ब्रह्म विद्या (४)
-----------------
साठ वर्ष के भोगी सोलह वर्ष की कन्याओं से विवाह करने लगेंगे तो इस प्रकार समाज में कुकर्म फैल जायेगा। यही कारण है कि भोगी और कामी व्यक्ति मधुमेह, हृदय रोग एवं अन्य प्रकार के विकारों से ग्रसित हो जाते हैं। अत्यधिक कामातुर स्त्रियों के गर्भाशय जीवन के मध्य अवस्था में ही नष्ट हो जाते हैं। यह सब मनुष्य नहीं करता है कोई न कोई दिव्य शक्ति ही इस प्रकार के दण्ड निर्धारित कर देती हैं जिससे कि अंकुश लग सके कुप्रवृत्तियों पर यही है। देव और असुर शक्तियों के बीच चलने वाला निरंतर संग्राम सूर्य की किरणें अत्यंत ही घातक हैं परन्तु ब्रह्म शक्ति के चलते उनकी भी हिम्मत नहीं है कि वे पृथ्वी पर घातक रूप में पैर रख सकें। उन्हें भी माता गायत्री के अनुसार ही कोमल रूप में पृथ्वी पर उतरना पड़ता है। इस पृथ्वी पर प्रत्येक शक्ति को अमृतमयी रूप में उतरने की इजाजत है अर्थात शक्ति का वह स्वरूप जो कि जीवन के लिए उत्पादक एवं लाभप्रद हो। बस इसी मातृमयी शक्ति के कारण ही तो बालक नौ महीने स्त्री के गर्भ में रह पाता है।
ब्रह्मऋषि सदैव मातृ शक्ति के उपासक होते हैं। प्रत्येक तत्व में, प्रत्येक जीव में माता के भाव देखते हैं इसलिए वे चारों ओर से पूर्ण सुरक्षित, कवचित और सुसज्जित होते हैं। जिस प्रकार माता अपने शिशु की हर तरफ से पूरी देखभाल करती है उसी प्रकार ब्रह्मऋषियों की प्रत्येक आवश्यकता माता बिना बताए ही स्वतः पूर्ण कर देती है। बालक के एक रूदन पर माता के स्तनों से दुग्ध की धारा फूट पड़ती है, वह स्वयं भूखी रह सकती है परन्तु बालक के लिए येन-केन-प्रकारेण भोजन उपलब्ध करा देती है। ब्रह्मत्व धारण करने का एकमात्र उपाय, अनुष्ठान एवं संकल्प है मातृ शक्ति की पूर्ण तन्मयता के साथ उपासना, आराधना एवं कृपा की प्राप्ति यही रहस्य जब विश्वामित्र ने समझा तब जाकर वह ब्रह्मऋषि बन पाये। गायत्री मंत्र क्या है? सीधी सी बात है वह परम ब्रह्माण्डीय, परम आदि माता का स्तुतिगान ही है। ब्रह्मविद्या के अंतर्गत क्या नहीं आता है? ब्रह्मज्ञानी चाहें तो बैठे-बैठे हजारों मील दूर की घटना को देख सकते हैं कहीं भी प्रकट हो सकते हैं। ब्रह्माण्ड में कहीं भी विचरण कर सकते हैं, किसी भी रोगी को दो मिनिट में स्वस्थ कर सकते हैं, मनचाहा पदार्थ अपनी इच्छानुरूप एक क्षण में प्राप्त कर सकते हैं, ब्रह्माण्ड के गूढ़ से गूढ़ रहस्यों को एक साथ देख सकते हैं, आत्मसात कर सकते हैं, किसी भी विषय पर घण्टों बोल सकते हैं, लीला भी कर सकते हैं, माया भी फैला सकते हैं, आशीर्वाद भी प्रदान कर सकते हैं, वरदान भी दे सकते हैं, दीक्षा संस्कार भी सम्पन्न कर सकते हैं। जिसने खुद कायाकल्प किया होगा वही तो कायाकल्प करायेगा। जिसके अंदर स्वयं के दुग्ध का उत्पादन होगा वही तो दुग्धपान करायेगा। वृक्ष ही आपको प्राणवान प्रदान करते हैं। जब प्राणवायु बनेगी तभी तो आपको प्राणवायु प्रदान करेंगे। प्रदान करने का खेल मातृ शक्ति का परिचायक है। मातृत्व के रस से परिपूर्ण मस्तिष्क ही मातृ शक्ति का प्रसार करेगी। जो स्वयं प्रेम विहीन होगा मातृत्व विहीन होगा, वह तो सिर्फ हिंसा, ताण्डव एवं दूसरों की आँखों में आँसू ही लायेगा। माता की गोद में बालक हँसने लगता है, मुस्कान बिखेरता है। ठीक इसी प्रकार आदि शक्ति माँ भगवती की गोद में खेल रहा बालक किस प्रकार की अमृतमयी मुस्कान बिखेरेगा इसे आप स्वयं ही समझ सकते हैं। ब्रह्मविद्या प्राप्त करने के लिए नाना प्रकार के जतन करने की जरूरत नहीं है बस सिर्फ मातृत्व की शरण में रहिए, मातृत्व तुल्य व्यक्तित्व बनिए, बालक के समान अपने आपको समेटिए और मुस्कान बिखेरिए यही है गायत्री शक्ति का रहस्य । .
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
-----------------
साठ वर्ष के भोगी सोलह वर्ष की कन्याओं से विवाह करने लगेंगे तो इस प्रकार समाज में कुकर्म फैल जायेगा। यही कारण है कि भोगी और कामी व्यक्ति मधुमेह, हृदय रोग एवं अन्य प्रकार के विकारों से ग्रसित हो जाते हैं। अत्यधिक कामातुर स्त्रियों के गर्भाशय जीवन के मध्य अवस्था में ही नष्ट हो जाते हैं। यह सब मनुष्य नहीं करता है कोई न कोई दिव्य शक्ति ही इस प्रकार के दण्ड निर्धारित कर देती हैं जिससे कि अंकुश लग सके कुप्रवृत्तियों पर यही है। देव और असुर शक्तियों के बीच चलने वाला निरंतर संग्राम सूर्य की किरणें अत्यंत ही घातक हैं परन्तु ब्रह्म शक्ति के चलते उनकी भी हिम्मत नहीं है कि वे पृथ्वी पर घातक रूप में पैर रख सकें। उन्हें भी माता गायत्री के अनुसार ही कोमल रूप में पृथ्वी पर उतरना पड़ता है। इस पृथ्वी पर प्रत्येक शक्ति को अमृतमयी रूप में उतरने की इजाजत है अर्थात शक्ति का वह स्वरूप जो कि जीवन के लिए उत्पादक एवं लाभप्रद हो। बस इसी मातृमयी शक्ति के कारण ही तो बालक नौ महीने स्त्री के गर्भ में रह पाता है।
ब्रह्मऋषि सदैव मातृ शक्ति के उपासक होते हैं। प्रत्येक तत्व में, प्रत्येक जीव में माता के भाव देखते हैं इसलिए वे चारों ओर से पूर्ण सुरक्षित, कवचित और सुसज्जित होते हैं। जिस प्रकार माता अपने शिशु की हर तरफ से पूरी देखभाल करती है उसी प्रकार ब्रह्मऋषियों की प्रत्येक आवश्यकता माता बिना बताए ही स्वतः पूर्ण कर देती है। बालक के एक रूदन पर माता के स्तनों से दुग्ध की धारा फूट पड़ती है, वह स्वयं भूखी रह सकती है परन्तु बालक के लिए येन-केन-प्रकारेण भोजन उपलब्ध करा देती है। ब्रह्मत्व धारण करने का एकमात्र उपाय, अनुष्ठान एवं संकल्प है मातृ शक्ति की पूर्ण तन्मयता के साथ उपासना, आराधना एवं कृपा की प्राप्ति यही रहस्य जब विश्वामित्र ने समझा तब जाकर वह ब्रह्मऋषि बन पाये। गायत्री मंत्र क्या है? सीधी सी बात है वह परम ब्रह्माण्डीय, परम आदि माता का स्तुतिगान ही है। ब्रह्मविद्या के अंतर्गत क्या नहीं आता है? ब्रह्मज्ञानी चाहें तो बैठे-बैठे हजारों मील दूर की घटना को देख सकते हैं कहीं भी प्रकट हो सकते हैं। ब्रह्माण्ड में कहीं भी विचरण कर सकते हैं, किसी भी रोगी को दो मिनिट में स्वस्थ कर सकते हैं, मनचाहा पदार्थ अपनी इच्छानुरूप एक क्षण में प्राप्त कर सकते हैं, ब्रह्माण्ड के गूढ़ से गूढ़ रहस्यों को एक साथ देख सकते हैं, आत्मसात कर सकते हैं, किसी भी विषय पर घण्टों बोल सकते हैं, लीला भी कर सकते हैं, माया भी फैला सकते हैं, आशीर्वाद भी प्रदान कर सकते हैं, वरदान भी दे सकते हैं, दीक्षा संस्कार भी सम्पन्न कर सकते हैं। जिसने खुद कायाकल्प किया होगा वही तो कायाकल्प करायेगा। जिसके अंदर स्वयं के दुग्ध का उत्पादन होगा वही तो दुग्धपान करायेगा। वृक्ष ही आपको प्राणवान प्रदान करते हैं। जब प्राणवायु बनेगी तभी तो आपको प्राणवायु प्रदान करेंगे। प्रदान करने का खेल मातृ शक्ति का परिचायक है। मातृत्व के रस से परिपूर्ण मस्तिष्क ही मातृ शक्ति का प्रसार करेगी। जो स्वयं प्रेम विहीन होगा मातृत्व विहीन होगा, वह तो सिर्फ हिंसा, ताण्डव एवं दूसरों की आँखों में आँसू ही लायेगा। माता की गोद में बालक हँसने लगता है, मुस्कान बिखेरता है। ठीक इसी प्रकार आदि शक्ति माँ भगवती की गोद में खेल रहा बालक किस प्रकार की अमृतमयी मुस्कान बिखेरेगा इसे आप स्वयं ही समझ सकते हैं। ब्रह्मविद्या प्राप्त करने के लिए नाना प्रकार के जतन करने की जरूरत नहीं है बस सिर्फ मातृत्व की शरण में रहिए, मातृत्व तुल्य व्यक्तित्व बनिए, बालक के समान अपने आपको समेटिए और मुस्कान बिखेरिए यही है गायत्री शक्ति का रहस्य । .
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
👍9❤5
Forwarded from Hindu X (🤩 सागर 0.5 यतो धर्मस्ततो जयः)
वृषभ माने बैल,
वृषभ माने पुराण की भाषा में धर्म !
वृषभ है भोले की सवारी,
भगवान भोले ज्ञान के रूप हैं, जब तक विश्वास न होगा ज्ञान भी न होगा,
तो विश्वास के रूप में भी शिव हैं,
जहाँ विश्वास होगा वहाँ धर्म होगा या जहाँ धर्म होगा वहाँ विश्वास होगा ...
भगवान भोले का एक नाम वृषभध्वज भी है,
यानी बैल के ऊपर सवार, फहराती पताका, ध्वजा !
धर्म पर विश्वास आरूढ़ होता है !
श्रद्धा ( शतरूपा ) ही यहाँ शृंगार गौरी बनी - शत शत रूपों में विराज रहीं - अपनी स्नेहसिक्त वापी धारा से श्रद्धालुओं की ज्ञान-पिपासा, तृष्णा, प्यास का उन्मूलन कर तुष्टि और तृप्ति प्रदान करती !
____
पत्थर का बैल सच बोल गया
ईमान की कसम खाने वाले झूठे ठहरे ...
@HinduX
वृषभ माने पुराण की भाषा में धर्म !
वृषभ है भोले की सवारी,
भगवान भोले ज्ञान के रूप हैं, जब तक विश्वास न होगा ज्ञान भी न होगा,
तो विश्वास के रूप में भी शिव हैं,
जहाँ विश्वास होगा वहाँ धर्म होगा या जहाँ धर्म होगा वहाँ विश्वास होगा ...
भगवान भोले का एक नाम वृषभध्वज भी है,
यानी बैल के ऊपर सवार, फहराती पताका, ध्वजा !
धर्म पर विश्वास आरूढ़ होता है !
श्रद्धा ( शतरूपा ) ही यहाँ शृंगार गौरी बनी - शत शत रूपों में विराज रहीं - अपनी स्नेहसिक्त वापी धारा से श्रद्धालुओं की ज्ञान-पिपासा, तृष्णा, प्यास का उन्मूलन कर तुष्टि और तृप्ति प्रदान करती !
____
पत्थर का बैल सच बोल गया
ईमान की कसम खाने वाले झूठे ठहरे ...
