--------: शरीर, एक देवालय :-------
उपनिषद् का निम्नलिखित कथानक मानव शरीर के देवालय होने की पुष्टि करता है -------
" हमारा शरीर भगवान का मंदिर है। यही वह मंदिर है, जिसके बाहर के सब दरवाजे बंद हो जाने पर जब भक्ति का भीतरी पट खुलता है, तब यहां ईश्वर ज्योति रूप में प्रकट होते हैं और मनुष्य को भगवान के दर्शन होते हैं। "
मानव शरीर में कौन कौन से देवताओं का वास है और उनके कार्य क्या हैं ---------
संसार में, जितने देवता हैं, उतने ही देवता मानव शरीर में “ अप्रकट ” रूप से स्थित हैं। किन्तु, दस इन्द्रियों (पांच ज्ञानेन्द्रिय और पांच कर्मेन्द्रियां) के और चार अंतकरण (भीतरी इन्द्रियां—बुद्धि, अहंकार, मन और चित्त) के अधिष्ठाता देवता प्रकट रूप में हैं। इस सभी इन्द्रियों का टोटल किया जाये, तो 14 बनता है।
इन देवताओं के बारे में संक्षेप में जानकारी ------
1. नेत्रेन्द्रिय (चक्षुरिन्द्रिय) के देवता -----
भगवान सूर्य नेत्रों में निवास करते हैं और उनके अधिष्ठाता देवता हैं। इसीलिए नेत्रों के द्वारा , किसी के रूप का दर्शन सम्भव हो पाता है । नेत्र विकार में चाक्षुषोपनिषद्, सूर्योपनिषद् की साधना और सूर्य की उपासना से लाभ होता है ।
2. घ्राणेन्द्रिय (नासिका) के देवता—नासिका के अधिष्ठाता देवता अश्विनीकुमार हैं । इनसे गन्ध का ज्ञान होता है ।
3. श्रोत्रेन्द्रिय (कान) के देवता—श्रोत-कान के अधिष्ठाता देवता दिक् देवता (दिशाएं) हैं । इनसे शब्द सुनाई पड़ता है ।
4. जिह्वा के देवता—जिह्वा में वरुण देवता का निवास है, इससे रस का ज्ञान होता है ।
5. त्वगिन्द्रिय (त्वचा) के देवता—त्वगिन्द्रिय के अधिष्ठाता वायु देवता हैं । इससे जीव स्पर्श का अनुभव करता है ।
@Sanatan
उपनिषद् का निम्नलिखित कथानक मानव शरीर के देवालय होने की पुष्टि करता है -------
" हमारा शरीर भगवान का मंदिर है। यही वह मंदिर है, जिसके बाहर के सब दरवाजे बंद हो जाने पर जब भक्ति का भीतरी पट खुलता है, तब यहां ईश्वर ज्योति रूप में प्रकट होते हैं और मनुष्य को भगवान के दर्शन होते हैं। "
मानव शरीर में कौन कौन से देवताओं का वास है और उनके कार्य क्या हैं ---------
संसार में, जितने देवता हैं, उतने ही देवता मानव शरीर में “ अप्रकट ” रूप से स्थित हैं। किन्तु, दस इन्द्रियों (पांच ज्ञानेन्द्रिय और पांच कर्मेन्द्रियां) के और चार अंतकरण (भीतरी इन्द्रियां—बुद्धि, अहंकार, मन और चित्त) के अधिष्ठाता देवता प्रकट रूप में हैं। इस सभी इन्द्रियों का टोटल किया जाये, तो 14 बनता है।
इन देवताओं के बारे में संक्षेप में जानकारी ------
1. नेत्रेन्द्रिय (चक्षुरिन्द्रिय) के देवता -----
भगवान सूर्य नेत्रों में निवास करते हैं और उनके अधिष्ठाता देवता हैं। इसीलिए नेत्रों के द्वारा , किसी के रूप का दर्शन सम्भव हो पाता है । नेत्र विकार में चाक्षुषोपनिषद्, सूर्योपनिषद् की साधना और सूर्य की उपासना से लाभ होता है ।
2. घ्राणेन्द्रिय (नासिका) के देवता—नासिका के अधिष्ठाता देवता अश्विनीकुमार हैं । इनसे गन्ध का ज्ञान होता है ।
3. श्रोत्रेन्द्रिय (कान) के देवता—श्रोत-कान के अधिष्ठाता देवता दिक् देवता (दिशाएं) हैं । इनसे शब्द सुनाई पड़ता है ।
4. जिह्वा के देवता—जिह्वा में वरुण देवता का निवास है, इससे रस का ज्ञान होता है ।
5. त्वगिन्द्रिय (त्वचा) के देवता—त्वगिन्द्रिय के अधिष्ठाता वायु देवता हैं । इससे जीव स्पर्श का अनुभव करता है ।
@Sanatan
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महाकुंभ में देश के सामने होगी हिंदू आचार संहिता,351 साल बाद काशी विद्वत परिषद ने की तैयार
वाराणसी। 351 साल बाद हिंदू आचार संहिता बनकर तैयार है। चार साल के अध्ययन, मंथन के बाद इसे काशी विद्वत परिषद और देशभर के विद्वानों की टीम ने बनाया है।इस पर प्रयागराज में होने वाले महाकुंभ में शंकराचार्य और महामंडलेश्वर अंतिम मुहर लगाएंगे। इसके बाद फिर धर्माचार्य नई हिंदू आचार संहिता को स्वीकार करने का आग्रह देश की जनता से करेंगे।
2025 में महाकुंभ होगा।देश को एकसूत्र में पिरोने और सनातन धर्म को मजबूत करने के लिए हिंदू आचार संहिता तैयार की गई है। कर्म और कर्तव्य प्रधान हिंदू आचार संहिता के लिए स्मृतियों को आधार बनाया गया है। इसमें श्रीमद्भागवत गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों का अंश शामिल किया गया है।
नई आचार संहिता तैयार करने की जिम्मेदारी काशी विद्वत परिषद को सौंपी गई थी। इसके लिए 70 विद्वानों की 11 टीम और तीन उप टीम बनाई गई थी। हर टीम में उत्तर और दक्षिण के पांच-पांच विद्वान सदस्यों को रखा गया था। टीम ने 40 बार से अधिक बैठक की है। मनु स्मृति, पराशर स्मृति और देवल स्मृति को भी आधार बनाया गया है।
हिंदू आचार संहिता में षोडश संस्कारों को सरल किया गया है। खासकर मृतक भोज के लिए न्यूनतम 16 की संख्या निर्धारित की गई है। अशौच के विधान का पालन करना होगा।काल के अनुसार स्मृतियों का निर्माण हुआ। सबसे पहले मनु स्मृति, फिर पाराशर और इसके बाद देवल स्मृति का निर्माण हुआ। 351 सालों से स्मृतियों का निर्माण नहीं हो सका था।महाकुंभ में वितरण के लिए पहली बार एक लाख प्रतियां हिंदू आचार संहिता की छापी जाएंगी। इसके बाद देश के हर शहर में 11 हजार प्रतियों का वितरण किया जाएगा।
हिंदू आचार संहिता में हिंदुओं को मंदिरों में बैठने, पूजन-अर्चन के लिए समान नियम बनाए गए हैं। महिलाओं को अशौचावस्था को छोड़कर वेद अध्ययन और यज्ञ करने की अनुमति दी गई है। प्री-वेडिंग जैसी कुरीतियों को हटाने के साथ ही रात्रि के विवाह को समाप्त करके दिन के विवाह को बढ़ावा दिया जाएगा।भारतीय परंपरा के अनुसार जन्मदिन मनाने पर जोर दिया गया है। घर वापसी की प्रकिया को आसान किया गया है। विधवा विवाह की व्यवस्था को भी इसमें शामिल किया गया है।
वाराणसी। 351 साल बाद हिंदू आचार संहिता बनकर तैयार है। चार साल के अध्ययन, मंथन के बाद इसे काशी विद्वत परिषद और देशभर के विद्वानों की टीम ने बनाया है।इस पर प्रयागराज में होने वाले महाकुंभ में शंकराचार्य और महामंडलेश्वर अंतिम मुहर लगाएंगे। इसके बाद फिर धर्माचार्य नई हिंदू आचार संहिता को स्वीकार करने का आग्रह देश की जनता से करेंगे।
2025 में महाकुंभ होगा।देश को एकसूत्र में पिरोने और सनातन धर्म को मजबूत करने के लिए हिंदू आचार संहिता तैयार की गई है। कर्म और कर्तव्य प्रधान हिंदू आचार संहिता के लिए स्मृतियों को आधार बनाया गया है। इसमें श्रीमद्भागवत गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों का अंश शामिल किया गया है।
नई आचार संहिता तैयार करने की जिम्मेदारी काशी विद्वत परिषद को सौंपी गई थी। इसके लिए 70 विद्वानों की 11 टीम और तीन उप टीम बनाई गई थी। हर टीम में उत्तर और दक्षिण के पांच-पांच विद्वान सदस्यों को रखा गया था। टीम ने 40 बार से अधिक बैठक की है। मनु स्मृति, पराशर स्मृति और देवल स्मृति को भी आधार बनाया गया है।
हिंदू आचार संहिता में षोडश संस्कारों को सरल किया गया है। खासकर मृतक भोज के लिए न्यूनतम 16 की संख्या निर्धारित की गई है। अशौच के विधान का पालन करना होगा।काल के अनुसार स्मृतियों का निर्माण हुआ। सबसे पहले मनु स्मृति, फिर पाराशर और इसके बाद देवल स्मृति का निर्माण हुआ। 351 सालों से स्मृतियों का निर्माण नहीं हो सका था।महाकुंभ में वितरण के लिए पहली बार एक लाख प्रतियां हिंदू आचार संहिता की छापी जाएंगी। इसके बाद देश के हर शहर में 11 हजार प्रतियों का वितरण किया जाएगा।
हिंदू आचार संहिता में हिंदुओं को मंदिरों में बैठने, पूजन-अर्चन के लिए समान नियम बनाए गए हैं। महिलाओं को अशौचावस्था को छोड़कर वेद अध्ययन और यज्ञ करने की अनुमति दी गई है। प्री-वेडिंग जैसी कुरीतियों को हटाने के साथ ही रात्रि के विवाह को समाप्त करके दिन के विवाह को बढ़ावा दिया जाएगा।भारतीय परंपरा के अनुसार जन्मदिन मनाने पर जोर दिया गया है। घर वापसी की प्रकिया को आसान किया गया है। विधवा विवाह की व्यवस्था को भी इसमें शामिल किया गया है।
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सन्ध्या विधि
