कालिका रहस्यम् (३)
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वे परा हैं, बुद्धि से और ज्ञान से परे वे उस उन्मुक्त व्यवस्था का प्रतीक है जो कि एक बार अगर क्रियाशील हो जाये तो फिर कार्य सिद्धि के पश्चात् भी शांत होने के लिये शिव को ही चरणों में लेटना पड़ता है। असुर अगर मायावी शक्ति पर घमण्ड करते हैं तो फिर महाकाली अपने अनावृत्त स्वरूप के द्वारा यह दिखला देती हैं कि असत्य का महाभ्रम अनावृत्त शाश्वत् सत्य के सामने क्षण भर भी नहीं टिक सकता है। उनके गले में असुर मुण्डों की माला एवं कटि पर बंधी हाथों की माला यही दर्शाती है कि अनावृत्त सत्य द्वारा असत्य रूपी मायाजाल को खण्ड-खण्ड किस प्रकार से किया जाता है।
गीता के समस्त उपदेश भगवान कृष्ण द्वारा की गई महाकाली साधना का ही प्रतीक हैं। अर्जुन की बुद्धि और भावनाओं में बैठी कायरता ने उसे युद्ध के मैदान में अवसाद से ग्रसित कर दिया था एक क्षत्रिय जिसका कर्म ही युद्ध करना हो वही अगर युद्ध के मैदान में कुण्ठित हो जाये तो फिर उसकी गति निश्चित ही अधोगामी होगी यही बात समझाने के लिये कृष्ण ने उसकी समस्त जिज्ञासाओं और आशंकाओं को महाकाली रूपी शक्ति से सदा के लिये शांत किया तब कहीं जाकर वह समग्रता के साथ युद्ध में रत हुआ। कृष्ण के समस्त गीता उपदेशों का सार ही मनुष्यों को मोह, लोभ, माया, विषाद, तर्क, ज्ञान और बुद्धि से मुक्त करा परम गति को प्राप्त कराना है। वे काल पुरुष हैं, काल के अनुसार ही काली साधना करा मनुष्यों के कर्मों को सम्पन्न करवाते हैं और जिस प्रकार महाकाली ने असुरों का विनाश कर सृष्टि को पुनस्थापित किया उसी प्रकार उनके उपदेश भी मनुष्यों को धर्म की संस्थापना के लिए पुन: प्रेरित करते हैं। जब साधक गुरु स्वरूप में प्रतिष्ठित होता है तब वह भी महाकाली की परम शक्ति से अनुयायियों के वंश वृक्ष में बैठे पाप को, दोषों को, दरिद्रता को नष्ट करते हुये उन्हें अवरोध विहीन माध्यम बनाकर उनमें देवी शक्तियों की स्थापना करता है।
महाकाली के सभी शस्त्र तेज व धारयुक्त हैं। धार ही शस्त्र हैं अन्यथा तो फिर वह धातु विशेष या फिर तत्व विशेष का कुंद टुकड़ा है। जीवन में दिव्य फल तत्व प्राप्ति महाकाली के बिना सम्भव ही नहीं हैं। बुद्धि के द्वारा सम्पादित किये गये कर्म अधिकांशतः क्षयकारी फल ही प्रदान करते हैं परन्तु निष्काम भाव से सम्पादित किये गये कर्म इतना फल प्रदान करते हैं कि जिसकी आपने कल्पना ही नहीं की है। महाकाली की शक्ति बुद्धि के द्वारा नहीं नापी जा सकती । न ही उनकी उपासना बुद्धि के द्वारा सम्भव है। वे ही अक्षय फलों को प्रदान करने वाली हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस महाकाली के अनन्य उपासक हुये हैं। उनका प्रत्येक दिन काली उपासना एवं उनके मूर्ति स्वरूप के श्रृंगार और देखभाल में ही बीत जाता था। उनके पास इतना समय भी नहीं था कि वे ग्रंथ लिख सकें, प्रवचन दे सकें या फिर अन्य किसी सामाजिक कार्य को सम्पन्न कर सकें। वे तो बस काली आराधना में ही लीन रहते थे। उनके परमहंसी स्वरूप से यह समस्त जग जो कि पंचेन्द्रिय व्यवस्थाओं में डूबा रहता है अपरिचित ही रह जाता अगर विवेकानंद जैसा धारदार व्यक्तित्व उन्हें नहीं मिलता। यही महाकाली का अक्षय फल है जिसने कि समस्त विश्व में परमहंस को विवेकानंद के द्वारा स्थापित करा दिया। बुद्धि से आप देखेगे तो विवेकानंद और रामकृष्ण ही नजर आयेंगे परन्तु हृदय से देखेंगे तो महाकाली ही नजर आयेंगी। कहीं भी अभेदात्मक स्थिति निर्मित नहीं होगी।
जितने भी अवतारी महापुरुष, ऋषि-मुनि हुये हैं उनके मूल में महाकाली साधना ही विराजमान हैं। उसी की शक्ति ने इन्हें अर्ध्वगामी बनाया, समस्त अवरोधों को जिन्हें कि हटानें में अनेको जन्म लग जाते हैं मात्र कुछ ही वर्षों में समाप्त कर ईष्ट से साक्षात्कार करवाया। मृत्यु तो आपको प्रदान करनी ही पड़ेगी और वह भी निर्ममता के साथ अपनी कमजोरियों को, अपने दोषों को, अपनी नकारात्मक सोच को तभी आप ऊर्ध्वगामी हो सकेंगे, तभी आप व्यर्थ के बोझों को उतारकर फेंक सकेंगे और वह मृत्यु प्रदान करेगी महाकाली साधना । वे श्मशान वासिनी हैं श्मशान अर्थात वह दिव्य स्थान जहाँ शाश्वत् सत्य मात्र का ही वाश है। माया, मनुष्यों द्वारा निर्मित बेतुके नियम, व्यर्थ की उपाधियाँ, तथाकथित ज्ञान सब कुछ शून्य है।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
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वे परा हैं, बुद्धि से और ज्ञान से परे वे उस उन्मुक्त व्यवस्था का प्रतीक है जो कि एक बार अगर क्रियाशील हो जाये तो फिर कार्य सिद्धि के पश्चात् भी शांत होने के लिये शिव को ही चरणों में लेटना पड़ता है। असुर अगर मायावी शक्ति पर घमण्ड करते हैं तो फिर महाकाली अपने अनावृत्त स्वरूप के द्वारा यह दिखला देती हैं कि असत्य का महाभ्रम अनावृत्त शाश्वत् सत्य के सामने क्षण भर भी नहीं टिक सकता है। उनके गले में असुर मुण्डों की माला एवं कटि पर बंधी हाथों की माला यही दर्शाती है कि अनावृत्त सत्य द्वारा असत्य रूपी मायाजाल को खण्ड-खण्ड किस प्रकार से किया जाता है।
गीता के समस्त उपदेश भगवान कृष्ण द्वारा की गई महाकाली साधना का ही प्रतीक हैं। अर्जुन की बुद्धि और भावनाओं में बैठी कायरता ने उसे युद्ध के मैदान में अवसाद से ग्रसित कर दिया था एक क्षत्रिय जिसका कर्म ही युद्ध करना हो वही अगर युद्ध के मैदान में कुण्ठित हो जाये तो फिर उसकी गति निश्चित ही अधोगामी होगी यही बात समझाने के लिये कृष्ण ने उसकी समस्त जिज्ञासाओं और आशंकाओं को महाकाली रूपी शक्ति से सदा के लिये शांत किया तब कहीं जाकर वह समग्रता के साथ युद्ध में रत हुआ। कृष्ण के समस्त गीता उपदेशों का सार ही मनुष्यों को मोह, लोभ, माया, विषाद, तर्क, ज्ञान और बुद्धि से मुक्त करा परम गति को प्राप्त कराना है। वे काल पुरुष हैं, काल के अनुसार ही काली साधना करा मनुष्यों के कर्मों को सम्पन्न करवाते हैं और जिस प्रकार महाकाली ने असुरों का विनाश कर सृष्टि को पुनस्थापित किया उसी प्रकार उनके उपदेश भी मनुष्यों को धर्म की संस्थापना के लिए पुन: प्रेरित करते हैं। जब साधक गुरु स्वरूप में प्रतिष्ठित होता है तब वह भी महाकाली की परम शक्ति से अनुयायियों के वंश वृक्ष में बैठे पाप को, दोषों को, दरिद्रता को नष्ट करते हुये उन्हें अवरोध विहीन माध्यम बनाकर उनमें देवी शक्तियों की स्थापना करता है।
महाकाली के सभी शस्त्र तेज व धारयुक्त हैं। धार ही शस्त्र हैं अन्यथा तो फिर वह धातु विशेष या फिर तत्व विशेष का कुंद टुकड़ा है। जीवन में दिव्य फल तत्व प्राप्ति महाकाली के बिना सम्भव ही नहीं हैं। बुद्धि के द्वारा सम्पादित किये गये कर्म अधिकांशतः क्षयकारी फल ही प्रदान करते हैं परन्तु निष्काम भाव से सम्पादित किये गये कर्म इतना फल प्रदान करते हैं कि जिसकी आपने कल्पना ही नहीं की है। महाकाली की शक्ति बुद्धि के द्वारा नहीं नापी जा सकती । न ही उनकी उपासना बुद्धि के द्वारा सम्भव है। वे ही अक्षय फलों को प्रदान करने वाली हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस महाकाली के अनन्य उपासक हुये हैं। उनका प्रत्येक दिन काली उपासना एवं उनके मूर्ति स्वरूप के श्रृंगार और देखभाल में ही बीत जाता था। उनके पास इतना समय भी नहीं था कि वे ग्रंथ लिख सकें, प्रवचन दे सकें या फिर अन्य किसी सामाजिक कार्य को सम्पन्न कर सकें। वे तो बस काली आराधना में ही लीन रहते थे। उनके परमहंसी स्वरूप से यह समस्त जग जो कि पंचेन्द्रिय व्यवस्थाओं में डूबा रहता है अपरिचित ही रह जाता अगर विवेकानंद जैसा धारदार व्यक्तित्व उन्हें नहीं मिलता। यही महाकाली का अक्षय फल है जिसने कि समस्त विश्व में परमहंस को विवेकानंद के द्वारा स्थापित करा दिया। बुद्धि से आप देखेगे तो विवेकानंद और रामकृष्ण ही नजर आयेंगे परन्तु हृदय से देखेंगे तो महाकाली ही नजर आयेंगी। कहीं भी अभेदात्मक स्थिति निर्मित नहीं होगी।
जितने भी अवतारी महापुरुष, ऋषि-मुनि हुये हैं उनके मूल में महाकाली साधना ही विराजमान हैं। उसी की शक्ति ने इन्हें अर्ध्वगामी बनाया, समस्त अवरोधों को जिन्हें कि हटानें में अनेको जन्म लग जाते हैं मात्र कुछ ही वर्षों में समाप्त कर ईष्ट से साक्षात्कार करवाया। मृत्यु तो आपको प्रदान करनी ही पड़ेगी और वह भी निर्ममता के साथ अपनी कमजोरियों को, अपने दोषों को, अपनी नकारात्मक सोच को तभी आप ऊर्ध्वगामी हो सकेंगे, तभी आप व्यर्थ के बोझों को उतारकर फेंक सकेंगे और वह मृत्यु प्रदान करेगी महाकाली साधना । वे श्मशान वासिनी हैं श्मशान अर्थात वह दिव्य स्थान जहाँ शाश्वत् सत्य मात्र का ही वाश है। माया, मनुष्यों द्वारा निर्मित बेतुके नियम, व्यर्थ की उपाधियाँ, तथाकथित ज्ञान सब कुछ शून्य है।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
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कालिका रहस्यम् (४)
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कुछ भी अहंकार करने योग्य नहीं है। अहंकार और बोझ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जिन पर आप अहंकार करते हैं वे ही बोझवत आपको आसुरी गति प्रदान करते हैं। अहंकार असुरों का श्रृंगार है वे इसी से सुशोभित होते हैं। इसी अहंकार से मुक्त होने के लिये असुर स्वयं भी लालायित रहते हैं। सच्चाई तो यह है कि आंतरिक दृष्टि से आसुरी शक्तियाँ इतनी कमजोर होती हैं कि वे जानते हुये भी बोझों से मुक्त नहीं हो पाती और अंत में थक हारकर वे नाना प्रकार के प्रयत्नों से महाकाली के चरणों तक पहुँच उन्हीं के द्वारा मुक्ति प्राप्त करती हैं। अनंतकाल से ऐसा ही होता चला आ रहा है और ऐसा ही होता रहेगा। आसुरी शक्तियों का अंतिम लक्ष्य महाकाली के द्वारा मुक्ति पाना ही है। समस्त चिकित्सा जगत का एकमात्र लक्ष्य महाकाली रूपी शक्ति को समग्रता से प्राप्त करना है। औषधियाँ काली का ही अंश हैं वे उन्हीं की पराशक्ति से शक्तिकृत होती हैं तभी वे शरीर रूपी व्यवस्था में प्रवेश कर रोग रूपी आसुरी शक्तियों का विनाश करने में सक्षम हो पाती हैं। रोगों का क्या है ? वे रक्त में भी पहुँच जाते हैं, मस्तिष्क की एक-एक कोशिका तक पहुँच नियंत्रण स्थापित कर लेते हैं। सारे मानस को प्रदूषित कर देते हैं परन्तु इन सबसे भी विकट स्थिति होती है आध्यात्मिक रोगों की। अनेकों तथाकथित अध्यात्मिक साधु-संत, मठाधीश इन्हीं रोगों से ग्रसित हो सिद्धियाँ खो बैठते हैं, भ्रष्ट हो जाते हैं, भोग एवं लोलुपता उनमें इतनी बढ़ जाती है कि वे साधारण गृहस्थ से भी ज्यादा कामान्ध हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि काली साधना उनके बस की बात नहीं रह जाती है। काली साधना प्रतिक्षण की क्रिया है। प्रतिक्षण त्याग की क्रिया । प्रतिक्षण मृत्यु प्रदान करने की क्रिया, प्रतिक्षण मोह से मुक्त होने की क्रिया, समस्त प्रकार के मोह से मुक्त होने की क्रिया ।
यही क्रियाऐं साधक को विशुद्धतम प्रेममयी व्यक्तित्व में परिवर्तित करती हैं। विशुद्धतम प्रेममयी व्यक्तित्व का तात्पर्य उस प्रकृति पुरुष से है जो कि योनि बंधनों, तत्व बंधनों, ज्ञान बंधनों एवं समस्त गृह बंधनों से मुक्त हो। उसे प्रेम करने के लिए मुख से बोलने या गाने की जरूरत नहीं होती है उसका प्रेम पंचेन्द्रियों द्वारा प्रकट होने की परिधि में नहीं आता है। ठीक उसी प्रकार जिस -प्रकार महाकाली स्वरूप में माँ पार्वती अपना समस्त सौन्दर्य, श्रृंगार, आभूषण और सम्मोहन त्याग कर अपने भक्तों के लिए वह रूप भी धारण कर लेती हैं जिसे देखकर असुर भी कांप उठते हैं। ब्रह्माण्डीय प्रेम रूप, रंग, श्रृंगार इत्यादि जैसी क्षण भंगुर स्थितियों का दास नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण ने विशुद्धतम प्रेम किया। उनके विशुद्धतम् प्रेम का प्रतीक थी राधा। उम्र में उनसे बड़ी, रंग रूप में भी अत्यंत साधारण, पारिवारिक दृष्टि से भी सामान्य परन्तु प्रेम की दृष्टि से दिव्यतम, सब कुछ कृष्ण पर न्यौछावर कर देनी वाली। कृष्ण की राह देखते-देखते अंतिम श्वास ली । कृष्ण उनसे कभी दूर थे ही नहीं। शरीर दूर हो सकता है परन्तु प्रेम मे दूरी जैसे शब्दों का कोई मूल्य नहीं । शरीर भोग का प्रतीक है परन्तु प्रेम भोग का प्रतीक नहीं है। राधा और कृष्ण एक ही आवृत्ति हैं दिव्यतम प्रेम आवृत्ति । जिस प्रकार शिव शक्ति । शरीर तो आते जाते रहते हैं। शरीर कालजयी नहीं है। आप महाकाली की गीता के रूप में उपासना करें, रोगों के नाश के लिए औषधि स्वरूप में अनुसंधान करें, साधक के रूप में इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करें, मोक्ष के लिए कर्म श्रृंखलाओं से मुक्ति का प्रयास करें, ले देकर करनी आपको महाकाली साधना ही पड़ेगी।
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