@HinduX
❤19👍3
Forwarded from Hindu Photos 24/7 🕉️
This media is not supported in your browser
VIEW IN TELEGRAM
❤18🥰2🙏1
प्रातः स्मरामि हनुमन्तमनन्तवीर्य श्रीरामचन्द्रचरणाम्बुजचरीकम् ।
लडापुरीदहननन्दित व सवांर्थसद्विसदन प्रथितप्रभाम् ।।
उन अनन्त पराक्रमी हनुमानजी को मैं प्रातः काल वन्दना करता हूँ जो भगवान राम के चरण कमलों के भ्रमर है, जिन्होंने लंकापुरी का दहन करके देववृन्द को आनन्दित किया है जो समस्त अर्थ सिद्धियों के दाता और लोक में विख्यात प्रभावशाली है।
@Sanatan
लडापुरीदहननन्दित व सवांर्थसद्विसदन प्रथितप्रभाम् ।।
उन अनन्त पराक्रमी हनुमानजी को मैं प्रातः काल वन्दना करता हूँ जो भगवान राम के चरण कमलों के भ्रमर है, जिन्होंने लंकापुरी का दहन करके देववृन्द को आनन्दित किया है जो समस्त अर्थ सिद्धियों के दाता और लोक में विख्यात प्रभावशाली है।
@Sanatan
❤20👍6🥰1🙏1
मुदा करात्तमोदकं सदा विमुक्ति साधकं कलाधरावतंसकं विलासिलोकरञ्जकम्।
अनायकैकनायकं विनाशितेभदैतयकं नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम् ॥
नतेतरातिभीकरं नवोदितार्कभस्वरं नमत्सुरारिनिर्जरं नताधिकापदुद्धरम् ।
सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम् ॥
समस्तलोकशंकरं निरस्तदैत्यकुञ्जरं दरेतरोदरं वरं वरेभवक्त्रमक्षरम् ।
कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करं नमस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम् ॥
अकिंचनार्तिमार्जनं चिरंतनोक्तिभाजनं पुरारिपूर्वनन्दनं सुरारिगर्वचर्वणम् ।
प्रपञ्चनाशभीषणं धनंजयादिभूषणं कपोलदानवारणं भजे पुराणवारणम् ॥ नितान्तकान्तदन्तकान्तिमन्तकान्तकात्मजमचिन्त्यरूपमन्तहीनमन्तरायकृन्तनम् ।
हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनां तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि संततम् ॥
महागणेशपञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहं प्रगायति प्रभात के हृदि स्मरन् गणेश्वरम् ।
अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतां समाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैति सोऽचिरात् ॥
जिन्होंने बड़े आनंद से अपने हाथ में मोदक ले रखे हैं। जो सदा ही मुमुक्षु जनों की मोक्षभिलाषा को सिद्ध करने वाले हैं। चन्द्रमा जिनके भालदेश के भूषण हैं जो भक्ति भाव से विलासित होने वाले लोगों के मन को आनन्दित करते हैं। जिनका कोई नायक या स्वामी नहीं है। जो एकमात्र स्वयं ही सबके नायक हैं, जिन्होंने गजासुर का संहार किया है। तथा जो नतमस्तक पुरुषों के अशुभ का तत्काल नाश करने वाले हैं, उन भगवान विनायक को मैं प्रणाम करता हूँ।
जो प्रणत न होने वाले उद्दण्ड मनुष्यों के लिये अत्यंत भयंकर है। नवोदित सूर्य के समान अरुण प्रभा से उद्भासित हैं। दैत्य और देवता-सभी जिनके चरणों में शीश झुकाते हैं। जो प्रणत भक्तों का भीषण आपत्तियों से उद्धार करने वाले हैं, उन सुरेश्वर, निधियों के अधिपति, गजेन्द्रशासक, महेश्वर, परात्पर गणेश्वर का मैं निरन्तर आश्रय ग्रहण करता हूँ। जो समस्त लोकों का कल्याण करने वाले हैं, जिन्होंने गजाकार दैत्य का विनाश किया है, जो लम्बोदर, श्रेष्ठ, अविनाशी एवं गजराजवदन है, कृपा, क्षमा और आनन्द की निधि हैं। जो यश प्रदान करने वाले तथा नमनशीलों को मन से सहयोग देने वाले हैं, उन प्रकाशमान देवता गणेश को मैं प्रणाम करता हूँ।
जो अकिंचन-जनों की पीड़ा दूर करने वाले तथा चिरंतन उक्ति (वेदवाणी) के भाजन (वर्ण्य विषय) हैं। जिन्हें त्रिपुरारि शिव के ज्येष्ठ पुत्र होने का गौरव प्राप्त हैं। जो देव-शत्रुओं के गर्व को चूर्ण कर देने वाले हैं। दृश्य-प्रपंच का संहार करते समय जिनका रूप भीषण हो जाता है। धनन्जय आदि नाग जिनके भूषण हैं तथा जो गण्डस्थल से दान की धारा बहाने वाले गजेन्द्ररूप हैं, उन पुरातन गजराज गणेश का मैं भजन करता हूँ।
जिनकी दन्तकान्ति नितान्त कमनीय है। जो अन्तक के अन्तक (मृत्युंजय) शिव के पुत्र हैं, जिनका रूप अचिन्त्य एवं अनन्त है। जो समस्त विघ्नों का उच्छेद करने वाले हैं तथा योगियों के हृदय के भीतर जिनका निरन्तर निवास है, उन एकदन्त गणेश का मैं सदा चिन्तन करता हूँ। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल मन ही मन गणेश का स्मरण करते हुए इस महागणेश पंचरत्न का आदरपूर्वक उच्चस्वर से गान करता है, वह शीघ्र ही आरोग्य, निर्दोषता, उत्तम ग्रन्थों एवं सत्पुरुषों का संग उत्तम पुत्र, दीर्घ आयु एवं अष्ट सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है।
@Sanatan
अनायकैकनायकं विनाशितेभदैतयकं नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम् ॥
नतेतरातिभीकरं नवोदितार्कभस्वरं नमत्सुरारिनिर्जरं नताधिकापदुद्धरम् ।
सुरेश्वरं निधीश्वरं गजेश्वरं गणेश्वरं महेश्वरं तमाश्रये परात्परं निरन्तरम् ॥
समस्तलोकशंकरं निरस्तदैत्यकुञ्जरं दरेतरोदरं वरं वरेभवक्त्रमक्षरम् ।
कृपाकरं क्षमाकरं मुदाकरं यशस्करं नमस्करं नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम् ॥
अकिंचनार्तिमार्जनं चिरंतनोक्तिभाजनं पुरारिपूर्वनन्दनं सुरारिगर्वचर्वणम् ।
प्रपञ्चनाशभीषणं धनंजयादिभूषणं कपोलदानवारणं भजे पुराणवारणम् ॥ नितान्तकान्तदन्तकान्तिमन्तकान्तकात्मजमचिन्त्यरूपमन्तहीनमन्तरायकृन्तनम् ।
हृदन्तरे निरन्तरं वसन्तमेव योगिनां तमेकदन्तमेव तं विचिन्तयामि संततम् ॥
महागणेशपञ्चरत्नमादरेण योऽन्वहं प्रगायति प्रभात के हृदि स्मरन् गणेश्वरम् ।
अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतां समाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैति सोऽचिरात् ॥
जिन्होंने बड़े आनंद से अपने हाथ में मोदक ले रखे हैं। जो सदा ही मुमुक्षु जनों की मोक्षभिलाषा को सिद्ध करने वाले हैं। चन्द्रमा जिनके भालदेश के भूषण हैं जो भक्ति भाव से विलासित होने वाले लोगों के मन को आनन्दित करते हैं। जिनका कोई नायक या स्वामी नहीं है। जो एकमात्र स्वयं ही सबके नायक हैं, जिन्होंने गजासुर का संहार किया है। तथा जो नतमस्तक पुरुषों के अशुभ का तत्काल नाश करने वाले हैं, उन भगवान विनायक को मैं प्रणाम करता हूँ।
जो प्रणत न होने वाले उद्दण्ड मनुष्यों के लिये अत्यंत भयंकर है। नवोदित सूर्य के समान अरुण प्रभा से उद्भासित हैं। दैत्य और देवता-सभी जिनके चरणों में शीश झुकाते हैं। जो प्रणत भक्तों का भीषण आपत्तियों से उद्धार करने वाले हैं, उन सुरेश्वर, निधियों के अधिपति, गजेन्द्रशासक, महेश्वर, परात्पर गणेश्वर का मैं निरन्तर आश्रय ग्रहण करता हूँ। जो समस्त लोकों का कल्याण करने वाले हैं, जिन्होंने गजाकार दैत्य का विनाश किया है, जो लम्बोदर, श्रेष्ठ, अविनाशी एवं गजराजवदन है, कृपा, क्षमा और आनन्द की निधि हैं। जो यश प्रदान करने वाले तथा नमनशीलों को मन से सहयोग देने वाले हैं, उन प्रकाशमान देवता गणेश को मैं प्रणाम करता हूँ।
जो अकिंचन-जनों की पीड़ा दूर करने वाले तथा चिरंतन उक्ति (वेदवाणी) के भाजन (वर्ण्य विषय) हैं। जिन्हें त्रिपुरारि शिव के ज्येष्ठ पुत्र होने का गौरव प्राप्त हैं। जो देव-शत्रुओं के गर्व को चूर्ण कर देने वाले हैं। दृश्य-प्रपंच का संहार करते समय जिनका रूप भीषण हो जाता है। धनन्जय आदि नाग जिनके भूषण हैं तथा जो गण्डस्थल से दान की धारा बहाने वाले गजेन्द्ररूप हैं, उन पुरातन गजराज गणेश का मैं भजन करता हूँ।
जिनकी दन्तकान्ति नितान्त कमनीय है। जो अन्तक के अन्तक (मृत्युंजय) शिव के पुत्र हैं, जिनका रूप अचिन्त्य एवं अनन्त है। जो समस्त विघ्नों का उच्छेद करने वाले हैं तथा योगियों के हृदय के भीतर जिनका निरन्तर निवास है, उन एकदन्त गणेश का मैं सदा चिन्तन करता हूँ। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल मन ही मन गणेश का स्मरण करते हुए इस महागणेश पंचरत्न का आदरपूर्वक उच्चस्वर से गान करता है, वह शीघ्र ही आरोग्य, निर्दोषता, उत्तम ग्रन्थों एवं सत्पुरुषों का संग उत्तम पुत्र, दीर्घ आयु एवं अष्ट सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है।
@Sanatan
🔥7❤3👍3
शुक्राचार्य जी द्वारा रचित महामृत्युंजय स्तोत्र
-------------------------------------------------------
यह पृथ्वी पुरुष क्षेत्र है। पुरुष वही है जिसमें कि पुरुषार्थ का सृजन होता है। इस पृथ्वी पर भले ही अवतारी व्यक्तित्व ही क्यों न हो उसे भी पुरुषार्थ का प्राकट्य करना पड़ता है। राम ने भी पुरुषार्थ किया, कृष्ण से लेकर सभी महामानव पुरुषार्थ का ही प्राकट्य करते हैं। पुरुषार्थ के अभाव में कुछ भी प्राप्त नहीं होता। जो । रोते हैं, भाग्य को कोसते हैं, अपने आपको दीनहीन समझते हैं, नाना प्रकार के प्रपंच रच अकर्मणता प्रस्तुत करते हैं निस्संदेह वे पुरुषार्थहीन हैं। अध्यात्म में पुरुषार्थ के बल पर ही सिद्धि, ज्ञान, तपस्या इत्यादि प्राप्त की जाती है। सनातन धर्म के ऋषि मुनि अत्यंत ही पुरुषार्थी रहे हैं। इन्हीं में से एक भृगु नंदन शुक्राचार्य जी भी हैं। वे असुरों के महागुरु हैं, उन्होंने अपने पुरुषार्थ से मृत संजीवनी विद्या प्राप्त की है। शिव जी उन्हें निगल गये थे। शिव जी के जठर में उन्हें निकलने का मार्ग दिखाई नहीं पड़ रहा था तब उन्होंने दिव्य मंत्रों के साथ शिव जी की स्तुति की कालान्तर उनके वीर्य मार्ग से वे प्रकट हुए और शिव पुत्र कहलाये।
