सनातन धर्म • Sanatan Dharma
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वेदोक्त श्री गणपति पूजन (५)
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पूंगीफलादिसहित ताम्बूल - अर्पण

ॐ पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम् ।
एलाचूर्णादिसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।
वसन्तो ऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, मुखवासार्थ मेलापूंगीफलादिसहितं ताम्बूलं समर्पयामि।

नारिकेलफल - अर्पण

इद फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव।
तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥
ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः ।
बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्तव हसः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः नारिकेलफलं समर्पयामि ।

दक्षिणा समर्पण

हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेम बीजं विभावसोः ।
अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥
ॐ हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्यजातः पतिरेक आसीत् ।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, ।
कृतायाः पूजायाः साद्गुण्यार्थं द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि ।

नीराजन या आरार्तिक ( आरती )

कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम् ।
आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मे वरदो भव ॥
ॐ इदं हविः प्रजननं मे अस्तु, दशवीर सर्वगण स्वस्तये ॥ आत्मसनि प्रजासनि पशुसनि लोकसन्यभयसनि ।
अग्निः प्रजां बहुलां मे करोत्वन्नं पयो रेतो अस्मासु धत्त ॥
आ रात्रि पार्थिव रजः पितुरप्रायि धामभिः ।
दिवः सदा सि बृहती तिष्ठस आ त्वेषं वर्तते तमः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, कर्पूरनीराजनं समर्पयामि ॥

पुष्पाञ्जलि समर्पण

नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद्भवानि च।
पुष्पाञ्जलिर्मया दत्ता गृहाण परमेश्वरं ।।
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥
ॐ गणानां त्वा गणपति हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे निधीनां त्वा निधिपति हवामहे वसो मम।
आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ॥
ॐ अम्बे अम्बिकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन ।
ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम् ॥
ॐ राजाधिराजाय प्रसह्यसाहिने नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे ।
स मे कामान् काम कामाय मह्यं कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु ॥ कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः ।
ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठ्यं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं समन्तपर्यायी स्यात् सार्वभौमः सार्वायुषान्तादापरार्धात् पृथिव्यै समुद्रपर्यन्ताया एकराडिति तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुतः परिवेष्टारो मरुत्तस्यावसन् गृहे । आवीक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवाः सभासद इति ।
ॐ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् । साम्बाहुभ्यां धमति सम्पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः, मंत्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि ।

प्रदक्षिणा

यानि कानि च पापानि ज्ञाताज्ञातकृतानि च ।
तानि सर्वाणि नश्यन्ति प्रदक्षिणपदे पदे ॥
ॐ ये तीर्थानि प्रचरन्ति सृकाहस्ता निषङ्गिणः ।
तेषाँ सहस्त्रयोजनेऽव धन्वानि तन्मसि ॥
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः प्रदक्षिणां समर्पयामि।

विशेषा-समर्पण

तदनन्तर जल, गन्ध, अक्षत, फल, दूर्वा और दक्षिणा एक ताम्र पात्र में रखकर दोनों घुटनों को पृथ्वी पर टेककर उक्त अर्घ्य पात्र को दोनों हाथों की अंजलि में लें और उसे मस्तक से लगाकर निम्नांकित श्लोकों को पढ़ते हुए श्री गणपति को अर्ध्य दें

रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्यरक्षक ।
भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात् ॥
द्वैमातुर कृपासिन्धो षाण्मातुराग्रज प्रभो ।
वरदस्त्वं वरं देहि वाञ्छितं वाञ्छितार्थद ॥
अनेन सफलार्येण सफलोऽस्तु सदा मम ।
ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय महागणपतये नमः विशेषार्घ्यं समर्पयामि ।

विशेषार्ध्य देने के पश्चात् निम्नाकित श्लोक पढ़कर प्रार्थना करें

विछेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय ।
नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते ॥
भक्तार्तिनाशनपराय गणेश्वराय सर्वेश्वराय शुभदाय सुरेश्वराय । विद्याधराय विकटाय च वामनाय भक्त प्रसन्नवरदाय नमो नमस्ते ॥
नमस्ते ब्रह्मरूपाय विष्णुरूपाय ते नमः ।
नमस्ते रुद्ररूपाय करिरूपाय ते नमः ॥
विश्वरूपस्वरूपाय नमस्ते ब्रह्मचारिणे ।
भक्तप्रियाय देवाय नमस्तुभ्यं विनायक ॥
लम्बोदर नमस्तुभ्यं सततं मोदकप्रिय ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
त्वां विघ्नशत्रुदलनेति च सुन्दरे ति भक्तप्रियेति सुखदेति फलप्रदेति ।
विद्याप्रदेत्यघहरेति च ये स्तुवन्ति तेभ्यो गणेश वरदो भव नित्यमेव ॥
गणेशपूजने कर्म यन्यूनमधिकं कृतम् ।
तेन सर्वेण सर्वात्मा प्रसन्नोऽस्तु सदा मम ॥
अनया पूजया सिद्धिबुद्धिसहितो महागणपति: प्रीयतां न मम ।.
शिव शासनत: शिव शासनत:
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भगवान गणपति के द्वादश नाम के रहस्य
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सनातन धर्म में कोई भी मंगल कार्य श्री गणेश जी की आराधना से ही आरम्भ होता है कार्य में सफलता की कामना से आरम्भ में ही श्री गणेश के द्वादश नामों का संकीर्तन किया जाता है। विध्याध्यन आरम्भ करते समय, विवाह के समय, नगर अथवा नवनिर्मित भवन में प्रवेश करते समय, यात्रा आदि में कहीं बाहर जाते समय संग्राम के अवसर पर अथवा किसी भी प्रकार की विपत्ति आने पर यदि साधक श्री गणेश जी के बारह नामों का स्मरण करता है उसके उद्देश्य और मार्ग में किसी प्रकार का विघ्न नहीं आता।


श्री गणेश जी के ये बारह नाम हैं- सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्ण, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशक, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भाल चन्द्र और गजानन। इन नामों को श्लोक के रूप में इस तरह वर्णित किया गया है-
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ॥
धूम्रकेतुः गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥

सामान्य रूप से इन बारह नामों का अर्थ इस प्रकार है-- सुमुख अर्थात सुन्दर मुख वाले, एकदन्त अर्थात एक दांत वाले, कपिल यानी कपिल वर्ण के, गजकर्ण अर्थात हाथी जैसे कान वाले, लम्बोदर अर्थात लम्बे पेट वाले, विकट यानी भयंकर, विनायक अर्थात वशिष्ट नायकोचित गुण सम्पन्न, धूम्रकेतु यानी धुँये के रंग की पताका वाले गणाध्यक्ष अर्थात गणों के अध्यक्ष, भालचन्द्र अर्थात मस्तक पर चन्द्रमा को धारण करने वाले और गजानन अर्थात हाथी के समान मुख वाले ।


सुमुख :- आम लोगों के मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि हाथी की सूंड, छोटी-छोटी आँखे और सूप जैसे लम्बे कान वाले को सुमुख कैसे कहा जा सकता है वैसे जो चमड़े की सुन्दरता को ही महत्व देते हैं उनका ऐसा सोचना ठीक भी है किन्तु यदि गहराई से विचार किया जाय तो शारीरिक सुन्दरता से परे गुणो की महत्ता सर्वोपरि है। सनातन आर्य संस्कृति ने सदैव गुणों को ही अधिक महत्व दिया है। आध्यात्मिक दृष्टि से छोटी आँखें गम्भीरता की, लम्बी नाक बुद्धिमता की और दीर्घ कर्ण बहुलता के सूचक हैं। सामुद्रिक शास्त्र भी इसकी पुष्टि करता है। इस प्रकार सुमुख नाम श्री गणेश के गुणों के सुरूप ही है।


एकदन्त :- श्री गणेश का दूसरा नाम एकदन्त है। श्री गणेश का एकदन्त होना इस बात का ज्ञान कराता है कि जीवन में सफल वही होता है जिसका लक्ष्य एक हो। दो वस्तुऐं हमेशा द्वैत की परिचायक होती हैं गणपति का एक दाँत टूटा तो वे अद्वैत के प्रतीक बन गये। यह एकदन्त का तात्विक पक्ष था जिसे जानकर यह जिज्ञासा जागृत होती है कि हाथी के समान मुख वाले श्री गणेश के दो दाँत थे तो एक दाँत टूटा कैसे ? इस सम्बन्ध में एक पौराणिक प्रसंग हैं


एक बार भगवती पार्वती और शिव विहार कर रहे थे तो उन्होंने श्री गणेश को यह कहकर द्वार पर पहरे में खड़ा कर दिया कि किसी को भी भीतर न आने दें तभी सहसा परशुराम वहाँ आये और भीतर जाने के लिये हठ करने लगे। बात इतनी अधिक बढ़ गयी कि परशुराम को प्रहार करना पड़ा फलस्वरूप श्री गणेश का दाँत टूट गया। परशुराम ने जब अपने तीव्र धार वाले कुठार से श्री गणेश की भुजा पर प्रहार किया तो वह कुठार फिसलकर गणेश जी के दाँत पर में गिरा और प्रचण्ड ध्वनि के साथ श्री गणेश का दाँत टूटकर गिर गया। वह दाँत जब परशुराम को नष्ट करने के लिये चला तो शिवगणों ने उसे रोक लिया। उस समय दाँत की वक्रगति देखकर पृथ्वी कांप उठी, पशु चिग्घाड़ने लगे सर्वत्र भय व्याप्त हो गया देवगण भी हाहाकार करने लगे। अंत में भगदन्त श्री गणेश जी की देवताओं ने स्तुति की इस प्रकार उनका नाम एकदन्त पड़ा।


कपिल :- श्री गणेश के तीसरे नाम कपिल का यदि आकारान्त बना दिया जाय तो इसका रूप बनेगा 'कपिला' जिसका शाब्दिक अर्थ है गाय इससे स्पष्ट है कि गौ धूसर वर्ण की होती हुयी भी दूध, दही, घृत आदि पोषक पदार्थ तथा गोमय व गोमूत्र आदि रोग निवारक पदार्थ प्रदान कर मानव का हित साधन करती है उसी प्रकार कपिलवर्ण के श्री गणेश भी बुद्धि रूपी दधि, ज्ञानरूपी घृत तथा समुज्वल भावरूपी दुग्ध द्वारा मानव को पुष्ट बनाते हैं अथवा उसके बौद्धिक पक्ष को पुष्ट बनाने वाले पदार्थ प्रदान करते हैं और अमंगल नाश, विघ्नहरण और दिव्य पदार्थ प्रदान कर उसके त्रिविध तापों का शमन करते हैं।.

