचते हो। उससे एक तरफ रखकर उपासना करो तो लक्ष्य सिद्धि हो जाएगी।

।। हरि ॐ तत्सत् जय सद् गुरुदेव।।


@Sanatan
👍29❤6
🙏17👍1
दुर्लभोपनिषद्
-----------------


         आज इन महत्वपूर्ण क्षणों में मैं आपके उस दुर्लभ गोपनीय और महत्वपूर्ण दुर्लभोपनिषद के श्लोकों की चर्चा करना चाहूंगा जो समस्त उपनिषदों में अद्वितीय और श्रेष्ठ हैं। अद्वितीय और श्रेष्ठ इस कारणवश क्योंकि जहां उपनिषद उस अद्वितीय तत्व ब्रह्म की अमूर्त व्याख्या करते है वहीं यह उपनिषद संक्षिप्त और गूढतापूर्वक उसकी प्रप्ति का मार्ग वर्णित करता है। समस्त उपनिषदों में से केवल यही है वह उपनिषद जो प्रथम बार जीवन की धन्यता के प्रतीक गुरु तत्व का पूर्णता से निरूपण करता है। अपने विन्यास में उपनिषदों की पारम्परिक शैली से भिन्न होने के कारण अथवा अपने निरूपित विषय की भिन्नता के कारण इस उपनिषद का वर्णन प्रायः नहीं प्राप्त होता है। प्रायः एक सौ आठ उपनिषदों के मध्य भी इस उपनिषद के नाम का उल्लेख नहीं प्राप्त होता है जिसका कारण मात्र यही प्रतीत होता है कि इसकी व्यंजना अथवा अभिव्यक्ति की शैली में एक प्रकार का विद्रोह परिलक्षित होता है। और उपनिषदाकारों के मध्य भी महर्षि विश्वामित्र सरीखे विद्रोही व्यक्तित्व हुए है, जिन्होंने प्रचलित शैली अथवा परम्परा से हट कर अपने धारणाओं को दृढ़ता व स्पष्टता पूर्वक कहने का साहस किया है।

             इसके अतिरिक्त इस उपनिषद के मंत्रों में कुछ ऐसी विलक्षण शक्तिया समाहित है जो इसे केवल तत्व वर्णन की एक घटना न रहने देकर साक्षात मंत्र स्वरूप में परिवर्तित कर देती है, क्योंकि विद्रोह अपने निश्छल स्वरूप मे चेतना का एक ऐसा झंकरण होता है जो स्वतः ही मंत्र स्वरूप में परिवर्तित हो जाता है।

         ऋषियों ने इस बात को स्वीकार किया है कि जहां दुर्लभोपनिषद की चर्चा होती है, वहां पवित्रता का वातावरण बन जाता है। जहां दुर्लभोपनिषद के श्लोकों का उच्चारण होता है, वहां के वातावरण में प्रसन्नता और आनन्द का अमृत छलकने लग जाता है। जो कोई इसके पदों को गेय अवस्था में कोई गाता है या श्रवण और मनन करता है वह स्वतः साधक और सिद्ध बन जाता है, समस्त सिद्धियां स्वतः उसके सामने उपस्थित हो जाती हैं। उसको साधना करने की विशेष आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ये श्लोक अपने-आप में दिव्य और चैतन्य हैं।

           इन श्लोकों की रचना ही इस प्रकार हुई है कि वह सुनने वालों के हृदय और प्राणों पर प्रहार करती है। प्रभाव डालती है, और उसके समस्त शरीर को साधनामय बना देती है। इसलिए शास्त्रकारों ने कहा है कि वे अत्यन्त सौभाग्यशाली व्यक्ति होते हैं, जिनके घर में 'दुर्लभोपनिषद' होता है, वास्तव में उनके पुण्य उदय हो जाते हैं वे जब इनकी चर्चा करते हैं। इसके श्लोकों का पाठ करने से व्यक्ति के पूर्व जन्मों के पुण्यों का उदय उसके जीवन में होने लगता है जब व्यक्ति का शुभ समय शुरु होता है, तभी वह दुर्लभोपनिषद के श्लोक का मनन करता है।

         दुर्लभोपनिषद के प्रारम्भ में ऋषि ने आप्त वाक में स्पष्ट किया है कि जो 108 दिन तक नित्य दुर्लभोपनिषद का पाठ करता है या श्रवण करता है, उसे विशेष सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं, वह चाहे महाकाली, महालक्ष्मी, भैरव, यक्ष, किन्नर या किसी भी प्रकार की साधना या सिद्धि हो वास्तव में यह एक अद्वितीय उपनिषद है। इसके कुछ महत्वपूर्ण व अति विशिष्ट श्लोकों को स्पष्ट कर रहा हूं और यह आप लोगों का सौभाग्य है कि आप के घर में दुर्लभोपनिषद है।

    ‌   इसके प्रारम्भ में कहा गया है कि गुरु द्वारा प्रदत्त श्लोक का ही पाठ या श्रवण हो, क्योंकि इसका तात्पर्य यह है कि गुरु स्वयं आप के घर में उपस्थित होते ही हैं। प्रत्येक व्रत, उपवास, साधना या पूजन के पूर्व इसका श्रवण या उच्चारण अवश्य करना चाहिए। इसकी चर्चा होने से समस्त देवता व ऋषियों का घर में पदार्पण होता है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसलिए यह उपनिषद अत्यन्त कम लोगों को ज्ञात हो सका। वशिष्ठ ने स्वयं कहा है कि दुर्लभोपनिषद जैसा ग्रन्थ तो बन ही नहीं सकता। विश्वामित्र ने कहा कि मेरी समस्त साधनाओं का सार दुर्लभोपनिषद ही है। शंकराचार्य ने कहा कि मैं जो कुछ हूं उसका आधार दुर्लभोपनिषद है।