शुक्राचार्य जी को स्वयं शिव जी के जठर में जीवित रहकर अपनी सिद्धि की परीक्षा देनी पड़ी। गुरु चलता-फिरता, जीवित जाग्रत मृत्युञ्जय रूपी शिव विग्रह है। जीवन के चौराहे पर खड़े शिष्य को वह नवजीवन प्रदान करता हैं। अनिर्णय को निर्णय में परिवर्तित करता है। जब- जब सनातन धर्म की अनेकों धाराओं में ज्ञान, तंत्र, ज्योतिष, सिद्धि, उपासना इत्यादि लुप्त होने की कगार पर पहुँचती है कोई एक ऋषि मृत्युञ्जय रूपी शिव विग्रह बन पुनः धर्म की संस्थापना कर देता है। पुनः शिष्यों की एक अखण्ड श्रृंखला को चलायमान कर देता है। स्तोत्र जड़ हैं कल्पवृक्ष की। शुक्राचार्य जी द्वारा रचित मृत्युञ्जय स्तोत्र से ही कालान्तर विभिन्न प्रकार के मृत्युञ्जय अनुष्ठान मंत्र इत्यादि प्रकट हुए हैं। नीचे मूल स्तोत्र को हिन्दी अर्थ के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ। संकट काल में मात्र एक आवृत्ति हृदयंगम भाव से पढ़ने पर जातक की रक्षा निश्चित ही होती है। इसके साथ ही शिव जी के 108 नामों से की गई अंधक द्वारा स्तुति भी दे रहा हूं । जिसके पठन से जातक को तुरंत ही शिव सानिध्य की प्राप्ति होती है।
शिव जी का एक-एक नाम उच्चारित करते हुए एक-एक अखण्डित बिल्वपत्र शिवलिङ्ग पर अर्पित करने से शुक्रेश्वर पूजन सम्पन्न होता है। शुक्र ही सबसे महत्वपूर्ण ग्रह है। शुक्र ही पराक्रम, पुरुषार्थ, यश, प्रसिद्धि कीर्ति और नाना प्रकार के वैभव प्रदान करता है। जिसका शुक्र अस्त हो अर्थात कुण्डलिनी में शुक्र का प्रकाश क्षीण हो वे जीवन के हर क्षेत्र में असफल होते हैं। शुक्र अस्त व्यक्तियों का वैवाहिक, पारिवारिक एवं गृहस्थ जीवन पूरी तरह से बर्बाद होता है। शुक्र पर्वत के दबे होने के कारण व्यक्ति कायर, अवसाद से ग्रसित, सम्मोहन एवं वशीकरण हीन निर्जीव बनकर रह जाता है। शुक्र पर्वत के बिगड़े होने के कारण या शुक्र पर्वत पर काला तिल होने से व्यक्ति चरित्रहीन, यौन रोगों से ग्रसित और विकृत कामुक प्रवृत्ति का होता है। जीवन की लय ही शुक्र है। शुक्र प्रधान व्यक्ति उच्च श्रेणी के दार्शनिक, गुरु पद पर आसीन शास्त्रार्थ में निपुण, यौद्धा, वीर और सदैव चमत्कारिक सम्मोहन एवं वशीकरण से युक्त होते हैं। पूर्ण विकसित शुक्र पर्वत सौन्दर्य, स्वास्थ्य एवं सर्व सफलता का द्योतक है।
शुक्र को विकसित करने के लिए 11 अखण्डित बिल्व पत्र इस मंत्र के साथ शिवलिङ्ग पर अर्पित करने चाहिए। मात्र 21 दिनों में जातक को अनुकूल परिणाम मिल जाते हैं।
॥ ॐ नमः शिवाय शुभं शुभं कुरु कुरु शिवाय नमः ॐ ॥
ॐ नमस्ते देवेशाय सुरासुरनमस्कृताय भूतभव्यमहादेवाय हरितपिङ्गललोचनाय बलाय बुद्धिरूपिणे वैयाघ्र वसनच्छ दायार णे याय त्रैलोक्यप्रभवे ईश्वराय हराय हरिनेत्राय युगान्तकरणायानलाय गणेशाय लोकपालाय महाभुजाय महाहस्ताय शूलिने महादंष्ट्रिणे कालाय महेश्वराय अव्ययाय कालरूपिणे नीलग्रीवाय महोदराय गणाध्यक्षाय सर्वात्मने सर्वभावनाव सर्वगाय मृत्युहन्त्रे पारियात्रसुव्रताय ब्रह्मचारिणे वेदान्तगाय तपोऽन्तगाय पशुपतये व्यङ्गाय शूलपाणये वृषकेतवे हरये जटिने शिखण्डिने लकुटिने महायशसे भूतेश्वराय गुहावासिने वीणापणवतालवते अमराय दर्शनीयाय बालसूर्यनिभाय श्मशानवासिने भगवते उमापतये अरिंदमाय भगस्याक्षिपातिने पूष्णो दशननाशनाय क्रूरकर्तकाय पाशहस्ताय प्रलयकालाय उल्कामुखायाग्निकेतवे मुनये दीप्ताय विशाम्पतये उन्नयते जनकाय चतुर्थकाय लोकसत्तमाय वामदेवाय वाग्दाक्षिण्याय वामतो भिक्षवे । .
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
-------------------------------------------------------
यह पृथ्वी पुरुष क्षेत्र है। पुरुष वही है जिसमें कि पुरुषार्थ का सृजन होता है। इस पृथ्वी पर भले ही अवतारी व्यक्तित्व ही क्यों न हो उसे भी पुरुषार्थ का प्राकट्य करना पड़ता है। राम ने भी पुरुषार्थ किया, कृष्ण से लेकर सभी महामानव पुरुषार्थ का ही प्राकट्य करते हैं। पुरुषार्थ के अभाव में कुछ भी प्राप्त नहीं होता। जो । रोते हैं, भाग्य को कोसते हैं, अपने आपको दीनहीन समझते हैं, नाना प्रकार के प्रपंच रच अकर्मणता प्रस्तुत करते हैं निस्संदेह वे पुरुषार्थहीन हैं। अध्यात्म में पुरुषार्थ के बल पर ही सिद्धि, ज्ञान, तपस्या इत्यादि प्राप्त की जाती है। सनातन धर्म के ऋषि मुनि अत्यंत ही पुरुषार्थी रहे हैं। इन्हीं में से एक भृगु नंदन शुक्राचार्य जी भी हैं। वे असुरों के महागुरु हैं, उन्होंने अपने पुरुषार्थ से मृत संजीवनी विद्या प्राप्त की है। शिव जी उन्हें निगल गये थे। शिव जी के जठर में उन्हें निकलने का मार्ग दिखाई नहीं पड़ रहा था तब उन्होंने दिव्य मंत्रों के साथ शिव जी की स्तुति की कालान्तर उनके वीर्य मार्ग से वे प्रकट हुए और शिव पुत्र कहलाये।
शुक्राचार्य जी को स्वयं शिव जी के जठर में जीवित रहकर अपनी सिद्धि की परीक्षा देनी पड़ी। गुरु चलता-फिरता, जीवित जाग्रत मृत्युञ्जय रूपी शिव विग्रह है। जीवन के चौराहे पर खड़े शिष्य को वह नवजीवन प्रदान करता हैं। अनिर्णय को निर्णय में परिवर्तित करता है। जब- जब सनातन धर्म की अनेकों धाराओं में ज्ञान, तंत्र, ज्योतिष, सिद्धि, उपासना इत्यादि लुप्त होने की कगार पर पहुँचती है कोई एक ऋषि मृत्युञ्जय रूपी शिव विग्रह बन पुनः धर्म की संस्थापना कर देता है। पुनः शिष्यों की एक अखण्ड श्रृंखला को चलायमान कर देता है। स्तोत्र जड़ हैं कल्पवृक्ष की। शुक्राचार्य जी द्वारा रचित मृत्युञ्जय स्तोत्र से ही कालान्तर विभिन्न प्रकार के मृत्युञ्जय अनुष्ठान मंत्र इत्यादि प्रकट हुए हैं। नीचे मूल स्तोत्र को हिन्दी अर्थ के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ। संकट काल में मात्र एक आवृत्ति हृदयंगम भाव से पढ़ने पर जातक की रक्षा निश्चित ही होती है। इसके साथ ही शिव जी के 108 नामों से की गई अंधक द्वारा स्तुति भी दे रहा हूं । जिसके पठन से जातक को तुरंत ही शिव सानिध्य की प्राप्ति होती है।
शिव जी का एक-एक नाम उच्चारित करते हुए एक-एक अखण्डित बिल्वपत्र शिवलिङ्ग पर अर्पित करने से शुक्रेश्वर पूजन सम्पन्न होता है। शुक्र ही सबसे महत्वपूर्ण ग्रह है। शुक्र ही पराक्रम, पुरुषार्थ, यश, प्रसिद्धि कीर्ति और नाना प्रकार के वैभव प्रदान करता है। जिसका शुक्र अस्त हो अर्थात कुण्डलिनी में शुक्र का प्रकाश क्षीण हो वे जीवन के हर क्षेत्र में असफल होते हैं। शुक्र अस्त व्यक्तियों का वैवाहिक, पारिवारिक एवं गृहस्थ जीवन पूरी तरह से बर्बाद होता है। शुक्र पर्वत के दबे होने के कारण व्यक्ति कायर, अवसाद से ग्रसित, सम्मोहन एवं वशीकरण हीन निर्जीव बनकर रह जाता है। शुक्र पर्वत के बिगड़े होने के कारण या शुक्र पर्वत पर काला तिल होने से व्यक्ति चरित्रहीन, यौन रोगों से ग्रसित और विकृत कामुक प्रवृत्ति का होता है। जीवन की लय ही शुक्र है। शुक्र प्रधान व्यक्ति उच्च श्रेणी के दार्शनिक, गुरु पद पर आसीन शास्त्रार्थ में निपुण, यौद्धा, वीर और सदैव चमत्कारिक सम्मोहन एवं वशीकरण से युक्त होते हैं। पूर्ण विकसित शुक्र पर्वत सौन्दर्य, स्वास्थ्य एवं सर्व सफलता का द्योतक है।
शुक्र को विकसित करने के लिए 11 अखण्डित बिल्व पत्र इस मंत्र के साथ शिवलिङ्ग पर अर्पित करने चाहिए। मात्र 21 दिनों में जातक को अनुकूल परिणाम मिल जाते हैं।
॥ ॐ नमः शिवाय शुभं शुभं कुरु कुरु शिवाय नमः ॐ ॥
ॐ नमस्ते देवेशाय सुरासुरनमस्कृताय भूतभव्यमहादेवाय हरितपिङ्गललोचनाय बलाय बुद्धिरूपिणे वैयाघ्र वसनच्छ दायार णे याय त्रैलोक्यप्रभवे ईश्वराय हराय हरिनेत्राय युगान्तकरणायानलाय गणेशाय लोकपालाय महाभुजाय महाहस्ताय शूलिने महादंष्ट्रिणे कालाय महेश्वराय अव्ययाय कालरूपिणे नीलग्रीवाय महोदराय गणाध्यक्षाय सर्वात्मने सर्वभावनाव सर्वगाय मृत्युहन्त्रे पारियात्रसुव्रताय ब्रह्मचारिणे वेदान्तगाय तपोऽन्तगाय पशुपतये व्यङ्गाय शूलपाणये वृषकेतवे हरये जटिने शिखण्डिने लकुटिने महायशसे भूतेश्वराय गुहावासिने वीणापणवतालवते अमराय दर्शनीयाय बालसूर्यनिभाय श्मशानवासिने भगवते उमापतये अरिंदमाय भगस्याक्षिपातिने पूष्णो दशननाशनाय क्रूरकर्तकाय पाशहस्ताय प्रलयकालाय उल्कामुखायाग्निकेतवे मुनये दीप्ताय विशाम्पतये उन्नयते जनकाय चतुर्थकाय लोकसत्तमाय वामदेवाय वाग्दाक्षिण्याय वामतो भिक्षवे । .