(क्रमशः)

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भगवान गणपति के द्वादश नाम के रहस्य (२)

गजकर्ण:- आर्य संस्कृति में श्री गणेश को बुद्धि का अधिष्ठात्र देवता माना गया है श्री गणेश के लम्बे कान सब कुछ सुनने की क्षमता रखते हैं। शास्त्र हमें यह शिक्षा देते हैं कि सुननी सबकी बात चाहिये किन्तु कोई भी कार्य ऊँचे लोगों से विचार विमर्श के पश्चात् ही करना चाहिए यही सीख देने के लिये श्री गणेश जी ने हाथी के समान लम्बे कान धारण किये हैं। श्री गणेश के लम्बे कानों में यह रहस्य भी छिपा हुआ है कि छुद्र अर्थात छोटे कानों वाला व्यक्ति सदैव व्यर्थ की बातों को सुनकर अपना ही अहित करने लगता है। श्री गणेश के लम्बे कान यह शिक्षा भी देते हैं कि व्यक्ति को अपने कान ओछे न रखकर इतने विस्तृत बना लेने चाहिए कि उनमें सहस्त्रों निंदकों की सभी अच्छी बुरी बातें इस प्रकार समा जाँय कि वे फिर कभी जिह्वाग्र पर आने का प्रयास न करें।


लम्बोदर :- लम्बा उदर समस्त भली बुरी बातों को उदरस्थ करने की प्रेरणा देता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान शंकर द्वारा बनाये हुये डमरू की ध्वनि से श्री गणेश ने सम्पूर्ण वेदों को ग्रहण किया, माता पार्वती के चरणद्वय में झंकृत होने वाले नूपुरों से संगीत सीखा, प्रतिदिन ताण्डव नृत्य देखने और उसके अभ्यास के बल से नृत्य सीखा और इस तरह से प्राप्त विभिन्न ज्ञानों को आत्मसात करने के कारण उनका उदर लम्बायमान हो कोष रूप में परिणित हुआ ।


विकट - इसके अनन्तर श्री गणेश का छठा नाम समाने आता है और वह है विकट । विकट का अर्थ होता है भयंकर श्री गणेश का धड़ (कण्ठ से पैर तक का भाग) है नर का और ऊर्ध्वांग अर्थात मुख है- हाथी का । अतः ऐसा विकट प्राणी विकट होगा ही यह निर्विवाद है। श्री गणेश के नाम के रूप में इसका भाव यह है कि श्री गणेश अपने नाम को सार्थक बनाते हुए सभी प्रकार के विघ्नों की निवृत्ति के लिये विघ्नों के मार्ग में विकट बनकर उपस्थित रहते हैं क्योंकि वे जानते हैं 'शठे शाठ्य समाचरेत्' अर्थात बुरे और दुष्ट व्यक्तियों को सौम्यता से नहीं, अपितु तद्वत् बनकर ही दबाया जा सकता है। अतः यह नाम भी सार्थक ही है। गणपत्यथर्वशीर्ष के नवम मंत्र में श्री गणेश के लिये लिखा है विघ्ननाशिने शिवसुताय वरदमूर्तये नमः । इसका भाव हैं हम विघ्नों को नष्ट करने वाले, शिव के पुत्र, वरप्रदायी मूर्ति रूप में प्रकटित श्री गणेश को नमस्कार करते हैं। सुप्रसिद्ध भाष्यकार श्रीसायणाचार्य ने विघ्ननाशिने का भाष्य इस प्रकार प्रस्तुत किया है विवनाशिने कालात्मक भयहारिणे, अमृतात्मकपदप्रदत्वात् अर्थात श्री गणेश कालात्मक भय को हरण करने वाले हैं क्योंकि वे अमृतात्मक पद के प्रदाता हैं। स्कन्दपुराण के अनुसार इन्द्र ने निज भाग शून्य यज्ञ के विध्वंस के लिये जब कालका आह्वान किया तब वह विनासुर के रूप में प्रकटित हो, अभिनन्दन राजा को मारकर सत्कर्मों का लोप करने लगा तब महर्षियों ने ब्रह्माजी की प्रेरणा से श्री गणेश की स्तुति कर उनके द्वारा विनासुर का उपद्रव दूर करवाया। उसी समय से गणेश पूजन स्मरणादिविरहित कार्य में विघ्न का प्रादुर्भाव अवश्य होता है। यह मान्यता स्वीकार कर कार्यारम्भ में श्री गणेश पूजन अनिवार्य प्रतिपादित किया गया है । विन भी सामान्य नहीं है। यह कालस्वरूप होने से भगवत् स्वरूप, अतएव अतीव महिमान्वित है। इसके स्वरूप का निदर्शन इस प्रकार प्राप्त होता है विशेषेण जागत्सामर्थ्यं हन्तीति विघ्नः ब्रह्मादिक की भी जगत्सर्जनादि सामर्थ्य का हरण करने वाले तत्व को विघ्न कहते हैं। इस पर यदि किसी का शासन चलता है तो श्री गणेश का ही अतः गणेश का विनेश नाम न केवल सार्थक, अपितु उनकी लोकोत्तर महिमा का भी व्यापक है।


विनायक :- गणेश की इस नामावली का अष्टम नाम है विनायक । इसका अर्थ है विशिष्ट नायक या विशिष्ट स्वामी । कतिपय विद्वानों ने वि उपसर्ग को विघ्न का लघुस्वरूप स्वीकार कर विनायक का अर्थ विघ्नों का नायक भी स्वीकार किया है यह अर्थ पूर्णत: श्री गणेश पर चरितार्थ होता है क्योंकि ब्रह्मादि देवता अपने-अपने कार्य में विघ्र पराभूत होने के कारण स्वेच्छाचारी नहीं हो सकते, परन्तु श्री गणेश के अनुग्रह से ही विघ्नरहित होकर कार्य सम्पादन में समर्थ होते हैं और यही कारण है कि पुण्याहवाचन के अवसर पर भगवन्तौ विघ्नविनायकौं प्रीयेताम् कहकर विघ्न और उसके पराभवकर्ता श्री गणेश दोनों का स्मरण किया जाता है इससे वि विघ्न, नायक स्वामी विनायक शब्द की सार्थकता सिद्ध हो जाती है। इसी प्रकार यदि इस शब्द विनायक का अर्थ विशिष्ट नायक लिया जाय तो भी वह अन्वर्थक ही सिद्ध होता है क्योंकि श्रुति में श्री गणेश को ज्येष्ठराज शब्द द्वारा सम्बोधित कर उनके महत्व का प्रतिपादन किया गया है।

(क्रमशः)

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भगवान गणपति के द्वादश नाम के रहस्य (३)


धूम्रकेतु- श्री गणेश जी का नवम नाम है धूम्रकेतु । धूम्रकेतु का सामान्य अर्थ है अग्नि और शब्दार्थ हैं धूऐं के ध्वजवाला ।श्री गणेश के संदर्भ में इसके दो भाव प्रकट होते हैं। 1.संकल्प - विकल्पात्मक धूम धूसर अस्पष्ट कल्पनाओं को साकार बनानेवाले तथा उन्हें मूर्तरूप दे ध्वजवत् नभमण्डल में फहराने वाले होने के कारण गणेश का धूम्रकेतु नाम अन्वर्थक है। 2.इसी प्रकार अग्नि के समान मानव की आध्यात्मिक अथवा आधिभौतिक प्रगति के मार्ग में आने वाले विघ्नों को भस्मसात् कर मानव को चरमोत्कर्ष की दिशा में उन्मुख बनाने की क्षमता से परिपूर्ण होने के कारण भी श्री गणेश का धूम्रकेतु नाम सार्थक ही प्रतीत होता है।


गणाध्यक्ष :- श्री गणेश का दशम नाम है। इसके दो अर्थ 1. संख्या में परिगणित हो सकने योग्य सभी पदार्थों के स्वामी तथा 2.प्रमथादि गणों के स्वामी विचार करने पर उक्त दोनों ही नाम अन्वर्थक जान पड़ते हैं। विश्व के परिगणनीय जितने भी पदार्थ हैं- श्री गणेश उन सबके स्वामी हैं। जैसा कि निम्न श्लोक से स्पष्ट है कि श्री गणेश देवता, नर, असुर,और नाग इन चारों के संस्थापक एवं चतुर्वर्ग (धर्म,अर्थ,काम, मोक्ष) तथा चतुर्वेदादि के भी स्थापक हैं।