        इसका तात्पर्य है कि यह उपनिषद अत्यन्त दुर्लभ कृति है। ऐसा इसलिए है कि इसकी रचना किसी एक ऋषि ने नहीं की है। समस्त ऋषियों के शरीर से निकले तेजपुंज ने एक आकार ग्रहण किया और उस तेज पुज ने इसके श्लोकों का उच्चारण किया, जिस प्रकार से समस्त देवताओं के शरीर से तेजपुंज निकला और भगवती जगदम्बा अवतरित हुई। इसीलिए इस दुर्लभोपनिषद को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है क्योंकि मूलतः यह गुरु चिन्तन और गुरु मनन है। जब हम गुरु शब्द का उच्चारण करते हैं, तब हम समस्त तीर्थों का उच्चारण करते हैं। समस्त देवताओं का उच्चारण करते हैं।

                                           (दुर्लभोपनिषद्)
(क्रमशः)


@Sanatan
👍7❤3
दुर्लभोपनिषद् (२)
---------------------


जहां हमने गुरुदेव का आह्वान किया वहां ब्रह्मा, विष्णु महेश अवतरित होते ही हैं। यदि हम गुरु शब्द की गरिमा समझें। उसका महत्व और मूल्य आंक सकें तो यह शब्द अपने-आप में अत्यन्त दिव्य, पवित्र और उच्चकोटि का है। अतः उपनिषद में गुरु से सम्बन्धित उन श्लोकों की रचना की गई है जिनके उच्चारण मात्र से देवता सामने प्रकट हो जाते है दृश्य-अदृश्य रूप में समस्त ऋषि वहां उपस्थित होते ही है, जहां दुर्लभोपनिषद का उच्चारण व श्रवण होता है, जिस घर में इसका उच्चारण होता है, उस घर के सामने स्वर्ग और इन्द्रपुरी भी नगण्य और तुच्छ मानी जाती है, क्योंकि उस घर में गुरु चिन्तन होता है, गुरु के हृदय का आगार होता है।

गुरु के हृदय से भाव-भूमि स्पष्ट होती है और हम उन तत्वों को स्पष्ट रूप से समझते हैं, जिसके द्वारा गुरु पद विन्यास को स्पष्ट रूप में समझा जाता है। इसलिए इस उपनिषद के श्लोक अपने-आप में एक अद्वितीय चिन्तन हैं। मैं आज पहली बार उन महान और श्रेष्ठ श्लोकों को स्पष्ट कर रहा हूं जिससे कि आपका जीवन पवित्र हो सके, दिव्य बन सके। आप सही अर्थों में साधक बन कर पूर्णता प्राप्त कर सकें। आपके घर का वातावरण पवित्र बन सके, आपके घर में सुख-सौभाग्य आ सके, आपके जीवन के कष्ट और अभाव दूर हो सकें, आप समस्त ऋषियों और देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करके अपने जीवन का ध्येय, और उद्देश्य प्राप्त कर सकें। आप जब इन श्लोकों का उच्चारण या श्रवण करें तो उसके पूर्व अत्यन्त पवित्र होकर गुरु चित्र के सम्मुख प्रणम्य हो करके अपने-आपको गुरु से जोड़ते हुए इनका मनन करें, इनको अपने हृदय और प्राणों मे उतारें, समस्त परिवार के साथ बैठकर शान्त चित्त से इसका पाठ करें, जिससे परिवार के लोगों के विचार संस्कारित हो सकें, प्रेम और आदर की भावना का विकास हो सके। इस प्रकार श्रवण या उच्चारण करने से उस व्यक्ति के घर में समस्त देवगण, ऋषिगण मरुद्गण तथा अटूट लक्ष्मी का स्थायी निवास होता ही है ।

दुर्लभोपनिषद्

गुरुर्वै सदां पूर्ण मदैव तुल्यं
प्राणो वदार्यै वहितं सदैव।
चिन्त्यं विचिन्त्यं भव मेक रुपं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं

गुरुर्वै प्रपन्नार्तवैवां वदैवं
अत्योर्वतां वै प्रहितं सदैव।
देवोत्वमेव भवतं सहि चिन्त्य रुपं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।

सतं वै सदानं देवालयोवै
प्रातोर्भवेवै सहितं न दिर्घयै।
पूर्णतंपरांपूर्ण मदैव रुपं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।

अदोयं वदेवं चिन्त्यं (सहेतं)
पुर्वोत्त रुपं चरणं सदैयं।
आत्मो सतां पूर्ण मदैव चिन्त्यं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।

चैतन्य रुपं अपरं सदैव
प्राणोदवेवं चरणं सदैव।
सतीर्थो सदैवं भवतं वदैवं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।

चैतन्य रुपं भवतं सदैव,
ज्ञानोच्छवासं सहितं तदैव।
देवोत्त्थां पूर्ण मदैव शक्तीं,
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।

न तातो वतान्यै न मातं न भ्रातं
न देहो वदान्यै पत्निर्वतेवं।
न जानामी वित्तं न वृत्ति न रुपं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।

त्वदियं त्वदेयं भवत्वं भवेयं,
चिन्त्यंविचिन्त्यं सहितं सदैव।
आर्तोनवातं भवमेक नित्यं,
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।

अवतं सदेवं भवतं सदैवं,
ज्ञानं सदेवं चिन्त्यं सदैवं।
पूर्णं सदैवं अवतं सदैवं,
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।