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
👍7❤6🙏1
शुक्राचार्य जी द्वारा रचित महामृत्युंजय स्तोत्र (२)
-------------------------------------------------
भिक्षुरूपिणे जटिने स्वयं जटिलाय शक्रहस्तप्रतिस्तम्भकाय वसूनां स्तम्भकाय कृतवे ऋतुकराय कालाय मेधाविने मधुकराय चलाय वानस्पत्याय वाजसने तिसमाश्रमपूजिताय जगद्धात्रे जगत्कर्त्रे पुरुषाय शाश्वताय ध्रुवाय धर्माध्यक्षाय त्रिवर्त्मने भूत भावनाय त्रिनेत्राय बहुरूपाय सूर्यायुतसमप्रभाव देवाय सर्वतूर्यनिनादिने सर्वबाधाविमोचनाय बन्धनाय सर्वधारिणे धर्मोत्तमाय पुष्पदन्तायाविभागाय मुखाय सर्वहराय हिरण्यश्रवसे द्वारिणे भीमाय । भीमपराक्रमाय ॐ नमो नमः ।
ॐ जो देवताओं के स्वामी, सुर-असुरद्वारा वन्दित, भूत और भविष्य के महान् देवता, हरे और पीले नेत्रों से युक्त, महाबली, बुद्धिस्वरूप, बांबंबर धारण करने के वाले, अग्निस्वरूप, त्रिलोकी के उत्पत्तिस्थान, ईश्वर, हर हरिनेत्र प्रलयकारी अग्निस्वरूप, गणेश, लोकपाल, महाभुज, महाहस्त, त्रिशूल धारण करने वाले, बड़ी बड़ी दाढ़ोंवाले कालस्वरूप, महेश्वर, अविनाशी, कालरूपी, नीलकण्ठ, महोदर, गणाध्यक्ष, सर्वात्मा, सबको उत्पन्न करने वाले, सर्वव्यापी, मृत्यु को हटानेवाले, पारियात्र पर्वत पर उत्तम व्रत धारण करनेवाले, ब्रह्मचारी, वेदान्तप्रतिपाद्य, तप की अन्तिम सीमा तक पहुँचने वाले, पशुपति, विशिष्ट अंङ्गों वाले, शूलपाणि, वृषध्वज, पापापहारी, जटाधारी, शिंखण्ड धारण करने वाले, दण्डधारी, महायशस्वी, भूतेश्वर गुहा में निवास करने वाले, वीणा और पणव पर ताल लगाने वाले, अमर, दर्शनीय, बालसूर्य- सरीखे रूपवाले श्मशानवासी, ऐश्वर्यशाली, उमापति, शत्रुदमन, भग के नेत्रों को नष्ट कर देने वाले, पूषा के दाँतों के विनाशक, क्रूरतापूर्वक संहार करने वाले, पाशधारी, प्रलयकालरूप, उल्कामुख, अग्निकंतु, मननशील, प्रकाशमान प्रजापति, ऊपर उठानेवाले, जीवों को उत्पन्न करने वाले, तुरीयतत्त्वरूप, लोकों में सर्वश्रेष्ठ वामदेव वाणी की चतुरतारूप, वाममार्ग में भिक्षुरूप, भिक्षुक, जटाधारी, जटिल दुराराध्य इन्द्र के हाथ को स्तम्भित करने वाले, वसुओं को बिजड़ित कर देने वाले, यज्ञस्वरूप, यज्ञकर्ता, काल, मेधावी, मधुकर चलने-फिरने वाले, वनस्पति का आश्रय लेनेवाले वाजसन नाम से सम्पूर्ण आश्रमों द्वारा पूजित, जगद्धाता, जगत्कर्ता, सर्वान्तर्यामी, सनातन, ध्रुव, धर्माध्यक्ष भूः भुवः स्वः - इन तीनों लोकों में विचरने वाले, भृतभावन त्रिनेत्र बहुरूप, दस हजार सूर्यो के समान प्रभावशाली, महादेव, सब तरह के बाजे बजानेवाले सम्पूर्ण बाधाओं से विमुक्त करने वाले, ।बन्धन स्वरूप सबको धारण करने वाले, उत्तम धर्मरूप, पुष्पदन्त विभागरहित, मुख्यरूप, सबका हरण करने वाले सुवर्ण के समान दीप्त कीर्तिवाले मुक्ति के द्वारस्वरूप, भीम तथा भीमपराक्रमी हैं, उन्हें नमस्कार है. नमस्कार है।
अंधक द्वारा शिव जी की 108 नामों से स्तुति
महादेवं विरूपाक्षं चन्द्रार्धकृतशेखरम् ।
अमृतं शाश्वतं स्थाणुं नीलकण्ठं पिनाकिनम् ॥
वृषभाक्षं महाज्ञेयं पुरुषं सर्वकामदम् ।
कामारिं कामदहनं कामरूपं कपर्दिनम् ॥
विरूपं गिरीशं भीमं सृविकणं रक्तवाससम् ।
योगिनं कालदहनं त्रिपुरघ्नं कपालिनम् ॥
गूढव्रतं गुप्तमंत्रं गम्भीरं भावगोचरम् ।
अणिमादिगुणाधारं त्रिलोकैश्वर्यदायकम् ॥
वीरं वीरहणं घोरं विरूपं मांसलं पटुम् ।
महामांसादमुन्मत्तं भैरवं वै महेश्वरम् ॥
त्रैलोक्यद्रावणं लुब्धं लुब्धकं यज्ञसूदनम्।
कृत्तिकानां सुतैर्युत्त मुन्मत्तं कृत्तिवाससम् ॥
गजकृत्तिपरीधानं क्षुब्धं भुजगभूषणम् ।
दत्तालम्बं च वेतालं घोरं शाकिनिपूजितम् ॥
अघोरं घोरदैत्यघ्नं घोरघोषं वनस्पतिम् ।
भस्माङ्गं जटिलं शुद्धं भेरुण्डशतसेवितम् ॥
भूतेश्वरं भूतनाथं पञ्चभूताश्रितं खगम् ।
क्रोधितं निष्ठरं चण्डं चण्डीशं चण्डिकाप्रियम् ॥
चण्डतुण्डं गरुत्मन्तं निस्त्रिंशं शवभोजनम् ।
लेलिहानं महारौद्रं मृत्युं मृत्योरगोचरम् ॥
मृत्योर्मृत्यं महासेनं श्मशानारण्यवासिनम् ।
रागं विरागं रागान्धं वीतरागं शतार्चिषम् ॥
सत्त्वं रजस्तमोधर्ममधर्मं वासवानुजम् ।
सत्यं त्वसत्यं सद्रूपमसद्रू पमहे तुकम् ॥
अर्धनारीश्वरं भानुं भानुकोटिशतप्रभम् ।
यज्ञं यज्ञपतिं रुद्रमीशानं वरदं शिवम् ॥
अष्टोत्तरशतं ह्येतन्मूर्तीनां परमात्मनः ।
शिवस्य दानवो ध्यायन् मुक्तस्तस्मान्महाभयात् ॥.
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
-------------------------------------------------
भिक्षुरूपिणे जटिने स्वयं जटिलाय शक्रहस्तप्रतिस्तम्भकाय वसूनां स्तम्भकाय कृतवे ऋतुकराय कालाय मेधाविने मधुकराय चलाय वानस्पत्याय वाजसने तिसमाश्रमपूजिताय जगद्धात्रे जगत्कर्त्रे पुरुषाय शाश्वताय ध्रुवाय धर्माध्यक्षाय त्रिवर्त्मने भूत भावनाय त्रिनेत्राय बहुरूपाय सूर्यायुतसमप्रभाव देवाय सर्वतूर्यनिनादिने सर्वबाधाविमोचनाय बन्धनाय सर्वधारिणे धर्मोत्तमाय पुष्पदन्तायाविभागाय मुखाय सर्वहराय हिरण्यश्रवसे द्वारिणे भीमाय । भीमपराक्रमाय ॐ नमो नमः ।
ॐ जो देवताओं के स्वामी, सुर-असुरद्वारा वन्दित, भूत और भविष्य के महान् देवता, हरे और पीले नेत्रों से युक्त, महाबली, बुद्धिस्वरूप, बांबंबर धारण करने के वाले, अग्निस्वरूप, त्रिलोकी के उत्पत्तिस्थान, ईश्वर, हर हरिनेत्र प्रलयकारी अग्निस्वरूप, गणेश, लोकपाल, महाभुज, महाहस्त, त्रिशूल धारण करने वाले, बड़ी बड़ी दाढ़ोंवाले कालस्वरूप, महेश्वर, अविनाशी, कालरूपी, नीलकण्ठ, महोदर, गणाध्यक्ष, सर्वात्मा, सबको उत्पन्न करने वाले, सर्वव्यापी, मृत्यु को हटानेवाले, पारियात्र पर्वत पर उत्तम व्रत धारण करनेवाले, ब्रह्मचारी, वेदान्तप्रतिपाद्य, तप की अन्तिम सीमा तक पहुँचने वाले, पशुपति, विशिष्ट अंङ्गों वाले, शूलपाणि, वृषध्वज, पापापहारी, जटाधारी, शिंखण्ड धारण करने वाले, दण्डधारी, महायशस्वी, भूतेश्वर गुहा में निवास करने वाले, वीणा और पणव पर ताल लगाने वाले, अमर, दर्शनीय, बालसूर्य- सरीखे रूपवाले श्मशानवासी, ऐश्वर्यशाली, उमापति, शत्रुदमन, भग के नेत्रों को नष्ट कर देने वाले, पूषा के दाँतों के विनाशक, क्रूरतापूर्वक संहार करने वाले, पाशधारी, प्रलयकालरूप, उल्कामुख, अग्निकंतु, मननशील, प्रकाशमान प्रजापति, ऊपर उठानेवाले, जीवों को उत्पन्न करने वाले, तुरीयतत्त्वरूप, लोकों में सर्वश्रेष्ठ वामदेव वाणी की चतुरतारूप, वाममार्ग में भिक्षुरूप, भिक्षुक, जटाधारी, जटिल दुराराध्य इन्द्र के हाथ को स्तम्भित करने वाले, वसुओं को बिजड़ित कर देने वाले, यज्ञस्वरूप, यज्ञकर्ता, काल, मेधावी, मधुकर चलने-फिरने वाले, वनस्पति का आश्रय लेनेवाले वाजसन नाम से सम्पूर्ण आश्रमों द्वारा पूजित, जगद्धाता, जगत्कर्ता, सर्वान्तर्यामी, सनातन, ध्रुव, धर्माध्यक्ष भूः भुवः स्वः - इन तीनों लोकों में विचरने वाले, भृतभावन त्रिनेत्र बहुरूप, दस हजार सूर्यो के समान प्रभावशाली, महादेव, सब तरह के बाजे बजानेवाले सम्पूर्ण बाधाओं से विमुक्त करने वाले, ।बन्धन स्वरूप सबको धारण करने वाले, उत्तम धर्मरूप, पुष्पदन्त विभागरहित, मुख्यरूप, सबका हरण करने वाले सुवर्ण के समान दीप्त कीर्तिवाले मुक्ति के द्वारस्वरूप, भीम तथा भीमपराक्रमी हैं, उन्हें नमस्कार है. नमस्कार है।
अंधक द्वारा शिव जी की 108 नामों से स्तुति
महादेवं विरूपाक्षं चन्द्रार्धकृतशेखरम् ।
अमृतं शाश्वतं स्थाणुं नीलकण्ठं पिनाकिनम् ॥
वृषभाक्षं महाज्ञेयं पुरुषं सर्वकामदम् ।
कामारिं कामदहनं कामरूपं कपर्दिनम् ॥
विरूपं गिरीशं भीमं सृविकणं रक्तवाससम् ।
योगिनं कालदहनं त्रिपुरघ्नं कपालिनम् ॥
गूढव्रतं गुप्तमंत्रं गम्भीरं भावगोचरम् ।
अणिमादिगुणाधारं त्रिलोकैश्वर्यदायकम् ॥
वीरं वीरहणं घोरं विरूपं मांसलं पटुम् ।
महामांसादमुन्मत्तं भैरवं वै महेश्वरम् ॥
त्रैलोक्यद्रावणं लुब्धं लुब्धकं यज्ञसूदनम्।
कृत्तिकानां सुतैर्युत्त मुन्मत्तं कृत्तिवाससम् ॥
गजकृत्तिपरीधानं क्षुब्धं भुजगभूषणम् ।
दत्तालम्बं च वेतालं घोरं शाकिनिपूजितम् ॥
अघोरं घोरदैत्यघ्नं घोरघोषं वनस्पतिम् ।
भस्माङ्गं जटिलं शुद्धं भेरुण्डशतसेवितम् ॥
भूतेश्वरं भूतनाथं पञ्चभूताश्रितं खगम् ।
क्रोधितं निष्ठरं चण्डं चण्डीशं चण्डिकाप्रियम् ॥
चण्डतुण्डं गरुत्मन्तं निस्त्रिंशं शवभोजनम् ।
लेलिहानं महारौद्रं मृत्युं मृत्योरगोचरम् ॥
मृत्योर्मृत्यं महासेनं श्मशानारण्यवासिनम् ।
रागं विरागं रागान्धं वीतरागं शतार्चिषम् ॥
सत्त्वं रजस्तमोधर्ममधर्मं वासवानुजम् ।
सत्यं त्वसत्यं सद्रूपमसद्रू पमहे तुकम् ॥
अर्धनारीश्वरं भानुं भानुकोटिशतप्रभम् ।
यज्ञं यज्ञपतिं रुद्रमीशानं वरदं शिवम् ॥
अष्टोत्तरशतं ह्येतन्मूर्तीनां परमात्मनः ।
शिवस्य दानवो ध्यायन् मुक्तस्तस्मान्महाभयात् ॥.