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शरीर की क्षमता बढ़ाने तथा मानसिक शारीरिक स्वास्थ्य के लिए संध्या वंदन एक उपयोगी प्रयोग है। इसे दैनिक कार्यों के समान ही महत्व दिया जाना चाहिए। संध्या-वंदन न केवल एक धार्मिक कृत्य है वरन् अपने को समाजोपयोगी बनाने के लिए एक आवश्यक आधार भी है।
संध्या-वंदन धार्मिक क्रिया-कलापों का आवश्यक अंग है, कर्म मय जीवन की नींव है और सामाजिक कर्तव्य है।
प्रत्येक भारतीय के लिये सन्ध्या एक आवश्यक प्रयोग है जिसे करना उसका कर्तव्य एवं धर्म है। व्यावहारिक रूप से देखा जाय तो सन्ध्या करने से बहुत अधिक लाभ होता है। इससे मन और शरीर स्वस्थ होते हैं, बुद्धि तीव्र होती है। संध्या वन्दन के अन्तर्गत प्राणायाम करने की वजह से दिन भर प्रफुल्लता बनी रहती है।
भारतीय युवकों को मेरी सलाह है कि वे अपने प्रातः कालीन कार्यों में सन्ध्या वन्दन को अवश्य ही स्थान दें वे स्वयं अनुभव करेंगे कि ऐसा करने से वे पहले की अपेक्षा ज्यादा स्वस्थ हो सके हैं। संध्या करने से उनके चेहरे पर एक अपूर्व तेज बनता है तथा वे ज्यादा बुद्धिमान, ज्यादा योग्य तथा ज्यादा सफलता की ओर अग्रसर होने में सक्षम होते हैं।
मै नीचे सन्ध्या विधि स्पष्ट कर रहा हूं :
प्रातः काल पूर्व की ओर मुंह करके साधक शुद्ध आसन पर बैठ अपने सामने जल का लोटा भर कर रख दे और उससे कुछ जल लेकर अपने शरीर पर छिड़के ।
मन्त्र
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा ।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥
फिर हाथ में जल लेकर यह संकल्प पढ़े।
ॐ तत्सद्यैतश्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेत- वाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तकदेशा- न्तर्गते पुण्यक्षेत्रे कलियुगे कलि प्रथम चरणे अमुक संवत्सरे अमुकमासे अमुक पक्षे अमुक तिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रोत्पन्नाऽमुक शर्माहं प्रातः सन्ध्योपासनं कर्म करिष्ये ॥
फिर हाथ में जल लेकर नीचे लिखा मन्त्र पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े ।
पृथ्वी तिमन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मो देवता आसने विनियोगः ॥
फिर नीचे लिखा मन्त्र पढ़कर आसन पर जल छिड़कते हुए आसन को पवित्र करे ।
ॐ पृथ्वित्वया धृता लोका देवित्वं विष्णुना धृता ।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ।।
फिर साधक गायत्री मंत्र पढ़कर चोटी बांध ले और आँख बन्द करके नीचे लिखे मन्त्र से तीन बार प्राणायाम करे ।
पहले दाहिने नथुने को बन्द कर बायें नथुने से श्वांस खींचे और फिर बायें नथुने को बन्द कर दाहिने नथुने से श्वांस छोड़ दे, इसे पूरक कहते हैं।
श्वांस को नाभी में रोकने को कुम्भक कहते हैं तथा धीरे धीरे श्वास को बाहर निकालने को रेचक कहते हैं।
इस प्रकार नीचे लिखे मंत्र का तीनों ही प्राणायाम के समय एक एक बार जप करना चाहिए ।
ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॐ आपो ज्योति रसोमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् ॥
फिर नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़ दे ।
सूर्यश्च मेति ब्रह्मा ऋषिः प्रकृतिश्छन्दः सूर्यो देवता अपामुपस्पर्शने विनियोगः ॥
फिर नीचे लिखा मन्त्र पढ़कर आचमन करे ।
ॐ सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृ- तेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्तां यद्वात्र्या पापमकार्ष मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भयामुदरेण शिश्ना रात्रिस्तदव लुम्पतु यत्किञ्चदुरितं मयि इदमहं माममृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा ॥
इसके बाद नीचे के मन्त्रों द्वारा अपनी उंगलियों से अपने शरीर पर जल छिड़कता हुआ मार्जन करे ।
ॐ आपो हिष्ठा मयोभुवः ॐ ता न ऊर्जे दधातन ॐ महे रणाय चक्षसे ॐ यो वः शिवतमो रसः ॐ तस्य भाजयतेहू नः ॐ उशतीरिवमातरः ॐ तस्मा अरंगमाम वः ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ ॐ आपो जनयथा च नः ।।
फिर खड़ा होकर एक चरण की एडी उठाये हुए या एक पांव पर खड़ा होकर गायत्री मन्त्र तीन बार जप करके पुष्प मिले हुए जल से सूर्य को तीन अंजलि दे।
फिर खड़े खड़े ही अपनी दोनों बाहें ऊपर उठाकर निम्न मन्त्र वढ़े ।
ॐ उद्वय तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरं देव देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम् ॥
ॐ उदुत्यं जातवेदस देवं वहन्ति वे तवः दृशे विश्वाय सूर्यम् ।।
ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुण- स्याग्नेः आप्राद्यावापृथिवी अन्तरिक्ष गूं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥
ॐ तच्चक्षुदवहितं पुरस्ताच्छु- क्रमुच्चरत् ॥ पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतश्रृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतम- दीनाः स्याम शरदः शतं भूयंश्च शरदः शतात् ।
फिर खड़े खड़े ही अंगन्यास करे और शरीर के जिस अंग का नाम हो, उसे स्पर्श करे ।
ॐ हृदयाय नमः ॐ भूः शिरसे स्वाहा ॐ भुवः शिखाये वषट् ॐ स्वः कवचाय हुम् ॐ भूर्भुवः नेत्राभ्यां वौषट् ॐ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट् ॥
(क्रमशः)
@Sanatan
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शरीर की क्षमता बढ़ाने तथा मानसिक शारीरिक स्वास्थ्य के लिए संध्या वंदन एक उपयोगी प्रयोग है। इसे दैनिक कार्यों के समान ही महत्व दिया जाना चाहिए। संध्या-वंदन न केवल एक धार्मिक कृत्य है वरन् अपने को समाजोपयोगी बनाने के लिए एक आवश्यक आधार भी है।
संध्या-वंदन धार्मिक क्रिया-कलापों का आवश्यक अंग है, कर्म मय जीवन की नींव है और सामाजिक कर्तव्य है।
प्रत्येक भारतीय के लिये सन्ध्या एक आवश्यक प्रयोग है जिसे करना उसका कर्तव्य एवं धर्म है। व्यावहारिक रूप से देखा जाय तो सन्ध्या करने से बहुत अधिक लाभ होता है। इससे मन और शरीर स्वस्थ होते हैं, बुद्धि तीव्र होती है। संध्या वन्दन के अन्तर्गत प्राणायाम करने की वजह से दिन भर प्रफुल्लता बनी रहती है।
भारतीय युवकों को मेरी सलाह है कि वे अपने प्रातः कालीन कार्यों में सन्ध्या वन्दन को अवश्य ही स्थान दें वे स्वयं अनुभव करेंगे कि ऐसा करने से वे पहले की अपेक्षा ज्यादा स्वस्थ हो सके हैं। संध्या करने से उनके चेहरे पर एक अपूर्व तेज बनता है तथा वे ज्यादा बुद्धिमान, ज्यादा योग्य तथा ज्यादा सफलता की ओर अग्रसर होने में सक्षम होते हैं।
मै नीचे सन्ध्या विधि स्पष्ट कर रहा हूं :
प्रातः काल पूर्व की ओर मुंह करके साधक शुद्ध आसन पर बैठ अपने सामने जल का लोटा भर कर रख दे और उससे कुछ जल लेकर अपने शरीर पर छिड़के ।
मन्त्र
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा ।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥
फिर हाथ में जल लेकर यह संकल्प पढ़े।
ॐ तत्सद्यैतश्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेत- वाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तकदेशा- न्तर्गते पुण्यक्षेत्रे कलियुगे कलि प्रथम चरणे अमुक संवत्सरे अमुकमासे अमुक पक्षे अमुक तिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रोत्पन्नाऽमुक शर्माहं प्रातः सन्ध्योपासनं कर्म करिष्ये ॥
फिर हाथ में जल लेकर नीचे लिखा मन्त्र पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़े ।
पृथ्वी तिमन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मो देवता आसने विनियोगः ॥
फिर नीचे लिखा मन्त्र पढ़कर आसन पर जल छिड़कते हुए आसन को पवित्र करे ।
ॐ पृथ्वित्वया धृता लोका देवित्वं विष्णुना धृता ।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ।।
फिर साधक गायत्री मंत्र पढ़कर चोटी बांध ले और आँख बन्द करके नीचे लिखे मन्त्र से तीन बार प्राणायाम करे ।
पहले दाहिने नथुने को बन्द कर बायें नथुने से श्वांस खींचे और फिर बायें नथुने को बन्द कर दाहिने नथुने से श्वांस छोड़ दे, इसे पूरक कहते हैं।
श्वांस को नाभी में रोकने को कुम्भक कहते हैं तथा धीरे धीरे श्वास को बाहर निकालने को रेचक कहते हैं।
