सनातन धर्म • Sanatan Dharma
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यदि तुम केवल भगवान को चाहते हो तो यह बिल्कुल निश्चित है कि तुम उनको पाओगे । परन्तु प्रत्येक क्षण यह सब शंका - संदेह उपस्थित करना और व्यग्र होते रहना --- विलंब कराता है तथा ह्रदय एवं आँखों के सामने एक निकटवर्ती पर्दा डाल देता है । क्योकि जब साधक कोई प्रगति करेगा तो प्रत्येक पग पर विरोधी शक्तियां पैरों में फंदा डाल देने की तरह इन संदेहो को फ़ेंक देगी और उसे लड़खड़ाहट के साथ बीच में ही रोक देंगी --- ऐसा करना उनका धंधा ही है । हमें कहना यह चाहिये कि "चूकि मैं केवल भगवान को चाहता हूँ , मेरी सफलता निश्चित है । मुझे बस पुरे विश्वास के साथ आगे बढ़ते जाना है और स्वयं उनका हाथ गुप्त रूप से मुझे उनकी ओर उनके अपने पथ से और उनके अपने समय पर ले जाने के लिए वहां मौजूद रहेगा ।" इसी चीज को तुम्हें अपने मन्त्र के रूप में सतत अपने पास रखना होगा । दूसरी किसी चीज पर मनुष्य शंका कर सकता है , पर यह बात कि जो व्यक्ति केवल भगवान् को चाहता है वह उन्हें अवश्य पायेगा , एकदम सुनिश्चिच है , तथा दो और दो चार होने से भी अधिक सुनिश्चित है । यही वह श्रद्धा है जिसे प्रत्येक साधक को अपने ह्रदय की गहराई में रखना चाहिये जो उसे प्रत्येक ठोकर और आघात और अग्नि परीक्षा के समय उसे संभाले रखे । सच पूछो तो केवल मिथ्या विचार अभी भी तुम्हारे मन पर अपनी परछाई फ़ेंक रहे है , जो तुम्हें इस श्रद्धा को बनाई रखने से रोकती है । उसे दूर धकेल दो और कठिनाई की रीड़ चूर - चूर हो जायेगी ।

महर्षि श्री अरविन्द

@Sanatan
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तर्क पेट भर सकते हैं लेकिन तृप्ति नहीं दे सकते।


मैं आर्यसमाजी परिवार में पैदा हुआ सनातनी हूँ। चूंकि उस माहौल में रहा हूँ तो बहुत सी बातें सहज ही पता चल जाती हैं, जैसे शत्रुबोध, वर्तमान ज्यादातर आर्यसमाजियों में शत्रुबोध नहीं है,, आपके सामने इस्लाम मुँह खोले खड़ा है,, ईसाइयत के अजगर ने राष्ट्र को जकड़ रक्खा है, #कम्युनिस्ट लफंगों के गिरोह पूरी शक्ति से सक्रिय हैं,, लिबर्ल्स अपनी खाली खोपड़ी में सनातन नाश के बीज बो रहे हैं,, निलचट्टे इन सबसे एक कदम आगे चल रहे हैं। आपके पास करने के लिए कहने के लिए पूरी शक्ति से प्रतिकार करने के लिए सामने शत्रु उपस्थित है, लेकिन यह क्या??


आप मंचो से #मूर्तिपूजकों को गाली देने में व्यस्त हैं,, आपकी सारी शक्ति मूर्तियों और पुराणों के खंडन में लग रही है, आपकी सारी शक्ति सनातनियों का मजाक उड़ाने में लग रही है,, तर्क के नाम पर कुतर्क भरा है,, एकबार एक कार्यक्रम में मैं भी वक्ता के रूप में उपस्थित था,, मंच से एक अतिउत्साही मुर्खः कह रहे-गजनी #सोमनाथ को तोड़कर ले गया,, क्यों नहीं रक्षा की सोमनाथ ने तुम्हारी ?? खुद की रक्षा तो कर नही पाए तुम्हारी क्या करेंगे,, शिव पर चढ़े प्रसाद को चूहे खाते हैं और पिंडी पर हगते हैं, जो अपनी रक्षा नहीं कर सकता वह हमारी रक्षा कैसे करेगा ?? हमने उनसे उसी समय पलटकर पूछा कि महर्षि दयानंद को जहर देकर मारा गया, क्यों नहीं #यज्ञ ने उनकी रक्षा की??


स्वामी #श्रद्धानंद को गोली से मारा गया क्यों नहीं वेदों ने और सत्यार्थ प्रकाश ने बचाया उन्हें ?? स्वामी स्वतन्त्रानन्द के सिर में मुस्लिम ने पूरी कुल्हाड़ी उतार दी, क्यों नहीं तर्क ने उन्हें बचाया?? लोग मुझे ही पकड़कर बैठाने लगे कि आप बैठ जाइए, वक्ता जी -हें हें हैं, आपको नाराजगी है तो बैठकर बात करते हैं,, मैंने कहा कि जब आस्थाओं का मजाक मंच से उड़ाया जा रहा है तो हमारे प्रश्नों के उत्तर भी मंच से दिए जाएं, वह अंतिम दिन था और हमने आर्यसमाज छोड़ दिया, महादेव को अवधूत रूप में गुरु वरण किया। अवधूत आशीर्वाद से बुध्दि की मलिनता भी धीरे धीरे धुल रही है।