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
❤9🔥7👍1🙏1
जिस प्रकार भूमण्डल का आधार मेरु पर्वत वर्णित है उसी प्रकार इस मनुष्य शरीर का आधार मेरुदण्ड अथवा रीढ़ की हड्डी है। मेरुदण्ड तैंतीस अस्थि-खण्डों के जुड़ने से बना हुआ है (सम्भव है, इस तैंतीस की संख्या का सम्बन्ध तैंतीस कोटि देवताओं अथवा प्रजापति, इन्द्र, अष्ट यसु, द्वादश आदित्य और एकादश रुद्र से हो )। भीतर से यह खोखला है। इसका नीचे का भाग नुकीला और छोटा होता है। इस नुकीले स्थान के आसपास का भाग कन्द कहा जाता है और इसी कन्द में जगदाधार महाशक्ति की प्रतिमूर्ति कुण्डलिनी का निवास माना गया है।
इस शरीर में बहत्तर हजार नाड़ियों की स्थिति कही गयी है, इनमें से मुख्य नाड़ियाँ संख्या में चौदह हैं। इनमें से भी प्रधान नाड़ियाँ तीन हैं। इनके नाम इडा पिंगला तथा सुषुम्ना हैं। इडा नाड़ी मेरुदण्ड के बाहर बायीं ओर से और पिंगला दाहिनी ओर से लिपटी हुई हैं। सुषुम्ना नाड़ी मेरुदण्ड के भीतर कन्दभाग से प्रारम्भ होकर कपाल में स्थित सहस्रदलकमल तक जाती हैं जिस प्रकार कदलीस्तम्भ में एक के बाद दूसरी परत होती है उसी प्रकार इस सुषुम्ना नाड़ी के भीतर क्रमशः वज्रा, चित्रिणी तथा ब्रह्मनाड़ी हैं। योगक्रियाओं द्वारा जागृत कुण्डलिनी शक्ति इसी ब्रह्मनाड़ी के द्वारा कपाल में स्थित ब्रह्मरन्ध्र तक (जिस स्थान पर खोपड़ी की विभिन्न हड्डियाँ एक स्थान पर मिलती हैं और जिसके ऊपर शिखा रक्खी जाती है) जाकर पुनः लौट आती है। मेरुदण्ड के भीतर ब्रह्मनाड़ी में पिरोये हुए छः कमलों की कल्पना की जाती है। यही कमल षट्चक्र हैं। प्रत्येक कमल के भिन्न संख्या में दल हैं और प्रत्येक का रंग भी भिन्न है। ये छः चक्र शरीर के जिन अवयवों के सामने मेरुदण्ड के भीतर स्थित हैं उन्हीं अवयवों के नाम से पुकारे जाते हैं।.
@Sanatan
इस शरीर में बहत्तर हजार नाड़ियों की स्थिति कही गयी है, इनमें से मुख्य नाड़ियाँ संख्या में चौदह हैं। इनमें से भी प्रधान नाड़ियाँ तीन हैं। इनके नाम इडा पिंगला तथा सुषुम्ना हैं। इडा नाड़ी मेरुदण्ड के बाहर बायीं ओर से और पिंगला दाहिनी ओर से लिपटी हुई हैं। सुषुम्ना नाड़ी मेरुदण्ड के भीतर कन्दभाग से प्रारम्भ होकर कपाल में स्थित सहस्रदलकमल तक जाती हैं जिस प्रकार कदलीस्तम्भ में एक के बाद दूसरी परत होती है उसी प्रकार इस सुषुम्ना नाड़ी के भीतर क्रमशः वज्रा, चित्रिणी तथा ब्रह्मनाड़ी हैं। योगक्रियाओं द्वारा जागृत कुण्डलिनी शक्ति इसी ब्रह्मनाड़ी के द्वारा कपाल में स्थित ब्रह्मरन्ध्र तक (जिस स्थान पर खोपड़ी की विभिन्न हड्डियाँ एक स्थान पर मिलती हैं और जिसके ऊपर शिखा रक्खी जाती है) जाकर पुनः लौट आती है। मेरुदण्ड के भीतर ब्रह्मनाड़ी में पिरोये हुए छः कमलों की कल्पना की जाती है। यही कमल षट्चक्र हैं। प्रत्येक कमल के भिन्न संख्या में दल हैं और प्रत्येक का रंग भी भिन्न है। ये छः चक्र शरीर के जिन अवयवों के सामने मेरुदण्ड के भीतर स्थित हैं उन्हीं अवयवों के नाम से पुकारे जाते हैं।.
@Sanatan
🔥16👍5❤2
आइये आज कुण्डलिनी से सम्बंधित कुछ बेसिक बातों की चर्चा करते हैं ।
सबसे पहले कुण्डलिनी नाम पड़ा कुंड से कुंड मतलब गड्ढा । गड्ढा किस चीज का, उर्जा से भरा हुआ कुंड या गड्ढा । कुंडलिनी वलयाकार साढ़े तीन फेरे लगाते हुए मूलाधार चक्र में स्थित है । मूलाधार चक्र रीढ़ की अंतिम हड्डी के इर्द गिर्द स्थित है । मूलाधार से उपर स्वाधिष्ठान चक्र स्थित है जो जननेन्द्रिय के इर्द गिर्द स्थित है । ठीक इसके उपर मणिपुर चक्र स्थित है यह नाभि से दो अंगुल नीचे है । इसके ऊपर अनाहत चक्र है जो छाती के दोनों पसलियों के ठीक मध्य में स्थित है । इसके उपर ग्रीवा ( गर्दन ) में कंठ के पास विशुद्ध चक्र स्थित है । और इसके ऊपर दोनों भौंह् के बीच आज्ञा चक्र स्थित है । सहस्त्रार कोई चक्र नही है बल्कि यह कुण्डलिनी की पूर्ण जाग्रत अवस्था है जिस अवस्था में दिमाग का नस नस सक्रीय रहता है । इसलिए इसे हजार कमल वाला बताया जाता है । इसका अर्थ हुआ सहस्त्रार जाग्रति मतलब पूर्ण रूप से जागृत मष्तिष्क ।
कुछ यौगिक क्रियाएं करने पर कुण्डलिनी अपने स्थान मूलाधार से ऊपर उठती है और परस्पर प्रत्येक चक्रो को भेदती हुई सहस्त्रार तक पहुँचती है । यह जीवनी उर्जा है जो मूलाधार में कुंड में स्थित रहती है । यह उर्जा स्वाभाविक रूप में निचे क्षरण होते हुए सृजन का कार्य करती है । ध्यान के द्वारा चक्रो को सक्रीय किया जाता है जबकि चक्रो को पूर्ण जागृत यौगिक क्रियाओं के द्वारा किया जाता है जब कुण्डलिनी ऊपर उठती है ।
प्रत्येक चक्र के बीज मन्त्र नीचे लिखे हुए हैं ।
मूलाधार बीज मन्त्र - लं ( LAM )
स्वाधिष्ठान बीज मन्त्र - वं ( VAM )
मणिपुर चक्र बीज मन्त्र - रं ( RAM )
अनाहत चक्र बीज मन्त्र - यं ( YAM )
विशुद्ध चक्र बीज मन्त्र - हं ( HAM )
आज्ञा चक्र बीज मन्त्र - ॐ ( OM MMMM ....)
सहस्त्रार - यह चक्र नही बल्कि अवस्था है | ईश्वर लीन अवस्था |
मन्त्रों का मानसिक जाप करते हुए चक्र ध्यान कर सकते हैं | ( साधारण गृहस्थ या जिन्हें ज्यादा ध्यान अभ्यास न हो दस मिनट से ज्यादा बीज मन्त्रों का मानसिक जाप न करें ) प्रत्येक चक्र की अपनी खासियत है और यह अपने खासियत के हिसाब से सक्रीय होते हुए अलग अलग सकारात्मक गुण उत्पन्न करने लगते हैं |
अधिक उर्जावान या क्रोधी व्यक्ति मणिपुर चक्र का बीज मन्त्र अधिक न जपे.
साभार - मनीष शेखर
@Sanatan
सबसे पहले कुण्डलिनी नाम पड़ा कुंड से कुंड मतलब गड्ढा । गड्ढा किस चीज का, उर्जा से भरा हुआ कुंड या गड्ढा । कुंडलिनी वलयाकार साढ़े तीन फेरे लगाते हुए मूलाधार चक्र में स्थित है । मूलाधार चक्र रीढ़ की अंतिम हड्डी के इर्द गिर्द स्थित है । मूलाधार से उपर स्वाधिष्ठान चक्र स्थित है जो जननेन्द्रिय के इर्द गिर्द स्थित है । ठीक इसके उपर मणिपुर चक्र स्थित है यह नाभि से दो अंगुल नीचे है । इसके ऊपर अनाहत चक्र है जो छाती के दोनों पसलियों के ठीक मध्य में स्थित है । इसके उपर ग्रीवा ( गर्दन ) में कंठ के पास विशुद्ध चक्र स्थित है । और इसके ऊपर दोनों भौंह् के बीच आज्ञा चक्र स्थित है । सहस्त्रार कोई चक्र नही है बल्कि यह कुण्डलिनी की पूर्ण जाग्रत अवस्था है जिस अवस्था में दिमाग का नस नस सक्रीय रहता है । इसलिए इसे हजार कमल वाला बताया जाता है । इसका अर्थ हुआ सहस्त्रार जाग्रति मतलब पूर्ण रूप से जागृत मष्तिष्क ।
कुछ यौगिक क्रियाएं करने पर कुण्डलिनी अपने स्थान मूलाधार से ऊपर उठती है और परस्पर प्रत्येक चक्रो को भेदती हुई सहस्त्रार तक पहुँचती है । यह जीवनी उर्जा है जो मूलाधार में कुंड में स्थित रहती है । यह उर्जा स्वाभाविक रूप में निचे क्षरण होते हुए सृजन का कार्य करती है । ध्यान के द्वारा चक्रो को सक्रीय किया जाता है जबकि चक्रो को पूर्ण जागृत यौगिक क्रियाओं के द्वारा किया जाता है जब कुण्डलिनी ऊपर उठती है ।
प्रत्येक चक्र के बीज मन्त्र नीचे लिखे हुए हैं ।
मूलाधार बीज मन्त्र - लं ( LAM )
स्वाधिष्ठान बीज मन्त्र - वं ( VAM )
मणिपुर चक्र बीज मन्त्र - रं ( RAM )
अनाहत चक्र बीज मन्त्र - यं ( YAM )
विशुद्ध चक्र बीज मन्त्र - हं ( HAM )
आज्ञा चक्र बीज मन्त्र - ॐ ( OM MMMM ....)
सहस्त्रार - यह चक्र नही बल्कि अवस्था है | ईश्वर लीन अवस्था |
मन्त्रों का मानसिक जाप करते हुए चक्र ध्यान कर सकते हैं | ( साधारण गृहस्थ या जिन्हें ज्यादा ध्यान अभ्यास न हो दस मिनट से ज्यादा बीज मन्त्रों का मानसिक जाप न करें ) प्रत्येक चक्र की अपनी खासियत है और यह अपने खासियत के हिसाब से सक्रीय होते हुए अलग अलग सकारात्मक गुण उत्पन्न करने लगते हैं |
अधिक उर्जावान या क्रोधी व्यक्ति मणिपुर चक्र का बीज मन्त्र अधिक न जपे.