स्वर्गेषु देवताश्चायं पृथ्व्यां नरांस्तथाऽतले ।
आसुरान्नागमुख्यांश्च स्थापयिष्यति बालकः ॥
तत्वानि चालयन् विप्रास्तस्मान्नाम्ना चतुर्भुजः ।
चतुर्णां विविधानां च स्थापकोऽयं प्रकीर्तितः ॥

गणों के स्वामी तो श्री गणेश हैं ही। इस पद पर वे स्वयं भगवान शंकर द्वारा प्रतिष्ठित किये गये या गणों द्वारा, इस सम्बन्ध में दोनों ही प्रकार के विवरण प्राप्त होते हैं। गणपति सम्भव के अनुसार जब भगवान् शंकर ने गज का मस्तक जोड़कर श्री गणेश को पुनर्जीवित कर दिया, तब सभी शिवगण समवेत होकर नाचते हुए अपने ऊपर उनको वरीयता देने लगे तथा गणपति कहकर सम्बोधन करते हुए उनकी जय-जयकार मनाने लगे।


भालचन्द :- श्री गणेश का ग्यारहवाँ नाम है- भालचन्द्र । इसका भाव है जिसके मस्तक (भाल) पर चन्द्र हो । भगवान शंकर के मस्तक में विराजमान चन्द्रमा का ही यह संक्षिप्त संस्करण है। चन्द्र की उत्पत्ति विराट के मन से मानी जाती है और उस चन्द्र तत्व से सब प्राणियों के मन अनुप्राणित माने जाते हैं। अतः श्री गणेश के संदर्भ में इसका भाव यही है कि वे भाल पर चन्द्र को धारण कर उसकी शीतल निर्मल कान्ति से विश्व के सभी प्राणियों को आप्यायित किया करते हैं। इसके साथ ही भालचन्द्र से यह भी विदित होता है कि व्यक्ति का मस्तक जितना शांत होगा उतनी ही कुशलता के साथ वह अपना दायित्व निभा सकेगा। श्री गणेश गणपति अर्थात् प्रत्येक गणनीय वस्तु के पति हैं, अतः अपने मस्तिष्क को सुशान्त बनाये रखने के प्रयास में सफलता पाकर, तत्परक नाम धारण कर सफलता कामियों के लिये एक समुज्जवल मार्ग प्रशस्त किया है और बताया है कि यदि वे अपने मस्तक में चन्द्र की सी शीतलता लेकर कार्यरत होंगे तो सफलता निश्चय ही उनके पग चूमेगी।


गजानन :- इस द्वादश नामावली का अंतिम नाम है गजानन । अर्थात हाथी के मुखवाला। गणेश के कण्ठ से ऊपर का भाग हाथी का है, इस तथ्य से सभी सुपरिचित हैं। नराकृति अर्धाङ्ग के साथ हाथी के मस्तक का मेल एक जीवित आश्चर्य ही कहा जा सकता है । परन्तु जब गजानन के सभी अवयवों पर दृष्टिपात कर हम एक निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, तब आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता है। मुख भाग में निम्न अवयव विशेषतः परिगणित होते हैं जिह्वा, दन्त, नासिका, कान और आँख जिह्वा सब विघ्नों की जड़ है। यह बहिर्मुखी होने के कारण परदोषगणन में विशेष रुचि लेती है परन्तु यदि मन जिह्वा के नुकीले भाग को दूसरों की ओर से हटाकर अपनी ओर कर ले,अर्थात् अपने दोषों का परिगणन करने लगे तो अनेकानेक झंझटों से मुक्त हो जाय। प्रकृति ने अन्य सभी प्राणियों के विपरीत हाथी की जिह्वा को दन्तमूल की ओर से कण्ठ की ओर लपलपाती हुई लगाया है अतः यह निर्विघ्नता विनायक विशेषता गणेश में विद्यमान रहकर उन्हें विघ्न विनायक का अन्वर्थक आश्रय बनाती है।


दन्त के सम्बन्ध में यह कहावत प्रसिद्ध ही है कि हाथी के दाँत खाने के और तथा दिखाने के और होते हैं। गणेश के दाँत भी इस बात के परिचायक हैं कि बुद्धिमान् व्यक्ति को ऊपरी दिखावा आन्तरिक भावों से सर्वथा भिन्न रखना चाहिये विशेषतः उस स्थिति में जब कि उसका सामना किसी सबल से हो परन्तु यह नीति केवल महाभारत के शब्दों में मायाचारों मायया बाधितव्यः के अनुसार एक सीमा तक ही आचरणीय है, सर्वथा एवं सवंदा अनुकरणीय नहीं इसलिए हाथी का मुख होते हुए भी दिखावे का दाँत केवल एक ही गणेश के साथ सम्पृक्त कर उन्हें एकदन्त पद से व्यवहृत किया जाता है।

शिव शासनत: शिव शासनत:

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Jai Jai Shri Radhe kirtan by Hanuman Prasad ji Poddar - Bhaiji
@Sanatan
Jai Jai Shri Radhe kirtan by Hanuman Prasad ji Poddar - Bhaiji

वाणी वैखरी से ऊपर स्तर की होने से सीधे दिल को छूती है, ऐसी वाणी फोन पर भी अपना अलग प्रभाव छोड़ जाती है।

इसी तरह श्रेष्ठ साधकों की आवाज भी होती चली जाती है।


श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार की आवाज भी वैखरी से ऊपर की वाणी का एहसास छोड़ती थी जिसे कानो से जादा हृदय से सुनने का मन करने लगता...
तो समझ लीजिए कि अब उसकी वाणी वैखरी की सीमा से ऊपर उठने लगी है ...

ऐसी ही वाणी और ध्वनि में आज राधाष्टमी पर इसे नेत्र बन्द कर सुनने से वैसा ही महसूस होगा जैसा वर्णन कर रहा हूँ ...

जय श्री राधे🌹

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ओंकार साधना
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उपासना विधि

हृत्युण्डरीकं विरजं विशोकं विशदं परम् ।
अष्टपत्रं केशराढ्यं कर्णिकोपरि शोभितम् ॥
आधारशक्तिमारभ्य त्रितत्त्वान्तमयं पदम् ।
विचिन्त्य मध्यतस्तस्य दहरं व्योम भावयेत् ॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मां त्वया सह । चिन्तयेन्मध्यतस्तस्य नित्यमुद्युक्तमानसः ॥


अर्थात उपासक स्वच्छ, शोकरहित, उज्ज्वल, अष्टदल कमल के समान मकरन्दयुक्त, कर्णिका से शोभायमान हृदय कमल के मध्य में आधार-शक्ति से आरम्भ करके त्रितत्त्वमय उत्तम पद का ध्यान करके दहरव्योम की भावना करे। ॐ इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण कर तुम्हारे साथ मेरा दहराकाश के बीच में सदा उत्कण्ठा से चिन्तन करें।


उपासना का फल

एवंविधोपासकस्य मल्लोकगतिमेव च ।
मत्तो विज्ञानमासाद्य मत्सायुज्यफलं प्रिये ॥

अर्थात हे प्रिये । इस प्रकार उपासना करने वाले को मेरे लोक की गति प्राप्त होती है और मुझसे ज्ञान प्राप्त कर वह मेरे ही सायुज्य को प्राप्त हो जाता है।


जप-विधि

ॐ अस्य श्रीप्रणवमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्री छन्दः, परमात्मा सदाशिवो देवता, अं बीजम्, उं शक्तिः, मं कीलकम्, मम मोक्षार्थे जपे विनियोगः ।


अङ्गन्यास

शिरसि, ब्रह्मणे ऋषये नमः । मुखे, गायत्रीच्छन्दसे नमः । हृदि, परमात्मने देवतायै नमः । गुह्ये, अं बीजाय नमः । पादयोः, उं शक्तये नमः । नाभौ, मं कीलकाय नमः । सर्वाङ्गे, मम मोक्षार्थे जपे विनियोगः ।


करन्यास

अं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । उं तर्जनीभ्यां नमः । मं मध्यमाभ्यां नमः । अं अनामिकाभ्यां नमः । उं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । मं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।


हृदयादिन्यास

ॐ ब्रह्मणे हृदयाय नमः । उं विष्णवे शिरसे स्वाहा। मं रुद्राय शिखायै वषट्।अं ब्रह्मणे कवचाय हुम् । उं विष्णवे नेत्रत्रयाय वौषट । मं रुद्राय अस्त्राय फट् ।


ध्यान

ॐ कारं निगमैकवेद्यमनिशं वेदान्ततत्त्वास्पदं चोत्पत्तिस्थितिनाशहेतुममल विश्वस्य विश्वात्मकम्। विश्वत्राणपरायणं श्रुतिशतैः सम्प्रोच्यमानं प्रभुं सत्यं ज्ञानमनन्तमूर्तिममलं शुद्धात्मकं तं भजे ॥


नमस्कार

ॐकारं विन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः । कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः ॥


प्रणव-जप का फल

महर्षि पतञ्जलि ने कहा है
ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्चं ।
अर्थात् प्रणव के जप से आत्मस्वरूप की प्राप्ति तथा सारे विघ्नों का नाश होता है।