इस्लामिक आक्रांताओं ने देव विग्रहों का भंजन किया,, तुमने मंचो से उनका मर्दन किया,, फर्क क्या रह गया है दोनों में? उन्होंने पत्थरों पर प्रहार किया तुमने श्रद्धा पर चोट की,, वे पराए थे,, तुम तो अपने हो,, इसलिए अपराध भी तुम्हारा ही गहरा माना जाएगा।


भले और बुद्धिमान आर्य बंधुओ से विनती करता हूँ कि शत्रुबोध पैदा करें। एकजुट होकर पहले चादर फादर लाल और नीले टिड्डों से निपटें। यह युगधर्म है,, यही आपदधर्म है, यही धर्म है, कहीं ऐसा न हो की जीवन देवनिन्दा में रीत जाए और अंत में सिवाय पछतावे के कुछ न बचे पास में।


हां, एक बात और,,, हनुमानजी हमें देवों में सबसे प्रिय हैं, या तो शिव या हनुमानजी,,, हम तो लाड़ से इन्हें #दादा कहते हैं,, दादा हनुमान की जय हो,,,


अभी भी वक्त है सुधर जाओ, देवद्रोह के भागी होना शुभ नहीं, अंत भला तो सब भला।



@Sanatan
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जय श्रीराम
जय गुरूदेव
🙏रामनवमी पर्व की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं
❤️

@Sanatan
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राम मन्त्र का अर्थ........

र', 'अ' और 'म', इन तीनों अक्षरों के योग से 'राम' मंत्र बनता है। यही राम रसायन है। 'र' अग्निवाचक है। 'अ' बीज मंत्र है। 'म' का अर्थ है ज्ञान। यह मंत्र पापों को जलाता है, किंतु पुण्य को सुरक्षित रखता है और ज्ञान प्रदान करता है। हम चाहते हैं कि पुण्य सुरक्षित रहें, सिर्फ पापों का नाश हो। 'अ' मंत्र जोड़ देने से अग्नि केवल पाप कर्मो का दहन कर पाती है।

और हमारे शुभ और सात्विक कर्मो को सुरक्षित करती है। 'म' का उच्चारण करने से ज्ञान की उत्पत्ति होती है। हमें अपने स्वरूप का भान हो जाता है।

इसलिए हम र, अ और म को जोड़कर एक मंत्र बना लेते हैं-राम। 'म' अभीष्ट होने पर भी यदि हम 'र' और 'अ' का उच्चारण नहीं करेंगे तो अभीष्ट की प्राप्ति नहीं होगी।

राम सिर्फ एक नाम नहीं अपितु एक मंत्र है, जिसका नित्य स्मरण करने से सभी दु:खों से मुक्ति मिल जाती है। राम शब्द का अर्थ है- मनोहर, विलक्षण, चमत्कारी, पापियों का नाश करने वाला व भवसागर से मुक्त करने वाला।
रामचरित मानस के बालकांड में एक प्रसंग में लिखा है-

नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू।
अर्थात
कलयुग में न तो कर्म का भरोसा है, न भक्ति का और न ज्ञान का। सिर्फ राम नाम ही एकमात्र सहारा हैं। स्कंदपुराण में भी राम नाम की महिमा का गुणगान किया गया है-

रामेति द्वयक्षरजप: सर्वपापापनोदक:।
गच्छन्तिष्ठन् शयनो वा मनुजो रामकीर्तनात्।।
इड निर्वर्तितो याति चान्ते हरिगणो भवेत्। ---स्कंदपुराण/ नागरखंड

अर्थात यह दो अक्षरों का मंत्र (राम) जपे जाने पर समस्त पापों का नाश हो जाता है। चलते, बैठते, सोते या किसी भी अवस्था में जो मनुष्य राम नाम का कीर्तन करता है, वह यहां कृतकार्य होकर जाता है और अंत में भगवान विष्णु का पार्षद बनता है।

राम रामेति रामेति रमे रामे रामो रमे |
सहस्त्र नाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने ||

विष्णु जी के सहस्त्र नामों को लेने का समय अगर आज के व्यस्त समय में ना मिले तो एक राम नाम ही सहस्त्र विष्णु नाम के बराबर है । कलियुग का एक अच्छा पक्ष है की हज़ारों यज्ञों का पुण्य सिर्फ नाम संकीर्तन से मिल जाता है।

@Sanatan
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दीक्षा एवं अध्यात्म
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मनुष्य देह अत्यंत दुर्लभ है। इसके अभाव में पूर्णत्व भगवद् मिलन नहीं हो सकता । 84 लाख योनि भेदन के बाद यह दुर्लभ देह प्राप्त होती है। प्रत्येक जीव में चिद् अंश आत्मरूप अचिद् अंश देहरूप में विद्यमान रहता है। क्रम विकास के मार्ग में देह विकास के साथ-साथ आत्मा का भी विकास संगठित होता है। उपनिषद् इस विकास को अन्नमय कोष से प्राणमय कोष का विकास कहते हैं। प्रत्येक कोष में असंख्य जटिलताएं होती है प्राणमय कोष का विकास होने पर मन का पूर्वाभास स्फुरित होने लगता है। मनोमय कोष का विकास 84 लाख योनि भेदन करने के बाद ही संपादित होता है। जिस देह में मनोमय कोष का विकास हुआ है वही मनुष्य देह है। 84 लाख योनि का भेदन करते-करते अन्नमय कोष व प्राणमय कोष का विकास सम्पन्न हो जाता है। अन्य समस्त जीव देहों में मन विकसित नहीं होता इसलिए उनकी उन्नति नहीं होती।