इस प्रकार नीचे लिखे मंत्र का तीनों ही प्राणायाम के समय एक एक बार जप करना चाहिए ।
ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॐ आपो ज्योति रसोमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् ॥
फिर नीचे लिखा विनियोग पढ़कर पृथ्वी पर जल छोड़ दे ।
सूर्यश्च मेति ब्रह्मा ऋषिः प्रकृतिश्छन्दः सूर्यो देवता अपामुपस्पर्शने विनियोगः ॥
फिर नीचे लिखा मन्त्र पढ़कर आचमन करे ।
ॐ सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृ- तेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्तां यद्वात्र्या पापमकार्ष मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भयामुदरेण शिश्ना रात्रिस्तदव लुम्पतु यत्किञ्चदुरितं मयि इदमहं माममृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा ॥
इसके बाद नीचे के मन्त्रों द्वारा अपनी उंगलियों से अपने शरीर पर जल छिड़कता हुआ मार्जन करे ।
ॐ आपो हिष्ठा मयोभुवः ॐ ता न ऊर्जे दधातन ॐ महे रणाय चक्षसे ॐ यो वः शिवतमो रसः ॐ तस्य भाजयतेहू नः ॐ उशतीरिवमातरः ॐ तस्मा अरंगमाम वः ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ ॐ आपो जनयथा च नः ।।
फिर खड़ा होकर एक चरण की एडी उठाये हुए या एक पांव पर खड़ा होकर गायत्री मन्त्र तीन बार जप करके पुष्प मिले हुए जल से सूर्य को तीन अंजलि दे।
फिर खड़े खड़े ही अपनी दोनों बाहें ऊपर उठाकर निम्न मन्त्र वढ़े ।
ॐ उद्वय तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरं देव देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम् ॥
ॐ उदुत्यं जातवेदस देवं वहन्ति वे तवः दृशे विश्वाय सूर्यम् ।।
ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुण- स्याग्नेः आप्राद्यावापृथिवी अन्तरिक्ष गूं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥
ॐ तच्चक्षुदवहितं पुरस्ताच्छु- क्रमुच्चरत् ॥ पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतश्रृणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतम- दीनाः स्याम शरदः शतं भूयंश्च शरदः शतात् ।
फिर खड़े खड़े ही अंगन्यास करे और शरीर के जिस अंग का नाम हो, उसे स्पर्श करे ।
ॐ हृदयाय नमः ॐ भूः शिरसे स्वाहा ॐ भुवः शिखाये वषट् ॐ स्वः कवचाय हुम् ॐ भूर्भुवः नेत्राभ्यां वौषट् ॐ भूर्भुवः स्वः अस्त्राय फट् ॥
(क्रमशः)
@Sanatan
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सन्ध्या विधि (२)
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फिर हाथ में जल लेकर विनियोग करे-
ॐ कारस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दोऽग्निर्देवता शुक्लो वर्णों जपे विनियोगः ॥
फिर गायत्री देवी का ध्यान करे-
श्वेतवर्णा समुद्दिष्टा कौशेयवसना तथा । श्वेतैर्विलेंपनै पुष्पेर लंकारेश्च भूषिता ॥
आदित्य मण्डलस्था च ब्रह्मलोकगताथवा । अक्षसूत्रधरादेवी पद्मासनगता शुभा ॥
फिर हाथ में जल लेकर नीचे लिखा विनियोग पढ़े ।
तेजोऽसीति देवा ऋषयो गायत्रो छदः शुक्र देवत' गायत्र्यावाहने विनियोगः ।।
फिर गायत्री देवी का निम्न मन्त्र से आह्वान करे-
ॐ गायत्र्यस्येकपदो द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसि नहि पद्मसे नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय पधेर जसेऽ सावदो मा प्रापत् ।।
फिर नीचे लिखे गायत्री मन्त्र का १०८ बार उच्चारण करे-
गायत्री मन्त्र
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्व धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात ॐ ।।
फिर नीचे लिखे मन्त्र को पढ़ते हुए प्रदक्षिणा करे-
यानि कानि च पापानि जन्मान्तर कृतानि च तानि तानि प्रणश्यन्ति प्रदक्षिणापदे पदे ।।
इस प्रकार गायत्री का जप करने से शरीर की ऊर्जा बढ़ती है, और चेहरे पर एक विशेष प्रकार की चमक पैदा होती है जिसे ब्रह्म चमक कहते हैं।
वास्तव में ही प्रत्येक भारतीय का कत्र्तव्य है कि वह गायत्री एवं सन्ध्या बन्दन करे, इसे किसी भी दिन सेप्रारम्भ किया जा सकता है।
@Sanatan
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फिर हाथ में जल लेकर विनियोग करे-
ॐ कारस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दोऽग्निर्देवता शुक्लो वर्णों जपे विनियोगः ॥
फिर गायत्री देवी का ध्यान करे-
श्वेतवर्णा समुद्दिष्टा कौशेयवसना तथा । श्वेतैर्विलेंपनै पुष्पेर लंकारेश्च भूषिता ॥
आदित्य मण्डलस्था च ब्रह्मलोकगताथवा । अक्षसूत्रधरादेवी पद्मासनगता शुभा ॥
फिर हाथ में जल लेकर नीचे लिखा विनियोग पढ़े ।
तेजोऽसीति देवा ऋषयो गायत्रो छदः शुक्र देवत' गायत्र्यावाहने विनियोगः ।।
फिर गायत्री देवी का निम्न मन्त्र से आह्वान करे-
ॐ गायत्र्यस्येकपदो द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसि नहि पद्मसे नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय पधेर जसेऽ सावदो मा प्रापत् ।।
फिर नीचे लिखे गायत्री मन्त्र का १०८ बार उच्चारण करे-
गायत्री मन्त्र
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्व धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात ॐ ।।
फिर नीचे लिखे मन्त्र को पढ़ते हुए प्रदक्षिणा करे-
यानि कानि च पापानि जन्मान्तर कृतानि च तानि तानि प्रणश्यन्ति प्रदक्षिणापदे पदे ।।
इस प्रकार गायत्री का जप करने से शरीर की ऊर्जा बढ़ती है, और चेहरे पर एक विशेष प्रकार की चमक पैदा होती है जिसे ब्रह्म चमक कहते हैं।
वास्तव में ही प्रत्येक भारतीय का कत्र्तव्य है कि वह गायत्री एवं सन्ध्या बन्दन करे, इसे किसी भी दिन सेप्रारम्भ किया जा सकता है।
@Sanatan
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शिव के व्रतों का वर्णन व विधान
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भारत को जनता धर्मप्रिय है, और भगवान शंकर भारतवासियों के लिये सर्वोच्च एवं सर्वप्रिय देवता रहे हैं।
इस लेख में भगवान शंकर से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण व्रतों का परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है।
१- सोमवार व्रत :-
इस व्रत में साधक किसी भी सोमवार से व्रत प्रारम्भ कर सकता है। उसे कम से कम सोलह सोमवार का व्रत-संकल्प अवश्य लेना चाहिए।
प्रातः काल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर साधक भगवान शंकर की विधि-विधान से पूजन करे और संकल्प लेकर प्रण करे कि मैं अमुक कार्य की सफलता के लिये आपका व्रत कर रहा हूं।
इसके बाद "नमः शिवाय" पंचाक्षरी मन्त्र की एक माला फेरे और उस दिन एक समय एक आसन पर बैठकर उतना ही भोजन करे जितना कि नित्य करता है, इसके अलावा दिन में किसी भी प्रकार का फलाहार या अन्न ग्रहण न करे ।
साधक को चाहिए कि व्रत के दिन असत्य न बोले, स्त्री-गमन न करे और यथा सम्भव शुद्ध सात्विक रूप से दिन व्यतीत करे।
२- मन्छा महादेव व्रत :
यह अत्यन्त महत्वपूर्ण व्रत है। किसी भी वर्ष से यह व्रत प्रारम्भ किया जा सकता है। श्रावण शुक्ल पक्ष प्रथम सोमवार से इस व्रत को प्रारम्भ किया जाता है तथा कार्तिक शुक्ला प्रथम सोमवार को इस व्रत का समापन होता है, इस प्रकार चार वर्ष तक इस को करने से पूर्णता मानी जाती है।
श्रावण शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार को साधक (पुरुष या स्त्री) स्नान कर शिव का पूजन करे और संकल्प में अपनी इच्छा व्यक्त करे, इसके बाद उस दिन मंछा महादेव कथा का पाठ करे या श्रवण करें । उस दिन साधक को एक बार ही भोजन करना चाहिए, इसके अलावा उस दिन किसी भी प्रकार का अन्न या भक्ष्य स्वीकार नहीं करना चाहिए।
इस प्रकार प्रत्येक सोमवार को व्रत रखना चाहिए और मंछामहादेव की कथा सुननी चाहिए, यह कथा बाजार में सहज ही प्राप्य है।
कार्तिक शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार को सवा किलो आटा, सवा किलो घी, गुड़ आदि लेकर भगवान शिव के लिये प्रसाद बनाया जाता है और कथा के अनुसार उसके भाग कर वितरण किया जाता है। इस प्रकार एक वर्ष का विधान सम्पन्न होता हैं, कार्य की सफलता के लिये इस प्रकार चार वर्ष तक व्रत करना चाहिए, ऐसा करने पर निश्चय ही मनोवांछित सफलता प्राप्त होती है।
३- शिवरात्रि व्रत :-