(दुर्लभोपनिषद्)


@Sanatan
❤12👍7🔥1🤬1
Audio
दुर्लभोपनिषद्

@Sanatan
❤6👍2
दुर्लभोपनिषद्

गुरुर्वै सदां पूर्ण मदैव तुल्यं
प्राणो वदार्यै वहितं सदैव।
चिन्त्यं विचिन्त्यं भव मेक रुपं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।


मैं इस जीवन में क्यों आया हूँ? मैं इस पृथ्वी तल पर क्यों हूँ? मेरे जीवन की डोर कहां बंधी है? मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है? इनको तो केवल गुरुदेव आप ही समझा सकते हैं, अन्य किसी में यह क्षमता ही नहीं है. अन्य सभी का साथ तो केवल स्वार्थ का बन्धन है। इन पाशों से बंधा हुआ मैं छटपटा रहा हूं भय ग्रस्त हो रहा हूं। मैं प्रत्येक पल मृत्यु की ओर अग्रसर हो रहा हूं, मेरे जीवन में सुख-सौभाग्य का सर्वथा अभाव है, मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आखिर मेरे जीवन का उद्देश्य और लक्ष्य क्या है? मुझे समझाने में समर्थ कोई शक्ति है तो वह केवल एकमात्र आप हैं।

इसीलिए हे गुरुदेव ! मैं अत्यन्त विगलित कण्ठ से अत्यन्त भाव-विह्वलता के साथ आपको दण्डवत् प्रणाम करता हुआ, आपके श्री चरणों में अपने सिर को रखता हुआ प्रार्थना करता हूं कि आप मुझे उस मर्म, उस रहस्य को समझाएं, जो मेरे जीवन का लक्ष्य है, जिसमें मेरे जीवन की पूर्णता है, क्योंकि मैं आप की शरण में हूं और निश्चित रूप से केवल और केवल एकमात्र आप की ही शरण में हूं।

गुरुर्वै प्रपन्नार्तवैवां वदैवं
अत्योर्वतां वै प्रहितं सदैव।
देवोत्वमेव भवतं सहि चिन्त्य रुपं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।


लोग कह रहे हैं कि मैं देवताओं की आराधना करूं। कौन से देवता की आराधना करू? हजारों-लाखों देवता है, किसकी प्रार्थना करू? किस की चौखट पर जाकर भीख मांगू? और वे मुझे दे भी क्या सकेंगे? उनके पास है भी क्या देने के लिए? वे तो स्वयं आपके सामने हाथ बांधे खड़े हैं, जब ये स्वयं आप से बहुत कुछ पाने की आकांक्षा लिए खड़े हैं. तो मैं उन भिखारियों के पास क्यों जाऊ?

मैं सीधा आपके पास आकर आपके चरणों में बैठना चाहता हूं. जिससे मैं उन स्थितियों को प्राप्त कर सकूं जो आप से प्राप्त हो सकती है जब आप देवताओं को देने में समर्थ हैं, तो फिर आप मुझे भी देने में समर्थ हैं। मैं देवताओं से परिचित नहीं हूं मैंने उन्हें देखा नहीं है, चित्रों के माध्यम से मात्र उनके अंकन को देखा है। हो सकता है कि वे चित्र सही हों, हो सकता है कि वे चित्र गलत हो। यह तो चित्रकार की एक भावना है जो कि कागज पर उसने उतारी है।

उसने भी उस देवता को देखा नहीं है सिर्फ अपनी कल्पना को साकार रूप दिया है, अतः कागज पर अंकित चित्र अपने आप में अधूरे है। मैं देवताओं से परिचित नहीं हूं और न देवता मुझ से परिचित हैं. किन्तु गुरुदेव ! मैं आप से परिचित हूं मैंने आपके सारे शरीर को स्पर्श किया है, मैं आपके चरणों के समीप बैठा हूं, आपके अंग-प्रत्यंग को मैंने अपनी आंखों के माध्यम से अपने हृदय में उतारा है. इसलिए मैं आप से अत्यधिक परिचित हूं, आप तो श्रेष्ठ हैं. चेतना पुंज हैं. सब कुछ देने में समर्थ है, फिर मुझ जैसे अकिंचन व्यक्ति को कुछ भी देना आपके लिए असम्भव है ही नहीं, आपके लिए तो यह सामान्य सी बात है।

मैं तो आप में ही समस्त देवताओं का दर्शन कर रहा हूं प्रत्येक रोम-रोम में एक नवीन देवता का दर्शन कर रहा हूं और ये समस्त देवताओं का आगार, समूह आप में देखकर मैं भाव विह्वल हो जाता हूँ। अतः आप मुझे देवताओं की आराधना करने के लिए मत कहिए। जब मेरे सम्मुख आपके रूप में जीवित जाग्रत देवता है. तो फिर उन पाषाण मूर्तियों की पूजा क्यों करूं? मैं तो गुरुदेव केवल मात्र आपकी शरण में हूं और एकमात्र आपकी ही शरण में हूं।

सतं वै सदानं देवालयोवै
प्रातोर्भवेवै सहितं न दिर्घयै।
पूर्णतंपरांपूर्ण मदैव रुपं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।