दिव्य जीवन की प्राप्ति अध्यात्म के बगैर असम्भव है, अध्यात्म की प्रथम सीढ़ी और अंतिम सीढ़ी दीक्षा है। दीक्षा के बगैर आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत हो ही नहीं सकती। दीक्षा के द्वारा ही पशुत्व समाप्त होता है इसके बगैर पाप, अशुद्धि व पशुत्व का नाश हो ही नहीं सकता, अदीक्षित की देह अशुद्ध है और अशुद्ध देह से देवार्चन नहीं हो सकता है। परम तत्व ही जगत के आदि गुरु हैं इसलिए हमारा गुरु मंत्र ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः है। अखण्ड परम तत्व ही जगत के -आदि गुरु हैं और उनसे ही अनंत ज्ञान स्त्रोत प्रवाहित होते रहते हैं और हर धारा में उनकी ही विशिष्ट शक्ति प्रवाहित होती रहती है एवं जब यह विशिष्ट शक्ति गुरु अपने शिष्य में संचारित करते हैं तब वह गुरुपद को प्राप्त करता है। इस प्रकार आदि गुरु से वर्तमान काल पर्यंत तक गुरु शक्ति की धारा सूक्ष्म अणु प्रवाह द्वारा चलती रहती है। गुरु कृपा तथा परमेश्वर की विशिष्ट शक्ति के संयोजन से दुर्लभ योग युक्त अवस्था भी शिष्य में आती है।

वैसे दीक्षाओं के चार भेद हैं पहली मंत्र विचार द्वारा दीक्षा, इसमें साधक के तीन जन्म का विचार करके उसे विशेष मंत्र के साथ विशेष दीक्षा दी जाती है। जो कर्म कुशल होते हैं उन्हें क्रिया योग दीक्षा दी जाती है। तृतीय दीक्षा बीजोद्वार दीक्षा, यह विशेष प्रकार के साधकों को दी जाती है। चतुर्थ दीक्षा साक्षात्कारात्मक दीक्षा है, यह अत्यंत तीव्र शक्तिपात दीक्षा है, साधारण साधक इस दीक्षा के तेज को सहन नहीं कर सकते। कर्म शक्ति की महिमा अनंत है बिना कर्म के ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। कर्म शक्ति और ज्ञान शक्ति का मिलन होने पर भाव शक्ति का प्रस्फुटन स्वमेव होने लगता है, भाव शक्ति ही पूर्ण शक्ति है। कर्म शक्ति स्थूलरूपिणी है, ज्ञान शक्ति सूक्ष्म रूपा है जब स्थूल और सूक्ष्म का परस्पर एकीकरण हो जाता है तब अव्यक्तता आदि शक्ति की अभिज्ञता महसूस होने लगती है।

भावगत अवस्था में ही चैतन्य देह की प्राप्त होती है मात्र ज्ञान की प्राप्ति से शरीर चैतन्य नहीं हो सकता । इस देह में मात्र ज्ञान के द्वारा अमृत्व का संचार नहीं हो सकता, यह संचार होता है मन के द्वारा मन का साधनाओं के द्वारा अमन हो जाना तथा देह, प्राण और मन में एक तारतम्य होना यह सब आदि शक्ति के द्वारा ही सम्भव है। कर्म, ज्ञान तथा भाव इनमें से एक की भी उपेक्षा करके अन्य की प्राप्ति सम्भव नहीं हो सकती। कर्म प्राथमिक सोपान है। सेवा के द्वारा, उद्यम के द्वारा, कर्म शक्ति का प्रसाद प्राप्त हो सकता है। सेवा धर्म का मर्म अति गहन है, इससे बढ़कर कोई साधना नहीं है पर इसका मर्म योगीगण भी सम्यक रीति से नहीं जानते यह कार्य देखने में अत्यंत सरल है तथापि अति कठिन है। सेवा कार्य में कर्म शक्ति, ज्ञान शक्ति और भाव शक्ति इन तीनों का एकत्रीकरण हो जाता है। सेवाकार्य में ज्ञान, कर्म और भाव एक बिन्दु में हो जाते हैं ये बिन्दु ही मिलन बिन्दु है। इस मिलन बिन्दु में ही महाभाव स्फुरित होता है। सेवा कार्य महाभाव को प्रत्यक्ष कराता है। कर्म का स्थल है देह, ज्ञान का स्थल है आज्ञा चक्र और भाव का स्थल है अनाहत परन्तु महाभाव सहस्त्रार से भी अतीत है। महाभाव की स्थिति में त्रिकोण की स्थिति नहीं रह जाती वह चक्राकार हो जाती है यह अत्यंत ही महत्वपूर्ण है।

(क्रमशः)