साभार - मनीष शेखर
@Sanatan
❤19👍6🤩5
मानव बुद्धि सदैव अपवित्र होती है। मानव बुद्धि से विवेचन करने की स्थिति में अपवित्रता की पूरी-पूरी सम्भावना होती है। मानवीय तल पर प्रेम एक घटिया प्रकरण बनकर रह गया है। महारास ब्रह्माण्ड नायक प्रभु श्री कृष्ण की लीला है। मनुष्य इसका विवेचन न करे तो अच्छा है। अर्जुन बनना इतना आसान नहीं है। अर्जुन बनने के लिए अनेकों साधनाऐं करनी पड़ेंगी। गोप और गोपियाँ बनने के लिए बस एक ही मूल मंत्र है जो कुछ होगा देखा जायेगा यही भाव जीवन में श्रेष्ठता प्रदान करता है। अच्छे कार्य, धर्म के कार्य एवं आध्यात्मिक उन्नति में बाधाऐं तो आती ही हैं। ईश्वर प्राप्ति गुड्डे-गुड़ियों का खेल नहीं है। व्यक्ति को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में यही भाव स्थापित करने होंगे कि जो कुछ होगा देखा जायेगा। कुरुक्षेत्र में खड़े होने के लिए पौरुष तो चाहिए ही। भागने वालों के लिए कुरुक्षेत्र नहीं बना है। चाहे रास लीला हो या फिर कुरुक्षेत्र दोनों ही जगह कृष्ण मौजूद हैं, पूर्ण परमेश्वर, पूर्णता प्रदान करने वाले । कृष्ण सिर्फ पूर्णता ही पूर्णता एवं श्रेष्ठता ही श्रेष्ठता का प्रतीक हैं। लिप्त व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता। प्रेम की ताकत ही जो कुछ होगा देखा जायेगा के भाव दे सकती है। इसी भाव को धारण किये हुए व्यक्ति प्रभु का सानिध्य पाते हैं, मीरा के पद को प्राप्त करते हैं, माऊंट एवरेस्ट पर अपने कदम जमाते हैं, ग्रंथों की रचना करते हैं, ईश्वर की प्राप्ति करते हैं और नये-नये अविष्कार करते हैं एवं प्रकृति के द्वारा उत्पन्न किए गये दृश्य में नायक के तौर पर उभरते हैं और इन सबसे भी ऊपर उठकर टपकते हुए रसीले व्यक्तित्व बनते हैं। रस ही सब कुछ है। प्रेम कला तो सीखनी होगी कृष्ण के द्वारा सनातन परम्परा को रस युक्त बनाने वाले परम परमेश्वर योगेश्वर प्रभु श्रीकृष्ण को मेरा शत-शत नमन।
@Sanatan
@Sanatan
❤15👍3🤩2🥰1
नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम् ।
छायामार्तण्डसम्भूतं शनिमावाहयाम्यहम् ॥
शनिजयंती 30/5/22
@Sanatan
छायामार्तण्डसम्भूतं शनिमावाहयाम्यहम् ॥
शनिजयंती 30/5/22
@Sanatan
❤14🤔1
परम् न्यायधीश
-------------------
महर्षि डग नर्मदा के किनारे तपस्या में लीन थे, उन्होंने नर्मदांचल में आश्रम बना रखा था। महर्षि डग जैसे ही ध्यानस्थ होते, एक भीलनी आकर श्रृद्धापूर्वक उनके आश्रम को साफ सुथरा कर देती, लीप पोत देती, पुनः व्यवस्थित कर देती और धीरे से चुपचाप चली जाती। कई वर्षों तक वह भीलनी बिना महर्षि से बताये स्वेच्छा भाव से छुप-छुप कर उनकी इस प्रकार सेवा करती रही। महर्षि प्रतिदिन अपने आश्रम को सुव्यवस्थित देख आश्चर्यचकित हो जाते आखिरकार एक दिन उन्होंने पता लगाने हेतु संकल्प लिया। वे छदम ध्यान मुद्रा में बैठ गये और जैसे ही भीलनी ने दबे पाँव आकर कार्य प्रारम्भ किया उन्होंने आँखें खोल दीं, वे भीलनी की सेवा और समर्पण को देख अति प्रसन्न हो उठे एवं गदगद वाणी में बोले हे प्रिये मैं तुम्हारी सेवा से अत्यधिक प्रसन्न हूँ तुम जो चाहे वह वरदान मांग लो। भीलनी बोली हे महर्षि आपने मेरे लिए प्रिये शब्द का सम्बोधन क्यों किया? यह शब्द तो पत्नी के लिए उपयोग किया जाता है अतः प्रथम सम्बोधन अनुसार आप मुझे पत्नी के रूप में स्वीकार कीजिए एवं मुझे पुत्र प्रदान कीजिए।
महर्षि के ऊपर शनि की महादशा प्रारम्भ हो गई थी, वे गलती कर बैठे बोले तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा। भीलनी बोली महर्षि यह आपने दूसरी गलती की, प्रथम में मुझे प्रिये कहकर सम्बोधित किया द्वितीय आपने मुझे पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया परन्तु आप तो ब्रह्मचारी हैं। महर्षि सोच में पड़ गये बोले नहीं मैं तप के माध्यम से तुम्हें पुत्रोत्पत्ति दूंगा। भीलनी ने कहा यह आपने तीसरी गलती की, आप तो धर्म के मार्ग पर चल दिए हैं परन्तु आपके तप से उत्पन्न मेरा पुत्र तो आखेट भी करेगा, मछली भी पकड़ेगा क्योंकि मेरी जाति में यह सब एक सामान्य कर्म हैं परन्तु होगा तो वह ऋषि पुत्र ही अतः एक ऋषि पुत्र को इस प्रकार के सामान्य कर्म शोभा नहीं देते। महर्षि सोच में पड़ गये यह कैसी प्रभु की लीला ? यह कैसे पूर्व जन्म के सम्बन्ध है ? है तो यह भीलनी परन्तु बातें ऋषि पत्नियों के समान करती है। महर्षि के सामने पूर्व जन्म कौंध उठा क्योंकि उन्होंने शनि देव का आह्वान किया था शनि देव ने न्यायधीश के समान उनके पूर्व जन्म की परतों को एक-एक करके खोल दिया। अपने पूर्ण जन्म की पत्नी को भीलनी के रूप में देख ऋषि व्याकुल हो उठे और बोले अब इस जीवन में जो कह दिया सो कह दिया अब आने वाले जन्मों में बंधन लेकर नहीं जाऊंगा, बंधन मुक्त होना चाहता हूँ। तुझे मेरे तप से पुत्र प्राप्त होगा, हां शनि की महादशा में ऋषि पुत्र प्राप्त होगा और वह ब्राह्मण ही कहलायेगा एवं उससे चलने वाला वंश एक विशेष प्रकार के ब्राह्मणों का वंश होगा जो कि एकमात्र इस धरा पर शनि का दान लेने के लिए उत्तराधिकारी होगें। अन्य ब्राह्मण शनि के निमित्त किया गया दान स्वीकार नहीं करते। केवल डग ऋषि से उत्पन्न डाकौत ब्राह्मणों की श्रृंखला ही शनि के निमित्त किया गया दान स्वीकार करती है।
काले कपड़े हों, काली अक्षत हो, लौह निर्मित वस्तुएं हों, तेल का पात्र हो, काली गाय हो, काला पशु हो, काले चने हो, धन हो इत्यादि यह सब केवल डाकौत ब्राह्मण ही स्वीकार करते हैं, उन्हीं में योग्यता है इस दान को ग्रहण करने की। शनि ही उनके कुल देवता हैं, शनि ही उनके इष्ट हैं, शनि ही उनके गुरु हैं। शरीर में शनि का स्थान नाभि से दो अंगुल नीचे है, नाभि से दो अंगुल नीचे शनि देव विराजमान रहते हैं। योग मार्ग में दो क्रियायें हैं वमन और विरेचन एवं यही शनि के दो प्रमुख लक्षण हैं। शनि अपने पुत्रों का भक्षण कर रहा था परन्तु रिया देवी ने एक पुत्र छिपा लिया जिसने विरेचन औषधि देकर शनि को वमन करने पर मजबूर कर दिया और इस प्रकार शनि द्वारा भक्षित समस्त पुत्र वमन के माध्यम से बाहर निकल आये। जब शरीर रोग ग्रस्त होता है तो योग क्रिया के माध्यम से साधक को वमन एवं विरेचन करने पर मजबूर किया जाता है जिससे कि मल के माध्यम से, उल्टी के माध्यम से विष का निष्कासन हो सके। सड़ान्ध, अनाधिकृत रूप से एकत्रित करके रखी गई ऊर्जा शरीर से मुक्त हो सके और जीव पुनः हल्का एवं स्वस्थ महसूस करे। शनि की मार ऐसी ही है, जब शनि की गदा बरसती है तो बस जातक की कराह ही सुनाई देती है। न गदा दिखाई देती है, न गदा मारने वाला दिखाई देता है। वमन और विरेचन न हो तो वृक्ष फल नहीं देते, समुद्र वर्षा नहीं देगा, भूमि अन्न नहीं देगी, पशु एवं जीव संतान उत्पत्ति नहीं करेगीं इन सबके मूल में वमन और विरेचन छिपा हुआ है। .
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
-------------------
महर्षि डग नर्मदा के किनारे तपस्या में लीन थे, उन्होंने नर्मदांचल में आश्रम बना रखा था। महर्षि डग जैसे ही ध्यानस्थ होते, एक भीलनी आकर श्रृद्धापूर्वक उनके आश्रम को साफ सुथरा कर देती, लीप पोत देती, पुनः व्यवस्थित कर देती और धीरे से चुपचाप चली जाती। कई वर्षों तक वह भीलनी बिना महर्षि से बताये स्वेच्छा भाव से छुप-छुप कर उनकी इस प्रकार सेवा करती रही। महर्षि प्रतिदिन अपने आश्रम को सुव्यवस्थित देख आश्चर्यचकित हो जाते आखिरकार एक दिन उन्होंने पता लगाने हेतु संकल्प लिया। वे छदम ध्यान मुद्रा में बैठ गये और जैसे ही भीलनी ने दबे पाँव आकर कार्य प्रारम्भ किया उन्होंने आँखें खोल दीं, वे भीलनी की सेवा और समर्पण को देख अति प्रसन्न हो उठे एवं गदगद वाणी में बोले हे प्रिये मैं तुम्हारी सेवा से अत्यधिक प्रसन्न हूँ तुम जो चाहे वह वरदान मांग लो। भीलनी बोली हे महर्षि आपने मेरे लिए प्रिये शब्द का सम्बोधन क्यों किया? यह शब्द तो पत्नी के लिए उपयोग किया जाता है अतः प्रथम सम्बोधन अनुसार आप मुझे पत्नी के रूप में स्वीकार कीजिए एवं मुझे पुत्र प्रदान कीजिए।
महर्षि के ऊपर शनि की महादशा प्रारम्भ हो गई थी, वे गलती कर बैठे बोले तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा। भीलनी बोली महर्षि यह आपने दूसरी गलती की, प्रथम में मुझे प्रिये कहकर सम्बोधित किया द्वितीय आपने मुझे पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया परन्तु आप तो ब्रह्मचारी हैं। महर्षि सोच में पड़ गये बोले नहीं मैं तप के माध्यम से तुम्हें पुत्रोत्पत्ति दूंगा। भीलनी ने कहा यह आपने तीसरी गलती की, आप तो धर्म के मार्ग पर चल दिए हैं परन्तु आपके तप से उत्पन्न मेरा पुत्र तो आखेट भी करेगा, मछली भी पकड़ेगा क्योंकि मेरी जाति में यह सब एक सामान्य कर्म हैं परन्तु होगा तो वह ऋषि पुत्र ही अतः एक ऋषि पुत्र को इस प्रकार के सामान्य कर्म शोभा नहीं देते। महर्षि सोच में पड़ गये यह कैसी प्रभु की लीला ? यह कैसे पूर्व जन्म के सम्बन्ध है ? है तो यह भीलनी परन्तु बातें ऋषि पत्नियों के समान करती है। महर्षि के सामने पूर्व जन्म कौंध उठा क्योंकि उन्होंने शनि देव का आह्वान किया था शनि देव ने न्यायधीश के समान उनके पूर्व जन्म की परतों को एक-एक करके खोल दिया। अपने पूर्ण जन्म की पत्नी को भीलनी के रूप में देख ऋषि व्याकुल हो उठे और बोले अब इस जीवन में जो कह दिया सो कह दिया अब आने वाले जन्मों में बंधन लेकर नहीं जाऊंगा, बंधन मुक्त होना चाहता हूँ। तुझे मेरे तप से पुत्र प्राप्त होगा, हां शनि की महादशा में ऋषि पुत्र प्राप्त होगा और वह ब्राह्मण ही कहलायेगा एवं उससे चलने वाला वंश एक विशेष प्रकार के ब्राह्मणों का वंश होगा जो कि एकमात्र इस धरा पर शनि का दान लेने के लिए उत्तराधिकारी होगें। अन्य ब्राह्मण शनि के निमित्त किया गया दान स्वीकार नहीं करते। केवल डग ऋषि से उत्पन्न डाकौत ब्राह्मणों की श्रृंखला ही शनि के निमित्त किया गया दान स्वीकार करती है।
काले कपड़े हों, काली अक्षत हो, लौह निर्मित वस्तुएं हों, तेल का पात्र हो, काली गाय हो, काला पशु हो, काले चने हो, धन हो इत्यादि यह सब केवल डाकौत ब्राह्मण ही स्वीकार करते हैं, उन्हीं में योग्यता है इस दान को ग्रहण करने की। शनि ही उनके कुल देवता हैं, शनि ही उनके इष्ट हैं, शनि ही उनके गुरु हैं। शरीर में शनि का स्थान नाभि से दो अंगुल नीचे है, नाभि से दो अंगुल नीचे शनि देव विराजमान रहते हैं। योग मार्ग में दो क्रियायें हैं वमन और विरेचन एवं यही शनि के दो प्रमुख लक्षण हैं। शनि अपने पुत्रों का भक्षण कर रहा था परन्तु रिया देवी ने एक पुत्र छिपा लिया जिसने विरेचन औषधि देकर शनि को वमन करने पर मजबूर कर दिया और इस प्रकार शनि द्वारा भक्षित समस्त पुत्र वमन के माध्यम से बाहर निकल आये। जब शरीर रोग ग्रस्त होता है तो योग क्रिया के माध्यम से साधक को वमन एवं विरेचन करने पर मजबूर किया जाता है जिससे कि मल के माध्यम से, उल्टी के माध्यम से विष का निष्कासन हो सके। सड़ान्ध, अनाधिकृत रूप से एकत्रित करके रखी गई ऊर्जा शरीर से मुक्त हो सके और जीव पुनः हल्का एवं स्वस्थ महसूस करे। शनि की मार ऐसी ही है, जब शनि की गदा बरसती है तो बस जातक की कराह ही सुनाई देती है। न गदा दिखाई देती है, न गदा मारने वाला दिखाई देता है। वमन और विरेचन न हो तो वृक्ष फल नहीं देते, समुद्र वर्षा नहीं देगा, भूमि अन्न नहीं देगी, पशु एवं जीव संतान उत्पत्ति नहीं करेगीं इन सबके मूल में वमन और विरेचन छिपा हुआ है। .