मैं काशी और कांची, हरिद्वार और मथुरा आदि तीर्थ स्थलों पर जाकर भी क्या कर लूंगा? गंगा में बार-बार डुबकी लगाने से भी क्या होगा? यदि डुबकी लगाने मात्र से ही पवित्रता मिलती तो सारी मछलियां. मेंढक और घोंघे पवित्र और दिया है। यदि काशी में रहने से ही मोक्ष मिल जाता तो वहां श्वान खर बहुत घूमते हैं. ये भी पूर्णत्व प्राप्त कर लेते। वहां जाने से कुछ प्राप्त होना सम्भव नहीं है। देवालयों में तो पत्थर की मूर्तियां है जो बोल नहीं पातीं, जो मेरी बात सुन नहीं पाते, मैं अपनी बात उन तक नहीं पहुंचा पाता, क्योंकि पत्थरों से कहने पर कुछ लाभ नहीं मिलता। मेरे लिए ये सारे तीर्थ नगण्य है, क्योंकि मैं आपकी देह को ही पूर्णरूप से देवालय मानता हूं, यही मेरा मंदिर है। आप के दोनों पैर इस देवालय के स्तम्भ हैं. इन स्तम्भों पर मंदिर टिका हुआ है, इस मंदिर में आपके प्राण रूपी आपकी चेतना रूपी आपका हृदय स्थल मंदिर का गर्भगृह है, उस गर्भगृह में जब मैं प्रवेश करता हूं तो मेरा रोम-रोम चैतन्य होकर गुरुदेव शब्द पुकारने लगता है।

(क्रमशः)

@Sanatan
❤8👍5🙏2
दुर्लभोपनिषद् (२)

मैं भाव विहवल हो जाता हूं, मेरी आंखों से अश्रु प्रवाहित होने लगते हैं. जब मैं उस गर्भगृह में स्थित मूर्ति के दर्शन करता हूं. .. यह मूर्ति इतनी सजीव और तेजस्विता युक्त है कि इसके दर्शन मात्र से ही मेरे अन्दर आध्यात्मिक शक्ति का स्फुरण होने लगता है। ऐसा लगता है कि मेरा शरीर प्रसन्नता के आवेग में नृत्यमय हो गया है. इस गर्भगृह के ऊपर जहां मूल प्रतिमा स्थापित है, जहां आपका हृदय है. इसके ऊपर शिखर के रूप में आपका सिर है, जिसे देख हिमालय की ऊंचाई का भान होता है। आपका दर्प युक्त सिर, आपका दैदीप्यमान सिर आपका गर्वोन्नत भाल, नेत्र, कर्ण, नासिका, मुख, जिह्वा और आपका चेहरा उस तीर्थ के समान है, जिसके दर्शन मात्र से पवित्रता का अवगाहन होता है. ऐसा लगता है कि सातों समुद्र और गंगा आदि समस्त पवित्र नदियां स्वयं आकर मुझे स्नान करा रही हैं। आपके नेत्रों से निकलने वाली कृपा वृष्टि का आनन्द वही समझ सकता है जो आपके पास खड़ा होकर इस वर्षा में भीगा है। ऐसे व्यक्ति के समान धन्य कोई हो ही नहीं सकता, इस पवित्र मंदिर को छोड़कर मैं कहां जाऊ? यदि मैं इस मंदिर में प्रवेश नहीं कर सका इस मंदिर की सेवा नहीं कर सकता तो मेरा सारा जीवन व्यर्थ है, क्योंकि इस मंदिर का दर्शन करने के लिए देवता भी तरसते हैं, अपने-आप को न्यौछावर करने के लिए तत्पर हैं।

गुरुदेव ! आप किसी तीर्थ के पास जाने की आज्ञा मुझे मत दीजिए, ये सारे तीर्थ, पानी का बहाव हैं. मछलियों का सागर हैं, खारा समुद्र हैं, केवल मात्र झील हैं। मुझे ऐसे निर्जीव तीथों में जाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यदि मैं समस्त तीर्थों का स्नान आपके नैत्रों से निकलती कृपा-दृष्टि से कर सकता हूं तो फिर इस से बड़ा सौभाग्यशाली क्षण अन्य हो ही नहीं सकता, वास्तव में मैंने पुण्य किया होगा कि मैं आप के सामने खड़ा हूं। वास्तव में मेरा पुण्योदय हुआ है, जिसके कारण आप मेरे सामने हैं और मैं इस युग में, इस पीढ़ी में आपके सामने उपस्थित हूं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि गुरुदेव मैं आप की शरण में हूं, केवल और केवल मात्र आप की ही शरण में हूं।

अदोयं वदेवं चिन्त्यं (सहेतं)
पुर्वोत्त रुपं चरणं सदैयं।
आत्मो सतां पूर्ण मदैव चिन्त्यं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।


वह तो मूर्ख और मूढ़ व्यक्ति होगा जो आपके चरण छोड़कर इधर -उधर भटकता होगा, उसके पाप ही आड़े आते हैं जो आपकी दृष्टि से ओझल होता होगा, उसके जीवन का दुर्भाग्य होगा कि वह आप से दूर खड़ा होकर भी सांस ले रहा होगा. आप से दूर रह कर जीवित रहने की कल्पना ही आश्चर्यजनक है। जिस प्रकार मछली पानी से बाहर आते ही तड़प कर मर जाती है. उसी प्रकार आप से दूर होकर मैं मर क्यों नहीं जाता? जिन्दा रहने का तात्पर्य क्या है? जिस प्रकार से चकोर चांद को देखे बिना सिर फोड कर समाप्त हो जाता है. उसी प्रकार हम समाप्त क्यों नहीं हो जाते? आपका वियोग हम कैसे सहन कर पा रहे हैं? यह कैसे सम्भव है कि आप से दूर रह कर हमारे प्राण हमारे शरीर में टिके रह सकें? ऐसे प्राणों की जरूरत भी नहीं है। हे गुरुदेव! मुझे ऐसे प्राण, ऐसा शरीर नहीं चाहिए। आप हैं तो जीवन है, आप हैं तो संसार है. खुशियां हैं. श्रेष्ठता है, दिव्यता है, यदि आप नहीं रहें और मैं जीवित रहूं तो यह मेरे जीवन का दुर्भाग्य है. यह मेरे जीवन की न्यूनता और अभाव है।