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@Sanatan
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दीक्षा एवं अध्यात्म (२)
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महाभाव की स्थिति में ही महाआनंद प्रकट होता है, यही महाआनंद महारास है। कर्म शक्ति, ज्ञान शक्ति, भाव शक्ति के एकीकरण होने पर ही महाभाव अवस्था आती है यही सिद्धावस्था है। सिद्धाश्रम और सिद्ध देह ये एक दूसरे के पर्याय हैं यह सिद्ध देह ही षोडशी विद्या या जिसे श्री विद्या कहते हैं उनकी कृपा से ही प्राप्त होती है। दस महाविद्याओं में पहली तीन काली, तारा, षोडशी ये सर्व प्रधान विद्याएं हैं मूल एक से ही तीन होती है। सर्वमूलभूत एक ही विद्या श्री विद्या है। इसी को ब्रहा विद्या, ब्रह्ममयी भी कहते हैं। काली और तारा का मूलविद्या षोडशी से क्या सम्बन्ध है ? और ये एक से तीन कैसे हुई ? इसका फिर कभी विस्तार से वर्णन करूंगा। आत्म शक्ति ही षोडशी हैं। आत्म शक्ति के प्रकट हुये बिना सिद्धता, सिद्धियाँ, सिद्ध देह यह सम्भव नहीं है।

जगत में सब कुछ परिवर्तनशील परिणामी है यह कालशक्ति जनित क्रिया है, महाशक्ति तथा कालशक्ति इस जगत में क्रियाशील है, इस जगत में सब कुछ काल के अधीन है। साधना का अर्थ है काल का अतिक्रमण या उससे मुक्ति कालजय के लिये शक्ति साधना का प्रचलन अधिक है। इसके लिये षोडशी शक्ति का ज्ञान अति आवश्यक है। षोडशी की प्राप्ति का अर्थ है काल राज्य से मुक्ति, जब शक्ति राज्य में प्रवेश हो जाती है तब शक्ति के साथ शिव का नित्य सानिध्य रहता है, यही कामेश्वर व कामेश्वरी कहे जाते हैं। ये महात्रिकोण के मध्य में विराजित रहते हैं परन्तु षोडशी नित्या होने पर भी साक्षात् जगदम्बा हैं। षोडशी काल द्वारा बाधित नहीं होती, जिस देह में षोडशी कला का उपादान स्थित है वह देह अमृत स्वरूप है, उस देह में षोडशी कला पूर्ण प्रकाशित हो जाती है। षोडशी काल का शोषण करती हैं, यह अखण्ड कुमारी तत्व है जिससे विश्व प्रवर्तित हो रहा है पर उसका कुमारीत्व यथावत् है ।
शिव शासनत: शिव शासनत: 🌹

🙏 @Sanatan
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जय गुरुदेव

आप सभी गुरु भाई एवं बहनों को सदगुरुदेव के अवतरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
हम सब पर सदगुरुदेव का आशीर्वाद बना रहे।

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@Sanatan
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भगवान विष्णु के 'आवेशावतार', शस्त्र-शास्त्र के ज्ञाता, समता एवं न्याय के प्रतीक, भगवान श्री परशुराम जन्मोत्सव एवं अक्षय तृतीया पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं!

@Sanatan
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🐍🌝राहु काल : 7 दिनों में कब और किस समय होता है राहु काल, यह जानकारी आपको जरूर होनी चाहिए..!🌞🐉


भारतीय ज्योतिष में नौ ग्रह गिने जाते हैं, सूर्य, चंद्रमा, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, राहु और केतु। जिसमें राहु, राक्षसी सांप का मुखिया है जो हिन्दू शास्त्रों के अनुसार सूर्य या चंद्रमा को निगलते हुए ग्रहण को उत्पन्न करता है। राहु तमस असुर है। राहु का कोई सिर नहीं है और जो आठ काले घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले रथ पर सवार हैं। 

ज्योतिष में राहु काल को अशुभ माना जाता है। अत: इस काल में शुभ कार्य नहीं कि जाते है। यहां आपके लिए प्रस्तुत है सप्ताह के दिनों पर आधारित राहुकाल का समय,जिसे देखकर आप अपना दैनिक कार्य कर सकते हैं। 
 
🐍यहां आपके लिए प्रस्त‍ुत हैं वार के अनुसार राहु काल का समय:-

👉रविवार:- सायं 4:30 से 6:00 बजे तक।
 
👉सोमवार:- प्रात:काल 7:30 से 9:00 बजे तक।
 
👉मंगलवार:- अपराह्न 3:00 से 4:30 बजे तक।
 
👉बुधवार:- दोपहर 12:00 से 1:30 बजे तक।
 
👉गुरुवार:- दोपहर 1:30 से 3:00 बजे तक।

 
👉शुक्रवार:- प्रात:10:30 से दोपहर 12:00 तक।
 
👉शनिवार:- प्रात: 9:00 से 10:30 बजे तक।


।।🕉️इति शुभं भवतु🕉️।।


@Sanatan
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‘श्रीकृष्ण’ को अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है।


01. उत्तर प्रदेश में कृष्ण या गोपाल गोविन्द इत्यादि नामों से जानते है।

02. राजस्थान में श्रीनाथजी या ठाकुरजी के नाम से जानते है।

03. महाराष्ट्र में विट्ठल के नाम से भगवान् जाने जाते है।

04. उड़ीसा में जगन्नाथ के नाम से जाने जाते है।

05. बंगाल में गोपालजी के नाम से जाने जाते है।

06. दक्षिण भारत में वेंकटेश या गोविन्दा के नाम से जाने जाते है।

07. गुजरात में द्वारिकाधीश के नाम से जाने जाते है।

08. असम, त्रिपुरा, नेपाल इत्यादि पूर्वोत्तर क्षेत्रो में कृष्ण नाम से ही पूजा होती है।