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
👍9❤6
परम् न्यायधीश (२)
-------------------
त्यागना तो पड़ेगा ही, जितनी जरूरत है उतना ले लो उससे ज्यादा मत लो नहीं तो गधे बन जाओगे, कब तक ढोओगे? यही शनि उवाच है। जितना ढो सकते हो उतना ढोओ उससे ज्यादा ढोने की कोशिश मत करो। जितना वजन लेकर बालक पैदा होता है उतना ही वजन मरने के बाद अस्थियों का होता है इससे एक रत्ती भी ज्यादा नहीं। शिव लोक में गणेश ने जन्म लिया महान कौतुक समस्त ब्रह्माण्ड में छा गया। शिव जैसा योगी पिता बन गये, काम को दग्ध करने वाला शिव आज पिता बन गये अतः चारों तरफ प्रसन्नता छा गई। ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, कुबेर, सरस्वती, बृहस्पति, सूर्य सबने जी भरकर दान दक्षिणा देना प्रारम्भ किया। अब दान दक्षिणा इतनी ज्यादा हो गई कि ब्राह्मणों से उठ ही नहीं रही थी, वे सबके सब दान की हुई वस्तुओं को उठाने में असमर्थ हो गये। एक-एक कर सभी देवगण आते और गणेश के मुख का दर्शन कर हर्षित हो उठते तभी शनि देव भी आ गये गणपति के दर्शनार्थ शनि देव नीचे दृष्टि किए हुए जगदम्बिका के सामने खड़े थे, जगदम्बा ने कहा हे शनि देव आप भी मेरे पुत्र का मुख क्यों नहीं देखते? शनि देव अपनी दृष्टि की विशेषता जानते थे अतः उन्होंने साफ-साफ कहा कि हे मातेश्वरी मेरी दृष्टि गणेश का अनिष्ट कर सकती है इसलिए मैं इनके मुख की तरफ नहीं देखूंगा परन्तु जगदम्बा बोली यह शिव लोक है यहाँ कर्म के सिद्धांत नहीं चलते। गणेश, शिव और शक्ति का पुत्र है तुम निर्भय होकर इसके दर्शन करो। शनि ने दुःखी मन से नेत्र के एक कोने से गणपति पर दृष्टि डाली और दूसरे ही क्षण गणपति का शीश ब्रह्माण्ड में उड़ गया एवं रक्त रंजित धड़ जगदम्बा की गोद में पड़ा रहा।
दूसरे ही क्षण जगदम्बा की समस्त कलायें जाग उठीं, एक साथ दस महाविद्याएं उठ खड़ी हुईं, प्रत्यंगिरा, नित्याएं, अघोरनी, चाण्डालिका, कर्कशिका, दारुणिका, विदारिका इत्यादि सबकी सब उग्र हो उठीं। काली ने सबका भक्षण शुरु कर दिया, छिन्नमस्ता ने शीर्षों को छिन्न छिन्न करना प्रारम्भ कर दिया, 64 योगिनियों ने रक्त की धारायें बहा दी, दक्षिण काली ने चारों तरफ ज्वर ही ज्वर फैला दिया, धूमावती ने समस्त ब्रह्माण्ड को धुए में ढँक दिया एवं शिवगणों का भी भक्षण करने लगीं। बगलामुखी ने सूर्य, पवन, अग्नि, इन्द्र, यम, जल, इत्यादि ब्रह्माण्ड के प्रत्येक लोक और तत्व को स्तम्भित करके रख दिया। अट्ठाहसिका अट्ठाहस करने लगीं, मातंगी ने स्वरों का भी लोप कर दिया, राज राजेश्वरी ने ब्रह्माण्ड उलटकर रख दिया, जगदम्बा के त्रिनेत्र से एक एक करके असंख्य महा विकराल रूप लिए करालिकाएं उत्पन्न होने लगीं। शिव की कुछ समझ में नहीं आया, ब्रह्मा किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गये उनकी सृष्टि तृण के समान नष्ट होने लगी बस समस्त ब्रह्माण्ड में हूंकार ही हूंकार थी।
श्रीहरि गरुड़ पर सवार हो सुदर्शन चक्र ले दौड़े और गज मुख लाकर गणेश के धड़ पर स्थापित कर दिया। श्री हरि आज अपनी बहिन जगदम्बा का रौद्र रूप देख समझ गये थे कि अब उनके कर्म के सिद्धांत के प्रवर्तक शनि की खैर नहीं है। कुपित जगदम्बा ने भस्माग्नि से सम्पूर्ण नेत्रों से शनि की तरफ देखा। क्रूर को महाक्रूर दृष्टि से देखा और श्राप देते हुए कहा जा अंगहीन हो जा और देखते ही देखते शनि की टांग टूट गई, वह लड़खड़ाकर चलने लगे, श्रीहरि के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये रक्षार्थ हेतु । श्रीहरि ने तुरंत अपने सुदर्शन चक्र में से एक अंश त्रैलोक्य मोहन गणेश कवच के रूप में उदित कर दिया और उसे शनि को धारण करा दिया। नीचे श्रीहरि द्वारा सुदर्शन चक्र में से प्रादुर्भावित दिव्य गणेश कवच का वर्णन है
त्रैलोक्य मोहन गणेश कवच
संसारमोहनस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः ।
ऋषिश्छन्दश्च बृहतो देवो लम्बोदरः स्वयम् ॥
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः ।
सर्वेषां कवचानां च सारभूतमिदं मुने।।
ॐ गं हुं श्रीगणेशाय स्वाहा मे पातु मस्तकम् ।
द्वात्रिंशदक्षरो मन्त्रो ललाटो मे सदाऽवतु ॥
ॐ ह्रीं क्लीं गमिति च संततं पातु लोचनम् ।
तालुकं पातु विघ्नेश: संततं धरणीतले ॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींमिति च संततं पातु नासिकाम् ।
ॐ गौं गं शूर्पकर्णाय स्वाहा पात्वधरं मम।।
दन्तानि तालुकां जिह्वां पातु मे षोडशाक्षरः ।
ॐ लं श्रीं लम्बोदरायेति स्वाहा गण्डं सदाऽवतु ।।
ॐ क्लीं ह्रीं विघ्ननाशाय स्वाहा कर्ण सदाऽवतु ।
ॐ श्रीं गं गजाननायेति स्वाहा स्कन्धं सदाऽवतु ।।
ॐ ह्रीं विनायकायेति स्वाहा पृष्ठं सदाऽवतु ।
ॐ क्लीं हीमिति कङ्कालं पातु वक्षःस्थलं च गम्।।
करौ पादौ सदा पातु सर्वाङ्गं विघ्ननिघ्नकृत् ॥
प्राच्यां लम्बोदरः पातु आग्नेय्यां विघ्जनायकः ।.
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
-------------------
त्यागना तो पड़ेगा ही, जितनी जरूरत है उतना ले लो उससे ज्यादा मत लो नहीं तो गधे बन जाओगे, कब तक ढोओगे? यही शनि उवाच है। जितना ढो सकते हो उतना ढोओ उससे ज्यादा ढोने की कोशिश मत करो। जितना वजन लेकर बालक पैदा होता है उतना ही वजन मरने के बाद अस्थियों का होता है इससे एक रत्ती भी ज्यादा नहीं। शिव लोक में गणेश ने जन्म लिया महान कौतुक समस्त ब्रह्माण्ड में छा गया। शिव जैसा योगी पिता बन गये, काम को दग्ध करने वाला शिव आज पिता बन गये अतः चारों तरफ प्रसन्नता छा गई। ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, कुबेर, सरस्वती, बृहस्पति, सूर्य सबने जी भरकर दान दक्षिणा देना प्रारम्भ किया। अब दान दक्षिणा इतनी ज्यादा हो गई कि ब्राह्मणों से उठ ही नहीं रही थी, वे सबके सब दान की हुई वस्तुओं को उठाने में असमर्थ हो गये। एक-एक कर सभी देवगण आते और गणेश के मुख का दर्शन कर हर्षित हो उठते तभी शनि देव भी आ गये गणपति के दर्शनार्थ शनि देव नीचे दृष्टि किए हुए जगदम्बिका के सामने खड़े थे, जगदम्बा ने कहा हे शनि देव आप भी मेरे पुत्र का मुख क्यों नहीं देखते? शनि देव अपनी दृष्टि की विशेषता जानते थे अतः उन्होंने साफ-साफ कहा कि हे मातेश्वरी मेरी दृष्टि गणेश का अनिष्ट कर सकती है इसलिए मैं इनके मुख की तरफ नहीं देखूंगा परन्तु जगदम्बा बोली यह शिव लोक है यहाँ कर्म के सिद्धांत नहीं चलते। गणेश, शिव और शक्ति का पुत्र है तुम निर्भय होकर इसके दर्शन करो। शनि ने दुःखी मन से नेत्र के एक कोने से गणपति पर दृष्टि डाली और दूसरे ही क्षण गणपति का शीश ब्रह्माण्ड में उड़ गया एवं रक्त रंजित धड़ जगदम्बा की गोद में पड़ा रहा।
दूसरे ही क्षण जगदम्बा की समस्त कलायें जाग उठीं, एक साथ दस महाविद्याएं उठ खड़ी हुईं, प्रत्यंगिरा, नित्याएं, अघोरनी, चाण्डालिका, कर्कशिका, दारुणिका, विदारिका इत्यादि सबकी सब उग्र हो उठीं। काली ने सबका भक्षण शुरु कर दिया, छिन्नमस्ता ने शीर्षों को छिन्न छिन्न करना प्रारम्भ कर दिया, 64 योगिनियों ने रक्त की धारायें बहा दी, दक्षिण काली ने चारों तरफ ज्वर ही ज्वर फैला दिया, धूमावती ने समस्त ब्रह्माण्ड को धुए में ढँक दिया एवं शिवगणों का भी भक्षण करने लगीं। बगलामुखी ने सूर्य, पवन, अग्नि, इन्द्र, यम, जल, इत्यादि ब्रह्माण्ड के प्रत्येक लोक और तत्व को स्तम्भित करके रख दिया। अट्ठाहसिका अट्ठाहस करने लगीं, मातंगी ने स्वरों का भी लोप कर दिया, राज राजेश्वरी ने ब्रह्माण्ड उलटकर रख दिया, जगदम्बा के त्रिनेत्र से एक एक करके असंख्य महा विकराल रूप लिए करालिकाएं उत्पन्न होने लगीं। शिव की कुछ समझ में नहीं आया, ब्रह्मा किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गये उनकी सृष्टि तृण के समान नष्ट होने लगी बस समस्त ब्रह्माण्ड में हूंकार ही हूंकार थी।
श्रीहरि गरुड़ पर सवार हो सुदर्शन चक्र ले दौड़े और गज मुख लाकर गणेश के धड़ पर स्थापित कर दिया। श्री हरि आज अपनी बहिन जगदम्बा का रौद्र रूप देख समझ गये थे कि अब उनके कर्म के सिद्धांत के प्रवर्तक शनि की खैर नहीं है। कुपित जगदम्बा ने भस्माग्नि से सम्पूर्ण नेत्रों से शनि की तरफ देखा। क्रूर को महाक्रूर दृष्टि से देखा और श्राप देते हुए कहा जा अंगहीन हो जा और देखते ही देखते शनि की टांग टूट गई, वह लड़खड़ाकर चलने लगे, श्रीहरि के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये रक्षार्थ हेतु । श्रीहरि ने तुरंत अपने सुदर्शन चक्र में से एक अंश त्रैलोक्य मोहन गणेश कवच के रूप में उदित कर दिया और उसे शनि को धारण करा दिया। नीचे श्रीहरि द्वारा सुदर्शन चक्र में से प्रादुर्भावित दिव्य गणेश कवच का वर्णन है
त्रैलोक्य मोहन गणेश कवच
संसारमोहनस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः ।
ऋषिश्छन्दश्च बृहतो देवो लम्बोदरः स्वयम् ॥
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः ।
सर्वेषां कवचानां च सारभूतमिदं मुने।।
ॐ गं हुं श्रीगणेशाय स्वाहा मे पातु मस्तकम् ।
द्वात्रिंशदक्षरो मन्त्रो ललाटो मे सदाऽवतु ॥
ॐ ह्रीं क्लीं गमिति च संततं पातु लोचनम् ।
तालुकं पातु विघ्नेश: संततं धरणीतले ॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लींमिति च संततं पातु नासिकाम् ।
ॐ गौं गं शूर्पकर्णाय स्वाहा पात्वधरं मम।।
दन्तानि तालुकां जिह्वां पातु मे षोडशाक्षरः ।
ॐ लं श्रीं लम्बोदरायेति स्वाहा गण्डं सदाऽवतु ।।
ॐ क्लीं ह्रीं विघ्ननाशाय स्वाहा कर्ण सदाऽवतु ।
ॐ श्रीं गं गजाननायेति स्वाहा स्कन्धं सदाऽवतु ।।
ॐ ह्रीं विनायकायेति स्वाहा पृष्ठं सदाऽवतु ।
ॐ क्लीं हीमिति कङ्कालं पातु वक्षःस्थलं च गम्।।
करौ पादौ सदा पातु सर्वाङ्गं विघ्ननिघ्नकृत् ॥
प्राच्यां लम्बोदरः पातु आग्नेय्यां विघ्जनायकः ।.