वास्तव में मैंने कोई पाप किया होगा जो आप के वियोग को सहन करते हुए भी जीवित हूँ, आप के बिना मैं सांस ले रहा हूं, खाना खा रहा हूं, पानी पी रहा हूं और चल रहा हूं, ये सब मेरे जीवन की न्यूनताएं हैं। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आप से दूर होते ही मृत्यु मुझे समाप्त क्यों नहीं कर देती, क्योंकि मृत्यु के बाद तो कम से कम आपके पास रह सकूंगा, मरने के बाद आपके चरणों से लिपट तो सकूंगा, क्योंकि जहां मेरी मृत्यु हो, वहां से उड़ कर राख आपके चरणों के पास आकर गिरेगी ही और जब आप के चरणों के पास आकर गिरेगी. और जब आपके चरण उस पर पड़ेंगे तो उससे बड़ा मेरे जीवन का सौभाग्य और हो भी क्या सकता है। मैं तो आप का प्रतिपल दर्शन करना चाहता हूं, आपके पास रहना चाहता हूँ, मैं हर क्षण चकोर की तरह आप को देखते रहना चाहता हूं, मैं तो हर क्षण पपीहे की तरह गुरु-गुरु शब्द का उच्चारण करना चाहता हूँ।

हर क्षण मेरी हृदय की प्रत्येक धड़कन के साथ गुरु शब्द का उच्चारण हो। मेरा प्रत्येक चिन्तन गुरुमय हो मेरा रोम-रोम आवाज दे सके गुरु गुरु मुझे गायत्री काली या किसी अन्य मंत्र की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मंत्रों में सर्वश्रेष्ठ गुरु मंत्र मेरे पास है।

(क्रमशः)

@Sanatan
👍5❤2🙏2😁1
दुर्लभोपनिषद् (३)

जब "ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः" गुरु मंत्र जैसा महामंत्र मेरे पास है तो अन्य मंत्रों की मुझे क्या आवश्यकता है? इसलिए मैं चाहता हूं कि जीवन का प्रत्येक क्षण आपके साथ, आपके लिए व्यतीत हो, मेरा शरीर आपके काम आ सके, मैं आपके चरणों से लिपट सकूं मैं आपकी देह की सुगन्ध से सुवासित हो सकूं और यदि आप से अलग होना ही पड़े तो मछली की तरह तड़प कर मर जाऊं, पत्थर पर सिर फोड़ कर मर जाऊं, मृत्यु प्राप्त हो जाए. मैं तो आप से ऐसा ही आशीर्वाद चाहता हूं कि मैं एक क्षण भी आप की जुदाई सहन नहीं कर सकूं। मेरी आंखों से प्रवाहित आंसू की प्रत्येक बूंद पर आपका बिम्ब हो, मैं जीवन की ऐसी स्थिति चाहता हूं और यदि ऐसी स्थिति प्राप्त नहीं होती है तो मेरे जैसा पापी, अधर्मी कोई नहीं हो सकता, आप मुझे आशीर्वाद दें तो ऐसा ही आशीर्वाद दें कि मैं हर क्षण आप के पास रह सकूं आपको अपनी आंखों से पी लेना चाहता हूं आप से एकाकार हो जाना चाहता हूं क्योंकि गुरुदेव मैं आपकी शरण में हूं, केवल और केवल मात्र आपकी शरण में हूँ।

चैतन्य रुपं अपरं सदैव
प्राणोदवेवं चरणं सदैव।
सतीर्थो सदैवं भवतं वदैवं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।


और लोगों ने अनुभव किया हो या न किया हो, किन्तु मैं तो आपके शरीर का एक हिस्सा हूं। मैंने अनुभव किया है कि आप हिमालय से भी अधिक गर्व युक्त और सागर से भी ज्यादा विशाल हैं। आपका गर्वोन्नत भाल हिमालय से भी ज्यादा ऊंचा है, जब मैं आप की तरफ देखता हूं तो मेरी आंखें चौंधिया जाती है, मैं नहीं समझ पाता हूं कि इस श्रेष्ठतम-गर्वोन्नत भाल को आंखों के माध्यम से कैसे ह्रदय में समाहित कर सकूंगा? मैं जब आपके वक्षस्थल की ओर देखता हूं तो सातों समुद्र हिलोरे मारते हुए दिखायी पड़ते हैं और मैं आपके वक्षस्थल में दुबक जाना चाहता हूं, जहां मुझे सुख-सौभाग्य, तृप्ति व पूर्णता प्राप्त हो सकेगी। जब मैं आप के सम्पूर्ण शरीर को देखता हूं तो मेरे सामने समस्त ब्रह्माण्ड साकार हो उठता है।