भगवान् शंकर ब्रह्मा-विष्णु से कहते हैं-

तत्तन्मन्त्रेण तत्सिद्धिः सर्वसिद्धिरितो भवेत्।
अनेन मन्त्रकन्देन भोगो मोक्षश्च सिध्यति ।
सकला मन्त्रराजानः साक्षाद् भोगप्रदाः शुभाः ।।

अर्थात् उस उस मन्त्र से वह वह सिद्धि होती है, किंतु प्रणव मंत्र से सब सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। यह सकल मन्त्रों का मूल है और भोग मोक्ष दोनों का देने वाला है।


वेदादौ च प्रयोज्यं स्याद्वन्दने संध्ययोरपि । नवकोटिजपाञ्जप्त्वा संशुद्धः पुरुषो भवेत् ॥
पुनश्च नवकोट्या तु पृथिवीजयमाप्नुयात्।
पुनश्च नवकोट्यातु ह्यपां जयमवाप्नुयात् ॥
पुनश्च नवकोट्यातु जेजसां जयमवाप्नुयात्।
पुनश्च नवकोट्यां तु "वायोर्जयमवाप्नुयात्
आकाशजयमाप्नोति नवकोटिजपेन वै ।
गन्धादीनां क्रमेणैव नवकोटिजपेन वै ।।
अहंकारस्य च पुनर्नवकोटिजपेने वै ।
सहस्रमन्त्रजप्तेन नित्यं शुद्धो भवेत् पुमान् ।।
ततः परं स्वसिद्धयर्थं जपो भवति हि द्विजाः । एवमष्टोत्तरशतकोटिजप्तेन वै पुनः ।।
प्रणवेन प्रबुद्धस्तु शुद्धयोगमवाप्नुयात् ।
शुद्धयोगेन संयुक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ।।


अर्थात् वेद के आदि में तथा दोनों काल के संध्या-वन्दन में भी ॐकार का प्रयोग करना चाहिये। नौ करोड़ जप करने से पुरुष शुद्ध हो जाता है। फिर नौ करोड़ जप करने से पृथिवी तत्त्व का जय होता है । इसी प्रकार नौ-नौ करोड़ से क्रमश: जल, अग्नि, वायु एवं आकाश तत्त्व का जय होता है । पश्चात् नौ-नौ करोड़ से क्रमशः पञ्चतन्मात्राओं तथा अहंकार - तत्त्व का जय होता है। नित्य सहस्र मन्त्र जपने से पुरुष शुद्ध रहता है, फिर इससे अधिक जप आत्मज्ञान की सिद्धि के लिये होता है। इस प्रकार 108 करोड़ जप करने से पुरुष प्रबुद्ध होकर शुद्ध योग को प्राप्त होता है और शुद्ध योग से निःसन्देह जीवन्मुक्त हो जाता है। प्रणव रूप शिव का सदा जप और ध्यान करने वाला महायोगी समाधि में स्थित होकर शिवरूप हो जाता है।.
॥ शिव एव न संशयः ॥
शिव शासनत: शिव शासनत:

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दिगिभेन्द्रपदट्टम्
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अध्यात्म मानवीय बुद्धि से नहीं समझा जा सकता, दोनों भुर्वो के बीच में भूमध्य होता है एवं यहीं पर जब ध्यान करते हैं तब आज्ञा चक्र विकसित होता है। आज्ञा चक्र के भेदन के पश्चात् ही तीसरा नेत्र विकसित होता है, आध्यात्मिक ग्रंथि क्रियाशील होती है और तब जाकर अध्यात्म का क ख ग समझ में आता है। अगस्त्य मुनि ने अपने शिष्य से कहा अगर तुम्हें दक्षिणा देने की इतनी पड़ी है तो जाओ राघवेन्द्र सरकार के मुझे दर्शन करा दो। अगस्त्य मुनि का वह शिष्य प्रभु श्रीराम एवं लक्ष्मण को ले आश्रम पर आ गया, उसने अगस्त्य मुनि से कहा श्रीराम एवं लक्ष्मण आश्रम के दरवाजे पर आपसे मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, अगस्त्य मुनि दौड़ पड़े। जैसे ही श्रीराम चंद्र एवं लक्ष्मण जी ने अगत्स्य मुनि को देखा वे उनके चरणों में साक्षात् दण्डवत हो गये, अगत्स्य मुनि की आँखों से आँसू बह निकले भगवान स्वयं चलकर अगत्स्य मुनि के आश्रम पर आये थे एवं अगत्स्य मुनि मनुष्य देह में इसलिए रुके हुए थे।

अवतार का कोई नियम नहीं होता, प्रभु श्रीराम सब नियम धर्म से परे हैं। कब किसके चरणों में झुक जायें ? कब किसे गले लगा ले, कब क्या दे दें उनकी मर्जी । वशिष्ठ एवं विश्वामित्र कुल गुरु बन गये, राजगुरु बन गये केवल इसलिए कि अवतार के रूप में स्वयं भगवान आ रहे हैं फिर कैसी मर्यादा ? जो सेवा मिल जाये, जो चाकरी मिल जाये वही मंजूर है। वशिष्ठ ब्रह्मपुत्र हैं शुरू में वे आना कानी कर रहे थे पंडिताई हेतु परन्तु जब मालूम चला कि स्वयं भगवान आ रहे हैं तो पंडिताई भी मंजूर कर ली दिव्य रथ सजा हुआ था, यक्ष गंधर्व गान कर रहे थे, ब्रह्मलोक के पार्षद महर्षि शरभंग को ब्रह्म लोक ले जाने के लिए उनके दरवाजे पर खड़े हुए थे परन्तु जेसे ही शरभंग को पता लगा कि श्रीराम एवं श्री लक्ष्मण स्वयं उनके आश्रम आ रहे हैं उन्होंने ब्रह्मलोक का दिव्य रथ वापस कर दिया, अपनी सारी ब्रह्मोपासना तिरोहित कर दी जब भगवान स्वयं आ रहे हैं तब फिर क्या जरुरत पड़ी है ? ब्रह्मलोक जाने की। भरत को खड़ाऊ दे दी बोले राज्य करो। लात मारकर सत्ता ठुकरा दी, अयोध्या वासियों को गंगा नदी के किनारे सोते में छोड़कर चले गये, बालि को मार गिराया, समुद्र से कह दिया रास्ता दे नहीं तो तेरी सत्ता नष्ट, सुग्रीव को राजा बना दिया सत्ता उसमें प्रतिष्ठित कर दी, भीलनी शबरी को ऋषितुल्य बना दिया, विभीषण का राज्याभिषेक कर दिया, उसे लंकेश घोषित कर दिया, अपनी समस्त भूमि उठाकर ब्राह्मणों को दान कर दी और ब्राह्मणों ने अमानत के तौर पर वह भूमि श्रीराम को दे दी राज्य हेतु, अश्वमेघ का घोड़ा दौड़ा दिया "रोक सके तो रोक, " कौन रोक पाया ?

सम्पूर्ण पृथ्वी पर 11,000 वर्षों तक एक छत्र राज्य किया। सबकी सत्ता को अपने हस्तगत कर लेना, सबकी सत्ता को अपने अनुरूप चलाना ही राम राज्य है। वायु से कह दिया जब तक राम राज्य है मंद-मंद ही रहना नहीं तो तेरी सत्ता नष्ट, तू सत्ता विहीन, इन्द्र से कह दिया कभी उत्पात मत करना न अल्प वृष्टि करना न अति वृष्टि करना, औकात में रहना नहीं तो तेरी सत्ता छिन जायेगी। कुबेर से कह दिया, पर्वतों से कह दिया, नदियों से कह दिया, भूमि से कह दिया, वृक्षों से कह दिया, यक्षों से कह दिया कि अपनी छोटी-छोटी सत्ताएं मर्यादा में रखना, उत्पात मत करना, प्रपंच मत करना, मदमस्त मत होना, पगलाना मत नहीं तो समूलता के साथ नष्ट कर दिए जाओगे, अस्तित्वविहीन कर दिए जाओगे इसलिए राम राज्य में नदियाँ निर्मल थीं, अकाल मृत्यु नहीं थी अगर किसी की इच्छा मृत्यु की नहीं है तो उसकी मृत्यु नहीं होती थी। पिता के सामने पुत्र नहीं मरता था, विधवाएं नहीं थीं, पशु खूब दूध देते थे, फसलें लहराती थीं, वृक्ष सदैव फल फूल से लदे रहते थे, दुर्जनता नहीं थीं, ताले नहीं थे, बंधन नहीं थे, नपुंसकता नहीं थी, संतानहीनता नहीं थी क्योंकि राज राजेश्वर स्वयं पृथ्वी पर विद्यमान थे।

सूर्य से कह दिया केवल स्निग्ध किरणें ही वायुमण्डल पर अवतरित करो, चंद्रमा से कह दिया हमेशा अमृत ही छिड़को, क्रूर ग्रहों से कह दिया कि किसी की भी जन्मकुण्डली में उल्टा सीधा मत बैठना, अपनी मर्यादा में रहना, राजा बनने का स्वांग मत करना, जैसा मैं कहूं वैसा करना, मेरे अनुकूल रहना, मेरे लिए परेशानी का कारण मत बनना, अपनी तुच्छ सत्ता पर मत इतराना अन्यथा सत्ता छीन ली जायेगी और सबने एक स्वर में भय के मारे, मर्यादा के मारे कि कहीं सत्ता छिन न जाये इस कारणवश राम राज्य में दुर्लभ समायोजन बनाये रखा। जिससे जो चाहा वो काम ले लिया, जिसमें चाही उसमें सत्ता स्थापित कर दी, जिसे चाहा उसे पुजवाया, जिसे चाहा उसे धूल में मिला दिया। सीता जी के लिए युद्ध किया और स्वयं सीता जी का त्याग कर दिया, हनुमान को गले लगाया।.