09. मलेशिया, इंडोनेशिया, अमेरिका, इंग्लैंड, फ़्रांस इत्यादि देशो में कृष्ण नाम ही विख्यात है।

10. गोविन्द या गोपाल में “गो” शब्द का अर्थ गाय एवं इन्द्रियों, दोनों से है। गो एक संस्कृत शब्द है और ऋग्वेद में गो का अर्थ होता है–‘मनुष्य की इन्द्रियाँ’...जो इन्द्रियों का विजेता हो जिसके वश में इन्द्रियाँ हो वही गोविन्द है गोपाल है

11. ‘श्रीकृष्ण’ के पिता का नाम वसुदेव था इसलिए इन्हें आजीवन ‘वासुदेव’ के नाम से जाना गया। ‘श्रीकृष्ण’ के दादा का नाम शूरसेन था..

12. ‘श्रीकृष्ण’ का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के राजा कंस की जेल में हुआ था।

13. ‘श्रीकृष्ण’ के भाई बलराम थे लेकिन उद्धव और अंगिरस उनके चचेरे भाई थे, अंगिरस ने बाद में तपस्या की थी और जैन धर्म के तीर्थंकर नेमिनाथ के नाम से विख्यात हुए थे।

14. ‘श्रीकृष्ण’ ने 16000 राजकुमारियों को असम के राजा नरकासुर की कारागार से मुक्त कराया था और उन राजकुमारियों को आत्महत्या से रोकने के लिए मजबूरी में उनके सम्मान हेतु उनसे विवाह किया था। क्योंकि उस युग में हरण की गयी स्त्री अछूत समझी जाती थी और समाज उन स्त्रियों को अपनाता नहीं था।

15. ‘श्रीकृष्ण’ की मूल पटरानी एक ही थी जिनका नाम रुक्मणी था जो महाराष्ट्र के विदर्भ राज्य के राजा रुक्मी की बहन थी।। रुक्मी शिशुपाल का मित्र था और ‘श्रीकृष्ण’ का शत्रु।

16. दुर्योधन ‘श्रीकृष्ण’ का समधी था और उसकी बेटी लक्ष्मणा का विवाह ‘श्रीकृष्ण’ के पुत्र साम्ब के साथ हुआ था।

17. ‘श्रीकृष्ण’ के धनुष का नाम सार्ङ्ग था। शंख का नाम पाञ्चजन्य था। चक्र का नाम सुदर्शन था। उनकी प्रेमिका का नाम राधारानी था जो बरसाना के सरपंच वृषभानु की बेटी थी। ‘श्रीकृष्ण’ राधारानी से निष्काम और निश्वार्थ प्रेम करते थे। राधारानी ‘श्रीकृष्ण’ से उम्र में बहुत बड़ी थी। लगभग 6 साल से भी ज्यादा का अन्तर था। ‘श्रीकृष्ण’ ने 14 वर्ष की उम्र में वृन्दावन छोड़ दिया था।। और उसके बाद वो राधा से कभी नहीं मिले।

18. ‘श्रीकृष्ण’ विद्या अर्जित करने हेतु मथुरा से उज्जैन मध्य प्रदेश आये थे। और यहाँ उन्होंने उच्च कोटि के ब्राह्मण महर्षि सान्दीपनि से अलौकिक विद्याओ का ज्ञान अर्जित किया था।।

19. ‘श्रीकृष्ण’ कुल 125 वर्ष धरती पर रहे। उनके शरीर का रंग गहरा काला था और उनके शरीर से 24 घण्टे पवित्र अष्टगन्ध महकता था। उनके वस्त्र रेशम के पीले रंग के होते थे और मस्तक पर मोरमुकुट शोभा देता था। उनके सारथि का नाम दारुक था और उनके रथ में चार घोड़े जुते होते थे। उनकी दोनो आँखों में प्रचण्ड सम्मोहन था।

20. ‘श्रीकृष्ण’ के कुलगुरु महर्षि शाण्डिल्य थे।

21. ‘श्रीकृष्ण’ का नामकरण महर्षि गर्ग ने किया था।

22. ‘श्रीकृष्ण’ के बड़े पोते का नाम अनिरुद्ध था जिसके लिए ‘श्रीकृष्ण’ ने बाणासुर और भगवान् शिव से युद्ध करके उन्हें पराजित किया था।

23. ‘श्रीकृष्ण’ ने गुजरात के समुद्र के बीचों-बीच द्वारिका नाम की राजधानी बसाई थी। द्वारिका पूरी सोने की थी और उसका निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा ने किया था।

24. ‘श्रीकृष्ण’ को ज़रा नाम के शिकारी का बाण उनके पैर के अंगूठे मे लगा वो शिकारी पूर्व जन्म का बाली था, बाण लगने के पश्चात भगवान स्वलोक धाम को गमन कर गए।

25. ‘श्रीकृष्ण’ ने हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अर्जुन को पवित्र गीता का ज्ञान रविवार शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन मात्र 45 मिनट में दे दिया था।

26. ‘श्रीकृष्ण’ ने सिर्फ एक बार बाल्यावस्था में नदी में नग्न स्नान कर रही स्त्रियों के वस्त्र चुराए थे और उन्हें अगली बार यूँ खुले में नग्न स्नान न करने की नसीहत दी थी।