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कुछ भी अहंकार करने योग्य नहीं है। अहंकार और बोझ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जिन पर आप अहंकार करते हैं वे ही बोझवत आपको आसुरी गति प्रदान करते हैं। अहंकार असुरों का श्रृंगार है वे इसी से सुशोभित होते हैं। इसी अहंकार से मुक्त होने के लिये असुर स्वयं भी लालायित रहते हैं। सच्चाई तो यह है कि आंतरिक दृष्टि से आसुरी शक्तियाँ इतनी कमजोर होती हैं कि वे जानते हुये भी बोझों से मुक्त नहीं हो पाती और अंत में थक हारकर वे नाना प्रकार के प्रयत्नों से महाकाली के चरणों तक पहुँच उन्हीं के द्वारा मुक्ति प्राप्त करती हैं। अनंतकाल से ऐसा ही होता चला आ रहा है और ऐसा ही होता रहेगा। आसुरी शक्तियों का अंतिम लक्ष्य महाकाली के द्वारा मुक्ति पाना ही है। समस्त चिकित्सा जगत का एकमात्र लक्ष्य महाकाली रूपी शक्ति को समग्रता से प्राप्त करना है। औषधियाँ काली का ही अंश हैं वे उन्हीं की पराशक्ति से शक्तिकृत होती हैं तभी वे शरीर रूपी व्यवस्था में प्रवेश कर रोग रूपी आसुरी शक्तियों का विनाश करने में सक्षम हो पाती हैं। रोगों का क्या है ? वे रक्त में भी पहुँच जाते हैं, मस्तिष्क की एक-एक कोशिका तक पहुँच नियंत्रण स्थापित कर लेते हैं। सारे मानस को प्रदूषित कर देते हैं परन्तु इन सबसे भी विकट स्थिति होती है आध्यात्मिक रोगों की। अनेकों तथाकथित अध्यात्मिक साधु-संत, मठाधीश इन्हीं रोगों से ग्रसित हो सिद्धियाँ खो बैठते हैं, भ्रष्ट हो जाते हैं, भोग एवं लोलुपता उनमें इतनी बढ़ जाती है कि वे साधारण गृहस्थ से भी ज्यादा कामान्ध हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि काली साधना उनके बस की बात नहीं रह जाती है। काली साधना प्रतिक्षण की क्रिया है। प्रतिक्षण त्याग की क्रिया । प्रतिक्षण मृत्यु प्रदान करने की क्रिया, प्रतिक्षण मोह से मुक्त होने की क्रिया, समस्त प्रकार के मोह से मुक्त होने की क्रिया ।
यही क्रियाऐं साधक को विशुद्धतम प्रेममयी व्यक्तित्व में परिवर्तित करती हैं। विशुद्धतम प्रेममयी व्यक्तित्व का तात्पर्य उस प्रकृति पुरुष से है जो कि योनि बंधनों, तत्व बंधनों, ज्ञान बंधनों एवं समस्त गृह बंधनों से मुक्त हो। उसे प्रेम करने के लिए मुख से बोलने या गाने की जरूरत नहीं होती है उसका प्रेम पंचेन्द्रियों द्वारा प्रकट होने की परिधि में नहीं आता है। ठीक उसी प्रकार जिस -प्रकार महाकाली स्वरूप में माँ पार्वती अपना समस्त सौन्दर्य, श्रृंगार, आभूषण और सम्मोहन त्याग कर अपने भक्तों के लिए वह रूप भी धारण कर लेती हैं जिसे देखकर असुर भी कांप उठते हैं। ब्रह्माण्डीय प्रेम रूप, रंग, श्रृंगार इत्यादि जैसी क्षण भंगुर स्थितियों का दास नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण ने विशुद्धतम प्रेम किया। उनके विशुद्धतम् प्रेम का प्रतीक थी राधा। उम्र में उनसे बड़ी, रंग रूप में भी अत्यंत साधारण, पारिवारिक दृष्टि से भी सामान्य परन्तु प्रेम की दृष्टि से दिव्यतम, सब कुछ कृष्ण पर न्यौछावर कर देनी वाली। कृष्ण की राह देखते-देखते अंतिम श्वास ली । कृष्ण उनसे कभी दूर थे ही नहीं। शरीर दूर हो सकता है परन्तु प्रेम मे दूरी जैसे शब्दों का कोई मूल्य नहीं । शरीर भोग का प्रतीक है परन्तु प्रेम भोग का प्रतीक नहीं है। राधा और कृष्ण एक ही आवृत्ति हैं दिव्यतम प्रेम आवृत्ति । जिस प्रकार शिव शक्ति । शरीर तो आते जाते रहते हैं। शरीर कालजयी नहीं है। आप महाकाली की गीता के रूप में उपासना करें, रोगों के नाश के लिए औषधि स्वरूप में अनुसंधान करें, साधक के रूप में इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करें, मोक्ष के लिए कर्म श्रृंखलाओं से मुक्ति का प्रयास करें, ले देकर करनी आपको महाकाली साधना ही पड़ेगी।
शिव शासनत: शिव शासनत:
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‘ नित्य-उपासना’ का ‘गायत्री मंत्र ’
ईश उपासना के इस ‘गायत्री मंत्र’ का प्रणव और त्रि भुवन भाव पश्चात द्वितीय चरण- ‘भर्गो देवस्य धीमहि’ रूपमें कुल तीन शब्द- भर्गः, देवस्य और धीमहि पद के उच्चारण को अपनाता है । ये तीनों ही पद निम्न भाव-बोध को प्रकट करते हैं-
भर्गो देवस्य = यह ‘भर्गो’ शब्द ‘भर्गः’ शब्द का क्रियात्मकरूप है । देववाणी संस्कृत भाषा के शब्दकोश अनुसार ‘भर्गः’ शिव का नाम है तथा ब्रह्मा का नाम है । इसके अतिरिक्त यह ‘भर्ग’ शब्द ईश्वरीय तेज के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है ।
भगवान शिव को सृष्टि का संहार करने वाला प्रलय का देवता जाना गया है । उन्हें ‘रुद्र’ कहा गया है तथा रौद्ररूप को धारणकर ‘ताण्डव नृत्य’ करने अर्थात् समूची सृष्टि का संहार करने वाला वर्णन किया गया है । भगवान शिव द्वारा ‘ताण्डव नृत्य’ करते समय ‘बजाये गये डमरु’ के नाद से भगवान पाणिनि द्वारा भाषा के ‘चौदह माहेश्व्वर सूत्र’ प्राप्त करना सर्वत्र जानने को मिलता है । अतः आदिदेव भगवान शिव को इस जीवात्मा का कल्याण करने वाला देवता कहा गया है । यही कारण है कि भगवान शिव देवगण तथा असुरगण दोनों के आराध्यदेव बने हुए हैं । वे देव और असुर दोनों के द्वारा पूजे और स्तवन किये जाते हैं ।
‘भर्ग’ सृष्टि-यज्ञकर्ता ब्रह्मा का नाम है । ब्रह्मा को चतुर्मुख और अहर्निश सृष्टियज्ञ-कर्म करने वाला देवता जाना गया है । ब्रह्मा को प्रजापति कहा गया है । इस प्रकार यह ‘भर्ग’ शब्द ‘संहार’ और ‘सृजन’ दोनों ही अर्थ से सम्बन्ध रखनेवाला है; यह ‘किसी सिक्के के दो पहलू’ की भाँति इन दोनों ही शक्तियों को धारण करने वाले ‘तेजोमय पुरुष’ को प्रकट करता है । अतः उस परमेश्वर का सूर्यरूप में जो संहारक तथा उत्पादक तेज है, यह ‘भर्ग’ कहा गया है तथा इस एकदेशीय अर्थ को हमारे द्वारा काल-चक्र के झंझावातों के बीच अभी तक स्मृति में धारण किया गया है । श्रुतिसाहित्य में ब्रह्मा को ही ‘ब्रह्म’ तथा शिव को ‘रुद्र’ कहा जाना प्रकट होता है । यहाँ ‘ईश उपासना’ के इस ‘गायत्री मंत्र’ में यह ‘भर्ग’ शब्द इन दोनों ही प्रथम- संहारकर्ता तेज और द्वितीय- सृजनकर्ता तेज अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। तथा ‘देवस्य’ शब्द सम्बन्ध सूचक होकर यह ‘भर्ग’ देवता के इस संहारक और सृजनकर्ता तेज को अपने इस मनुष्य जीवन में अपनाने या धारण करने से सम्बन्ध रखता है ।
धीमहि – यह ‘धीमहि’ शब्द ‘ध्यान करते हैं’ अर्थ को सूचित करने वाला जाना गया है । किन्तु जब हम पूर्व पद ‘भर्ग’ द्वारा संसूचित भगवान शिव के सृष्टिसंहारकर्ता - कल्याणकारी तेज और सृष्टिसृजनकर्ता देव ब्रह्मा के प्राणीमात्र के उद्भवकर्ता और पालनकर्ता प्रजापति रूपमें धारण किये गये तेज से सम्बद्धता को अपनाकर इस ‘धीमहि’ पद पर विचार करते हैं, तो यह ‘धीमहि’ शब्द ‘मुखसुख’ को अपनाकर दो भिन्न ‘संज्ञा’ शब्द ‘धी:’ और ‘महि’ के संयोग से बना एवं समास रूप शब्द जानने में आता है । ‘धी’ शब्द बुद्धि, प्रज्ञा, मन आदि अर्थ सूचित करता है ।
यह जीवन को धारण करने वाली अर्थात् जीवन-यात्रा में सहायक बुद्धि को प्रकट करता है तथा ‘महि’ (मही) शब्द पृथिवी का सूचक है । इस प्रकार पूर्व पद के साथ सम्बद्धता को धारण करता हुआ ‘गायत्री मंत्र’ का यह द्वितीय चरण इस पृथिवी पर प्राणीमात्र के संहारक देव शिव और सृजनकर्ता या उत्पन्नकर्ता देव ब्रह्मा के कार्य से सम्बन्धित बुद्धि या प्रज्ञा का जीवनदायी रूपमें ध्यान करने अर्थात् आदिदेव भगवान शिव के संहारकर्ता कार्य और सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के उत्पत्तिकर्ता जीवनदायी कार्य से सम्बन्धित तेजोमय बुद्धि या प्रज्ञा का ध्यान करने अर्थात् उसे अपने नित्य-जीवन में अपनाने के अर्थ को सूचित करता है ।
यहाँ यह उल्लेख समीचीन है कि यह ‘भर्ग’ शब्द अपने ‘तेजोमय’ अर्थ रूपमें ‘भर्जन’ शब्द की स्मृति प्रदान करता है । यह ‘भर्जन’ शब्द भड़भूँजे को अर्थात् ‘बीज’ रूप अन्न का भंजन करने वाले पुरुष को सूचित करता है तथा भूँजने की क्रिया को ‘भर्जनम्’ अर्थात् जन्मप्रक्रिया का निरोध करना जाना गया है । उस परमात्मा का तेज समस्त पापों का भर्जन करने वाला है । यह समस्त दुष्ट भावों को जलाकर नष्ट करता है । इसके अतिरिक्त यह ‘भर्ग’ शब्द चमक, दीप्ति, ज्योति, तेज, प्रतिभा, आभा, उज्ज्वलता, विकाररहित अनामय अवस्था आदि को भी प्रकट करता है । अतः जन्म-प्रक्रिया के निरोध की भावभूमि पर गायत्री मंत्र के इस द्वितीय चरण का अर्थ होता है- “मैं अपने ब्रह्मरूप में संहारकर्ता देव शिव और सृजनकर्ता देव ब्रह्मा की कर्मकर्ता तेजोमय जीवनदायी बुद्धि को सविता के तेज रूपमें यथावसर अपनाने का संकल्प धारण करता हूँ ।” .
१/२
@Sanatan
ईश उपासना के इस ‘गायत्री मंत्र’ का प्रणव और त्रि भुवन भाव पश्चात द्वितीय चरण- ‘भर्गो देवस्य धीमहि’ रूपमें कुल तीन शब्द- भर्गः, देवस्य और धीमहि पद के उच्चारण को अपनाता है । ये तीनों ही पद निम्न भाव-बोध को प्रकट करते हैं-
भर्गो देवस्य = यह ‘भर्गो’ शब्द ‘भर्गः’ शब्द का क्रियात्मकरूप है । देववाणी संस्कृत भाषा के शब्दकोश अनुसार ‘भर्गः’ शिव का नाम है तथा ब्रह्मा का नाम है । इसके अतिरिक्त यह ‘भर्ग’ शब्द ईश्वरीय तेज के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है ।
भगवान शिव को सृष्टि का संहार करने वाला प्रलय का देवता जाना गया है । उन्हें ‘रुद्र’ कहा गया है तथा रौद्ररूप को धारणकर ‘ताण्डव नृत्य’ करने अर्थात् समूची सृष्टि का संहार करने वाला वर्णन किया गया है । भगवान शिव द्वारा ‘ताण्डव नृत्य’ करते समय ‘बजाये गये डमरु’ के नाद से भगवान पाणिनि द्वारा भाषा के ‘चौदह माहेश्व्वर सूत्र’ प्राप्त करना सर्वत्र जानने को मिलता है । अतः आदिदेव भगवान शिव को इस जीवात्मा का कल्याण करने वाला देवता कहा गया है । यही कारण है कि भगवान शिव देवगण तथा असुरगण दोनों के आराध्यदेव बने हुए हैं । वे देव और असुर दोनों के द्वारा पूजे और स्तवन किये जाते हैं ।
‘भर्ग’ सृष्टि-यज्ञकर्ता ब्रह्मा का नाम है । ब्रह्मा को चतुर्मुख और अहर्निश सृष्टियज्ञ-कर्म करने वाला देवता जाना गया है । ब्रह्मा को प्रजापति कहा गया है । इस प्रकार यह ‘भर्ग’ शब्द ‘संहार’ और ‘सृजन’ दोनों ही अर्थ से सम्बन्ध रखनेवाला है; यह ‘किसी सिक्के के दो पहलू’ की भाँति इन दोनों ही शक्तियों को धारण करने वाले ‘तेजोमय पुरुष’ को प्रकट करता है । अतः उस परमेश्वर का सूर्यरूप में जो संहारक तथा उत्पादक तेज है, यह ‘भर्ग’ कहा गया है तथा इस एकदेशीय अर्थ को हमारे द्वारा काल-चक्र के झंझावातों के बीच अभी तक स्मृति में धारण किया गया है । श्रुतिसाहित्य में ब्रह्मा को ही ‘ब्रह्म’ तथा शिव को ‘रुद्र’ कहा जाना प्रकट होता है । यहाँ ‘ईश उपासना’ के इस ‘गायत्री मंत्र’ में यह ‘भर्ग’ शब्द इन दोनों ही प्रथम- संहारकर्ता तेज और द्वितीय- सृजनकर्ता तेज अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। तथा ‘देवस्य’ शब्द सम्बन्ध सूचक होकर यह ‘भर्ग’ देवता के इस संहारक और सृजनकर्ता तेज को अपने इस मनुष्य जीवन में अपनाने या धारण करने से सम्बन्ध रखता है ।
धीमहि – यह ‘धीमहि’ शब्द ‘ध्यान करते हैं’ अर्थ को सूचित करने वाला जाना गया है । किन्तु जब हम पूर्व पद ‘भर्ग’ द्वारा संसूचित भगवान शिव के सृष्टिसंहारकर्ता - कल्याणकारी तेज और सृष्टिसृजनकर्ता देव ब्रह्मा के प्राणीमात्र के उद्भवकर्ता और पालनकर्ता प्रजापति रूपमें धारण किये गये तेज से सम्बद्धता को अपनाकर इस ‘धीमहि’ पद पर विचार करते हैं, तो यह ‘धीमहि’ शब्द ‘मुखसुख’ को अपनाकर दो भिन्न ‘संज्ञा’ शब्द ‘धी:’ और ‘महि’ के संयोग से बना एवं समास रूप शब्द जानने में आता है । ‘धी’ शब्द बुद्धि, प्रज्ञा, मन आदि अर्थ सूचित करता है ।
यह जीवन को धारण करने वाली अर्थात् जीवन-यात्रा में सहायक बुद्धि को प्रकट करता है तथा ‘महि’ (मही) शब्द पृथिवी का सूचक है । इस प्रकार पूर्व पद के साथ सम्बद्धता को धारण करता हुआ ‘गायत्री मंत्र’ का यह द्वितीय चरण इस पृथिवी पर प्राणीमात्र के संहारक देव शिव और सृजनकर्ता या उत्पन्नकर्ता देव ब्रह्मा के कार्य से सम्बन्धित बुद्धि या प्रज्ञा का जीवनदायी रूपमें ध्यान करने अर्थात् आदिदेव भगवान शिव के संहारकर्ता कार्य और सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के उत्पत्तिकर्ता जीवनदायी कार्य से सम्बन्धित तेजोमय बुद्धि या प्रज्ञा का ध्यान करने अर्थात् उसे अपने नित्य-जीवन में अपनाने के अर्थ को सूचित करता है ।
यहाँ यह उल्लेख समीचीन है कि यह ‘भर्ग’ शब्द अपने ‘तेजोमय’ अर्थ रूपमें ‘भर्जन’ शब्द की स्मृति प्रदान करता है । यह ‘भर्जन’ शब्द भड़भूँजे को अर्थात् ‘बीज’ रूप अन्न का भंजन करने वाले पुरुष को सूचित करता है तथा भूँजने की क्रिया को ‘भर्जनम्’ अर्थात् जन्मप्रक्रिया का निरोध करना जाना गया है । उस परमात्मा का तेज समस्त पापों का भर्जन करने वाला है । यह समस्त दुष्ट भावों को जलाकर नष्ट करता है । इसके अतिरिक्त यह ‘भर्ग’ शब्द चमक, दीप्ति, ज्योति, तेज, प्रतिभा, आभा, उज्ज्वलता, विकाररहित अनामय अवस्था आदि को भी प्रकट करता है । अतः जन्म-प्रक्रिया के निरोध की भावभूमि पर गायत्री मंत्र के इस द्वितीय चरण का अर्थ होता है- “मैं अपने ब्रह्मरूप में संहारकर्ता देव शिव और सृजनकर्ता देव ब्रह्मा की कर्मकर्ता तेजोमय जीवनदायी बुद्धि को सविता के तेज रूपमें यथावसर अपनाने का संकल्प धारण करता हूँ ।” .