यह व्रत पूरे वर्ष में सर्वश्रेष्ठ और शिव को अत्यन्त प्रिय व्रत है। इस दिन साधक दिन भर भूखा रहता है और सूर्यास्त के बाद प्रथम प्रहर में भगवान शिव की षोडशोपचार पूजा करता है। यदि संभव हो तो साधक को रुद्राष्टाध्यायी का पाठ भी करना चाहि- ए। इसी प्रकार रात्रि के चार प्रहरों में चार बार शिव पूजा की जाती है तथा प्रातः काल भगवान शिव का श्रृंगार कर उसकी आरती की जाती है। साधक को रात्रि भर जागरण करना चाहिए, प्रातः काल आर- ती के बाद ही भोजन करने का विधान है।
रात्रि को शिव पूजन करते समय संस्कृत का ज्ञान न हो तो "नमः शिवाय' मन्त्र से भी पूजा की जा सकती है और सारी रात इसी पंचाक्षरी मन्त्र का जप किया जा सकता है।
४- षोडश सोमवार व्रत :-
शास्त्रों में लिखा है कि शिवजी के प्रिय चन्द्र हैं जिन्हें वे हमेशा अपने ललाट में स्थापित किये रहते हैं। अतः शिव को प्रसन्न करने के लिये सोमवार का व्रत किया जाता है। शिव पूजन उत्तर की ओर मुंह करके किया जाना चाहिए ।
साधक को किसी भी सोमवार को स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर भगवान शंकर की पूजा करके संकल्प के द्वारा अपनी इच्छा व्यक्त करनी चाहिए। उसके बाद "नमः शिवाय" मन्त्र की एक माला फेरी जाती है, साधक को उस दिन एक समय भोजन करना चाहिए और अन्य सभी नियमों का पालन करना चाहिए । इस प्रकार सोलह सोमवारों को व्रत किया जाता है। अन्तिम सोमवार को व्रत की समाप्ति पर पुनः शंकर की पूजा कर साधुओं को भोजन कराया जाता है, और सोमवार व्रत कथा सुनकर व्रत समाप्ति की जाती है।
५- श्रावण व्रत :-
श्रावण का महीना शंकर को सर्वाधिक प्रिय है। इस महीने में चार या पांच सोमवार आते हैं । साधक को पहले सोमवार को प्रातः उठकर स्नान कर पूर्ण विधि- विधान के साथ भगवान शंकर की पूजा करनी चाहिए । फिर शुद्ध स्थान से मिट्टी लाकर उसके लिंगाकार ११०० शिवलिंग बनाये जाते हैं और लिंग के ऊपर बिना टूटा हुआ चावल का दाना लगाया जाता है। साथ ही साथ मां पार्वती, नन्दी, गणेश और कार्तिकेय की मूर्तियां मिट्टी से ही बनाई जाती हैं।
फिर इन सब का पूर्ण विधि-विधान के साथ पूजन किया जाता है और पूजन के बाद तालाब में या नदी में उन शिवलिंगों का विसर्जन कर दिया जाता है।
श्रावण महीने में प्रत्येक दिन या प्रत्येक सोमवार इसी प्रकार पूजा करने का विधान है। इससे साधक की निश्चित रूप से इच्छा पूर्ण होती है और वह जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त कर पाता है।
(क्रमशः)
@Sanatan
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भारत को जनता धर्मप्रिय है, और भगवान शंकर भारतवासियों के लिये सर्वोच्च एवं सर्वप्रिय देवता रहे हैं।
इस लेख में भगवान शंकर से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण व्रतों का परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है।
१- सोमवार व्रत :-
इस व्रत में साधक किसी भी सोमवार से व्रत प्रारम्भ कर सकता है। उसे कम से कम सोलह सोमवार का व्रत-संकल्प अवश्य लेना चाहिए।
प्रातः काल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर साधक भगवान शंकर की विधि-विधान से पूजन करे और संकल्प लेकर प्रण करे कि मैं अमुक कार्य की सफलता के लिये आपका व्रत कर रहा हूं।
इसके बाद "नमः शिवाय" पंचाक्षरी मन्त्र की एक माला फेरे और उस दिन एक समय एक आसन पर बैठकर उतना ही भोजन करे जितना कि नित्य करता है, इसके अलावा दिन में किसी भी प्रकार का फलाहार या अन्न ग्रहण न करे ।
साधक को चाहिए कि व्रत के दिन असत्य न बोले, स्त्री-गमन न करे और यथा सम्भव शुद्ध सात्विक रूप से दिन व्यतीत करे।
२- मन्छा महादेव व्रत :
यह अत्यन्त महत्वपूर्ण व्रत है। किसी भी वर्ष से यह व्रत प्रारम्भ किया जा सकता है। श्रावण शुक्ल पक्ष प्रथम सोमवार से इस व्रत को प्रारम्भ किया जाता है तथा कार्तिक शुक्ला प्रथम सोमवार को इस व्रत का समापन होता है, इस प्रकार चार वर्ष तक इस को करने से पूर्णता मानी जाती है।
श्रावण शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार को साधक (पुरुष या स्त्री) स्नान कर शिव का पूजन करे और संकल्प में अपनी इच्छा व्यक्त करे, इसके बाद उस दिन मंछा महादेव कथा का पाठ करे या श्रवण करें । उस दिन साधक को एक बार ही भोजन करना चाहिए, इसके अलावा उस दिन किसी भी प्रकार का अन्न या भक्ष्य स्वीकार नहीं करना चाहिए।
इस प्रकार प्रत्येक सोमवार को व्रत रखना चाहिए और मंछामहादेव की कथा सुननी चाहिए, यह कथा बाजार में सहज ही प्राप्य है।
कार्तिक शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार को सवा किलो आटा, सवा किलो घी, गुड़ आदि लेकर भगवान शिव के लिये प्रसाद बनाया जाता है और कथा के अनुसार उसके भाग कर वितरण किया जाता है। इस प्रकार एक वर्ष का विधान सम्पन्न होता हैं, कार्य की सफलता के लिये इस प्रकार चार वर्ष तक व्रत करना चाहिए, ऐसा करने पर निश्चय ही मनोवांछित सफलता प्राप्त होती है।
३- शिवरात्रि व्रत :-
यह व्रत पूरे वर्ष में सर्वश्रेष्ठ और शिव को अत्यन्त प्रिय व्रत है। इस दिन साधक दिन भर भूखा रहता है और सूर्यास्त के बाद प्रथम प्रहर में भगवान शिव की षोडशोपचार पूजा करता है। यदि संभव हो तो साधक को रुद्राष्टाध्यायी का पाठ भी करना चाहि- ए। इसी प्रकार रात्रि के चार प्रहरों में चार बार शिव पूजा की जाती है तथा प्रातः काल भगवान शिव का श्रृंगार कर उसकी आरती की जाती है। साधक को रात्रि भर जागरण करना चाहिए, प्रातः काल आर- ती के बाद ही भोजन करने का विधान है।
रात्रि को शिव पूजन करते समय संस्कृत का ज्ञान न हो तो "नमः शिवाय' मन्त्र से भी पूजा की जा सकती है और सारी रात इसी पंचाक्षरी मन्त्र का जप किया जा सकता है।
४- षोडश सोमवार व्रत :-
शास्त्रों में लिखा है कि शिवजी के प्रिय चन्द्र हैं जिन्हें वे हमेशा अपने ललाट में स्थापित किये रहते हैं। अतः शिव को प्रसन्न करने के लिये सोमवार का व्रत किया जाता है। शिव पूजन उत्तर की ओर मुंह करके किया जाना चाहिए ।
साधक को किसी भी सोमवार को स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर भगवान शंकर की पूजा करके संकल्प के द्वारा अपनी इच्छा व्यक्त करनी चाहिए। उसके बाद "नमः शिवाय" मन्त्र की एक माला फेरी जाती है, साधक को उस दिन एक समय भोजन करना चाहिए और अन्य सभी नियमों का पालन करना चाहिए । इस प्रकार सोलह सोमवारों को व्रत किया जाता है। अन्तिम सोमवार को व्रत की समाप्ति पर पुनः शंकर की पूजा कर साधुओं को भोजन कराया जाता है, और सोमवार व्रत कथा सुनकर व्रत समाप्ति की जाती है।
५- श्रावण व्रत :-
श्रावण का महीना शंकर को सर्वाधिक प्रिय है। इस महीने में चार या पांच सोमवार आते हैं । साधक को पहले सोमवार को प्रातः उठकर स्नान कर पूर्ण विधि- विधान के साथ भगवान शंकर की पूजा करनी चाहिए । फिर शुद्ध स्थान से मिट्टी लाकर उसके लिंगाकार ११०० शिवलिंग बनाये जाते हैं और लिंग के ऊपर बिना टूटा हुआ चावल का दाना लगाया जाता है। साथ ही साथ मां पार्वती, नन्दी, गणेश और कार्तिकेय की मूर्तियां मिट्टी से ही बनाई जाती हैं।
फिर इन सब का पूर्ण विधि-विधान के साथ पूजन किया जाता है और पूजन के बाद तालाब में या नदी में उन शिवलिंगों का विसर्जन कर दिया जाता है।
श्रावण महीने में प्रत्येक दिन या प्रत्येक सोमवार इसी प्रकार पूजा करने का विधान है। इससे साधक की निश्चित रूप से इच्छा पूर्ण होती है और वह जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त कर पाता है।
(क्रमशः)
@Sanatan
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शिव के व्रतों का वर्णन व विधान (२)
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६- श्रावण शिव व्रत :-
श्रावण महीने में कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तक यह व्रत किया जाता है। सर्व प्रथम साधक चांदी या पत्थर के शिवलिंग स्थापित कर उसकी पूजा करता है तथा उस पर अनवरत जलधार देता है। शिवलिंग पर ऐसी व्यवस्था की जाती है कि उस पर तिपाई ऊपर रखे हुए कलश या घड़े के नीचे छोटा-सा छेद करके उसमें से जल की एक-एक बूंद शिवलिंग पर पड़ती रहती है। यह जलधार चौबीसो घंटे चलती रहती है तथा नित्य प्रातः काल साधक शिव की पूर्ण विधि- विधान के साथ पूजन करता है।