(क्रमशः)

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दिगिभेन्द्रपदट्टम् (२)
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राम नाम की सत्ता बता दी, पत्थर तैर गये, वानर राक्षसों से ज्यादा वीर हो गये, भालुओं ने राक्षसों को पीट डाला। जैसे ही श्री हनुमान माता सीता का पता लगाकर लौटे परब्रह्म परमेश्वर श्रीराम ने उनकी तारीफ करना शुरु कर दी तो श्री हनुमान रोने लगे, चरणों को पकड़ लिया बोले यह सिर्फ आपकी सत्ता है, आपके द्वारा प्रतिरोपित शक्ति है मैं कुछ नहीं हूँ, श्री हनुमान सत्ता के रहस्य को समझ गये थे ।

अनंत कोटि ब्रह्माण्ड के राजा श्री राघवेन्द्र सरकार को लोग मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं परन्तु मैं कहता हूँ वे दूसरों को मर्यादित रखते हैं उन्हें मर्यादित रहने की जरुरत नहीं है। विभीषण कहने लगा मैं रावण का दाह संस्कार नहीं करूंगा इसने मुझे लात मारकर लंका से निकाला है श्रीराम बोले हे विभीषण इसका दाह संस्कार करो पूर्ण विधान के साथ मेरी आँखों के सामने क्या तुम खुद नहीं देख रहे हो कि इसकी मृत्यु के उपरांत इसके शरीर से प्राण निकलकर मेरे चरणों में विलीन हो गये, मृत्यु के अंतिम क्षण में इसने हे राम ही कहा, मुझे नमस्कार किया अत: मैंने इसे इसकी सत्ता दी । हनुमान तो रावण के शरीर को विदीर्ण कर समस्त लंका में घुमाना चाह रहे थे परन्तु श्रीराम ने उसे एक राजा के समान मृत्यु के पश्चात् भी सम्मान दिया, उसकी अंत्येष्ठि लंकेश की भांति ही की गई। सम्पूर्ण रामायण में एक ही संदेश जाता है कि सत्ता के पीछे मत भागो, सत्ता के गुलाम मत बनो, सत्ता के लिए स्वयं की सत्ता मत खोओ अपितु जो सत्ता प्रदान कर रहा है, सत्ता जिसके हस्तगत है उसे पकड़ो।

श्रीराम के सोलह पार्षद है, ये उनके नित्य पार्षद हैं। नित्य पार्षद का तात्पर्य है जिनकी सत्ता नित्य बनी रहती है, जो कभी सत्ता से च्युत नहीं होते। विभीषण आज भी लंकेश है, जाम्बवान आज भी राजा हैं, हनुमान आज भी राजा हैं। तंत्र का क्षेत्र बड़ा विचित्र है लंका में एक परम तांत्रोक्त नवग्रह मंदिर था जिसमें कि रावण ने अपनी तंत्र शक्ति से नवग्रहों का आह्वान कर सर्वप्रथम उन्हें बुलाया, उन्हें स्थापित किया और फिर उन्हें कैद कर लिया, उनकी सत्ता उनसे छीन ली। वास्तव में लंका में अनेकों तांत्रोक्त मंदिर थे जिनमें असंख्य देव शक्तियाँ, यक्ष शक्तियाँ, गंधर्व शक्तियाँ, देवियाँ रावण के द्वारा आह्वान करके बुला लीं गई और कालान्तर कैद कर ली गईं, उनके बाहर निकलने के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया गया, उनकी सत्ता छीन ली गई। ब्रह्मा की ब्रह्म शक्ति तक रावण ने कैद कर ली थी, यह सब कैसे हुआ ? रावण ने तो आद्या को भी ले जाना चाहा था परन्तु गणेश जी के कारण नहीं ले जा पाया।

वास्तव में अध्यात्म में भी विनिमय प्रणाली लागू है लोग कहते हैं हमारा काम नहीं हुआ, हमें फल नहीं मिला इत्यादि इत्यादि । अध्यात्म में भी आध्यात्मिक लखपति, करोड़पति, अरबपति, असंख्य पति होते हैं जो जितना आध्यात्मिक रूप से धनवान होगा वह उतनी ही दुर्लभतम श्रेष्ठतम आध्यात्मिक प्राप्ति करने में सक्षम होगा। मंत्र जप, अनुष्ठान, तपस्या, साधना, पूजन, योग, ध्यान इत्यादि नाना प्रकार की आध्यात्मिक गतिविधियों से अध्यात्म का सकल उत्पादन होता है और इस प्रकार जातक के पास आध्यात्मिक राशि का संचय होता है। आध्यात्मिक राशि भी भौतिक राशि के समान स्थांतरित होती है। चतुर जातक आध्यात्मिक विनिमय करता है वह चाहे तो दर्शन कर सकता है, ऐश्वर्य प्राप्त कर सकता है, दिव्य लोक में स्थान प्राप्त कर सकता है, देवी देवताओं एवं अन्य परा शक्तियों को अपने हस्तगत भी कर सकता है।

शिव अल्कापुरी के नजदीक निवास करते हैं, अल्कापुरी का शासक कुबेर है एवं कुबेर रावण का सौतेला भाई है। रावण ने अपनी आध्यात्मिक राशि से ब्रह्मा से वरदान खरीद लिए, अमरता प्राप्त की। वह अमर तो हो ही गया जब तक श्रीराम का नाम लिया जायेगा रावण का नाम भी लिया जायेगा। आध्यात्मिक राशि पूर्ण चैतन्य एवं प्रजनन की क्षमता से युक्त है अर्थात बड़ी तेजी से फलती-फूलती है। रावण कौन ? रावण वह जिसने कुबेर को मार भगाया एवं ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण आध्यात्मिक राशि पर एक छत्र अधिकार जमा लिया। कुबेर तो हिमालय की श्रृंखलाओं में छिप गये सब कुछ छोड़कर। रावण ऋषि-मुनियों को क्यों सताता था ? क्यों यज्ञ नहीं होने देता था ? क्यों उन्हें अनुष्ठान नहीं करने देता था ? सीधी सी बात है कहीं कोई और आध्यात्मिक राशि का संचय न कर ले, उससे ज्यादा आध्यात्मिक रूप से अमीर न हो जाये इसलिए वह यह सब करता था। अगर आप चेक काटोगे और आपके बैंक खाते में पैसा नहीं होगा तो चेक निरस्त हो जायेगा ठीक इसी प्रकार लोग ईश्वर से प्रार्थना करते हैं, हाथ जोड़ते हैं, मनोकामनाएं मांगते हैं इत्यादि इत्यादि । मनोकामना एक तरह से चैक पर लिखी हुई राशि है जो कि

(क्रमशः)

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दिगिभेन्द्रपदट्टम् (३)
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आपके बैंक खाते में आध्यात्मिक राशि कम होने से पूर्ण नहीं हो पाती। इस व्यवस्था के चलते एक भारी असंतुलन हो गया रावण खुद तो यज्ञ करता, प्रकाण्ड शिव भक्त था, प्रकाण्ड कर्मकाण्डी था, वह दिन प्रतिदिन नित नये आध्यात्मिक अनुष्ठानों का अविष्कार करता, दसों महाविद्याएं सिद्ध कर रखी थी उसने परन्तु किसी अन्य को नहीं करने देता। इस प्रकार वह तीनों लोकों का एकमात्र शासक बन गया, जैसे ही प्रभु श्रीराम माता कौशल्या के गर्भ से प्रकट हुए उन्होंने अपना मुस्कुराता हुआ स्वरूप दिखाया, माता कौशल्या बोल उठीं रोइये प्रभु, रूदन कीजिए क्योंकि आप रावण के द्वारा शासित भूमि पर आ गये हैं।

रावण का तात्पर्य है जो दूसरों को रुलाता हो, केवल रूदन का उत्पादन कराता हो अतः प्रभु श्रीराम रोये अनेकों बार रोये । वनवास जाते समय, अयोध्या वासियों से बिछड़ते समय रोये, सीता के लिए रोये, हनुमान के गले लगकर रोये, पिता की मृत्यु पर रोये, भरत के गले लगकर रोये, लक्ष्मण को शक्ति लगने पर रोये, जटायु की मृत्यु पर रोये बस यहीं रावण मार खा गया। राज राजेश्वर श्रीराम के एक-एक आँसू, राज राजेश्वरी श्री सीता के एक-एक आँसू की कीमत चुकाते चुकाते वह अपनी समस्त आध्यात्मिक राशि खो बैठा, कंगाल हो गया और मारा गया। लंका से सीता सर्वप्रथम मुक्त नहीं हुईं, सीता तो उग्रचण्डी बन अंत तक लंका में बैठी रहीं राम वियोग तो बहाना था, पहले सिंहिका मुक्त हुई, फिर नागमाता कद्रू मुक्त हुईं, फिर अनेकों देवियाँ मुक्त हुई, शनिदेव मुक्त हुए, सूर्य देव मुक्त हुए, नवग्रह मुक्त हुए, यक्ष, किन्नर मुक्त हुए । हनुमान जी ने एक-एक करके रावण के सभी तांत्रोक्त मंदिर जला डाले, यज्ञस्थान नष्ट कर दिए, सब यंत्रों का उत्कीलन कर दिया तब जाकर अंत में राज राजेश्वरी सीता ने लंका से प्रस्थान किया।