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@Sanatan
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ईश उपासना के इस ‘गायत्री मंत्र’ के तृतीय चरण में कुल चार पद(शब्द) आये हैं- ‘धियो यो नः प्रचोदयात् ।’ ये चारों ही पद (शब्द) ‘चतुष्पाद्’ रूपमें यह जीवन-सन्देश प्रदान करते हैं कि-
धियो = यह ‘धीयः’ शब्द प्रज्ञा अर्थात् बुद्धि की धैर्यमय, विवेकयुक्त बहुवचन अवस्था को सूचित करता है; जिसे धारण करके यह पुरुष ‘व्यवहार कुशल’ कहा जाता या ‘परिपक्व बुद्धि’ जाना जाता है । यह मनुष्यशरीर पंचमहाभूतों से बना है तथा इस देहधारी पुरुषरूप को श्रुति द्वारा अन्नरसमय होना कथन किया गया है- ‘स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः ।’ (तैत्ति.उप. २.१.१) इस नश्वर शरीर और देहस्थ आत्मा (जीवत्मा) को अपने उभयरूप में – ‘यह या वह’ एवं ‘यह और वह’ आधारपर अन्न को ग्रहण (भक्षण या सेवन) करके जीवित रहने वाला प्रकट किया गया है । इस कारण यह मनुष्य इस पुरुषदेह और दशेन्द्रियों की सहायता से अपनी जीवनयात्रा को पूर्ण करने और भोगरत या भोगासक्त अवस्था को धारण करने वाला बना हुआ है और इस भोगरत या भोगासक्त अवस्था में कामनाओं की पूर्ति हेतु यह बुद्धि के नाना रूपको धारण करने और अपनाने वाला हो गया है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता में जनार्दन श्रीकृष्ण द्वारा-
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ (गीता २.४१)
अर्थात्- हे कुरुनन्दन ! इस लोक में व्यवसायात्मिका अर्थात् निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है और व्यवसायात्मिका अर्थात् अनिश्चय वाली बुद्धि बहुत भेदों वाली और अनन्त होती है ।”
कहा जाकर उपदेश किया गया है । अतः यहाँ प्रयुक्त हुआ यह ‘धियोः’ शब्द बहुत भेदों वाली अनन्त बुद्धि को व्यवसायात्मिका (एकात्मिका) बुद्धि रूपमें प्राप्त करने या धारण करने से सम्बन्ध रखने वाला होना जानने में आता वा प्रकट होता है ।
यो = यह ‘यः’ शब्द ‘जो’ अर्थ सूचित करता है तथा यह सवितादेव से सम्बन्ध रखने वाला जानने में आता है ।
नः = यह ‘नः’ शब्द बहुवचन अवस्था में यहाँ ‘हमारी’ या ‘हम सबकी’ अर्थ सूचित करता है । यह ‘न’ अव्यय पद है । इस पुरुषदेह में क्षरपुरुष और अक्षरपुरुष तथा अन्य सब देवगण निवास करते हैं । ऐतरेय उपनिषद् में श्रुतिकथन आया है कि इस मनुष्यशरीर को ‘सुकृत’ जानकर सब देवता इसमें प्रवेश करके स्थित हो गये हैं तथा वह सृजनकर्ता देव भी इस मानवदेह को विदीर्ण करके (जिस प्रकार कोई ठोस वस्तु जल की सतह को विदीर्ण करती हुई जल में प्रवेश करके स्थित हो जाती है; उसी प्रकार इस मानवदेह में प्रवेश करके वह परमात्मा) स्थित हो गया है । अतः यह ‘नः’ पद यहाँ इस ‘मंत्र साधना’ के क्रम में प्रयुक्त होना पाया जाता वा प्रकट होता है । यह मन, बुद्धि और अहंकार तथा देहस्थ इन्द्रियों की भोक्तावृत्ति की परस्पर सामञ्जस्यपूर्ण, द्वन्द्वरहित अवस्था को प्राप्त करने या धारण करने से सम्बन्ध रखता है ।
प्रचोदयात् = यह ‘प्रचोदयात्’ शब्द क्रिया पद है । इस प्रचोदयात् शब्द का अर्थ ‘प्रेरित करे’ या ‘प्रेरणा प्रदान करे’ लिया जाता है । किन्तु यह इस क्रियापद का युक्तियुक्त (संगति को प्राप्त) अर्थ होता नहीं । कारण कि यह तो सर्वरूप, अविनाशी, अभोक्ता ब्रह्म से स्वयं की पृथकता का भाव-बोध अपनाना प्रकट करता है । बृहदारण्यक उपनिषद् में श्रुति कथन आया है कि- “उस इस ब्रह्म को इस समय भी जो इस प्रकार जानता है कि ‘मैं ब्रह्म हूँ, वह यह सर्व हो जाता है । उसके पराभव में देवता भी समर्थ नहीं होते; क्योंकि वह उनका आत्मा ही हो जाता है । और जो अन्य देवता की ‘वह अन्य है और मैं अन्य हूँ’ इस प्रकार उपासना करता है, वह नहीं जानता । जैसे पशु होता है वैसे ही वह देवताओं का पशु है”- ‘अन्योऽसावन्योऽहमस्मिति न स वेद यथा पशुरेवँ्स देवानाम् ।’ (बृह.उप. १.४.१०) अतः इस पृथकता के भाव का निरोध करते हुए ही यहाँ ‘नः’ पद अपनाया गया है तथा छान्दोग्य उपनिषद् में श्रुति द्वारा इस देहधारी पुरुष को वह जो अविनाशी-अभोक्ता ब्रह्मस्वरूप आत्मा है उसका प्रकट श्वेतपताका रूप (मुखौटा) होना कथन किया गया है- ‘स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो ।‘ (छा.उप. ६.८-१६) अविनाशी ब्रह्म का प्रत्यक्ष प्रकटरूप होना कथन किया है- ‘त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ।’ (तैत्ति.उप. १.१.१) “यह सब कुछ ब्रह्म का प्रकटरूप होना, ब्रह्म में उत्पन्न होना, ब्रह्म में चेष्टा करना और ब्रह्म में लय अवस्था प्राप्त करना कथन किया गया है तथा चित्त (अन्तःकरण) की शान्त अवस्था को अपनाकर ब्रह्म की उपासना करने का निर्देश किया गया है”- ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत ।’ (छा.उप. ३.१४.१) अतः यह ‘प्रचोदयात्’ पद उस सर्वरूप ब्रह्म को अंगीकार करने या स्वयं की नियोजित अवस्था को अपनाने का अर्थ धारण करता है जिसका वरण प्रथम चरण में आयी शब्दावली अनुसार किया गया है ।
@Sanatan
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ईश उपासना के इस ‘गायत्री मंत्र’ के तृतीय चरण में कुल चार पद(शब्द) आये हैं- ‘धियो यो नः प्रचोदयात् ।’ ये चारों ही पद (शब्द) ‘चतुष्पाद्’ रूपमें यह जीवन-सन्देश प्रदान करते हैं कि-
धियो = यह ‘धीयः’ शब्द प्रज्ञा अर्थात् बुद्धि की धैर्यमय, विवेकयुक्त बहुवचन अवस्था को सूचित करता है; जिसे धारण करके यह पुरुष ‘व्यवहार कुशल’ कहा जाता या ‘परिपक्व बुद्धि’ जाना जाता है । यह मनुष्यशरीर पंचमहाभूतों से बना है तथा इस देहधारी पुरुषरूप को श्रुति द्वारा अन्नरसमय होना कथन किया गया है- ‘स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः ।’ (तैत्ति.उप. २.१.१) इस नश्वर शरीर और देहस्थ आत्मा (जीवत्मा) को अपने उभयरूप में – ‘यह या वह’ एवं ‘यह और वह’ आधारपर अन्न को ग्रहण (भक्षण या सेवन) करके जीवित रहने वाला प्रकट किया गया है । इस कारण यह मनुष्य इस पुरुषदेह और दशेन्द्रियों की सहायता से अपनी जीवनयात्रा को पूर्ण करने और भोगरत या भोगासक्त अवस्था को धारण करने वाला बना हुआ है और इस भोगरत या भोगासक्त अवस्था में कामनाओं की पूर्ति हेतु यह बुद्धि के नाना रूपको धारण करने और अपनाने वाला हो गया है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता में जनार्दन श्रीकृष्ण द्वारा-
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ (गीता २.४१)
अर्थात्- हे कुरुनन्दन ! इस लोक में व्यवसायात्मिका अर्थात् निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है और व्यवसायात्मिका अर्थात् अनिश्चय वाली बुद्धि बहुत भेदों वाली और अनन्त होती है ।”
कहा जाकर उपदेश किया गया है । अतः यहाँ प्रयुक्त हुआ यह ‘धियोः’ शब्द बहुत भेदों वाली अनन्त बुद्धि को व्यवसायात्मिका (एकात्मिका) बुद्धि रूपमें प्राप्त करने या धारण करने से सम्बन्ध रखने वाला होना जानने में आता वा प्रकट होता है ।
यो = यह ‘यः’ शब्द ‘जो’ अर्थ सूचित करता है तथा यह सवितादेव से सम्बन्ध रखने वाला जानने में आता है ।
नः = यह ‘नः’ शब्द बहुवचन अवस्था में यहाँ ‘हमारी’ या ‘हम सबकी’ अर्थ सूचित करता है । यह ‘न’ अव्यय पद है । इस पुरुषदेह में क्षरपुरुष और अक्षरपुरुष तथा अन्य सब देवगण निवास करते हैं । ऐतरेय उपनिषद् में श्रुतिकथन आया है कि इस मनुष्यशरीर को ‘सुकृत’ जानकर सब देवता इसमें प्रवेश करके स्थित हो गये हैं तथा वह सृजनकर्ता देव भी इस मानवदेह को विदीर्ण करके (जिस प्रकार कोई ठोस वस्तु जल की सतह को विदीर्ण करती हुई जल में प्रवेश करके स्थित हो जाती है; उसी प्रकार इस मानवदेह में प्रवेश करके वह परमात्मा) स्थित हो गया है । अतः यह ‘नः’ पद यहाँ इस ‘मंत्र साधना’ के क्रम में प्रयुक्त होना पाया जाता वा प्रकट होता है । यह मन, बुद्धि और अहंकार तथा देहस्थ इन्द्रियों की भोक्तावृत्ति की परस्पर सामञ्जस्यपूर्ण, द्वन्द्वरहित अवस्था को प्राप्त करने या धारण करने से सम्बन्ध रखता है ।
प्रचोदयात् = यह ‘प्रचोदयात्’ शब्द क्रिया पद है । इस प्रचोदयात् शब्द का अर्थ ‘प्रेरित करे’ या ‘प्रेरणा प्रदान करे’ लिया जाता है । किन्तु यह इस क्रियापद का युक्तियुक्त (संगति को प्राप्त) अर्थ होता नहीं । कारण कि यह तो सर्वरूप, अविनाशी, अभोक्ता ब्रह्म से स्वयं की पृथकता का भाव-बोध अपनाना प्रकट करता है । बृहदारण्यक उपनिषद् में श्रुति कथन आया है कि- “उस इस ब्रह्म को इस समय भी जो इस प्रकार जानता है कि ‘मैं ब्रह्म हूँ, वह यह सर्व हो जाता है । उसके पराभव में देवता भी समर्थ नहीं होते; क्योंकि वह उनका आत्मा ही हो जाता है । और जो अन्य देवता की ‘वह अन्य है और मैं अन्य हूँ’ इस प्रकार उपासना करता है, वह नहीं जानता । जैसे पशु होता है वैसे ही वह देवताओं का पशु है”- ‘अन्योऽसावन्योऽहमस्मिति न स वेद यथा पशुरेवँ्स देवानाम् ।’ (बृह.उप. १.४.१०) अतः इस पृथकता के भाव का निरोध करते हुए ही यहाँ ‘नः’ पद अपनाया गया है तथा छान्दोग्य उपनिषद् में श्रुति द्वारा इस देहधारी पुरुष को वह जो अविनाशी-अभोक्ता ब्रह्मस्वरूप आत्मा है उसका प्रकट श्वेतपताका रूप (मुखौटा) होना कथन किया गया है- ‘स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो ।‘ (छा.उप. ६.८-१६) अविनाशी ब्रह्म का प्रत्यक्ष प्रकटरूप होना कथन किया है- ‘त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ।’ (तैत्ति.उप. १.१.१) “यह सब कुछ ब्रह्म का प्रकटरूप होना, ब्रह्म में उत्पन्न होना, ब्रह्म में चेष्टा करना और ब्रह्म में लय अवस्था प्राप्त करना कथन किया गया है तथा चित्त (अन्तःकरण) की शान्त अवस्था को अपनाकर ब्रह्म की उपासना करने का निर्देश किया गया है”- ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत ।’ (छा.उप. ३.१४.१) अतः यह ‘प्रचोदयात्’ पद उस सर्वरूप ब्रह्म को अंगीकार करने या स्वयं की नियोजित अवस्था को अपनाने का अर्थ धारण करता है जिसका वरण प्रथम चरण में आयी शब्दावली अनुसार किया गया है ।
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आराधना,भक्ति ,तपस्या, किसे कहते है ?
भक्ति तो एक मनोभाव है समर्पण का, परम विश्वास का, मनोरम रस-माधुर्य का, न्योछावर हो जाने का, तन्मयता के साथ अनुरक्त रहने का। यह भाव अपने इष्ट या आराध्य के चरणों में समर्पित कर भक्त उस भाव-धारा के पुण्य जल में निरंतर अवगाहन करता हुआ मगन रहता है।
आराधना भक्ति की निरंतरता, सातत्य और अविचलता के साथ कुछ और भी है। आराधना है अपने ईश के रूप, स्वरूप, गुण, महिमा का निरंतर स्मरण, मन में दुहराव, जप, कीर्तन, मनन तथा मानसिक और भौतिक पूजन द्वारा अपने आराध्य से यह कृपा प्राप्त करने का यत्न कि उसके स्वरूप की दिव्यता के तत्व हमारे व्यक्तित्व को भरसक प्रकाशित करें, हमारे चरित्र को आलोकित करें और हमारे कार्यों व संकल्पों में झलकें। उद्देश्य यह कि हमारा संपूर्ण जीवन सांसारिक गतिविधियों में लिप्त रहता हुआ भी उस दैवी-दिव्यता से तृप्त रहे, आप्यायित हो।
आराधना या उपासना को एक अन्य अर्थ में ही समझा जाना चाहिए। दैवी शक्तियों की आराधना इसलिए भी की जाती है कि हम उनसे अपने सांसारिक उपक्रमों में इच्छित सफलता प्राप्त करने का वरदान प्राप्त करें, सफलता प्राप्ति के बीच आने वाली बाधाओं का निवारण हो और हमारा प्रयत्न, उद्यम, तपस्या, उपक्रम, सुगम हो। दैवी शक्तियों की आराधना मनोबल देती है, आत्मविश्वास बढ़ाती है, उत्साह का संचार करती है और सफलता की संभावना बढ़ाती है। परंतु यह समझ लिया जाना चाहिए कि भौतिक चढ़ावों या धूप, दीप, भोग, दान से यह आराधना सफल नहीं होती।
आराधना या उपासना को एक अन्य अर्थ में ही समझा जाना चाहिए। दैवी शक्तियों की आराधना इसलिए भी की जाती है कि हम उनसे अपने सांसारिक उपक्रमों में इच्छित सफलता प्राप्त करने का वरदान प्राप्त करें, सफलता प्राप्ति के बीच आने वाली बाधाओं का निवारण हो और हमारा प्रयत्न, उद्यम, तपस्या, उपक्रम, सुगम हो। दैवी शक्तियों की आराधना मनोबल देती है, आत्मविश्वास बढ़ाती है, उत्साह का संचार करती है और सफलता की संभावना बढ़ाती है। परंतु यह समझ लिया जाना चाहिए कि भौतिक चढ़ावों या धूप, दीप, भोग, दान से यह आराधना सफल नहीं होती। सफलता प्राप्त होती है अपने प्रयत्नों में कठोर परिश्रम से, एकाग्रता से, लगन से, तन्मय उद्यम से, इच्छित दिशा में किए गए सार्थक प्रयासों से।
सफलता प्राप्ति का मूल मंत्र है तपस्या। दैवी शक्तियां तो इस तपस्या की साक्षी होती हैं, मनोबल बढ़ाने का वरदान देती हैं और एक ऐसा सुखद अहसास देती हैं कि हमारे प्रयत्नों पर किसी दिव्य शक्ति की छत्रछाया है। इन शक्तियों की आराधना का मनोभाव हमारे प्रयत्नों को अनंत ऊर्जा से श्रृंगारित कर देता है, जो सफलता को अवश्यंभावी बना देता है। आराधना हमारे प्रयत्नों की सहकारिणी हैं।
जय माँ काली ।🙏जय निखिलेश्वर 🙏🏼 .
@Sanatan
भक्ति तो एक मनोभाव है समर्पण का, परम विश्वास का, मनोरम रस-माधुर्य का, न्योछावर हो जाने का, तन्मयता के साथ अनुरक्त रहने का। यह भाव अपने इष्ट या आराध्य के चरणों में समर्पित कर भक्त उस भाव-धारा के पुण्य जल में निरंतर अवगाहन करता हुआ मगन रहता है।
आराधना भक्ति की निरंतरता, सातत्य और अविचलता के साथ कुछ और भी है। आराधना है अपने ईश के रूप, स्वरूप, गुण, महिमा का निरंतर स्मरण, मन में दुहराव, जप, कीर्तन, मनन तथा मानसिक और भौतिक पूजन द्वारा अपने आराध्य से यह कृपा प्राप्त करने का यत्न कि उसके स्वरूप की दिव्यता के तत्व हमारे व्यक्तित्व को भरसक प्रकाशित करें, हमारे चरित्र को आलोकित करें और हमारे कार्यों व संकल्पों में झलकें। उद्देश्य यह कि हमारा संपूर्ण जीवन सांसारिक गतिविधियों में लिप्त रहता हुआ भी उस दैवी-दिव्यता से तृप्त रहे, आप्यायित हो।
आराधना या उपासना को एक अन्य अर्थ में ही समझा जाना चाहिए। दैवी शक्तियों की आराधना इसलिए भी की जाती है कि हम उनसे अपने सांसारिक उपक्रमों में इच्छित सफलता प्राप्त करने का वरदान प्राप्त करें, सफलता प्राप्ति के बीच आने वाली बाधाओं का निवारण हो और हमारा प्रयत्न, उद्यम, तपस्या, उपक्रम, सुगम हो। दैवी शक्तियों की आराधना मनोबल देती है, आत्मविश्वास बढ़ाती है, उत्साह का संचार करती है और सफलता की संभावना बढ़ाती है। परंतु यह समझ लिया जाना चाहिए कि भौतिक चढ़ावों या धूप, दीप, भोग, दान से यह आराधना सफल नहीं होती।
आराधना या उपासना को एक अन्य अर्थ में ही समझा जाना चाहिए। दैवी शक्तियों की आराधना इसलिए भी की जाती है कि हम उनसे अपने सांसारिक उपक्रमों में इच्छित सफलता प्राप्त करने का वरदान प्राप्त करें, सफलता प्राप्ति के बीच आने वाली बाधाओं का निवारण हो और हमारा प्रयत्न, उद्यम, तपस्या, उपक्रम, सुगम हो। दैवी शक्तियों की आराधना मनोबल देती है, आत्मविश्वास बढ़ाती है, उत्साह का संचार करती है और सफलता की संभावना बढ़ाती है। परंतु यह समझ लिया जाना चाहिए कि भौतिक चढ़ावों या धूप, दीप, भोग, दान से यह आराधना सफल नहीं होती। सफलता प्राप्त होती है अपने प्रयत्नों में कठोर परिश्रम से, एकाग्रता से, लगन से, तन्मय उद्यम से, इच्छित दिशा में किए गए सार्थक प्रयासों से।
सफलता प्राप्ति का मूल मंत्र है तपस्या। दैवी शक्तियां तो इस तपस्या की साक्षी होती हैं, मनोबल बढ़ाने का वरदान देती हैं और एक ऐसा सुखद अहसास देती हैं कि हमारे प्रयत्नों पर किसी दिव्य शक्ति की छत्रछाया है। इन शक्तियों की आराधना का मनोभाव हमारे प्रयत्नों को अनंत ऊर्जा से श्रृंगारित कर देता है, जो सफलता को अवश्यंभावी बना देता है। आराधना हमारे प्रयत्नों की सहकारिणी हैं।
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ॐ कृष्णकायाम्बिकाय विद्महे पार्वती रूपाय धीमहि । तन्नो कालिका प्रचोदयात ॥
ॐ कृष्णकायाम्बिकाय विद्महे पार्वती रूपाय धीमहि । तन्नो कालिका प्रचोदयात ॥ यही वह मंत्र है जिसके द्वारा भगवती कालिका को अर्घ्य प्रदान कर जगद् गुरु श्रीकृष्ण एवं श्रीविद्योधारक भगवान दत्तात्रेय मंदिरापान के दोष से मुक्त हुए, इसी मंत्र के द्वारा परशुराम जिन्होंने कि अपनी माता का वध किया था मातृ वध के महापाप से मुक्त हुए। राम एवं हनुमान ने जब इस मंत्र से महाकालिका का तर्पण किया तब जाकर वे ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त हुए, काशी में कालभैरव भी ब्रह्मा के शिरोच्छेदन के कारण ब्रह्म-हत्या के पाप से इसी मंत्र के द्वारा मुक्त हुए, उनके पीछे भी कृत्या लग गई थी। यही वह महामंत्र है जिसे जब बुद्ध ने सिद्ध किया तब उग्रतारा के रूप में भगवती प्रत्यंगिरा का प्राकट्य हुआ और वेद-निंदा के पाप से बुद्ध का बुद्धत्व मुक्त हुआ। इसी महामंत्र को पढ़कर जब स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने कलकत्ता की वेश्याओं की आँखों में शक्तिपात किया तो क्षण भर में ही वेश्यावृत्ति में लीन वेश्याओं के समस्त पाप धुल गये, वे निर्मल हो गईं, उनका हृदय परिवर्तन हो गया एवं रामकृष्ण मिशन के निर्माण की प्रारम्भिक अवस्था में इन पवित्र स्त्रियों ने तन- मन-धन से असीम योगदान दिया।
प्रवचनकर्ता कहते हैं माया मल है, मल से ढँका शिव जीव है। कहने से क्या होता है ? कहते रहो। लाओ वह साबुन, वह डिटर्जेंट, वह परम औषधि जो कि मन पर लगे तन पर लगे, आत्मा से चिपटे,मस्तिष्क में घुसे, हृदय पर आरूढ़ मल को धो सके, धब्बों को मिटा सके तब तो कोई बात हैं। हम बदरंग हो रहे हैं, हम धूमिल हो रहे हैं, हम बदबू मार रहे हैं क्योंकि मल में से बदबू आती है खुशबू नहीं, मल सड़ान्ध उत्पन्न करता है अतः हम सड़ रहे हैं, मल गलाता है अत: हम गल रहे हैं। मल हमें अछूत बनाता है, मल हमें तिरस्कृत बनाता है अतः कहने से कुछ नहीं होगा अपितु इस मल का निवारण चाहिए। हे भगवती कालिका तु ही मल का निवारण कर सकती हैं, तू ही मल का भक्षण कर सकती है, तू ही हमें मल-चक्र से बचा सकती है। किसी ने मुझस कहा हमारे लड़के का पूजा में मन नहीं लगता भगवान में उसे विश्वास नहीं है, उसका भगवान पर से विश्वास उठ गया है। मैने कहा तुम कहती हो परन्तु वास्तव में सत्य यह है कि भगवान का तुम्हारे बेटे में मन नहीं लगता, भगवान को तुम्हारे बेटे में विश्वास नहीं रहा, भगवान तुम्हारे बेटे से दूर हो गया है इसलिए वह भोग रहा है, भटक रहा है, दर-दर की ठोकरें खा रहा है। मैंने कहा जब मेरी तुम्हारे बेटे में रुचि नहीं है, मैं उस पर विश्वास नहीं करता, मेरा विश्वास उस पर से उठ गया है तो फिर भगवान तो बहुत दूर की बात है।
भगवान तो मनुष्य को बनाया और उसे कृपा करके इच्छा-स्वातंत्र दिया अतः भगवान मनुष्य के इच्छा स्वातंत्र के प्रति प्रतिबद्ध है। इच्छा भगवान ने ही दी है अतः मनुष्य अपनी इच्छानुसार जीवन जी सकता है जैसी उसकी मर्जी इच्छा-स्वातंत्र को समझना जरूरी है आप चाहो तो चार मंजिला इमारत पर खड़े होकर छलांग लगा सकते हो आपकी इच्छा एवं आपका परिणाम आप चाहो तो चार मंजिला इमारत पर खड़े होकर छलांग लगाने वाले को रोक सकते हो, आप चाहो तो चार मंजिला इमारत भी बना सकते हो जैसी आपकी इच्छा एवं यह श्री प्रत्यंगिरा के लेख का रहस्य बिन्दु है। आप चाहो तो प्रत्यंगिरा की शरण में रह सकते हो और अपनी इच्छा को श्री कालिका इच्छा, श्री त्रिपुरा इच्छा में विलीन कर स्व-इच्छा का त्याग कर परा-इच्छा के अंतर्गत आनंदमय कोष में भी रह सकते हो। तब जीवन द्वंद-विहीन होगा, तब जीवन शत्रु विहीन होगा, तब जीवन भय विहीन होगा तब जीवन असुरक्षा- विहीन होगा क्योंकि आपके साथ महाप्रत्यंगिरा चलेगीं।
शिव की कोई इच्छा नहीं है, शिव इच्छा विहीन है इसलिए प्रत्यंगिरा उनके साथ खड़ी रहती हैं। विष्णु भी इच्छा विहीन है इसलिए महामाया के रूप में प्रत्यंगिरा उनके साथ रहती हैं। महाजल प्रलय के समय वट वृक्ष के पत्ते के ऊपर अपने पाँव का अंगूठा चूसते हुए श्री बाल मुकुन्दम मुस्कुरा रहे थे और मार्कण्डेय ने देखा कि पीछे साक्षात् महामाया स्वरूपिणी महा प्रत्यंगिरा खड़ी हुई हैं एवं बाल मुकुन्दम को निर्भयता प्रदान कर रही हैं। चिंता मत कर मैं हूँ न, मैं ही कर्ता मैं ही धर्ता मैं ही मर्ता, मैं ही प्रलय, मैं ही सृष्टि, मैं ही आत्मा, मैं ही परमात्मा, मैं ही दिव्यात्मा, मैं ही पुण्यात्मा, मैं ही सर्वात्मा, मैं ही ब्रह्मात्मा अर्थात जो कुछ हूँ मैं ही हूँ। जो कुछ करूंगी मैं ही करूंगी, मैं ही करवाऊंगी। मैं ही कारण, मैं ही कार्य, मैं ही क्रिया अतः "नमोऽस्तुते नमोऽस्तुति, आदि-बिन्दु नमोऽस्तुते।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan .
ॐ कृष्णकायाम्बिकाय विद्महे पार्वती रूपाय धीमहि । तन्नो कालिका प्रचोदयात ॥ यही वह मंत्र है जिसके द्वारा भगवती कालिका को अर्घ्य प्रदान कर जगद् गुरु श्रीकृष्ण एवं श्रीविद्योधारक भगवान दत्तात्रेय मंदिरापान के दोष से मुक्त हुए, इसी मंत्र के द्वारा परशुराम जिन्होंने कि अपनी माता का वध किया था मातृ वध के महापाप से मुक्त हुए। राम एवं हनुमान ने जब इस मंत्र से महाकालिका का तर्पण किया तब जाकर वे ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त हुए, काशी में कालभैरव भी ब्रह्मा के शिरोच्छेदन के कारण ब्रह्म-हत्या के पाप से इसी मंत्र के द्वारा मुक्त हुए, उनके पीछे भी कृत्या लग गई थी। यही वह महामंत्र है जिसे जब बुद्ध ने सिद्ध किया तब उग्रतारा के रूप में भगवती प्रत्यंगिरा का प्राकट्य हुआ और वेद-निंदा के पाप से बुद्ध का बुद्धत्व मुक्त हुआ। इसी महामंत्र को पढ़कर जब स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने कलकत्ता की वेश्याओं की आँखों में शक्तिपात किया तो क्षण भर में ही वेश्यावृत्ति में लीन वेश्याओं के समस्त पाप धुल गये, वे निर्मल हो गईं, उनका हृदय परिवर्तन हो गया एवं रामकृष्ण मिशन के निर्माण की प्रारम्भिक अवस्था में इन पवित्र स्त्रियों ने तन- मन-धन से असीम योगदान दिया।
प्रवचनकर्ता कहते हैं माया मल है, मल से ढँका शिव जीव है। कहने से क्या होता है ? कहते रहो। लाओ वह साबुन, वह डिटर्जेंट, वह परम औषधि जो कि मन पर लगे तन पर लगे, आत्मा से चिपटे,मस्तिष्क में घुसे, हृदय पर आरूढ़ मल को धो सके, धब्बों को मिटा सके तब तो कोई बात हैं। हम बदरंग हो रहे हैं, हम धूमिल हो रहे हैं, हम बदबू मार रहे हैं क्योंकि मल में से बदबू आती है खुशबू नहीं, मल सड़ान्ध उत्पन्न करता है अतः हम सड़ रहे हैं, मल गलाता है अत: हम गल रहे हैं। मल हमें अछूत बनाता है, मल हमें तिरस्कृत बनाता है अतः कहने से कुछ नहीं होगा अपितु इस मल का निवारण चाहिए। हे भगवती कालिका तु ही मल का निवारण कर सकती हैं, तू ही मल का भक्षण कर सकती है, तू ही हमें मल-चक्र से बचा सकती है। किसी ने मुझस कहा हमारे लड़के का पूजा में मन नहीं लगता भगवान में उसे विश्वास नहीं है, उसका भगवान पर से विश्वास उठ गया है। मैने कहा तुम कहती हो परन्तु वास्तव में सत्य यह है कि भगवान का तुम्हारे बेटे में मन नहीं लगता, भगवान को तुम्हारे बेटे में विश्वास नहीं रहा, भगवान तुम्हारे बेटे से दूर हो गया है इसलिए वह भोग रहा है, भटक रहा है, दर-दर की ठोकरें खा रहा है। मैंने कहा जब मेरी तुम्हारे बेटे में रुचि नहीं है, मैं उस पर विश्वास नहीं करता, मेरा विश्वास उस पर से उठ गया है तो फिर भगवान तो बहुत दूर की बात है।
भगवान तो मनुष्य को बनाया और उसे कृपा करके इच्छा-स्वातंत्र दिया अतः भगवान मनुष्य के इच्छा स्वातंत्र के प्रति प्रतिबद्ध है। इच्छा भगवान ने ही दी है अतः मनुष्य अपनी इच्छानुसार जीवन जी सकता है जैसी उसकी मर्जी इच्छा-स्वातंत्र को समझना जरूरी है आप चाहो तो चार मंजिला इमारत पर खड़े होकर छलांग लगा सकते हो आपकी इच्छा एवं आपका परिणाम आप चाहो तो चार मंजिला इमारत पर खड़े होकर छलांग लगाने वाले को रोक सकते हो, आप चाहो तो चार मंजिला इमारत भी बना सकते हो जैसी आपकी इच्छा एवं यह श्री प्रत्यंगिरा के लेख का रहस्य बिन्दु है। आप चाहो तो प्रत्यंगिरा की शरण में रह सकते हो और अपनी इच्छा को श्री कालिका इच्छा, श्री त्रिपुरा इच्छा में विलीन कर स्व-इच्छा का त्याग कर परा-इच्छा के अंतर्गत आनंदमय कोष में भी रह सकते हो। तब जीवन द्वंद-विहीन होगा, तब जीवन शत्रु विहीन होगा, तब जीवन भय विहीन होगा तब जीवन असुरक्षा- विहीन होगा क्योंकि आपके साथ महाप्रत्यंगिरा चलेगीं।
शिव की कोई इच्छा नहीं है, शिव इच्छा विहीन है इसलिए प्रत्यंगिरा उनके साथ खड़ी रहती हैं। विष्णु भी इच्छा विहीन है इसलिए महामाया के रूप में प्रत्यंगिरा उनके साथ रहती हैं। महाजल प्रलय के समय वट वृक्ष के पत्ते के ऊपर अपने पाँव का अंगूठा चूसते हुए श्री बाल मुकुन्दम मुस्कुरा रहे थे और मार्कण्डेय ने देखा कि पीछे साक्षात् महामाया स्वरूपिणी महा प्रत्यंगिरा खड़ी हुई हैं एवं बाल मुकुन्दम को निर्भयता प्रदान कर रही हैं। चिंता मत कर मैं हूँ न, मैं ही कर्ता मैं ही धर्ता मैं ही मर्ता, मैं ही प्रलय, मैं ही सृष्टि, मैं ही आत्मा, मैं ही परमात्मा, मैं ही दिव्यात्मा, मैं ही पुण्यात्मा, मैं ही सर्वात्मा, मैं ही ब्रह्मात्मा अर्थात जो कुछ हूँ मैं ही हूँ। जो कुछ करूंगी मैं ही करूंगी, मैं ही करवाऊंगी। मैं ही कारण, मैं ही कार्य, मैं ही क्रिया अतः "नमोऽस्तुते नमोऽस्तुति, आदि-बिन्दु नमोऽस्तुते।
(क्रमशः)
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ॐ कृष्णकायाम्बिकाय विद्महे पार्वती रूपाय धीमहि । तन्नो कालिका प्रचोदयात ॥ (२)
महाप्रत्यंगिरा सिद्धि के क्या लक्षण हैं? क्यों मैं तुम्हें ज्ञान दे दूं? क्यों मैं तुम्हें माता-पिता, बंधु-बांधव, मित्र, सहयोगी, पुत्र-पुत्री, पत्नी, रिश्तेदार इत्यादि-इत्यादि कह दूं? क्यों मैं तुम्हें पूजूं ? क्यों पुजवाऊं? क्योंकि इन सबमें कृत्य है। कृत्य का तात्पर्य है। कि कर्म कर्म करोगे तो कृत्य होगा, कृत्य करोगे तो कृत्या चलेगी, कृत्या चलेगी तो प्रतिक्रिया होगी, प्रतिक्रिया लौटकर आयेगी एवं लौटकर आयेगी तो अपने साथ बहुत कुछ लेकर आयेगी अतः हमें हिसाब किताब रखना पड़ेगा और इस प्रकार महा संसार चक्र प्रारम्भ हो जायेगा, एक नई सृष्टि की रचना के आप केन्द्र बिन्दु बन जायेंगे।
जो अच्छा काम करता है उसके सबसे ज्यादा शत्रु होते हैं। जितने लोग बुरा काम करते हैं वे अच्छे काम करने वालों के घोर शत्रु हो जाते हैं। जो सेवा करते हैं उनके भी बहुत शत्रु हो जाते हैं, जितने शोषण करने वाले होंगे वे आपके कट्टर शत्रु हो जायेंगे। क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। आप चोर को पकड़ोगे तो समस्त चोर समुदाय आपका शत्रु हो जायेगा, आप उपद्रवियों को मारोगे तो उपद्रवी पूरी ताकत से आपके खिलाफ शत्रुता भजाने लगेंगे, आप पाखण्ड का विरोध करोगे तो जितने पाखण्डी हैं सब आपके शत्रु हो जायेंगे। आप सत्य बोलोगे तो जितने असत्य के साधक हैं वे सब उठ खड़े होंगे। कृष्ण पाण्डवों के साथ खड़े हो गये तो समस्त विश्व दुर्योधन के साथ खड़ा हो गया कृष्ण का शत्रु बनकर, सबने एक स्वर में कहा कि कृष्ण को मार डालो अर्जुन को तो हम मसल देंगे। दूसरा पक्ष भी अस्त्र-शस्त्रों से लैस होता है, तप होता है उनके पास, ज्ञान होता है उनके पास, विज्ञान होता है, उनके पास उनके कुल देवता, उनके शुभ चिंतक, उनकी माताएं, उनके बंधु बांधव, उनके शिष्य, उनकी प्रजा, उनके देवी-देवता इत्यादि पूरी ताकत के साथ, पूरे समर्थन के साथ उनके साथ होते हैं और ऐसी स्थिति में महाप्रत्यंगिरा अनुष्ठानम् करना पड़ता है, महा-कालिका को जगाना पड़ता है।
हे महाप्रत्यंगिरा रूपिणी महाकालिका जब आप जागृत होती हैं तो घोर अट्ठाहस करते हुए, नृत्य करते हुए, महामद में चूर होकर युद्ध क्षेत्र को तत्पर होती हैं और आपके अंदर से असंख्य तरह के मुख धारण किए हुए अनेकों प्रत्यंगिराएं निकल पड़ती हैं। किसी का मुख उलूक के समान होता है, किसी का मुख सिंह के समान होता है, किसी का मुख व्याघ्र के समान होता है, किसी का मुख पक्षी के समान होता है, किसी का मुख वाराही के समान होता है, किसी का मुख ऊष्ट हथिनी के समान होता है, किसी का मुख चूहे के समान होता है इत्यादि-इत्यादि ये सबकी सब प्रत्यंगिराएं शत्रुओं के ऊपर टूट पड़ती हैं, उन्हें नोंचती है, उन्हें काटती हैं, उन्हें तोड़ती हैं, उन्हें मरोड़ती हैं, उनका रक्त पी लेती हैं, उनका मांस खा जाती हैं, उन्हें जला देती हैं, उन्हें अपने अट्ठाहस से डरा देती हैं, उन्हें जल में डुबो देती हैं, उन्हें पीटती हैं, उनका अंग-भंग करती हैं, उन्हें चीरती हैं, उन्हें दौड़ाती हैं, उनके टुकड़े-टुकड़े कर देती हैं, उन्हें निगल जाती हैं, उन्हें घेर लेती हैं, उन पर विष वमन करती हैं, उन्हें डस लेती हैं, उन्हें मूर्च्छित कर देती हैं, उन्हें विक्षप्त कर देती हैं, उन्हें हवा में उड़ा देती हैं, उन्हें पंजों में दबा लेती हैं, उनके शरीर में प्रविष्ट हो उन्हें भ्रमित करती हैं, उन्हें मोहित-स्तंभित जृम्भित करती हैं अर्थात जैसे हो सके वैसे उनका सर्वनाश कर देती हैं। उन्हें आंदोलित करती हैं, उन्हें प्रेरित करती हैं, उन्हें बाध्य करती हैं, उन्हें मरने के लिए मजबूर करती हैं, उन्हें क्रोध दिलाती हैं अर्थात उन्हें छोड़ती नहीं हैं अपितु उनका समूल नाश करती हैं।
भगवती की आँखें चढ़ गईं, दोनों नेत्र रक्त के समान लाल हो गये और वे शिव से बोली कि अब दो ही चीजें होगी, अब दो ही बातें होंगी या तो दक्ष के यज्ञ का ध्वंस होगा या वह आपके चरण पकड़कर क्षमा मांगेगा, आपके शरणागत होगा तीसरा कुछ नहीं होगा और इस प्रकार ब्रह्माण्ड में प्रथम बार शिव ने महा प्रत्यंगिरा का अविष्कार देखा, महाप्रत्यंगिरा का घोष देखा, महाप्रत्यंगिरा का महानाद सुना। शिव घबरा गये महा प्रत्यंगिरा के इस महाविकराल रूप को देखकर। मैं नहीं लौटूगी-मैं नहीं लौटूंगी-मैं नहीं लौटूगी बार-बार आदि महा - प्रत्यंगिरा उच्च स्वर में घोष कर रही थीं ।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
महाप्रत्यंगिरा सिद्धि के क्या लक्षण हैं? क्यों मैं तुम्हें ज्ञान दे दूं? क्यों मैं तुम्हें माता-पिता, बंधु-बांधव, मित्र, सहयोगी, पुत्र-पुत्री, पत्नी, रिश्तेदार इत्यादि-इत्यादि कह दूं? क्यों मैं तुम्हें पूजूं ? क्यों पुजवाऊं? क्योंकि इन सबमें कृत्य है। कृत्य का तात्पर्य है। कि कर्म कर्म करोगे तो कृत्य होगा, कृत्य करोगे तो कृत्या चलेगी, कृत्या चलेगी तो प्रतिक्रिया होगी, प्रतिक्रिया लौटकर आयेगी एवं लौटकर आयेगी तो अपने साथ बहुत कुछ लेकर आयेगी अतः हमें हिसाब किताब रखना पड़ेगा और इस प्रकार महा संसार चक्र प्रारम्भ हो जायेगा, एक नई सृष्टि की रचना के आप केन्द्र बिन्दु बन जायेंगे।
जो अच्छा काम करता है उसके सबसे ज्यादा शत्रु होते हैं। जितने लोग बुरा काम करते हैं वे अच्छे काम करने वालों के घोर शत्रु हो जाते हैं। जो सेवा करते हैं उनके भी बहुत शत्रु हो जाते हैं, जितने शोषण करने वाले होंगे वे आपके कट्टर शत्रु हो जायेंगे। क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। आप चोर को पकड़ोगे तो समस्त चोर समुदाय आपका शत्रु हो जायेगा, आप उपद्रवियों को मारोगे तो उपद्रवी पूरी ताकत से आपके खिलाफ शत्रुता भजाने लगेंगे, आप पाखण्ड का विरोध करोगे तो जितने पाखण्डी हैं सब आपके शत्रु हो जायेंगे। आप सत्य बोलोगे तो जितने असत्य के साधक हैं वे सब उठ खड़े होंगे। कृष्ण पाण्डवों के साथ खड़े हो गये तो समस्त विश्व दुर्योधन के साथ खड़ा हो गया कृष्ण का शत्रु बनकर, सबने एक स्वर में कहा कि कृष्ण को मार डालो अर्जुन को तो हम मसल देंगे। दूसरा पक्ष भी अस्त्र-शस्त्रों से लैस होता है, तप होता है उनके पास, ज्ञान होता है उनके पास, विज्ञान होता है, उनके पास उनके कुल देवता, उनके शुभ चिंतक, उनकी माताएं, उनके बंधु बांधव, उनके शिष्य, उनकी प्रजा, उनके देवी-देवता इत्यादि पूरी ताकत के साथ, पूरे समर्थन के साथ उनके साथ होते हैं और ऐसी स्थिति में महाप्रत्यंगिरा अनुष्ठानम् करना पड़ता है, महा-कालिका को जगाना पड़ता है।
हे महाप्रत्यंगिरा रूपिणी महाकालिका जब आप जागृत होती हैं तो घोर अट्ठाहस करते हुए, नृत्य करते हुए, महामद में चूर होकर युद्ध क्षेत्र को तत्पर होती हैं और आपके अंदर से असंख्य तरह के मुख धारण किए हुए अनेकों प्रत्यंगिराएं निकल पड़ती हैं। किसी का मुख उलूक के समान होता है, किसी का मुख सिंह के समान होता है, किसी का मुख व्याघ्र के समान होता है, किसी का मुख पक्षी के समान होता है, किसी का मुख वाराही के समान होता है, किसी का मुख ऊष्ट हथिनी के समान होता है, किसी का मुख चूहे के समान होता है इत्यादि-इत्यादि ये सबकी सब प्रत्यंगिराएं शत्रुओं के ऊपर टूट पड़ती हैं, उन्हें नोंचती है, उन्हें काटती हैं, उन्हें तोड़ती हैं, उन्हें मरोड़ती हैं, उनका रक्त पी लेती हैं, उनका मांस खा जाती हैं, उन्हें जला देती हैं, उन्हें अपने अट्ठाहस से डरा देती हैं, उन्हें जल में डुबो देती हैं, उन्हें पीटती हैं, उनका अंग-भंग करती हैं, उन्हें चीरती हैं, उन्हें दौड़ाती हैं, उनके टुकड़े-टुकड़े कर देती हैं, उन्हें निगल जाती हैं, उन्हें घेर लेती हैं, उन पर विष वमन करती हैं, उन्हें डस लेती हैं, उन्हें मूर्च्छित कर देती हैं, उन्हें विक्षप्त कर देती हैं, उन्हें हवा में उड़ा देती हैं, उन्हें पंजों में दबा लेती हैं, उनके शरीर में प्रविष्ट हो उन्हें भ्रमित करती हैं, उन्हें मोहित-स्तंभित जृम्भित करती हैं अर्थात जैसे हो सके वैसे उनका सर्वनाश कर देती हैं। उन्हें आंदोलित करती हैं, उन्हें प्रेरित करती हैं, उन्हें बाध्य करती हैं, उन्हें मरने के लिए मजबूर करती हैं, उन्हें क्रोध दिलाती हैं अर्थात उन्हें छोड़ती नहीं हैं अपितु उनका समूल नाश करती हैं।
भगवती की आँखें चढ़ गईं, दोनों नेत्र रक्त के समान लाल हो गये और वे शिव से बोली कि अब दो ही चीजें होगी, अब दो ही बातें होंगी या तो दक्ष के यज्ञ का ध्वंस होगा या वह आपके चरण पकड़कर क्षमा मांगेगा, आपके शरणागत होगा तीसरा कुछ नहीं होगा और इस प्रकार ब्रह्माण्ड में प्रथम बार शिव ने महा प्रत्यंगिरा का अविष्कार देखा, महाप्रत्यंगिरा का घोष देखा, महाप्रत्यंगिरा का महानाद सुना। शिव घबरा गये महा प्रत्यंगिरा के इस महाविकराल रूप को देखकर। मैं नहीं लौटूगी-मैं नहीं लौटूंगी-मैं नहीं लौटूगी बार-बार आदि महा - प्रत्यंगिरा उच्च स्वर में घोष कर रही थीं ।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
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ॐ कृष्णकायाम्बिकाय विद्महे पार्वती रूपाय धीमहि । तन्नो कालिका प्रचोदयात ॥ (३)