पूर्णिमा की रात्रि को यह व्रत समाप्त होता है। इस एक महीने में साधक को चाहिए कि वह नित्य एक समय भोजन करे, पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करे, सिगरेट आदि का सेवन न करे, दिन में न सोये, व्यर्थ की बकवास न करे, और अपने शरीर तथा मन को यथासम्भव शुद्ध और पवित्र बनाये रखे ।
७- प्रदोष व्रत :
सामान्यतः प्रत्येक महीने की त्रयोदशी को प्रदोष व्रत किया जाता है। पर कभी-कभी एक दिन पहले या एक दिन बाद भी यह व्रत आ जाता है अतः योग्य ब्राह्मण से इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।
प्रदोष के दिन साधक को प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान शंकर की पूर्ण विधि-विधान के साथ पूजा करनी चाहिए और प्रदोष कथा सुनकर ही एक समय भोजन करना चाहिए । इस प्रकार प्रत्येक महीने में दो प्रदोष व्रत किये जाते हैं। एक साल भर तक इस प्रकार व्रत करने से साधक की मनोकामना निश्चय ही पूर्ण होती है।
वस्तुतः ये व्रत शिव भक्तों के लिये आवश्यक हैं और उन्हें अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस प्रकार के व्रतों को करना चाहिए। ऐसा करने से वे इस जीवन में पूर्ण सुख प्राप्त करते हुये अन्त में मोक्ष पद प्राप्त करते हैं।
@Sanatan
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६- श्रावण शिव व्रत :-
श्रावण महीने में कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तक यह व्रत किया जाता है। सर्व प्रथम साधक चांदी या पत्थर के शिवलिंग स्थापित कर उसकी पूजा करता है तथा उस पर अनवरत जलधार देता है। शिवलिंग पर ऐसी व्यवस्था की जाती है कि उस पर तिपाई ऊपर रखे हुए कलश या घड़े के नीचे छोटा-सा छेद करके उसमें से जल की एक-एक बूंद शिवलिंग पर पड़ती रहती है। यह जलधार चौबीसो घंटे चलती रहती है तथा नित्य प्रातः काल साधक शिव की पूर्ण विधि- विधान के साथ पूजन करता है।
पूर्णिमा की रात्रि को यह व्रत समाप्त होता है। इस एक महीने में साधक को चाहिए कि वह नित्य एक समय भोजन करे, पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करे, सिगरेट आदि का सेवन न करे, दिन में न सोये, व्यर्थ की बकवास न करे, और अपने शरीर तथा मन को यथासम्भव शुद्ध और पवित्र बनाये रखे ।
७- प्रदोष व्रत :
सामान्यतः प्रत्येक महीने की त्रयोदशी को प्रदोष व्रत किया जाता है। पर कभी-कभी एक दिन पहले या एक दिन बाद भी यह व्रत आ जाता है अतः योग्य ब्राह्मण से इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।
प्रदोष के दिन साधक को प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान शंकर की पूर्ण विधि-विधान के साथ पूजा करनी चाहिए और प्रदोष कथा सुनकर ही एक समय भोजन करना चाहिए । इस प्रकार प्रत्येक महीने में दो प्रदोष व्रत किये जाते हैं। एक साल भर तक इस प्रकार व्रत करने से साधक की मनोकामना निश्चय ही पूर्ण होती है।
वस्तुतः ये व्रत शिव भक्तों के लिये आवश्यक हैं और उन्हें अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस प्रकार के व्रतों को करना चाहिए। ऐसा करने से वे इस जीवन में पूर्ण सुख प्राप्त करते हुये अन्त में मोक्ष पद प्राप्त करते हैं।
@Sanatan
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स्तोत्र पाठ से सम्बन्धित ज्ञातव्य तथ्य
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शास्त्रों में कहा गया है कि कलियुग में स्तोत्र सबसे अधिक शक्तिशाली और शीघ्र प्रभावकारी हैं। स्तोत्र पाठ करते समय साधक को कुछ विशेष सावधानियां बरतनी चाहिए। नीचे मैं शास्त्रों में वर्णित कुछ तथ्य स्पष्ट कर रहा हूं जो कि स्तोत्र पाठ करते समय ध्यान में रखने चाहिए--
१ - स्तोत्र हिन्दी या संस्कृत में हों तो यथासम्भव मूल पाठ को ही पढ़ना चाहिए । उनका अनुवाद पढ़ने से पूर्ण लाभ प्राप्त नहीं हो पाता ।
२ - हम ईश्वर के सामने बालक के समान हैं और यही भाव मन में रखकर स्तोत्र पाठ करना चाहिए बालक यदि त्रुटियां करता है तब भी वह क्षम्य है,अतः हम भी इसी भावना को लेकर पाठ करें ।
३ - शुद्ध होकर, शुद्ध आसन बिछाकर सामने उस देवता का विग्रह या मूर्ति रखकर स्तोत्र पाठ करें, यदि यह सम्भव नहीं हो तो आँख बन्द कर संबंधित देवता का ध्यान मानस में करके, फिर पाठ करना चाहिए ।
४ - पाठ शुद्धता अति आवश्यक है अतः यथासम्भव स्तोत्र का पाठ शुद्ध रूप में करें, यदि संस्कृत का ज्ञान न हो तो किसी संस्कृत जानने वाले विद्वान् से वह स्तोत्र दो तीन बार सुनकर शुद्ध पाठ ज्ञात कर लें और इसके बाद ही उसका पाठ करें ।
५ - स्तोत्र पाठ गेय रूप में करें, अर्थात् यदि स्तोत्र को गाया जा सके तो गाकर ही पाठ करना चाहिए ।
६ - पाठ करते समय क्रोध, आलस्य, निद्रा, तन्द्रा या अन्य व्यवधान नहीं होने चाहिए। जब हम प्रफुल्ल चित्त हो तभी हमें स्तोत्र पाठ करना चाहिए ।
७ - स्तोत्र पाठ करते समय हमारे वस्त्र स्वच्छ और पवित्र हों।
८ - स्तोत्र पाठ सात्विक भाव से करें और इस बात का ध्यान रखें कि हम जो कुछ बोल रहें हैं, वह सत्य और प्रामाणिक रूप से बोल रहे हैं।
९ - स्तोत्र पाठ करने वाले साधक को उस स्तोत्र का अर्थ ज्ञात होना चाहिए, बिना अर्थ ज्ञात किये मात्र तोते की तरह पढ़ने से कोई लाभ नहीं होता ।
१० - स्तोत्र पाठ में मधुरता होनी आवश्यक है। उतावली में या समय की न्यूनता के कारण जल्दी-जल्दी स्तोत्र पाठ पूरा करना किसी भी दृष्टि से अनुकूल नहीं है।
११ - स्तोत्र पाठ करते समय मुंह में कोई अन्य वस्तु नहीं होनी चाहिए और पाठ करते समय किसी प्रकार का नशा या व्यसन आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए ।
१२ - स्तोत्र पाठ प्रारम्भ करने के बाद तब तक आसन से नहीं उठना चाहिए जब तक वह स्तोत्र पूरा न हो जाय ।
१३ - स्तोत्र पाठ सरल चित्त से करना चाहिए। मन में किसी प्रकार का अहंभाव लेकर स्तोत्र पाठ करना वर्जित है।
१४ - यदि हम सही रूप में, सही स्वर में तथा सही भावना से स्तोत्र पाठ करें तो स्तोत्र पाठ का तुरन्त प्रभाव होता है। स्तोत्र पाठ में यद्यपि त्रुटि क्षम्य है फिर भी यथासम्भव त्रुटि न हो, तो ज्यादा अच्छा है।
१५ स्तोत्र पाठ करते समय यदि सामने दीपक और अगरबत्ती प्रज्वलित हो तो अनुकूल रहता है।
१६ - स्तोत्र पाठ करते समय उस स्तोत्र की भावना, मधुरता और रम्यता में पूरी तरह डूब जाना चाहिए। एक प्रकार से साधक को उस स्तोत्र का ही एक भाग बन जाना चाहिए। जब तक साधक स्तोत्र और संबंधित देवता से एक रूपता प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक उसका लाभ पूरी तरह प्राप्त नहीं हो पाता ।
१७ - अधिकतर स्तोत्र संस्कृत में हैं अतः साधक को पहले संस्कृत का सामान्य ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए ।
१५ - मन ही मन स्तोत्र पाठ करना वर्जित है। स्तोत्र पाठ उच्चारण के साथ करना चाहिए ।
१९ - नित्य नियमित रूप से स्तोत्र पाठ करने पर वह मन्त्र स्वरूप हो जाता है और उसका प्रत्यक्ष लाभ दिखाई देने लग जाता है, अतः स्तोत्र का चयन सावधानीपूर्वक करना चाहिए ।
२० - स्तोत्र पाठ सुखासन में बैठकर किया जाना चाहिए । इसके अलावा यदि साधक किसी अन्य आसन में बैठकर पाठ करना चाहे तो कोई हानि नहीं हैं।
२१ - स्तोत्र पाठ करते समय सामने संबंधित देवता का चित्र, अगरबत्ती, दीपक व जल का पात्र हो तो ज्यादा अनुकूल रहता है, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार अग्नि (दीपक), वरुण (जल पात्र) की साक्षी में ही स्तोत्र पाठ होना चाहिए ।
२२ स्तोत्र पाठ प्रातः सांय या रात्रि किसी भी समय किया जा सकता है। इसके लिये कोई विशेष समय निश्चित नही होता। जब भी मन में तरंग उठे, जब भी स्तोत्र पाठ करने की इच्छा जाग्रत हो, जब भी प्रभु के समीप बैठने की भावना बने, तभी बैठकर स्तोत्र पाठ किया जा सकता है, परन्तु अपवित्र शरीर से या अपवित्र स्थान पर बैठकर स्तोत्र पाठ करना वर्जित है।
२३ - स्तोत्र पाठ करते समय या इससे पूर्व भारी भोजन नहीं करना चाहिए। शरीर को स्वच्छ व हल्का बनाये रखना अनुकूल रहता है।
२४ कलियुग में स्तोत्र पाठ ही श्रेष्ठतम विधान माना गया है। .