कुंभकरण का एक पुत्र हुआ था मूल नक्षत्र में जिसे कुंभकरण ने मूल नक्षत्र में उत्पन्न होने के कारण वन में छुड़वा दिया था एवं उसका नाम पड़ा मूलकासुर। रावण एवं मेघनाथ की मृत्यु के कारण वह अत्यंत ही व्यथित था उसने पुनः लंका पर कब्जा कर लिया विभीषण को मार भगाया, वह ब्राह्मणों से बोल रहा था चण्डी सीता के कारण मेरे कुल का नाश हुआ। ब्राह्मण ने कहा जा वही चण्डी तेरा सर्वनाश करेगी, राम उससे नहीं जीत पा रहे थे वे कल्प वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे तभी पुष्पक विमान से श्रीसीता आ गईं और उनके शरीर से एक दिव्य तामसी शक्ति निकली जिसने देखते ही देखते मूलकासुर का वध कर दिया परन्तु काली रूपा वह शक्ति नियंत्रित ही नहीं हो रही थी सम्पूर्ण रूप से अमर्यादित होती जा रही थीं अतः राम को उठना पड़ा और कुछ ही क्षणों में उनका स्पर्श पा वह महाकाली स्वरूपा शक्ति मर्यादित हो गई, पुनः शांत हो गई।
शिव शासनत: शिव शासनत:

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शंकरं प्रेमपिण्डम् (३)
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वामांग का अतिक्रमण कर लेती हूँ, जब मैं धूमा होती हूँ तो इन्हें उदरस्थ कर लेती हूँ, जब मैं कामाख्या होती हूँ तो इन्हें अपने अंदर स्थापित कर लेती हूँ, योनि स्वरूपा बन इनका आराधन कर लेती हूँ, विवाह के समय भी मैं इनके गोद में बैठी हुई थी, जब मैं तपस्विनी होती हूँ तो इनको हृदय में आत्मसात कर लेती हूँ, जब मैं छिन्नमस्ता होती हूँ तो इनके ऊपर सवार होती हूँ अतः इनके सम्पूर्ण अंगों पर केवल मेरा ही अधिकार है। इनके मानस, इनके शरीर, इनके दिव्यांग, इनके हृदय में तो सिर्फ मैं ही विराजती हूँ परन्तु अब ये कौन आ गया और मुझे मालूम ही नहीं चला, मेरी आज्ञा के विरुद्ध हे शिव आपने किसी और की सृष्टि कैसे की ? किसी और पर दृष्टि कैसे डाली ? किसी और को स्पर्श क्यों किया ? शिवा क्रोधित हो गई और जब शिव का ध्यान, शिव की मुग्धता उस बालक पर से नहीं हट रही थी तब उन्होंने उस बालक का मुख गज के समान कर दिया।

गज मुख गणेश उछलकर शिव की गोद से शिवा की तरफ बढ़ गया। शिव बोल उठे लो गजमुख को, "यह है शंकरम् प्रेम पिण्डम् " अर्थात शंकर का प्रेम पिण्ड तत्काल ही शिवा बोल उठीं नहीं नहीं यह तो "शिव-शिवा प्रेम पिण्डम् " है अर्थात शिव और शिवा दोनों के प्रेम का पिण्ड श्री गणेश और इस प्रकार देवताओं को शिव-शिवा प्रेम पिण्डम् के रूप में श्री गणेश प्राप्त हुए जिन्होंने कालान्तर विघ्न का निर्माण किया। हे गजगामिनी, हे गज योनि, हे गज माते, हे गज मणिधारिणी, हे गजाभिषेका कमले, हे गज मदयुक्ता, हे गजारूढ़ा, हे गजदर्शिनी, हे गज पोषिणी, हे गज सुगंधयुक्ता, हे गज वेमा देखो अपने इस गज मुखि पुत्र को देखो, देखो इसके कोमल पाँवों को इसमें गज रेखा बनी हुई है जो कि मध्य से शुरु होकर अंगुष्ठ तक जाती है। इसे कहते हैं गज केसरी योग यह गणनायक बनेगा, गणों की गिनती करेगा। देखो इसके चरण कमलों को इसमें ध्वजा, शंख, चक्र और पद्म विराजमान हैं अतः यह राज-राजेश्वर बनेगा एवं अनंत ब्रह्माण्डों के राजाओं के ऊपर शासन करेगा। सभी देव इसे पूजेंगे, बड़े-बड़े गजारूढ़ इसके चरणों

में मस्तक झुकायेंगे शिव कह उठे। हाँ जो गणपति के भक्त होते हैं, जिन पर गणपति कृपावान होते हैं उनके पैरों में गज रेखा होती है उनकी जन्मकुण्डली में गज केसरी योग होता है। देखो इसके पाँव के नाखून ये गज मुक्ता से भी ज्यादा प्रकाशवान हैं तुरंत गजगामिनी बोल उठीं हे गज चर्मधारी, हे गज पूजक, हे गजेश्वर, हे गज पिता, हे ॐकार नादा, हे गं मंत्र रचियता देखो इस बालक के कोमल हाथों की तरफ इसके हाथ में ॐकार बना हुआ है, इसके शुक्र पर्वत पर स्वस्तिक का चिह्न है, अरे इसके चंद्र पर्वत पर अंकुश बना हुआ है, इसके शुरु पर्वत पर पाश का शुभ चिन्ह है, यह तो आदि बृहस्पति है, हे गजासुर हंता अब समय आ गया है कि आप ॐकार नाद को छोड़ नाना प्रकार की उपासना पद्धतियों, पंचम वेद, 54 प्रकार के तंत्र ग्रंथ एवं परम गोपनीय शक्ति मंत्रों इत्यादि को अपने मुखारविंद से उच्चारित करें। मेरा यह गज मुखी पुत्र, मेरा यह मयूरेश्वर अपने दंत से, अपने पंख से उन सबको जन कल्याण के लिए लिपिबद्ध करेगा, शिव उवाच के लिपिबद्ध होने का समय आ गया है।

हे गजम्बिके जल्दी करो, इसके कोमल पाँवों में अपनी सदा झनकार करने वाली नूपुर बांध दो क्योंकि यह अब हमारे साथ नृत्य करेगा। जब मैं ताण्डव करूंगा तो यह अपनी शुण्डाग्र से मृदंग का नाद उपस्थित करेगा और जब तुम लास्य करोगी तो यह अपने पैरों में लगे घुंघरूओं को बजाते हुए तुम्हारे साथ सुर ताल मिलायेगा। देखो नारद तुम्बरु से वीणा वादन में हार रहा है। ब्रह्मा का पुत्र है परन्तु ब्रह्म शिष्य से हार रहा है। हे आदि सरस्वती स्वरूपा गजम्बिके उसे इतना नहीं मालूम कि वह गणेशोपासना भूल गया है क्योंकि तुमने अपनी विचित्र वीणा जो इस नृत्य गणपति के हाथ में थमा दी है। हे गजप्रिया देखो वह आदि वेद व्यास सिर धुन रहे हैं उन्हें इतना नहीं मालूम कि गणपति ने शिव उवाच को लिपिबद्ध करने के लिए अपना एक दंत तोड़ लिया है अतः इनकी उपासना के बिना अब कोई लेखक नहीं बन सकता, अब कोई नर्तक नहीं बन सकता, अब कोई गायक नहीं बन सकता, अब कोई कवि नहीं बन सकता, अब कोई वैज्ञानिक नहीं बन सकता, अब कोई जोड़-तोड़कर कुछ नहीं बना सकता। .

( क्रमशः)

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शंकर प्रेमपिण्डम् (४)
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यह तो सृष्टि के प्रथम वैज्ञानिक हैं क्योंकि तुमने और मैंने मिलकर जोड़-तोड़कर इन्हें गज-मुख बनाया है, एक अद्भुत समायोजन किया। है गज की उम्र भी 120 वर्ष और मनुष्य की उम्र भी 120 वर्ष, गज का मुख और मनुष्य का शरीर इन दोनों का अद्भुत समायोजन करके ही हमने प्रथम गणेश विज्ञान का निर्माण किया है कालान्तर ब्रह्मा ऐसे ही जोड़ तोड़कर पता नहीं क्या- क्या बनायेगा पर उसे भी गज मुख अपने यहाँ स्थापित करने पड़ेंगे। समस्त लोकों में चाहे इन्द्रलोक हो, ब्रह्म लोक हो, गौ लोक हो, विष्णु लोक हो, देवी तीर्थ हो, सिद्ध लोक हो इत्यादि सब जगह सबने गणपति को विराजमान किया है, उनकी उपासना की क्योंकि संसार का प्रत्येक कर्म प्रथम बार गणपति ने ही सम्पन्न किया है। वे शिव द्वारा रचित प्रथम ज्ञान के साक्षी हैं, वे प्रथम वाणी के साक्षी हैं, वे भगवती त्रिपुर सुन्दरी के प्रथम सौन्दर्य के साक्षी हैं वे शिव की प्रचण्डता के साक्षी हैं अतः मूलरूपी गणपति की उपासना के अभाव में चारों तरफ विघ्न ही विघ्न हैं। गणपति इसलिए गंभीर हैं क्योंकि उन्होंने जो देखा, उन्होंने जो सुना वह किसी ने नहीं देखा, किसी ने नहीं सुना किसी ने अनुभूत नहीं किया।
शिव शासनत: शिव शासनत:

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ॐ श्री परमात्मने नमः
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जिंदगी भर दौड़ती भागती रहती है यह दुनिया सुख और खुशियाँ पाने के लिए, जीवन की तृष्णा का अर्थ है कि हम अपने जीवन को कल में खोज रहे हैं, भविष्य में खोज रहे हैं पर जीवन अभी में है, आज मे है, इसी क्षण में है। जीवन आज है और आप हो कि अपनी आँखें कल पर लगाये बैठे हो एवं जो आज नहीं देखता वह चूक जाता है। समय का चक्र निरंतर चलता रहता है प्रत्येक क्षण अपने आप में एक अलग सत्ता है, प्रत्येक क्षण अपने आप में अलग व्यक्तित्व है जब तक आप क्षण को महत्व नहीं देते तब तक अपने व्यक्तित्व को नहीं समझ सकते। रावण लंका का राजा था एवं उसके क्रोध से समस्त भूमण्डल थर-थर कांपता था। उसने मंत्र-तंत्र के माध्यम से कुछ ऐसी विशेष सिद्धियाँ प्राप्त कर ली थी कि जिससे वह आकाश गमन कर सकता था, वह वायु, इंद्र आदि का मनचाहे ढंग से उपयोग कर सकता था। रावण ने भी अंत समय में काल के चक्र को मन ही मन प्रणाम करके कहा कि मैं सब कुछ करने में तो समर्थ हो सका पर समय का मूल्य और क्षण का महत्व नहीं जान सका इसलिए आज मैं ऐसी स्थिति को प्राप्त हुआ हूँ।

रावण का शरीर रणभूमि में मृत्यु की कगार पर पड़ा हुआ था एवं जब राम ने देखा कि युद्ध में विजय के पश्चात् लक्ष्मण में कुछ घमंड आ गया है तो वह लक्ष्मण को समझाते हैं, वह लक्ष्मण से कहते हैं कि देवताओं की कृपा से ही हम इस युद्ध में विजयी हुए हैं परन्तु इसका मतलब यह नहीं कि हम रावण से ज्यादा बलवान और चतुर है अगर सचमुच में देखा जाये तो रावण के समान विद्वान इस पृथ्वी पर कोई हुआ ही नहीं वह मंत्र और तंत्र के क्षेत्र में अद्वितीय था उसने प्रकृति एवं उसके साधनों को अपने वश में कर लिया। सामान्य लोग जिस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते उसने ऐसे-ऐसे असम्भव कार्यों को भी सम्भव करके दिखाया। वह जब चाहे तब अपनी लंका पर जितनी चाहे उतनी वर्षा कराने में समर्थ था, वह पर्वतो का स्थान बदलने में समर्थ था, वायु के वेग को वह अपने सामर्थ्य से रोक सकता था, स्वतंत्र रूप से आकाश में विचरण कर सकता था । इस पृथ्वी पर प्राकृतिक शक्तियों को जिस प्रकार रावण ने नियंत्रित किया था अन्य कोई व्यक्ति नहीं कर सकता। रावण इस पृथ्वी पर सबसे ज्यादा बलवान, विद्वान और योग्य व्यक्ति था । उसे समय की गणना का पूरा-पूरा ज्ञान था, समय ज्ञान अपने आप में एक बहुत बड़ी अद्भुत विद्या है। तुम रावण के पास जाकर काल ज्ञान की शिक्षा ग्रहण करो लक्ष्मण, राम की आज्ञा पाकर वह अनमने मन से रावण के पास जाते हैं।

वहाँ पहुँचकर लक्ष्मण ने देखा कि मृत्यु के समय भी रावण के चेहरे पर मुस्कुराहट है । लक्ष्मण गर्व से विजयी भाव लिए रावण से कहते हैं कि मेरे बड़े भाई राम ने मुझे आपके पास भेजा है और मैं आपसे काल ज्ञान की शिक्षा लेने आया हूँ। रावण चुप रहा, न उसने लक्ष्मण को कोई आशीर्वाद दिया न अपने मुँह से कोई शब्द निकाला। रावण के उत्तर का इंतजार करते-करते जब काफी समय बीत गया तब क्रोध से तमतमाते हुए लक्ष्मण वापस अपने शिविर में आ गये एवं आकर राम से बोले आपने तो व्यर्थ में ही मेरा अपमान करा दिया एक हारे हुए व्यक्ति के पास जाने का कोई मतलब नहीं है। मैंने तो अपने क्षत्रिय कुल की मर्यादा भी रखी उसे प्रणाम भी किया पर उसने तो मुझसे एक बात भी नहीं की। राम ने कहा रावण इतना मूर्ख और असभ्य नहीं है अपितु वह ज्ञान के जिस स्तर पर है वहाँ हार-जीत में कोई भेद नहीं है अच्छा तुम यह बताओ जब तुम रावण के पास गये थे तब तुम कहाँ खड़े हुए थे। लक्ष्मण ने कहा में उनके सिरहाने खड़ा था, बस तुमने यही गलती कर दी थी। तुम वहाँ एक शिष्य के रूप में गये थे, तुम उनसे कुछ सीखने गये थे और जब कुछ सीखने ही गये थे तो तुम्हें उनके चरणों के पास खड़े होना चाहिए था क्योंकि शिष्य का स्थान चरणों के पास ही होता है।

शिष्य चाहे कितना भी महान क्यों न हो जाये उसे अपने गुरु के सामने कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए अपितु उसका व्यवहार हमेशा शालीन, नम्र एवं सुयोग्य शिष्य के समान होना चाहिए। तुम एक बार फिर उनके पास जाओ, लक्ष्मण राम की आज्ञा पाकर पुन: रावण के पास पहुँचते हैं। लक्ष्मण वहाँ पहुँचकर इस बार उनके चरणों के पास खड़े होते हैं और रावण से कहते हैं कि मैं दशरथ नंदन लक्ष्मण पूर्ण श्रद्धा के साथ आपके चरणों में नमन करता हूँ। रावण ने तुरंत उसे आशीर्वाद दिया दीर्घायु एवं विजयी होने का प्रसन्न मन से लक्ष्मण ने निवेदन किया मैं श्रीराम की विशेष आज्ञा से आपसे काल - ज्ञान की शिक्षा लेने आया हूँ अतः आप मुझे इस योग्य समझे तो काल ज्ञान प्रदान करने की कृपा करें। रावण ने समय के महत्व को समझाते हुए कहा कि समय का चक्र निरंतर चलता रहता है और जो अपने जीवन में समय के चक्र को पहचान लेता है वह निश्चय ही अपने लक्ष्य तक पहुँचने में सफल हो जाता है एवं उसकी प्रगति को विधाता भी नहीं रोक सकते।

(क्रमशः)

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‌‌ ॐ श्री परमात्मने नमः (२)
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प्रत्येक क्षण का एक अलग ही महत्व है, प्रत्येक क्षण की अपनी एक अलग ही सत्ता होती है, एक क्षण का दूसरे क्षण से कोई मुकाबला नहीं है, दोनों क्षणों की आपस में कोई तुलना नहीं है। एक क्षण विशेष में किया हुआ कार्य जहाँ पूर्णतः सफल होता है वही दूसरे क्षण विशेष में उसी कार्य में असफलता हाथ लगती है । रावण ने कहा मैं इस बात को अभी यहीं सिद्ध किये देता हूँ। रावण ने अपने आस-पास से सात पत्ते इकट्ठा किए और लक्ष्मण से कहा मैं लोहे की शलाका से एक विशेष क्षण में इन्हें भेदूंगा तब तुम्हें प्रत्येक क्षण की स्वतंत्र सत्ता समझ में आ जायेगी फिर रावण ने शलाका पत्तों पर चुभो दी। उसने देखा कि पहला पत्ता सोने में परिवर्तित हो गया, दूसरा पत्ता चाँदी में तीसरा पत्ता ताँबे में और चौथा लोहे में परिवर्तित हो गया। इस प्रकार छः पत्ते अलग-अलग धातुओं में परिवर्तित हो गए और साँतवा पत्ता सिर्फ पत्ता ही रह गया उसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ, यही क्षणों की पहचान और उसका महत्व है। सातों पत्तों को भेदने बहुत ही कम समय लगा हर क्षण की विशेष सत्ता के कारण पतों में भी विशेष परिवर्तन हुए। एक क्षण दूसरे क्षण से अलग है इसलिए व्यक्ति को क्षणों की पहचान कर लेनी चाहिए और उन्होंने लक्ष्मण को काल ज्ञान की दीक्षा प्रदान करके आशीर्वाद दिया।

‌जीवन का गहनतम प्रयोग यह है कि आप समय को पहचानो, उसका मूल्य समझो, समय बहुत ही अनमोल है, जीवन से तृष्णा को दूर करो, जीवन से वासना को दूर करो। जीवन की तृष्णा का अर्थ है कि सभी तृष्णाएं भविष्य में होती हैं। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि जिस क्षण में हम बैठे हैं उस क्षण हम किसी वासना में नहीं डूब सकते अपितु सारी वासनाएं कल के लिए होती हैं। वासना के लिए समय चाहिए, स्थान चाहिए। हम जब भी कुछ चाहते हैं भविष्य के लिए चाहते हैं अगर भविष्य न हो तो इच्छा मर जाती है अगर कोई इच्छा ही न रहे, कोई चाहत ही न रहे तो भविष्य समाप्त हो जाता है अगर चाह छूट जाये तो आदमी वर्तमान में आ जाता है यदि हम वर्तमान में आ जाये तो चाह छूट जाती है जीवन की तृष्णा को हम भविष्य में खोज रहे हैं जबकि जीवन यहाँ है, जीवन तो आप स्वयं ही हो और आप की आँखें कल पर लगी हुई हैं।