महाप्रत्यंगिरा महासंकल्प,महा-क्रिया-शक्ति, महाइच्छा शक्ति और महा-ज्ञान-शक्ति का अद्भुत सम्मिश्रण है कोई समझा नहीं सकता, कोई मना नहीं सकता, कोई रोक नहीं सकता, कोई कुछ नहीं कर सकता जो होना है सो होगा अतः इस प्रकार स्थिति शिव के काबू में भी नहीं रहती। बेकाबू, बेआबरु, बेपरवाह, बेधड़क यही हैं श्री महाप्रत्यंगिरा के लक्षण।
हे महाप्रत्यंगिरे तू बैखौफ है और अपने जातक को भी बेखौफ करती हैं। बेखौफ, बेकाबू, बेपरवाह के असीम सौन्दर्य को देख शिव बेलगाम हो इधर-उधर भागने लगे। बेलगाम शिव को भागते देख दसों दिशाओं में महाप्रत्यंगिरा ने लगाम लगा दी दस महाविद्याओं के रूप में । शिव को बेलगाम नहीं होने देतीं महाप्रत्यंगिरा, जो बेलगाम शिव पर लगाम लगा दे पशुओं की तरह वही हैं शिव-पशुधारिणी, शिव-पशु- पाशिनी अर्थात शिव जिसका पशु है, जिसके पाश में शिव-रूपी पशु पाश-युक्त है। पहले शिव को पाश-युक्त किया फिर चल पड़ी महाप्रत्यंगिरा दक्ष और उसके अनुयायियों को लगाम लगाने हेतु । जैसे ही भगवती योगाग्नि में आहूत हुई तीन मुखों वाली पूरी तरह नग्न श्री शत्रुध्वंसकारिणीं का प्राकट्य हो गया और बैठ गईं वे दक्ष के राज्य में दक्ष के कुल देवताओं, दक्ष के देवी-देवता, दक्ष के ऋषि-मुनि, दक्ष के मित्र, दक्ष के पिता ब्रह्मा, दक्ष की पत्नियाँ, बंधु-बांधव इत्यादि सब कुछ ध्वंस हो गये। भृगु ने कृत्या चलाई, हवन- कुण्ड से कृत्या-पुरुष उत्पन्न किए। क्या हुआ? हे कालिके, हे भद्रकालिके, हे महाप्रत्यंगिरे कृत्या का उत्पत्ति केन्द्र यज्ञ कुण्ड ही ध्वस्त हो गया। कृत्या उत्पन्न करने वाला भृगु दांत तुड़वा बैठा, कृत्या-पुरुषों का भक्षण प्रत्यंगिराएं कर गई।
शिव ने कहा था अपनी पीछे की जटा को तोड़कर कि जाओ, प्रत्यंगिराओं सबको खा जाना, जो मिले उसे खा जाना अत: प्रत्यंगिरायें हवन सामग्री खा गईं, हवन की अग्नि पी गईं, पूजा पाठ में बैठे ऋषियों को खा गईं, उनके अस्त्र-शस्त्रों को खा गई, उनकी पुस्तकों और किताबों को खा गईं, विष्णु का सुदर्शन चक्र कुन्द हो गया । हे प्रत्यंगिराओं आप ब्रह्माण्ड की परम प्रतिरोधक क्षमता हो एण्टी-बॉडीज हो अर्थात विरोध का प्रतिरोध। जिसमें जतनी प्रतिरोधक क्षमता होगी वही महामानव कहलायेगा, महापुरुष कहलायेगा। प्रत्यंगिरा अनुष्ठानम्, प्रत्यंगिरा साधना अति दिव्यतम प्रतिरोधक क्षमता देती है। सीधा लेट जा साधक, कहाँ पड़ा है किताबी ज्ञान के चक्कर में? एक ऊन का कंबल बिछा, सारे कपड़े उतारकर फेंक दे अपने शरीर से, दरवाजा बंद कर ले एवं मुर्दे की भांति दक्षिण की तरफ सिर करके लेट जा और शुरु कर महाषोढान्यास। सर्वप्रथम अपने पांव के नाखून से लेकर शिखा तक क्रीं क्रीं मंत्र का जाप करते हुए उस मंत्र को अपनी प्राण शक्ति के द्वारा सम्पूर्ण शरीर पर स्थापित करता जा। गुदा में भी क्रीं स्थापित कर, गोपनीय भाग पर भी क्रीं स्थापित कर। आँख, नाक, मुख, कान पर भी क्रीं स्थापित कर, सभी चक्रों पर क्रीं स्थापित कर, हृदय में भी क्रीं स्थापित कर, कण्ठ में भी क्रीं इत्यादि-इत्यादि बीस मिनट तक शरीर के सूक्ष्मातीत, आंतरिक, बाह्य अंगों में क्रीं स्थापित कर ले। रोम-रोम में क्रीं स्थापित कर, अणु-अणु में क्रीं स्थापित कर, रक्त की प्रत्येक बूंद में क्रीं स्थापित कर ।
यह गुरु मुख से प्राप्त ज्ञान है अतः ऐसा कर के 6 महीने हो जा सम्पूर्ण कालिकामय, सम्पूर्ण प्रत्यंगिरा मय। क्रीं को खा, क्रीं को सुन, क्रीं को पी, क्रीं को स्पर्श कर, क्रीं को देख, क्रीं क्रीं चिल्ला तब देख कैसे खड़ी नहीं होती प्रत्यंगिरा तेरे साथ। इस महाषोढान्यास के फलस्वरूप अगर हाथ कटेगा तो बिना औषधि के जुड़ जायेगा, रोग कहाँ बचेंगे तेरे शरीर में क्रीं रूपी परम औषधि, परम प्रतिरोधक क्षमता सबको लात मारकर बाहर फेंक देगी। मस्तिष्क में जितना कचरा है क्रीं खा जायेगी और तेरे व्यक्तित्व में वो चमक, वो नशा, वो सौन्दर्य, वो यौवन, वो सम्मोहन विकसित हो जायेगा कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। तू परम मदिरामय हो जायेगा, सिर से पांव तक मदिरा रस की जीवित जागृत मूर्ति बन जायेगा। कोई तेरी आँखों में देखेगा तो कह उठेगा कितना नशा है इन आँखों में मैं मदहोश हुआ जा रहा हूँ, कोई तेरी तस्वीर देखेगा तो उसका मस्तिष्क तेरे मद में मदान्ध हो जायेगा और वो तेरा हो जायेगा, तू जिसे छू देगा वह तेरे मद में मतवाला हो जायेगा। तू जहाँ बैठ जायेगा वह स्थान मदयुक्त हो जायेगा।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
महाप्रत्यंगिरा महासंकल्प,महा-क्रिया-शक्ति, महाइच्छा शक्ति और महा-ज्ञान-शक्ति का अद्भुत सम्मिश्रण है कोई समझा नहीं सकता, कोई मना नहीं सकता, कोई रोक नहीं सकता, कोई कुछ नहीं कर सकता जो होना है सो होगा अतः इस प्रकार स्थिति शिव के काबू में भी नहीं रहती। बेकाबू, बेआबरु, बेपरवाह, बेधड़क यही हैं श्री महाप्रत्यंगिरा के लक्षण।
हे महाप्रत्यंगिरे तू बैखौफ है और अपने जातक को भी बेखौफ करती हैं। बेखौफ, बेकाबू, बेपरवाह के असीम सौन्दर्य को देख शिव बेलगाम हो इधर-उधर भागने लगे। बेलगाम शिव को भागते देख दसों दिशाओं में महाप्रत्यंगिरा ने लगाम लगा दी दस महाविद्याओं के रूप में । शिव को बेलगाम नहीं होने देतीं महाप्रत्यंगिरा, जो बेलगाम शिव पर लगाम लगा दे पशुओं की तरह वही हैं शिव-पशुधारिणी, शिव-पशु- पाशिनी अर्थात शिव जिसका पशु है, जिसके पाश में शिव-रूपी पशु पाश-युक्त है। पहले शिव को पाश-युक्त किया फिर चल पड़ी महाप्रत्यंगिरा दक्ष और उसके अनुयायियों को लगाम लगाने हेतु । जैसे ही भगवती योगाग्नि में आहूत हुई तीन मुखों वाली पूरी तरह नग्न श्री शत्रुध्वंसकारिणीं का प्राकट्य हो गया और बैठ गईं वे दक्ष के राज्य में दक्ष के कुल देवताओं, दक्ष के देवी-देवता, दक्ष के ऋषि-मुनि, दक्ष के मित्र, दक्ष के पिता ब्रह्मा, दक्ष की पत्नियाँ, बंधु-बांधव इत्यादि सब कुछ ध्वंस हो गये। भृगु ने कृत्या चलाई, हवन- कुण्ड से कृत्या-पुरुष उत्पन्न किए। क्या हुआ? हे कालिके, हे भद्रकालिके, हे महाप्रत्यंगिरे कृत्या का उत्पत्ति केन्द्र यज्ञ कुण्ड ही ध्वस्त हो गया। कृत्या उत्पन्न करने वाला भृगु दांत तुड़वा बैठा, कृत्या-पुरुषों का भक्षण प्रत्यंगिराएं कर गई।
शिव ने कहा था अपनी पीछे की जटा को तोड़कर कि जाओ, प्रत्यंगिराओं सबको खा जाना, जो मिले उसे खा जाना अत: प्रत्यंगिरायें हवन सामग्री खा गईं, हवन की अग्नि पी गईं, पूजा पाठ में बैठे ऋषियों को खा गईं, उनके अस्त्र-शस्त्रों को खा गई, उनकी पुस्तकों और किताबों को खा गईं, विष्णु का सुदर्शन चक्र कुन्द हो गया । हे प्रत्यंगिराओं आप ब्रह्माण्ड की परम प्रतिरोधक क्षमता हो एण्टी-बॉडीज हो अर्थात विरोध का प्रतिरोध। जिसमें जतनी प्रतिरोधक क्षमता होगी वही महामानव कहलायेगा, महापुरुष कहलायेगा। प्रत्यंगिरा अनुष्ठानम्, प्रत्यंगिरा साधना अति दिव्यतम प्रतिरोधक क्षमता देती है। सीधा लेट जा साधक, कहाँ पड़ा है किताबी ज्ञान के चक्कर में? एक ऊन का कंबल बिछा, सारे कपड़े उतारकर फेंक दे अपने शरीर से, दरवाजा बंद कर ले एवं मुर्दे की भांति दक्षिण की तरफ सिर करके लेट जा और शुरु कर महाषोढान्यास। सर्वप्रथम अपने पांव के नाखून से लेकर शिखा तक क्रीं क्रीं मंत्र का जाप करते हुए उस मंत्र को अपनी प्राण शक्ति के द्वारा सम्पूर्ण शरीर पर स्थापित करता जा। गुदा में भी क्रीं स्थापित कर, गोपनीय भाग पर भी क्रीं स्थापित कर। आँख, नाक, मुख, कान पर भी क्रीं स्थापित कर, सभी चक्रों पर क्रीं स्थापित कर, हृदय में भी क्रीं स्थापित कर, कण्ठ में भी क्रीं इत्यादि-इत्यादि बीस मिनट तक शरीर के सूक्ष्मातीत, आंतरिक, बाह्य अंगों में क्रीं स्थापित कर ले। रोम-रोम में क्रीं स्थापित कर, अणु-अणु में क्रीं स्थापित कर, रक्त की प्रत्येक बूंद में क्रीं स्थापित कर ।
यह गुरु मुख से प्राप्त ज्ञान है अतः ऐसा कर के 6 महीने हो जा सम्पूर्ण कालिकामय, सम्पूर्ण प्रत्यंगिरा मय। क्रीं को खा, क्रीं को सुन, क्रीं को पी, क्रीं को स्पर्श कर, क्रीं को देख, क्रीं क्रीं चिल्ला तब देख कैसे खड़ी नहीं होती प्रत्यंगिरा तेरे साथ। इस महाषोढान्यास के फलस्वरूप अगर हाथ कटेगा तो बिना औषधि के जुड़ जायेगा, रोग कहाँ बचेंगे तेरे शरीर में क्रीं रूपी परम औषधि, परम प्रतिरोधक क्षमता सबको लात मारकर बाहर फेंक देगी। मस्तिष्क में जितना कचरा है क्रीं खा जायेगी और तेरे व्यक्तित्व में वो चमक, वो नशा, वो सौन्दर्य, वो यौवन, वो सम्मोहन विकसित हो जायेगा कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। तू परम मदिरामय हो जायेगा, सिर से पांव तक मदिरा रस की जीवित जागृत मूर्ति बन जायेगा। कोई तेरी आँखों में देखेगा तो कह उठेगा कितना नशा है इन आँखों में मैं मदहोश हुआ जा रहा हूँ, कोई तेरी तस्वीर देखेगा तो उसका मस्तिष्क तेरे मद में मदान्ध हो जायेगा और वो तेरा हो जायेगा, तू जिसे छू देगा वह तेरे मद में मतवाला हो जायेगा। तू जहाँ बैठ जायेगा वह स्थान मदयुक्त हो जायेगा।
(क्रमशः)
🙏 @Sanatan
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ॐ कृष्णकायाम्बिकाय विद्महे पार्वती रूपाय धीमहि । तन्नो कालिका प्रचोदयात ॥ (४)
सबको मद चाहिए, सबको महामदिरा चाहिए अतः पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, देवगण, ऋषि-गण इत्यादि सभी तेरे महाकालिका रूपी मद को प्राप्त करने के लिए लालायित हो उठेंगे और बदले में जो चाहो खो देने को तैयार होंगे एवं यहीं हैं सोम रहस्यम् । आज वैज्ञानिक सोम की खोज कर रहे हैं, उस दिव्य औषधि को खोज रहे हैं जिससे कि सोम रस बनाया जा सके। प्राचीन काल में सोमलता के अभाव में यज्ञाहुति पूर्ण नहीं मानी जाती थी क्योंकि देवताओं को चाहे अन्न की आहुति दो, घी की आहुति दो, गुड़ की आहुति दो या मांस- रुधिर इत्यादि की आहुति दो उन्हें सबसे ज्यादा प्रसन्न सोमाहुति ही करती है। इन्द्र तो सोमरस का दीवाना है, सोमपान करने के लिए तो इन्द्र यज्ञ में अवश्य आता है। सोम की तलाश मनुष्यों को ही नहीं है अपितु सूर्य-चंद्र इत्यादि नौ ग्रहों से लेकर ऋषि-मुनि, देवता, असुर, यक्ष, किन्नर, अप्सरा सभी सोम रस के दीवाने हैं और सोम की मल्लिका हैं श्री श्री महाकालिका, श्री श्री महाप्रत्यंगिरा। वे नित्य सोम रस का पान करती रहती हैं, उन्हें ही सोम हस्तगत है, काली का खप्पर सदैव सोमरस से भरा रहता है। जब हे कालिका आप अपने भक्त पर कृपावान होती हो तो उसे सोम रस प्रदान करती हो जिसे वह छककर वही महामानव कहलायेगा, महापुरुष कहलायेगा।
हे दीर्घ-स्तना तेरे अति सुगठित विशाल स्तनों से सोमरस ही उत्सर्जित होता है तुम प्रत्यंगिरा बन सभी दिशाओं से शिव को कवचित किए रहती हो इस प्रकार शिव जन्म-मृत्यु, काल-अकाल, लोक-लोकादि, कर्म, कृत्य-अकृत्य, धर्म अधर्म इत्यादि सभी स्थितियों के चक्रों से सर्वथा अनभिज्ञ रहते हैं तब जाकर वह हे महाबिन्दु-निवासिनी तेरे परम सोम-बिन्दु में परम विलास को प्राप्त होते हैं। सोमानंदाय नमो नमः, सोम-रूपिण्यै नमो नमः, सोम प्रियायै नमो नमः, सोम दात्री नमो नमः । शिव+सोम= शिवोऽहम् । बेखौफ, बेलगाम, बेनाम, बेकाम, बेचिंता, बेध्यान, बेज्ञान, बेयोग, बेरोग, बेभोग प्रदान करता है सोम । मस्तिष्क को नशा मुक्त करता है, मस्तिष्क को स्वतंत्र करता है, मस्तिष्क को प्रवृत्ति-विहीन करता है, मस्तिष्क को लिंग विहीन करता है, मस्तिष्क को अस्तित्व विहीन करता है सोम। क्या कहूं? इसके बारे में। देखो विष्णु को लोग कहते हैं कि वह महामाया के आगोश में है परन्तु मैं कहता हूँ कि कालिका ने उसे सोम रस में डुबो दिया है, वह सोम पान करके लेटे हुए है। हे कालिका तू सर्व रक्षिणी है, हे निद्रा की देवी जब हम प्रगाढ़ निद्रा में होते हैं तब हम सब कुछ भूल जाते हैं प्रतिदिन करोड़ों मनुष्य, असंख्य देवी देवता, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे सभी सोते हैं परन्तु इस अद्भुत निद्रावस्था में कौन हमारी रक्षा करता है ? वह सिर्फ आप ही हैं प्रत्यंगिरा जो निद्रा में भी हमारी रक्षा करती है अन्यथा चारों तरफ गोचर, अगोचर, छदम शत्रुओं की भरमार है फिर भी आप हमारी निद्रा को सफल बनाती हैं, हमारी रक्षा करती हैं। 99 प्रतिशत मृत्यु जागृत अवस्था में होती है, जागृत हिरण को सिंह खाता है न कि सोते हुए हिरण को । शिकार और शिकारी दोनों जागृत अवस्था में होते हैं। मृत्यु से पूर्व जिसकी मृत्यु होने वाली होती है वह जग जाता है, उसकी समस्त इन्द्रियाँ एक बार पुनः भले ही कुछ क्षणों के लिए जागृत हो जायें पर जागृत हो जाती हैं। प्रत्यंगिरा सभी के साथ चलती हैं, सभी में प्रतिरोध करने की कुछ न कुछ मात्रा में नै:सर्गिक शक्ति होती है।
शिव शासनत: शिव शासनत:
क्षमस्व परमेश्वरी
🙏 @Sanatan
सबको मद चाहिए, सबको महामदिरा चाहिए अतः पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, देवगण, ऋषि-गण इत्यादि सभी तेरे महाकालिका रूपी मद को प्राप्त करने के लिए लालायित हो उठेंगे और बदले में जो चाहो खो देने को तैयार होंगे एवं यहीं हैं सोम रहस्यम् । आज वैज्ञानिक सोम की खोज कर रहे हैं, उस दिव्य औषधि को खोज रहे हैं जिससे कि सोम रस बनाया जा सके। प्राचीन काल में सोमलता के अभाव में यज्ञाहुति पूर्ण नहीं मानी जाती थी क्योंकि देवताओं को चाहे अन्न की आहुति दो, घी की आहुति दो, गुड़ की आहुति दो या मांस- रुधिर इत्यादि की आहुति दो उन्हें सबसे ज्यादा प्रसन्न सोमाहुति ही करती है। इन्द्र तो सोमरस का दीवाना है, सोमपान करने के लिए तो इन्द्र यज्ञ में अवश्य आता है। सोम की तलाश मनुष्यों को ही नहीं है अपितु सूर्य-चंद्र इत्यादि नौ ग्रहों से लेकर ऋषि-मुनि, देवता, असुर, यक्ष, किन्नर, अप्सरा सभी सोम रस के दीवाने हैं और सोम की मल्लिका हैं श्री श्री महाकालिका, श्री श्री महाप्रत्यंगिरा। वे नित्य सोम रस का पान करती रहती हैं, उन्हें ही सोम हस्तगत है, काली का खप्पर सदैव सोमरस से भरा रहता है। जब हे कालिका आप अपने भक्त पर कृपावान होती हो तो उसे सोम रस प्रदान करती हो जिसे वह छककर वही महामानव कहलायेगा, महापुरुष कहलायेगा।