मुझे आपके शरीर में ही इन्द्र लोक, ब्रह्म लोक, रुद्र लोक दिखाई देता है. फिर मैं ब्रह्माण्ड साधना क्यों करूं, उससे होगा भी क्या ? आपके चेहरे पर आई मुस्कुराहट से ही सारे ब्रह्माण्ड में आहलाद व्याप्त हो जाता है, और इस पूरे ब्रह्माण्ड को जब मैं अपने सम्मुख देखता हूं तो अपने-आप को बहुत छोटा और नगण्य लगने लगता हूं, ऐसा लगता है कि इन लाखों-करोड़ों लोगों में जहां महानतम ऋषि हैं, समस्त देव योनियां हैं, ब्रह्मा, विष्णु रुद्र और अगस्त्य, पुलस्त्य, अत्रि, कणाद जैसे ऋषि हैं, इन सबके आगे तो मेरा अस्तित्व एक अत्यन्त सूक्ष्म कण के समान दिखाई देता है। इसके बावजूद भी आपने इस कण को अपनाया इससे बड़ा सौभाग्य क्या हो सकता है? इस कण पर आपने कृपा-दृष्टि की अपने हाथों का स्पर्श प्रदान किया, यह मेरे जीवन का सौभाग्य है, अहोभाव है, मेरे पूर्व जन्मों के पुण्यों का उदय है।

मुझे गर्व है कि मैं ब्रह्माण्ड का एक हिस्सा बन सका। आपकी तुलना हो ही नहीं सकती, हजारों जन्म लेने के बाद भी आपके मेरी बराबर चिन्तन कर ही नहीं सकता। दीपक से सूर्य की बूंद से सागर की तुलना नहीं हो सकती, ठीक इसी प्रकार मेरी और आप की तुलना करना ही व्यर्थ है। यदि मैं इस ब्रह्माण्ड का एक कण बना हुआ रह सकूं तो यह मेरी बहुत बड़ी उपलब्धि है कि इस ब्रह्माण्ड में मेरा अस्तित्व है। इससे भी बड़ा सौभाग्य यह है कि इस कण पर आप की कृपा-दृष्टि है। इससे बड़ा सौभाग्य मुझे क्या चाहिए? जब मैं पूर्ण भावना के साथ आपके चरणों में झुकता हूं तो मुझे वहां विश्वनाथ की नगरी दिखाई देती है. समस्त तीर्थों का दर्शन स्वतः हो जाता है, ये मात्र चरण ही नहीं हैं, अपितु सम्पूर्ण देवलोक हैं। जब श्री चरणों को आंसुओं से प्रक्षालित करता हूं तो ऐसा लगता है कि समस्त देवताओं का पूजन एक साथ कर लिया हो।

आपका यह दिव्यतम, अद्वितीय शरीर, गर्वोन्नत भाल तीक्ष्ण और सुन्दर आंखें और होठों पर खेलती मुस्कुराहट मुझे पागल कर देती है। मैं इन सब में खो जाता हूं, हर क्षण इस मुस्कान में निमग्न रहता हूं, हर क्षण यह इच्छा रहती है कि दौड़ कर आपके पास आऊं। जब मैं वक्षस्थल की दृढ़ता को देखता हूं तो स्पष्ट होता है कि आपके वक्षस्थल में इतनी तीव्रता, इतना भाव है कि यदि हिमालय से टकरा जाए तो कई कदम उसे पीछे हटना पड़ जाए। ऐसा अद्वितीय वक्षस्थल न किसी का रहा है, न किसी का हो सकता है, मैंने इस वक्षस्थल में सिमट कर इसका स्पर्श व इसकी गर्मी का अहसास किया है, उस ऊष्णता को मैंने अपने हृदय में, अपने प्राणों में उतारा है। आपके लम्बे और अजानु बाहु, ताकत और प्रभुता के परिचायक हैं। ऐसा लगता है कि स्वयं इन्द्र मेरे सामने उपस्थित हो गया हो।

(क्रमशः)

@Sanatan
❤4👍2🙏1
दुर्लभोपनिषद् (४)

वास्तव में ही आपके वरदहस्त आपकी श्रेष्ठता और आपकी अद्वितीयता को वर्णित नहीं किया जा सकता। सहस्रों मुख से भी यदि शेषनाग आपके गुणों को स्पष्ट करे तो उनके लिए सम्भव नहीं है।

मैं तो एक अकिंचन हूं, शब्दों का भिखारी हूं मैं आप का वर्णन कर ही नहीं सकता, मैं तो आप को एकटक देखते हुए इन आंखों के माध्यम से हृदय में उतार लेना चाहता हूं, मैं अपनी धड़कन में आपकी धड़कन को मिला देना चाहता हूं, अपने-आपको आप के चरणों में निमग्न कर देना चाहता हूं, अपने अस्तित्व को समाप्त कर देना चाहता हूं, क्योंकि गुरुदेव मैं आप का हूं, केवल मात्र आपका हूं और आपकी शरण में हूं। इस ब्रह्माण्ड में आपके अलावा और कोई मेरा रखवाला नहीं है, कोई मेरा अस्तित्व रखने वाला नहीं है. मैं तो केवल और केवल आप की ही शरण में हूं।

चैतन्य रुपं भवतं सदैव,
ज्ञानोच्छवासं सहितं तदैव।
देवोत्त्थां पूर्ण मदैव शक्तीं,
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।


इस समस्त ब्रह्माण्ड की शक्तियां वह चाहे महाकाली, महालक्ष्मी या महासरस्वती हो, चाहे वह बगला, तारा, धूमावती या जगदम्बा, किसी भी प्रकार की शक्ति हो, मैं तो यही देखता हूं कि वे आपके सामने आप को प्रसन्न करने के लिए नृत्य कर रही हैं. आप की कृपा कटाक्ष पाने के लिए प्रयत्नशील है। जब मैं यह देखता हूं तो सोचता हूं कि आप को छोड़कर अन्य कौन-सी साधना मेरे लिए उपयुक्त है? क्या होगा इन शक्तियों की आराधना से? क्या मिलेगा नवार्ण मंत्र के उच्चारण से? इन सब को तो आपके सामने नृत्य करते देखता हूं। यह सब देखकर मैं सोचता हूं कि आप से बड़ा देवत्व क्या हो सकता है? आप अपने-आप में समग्र हैं, आप के दर्शन मात्र से ही मैं पूर्ण कुण्डलिनी जागरण व क्रिया योग से सम्पन्न हो जाता हूं, पूर्णत्व प्राप्त कर लेता हूं और सही अर्थों में देखा जाए तो वशिष्ठ, विश्वामित्र व अत्रि बन जाता हूं, ब्रह्मा व रुद्र बन जाता हूं।