27. ‘श्रीकृष्ण’ के अनुसार गौ हत्या करने वाला असुर है और उसको जीने का कोई अधिकार नहीं।

28. ‘श्रीकृष्ण’ अवतार नहीं थे बल्कि अवतारी थे....जिसका अर्थ होता है–‘पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्।’ न ही उनका जन्म साधारण मनुष्य की तरह हुआ था और न ही उनकी मृत्यु हुई थी।
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सर्वान् धर्मान परित्यजम मामेकं शरणम् व्रज
अहम् त्वम् सर्व पापेभ्यो मोक्षस्यामी मा शुच--
(भगवद् गीता अध्याय 18)
‘श्रीकृष्ण’ कहते हैं–‘सभी धर्मो का परित्याग करके एकमात्र मेरी शरण ग्रहण करो, मैं सभी पापों से तुम्हारा उद्धार कर दूँगा, डरो मत।’

🙏🌹🌹जय श्री राधे राधे 🌹🌹
🙏🏻 हरे कृष्णा 🌹🌹🙏🏻

@Sanatan
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आत्मा की सात अवस्थाएं

वेद अनुसार जन्म और मृत्यु के बीच और फिर मृत्यु से जन्म के बीच तीन अवस्थाएं ऐसी हैं जो अनवरत और निरंतर चलती रहती हैं। वह तीन अवस्थाएं हैं : जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति। उक्त तीन अवस्थाओं से बाहर निकलने की विधि का नाम ही है हिन्दू धर्म।
यह क्रम इस प्रकार चलता है- जागा हुआ व्यक्ति जब पलंग पर सोता है तो पहले स्वप्निक अवस्था में चला जाता है फिर जब नींद गहरी होती है तो वह सुषुप्ति अवस्था में होता है। इसी के उल्टे क्रम में वह सवेरा होने पर पुन: जागृत हो जाता है। व्यक्ति एक ही समय में उक्त तीनों अवस्था में भी रहता है। कुछ लोग जागते हुए भी स्वप्न देख लेते हैं अर्थात वे गहरी कल्पना में चले जाते हैं।
जो व्यक्ति उक्त तीनों अवस्था से बाहर निकलकर खुद का अस्तित्व कायम कर लेता है वही मोक्ष के, मुक्ति के और ईश्वर के सच्चे मार्ग पर है। उक्त तीन अवस्था से क्रमश: बाहर निकला जाता है। इसके लिए निरंतर ध्यान करते हुए साक्षी भाव में रहना पड़ता है तब हासिल होती है : तुरीय अवस्था, तुरीयातीत अवस्था, भगवत चेतना और ‍ब्राह्मी चेतना।

जागृत अवस्था ----  अभी यह आलेख पढ़ रहे हो तो जागृत अवस्था में ही पढ़ रहे हो? ठीक-ठीक वर्तमान में रहना ही चेतना की जागृत अवस्था है लेकिन अधिकतर लोग ठीक-ठीक वर्तमान में भी नहीं रहते। जागते हुए कल्पना और विचार में खोए रहना ही तो स्वप्न की अवस्था है।
जब हम भविष्य की कोई योजना बना रहे होते हैं, तो वर्तमान में नहीं रहकर कल्पना-लोक में चले जाते हैं। कल्पना का यह लोक यथार्थ नहीं एक प्रकार का स्वप्न-लोक होता है। जब हम अतीत की किसी याद में खो जाते हैं, तो हम स्मृति-लोक में चले जाते हैं। यह भी एक-दूसरे प्रकार का स्वप्न-लोक ही है।
अधिकतर लोग स्वप्‍न लोक में जीकर ही मर जाते हैं, वे वर्तमान में अपने जीवन का सिर्फ 10 प्रतिशत ही जी पाते हैं, तो ठीक-ठीक वर्तमान में रहना ही चेतना की जागृत अवस्था है।

2.स्वप्न अवस्था ----  जागृति और निद्रा के बीच की अवस्था को स्वप्न अवस्था कहते हैं। निद्रा में डूब जाना अर्थात सुषुप्ति अवस्था कहलाती है। स्वप्न में व्यक्ति थोड़ा जागा और थोड़ा सोया रहता है। इसमें अस्पष्ट अनुभवों और भावों का घालमेल रहता है इसलिए व्यक्ति कब कैसे स्वप्न देख ले कोई भरोसा नहीं।
यह ऐसा है कि भीड़भरे इलाके से सारी ट्रेफिक लाइटें और पुलिस को हटाकर स्ट्रीट लाइटें बंद कर देना। ऐसे में व्यक्ति को झाड़ का ‍हिलना भी भूत के होने को दर्शाएगा या रस्सी का हिलना सांप के पीछे लगने जैसा होगा। हमारे स्वप्न दिनभर के हमारे जीवन, विचार, भाव और सुख-दुख पर आधारित होते हैं। यह किसी भी तरह का संसार रच सकते हैं।