हे दीर्घ-स्तना तेरे अति सुगठित विशाल स्तनों से सोमरस ही उत्सर्जित होता है तुम प्रत्यंगिरा बन सभी दिशाओं से शिव को कवचित किए रहती हो इस प्रकार शिव जन्म-मृत्यु, काल-अकाल, लोक-लोकादि, कर्म, कृत्य-अकृत्य, धर्म अधर्म इत्यादि सभी स्थितियों के चक्रों से सर्वथा अनभिज्ञ रहते हैं तब जाकर वह हे महाबिन्दु-निवासिनी तेरे परम सोम-बिन्दु में परम विलास को प्राप्त होते हैं। सोमानंदाय नमो नमः, सोम-रूपिण्यै नमो नमः, सोम प्रियायै नमो नमः, सोम दात्री नमो नमः । शिव+सोम= शिवोऽहम् । बेखौफ, बेलगाम, बेनाम, बेकाम, बेचिंता, बेध्यान, बेज्ञान, बेयोग, बेरोग, बेभोग प्रदान करता है सोम । मस्तिष्क को नशा मुक्त करता है, मस्तिष्क को स्वतंत्र करता है, मस्तिष्क को प्रवृत्ति-विहीन करता है, मस्तिष्क को लिंग विहीन करता है, मस्तिष्क को अस्तित्व विहीन करता है सोम। क्या कहूं? इसके बारे में। देखो विष्णु को लोग कहते हैं कि वह महामाया के आगोश में है परन्तु मैं कहता हूँ कि कालिका ने उसे सोम रस में डुबो दिया है, वह सोम पान करके लेटे हुए है। हे कालिका तू सर्व रक्षिणी है, हे निद्रा की देवी जब हम प्रगाढ़ निद्रा में होते हैं तब हम सब कुछ भूल जाते हैं प्रतिदिन करोड़ों मनुष्य, असंख्य देवी देवता, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे सभी सोते हैं परन्तु इस अद्भुत निद्रावस्था में कौन हमारी रक्षा करता है ? वह सिर्फ आप ही हैं प्रत्यंगिरा जो निद्रा में भी हमारी रक्षा करती है अन्यथा चारों तरफ गोचर, अगोचर, छदम शत्रुओं की भरमार है फिर भी आप हमारी निद्रा को सफल बनाती हैं, हमारी रक्षा करती हैं। 99 प्रतिशत मृत्यु जागृत अवस्था में होती है, जागृत हिरण को सिंह खाता है न कि सोते हुए हिरण को । शिकार और शिकारी दोनों जागृत अवस्था में होते हैं। मृत्यु से पूर्व जिसकी मृत्यु होने वाली होती है वह जग जाता है, उसकी समस्त इन्द्रियाँ एक बार पुनः भले ही कुछ क्षणों के लिए जागृत हो जायें पर जागृत हो जाती हैं। प्रत्यंगिरा सभी के साथ चलती हैं, सभी में प्रतिरोध करने की कुछ न कुछ मात्रा में नै:सर्गिक शक्ति होती है।
शिव शासनत: शिव शासनत:
क्षमस्व परमेश्वरी
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॥ क्रीं ह्रीं ह्रीं दक्षिणकालिकेस्वाहा ॥
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महाकाली नाचे जा रही है, वह परम कामरता हैं, उनमें काम तत्व बहुत है, उन्होंने ही इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की है, इस सृष्टि में सब कुछ उन्हीं से निकला है, वही इस सृष्टि की सृजनकर्ता है। उन्होंने ही बुद्ध को बनाया था, उन्होंने ही राम को बनाया था, उन्होंने ही कृष्ण को बनाया था, उन्हें अभी इससे भी बेहतर कुछ और बनाना है। राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध सभी आ गये लेकिन वह तृप्त नहीं हुई, चाहे वह कितनी भी अच्छी रचना क्यों न बना ले पर वह कभी तृप्त नहीं होती हैं, वह निरंतर नयी नयी रचनाएं रचती चली जा रही हैं, उनकी अतृति का कोई अंत नहीं है। जिस रचना को एक बार बना दिया फिर वह उस मॉडल को पुनः दुबारा नहीं रचती हैं वह न दुबारा राम को रचती है, न वह दुबारा कृष्ण को रचती है, किसी चीज को दुबारा नहीं रचती हैं जिनमें मौलिकता की कमी होती है, जो ओरिजनल नहीं हैं, जो मौलिक नहीं है वही लोग एक ही क्रिया को बार-बार दोहराते रहते हैं।
एक गीतकार कोई बहुत अच्छा गीत लिख देता है फिर लोग उसी गीत को अपने हिसाब से, उसमें नई नई कड़ियाँ जोड़कर गाये चले जाते हैं, एक चित्रकार बहुत सुन्दर चित्र बना लेता है फिर कुछ लोग वैसा ही चित्र अपने हिसाब से बनाकर उसकी नकल करने लगते हैं उसी प्रकार आप लोग भी अपनी पुरानी, घिसी- पिटी दिनचर्या में उसी पुरानी जीवन शैली में जिये चले जा रहे हो, जिन्दगी भर आप वही क्रियायें जन्म से लेकर अंत समय तक दोहराते रहते हो लेकिन काली अद्भुत है इस पृथ्वी पर आज तक न जाने कितने अरबों-खरबों लोग जमीन पर पैदा हुए है और निरंतर पैदा हो रहे है। पर उनमे से किसी की भी रचना में रिपीटेशन नहीं हुआ है क्योंकि उनकी रचना बड़ी ही सृजनात्मक एंव भौतिक है, वह प्रतिपत्त नित्य नए-नए जीव को पैदा करती है, वह यहां से बूढ़े को विदा कर देती है, बच्चों को खड़ा कर देती है एवं वह बुजुर्गों से कहती हैं अब आप लोग पीछे हट जाइए, अब आप बहुत पुराने हो गए है, अब आप मंच के पीछे आ जाइए और नए बच्चो को मंच पर सामने लाकर खड़ा कर देती है। वह जानती है बूढ़े में जिंदगी भर का अनुभव होता है वह अनुभव जो उसने अपने ज्ञान से अर्जित किया है फिर भी वह उसे विदा कर देती है, उसकी जगह वह एक अंजान अपरिचित को खड़ा कर देती है जिस पर बिलकुल भरोसा नहीं किया जा सकता। यह क्या करेगा क्या नहीं करेगा, इसका चाल चलन कैसा होगा, यह चोर होगा, बेईमान होगा, साधु संयासी होगा, इसका कुछ भी अता पता नहीं फिर भी वह एक नए को पुराने के सामने लाकर खड़ा कर देती है। काली कहती है, अब तुम पुराने हो गए हो, अब तुम हट जाओ नए में जीवन है, पुराने में मृत्यु है, जो पुराना है वह अब मरने के करीब पहुँच गया है। जो नया है जियेगा, फलेगा-फूलेगा और आगे बढ़ेगा, जो लोग जीवन के विरोध में है मैं उन्हें धार्मिक नहीं कहता इसी शिक्षा के कारण आज हमारी पृथ्वी धार्मिक नहीं हो पाई।
जीवन को छोड़ना असम्भव है, कोई भी जीवन छोड़ना नहीं चाहता, सभी को जीवन से अत्यंत प्रेम होता है, हर माता पिता अपने बच्चों के लिए चिंतित रहते हैं, उसी प्रकार एक गुरू भी अपने शिष्यो के लिए बहुत ज्यादा चिंतित रहता है। जीवन नई-नई शक्लों में हमारे सामने आता है, जिंदगी से कोई भाग नहीं सकता, हम जहाँ भी जाएगें यहां जिंदगी को पास में पाएगें, हर जगह जीवन है हम रूप बदल सकते हैं, सूरत शक्ल बदल सकते हैं, द्वार बदल सकते हैं।
काली कहती हैं आनन्दपूर्ण रहो, सदा आनन्दमय रहो, तुम अपने आप से भागोमत बल्कि तुम हालात का डटकर मुकाबला करो तुम्हे अवश्य सफलता मिलेगी। इससे क्या फर्क पड़ता है कि तुम किस मकान में रहते हो, तुम क्या खाते हो, इससे क्या फर्क पड़ता है। इससे आपके अंदर एक प्रकार की हिप्पोक्रेसी पैदा होती है, आपके अंदर एक प्रकार का पाखण्ड झूठा दिखावा पैदा होता है हम सदा दूसरे की नकल करते रहते है उसने मकान लिया तो हम भी उससे अच्छा मकान लेंगे, उस औरत ने एक मंहगी साड़ी ली है मैं भी वैसी ही साड़ी लूंगी बस दूसरों से होड़ करने में लगे रहते हैं अगर हम जिंदगी को सीधे-साधे ढंग से स्वीकार कर लें तब हमें किसी प्रकार का कोई झूठा पाखण्ड नहीं करना पड़ेगा, न ही हमें किसी प्रकार की कोई बेईमानी खोजनी पड़ेगी, न झूठा दिखावा करना पड़ेगा। मैंने अपने जीवन में ऐसे बहुत से सन्यासी वस्त्र धारण किए हुए व्यक्ति देखे हैं वह अपने पास पैसा नहीं रखते, वह अपने साथ एक आदमी को रखते हैं जो पैसा रखता है वह लोग कहते हैं मैंने पैसे का बंधन छोड़ दिया है इसलिए अब मैं पैसों को अपने पास नहीं रखता हूँ, अब मैं पैसों को हाथ भी नहीं लगाता हूँ। जो व्यक्ति उनके साथ में चलता है वही उनके सारे लेन-देन है, वही आटो टेक्सी का लेन-देन करता है,
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(क्रमशः)
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महाकाली नाचे जा रही है, वह परम कामरता हैं, उनमें काम तत्व बहुत है, उन्होंने ही इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की है, इस सृष्टि में सब कुछ उन्हीं से निकला है, वही इस सृष्टि की सृजनकर्ता है। उन्होंने ही बुद्ध को बनाया था, उन्होंने ही राम को बनाया था, उन्होंने ही कृष्ण को बनाया था, उन्हें अभी इससे भी बेहतर कुछ और बनाना है। राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध सभी आ गये लेकिन वह तृप्त नहीं हुई, चाहे वह कितनी भी अच्छी रचना क्यों न बना ले पर वह कभी तृप्त नहीं होती हैं, वह निरंतर नयी नयी रचनाएं रचती चली जा रही हैं, उनकी अतृति का कोई अंत नहीं है। जिस रचना को एक बार बना दिया फिर वह उस मॉडल को पुनः दुबारा नहीं रचती हैं वह न दुबारा राम को रचती है, न वह दुबारा कृष्ण को रचती है, किसी चीज को दुबारा नहीं रचती हैं जिनमें मौलिकता की कमी होती है, जो ओरिजनल नहीं हैं, जो मौलिक नहीं है वही लोग एक ही क्रिया को बार-बार दोहराते रहते हैं।
एक गीतकार कोई बहुत अच्छा गीत लिख देता है फिर लोग उसी गीत को अपने हिसाब से, उसमें नई नई कड़ियाँ जोड़कर गाये चले जाते हैं, एक चित्रकार बहुत सुन्दर चित्र बना लेता है फिर कुछ लोग वैसा ही चित्र अपने हिसाब से बनाकर उसकी नकल करने लगते हैं उसी प्रकार आप लोग भी अपनी पुरानी, घिसी- पिटी दिनचर्या में उसी पुरानी जीवन शैली में जिये चले जा रहे हो, जिन्दगी भर आप वही क्रियायें जन्म से लेकर अंत समय तक दोहराते रहते हो लेकिन काली अद्भुत है इस पृथ्वी पर आज तक न जाने कितने अरबों-खरबों लोग जमीन पर पैदा हुए है और निरंतर पैदा हो रहे है। पर उनमे से किसी की भी रचना में रिपीटेशन नहीं हुआ है क्योंकि उनकी रचना बड़ी ही सृजनात्मक एंव भौतिक है, वह प्रतिपत्त नित्य नए-नए जीव को पैदा करती है, वह यहां से बूढ़े को विदा कर देती है, बच्चों को खड़ा कर देती है एवं वह बुजुर्गों से कहती हैं अब आप लोग पीछे हट जाइए, अब आप बहुत पुराने हो गए है, अब आप मंच के पीछे आ जाइए और नए बच्चो को मंच पर सामने लाकर खड़ा कर देती है। वह जानती है बूढ़े में जिंदगी भर का अनुभव होता है वह अनुभव जो उसने अपने ज्ञान से अर्जित किया है फिर भी वह उसे विदा कर देती है, उसकी जगह वह एक अंजान अपरिचित को खड़ा कर देती है जिस पर बिलकुल भरोसा नहीं किया जा सकता। यह क्या करेगा क्या नहीं करेगा, इसका चाल चलन कैसा होगा, यह चोर होगा, बेईमान होगा, साधु संयासी होगा, इसका कुछ भी अता पता नहीं फिर भी वह एक नए को पुराने के सामने लाकर खड़ा कर देती है। काली कहती है, अब तुम पुराने हो गए हो, अब तुम हट जाओ नए में जीवन है, पुराने में मृत्यु है, जो पुराना है वह अब मरने के करीब पहुँच गया है। जो नया है जियेगा, फलेगा-फूलेगा और आगे बढ़ेगा, जो लोग जीवन के विरोध में है मैं उन्हें धार्मिक नहीं कहता इसी शिक्षा के कारण आज हमारी पृथ्वी धार्मिक नहीं हो पाई।
जीवन को छोड़ना असम्भव है, कोई भी जीवन छोड़ना नहीं चाहता, सभी को जीवन से अत्यंत प्रेम होता है, हर माता पिता अपने बच्चों के लिए चिंतित रहते हैं, उसी प्रकार एक गुरू भी अपने शिष्यो के लिए बहुत ज्यादा चिंतित रहता है। जीवन नई-नई शक्लों में हमारे सामने आता है, जिंदगी से कोई भाग नहीं सकता, हम जहाँ भी जाएगें यहां जिंदगी को पास में पाएगें, हर जगह जीवन है हम रूप बदल सकते हैं, सूरत शक्ल बदल सकते हैं, द्वार बदल सकते हैं।
काली कहती हैं आनन्दपूर्ण रहो, सदा आनन्दमय रहो, तुम अपने आप से भागोमत बल्कि तुम हालात का डटकर मुकाबला करो तुम्हे अवश्य सफलता मिलेगी। इससे क्या फर्क पड़ता है कि तुम किस मकान में रहते हो, तुम क्या खाते हो, इससे क्या फर्क पड़ता है। इससे आपके अंदर एक प्रकार की हिप्पोक्रेसी पैदा होती है, आपके अंदर एक प्रकार का पाखण्ड झूठा दिखावा पैदा होता है हम सदा दूसरे की नकल करते रहते है उसने मकान लिया तो हम भी उससे अच्छा मकान लेंगे, उस औरत ने एक मंहगी साड़ी ली है मैं भी वैसी ही साड़ी लूंगी बस दूसरों से होड़ करने में लगे रहते हैं अगर हम जिंदगी को सीधे-साधे ढंग से स्वीकार कर लें तब हमें किसी प्रकार का कोई झूठा पाखण्ड नहीं करना पड़ेगा, न ही हमें किसी प्रकार की कोई बेईमानी खोजनी पड़ेगी, न झूठा दिखावा करना पड़ेगा। मैंने अपने जीवन में ऐसे बहुत से सन्यासी वस्त्र धारण किए हुए व्यक्ति देखे हैं वह अपने पास पैसा नहीं रखते, वह अपने साथ एक आदमी को रखते हैं जो पैसा रखता है वह लोग कहते हैं मैंने पैसे का बंधन छोड़ दिया है इसलिए अब मैं पैसों को अपने पास नहीं रखता हूँ, अब मैं पैसों को हाथ भी नहीं लगाता हूँ। जो व्यक्ति उनके साथ में चलता है वही उनके सारे लेन-देन है, वही आटो टेक्सी का लेन-देन करता है,
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॥ क्रीं ह्रीं ह्रीं दक्षिणकालिकेस्वाहा ॥ (२)
वही होटल में रुकने की व्यवस्था करता है, जितने भी प्रकार के हिसाब किताब है वही देखता है। यह भी एक प्रकार का उपद्रव है कहीं भी जाओ तो एक व्यक्ति पैसा रखने के लिए साथ में होना चाहिये क्योंकि वह तो पैसा छूते नहीं है यह सब एक प्रकार का झूठा दिखावा है, यह सब एक पाखण्ड है, अगर आप किसी भी आटो या टेक्सी, बस, रेल इत्यादि में बैठेंगे तो आपको पैसा तो देना ही पड़ेगा। अब वह पैसा चाहे आपकी जेब में रखा हो या आपके साथी की जेब में इससे क्या फर्क पड़ता है।
जिंदगी से भागने का परिणाम पाखण्ड है मैं देखत हूँ चारों तरफ एक नंगा पाखण्डं खड़ा हो गया है जिन्दगी से भागोगे कैसे वह तो चारों तरफ है अगर आप कमायेंगे नहीं तो आपको भीख मांगनी पड़ेगी, भीख मांगने का मतलब है हमारे लिए कोई ओर कमायेगा, हम किसी और पर निर्भर रहेंगे। लोग पैसा कमाने को पाप कहते हैं वहीं लोग दूसरे की कमाई को लेने और उसे खर्च करने को पाप नहीं समझते हैं यह तो सिर्फ एक प्रकार की लीगल कानूनी तरकीबें हैं। जिन्दगी से पलायन करना ठीक नहीं है आप जहाँ भी जायेंगे वहाँ पर जिन्दगी को हाथ जोड़कर सामने खड़ा पायेंगे, वह कहेगी आइये यहाँ पर आपका स्वागत है, आप भी जिंदगी है, मैं भी एक जिंदगी हूं, हम सब एक जिंदगी है अगर आप सबसे भाग भी गये तो अपने आप से कैसे भागोगे ? लोगों ने अध्यात्म के क्षेत्र में भी कई तरकीबें निकाल रखी हैं, लोग ऐसी बेवकूफी करते हैं जिसे सोचकर मुझे बड़ी हैरानी होती हैं। जिन्दगी से भागो मत, जिन्दगी को देखे, उसे समझे आपके अंदर जीवन को देखने का इकहरा मापदण्ड होना चाहिए जो जीवन को ठीक से देखता है, वह इकहरा मापदण्ड बनाता है। आप अपने को जिस तराजू में तोलते है दूसरे को भी उसी तराजू में तोले, किसी से भेदभाव मत रखो जो व्यवहार आप अपने लिए पसंद नहीं वह आप दूसरे के साथ भी मत करो। जो व्यक्ति एक तराजू बनायेगा वह अपने आप में बहुत करुणावान हो जायेगा फिर वह कभी कठोर नहीं रह सकता, जो लोग दो तराजू बनाते हैं वह बहुत कठोर हो जाते हैं, दूसरों को वह बिल्कुल पापी समझते हैं वह कहेंगे यह बहुत दुष्ट है, इसे तो नर्क में डाल देना चाहिये वह कहेगा इसे अदालत में घसीटो, बड़ी से बड़ी सजा दो, इसको तो फाँसी पर लटका दो।