@Sanatan
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शास्त्रों में कहा गया है कि कलियुग में स्तोत्र सबसे अधिक शक्तिशाली और शीघ्र प्रभावकारी हैं। स्तोत्र पाठ करते समय साधक को कुछ विशेष सावधानियां बरतनी चाहिए। नीचे मैं शास्त्रों में वर्णित कुछ तथ्य स्पष्ट कर रहा हूं जो कि स्तोत्र पाठ करते समय ध्यान में रखने चाहिए--
१ - स्तोत्र हिन्दी या संस्कृत में हों तो यथासम्भव मूल पाठ को ही पढ़ना चाहिए । उनका अनुवाद पढ़ने से पूर्ण लाभ प्राप्त नहीं हो पाता ।
२ - हम ईश्वर के सामने बालक के समान हैं और यही भाव मन में रखकर स्तोत्र पाठ करना चाहिए बालक यदि त्रुटियां करता है तब भी वह क्षम्य है,अतः हम भी इसी भावना को लेकर पाठ करें ।
३ - शुद्ध होकर, शुद्ध आसन बिछाकर सामने उस देवता का विग्रह या मूर्ति रखकर स्तोत्र पाठ करें, यदि यह सम्भव नहीं हो तो आँख बन्द कर संबंधित देवता का ध्यान मानस में करके, फिर पाठ करना चाहिए ।
४ - पाठ शुद्धता अति आवश्यक है अतः यथासम्भव स्तोत्र का पाठ शुद्ध रूप में करें, यदि संस्कृत का ज्ञान न हो तो किसी संस्कृत जानने वाले विद्वान् से वह स्तोत्र दो तीन बार सुनकर शुद्ध पाठ ज्ञात कर लें और इसके बाद ही उसका पाठ करें ।
५ - स्तोत्र पाठ गेय रूप में करें, अर्थात् यदि स्तोत्र को गाया जा सके तो गाकर ही पाठ करना चाहिए ।
६ - पाठ करते समय क्रोध, आलस्य, निद्रा, तन्द्रा या अन्य व्यवधान नहीं होने चाहिए। जब हम प्रफुल्ल चित्त हो तभी हमें स्तोत्र पाठ करना चाहिए ।
७ - स्तोत्र पाठ करते समय हमारे वस्त्र स्वच्छ और पवित्र हों।
८ - स्तोत्र पाठ सात्विक भाव से करें और इस बात का ध्यान रखें कि हम जो कुछ बोल रहें हैं, वह सत्य और प्रामाणिक रूप से बोल रहे हैं।
९ - स्तोत्र पाठ करने वाले साधक को उस स्तोत्र का अर्थ ज्ञात होना चाहिए, बिना अर्थ ज्ञात किये मात्र तोते की तरह पढ़ने से कोई लाभ नहीं होता ।
१० - स्तोत्र पाठ में मधुरता होनी आवश्यक है। उतावली में या समय की न्यूनता के कारण जल्दी-जल्दी स्तोत्र पाठ पूरा करना किसी भी दृष्टि से अनुकूल नहीं है।
११ - स्तोत्र पाठ करते समय मुंह में कोई अन्य वस्तु नहीं होनी चाहिए और पाठ करते समय किसी प्रकार का नशा या व्यसन आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए ।
१२ - स्तोत्र पाठ प्रारम्भ करने के बाद तब तक आसन से नहीं उठना चाहिए जब तक वह स्तोत्र पूरा न हो जाय ।
१३ - स्तोत्र पाठ सरल चित्त से करना चाहिए। मन में किसी प्रकार का अहंभाव लेकर स्तोत्र पाठ करना वर्जित है।
१४ - यदि हम सही रूप में, सही स्वर में तथा सही भावना से स्तोत्र पाठ करें तो स्तोत्र पाठ का तुरन्त प्रभाव होता है। स्तोत्र पाठ में यद्यपि त्रुटि क्षम्य है फिर भी यथासम्भव त्रुटि न हो, तो ज्यादा अच्छा है।
१५ स्तोत्र पाठ करते समय यदि सामने दीपक और अगरबत्ती प्रज्वलित हो तो अनुकूल रहता है।
१६ - स्तोत्र पाठ करते समय उस स्तोत्र की भावना, मधुरता और रम्यता में पूरी तरह डूब जाना चाहिए। एक प्रकार से साधक को उस स्तोत्र का ही एक भाग बन जाना चाहिए। जब तक साधक स्तोत्र और संबंधित देवता से एक रूपता प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक उसका लाभ पूरी तरह प्राप्त नहीं हो पाता ।
१७ - अधिकतर स्तोत्र संस्कृत में हैं अतः साधक को पहले संस्कृत का सामान्य ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए ।
१५ - मन ही मन स्तोत्र पाठ करना वर्जित है। स्तोत्र पाठ उच्चारण के साथ करना चाहिए ।
१९ - नित्य नियमित रूप से स्तोत्र पाठ करने पर वह मन्त्र स्वरूप हो जाता है और उसका प्रत्यक्ष लाभ दिखाई देने लग जाता है, अतः स्तोत्र का चयन सावधानीपूर्वक करना चाहिए ।
२० - स्तोत्र पाठ सुखासन में बैठकर किया जाना चाहिए । इसके अलावा यदि साधक किसी अन्य आसन में बैठकर पाठ करना चाहे तो कोई हानि नहीं हैं।
२१ - स्तोत्र पाठ करते समय सामने संबंधित देवता का चित्र, अगरबत्ती, दीपक व जल का पात्र हो तो ज्यादा अनुकूल रहता है, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार अग्नि (दीपक), वरुण (जल पात्र) की साक्षी में ही स्तोत्र पाठ होना चाहिए ।
२२ स्तोत्र पाठ प्रातः सांय या रात्रि किसी भी समय किया जा सकता है। इसके लिये कोई विशेष समय निश्चित नही होता। जब भी मन में तरंग उठे, जब भी स्तोत्र पाठ करने की इच्छा जाग्रत हो, जब भी प्रभु के समीप बैठने की भावना बने, तभी बैठकर स्तोत्र पाठ किया जा सकता है, परन्तु अपवित्र शरीर से या अपवित्र स्थान पर बैठकर स्तोत्र पाठ करना वर्जित है।
२३ - स्तोत्र पाठ करते समय या इससे पूर्व भारी भोजन नहीं करना चाहिए। शरीर को स्वच्छ व हल्का बनाये रखना अनुकूल रहता है।
२४ कलियुग में स्तोत्र पाठ ही श्रेष्ठतम विधान माना गया है। .