सुषुप्ति अवस्था ----  गहरी नींद को सु‍षुप्ति कहते हैं। इस अवस्था में पांच ज्ञानेंद्रियां और पांच कर्मेंद्रियां सहित चेतना (हम स्वयं) विश्राम करते हैं। पांच ज्ञानेंद्रियां- चक्षु, श्रोत्र, रसना, घ्राण और त्वचा। पांच कर्मेंन्द्रियां- वाक्, हस्त, पैर, उपस्थ और पायु।
सुषुप्ति की अवस्था चेतना की निष्क्रिय अवस्था है। यह अवस्था सुख-दुःख के अनुभवों से मुक्त होती है। इस अवस्था में किसी प्रकार के कष्ट या किसी प्रकार की पीड़ा का अनुभव नहीं होता। इस अवस्था में न तो क्रिया होती है, न क्रिया की संभावना। मृत्यु काल में अधिकतर लोग इससे और गहरी अवस्था में चले जाते हैं।

तुरीय अवस्था ----  चेतना की चौथी अवस्था को तुरीय चेतना कहते हैं। यह अवस्था व्यक्ति के प्रयासों से प्राप्त होती है। चेतना की इस अवस्था का न तो कोई गुण है, न ही कोई रूप। यह निर्गुण है, निराकार है। इसमें न जागृति है, न स्वप्न और न सुषुप्ति। यह निर्विचार और अतीत व भविष्य की कल्पना से परे पूर्ण जागृति है।
यह उस साफ और शांत जल की तरह है जिसका तल दिखाई देता है। तुरीय का अर्थ होता है चौथी। इसके बारे में कुछ कहने की सुविधा के लिए इसे संख्या से संबोधित करते हैं। यह पारदर्शी कांच या सिनेमा के सफेद पर्दे की तरह है जिसके ऊपर कुछ भी प्रोजेक्ट नहीं हो रहा।
जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति आदि चेतनाएं तुरीय के पर्दे पर ही घटित होती हैं और जैसी घटित होती हैं, तुरीय चेतना उन्हें हू-ब-हू हमारे अनुभव को प्रक्षेपित कर देती है। यह आधार-चेतना है। यहीं से शुरू होती है आध्यात्मिक यात्रा, क्योंकि तुरीय के इस पार संसार के दुःख तो उस पार मोक्ष का आनंद होता है। बस, छलांग लगाने की जरूरत है।

तुरीयातीत अवस्था ---- तुरीय अवस्था के पार पहला कदम तुरीयातीत अनुभव का। यह अवस्था तुरीय का अनुभव स्थाई हो जाने के बाद आती है। चेतना की इसी अवस्था को प्राप्त व्यक्ति को योगी या योगस्थ कहा जाता है।
क्रमशः

@Sanatan
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इस अवस्था में अधिष्ठित व्यक्ति निरंतर कर्म करते हुए भी थकता नहीं। इस अवस्था में काम और आराम एक ही बिंदु पर मिल जाते हैं। इस अवस्था को प्राप्त कर लिया, तो हो गए जीवन रहते जीवन-मुक्त। इस अवस्था में व्यक्ति को स्थूल शरीर या इंद्रियों की आवश्यकता नहीं रहती। वह इनके बगैर भी सबकुछ कर सकता है। चेतना की तुरीयातीत अवस्था को ही सहज-समाधि भी कहते हैं।

भगवत चेतना ---- तुरीयातीत की अवस्था में रहते-रहते भगवत चेतना की अवस्था बिना किसी साधना के प्राप्त हो जाती है। इसके बाद का विकास सहज, स्वाभाविक और निस्प्रयास हो जाता है।
इस अवस्था में व्यक्ति से कुछ भी छुपा नहीं रहता और वह संपूर्ण जगत को भगवान की सत्ता मानने लगता है। यह एक महान सि‍द्ध योगी की अवस्था है ।

ब्राह्मी चेतना --- भगवत चेतना के बाद व्यक्ति में ब्राह्मी चेतना का उदय होता है अर्थात कमल का पूर्ण रूप से खिल जाना। भक्त और भगवान का भेद मिट जाना। अहम् ब्रह्मास्मि और तत्वमसि अर्थात मैं ही ब्रह्म हूं और यह संपूर्ण जगत ही मुझे ब्रह्म नजर आता है।
इस अवस्था को ही योग में समाधि की अवस्था कहा गया है। जीते-जी मोक्ष।
साभार.......

@Sanatan
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गुरु वाणी
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वर्तमान के समाज पर नजर डालें तो बस बड़े-बड़े मकान, एक से एक सुसज्जित बंगले, कीमती वस्त्रों से सुसज्जित स्त्री-पुरुष सर्वत्र दिखाई पड़ते हैं इसके अलावा घोर दरिद्रता, अभाव ग्रस्त जीवन, दो वक्त की रोटी के लिए जद्दोजहद करते हुए लोग भी दिखाई पड़ते हैं। इन दोनों धाराओं में जीवन जी रहे मनुष्यों को अगर जरा सी भी सुई चुभोई जाय तो सिर्फ मवाद ही मवाद निकलता हुआ दिखाई पड़ता है। पुष्प के पास जाओगे तो खुशबू मिलेगी, वृक्ष के पास जाओगे तो फल मिलेंगे। पशु भी आपको उपयोगी उत्पादन प्रदान कर देंगे परंतु मनुष्य सिर्फ मवाद ही उत्पादित कर रहा है। मवाद विष का प्रतीक है, मवाद दुर्गन्ध युक्त है। यहाँ पर मैं मवाद को घृणा, ईर्ष्या, द्वेष, छल-कपट, लटका हुआ मुँह, हिंसा, प्रपंच इत्यादि के रूप में व्यक्त कर रहा हूँ। कहने को तो ये भी उत्पादन है। विष भी उत्पादन ही है। विष रूपी उत्पादन का लक्ष्य मृत्यु है, दर्द है, पीड़ा है। घर आजकल कारागृह बन गए हैं जिसमें पति-पत्नी को प्रताड़ित करता है और पत्नी पति को कारावास देती है। बुजुर्ग तानाशाही पूर्वक शासन चलाते हैं और ग्रसित नव युवक फाँसी के फंदे पर झूलते हैं इत्यादि-इत्यादि यही सब कुछ झोपड़ पट्टी से लेकर आलीशान महलों में हो रहा है। सब एक-दूसरे का गला घोट रहे हैं, हिंसक पशुओं के समान एक-दूसरे को नोंच रहे हैं और सबके सब लहूलुहान एवं दिग्भ्रमित हैं।