प्राचीन काल से ही हमारा इतिहास दोहरे मापदण्ड का काल है इसलिए मनुष्य नैतिक नहीं हो पाया क्योंकि नैतिकता का मूल बिन्दु करुणा है जब किसी व्यक्ति में कम्पेशन अर्थात करुणा पैदा नहीं होती तो वह व्यक्ति बहुत कठोर हो जाता है हम कठोर व्यक्ति को नैतिक कहते हैं। आपको अगर जिन्दगी खोजनी है तो पहले अपने घर जाओ आपका घर कहाँ है? जहाँ से आप आये हो वही आपका घर है, वहीं से जीवन के आनंद की यात्रा शुरु होती है। जीवन की यात्रा काली से ही शुरु होती है क्योंकि अध्यात्म की प्रथमा काली ही हैं वही जीवन का द्वार है, वही पराम्बा है, उन्हीं से जीवन शुरु होता है, उन्हीं पर जीवन का अंत होता है। महाकाली रहस्य को आप जीवन के आनंद के बिना समझ नहीं सकते जब महाकाली की कृपा होती है तब जातक के जीवन में आनंदमय कोष जागृत हो जाता है, महाकाली की कृपा से ही आनंदमय कोष जागृत होता है तब आपका जीवन धीरे-धीरे आगे बढ़ेगा, चारों ओर उसका प्रकाश फैलेगा यह पहाड़, वृक्ष, चाँद तारे आपमे समा जायेंगे, सारे लोग आपमे समा जायेंगे, सारा ब्रह्माण्ड आपमे समा जायेगा, आपकी चेतना जितनी फैलती जायेगी उतने बड़े आनंद को, उतने ही बड़े जीवन को आप उपलब्ध होते चले जाओगे फिर आपकी आँखों में आनंद होगा, आपके जीवन में सौन्दर्य होगा, आपके जीवन में सत्य होगा, आपके जीवन में संगीत होगा, आपके जीवन में रस होगा, आपकी आँखों में पराम्बा होगी इसी को मैं जिन्दगी कहता हूँ।
मनुष्य ने अपने जीवन में चाहे कितने भी पाप क्यों न किये हों काली सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करने से ब्रह्म की प्राप्ति होती हैं, धन धान्य की विपुलता रहती है, वहाँ पर सर्वदा मंगल होता है महामारी, राज्यभय, चोरभय, अग्निभय, सभी भयों से वह मुक्त हो जाता है इससे अति घोर व्याधियाँ समाप्त हो जाती हैं, इससे शत्रुओं के संकट का निवारण होता है इसके पाठ मात्र से साधक को इष्ट सिद्धि प्राप्त होती है। राम ने भी काली के सहस्त्र नाम स्तोत्र का पाठ किया और उनका पूजन किया, सभी साधकों को इस सहस्त्र स्त्रोत का पाठ करना चाहिये जो। इसका पाठ करने से जीवन में परम तत्व की प्राप्ति होती है, इसका पाठ करने वाले साधक को अतुल लक्ष्मी, अद्भुत पराक्रम की प्राप्ति होती है उसके शरीर से सभी प्रकार के रोग एवं समस्त प्रकार की व्याधियाँ साधक को गुप्त धन एवं गुप्त ज्ञान की प्राप्ति होती है।
काली के विभिन्न नामों में उन्हें कामा भी कहा गया है, उन्हें काम तत्परा भी कहा गया है, उन्हें कामाचार वर्धिनी भी कहा गया है।
(क्रमशः)
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वही होटल में रुकने की व्यवस्था करता है, जितने भी प्रकार के हिसाब किताब है वही देखता है। यह भी एक प्रकार का उपद्रव है कहीं भी जाओ तो एक व्यक्ति पैसा रखने के लिए साथ में होना चाहिये क्योंकि वह तो पैसा छूते नहीं है यह सब एक प्रकार का झूठा दिखावा है, यह सब एक पाखण्ड है, अगर आप किसी भी आटो या टेक्सी, बस, रेल इत्यादि में बैठेंगे तो आपको पैसा तो देना ही पड़ेगा। अब वह पैसा चाहे आपकी जेब में रखा हो या आपके साथी की जेब में इससे क्या फर्क पड़ता है।
जिंदगी से भागने का परिणाम पाखण्ड है मैं देखत हूँ चारों तरफ एक नंगा पाखण्डं खड़ा हो गया है जिन्दगी से भागोगे कैसे वह तो चारों तरफ है अगर आप कमायेंगे नहीं तो आपको भीख मांगनी पड़ेगी, भीख मांगने का मतलब है हमारे लिए कोई ओर कमायेगा, हम किसी और पर निर्भर रहेंगे। लोग पैसा कमाने को पाप कहते हैं वहीं लोग दूसरे की कमाई को लेने और उसे खर्च करने को पाप नहीं समझते हैं यह तो सिर्फ एक प्रकार की लीगल कानूनी तरकीबें हैं। जिन्दगी से पलायन करना ठीक नहीं है आप जहाँ भी जायेंगे वहाँ पर जिन्दगी को हाथ जोड़कर सामने खड़ा पायेंगे, वह कहेगी आइये यहाँ पर आपका स्वागत है, आप भी जिंदगी है, मैं भी एक जिंदगी हूं, हम सब एक जिंदगी है अगर आप सबसे भाग भी गये तो अपने आप से कैसे भागोगे ? लोगों ने अध्यात्म के क्षेत्र में भी कई तरकीबें निकाल रखी हैं, लोग ऐसी बेवकूफी करते हैं जिसे सोचकर मुझे बड़ी हैरानी होती हैं। जिन्दगी से भागो मत, जिन्दगी को देखे, उसे समझे आपके अंदर जीवन को देखने का इकहरा मापदण्ड होना चाहिए जो जीवन को ठीक से देखता है, वह इकहरा मापदण्ड बनाता है। आप अपने को जिस तराजू में तोलते है दूसरे को भी उसी तराजू में तोले, किसी से भेदभाव मत रखो जो व्यवहार आप अपने लिए पसंद नहीं वह आप दूसरे के साथ भी मत करो। जो व्यक्ति एक तराजू बनायेगा वह अपने आप में बहुत करुणावान हो जायेगा फिर वह कभी कठोर नहीं रह सकता, जो लोग दो तराजू बनाते हैं वह बहुत कठोर हो जाते हैं, दूसरों को वह बिल्कुल पापी समझते हैं वह कहेंगे यह बहुत दुष्ट है, इसे तो नर्क में डाल देना चाहिये वह कहेगा इसे अदालत में घसीटो, बड़ी से बड़ी सजा दो, इसको तो फाँसी पर लटका दो।
प्राचीन काल से ही हमारा इतिहास दोहरे मापदण्ड का काल है इसलिए मनुष्य नैतिक नहीं हो पाया क्योंकि नैतिकता का मूल बिन्दु करुणा है जब किसी व्यक्ति में कम्पेशन अर्थात करुणा पैदा नहीं होती तो वह व्यक्ति बहुत कठोर हो जाता है हम कठोर व्यक्ति को नैतिक कहते हैं। आपको अगर जिन्दगी खोजनी है तो पहले अपने घर जाओ आपका घर कहाँ है? जहाँ से आप आये हो वही आपका घर है, वहीं से जीवन के आनंद की यात्रा शुरु होती है। जीवन की यात्रा काली से ही शुरु होती है क्योंकि अध्यात्म की प्रथमा काली ही हैं वही जीवन का द्वार है, वही पराम्बा है, उन्हीं से जीवन शुरु होता है, उन्हीं पर जीवन का अंत होता है। महाकाली रहस्य को आप जीवन के आनंद के बिना समझ नहीं सकते जब महाकाली की कृपा होती है तब जातक के जीवन में आनंदमय कोष जागृत हो जाता है, महाकाली की कृपा से ही आनंदमय कोष जागृत होता है तब आपका जीवन धीरे-धीरे आगे बढ़ेगा, चारों ओर उसका प्रकाश फैलेगा यह पहाड़, वृक्ष, चाँद तारे आपमे समा जायेंगे, सारे लोग आपमे समा जायेंगे, सारा ब्रह्माण्ड आपमे समा जायेगा, आपकी चेतना जितनी फैलती जायेगी उतने बड़े आनंद को, उतने ही बड़े जीवन को आप उपलब्ध होते चले जाओगे फिर आपकी आँखों में आनंद होगा, आपके जीवन में सौन्दर्य होगा, आपके जीवन में सत्य होगा, आपके जीवन में संगीत होगा, आपके जीवन में रस होगा, आपकी आँखों में पराम्बा होगी इसी को मैं जिन्दगी कहता हूँ।
मनुष्य ने अपने जीवन में चाहे कितने भी पाप क्यों न किये हों काली सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करने से ब्रह्म की प्राप्ति होती हैं, धन धान्य की विपुलता रहती है, वहाँ पर सर्वदा मंगल होता है महामारी, राज्यभय, चोरभय, अग्निभय, सभी भयों से वह मुक्त हो जाता है इससे अति घोर व्याधियाँ समाप्त हो जाती हैं, इससे शत्रुओं के संकट का निवारण होता है इसके पाठ मात्र से साधक को इष्ट सिद्धि प्राप्त होती है। राम ने भी काली के सहस्त्र नाम स्तोत्र का पाठ किया और उनका पूजन किया, सभी साधकों को इस सहस्त्र स्त्रोत का पाठ करना चाहिये जो। इसका पाठ करने से जीवन में परम तत्व की प्राप्ति होती है, इसका पाठ करने वाले साधक को अतुल लक्ष्मी, अद्भुत पराक्रम की प्राप्ति होती है उसके शरीर से सभी प्रकार के रोग एवं समस्त प्रकार की व्याधियाँ साधक को गुप्त धन एवं गुप्त ज्ञान की प्राप्ति होती है।
काली के विभिन्न नामों में उन्हें कामा भी कहा गया है, उन्हें काम तत्परा भी कहा गया है, उन्हें कामाचार वर्धिनी भी कहा गया है।
(क्रमशः)
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॥ क्रीं ह्रीं ह्रीं दक्षिणकालिकेस्वाहा ॥ (३)
लोगों ने समझा काली काम की देवी हैं, काम को परिभाषा लोगों ने अपने-अपने अर्थों में लगा ली, काम तत्परा का मतलब होता है जो सदा काम करने को तत्पर रहती हैं, काम विनोदनी का मतलब है वह बड़े से बड़ा कार्य खेल-खेल में ही कर देती हैं वही शक्ति देती हैं, काम का मतलब है अद्भुत पराक्रम करने की शक्ति जो कि साधक को महाकाली ही प्रदान करती हैं महाकाली को काम विशारद भी कहते हैं। इसका मतलब होता है किसी दिव्य काम को करने के लिए जिस दिव्य ज्ञान की आवश्यकता होती हैं वह ज्ञान साधक को भगवती महाकाली ही प्रदान करती हैं क्योंकि बिना ज्ञान के गुरुत्व नहीं आ सकता, गुरुत्व काली ही प्रदान करती हैं। क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति और भाव शक्ति यह तीनों शक्तियाँ अनायास ही काली के साधक को प्राप्त हो जाती है फिर ऐसा कोई कार्य नहीं है जो साधक के लिए असम्भव हो। काली ही भयहारिणी, भक्तारिणी, भव भामिनी एवं भव बंधन मोचनी हैं काली की प्रामाणिकता इस कलियुग में भी देखी जा सकती है अगर माथे पर मिट्टी और भस्म लगाने से मोक्ष मिलता तो आज मिट्टी में पाये जाने वाले समस्त जीव-जन्तु, कीटाणु मुक्त हो जाते और मोक्ष को प्राप्त हो जाते अगर घर-परिवार छोड़कर वन में जाने से मोक्ष मिलता तो आज सभी वन्य प्राणी मोक्ष प्राप्त कर चुके होते, बिना महाकाली की कृपा के मोक्ष पाना असम्भव है।
जब महाकाली कृपा करती हैं तब वह अपनी कृपा दृष्टि से साधक को दिव्य ज्ञान चक्षु प्रदान करती हैं, वह आत्मा को मोह के बंधन से मुक्त कर देती है। साधक को तत्व ज्ञान भी काली ही प्रदान करती हैं "आगम निगम बखानी" आगम निगम का बखान वही प्रदान करती है, उन्हें दो रूपो में पूजा जाता है रक्ता और श्यामा उनके काले स्वरूप को देखकर ब्रह्मा भी कह उठते हैं "नमामि कृष्ण रूपिणि" हे काली तुझे मेरा नमन है। रक्ता रूप में वह श्री सुन्दरी कहलाती हैं, श्री सुन्दरी श्रीविद्या को कहते हैं श्री विद्या श्रीविद्या, कालिका को विद्याराज्ञी भी कहा जाता है, रक्ता और कृष्णा के रूप में भगवती काली ही प्रतिष्ठित हैं, विद्याराज्ञी ही भोग और मोक्ष प्रदान करती हैं इस बात को सभी ऋषि-मुनियों ने स्वीकार किया है। कालिका के अत्यंत प्राचीन एवं प्रामाणिक ग्रंथों में भी इस बात का उल्लेख है वह कहते हैं महाशक्ति अलग-अलग आसनों पर विराजमान होकर शोभायमान हो रही हैं।
जब वह पूर्व आमान्य में बैठ जाती है तब वह षोडशी कहलाती है, जब वह पश्चिम आमान्य के सिंहासन पर बैठती है तब वह सारे क्लेशों का निवारण करती है तब वह कुब्जिका कहलाती है। जब वह दक्षिण आमान्य के सिंहासन पर बैठती है तब वह विश्वेश्वरी कहलाती है। पूर्व आमान्य में उन्हें पूर्णश्वरी भी कहा जाता है, उत्तर आमान्य में वह भोग, मोक्ष तथा समस्त सिद्धियों की दात्री कहलाती है तब हम सब उन्हें कालिका के नाम से जानते हैं। तुम ही अध्यात्म की माता हो, मैंने भगवती तुम्हारे किसी भी रूप की साधना की हो पर तुमने सदा मेरे सिर पर हाथ कालिका के रूप में ही रखा है, तुम ही सत्य हो, तुम ही शिव हो, तुम ही सुन्दर हो तुम ही सुन्दर हो, माँ तुम कितनी सुन्दर हो ।
जब आप किसी काली दीवार अर्थात ब्लेक बोर्ड पर चॉक से लिखते है तब दीवार जितनी ज्यादा काली होगी उस पर लिखाई उतनी ज्यादा सफेद होगी। सफेद दीवार पर आप सफेद चॉक से नहीं लिख सकते, सफेद दीवार पर सफेद चॉक से आप कुछ भी नहीं लिख सकते अगर कुछ लिखने की कोशिश भी करोगे तो वह किसी के समझ में नहीं आयेगा और आपका सारा लिखना बेकार चला जायेगा। यदि काली दीवार मिट जाये तो तुम्हारी लिखाई भी मिट जायेगी। किस दीवार पर क्या लिखना है, क्या नहीं लिखना है इसका सारा ज्ञान भी महाकाली ही देती हैं। बिन्दु-बिन्दु तो सब कहते हैं पर आखिर बिन्दु क्या है? सिर्फ एक तत्व ज्ञानी व्यक्ति ही बिन्दु को समझ सकता है उस बिन्दु में जब आप छलांग लगाते हो तब आपके अंदर एक प्रकार का अद्वैतभाव आता है, बिन्दु में छलांग लगाने से पहले द्वैत हो, द्वैत और अद्वैत की बात करने से कुछ नहीं होगा इसका खण्डन-मण्डन करने से भी कुछ नहीं होगा आत्मा-परमात्मा की बात करने से भी कुछ नहीं होगा, दो चार शास्त्र रटकर प्रवचन करने से भी कुछ नहीं होगा इससे तो बस एक प्रकार का मरघटिया ज्ञान की प्राप्ति होती है। काली का साधक जब उस बिन्दु के अंदर छलांग लगाता है उस छलांग के बाद उसके भीतर से जो अद्वैतवाद आता है तब वह आँखों में करुणा लाता है, आँखों में रस लाता है जीवन में अमृत लाता है फिर सारे विरोध स्वत: समाप्त हो जाते हैं, दोनों ध्रुव समाप्त हो जाते हैं तब न कोई निगेटिव रहता है न ही कोई पॉजीटिव रहता है, दोनों एक साथ मिल जाते हैं, एक दूसरे को काट देते हैं और समास हो जाते हैं तब एक शुद्ध और निर्दोष आत्मा बची रहती है यह आत्म ज्ञान महाकाली प्रदान करती है।
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
लोगों ने समझा काली काम की देवी हैं, काम को परिभाषा लोगों ने अपने-अपने अर्थों में लगा ली, काम तत्परा का मतलब होता है जो सदा काम करने को तत्पर रहती हैं, काम विनोदनी का मतलब है वह बड़े से बड़ा कार्य खेल-खेल में ही कर देती हैं वही शक्ति देती हैं, काम का मतलब है अद्भुत पराक्रम करने की शक्ति जो कि साधक को महाकाली ही प्रदान करती हैं महाकाली को काम विशारद भी कहते हैं। इसका मतलब होता है किसी दिव्य काम को करने के लिए जिस दिव्य ज्ञान की आवश्यकता होती हैं वह ज्ञान साधक को भगवती महाकाली ही प्रदान करती हैं क्योंकि बिना ज्ञान के गुरुत्व नहीं आ सकता, गुरुत्व काली ही प्रदान करती हैं। क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति और भाव शक्ति यह तीनों शक्तियाँ अनायास ही काली के साधक को प्राप्त हो जाती है फिर ऐसा कोई कार्य नहीं है जो साधक के लिए असम्भव हो। काली ही भयहारिणी, भक्तारिणी, भव भामिनी एवं भव बंधन मोचनी हैं काली की प्रामाणिकता इस कलियुग में भी देखी जा सकती है अगर माथे पर मिट्टी और भस्म लगाने से मोक्ष मिलता तो आज मिट्टी में पाये जाने वाले समस्त जीव-जन्तु, कीटाणु मुक्त हो जाते और मोक्ष को प्राप्त हो जाते अगर घर-परिवार छोड़कर वन में जाने से मोक्ष मिलता तो आज सभी वन्य प्राणी मोक्ष प्राप्त कर चुके होते, बिना महाकाली की कृपा के मोक्ष पाना असम्भव है।