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गणेश स्तोत्र
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स्मार्त पंचदेवोपासक होते हैं। ये पांच देव हैं- १. श्री विष्णु २. श्री शिव ३. श्री शक्ति ४. श्री सूर्य ५. श्री गणपति । इनमें से जो मात्र वैष्णव हैं वे विष्णु को ही मुख्य अंग मानकर पूजा करते हैं, इस प्रकार शैव शिव को, शाक्त शक्ति को, सौर्य सूर्य को और गणपत्य गणेशजी को मुख्य मानते हैं।
गणेश शब्द का मूल अर्थ है समस्त जीव जाति के स्वामी । कुछ लोगों का यह कथन है कि ये अनार्यों के देवता थे और बाद में आर्यों ने इन्हें पंच देवताओं में स्थान दिया। यह भ्रम विदेशियों द्वारा फैलाया हुआ है। हमारी सभ्यता के प्रारम्भ से ही जिन देवताओं की उपासना होती आई है उनमें गणेश सर्व प्रथम पूजनीय रहे हैं।
गणेश का वर्णन कई स्थानों पर आया है और अनुभवों से यह सिद्ध हुआ है कि गणपति की पूजा जीवन में मंगलकारी एवं अत्यन्त अनुकूल रहती है। जो व्यक्ति अन्य किसी देवी-देवताओं की पूजा नहीं कर सकता उसे गणेश पूजन अवश्य ही करना चाहिए । मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह रहा है कि यदि हम नित्य प्रातः उठते समय गणपति का स्मरण कर लें तो सारा दिन प्रसन्नता से बीतता है, और उस दिन विशेष शुभ फलदायक समाचार मिलते हैं।
आगे गणपति से सम्बन्धित स्तोत्र दिये हैं जो संक्षिप्त होते हुए भी अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। प्रातः उठकर यदि व्यक्ति इनमें से किसी एक स्तोत्र का भी पाठ कर ले तो उसके जीवन में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता। चिन्ता एवं रोग निवारण के लिये "मयूरेश स्तोत्र" अत्यन्त समर्थ है। यह स्तोत्र मनुष्य को भक्ति मार्ग में लगाने वाला तथा समस्त प्रकार के पापों का नाश करने वाला है। मानसिक रूप से चाहे कितनी ही चिन्ताएं व्यक्ति को परेशान कर रही हों, यदि वह ११ दिन ही प्रातः उठकर "मयूरेश स्तोत्र" का पाठ कर ले तो वह स्वयं ही आश्चर्यजनक रूप से अनुभव करेगा कि चिन्ताएं एवं समस्याएं स्वतः ही समाप्त हो रही हैं, और उन समस्याओं का सुलझाव अपने अनुकूल हो रहा है। यह शुभ स्तोत्र मानसिक चिन्ता तथा शारीरिक रोग को दूर करने में अत्यधिक सहायक एव अनुकूल है।
संकटनाश के लिये गणपति से संबंधित एक अन्य महत्वपूर्ण स्तोत्र 'संकटनाशन स्तोत्र' है। यह स्तोत्र भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। व्यक्ति के जीवन में कितना ही भयंकर संकट क्यों न आया हो, यदि इस स्तोत्र का पाठ नित्य श्रद्धापूर्वक करे तो वह उस संकट से मुक्ति प्राप्त करने में सफल हो जाता है। इस स्तोत्र का प्रभाव यहां तक देखा है गया है कि व्यक्ति जेल से मुक्त हो जाता है तथा मुकदमें में सफलता प्राप्त कर लेता है।
जिन व्यक्तियों पर मुकदमें चल रहे हों या शत्रु परेशान कर रहे हों तो उनके लिये यह स्तोत्र कल्प वृक्ष के समान है। उन्हें चाहिए कि इस स्तोत्र का पाठ नित्य पांच बार करें, और तब तक इस स्तोत्र का पाठ चालू रखें जब तक कि उन्हें अपने कार्य में सिद्धि प्राप्त न हो जाय। शत्रु विजय, मुकदमें में सफलता तथा बाधाओं की शान्ति के लिये इससे बढ़ कर कोई अन्य स्तोत्र नहीं है।
चिन्ता एवं रोग निवारण के लिये
मयूरेशस्तोत्रम्
पुराणपुरुषं देवं नानाक्रीडाकरं मुदा ।
मायाविनं दुर्विभाव्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
परात्परं चिदानन्दं निर्विकारं हृदि स्थितम् ।
गुणातीतं गुणमयं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
सृजन्तं पालयन्तं च संहरन्तं निजेच्छया।
सर्वविघ्नहरं देवं मयूरेशं नमाम्यहम् ।।
नानादैत्यनिहन्तारं नानारूपाणि बिभ्रतम् ।
नानायुधधरं भक्त्या मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
इन्द्रादिदेवतावृन्दैरभिष्टुतमहर्निशम् ।
सदसद्ध यक्तमव्यक्तं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
सर्वशक्तिमयं देवं सर्वरूपधरं विभुम् ।
सर्वविद्याप्रवक्तारं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
पार्वतीनन्दनं शम्भोरानन्दपरिवर्धनम् ।
भक्तानन्दकरं नित्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
मुनिध्येयं मुनिनुतं मुनिकामप्रपूरकम् ।
समष्टिव्यष्टिरूपं त्वा मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
सर्वाज्ञाननिहन्तारं सर्वज्ञानकरं शुचिम् ।
सत्यज्ञानमयं सत्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
अनेककोटिब्रह्माण्डनायकं जगदीश्वरम् ।
अनन्तविभवं विष्णुं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
मयूरेश उवाच
इदं ब्रह्मकरं स्तोत्रं सर्वपापप्रनाशनम् ।
सर्वकामप्रदं नृणां सर्वोपद्रवनाशनम् ॥
कारागृहगतानां चमोचनं दिनसप्तकात्।
आधिव्याधिहरं चैव भुक्तिमुक्तिप्रदं शुभम् ॥
(क्रमशः)
@Sanatan
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स्मार्त पंचदेवोपासक होते हैं। ये पांच देव हैं- १. श्री विष्णु २. श्री शिव ३. श्री शक्ति ४. श्री सूर्य ५. श्री गणपति । इनमें से जो मात्र वैष्णव हैं वे विष्णु को ही मुख्य अंग मानकर पूजा करते हैं, इस प्रकार शैव शिव को, शाक्त शक्ति को, सौर्य सूर्य को और गणपत्य गणेशजी को मुख्य मानते हैं।
गणेश शब्द का मूल अर्थ है समस्त जीव जाति के स्वामी । कुछ लोगों का यह कथन है कि ये अनार्यों के देवता थे और बाद में आर्यों ने इन्हें पंच देवताओं में स्थान दिया। यह भ्रम विदेशियों द्वारा फैलाया हुआ है। हमारी सभ्यता के प्रारम्भ से ही जिन देवताओं की उपासना होती आई है उनमें गणेश सर्व प्रथम पूजनीय रहे हैं।
गणेश का वर्णन कई स्थानों पर आया है और अनुभवों से यह सिद्ध हुआ है कि गणपति की पूजा जीवन में मंगलकारी एवं अत्यन्त अनुकूल रहती है। जो व्यक्ति अन्य किसी देवी-देवताओं की पूजा नहीं कर सकता उसे गणेश पूजन अवश्य ही करना चाहिए । मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह रहा है कि यदि हम नित्य प्रातः उठते समय गणपति का स्मरण कर लें तो सारा दिन प्रसन्नता से बीतता है, और उस दिन विशेष शुभ फलदायक समाचार मिलते हैं।
आगे गणपति से सम्बन्धित स्तोत्र दिये हैं जो संक्षिप्त होते हुए भी अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। प्रातः उठकर यदि व्यक्ति इनमें से किसी एक स्तोत्र का भी पाठ कर ले तो उसके जीवन में किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता। चिन्ता एवं रोग निवारण के लिये "मयूरेश स्तोत्र" अत्यन्त समर्थ है। यह स्तोत्र मनुष्य को भक्ति मार्ग में लगाने वाला तथा समस्त प्रकार के पापों का नाश करने वाला है। मानसिक रूप से चाहे कितनी ही चिन्ताएं व्यक्ति को परेशान कर रही हों, यदि वह ११ दिन ही प्रातः उठकर "मयूरेश स्तोत्र" का पाठ कर ले तो वह स्वयं ही आश्चर्यजनक रूप से अनुभव करेगा कि चिन्ताएं एवं समस्याएं स्वतः ही समाप्त हो रही हैं, और उन समस्याओं का सुलझाव अपने अनुकूल हो रहा है। यह शुभ स्तोत्र मानसिक चिन्ता तथा शारीरिक रोग को दूर करने में अत्यधिक सहायक एव अनुकूल है।
संकटनाश के लिये गणपति से संबंधित एक अन्य महत्वपूर्ण स्तोत्र 'संकटनाशन स्तोत्र' है। यह स्तोत्र भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। व्यक्ति के जीवन में कितना ही भयंकर संकट क्यों न आया हो, यदि इस स्तोत्र का पाठ नित्य श्रद्धापूर्वक करे तो वह उस संकट से मुक्ति प्राप्त करने में सफल हो जाता है। इस स्तोत्र का प्रभाव यहां तक देखा है गया है कि व्यक्ति जेल से मुक्त हो जाता है तथा मुकदमें में सफलता प्राप्त कर लेता है।
जिन व्यक्तियों पर मुकदमें चल रहे हों या शत्रु परेशान कर रहे हों तो उनके लिये यह स्तोत्र कल्प वृक्ष के समान है। उन्हें चाहिए कि इस स्तोत्र का पाठ नित्य पांच बार करें, और तब तक इस स्तोत्र का पाठ चालू रखें जब तक कि उन्हें अपने कार्य में सिद्धि प्राप्त न हो जाय। शत्रु विजय, मुकदमें में सफलता तथा बाधाओं की शान्ति के लिये इससे बढ़ कर कोई अन्य स्तोत्र नहीं है।
चिन्ता एवं रोग निवारण के लिये
मयूरेशस्तोत्रम्
पुराणपुरुषं देवं नानाक्रीडाकरं मुदा ।
मायाविनं दुर्विभाव्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
परात्परं चिदानन्दं निर्विकारं हृदि स्थितम् ।
गुणातीतं गुणमयं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
सृजन्तं पालयन्तं च संहरन्तं निजेच्छया।
सर्वविघ्नहरं देवं मयूरेशं नमाम्यहम् ।।
नानादैत्यनिहन्तारं नानारूपाणि बिभ्रतम् ।
नानायुधधरं भक्त्या मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
इन्द्रादिदेवतावृन्दैरभिष्टुतमहर्निशम् ।
सदसद्ध यक्तमव्यक्तं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
सर्वशक्तिमयं देवं सर्वरूपधरं विभुम् ।
सर्वविद्याप्रवक्तारं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
पार्वतीनन्दनं शम्भोरानन्दपरिवर्धनम् ।