समाज की प्रत्येक क्रिया मनुष्य की शक्ति को बिखेर रही है। बिखरना एक बात है और उर्ध्वगामी होना दूसरी बात है। गुरु इन्हीं सब विडम्बनाओं के बीच खड़ा रहता हुआ आपको निरंतर उर्ध्वगामी बनाने की कोशिश में लगा रहता है। उर्ध्वगामी बनने के लिए बिखरने की क्रिया रोकनी होगी या तो फैला लो लता के समान या फिर ऊँचे उठ लो वृक्ष के समान। घास बनोंगे तो पैरों तले रौंदे जाओगे, वृक्ष बनोंगे तो छाया प्रदान करोगे मनुष्यों को आश्रय प्रदान करोगे पक्षियों को । मवाद तभी बनता है जब आप घायल होते हैं और आपकी सिमटने की शक्ति क्षीण होती है। मवाद भौतिक तल पर भी है और मानस पर भी निर्मित होता है। अवचेतन में भी विषाद उत्पन्न होता है।

गुरु गणेश का प्रतीक होता है वह सर्वप्रथम घाव की, जो कि आपको आपके तथाकथित समाज ने प्रदान किया हैं, शल्य क्रिया करता है। घाव को सुखाता है और पुनः जख्म प्राप्त न हो इस प्रकार की व्यवस्था करता है। साथ ही साथ आप भी दूसरों को जख्म न प्रदान कर सकें इसलिए वह आपके नाखून और दाँत भी तोड़ता है। गणपति एक दन्तेश्वर हैं दो दाँत वाले तो असुर प्रवृत्ति के होते हैं। जब प्रत्येक घर में अराजकता व अव्यवस्था फैली हो तो वहाँ गुरु सूक्ष्म रूप से प्रवेश कर विघ्नों का नाश करते हुए देव शक्तियों को प्रतिष्ठित करते हैं। आज का मनुष्य मात्र बाहरी दिखावों में उलझ कर रह गया है। निमंत्रण-पत्र, शुभकामना संदेश इत्यादि इत्यादि का आदान-प्रदान कर इति श्री कर लेता है परन्तु वास्तव में आशीर्वादों का उत्पादन दुर्लभ होता जा रहा है। आशीर्वाद, शुभकामना, मंगलमय वचन, दीक्षाऐं इत्यादि हृदय-पक्ष के द्वारा सृजन की जाती है। यही इस ब्रह्माण्ड की सबसे तीक्ष्ण साधना है।

अति शीघ्र परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं परन्तु इनके द्वारा उत्पादन के लिए योग्यता तो अवश्य चाहिए। शिव का पुत्र तो बनना ही होगा। देव गणों का अधिपति तो होना ही होगा, विष का पान करना ही होगा । बुद्धि व सिद्धि को अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करना होगा। क्षेम व कुशल रूपी मानसपुत्र उत्पन्न करने होंगे। गणपति की एक और अर्धांगिनी हैं एवं उनका नाम पुष्टि है। कहने का तात्पर्य यह है कि गुरु मात्र अकेला कुछ नहीं करता। वह भी वास्तव में शिव परिवार का ही निर्माण करता है, जिस प्रकार शिव के परिवार में भैरव, गणेश, कार्तिकेय एवं अनेकों गण व अनुचर शिव पुत्रों के समान निवास करते हैं उसी प्रकार गुरु के सानिध्य में शिष्य शिव के मानस पुत्रों की तरह सत्कर्मों में क्रियाशील होते हैं। माता पार्वती सब के प्रति समान भाव रखती हैं। साधक का निर्माण आसान क्रिया नहीं है।

एक सामान्य व्यक्ति को आध्यात्मिक साधक में परिवर्तित करने के लिए गुरु को उतना ही प्रयत्न करना पड़ता है जितना कि कृष्ण ने अर्जुन के लिए किया था उसे पूर्ण योद्धा बनाने के लिए। साधक का निर्माण एक दिन की बात नहीं है और न ही एकाध संस्कार से कुछ होने वाला है। एक साधक का निर्माण लगभग 64 करोड़ संस्कारों के बाद ही सम्पन्न होता है। आप सोचिए गुरु को प्रतिक्षण के 100 वें हिस्से में भी संस्कार सम्पन्न करना पड़ता है। संस्कारों की क्रिया प्रवचनों, दीक्षाओं, साधनाओं एवं अन्य अतिसूक्ष्म; अदृश्य गूढ़ क्रियाओं के द्वारा सम्पन्न करनी पड़ती हैं। गणेश का स्थापन इतना आसान नहीं है।

(क्रमशः)

@Sanatan
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