आप के दर्शन मात्र से ही मैं इन देवताओं व ऋषियों के समान बन जाता हूं। यह सम्भव है कि वे थोड़ा आगे हों और मैं थोड़ा पीछे रुका हुआ हूं। हो सकता है कि उनके और मेरे बीच में फासला हो, लेकिन आप की कृपा-दृष्टि उन पर है तो उनसे भी पहले मुझ पर है, यह मेरे लिए प्रसन्नता, सौभाग्य व आनन्द की बात है। मुझे मंत्र, तंत्र, योग, दर्शन और मीमांसा नहीं चाहिए, क्योंकि आपके मुंह से निकला शब्द मंत्र है, तंत्र है, यदि उन शब्दों को अपने जीवन में उतार लेता हूं तो ये सब मेरे सामने स्पष्ट हो जाएगा. आपके स्पर्श मात्र से सारी योग की भावभूमियां मेरे शरीर में अवतरित हो जाएगी।

मैं तो आपके चरणों में निमग्न हो जाना चाहता हूं। जब मैंने समुद्र को देखा है तो बूंद को देख कर क्या करूंगा? वसन्त के आगे एक हल्का सुगन्ध का झोंका मिला भी तो उससे क्या हो जाएगा? गुरुदेव मैं तो केवल यही मंत्र जानता हूं कि मैं आपका हूं, आप और आपकी कृपा-दृष्टि ही मेरी है। मैं तो यही साधना जानता हूं कि मैं आपकी शरण में हूं।

(क्रमशः)

@Sanatan
❤6👍1🙏1
दुर्लभोपनिषद् (५)

न तातो वतान्यै न मातं न भ्रातं
न देहो वदान्यै पत्निर्वतेवं।
न जानामी वित्तं न वृत्ति न रुपं
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।


न मैं तो माता को जानता हूं, न पिता को जानता हूं, क्योंकि उनसे सिर्फ स्वार्थमय सम्बन्ध है। पिता इसलिए मुझे पुत्र कहते हैं कि मैं जीवन में उनके काम आ सकूं। मेरा न तो भाई है, न पत्नी है, न बन्धु है, न कोई बान्धव है और न ही वित्त है, न धन है और न ही कोई ऐश्वर्य है। मेरे जीवन में कुछ है ही नहीं, क्योंकि मैं जीवन में कुछ चाहता ही नहीं हूं। यह सब तो क्षणभंगुर हैं. इनके द्वारा मुझे मेरे लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। ये तो इस जीवन यात्रा के पड़ाव है, क्योंकि मैं जन्म से मृत्यु की ओर निरन्तर अग्रसर हो रहा हूं श्मशान की यात्रा ये मेरे सहायक हैं, जो मुझे ठेल कर उधर अग्रसर कर रहे हैं। ये तो मात्र मेरी देह, मेरी सेवा व मेरे जीवन का अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करना चाहते हैं। इससे तो मैं एक देहधारी गंदा कीड़ा बन जाऊंगा। मैं पुत्र उत्पन्न करूंगा तो ज्यादा से ज्यादा वह मेरी अर्थी को कंधा दे देगा, पत्नी मेरी मृत्यु पर चार आंसू बहा देगी, किन्तु यह मेरे जीवन का प्रयोजन नहीं है, मैं उस स्थान पर खड़ा हूं, जहां ये सब तुच्छ हैं।

हिमालय के सामने एक बड़ा पत्थर कंकर के समान दिखता है. उसी प्रकार आपके सामने ये सारे सम्बन्ध बेमानी और अस्तित्व हीन लगने लगे हैं। मैं इन सम्बन्धों से जीवित नहीं रहना चाहता, इन बनानों में फंसना नहीं चाहता, ये मेरे जीवन का अभिशाप और पैरों की बेड़ियां हैं जो मुझे जकड़े हुए हैं।मैं एक अंधेरी कोठरी में फंस गया हूं मुझे द्वार नहीं मिल रहा है. दीवारों से टकरा कर मेरा सिर लहूलुहान हो गया है। इस समाज ने अंधकार व आलोचना के अलावा मुझे कुछ नहीं दिया है।मैं इस अंधकार से, इस दल-दल से निकलना चाहता हूँ।

मैं गुरुमय बन करके अपने जीवन को पवित्र और दिव्य बनाना चाहता हूं। मैं उस स्थिति को प्राप्त करना चाहता हूं जिसको ऋषियों ने "अहं ब्रह्मास्मि" कहा है। आप मुझ पर कृपा करें, वापस इन बंधनों में नहीं फंसने दें, मुझे किसी प्रकार का कोई मोह नहीं रहा है, यदि कोई मोह है तो आप उसे समाप्त करें। मैं मानसरोवर के पास आकर प्यासा नहीं रहना चाहता, आपके सामने आकर दुर्भाग्यमय नहीं बनना चाहता। मैं आपके चरणों में समर्पण चाहता हूं आपसे एकाकार हो जाना चाहता हूं, आपके प्राणों की धड़कन बनना चाहता हूं।हे गुरुदेव! मैं आपकी शरण में हूं और इस ब्रह्माण्ड में केवल मात्र आपकी ही शरण में हूं।