जो बहुमूल्य समय आपके पास आज है वह आपको दिखाई नहीं पड़ता है यही अनमोल क्षण हमसे चूक जाता हैं इसलिए हम सभी दुःखी हैं हमें दुःखी होने की इतनी कलाएं आती हैं कि जिसका कोई हिसाब ही नहीं है क्योंकि हम सब भविष्य में जीते हैं और भविष्य कभी नहीं आता बस हमें वह आता हुआ दिखाई देता है। भविष्य की तृष्णाएं दुःख देती हैं जितनी ज्यादा तृष्णाएं होंगी उतना ज्यादा दुःख होगा। एक बार तरकश से तीर निकल गया तो फिर उसे रोकने का कोई उपाय नहीं है। भिखारियों के समान जो इस जगत में जीयेगा वह दुःखी रहेगा परन्तु जो सम्राटों की तरह अपना जीवन जियेगा वह सदा सुखी रहेगा। किसे कहते हो आप सम्राट - सम्राट । सम्राट वह है जो सुखी है, संतुष्ट है। हम अपने चारों तरफ सुख की तलाश करें कि सुख कहाँ है वह आपके पास ही है बस पहचानने की क्रिया आनी चाहिए, सुख का अपार भण्डार है आपके पास बस आपमें उसे ग्रहण करने की क्षमता होनी चाहिए जब भी आप जो भी कार्य करें पूरी लगन से सुख पूर्वक करें जब आप पानी पियें तो सुख पूर्वक पियें, भोजन करें चाहे वह दाल-रोटी ही क्यों न हो तो सुखपूर्वक करें। राह पर चलो या वृक्ष के नीचे बैठें चाहे आप ध्यान लगा रहे हो तो उसे भी सुखपूर्वक लगाओ।

आप जो भी काम कर रहे हो सुख से करो। इतना सुख है कि आप समेट भी नहीं पाओगे, इतना सुख है कि आपकी सारी झोलियाँ छोटी पड़ जायेगीं, इतना सुख है कि आपके हृदय में सुख की बाढ़ आ जायेगी और जिस दिन आपके हृदय में सुख की बाढ़ आ जाये आप समझ लेना कि आप स्वयं सम्राट बन गये, आपके चारों तरफ सुख का वातावरण चलने लगेगा, जो भी आपकी छत्र-छाया में बैठेगा वह भी सुखी हो जायेगा, आपके नृत्य से वह भी नृत्य करने लगेगा, आपके चारों तरफ सुख ही सुख का वातावरण चलने लगेगा, आप जिसे छुओगे उसे सुख का स्पर्श होगा, जिसकी तरफ देखोगे वहाँ सुख के फूल खिलने लगेंगे। सुख कोई इच्छा नहीं है वह जीने की एक कला है एवं आप इस कला को सीखे

(क्रमशः)

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ॐ श्री परमात्मने नमः (३)
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फिर आपके भीतर इतना सुख होगा कि वह बहने लगेगा, अपने आप बटने लगेगा, सुख की तरंगे आपकी अंदर से उठने लगेगीं, सुख के गीत झरने लगेंगे। सुख से जीने का एक अलग ही ढंग है जो वर्तमान में जीते हैं, हर क्षण को जीते हैं, क्षण-क्षण की बात करते हैं वह जीवन को कल पर नहीं थोपते एवं जो कल की बात करते हैं, जो लोग दिन भर ख्याली पुलाव बनाते हैं, जो महत्वाकांक्षा से भरे हैं वह दुःख ही पाते हैं। वह जीते सुखी होने के लिए है पर दुःख ही पाते हैं। मैं यह नहीं कहत कि आप हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाओ अपितु अपने व्यापार में, अपने केरियर में जो महत्वाकांक्षा है उन्हीं के अनुसार परिश्रम करे। अत्यधिक महत्वाकांक्षी पागलों के समान श्रम करते हैं, परिश्रम भी करें तो सुख से करें, हँसते मुस्कुराते हुए करें फिर जीवन में हर तरह का पूर्ण भौतिक और पूर्ण आध्यात्मिक सुख मिलता है। जिस ओर भी हम श्रम करते हैं हमें उसका फल तो प्राप्त होता ही है।

आम का पेड़ लग गया तो आम उगेगा ही पर चौबीस घण्टे फल के उगने के लिए रोते रहोगे तो दुःखी ही रहोगे। जब फल लगेगा तब खा लेना सुखपूर्वक । ईश्वर की कृपा भी उन्हीं को मिलती है जो उस तरफ की यात्रा करते हैं, ईश्वर भी उन्हीं की सहायता करता है जो दूसरों को सहायता देने में कंजूसी नहीं करते हैं। प्रसाद उन्हीं को मिलता है जो श्रम करते हैं, प्रयास करते हैं। मुफ्त में कुछ भी नहीं मिलता फिर परम सुख की खोज मुफ्त में कैसे हो सकती है ? लोग कहते हैं हम सुख से कैसे जियें ? आप जिस क्षण में हो उसका पूरा-पूरा सदुपयोग करें, आपको एक-एक क्षण को जीना आ जायेगा। कैसे ? यह मत पूछिए बस आप जो भी कार्य करें सुख पूर्वक करें, चलो तो सुख से, बैठो तो सुख से, श्वास लो तो सुख से आपकी प्रत्येक क्रिया में सुख का झरना बहने लगेगा, सुख के लिए रुको मत, सुखी होने के लिए उसका इंतजार मत करो, सुख को भविष्य के लिए मत छोड़ो। आप जहाँ भी खड़े हो जैसे भी खड़े हो आप जो कुछ भी कर रहे हो सुख से करो। "बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले न भीख"

हमारे मन में कई जन्मों के संस्कार हैं, कई जन्मों से हमने दुख के सिवा कुछ भी इकट्ठा नहीं किया यही संस्कार बार-बार धक्के मारकर दुःख के आवरण में प्रविष्ट करा देते हैं। दुःखी होने की प्रवृत्ति पाप है यह शायद सुनने में आपको अच्छा न लग रहा होगा क्योंकि जो दुःखी होता है वह दूसरों को दुख देने में अधिक रस लेता है। उसे दुसरों को दुखी करना अच्छा लगता है जबकि दूसरे को दुःखी करना पाप है जो दूसरों को हमेशा दुखी करता है सोचो वह स्वयं कितना दुःखी आदमी है। अंदर से जिसके पास जो होगा वही तो बांटेगा जो स्वयं अपनी आत्मा पर दुःख की काली छाया नहीं पड़ने देता वह महासुख से भर जायेगा । वह सम्राट बन जायेगा। हम दूसरों को क्यों दुःख देना चाहते हैं? क्योंकि हम दुःखी हैं और जब तक हम अपने से ज्यादा दुःखी किसी को नहीं कर लेते हैं उसका दुःख देखकर हम थोड़े सुखी हो जाते हैं। हमारा सुख यही है कि हमने किसी को दुःखी कर दिया। हमने किसी से उसका सबकुछ छीन लिया, हमने उसको नीचा दिखा दिया, हमने उसकी अकड़ ढीली कर दी, हमने उसको भरी सभा में सबके सामने अपमानित कर दिया पर यह सब सुख नहीं है हम अपने चारों तरफ दुःख की लकीरें खींचते रहते हैं।

एक दुःखी पति अपनी पत्नी को दुःखी करता रहता है, दुःखी बेटा अपने बाप को दुःखी करेगा, पूरे का पूरा समाज दुःख का एक जंजाल बन गया है। जब हम अपने से ज्यादा किसी को दुःखी देख लेते हैं तब हम थोड़ा सुखी हो जाते हैं हम यह सोचते हैं कि यह हमसे ज्यादा दुःखी है। दूसरों को दुःख पहुँचाने में इतना ज्यादा व्यस्त हो जाते हैं कि अपनी सारी चिंताएं ही भूल जाते हैं। स्वयं दुःखी होना और दूसरों को दुःख पहुँचाना पाप है इसलिए अपने अंदर से पाप के बीज को बाहर निकालीये सुख पुण्य है, आनंद पुण्य है जब तक सुखी होते है तो पुण्यात्मा हो जाते है। लोग सोचते हैं हमने दान दे दिया हम पुण्यात्मा हो गये, हमने मंदिर बनवा दिया या हमने कोई गुरुद्वारा या गिरजाघर बनवा दिया, गरीब लोगों को भोजन करवा दिया, धर्मशाला बनवा दी तो तुम पुण्यात्मा बन जाओगे यह जरुरी नहीं। हो सकता है यह सब कार्य आप दूसरों को नीचा दिखाने के लिए या दुःख देने की वृत्ति से कर रहे हो अगर आप अहंकारी हो गये और अहंकार से आपने पड़ोसी को मुफ्त में दस हजार रुपया भी दे दिए तो वह दान नहीं है। जब भी आपको ऐसा लगे कि आपका मन आपको दुःख की वृत्ति में डाल रहा है, आप दुःख की वृत्ति में पड़ रहे हैं तो उस बीज को डालने से पहले ही अपने हृदय से उखाड़ फेंकना, देर मत करना इन जड़ों को भीतर प्रवेश मत करने देना, यहाँ अपने आप में बड़े साहस की जरुरत पड़ती है।

(क्रमशः)

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