जब महाकाली कृपा करती हैं तब वह अपनी कृपा दृष्टि से साधक को दिव्य ज्ञान चक्षु प्रदान करती हैं, वह आत्मा को मोह के बंधन से मुक्त कर देती है। साधक को तत्व ज्ञान भी काली ही प्रदान करती हैं "आगम निगम बखानी" आगम निगम का बखान वही प्रदान करती है, उन्हें दो रूपो में पूजा जाता है रक्ता और श्यामा उनके काले स्वरूप को देखकर ब्रह्मा भी कह उठते हैं "नमामि कृष्ण रूपिणि" हे काली तुझे मेरा नमन है। रक्ता रूप में वह श्री सुन्दरी कहलाती हैं, श्री सुन्दरी श्रीविद्या को कहते हैं श्री विद्या श्रीविद्या, कालिका को विद्याराज्ञी भी कहा जाता है, रक्ता और कृष्णा के रूप में भगवती काली ही प्रतिष्ठित हैं, विद्याराज्ञी ही भोग और मोक्ष प्रदान करती हैं इस बात को सभी ऋषि-मुनियों ने स्वीकार किया है। कालिका के अत्यंत प्राचीन एवं प्रामाणिक ग्रंथों में भी इस बात का उल्लेख है वह कहते हैं महाशक्ति अलग-अलग आसनों पर विराजमान होकर शोभायमान हो रही हैं।
जब वह पूर्व आमान्य में बैठ जाती है तब वह षोडशी कहलाती है, जब वह पश्चिम आमान्य के सिंहासन पर बैठती है तब वह सारे क्लेशों का निवारण करती है तब वह कुब्जिका कहलाती है। जब वह दक्षिण आमान्य के सिंहासन पर बैठती है तब वह विश्वेश्वरी कहलाती है। पूर्व आमान्य में उन्हें पूर्णश्वरी भी कहा जाता है, उत्तर आमान्य में वह भोग, मोक्ष तथा समस्त सिद्धियों की दात्री कहलाती है तब हम सब उन्हें कालिका के नाम से जानते हैं। तुम ही अध्यात्म की माता हो, मैंने भगवती तुम्हारे किसी भी रूप की साधना की हो पर तुमने सदा मेरे सिर पर हाथ कालिका के रूप में ही रखा है, तुम ही सत्य हो, तुम ही शिव हो, तुम ही सुन्दर हो तुम ही सुन्दर हो, माँ तुम कितनी सुन्दर हो ।
जब आप किसी काली दीवार अर्थात ब्लेक बोर्ड पर चॉक से लिखते है तब दीवार जितनी ज्यादा काली होगी उस पर लिखाई उतनी ज्यादा सफेद होगी। सफेद दीवार पर आप सफेद चॉक से नहीं लिख सकते, सफेद दीवार पर सफेद चॉक से आप कुछ भी नहीं लिख सकते अगर कुछ लिखने की कोशिश भी करोगे तो वह किसी के समझ में नहीं आयेगा और आपका सारा लिखना बेकार चला जायेगा। यदि काली दीवार मिट जाये तो तुम्हारी लिखाई भी मिट जायेगी। किस दीवार पर क्या लिखना है, क्या नहीं लिखना है इसका सारा ज्ञान भी महाकाली ही देती हैं। बिन्दु-बिन्दु तो सब कहते हैं पर आखिर बिन्दु क्या है? सिर्फ एक तत्व ज्ञानी व्यक्ति ही बिन्दु को समझ सकता है उस बिन्दु में जब आप छलांग लगाते हो तब आपके अंदर एक प्रकार का अद्वैतभाव आता है, बिन्दु में छलांग लगाने से पहले द्वैत हो, द्वैत और अद्वैत की बात करने से कुछ नहीं होगा इसका खण्डन-मण्डन करने से भी कुछ नहीं होगा आत्मा-परमात्मा की बात करने से भी कुछ नहीं होगा, दो चार शास्त्र रटकर प्रवचन करने से भी कुछ नहीं होगा इससे तो बस एक प्रकार का मरघटिया ज्ञान की प्राप्ति होती है। काली का साधक जब उस बिन्दु के अंदर छलांग लगाता है उस छलांग के बाद उसके भीतर से जो अद्वैतवाद आता है तब वह आँखों में करुणा लाता है, आँखों में रस लाता है जीवन में अमृत लाता है फिर सारे विरोध स्वत: समाप्त हो जाते हैं, दोनों ध्रुव समाप्त हो जाते हैं तब न कोई निगेटिव रहता है न ही कोई पॉजीटिव रहता है, दोनों एक साथ मिल जाते हैं, एक दूसरे को काट देते हैं और समास हो जाते हैं तब एक शुद्ध और निर्दोष आत्मा बची रहती है यह आत्म ज्ञान महाकाली प्रदान करती है।
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
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सद्गुरुदेव जी के महाप्रयाण दिवस पर गुरुवर जी को कोटि कोटि नमन🙏🌹🌹
3 जुलाई 1998 को प्रातः लगभग 10 बजे हम सबके आराध्य अपनी भौतिक देह को त्यागकर सिद्धाश्रम गमन कर अपने मूल स्वरूप (परमहंस योगिराज स्वामी निखिलेश्वरानंद जी महाराज) में पुनः समाधिस्थ हो गए ,पुनः शक्तियां अर्जित कर 2500 वर्ष पश्चात युग के अनुरूप अपने भक्तों को तारने हेतु एवं नई लीलाओं के साथ पुनः अवतरण लेने के लिए किसी नए नाम के साथ...!ऐसे महायोगी को भाव भीनी श्रद्धांजलि के साथ उनके श्री चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम.. !🙏.
@Sanatan
3 जुलाई 1998 को प्रातः लगभग 10 बजे हम सबके आराध्य अपनी भौतिक देह को त्यागकर सिद्धाश्रम गमन कर अपने मूल स्वरूप (परमहंस योगिराज स्वामी निखिलेश्वरानंद जी महाराज) में पुनः समाधिस्थ हो गए ,पुनः शक्तियां अर्जित कर 2500 वर्ष पश्चात युग के अनुरूप अपने भक्तों को तारने हेतु एवं नई लीलाओं के साथ पुनः अवतरण लेने के लिए किसी नए नाम के साथ...!ऐसे महायोगी को भाव भीनी श्रद्धांजलि के साथ उनके श्री चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम.. !🙏.
@Sanatan
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॥ श्रीराजराजेश्वरी प्रातः स्मरणम् ॥
रुद्र का पिता कौन ? ब्रह्मा का पिता कौन ? ब्रह्मा की माता कौन ? रुद्र की माता कौन ? विष्णु की माता कौन ? विष्णु का पिता कौन ? कामदेव की माता कौन ? कामदेव का पिता कौन ? इन्द्र का पिता कौन ? इन्द्र की माता कौन ? किसी को नहीं मालूम, किसी भी वेद पुराण या तंत्र ग्रंथ इत्यादि में इनके माता पिता के बारे में कुछ नहीं लिखा गया ईश्वर की माता कौन ? ईश्वर का पिता कौन ? सदाशिव की माता कौन ? सदाशिव का पिता कौन ? इस के बारे में भी कुछ नहीं लिखा गया। ये अद्भुत संरचनाएं हैं, इनकी संरचना भगवती त्रिपुर सुन्दरी ने स्वतः की है, यह गर्भ से पैदा नहीं हुए हैं, गर्भातीत नहीं हैं, गर्भ इनका विषय नहीं है। नारायण की माता कौन ? नारायण का पिता कौन ? यह मुख्य चिंतन का विशेष कर अध्यात्म चिंतन का विषय है किसी भी वेद ग्रंथ में इनके माता पिता का उल्लेख नहीं है।
रुद्र का तात्पर्य है जो संहार करता है, ब्रह्मा का तात्पर्य जो सृष्टि करता है, विष्णु का तात्पर्य जो जीवन रचना करता है, ब्रह्मा विष्णु और रुद्र ये तीनों दस-दस कला युक्त हैं अर्थात इनमें से प्रत्येक के पास अपनी-अपनी दस विशेष कलाएं हैं, दस कलाओं का तात्पर्य एक जैसे दस अणुओं का समायोजन चौथा ईश्वर है जिसके पास चार कलाएं हैं अर्थात चार एक जैसे अणुओं का समायोजन, ईश्वर का तात्पर्य यह है कि जो सबको तिरस्कृत कर दें, सब स्थितियों से निवृत्त हो जाये, कहीं लिप्त न हो सिर्फ देता रहे एक जीवन युक्त अवस्था जैसे आप आप गुरु नानक जी को कह सकते हैं, शंकराचार्य जी को कह सकते हैं, आप स्वामी समर्थनाथ जी को कह सकते हैं । इस श्रेणी में बहुत सारे जीव आ सकते हैं जो कि ईश्वर तत्व तक पहुँच गये, आज बुद्ध एवं महावीर ये भी ईश्वर तत्व तक पहुँच गये हैं, इनमें भी चार कलाओं का विकास हो गया, चार सजातीय अणुओं में एक साथ रहने की कला आ गयी।
नवनाथ का भी अवसान होता है, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र एवं ईश्वर का भी अवसान होता है यह भी मृत्यु को प्राप्त होते हैं परन्तु 16 कलायुक्त सदाशिव जो कि इन पायों के ऊपर फलक बनकर लेटे हुए हैं और जिनकी नाभि से कमल निकल रहा है जिस पर भगवती विराजमान है ये कभी प्रलयातीत नहीं होते। सदाशिव का तात्पर्य है सदा के लिये बने रहने वाले शिव इसलिए कहा गया है कि है भगवती तू ही एकमात्र सुहागन है, तेरा पति कभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होता, वह प्रलय काल में भी जस का तस रहता है क्योंकि उसके अंदर त्रिपुरा की षोडशी कला प्रवाहित हो रही है यही श्रीविद्या रहस्यम् है, यही शुद्ध विद्या रहस्यम् है। नाम से ही स्पष्ट है कि ये श्लोक प्रातःकाल उठकर पाठ करने के हैं। इनमें तीनों लोकों की जननी और राज्ञी, लोगों की आश्रयभूता भण्ड और महिषासुर को मारने वाली भगवती का स्मरण किया गया है। इसका प्रतिदिन " पाठ करने वाले की रक्षा भगवती स्वत: करती हैं।
सदगुरुदेव के महाप्रयाण दिवस से एक नया समूह का निर्माण किया गया है जिसमें अष्टक वर्ग वैदिक ज्योतिष निशुल्क रूप से सिखाया जा रहा है और इस परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है ।जो कि सच्चे अर्थों में यही उनके प्रति हमारी श्रद्धांजलि हो सकेगी । जो भी ज्योतिष सीखने में रुचि रखते हो वो इस समूह को ज्वाइन कर सकते हैं। वही लोग समूह जॉइन करें जो ज्योतिष सीखना चाहते हैं समूह का लिंक नीचे दे रहा हूं https://t.me/+nDNYTSbB-2I0MGI1
॥ श्रीराजराजेश्वरी प्रातः स्मरणम् ॥
प्रातः स्मरामि सु सुधाम्बुधि मध्यभागे।
कल्पाटवी परिवृते मणि निर्मितेऽस्मिन् ।।
चिन्तामणीय सुमहा सदने निविष्टां ।
राजेश्वरी त्रिजगतां जननीं च राज्ञीम् ॥
प्रातर्नमामि सकलागम नित्यवेद्यं ।
संक्रन्दनादि सुरवृन्द निषेव्यमाणम् ॥
लाक्षारूणं कमल शङ्ख सुरेखिकं च।
राजेश्वरी पदयुगं जगतां शरण्यम् ॥
प्रातर्वदामि सकलेष्ट सुदान दक्षं ।
दक्षज्ञ भक्त भय रोग समूलनाशे ॥
भाग्यप्रदञ्च भवरोग निवारकञ्च ।
राजेश्वरी महितनाम सहस्त्रमेव ॥
प्रातः पठामि दुरितौघ विनाश हेतुं ।
वन्दारु वाञ्छित फलप्रद माशु नित्यं ॥
मोक्षप्रदं मुनिनुतं सुमहत्त्व पूर्णं ।
माहात्म्यमेव महितं वर षोडशेश्याः ॥
प्रातः शृणोमि शठ माहिष भण्डमुख्य ।
सर्वासुर क्षपण दीक्षित माहवषु ॥
वीरायितं च वरदान विचक्षणं च।
विस्मापनीय चरितं जगदम्बिकायाः ॥
यः श्लोक पञ्चकमिदं पठति प्रभाते ।
सिंहासन स्थित मनोहर चक्रराज्याः।।
राजेश्वरी च रजनीकर चारुचूडा।
रक्षां करोति सततं तदिदं हि सत्यम् ॥
।। इति श्रीमहाराज्ञी श्रीराजराजेश्वरी प्रातः स्मरणम् ॥ .
शिव शासनत: शिव शासनत:
🙏 @Sanatan
रुद्र का पिता कौन ? ब्रह्मा का पिता कौन ? ब्रह्मा की माता कौन ? रुद्र की माता कौन ? विष्णु की माता कौन ? विष्णु का पिता कौन ? कामदेव की माता कौन ? कामदेव का पिता कौन ? इन्द्र का पिता कौन ? इन्द्र की माता कौन ? किसी को नहीं मालूम, किसी भी वेद पुराण या तंत्र ग्रंथ इत्यादि में इनके माता पिता के बारे में कुछ नहीं लिखा गया ईश्वर की माता कौन ? ईश्वर का पिता कौन ? सदाशिव की माता कौन ? सदाशिव का पिता कौन ? इस के बारे में भी कुछ नहीं लिखा गया। ये अद्भुत संरचनाएं हैं, इनकी संरचना भगवती त्रिपुर सुन्दरी ने स्वतः की है, यह गर्भ से पैदा नहीं हुए हैं, गर्भातीत नहीं हैं, गर्भ इनका विषय नहीं है। नारायण की माता कौन ? नारायण का पिता कौन ? यह मुख्य चिंतन का विशेष कर अध्यात्म चिंतन का विषय है किसी भी वेद ग्रंथ में इनके माता पिता का उल्लेख नहीं है।
रुद्र का तात्पर्य है जो संहार करता है, ब्रह्मा का तात्पर्य जो सृष्टि करता है, विष्णु का तात्पर्य जो जीवन रचना करता है, ब्रह्मा विष्णु और रुद्र ये तीनों दस-दस कला युक्त हैं अर्थात इनमें से प्रत्येक के पास अपनी-अपनी दस विशेष कलाएं हैं, दस कलाओं का तात्पर्य एक जैसे दस अणुओं का समायोजन चौथा ईश्वर है जिसके पास चार कलाएं हैं अर्थात चार एक जैसे अणुओं का समायोजन, ईश्वर का तात्पर्य यह है कि जो सबको तिरस्कृत कर दें, सब स्थितियों से निवृत्त हो जाये, कहीं लिप्त न हो सिर्फ देता रहे एक जीवन युक्त अवस्था जैसे आप आप गुरु नानक जी को कह सकते हैं, शंकराचार्य जी को कह सकते हैं, आप स्वामी समर्थनाथ जी को कह सकते हैं । इस श्रेणी में बहुत सारे जीव आ सकते हैं जो कि ईश्वर तत्व तक पहुँच गये, आज बुद्ध एवं महावीर ये भी ईश्वर तत्व तक पहुँच गये हैं, इनमें भी चार कलाओं का विकास हो गया, चार सजातीय अणुओं में एक साथ रहने की कला आ गयी।
नवनाथ का भी अवसान होता है, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र एवं ईश्वर का भी अवसान होता है यह भी मृत्यु को प्राप्त होते हैं परन्तु 16 कलायुक्त सदाशिव जो कि इन पायों के ऊपर फलक बनकर लेटे हुए हैं और जिनकी नाभि से कमल निकल रहा है जिस पर भगवती विराजमान है ये कभी प्रलयातीत नहीं होते। सदाशिव का तात्पर्य है सदा के लिये बने रहने वाले शिव इसलिए कहा गया है कि है भगवती तू ही एकमात्र सुहागन है, तेरा पति कभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होता, वह प्रलय काल में भी जस का तस रहता है क्योंकि उसके अंदर त्रिपुरा की षोडशी कला प्रवाहित हो रही है यही श्रीविद्या रहस्यम् है, यही शुद्ध विद्या रहस्यम् है। नाम से ही स्पष्ट है कि ये श्लोक प्रातःकाल उठकर पाठ करने के हैं। इनमें तीनों लोकों की जननी और राज्ञी, लोगों की आश्रयभूता भण्ड और महिषासुर को मारने वाली भगवती का स्मरण किया गया है। इसका प्रतिदिन " पाठ करने वाले की रक्षा भगवती स्वत: करती हैं।
सदगुरुदेव के महाप्रयाण दिवस से एक नया समूह का निर्माण किया गया है जिसमें अष्टक वर्ग वैदिक ज्योतिष निशुल्क रूप से सिखाया जा रहा है और इस परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है ।जो कि सच्चे अर्थों में यही उनके प्रति हमारी श्रद्धांजलि हो सकेगी । जो भी ज्योतिष सीखने में रुचि रखते हो वो इस समूह को ज्वाइन कर सकते हैं। वही लोग समूह जॉइन करें जो ज्योतिष सीखना चाहते हैं समूह का लिंक नीचे दे रहा हूं https://t.me/+nDNYTSbB-2I0MGI1
॥ श्रीराजराजेश्वरी प्रातः स्मरणम् ॥
प्रातः स्मरामि सु सुधाम्बुधि मध्यभागे।
कल्पाटवी परिवृते मणि निर्मितेऽस्मिन् ।।
चिन्तामणीय सुमहा सदने निविष्टां ।
राजेश्वरी त्रिजगतां जननीं च राज्ञीम् ॥
प्रातर्नमामि सकलागम नित्यवेद्यं ।
संक्रन्दनादि सुरवृन्द निषेव्यमाणम् ॥
लाक्षारूणं कमल शङ्ख सुरेखिकं च।
राजेश्वरी पदयुगं जगतां शरण्यम् ॥
प्रातर्वदामि सकलेष्ट सुदान दक्षं ।
दक्षज्ञ भक्त भय रोग समूलनाशे ॥
भाग्यप्रदञ्च भवरोग निवारकञ्च ।
राजेश्वरी महितनाम सहस्त्रमेव ॥
प्रातः पठामि दुरितौघ विनाश हेतुं ।
वन्दारु वाञ्छित फलप्रद माशु नित्यं ॥
मोक्षप्रदं मुनिनुतं सुमहत्त्व पूर्णं ।
माहात्म्यमेव महितं वर षोडशेश्याः ॥
प्रातः शृणोमि शठ माहिष भण्डमुख्य ।
सर्वासुर क्षपण दीक्षित माहवषु ॥
वीरायितं च वरदान विचक्षणं च।
विस्मापनीय चरितं जगदम्बिकायाः ॥
यः श्लोक पञ्चकमिदं पठति प्रभाते ।
सिंहासन स्थित मनोहर चक्रराज्याः।।
राजेश्वरी च रजनीकर चारुचूडा।
रक्षां करोति सततं तदिदं हि सत्यम् ॥
।। इति श्रीमहाराज्ञी श्रीराजराजेश्वरी प्रातः स्मरणम् ॥ .
शिव शासनत: शिव शासनत:
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