वदियं त्वदेयं भवत्वं भवेयं,
चिन्त्यंविचिन्त्यं सहितं सदैव।
आर्तोनवातं भवमेक नित्यं,
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।


मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार रहा हूं पूरी शक्ति प्राणों में भरकर उच्चारण कर रहा हूं मैं अपनी बात आप तक पहुंचाना चाहता हूं मेरा सारा शरीर कांप रहा है. आंखों से आंसू प्रवाहित हो रहे हैं. मुंह से वाणी नहीं निकल पा रही है. पूरे शरीर के रोम-रोम से आवाज आने लग गई है,मैं अपने आप में नहीं रहा हूं।

मैं एक ऐसी बूंद हूं जो अंगारे पर पड़ते ही समाप्त हो जाती है,मैं एक बादल का टुकड़ा हूं जो किसी पहाड़ से टकरा कर समाप्त हो जाना चाहता है।मैं तो एक ऐसा कण बनना चाहता हूं जो आप का स्पर्श प्राप्त करना चाहता है।मैं आप में एकाकार और लीन होना चाहता हूं और यदि ऐसा सम्भव नहीं है तो यह जीवन मेरे लिए मूल्यहीन है,व्यर्थ है, एक जीवित लाश है जिसे अपने कंधे पर उठाए हुए मृत्यु की ओर अग्रसर हो रहा हूं।क्या मेरी पुकार आप तक नहीं पहुंच रही है? क्या आप के ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है? ऐसा हो ही नहीं सकता है,प्रभाव तो अवश्य पड़ रहा होगा,किन्तु मेरा ही कोई दुर्भाग्य है कि आप आगे बढ़कर मुझे अपना नहीं रहे हैं, मेरे अन्दर अवश्य कोई न्यूनता होगी, कि आपकी कृपा-दृष्टि मेरे ऊपर हो ही नहीं रही है. मेरे पाप ही आपके और मेरे बीच में पर्दा डाल रहे हैं. इन सब से आप ही मुझे बचाएं मेरे अन्दर इतनी क्षमता नहीं है कि इन्हें अपने से दूर ढकेल सकूं। मुझे कोई साधना या सिद्धि नहीं आती है, किसी मंत्र का ज्ञान नहीं है। मुझे तो केवल एक शब्द "गुरु" ही बोलना आता है। मैंने तो केवल एक यही मंत्र सीखा है कि "गुरुदेव मैं आपकी शरण में हूं और गुरुदेव मात्र आपकी ही शरण में हूं।"

अवतं सदेवं भवतं सदैवं,
ज्ञानं सदेवं चिन्त्यं सदैवं।
पूर्णं सदैवं अवतं सदैवं,
गुरुर्वै शरण्यं गुरुर्वै शरण्यं।।


कई-कई जन्मों से आपका और मेरा साथ रहा है. कई-कई जन्मों से आपने मुझे खींच कर सही रास्ते पर खड़ा किया है कई-कई जन्मों से आपने मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है। हर बार आपने मुझे समझाया है, हर बार मुझे चेतना दी है मेरे प्राणों को झंकृत किया है. हर बार आपने मुझे यह बताया है कि जीवन की पूर्णता क्या है?

(क्रमशः)

@Sanatan
👍12❤3🙏2
दुर्लभोपनिषद् (६)

इसके बावजूद मैं अज्ञानी हूं बुद्धि से ग्रस्त हूं आपको मैं समझ नहीं पा रहा हूं, इसलिए समझ नहीं पा रहा हूं कि आप हर क्षण परिवर्तनशील हैं. हर क्षण एक नए स्वरूप में मेरे सामने खड़े हो जाते हैं। मैं एक स्वरूप को समझने का प्रयास करता हूं तो दूसरा, तीसरा, चौथा और न जाने कितने स्वरूप मेरे सामने आ जाते हैं।

मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि किस स्वरूप को समझू? ज्यों ही मैं समझने का प्रयत्न करता हूं आप मेरे सामने माया का पर्दा डाल देते हैं और मैं फिर आपको सामान्य मानव समझने लगता हूं और अपने जैसा मानव समझने लगता हूं। इस माया के आवरण में फंसकर उसी जगह जा कर खड़ा हो जाता हूं, जहां से मैं चला था। प्रभु! ऐसा मत करिए. यह बार-बार मेरी परीक्षा मत लें, बार-बार माया के आवरण में मुझे मत डालिए. बार-बार मुझे पीछे मत हटाइये, मुझमें किसी प्रकार का बल, साहस या क्षमता नहीं है, मैं तो अत्यन्त तुच्छ और नगण्य हूं। मुझमें कोई ज्ञान की चेतना नहीं है, यदि आप की कृपा-कटाक्ष मेरे ऊपर है तो आप मेरी भावनाओं को जाग्रत करें। यदि आप अपना समझते हैं तो मुझे अपने सीने से लगा लीजिए, मैं आप की धड़कन को अपने जीवन में उतार सकूं, अपने प्राणों को आप में लीन कर सकूं, आप से अलग मेरा अस्तित्व नहीं रहे, बूंद पूर्णतया समुद्र में विसर्जित हो जाए. मैं इसी प्रकार आप में समाहित हो जाना चाहता हूं, क्योंकि मेरा एकमात्र सहारा मेरा एकमात्र अवलम्ब गुरुदेव! आप हैं. मैं आप की शरण में हूं, केवल मात्र आप की शरण में हूं।

(दुर्लभोपनिषद्)

@Sanatan
👍10❤6🔥4🙏4🤬1
👍2