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
❤6👍3
परम् न्यायधीश (३)
-------------------
दक्षिणे पातु विघ्नेशो नैर्ऋत्यां तु गजाननः ॥
पश्चिमे पार्वतीपुत्रो वायव्यां शंकरात्मजः ।
कृष्णस्यांशश्चोत्तरे च परिपूर्णतमस्य च ॥
ऐशान्यामेकदन्तश्च हेरम्ब: पातु चोर्ध्वतः ।
अघो गणाधिपः पातु सर्वपूज्यश्च सर्वतः ॥
स्वप्ने जागरणे चैव पातु मां योगिनां गुरुः ॥
इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम् ।
संसारमोहनं नाम कवचं परमाद्भुतम् ॥
श्रीकृष्णेन पुरा दत्तं गोलोके रासमण्डले ।
वृन्दावने विनीताय मह्यं दिनकरात्मज ॥
मया दत्तं च तुभ्यं च यस्मै कस्मै न दास्यसि ।
परं वरं सर्वपूज्यं सर्वसंकटतारणम् ॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं धारयेत्तु यः ।
कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ सोऽपि विष्णुर्न संशयः ॥ अश्वमेघसहस्त्राणि वाजपेयशतानि च ।
ग्रहेन्द्र कवचस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥
इदं कवचमशात्वा यो भजेच्छंकरात्मजम् ।
शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः ॥
शनि देव ने तुरंत गणेश कवच का पाठ प्रारम्भ कर दिया और इस प्रकार महाकूरा रूप धारण की हुई जगदम्बा की दृष्टि शनि के प्रति सौम्य हो गई।
आप शनि के आस-पास आज भी वलय देखते हैं, वे चारों तरफ से सुदर्शन चक्र नुमा वलय से आच्छादित हैं। क्रूर दृष्टि सम्पन्न शनि पर अनेकों बार महायोगियों, महाशक्तियों, महाविद्याओं, महादेवों, महर्षियों के साथ-साथ सभी जीवों की भी वक्र दृष्टि होती है। शनि को तो सूर्य भी वक्र दृष्टि से देखते हैं ऐसे में बेचारा शनि अकेला पड़ जाता है। किस किस की वक्र दृष्टि, किस-किस की क्रूर दृष्टि को वह झेले। भला किसमें ताकत है कि वह जगदम्बा की क्रूर दृष्टि झेले ? उनके आगे तो शिव भी नतमस्तक हैं। ब्रह्माण्ड एक से एक विलक्षण शक्तियों से भरा पड़ा है जो किसी को कुछ नहीं समझतीं तब से लेकर आज तक नीची आँख किए, ध्यान भाव में बैठे, एकाकी जीवन जीने वाले योगियो, साधु-संन्यासियों को सभी महाविद्याएं शंका की दृष्टि से, वक्र दृष्टि से, क्रूर दृष्टि से सर्वप्रथम देखती हैं कि कहीं पुनः शनि तो नहीं आ रहा है।
आदि गुरु शंकराचार्य जी जब दक्षिण में जगदम्बा के मंदिर में प्रविष्ट होने वाले थे तो उन्होंने सर्वप्रथम इसी गणेश कवच को धारण किया था। प्रत्येक समझदार संन्यासी को मातृ विग्रह के सामने जाने से पूर्व इस गणेश कवच को अवश्य धारण करना चाहिए अन्यथा उसे जगदम्बा की वक्र दृष्टि झेलनी पड़ेगी। जो कवच शनि की भी रक्षा करे वह कवच तो शनि की महादशा से ग्रसित जातक के लिए साक्षात् संजीवनी है। जैसे ही गणपति का शिरोच्छेदन हुआ नीलकमल के समान सदृश्य मां जगदम्बा की आँखों से अश्रु बूंदे पुत्र वियोग में छलक पड़ी और यही अश्रु बूंदे कालान्तर नीलमणि अर्थात नीलम के रूप में स्थापित हुईं। नीलम अर्थात माँ जगदम्बा की आँखों से गणेश वियोग में स्खलित हुई साक्षात् अश्रु बूंदें। जब जातक शनि की महादशा के अंतर्गत आता है तो वह जगदम्बा के सामने गणेश जी का ध्यान करके शनि की अंगुली में अर्थात मध्यमा में नील मणि धारण करता है और इस प्रकार जगदम्बा के समस्त रूप जातक की शनि की कुदृष्टि से रक्षा करते हैं। शनि भी नीलमणि को देख पूर्व काल में घटित जगदम्बा के परम प्रचण्ड स्वरूप को याद कर जातक को राहत प्रदान करते है। राष्ट्रपति चाहे तो क्षण भर में, राष्ट्राध्यक्ष चाहे तो क्षण भर में मृत्युदण्ड प्राप्त, आजीवन कारावास प्राप्त अभियुक्त को क्षमा कर सकता है, उसे क्षमादान करने की विशेष शक्ति प्राप्त है। न्याय ही सब कुछ नहीं है, न्याय से ऊपर क्षमा है। कभी-कभी न्याय भी गलत होता है, दोषी निर्दोष साबित हो जाते हैं एवं निर्दोषी दोषी साबित हो जाते हैं। क्षमा जीव का जन्म सिद्ध अधिकार है, क्षमा याचना पर ही अध्यात्म चलता है।
प्रायश्चित, दण्ड व्यवस्था से ऊपर का स्तर है। दण्ड व्यवस्था ने आज तक परिवर्तन नहीं किया अगर ऐसा होता तो हत्यायें रुक गईं होती, व्याभिचार रुक गये होते, चोरी रुक गईं होती पर ऐसा कभी नहीं हुआ क्रूर से क्रूर दण्ड प्रदान से करने वाले देशों में भी अपराध होते हैं शनि की महादशा भोगने के बाद भी जातक पुनः अपराध करते हैं। दण्ड व्यवस्था, न्यायधीश व्यवस्था एक तरह से भैरव तंत्र के अंतर्गत आती है। भय का उत्पादन, भयभीत करना प्रताड़ित करना ही शनि का कार्य है एवं इस प्रणाली से मात्र कुछ हद तक अंकुश लगता है पर यह पूर्ण उपचार नहीं है। पूर्ण उपचार तो शिवोऽहम भाव में है, वास्तविक अध्यात्म में है और कहीं नहीं। परिवर्तन सिर्फ शिव और शक्ति का विषय है।फर्जी नकली दुर्गा, फर्जी नकली काली, फर्जी नकली गणेश, फर्जी नकली विष्णु, फर्जी नकली देवता, फर्जी नकली हनुमान इत्यादि । .
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
-------------------
दक्षिणे पातु विघ्नेशो नैर्ऋत्यां तु गजाननः ॥
पश्चिमे पार्वतीपुत्रो वायव्यां शंकरात्मजः ।
कृष्णस्यांशश्चोत्तरे च परिपूर्णतमस्य च ॥
ऐशान्यामेकदन्तश्च हेरम्ब: पातु चोर्ध्वतः ।
अघो गणाधिपः पातु सर्वपूज्यश्च सर्वतः ॥
स्वप्ने जागरणे चैव पातु मां योगिनां गुरुः ॥
इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम् ।
संसारमोहनं नाम कवचं परमाद्भुतम् ॥
श्रीकृष्णेन पुरा दत्तं गोलोके रासमण्डले ।
वृन्दावने विनीताय मह्यं दिनकरात्मज ॥
मया दत्तं च तुभ्यं च यस्मै कस्मै न दास्यसि ।
परं वरं सर्वपूज्यं सर्वसंकटतारणम् ॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं धारयेत्तु यः ।
कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ सोऽपि विष्णुर्न संशयः ॥ अश्वमेघसहस्त्राणि वाजपेयशतानि च ।
ग्रहेन्द्र कवचस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥
इदं कवचमशात्वा यो भजेच्छंकरात्मजम् ।
शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः ॥
शनि देव ने तुरंत गणेश कवच का पाठ प्रारम्भ कर दिया और इस प्रकार महाकूरा रूप धारण की हुई जगदम्बा की दृष्टि शनि के प्रति सौम्य हो गई।
आप शनि के आस-पास आज भी वलय देखते हैं, वे चारों तरफ से सुदर्शन चक्र नुमा वलय से आच्छादित हैं। क्रूर दृष्टि सम्पन्न शनि पर अनेकों बार महायोगियों, महाशक्तियों, महाविद्याओं, महादेवों, महर्षियों के साथ-साथ सभी जीवों की भी वक्र दृष्टि होती है। शनि को तो सूर्य भी वक्र दृष्टि से देखते हैं ऐसे में बेचारा शनि अकेला पड़ जाता है। किस किस की वक्र दृष्टि, किस-किस की क्रूर दृष्टि को वह झेले। भला किसमें ताकत है कि वह जगदम्बा की क्रूर दृष्टि झेले ? उनके आगे तो शिव भी नतमस्तक हैं। ब्रह्माण्ड एक से एक विलक्षण शक्तियों से भरा पड़ा है जो किसी को कुछ नहीं समझतीं तब से लेकर आज तक नीची आँख किए, ध्यान भाव में बैठे, एकाकी जीवन जीने वाले योगियो, साधु-संन्यासियों को सभी महाविद्याएं शंका की दृष्टि से, वक्र दृष्टि से, क्रूर दृष्टि से सर्वप्रथम देखती हैं कि कहीं पुनः शनि तो नहीं आ रहा है।
आदि गुरु शंकराचार्य जी जब दक्षिण में जगदम्बा के मंदिर में प्रविष्ट होने वाले थे तो उन्होंने सर्वप्रथम इसी गणेश कवच को धारण किया था। प्रत्येक समझदार संन्यासी को मातृ विग्रह के सामने जाने से पूर्व इस गणेश कवच को अवश्य धारण करना चाहिए अन्यथा उसे जगदम्बा की वक्र दृष्टि झेलनी पड़ेगी। जो कवच शनि की भी रक्षा करे वह कवच तो शनि की महादशा से ग्रसित जातक के लिए साक्षात् संजीवनी है। जैसे ही गणपति का शिरोच्छेदन हुआ नीलकमल के समान सदृश्य मां जगदम्बा की आँखों से अश्रु बूंदे पुत्र वियोग में छलक पड़ी और यही अश्रु बूंदे कालान्तर नीलमणि अर्थात नीलम के रूप में स्थापित हुईं। नीलम अर्थात माँ जगदम्बा की आँखों से गणेश वियोग में स्खलित हुई साक्षात् अश्रु बूंदें। जब जातक शनि की महादशा के अंतर्गत आता है तो वह जगदम्बा के सामने गणेश जी का ध्यान करके शनि की अंगुली में अर्थात मध्यमा में नील मणि धारण करता है और इस प्रकार जगदम्बा के समस्त रूप जातक की शनि की कुदृष्टि से रक्षा करते हैं। शनि भी नीलमणि को देख पूर्व काल में घटित जगदम्बा के परम प्रचण्ड स्वरूप को याद कर जातक को राहत प्रदान करते है। राष्ट्रपति चाहे तो क्षण भर में, राष्ट्राध्यक्ष चाहे तो क्षण भर में मृत्युदण्ड प्राप्त, आजीवन कारावास प्राप्त अभियुक्त को क्षमा कर सकता है, उसे क्षमादान करने की विशेष शक्ति प्राप्त है। न्याय ही सब कुछ नहीं है, न्याय से ऊपर क्षमा है। कभी-कभी न्याय भी गलत होता है, दोषी निर्दोष साबित हो जाते हैं एवं निर्दोषी दोषी साबित हो जाते हैं। क्षमा जीव का जन्म सिद्ध अधिकार है, क्षमा याचना पर ही अध्यात्म चलता है।
प्रायश्चित, दण्ड व्यवस्था से ऊपर का स्तर है। दण्ड व्यवस्था ने आज तक परिवर्तन नहीं किया अगर ऐसा होता तो हत्यायें रुक गईं होती, व्याभिचार रुक गये होते, चोरी रुक गईं होती पर ऐसा कभी नहीं हुआ क्रूर से क्रूर दण्ड प्रदान से करने वाले देशों में भी अपराध होते हैं शनि की महादशा भोगने के बाद भी जातक पुनः अपराध करते हैं। दण्ड व्यवस्था, न्यायधीश व्यवस्था एक तरह से भैरव तंत्र के अंतर्गत आती है। भय का उत्पादन, भयभीत करना प्रताड़ित करना ही शनि का कार्य है एवं इस प्रणाली से मात्र कुछ हद तक अंकुश लगता है पर यह पूर्ण उपचार नहीं है। पूर्ण उपचार तो शिवोऽहम भाव में है, वास्तविक अध्यात्म में है और कहीं नहीं। परिवर्तन सिर्फ शिव और शक्ति का विषय है।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
👍9❤6👏1