भक्तानन्दकरं नित्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
मुनिध्येयं मुनिनुतं मुनिकामप्रपूरकम् ।
समष्टिव्यष्टिरूपं त्वा मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
सर्वाज्ञाननिहन्तारं सर्वज्ञानकरं शुचिम् ।
सत्यज्ञानमयं सत्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
अनेककोटिब्रह्माण्डनायकं जगदीश्वरम् ।
अनन्तविभवं विष्णुं मयूरेशं नमाम्यहम् ॥
मयूरेश उवाच
इदं ब्रह्मकरं स्तोत्रं सर्वपापप्रनाशनम् ।
सर्वकामप्रदं नृणां सर्वोपद्रवनाशनम् ॥
कारागृहगतानां चमोचनं दिनसप्तकात्।
आधिव्याधिहरं चैव भुक्तिमुक्तिप्रदं शुभम् ॥
(क्रमशः)
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गणेश स्तोत्र (२)
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संकटनाश के लिये
संकष्टनाशन स्तोत्रम्
नारद उवाच
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुः कामार्थसिद्धये ॥
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्।
तृतीयं कृष्ण पिंगाक्षं गजवकां चतुर्थकम् ॥
लम्बोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टकम् ॥
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्।
एक द गणपति द्वादशं तु गजानानम् ॥
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम् ॥
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ।।
जपेद गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत्।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥
अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् ।
तस्य विद्या भवेत् सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥
@Sanatan
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संकटनाश के लिये
संकष्टनाशन स्तोत्रम्
नारद उवाच
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुः कामार्थसिद्धये ॥
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्।
तृतीयं कृष्ण पिंगाक्षं गजवकां चतुर्थकम् ॥
लम्बोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टकम् ॥
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्।
एक द गणपति द्वादशं तु गजानानम् ॥
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम् ॥
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ।।
जपेद गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत्।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः ॥
अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् ।
तस्य विद्या भवेत् सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥
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. राम रक्षा स्तोत्र
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प्रसिद्ध संत स्वामी महेशानन्दजी भारत की दिव्य विभूति हैं। उनसे इस जीवन में कई बार मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। वे उच्च कोटि के साधक एवं योगी हैं। एक बार जब 'राम रक्षा स्तोत्र' की बात चल पड़ी तो उन्होंने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि 'रामरक्षा स्तोत्र' इस युग का सर्वश्रेष्ठ स्तोत्र है। मैंने अपने जीवन में इस स्तोत्र का विभिन्न अवसरों पर विभिन्न स्थितियों में प्रयोग किया है और वे सभी प्रयोग शत-प्रतिशत सही रहे हैं। बिच्छु काटने से लेकर भयंकर विष का सेवन कर लेने की परिस्थितियों तक में इस स्तोत्र के पाठ से लाभ पहुंचा है। घोर आर्थिक सकट से ग्रस्त व्यक्ति इसका पाठ करके कुछ ही समय में ऋण से उबर जाते हैं। नौकरी छूटना, बुखार आना, जी मिचलाना, मुसीबत, व्यर्थ की परेशानी तथा संकटकालीन परिस्थितियों में मात्र एक दो पाठ से ही व्यक्ति परेशानी से मुक्त हो जाता है और उसे उसी समय नई राह सूझने लग जाती है।
मंत्र में शब्दों का गुंफन ही अपने आप में महत्वपूर्ण है। स्तोत्र का प्रभाव या किसी मंत्र का प्रभाव इसलिये होता है कि उसके शब्दों का संयोजन अपने आप में विलक्षण होता है। उन्होंने बताया कि ध्वनि के माध्यम से कई असंभव कार्यों को संभव किया जा सकता है। युद्ध में बम के धमाके से आदमी बहरा हो जाता है, मकान की खिड़कियाँ टूट जाती है, तथा कई मकान नीचे गिर जाते हैं। अमेरिका में ध्वनि के प्रयोग से बड़े-बड़े तालाब खोद लिये जाते हैं तथा केवल मात्र, ध्वनि से बड़े-बड़े बांध तथा पहाड़ को इधर-उधर खिसकाया जाता है। कई बार युद्ध में केवल बम की ध्वनि के आघात से व्यक्तियों को लकवा हो जाता है, उनके मुँह टेढ़े हो जाते हैं, नाड़ी-संस्थान कार्य करना बन्द कर देता है, गर्भवती स्त्रियों के गर्भ गिर जाते हैं, तथा हृदय रोग से पीड़ित व्यक्तियों का देहान्त हो जाता है। तेज आवाज से वायु मण्डल में तीव्र कम्पन्न पैदा होते हैं और जब वे कम्पन हमारे मस्तिष्क को स्पर्श करते हैं तो उसके दुष्प्रभाव से व्यक्ति पागल हो जाता है।
मंत्रों के प्रभाव के मूल में यही ध्वनि-विज्ञान कार्य करता है। मंत्रों के प्रत्येक अक्षरों का आपस में संबंध रहता है और उन अक्षरों के संयोग से एक विशेष ध्वनि का प्रादुर्भाव होता है और यही ध्वनि वायुमण्डल में फैलकर इच्छित कार्य करने में सफल होती है।
"राम रक्षा स्तोत्र" के प्रभाव के मूल में भी यही ध्वनि कार्य करती है। इस स्तोत्र में शब्दों का संयोजन अपने आप में विलक्षण एवं अप्रतिम है, जिसकी वजह से एक विशेष ध्वनि का निर्माण होता है और उस ध्वनि के कम्पन, बीमार के अचेतन मन में जाकर उसे साहस एवं दृढ़ता प्रदान करते हैं। इस आत्म बल से ही रोग दूर होते हैं तथा उसे आरोग्य, बल एवं शान्ति मिलती है। जो व्यक्ति जितनी ही पुष्टता तथा विश्वास से इस स्तोत्र का पाठ करता है उसे उतनी ही जल्दी सफलता प्राप्त होती है। यह अपने आप में एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है, और यह प्रक्रिया लाखों लोगों ने लाखों बार आजमाई है तथा उन्हें अपने कार्यों में सफलता मिली है।
कई पुस्तकों तथा पत्र पत्रिकाओं में राम रक्षा स्तोत्र के फल के बारे में समाचार सुनने को मिलते रहते हैं। सैकड़ों लोगों ने मुझे राम रक्षा स्तोत्र की सफलता के बारे में बताया है।
राम रक्षा स्तोत्रम्
विनियोगः- अस्य श्रीराम रक्षा स्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः श्रीसीतारामचन्द्रो देवता अनुष्टुप् छन्दः सीता शक्तिः श्रीमान् हनुमान् कीलकं श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः ।
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥१॥
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् । जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥२॥
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥३॥
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥४॥
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥५॥
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥६॥
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्र्यजित् ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥७॥
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षः कुलविनाशकृत ॥८॥
जानुनी सेतुकृत्पातु जंघे दशमुखान्तकः ।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ॥९॥
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥१०॥
पाताल भूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥११॥
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प्रसिद्ध संत स्वामी महेशानन्दजी भारत की दिव्य विभूति हैं। उनसे इस जीवन में कई बार मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। वे उच्च कोटि के साधक एवं योगी हैं। एक बार जब 'राम रक्षा स्तोत्र' की बात चल पड़ी तो उन्होंने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि 'रामरक्षा स्तोत्र' इस युग का सर्वश्रेष्ठ स्तोत्र है। मैंने अपने जीवन में इस स्तोत्र का विभिन्न अवसरों पर विभिन्न स्थितियों में प्रयोग किया है और वे सभी प्रयोग शत-प्रतिशत सही रहे हैं। बिच्छु काटने से लेकर भयंकर विष का सेवन कर लेने की परिस्थितियों तक में इस स्तोत्र के पाठ से लाभ पहुंचा है। घोर आर्थिक सकट से ग्रस्त व्यक्ति इसका पाठ करके कुछ ही समय में ऋण से उबर जाते हैं। नौकरी छूटना, बुखार आना, जी मिचलाना, मुसीबत, व्यर्थ की परेशानी तथा संकटकालीन परिस्थितियों में मात्र एक दो पाठ से ही व्यक्ति परेशानी से मुक्त हो जाता है और उसे उसी समय नई राह सूझने लग जाती है।
मंत्र में शब्दों का गुंफन ही अपने आप में महत्वपूर्ण है। स्तोत्र का प्रभाव या किसी मंत्र का प्रभाव इसलिये होता है कि उसके शब्दों का संयोजन अपने आप में विलक्षण होता है। उन्होंने बताया कि ध्वनि के माध्यम से कई असंभव कार्यों को संभव किया जा सकता है। युद्ध में बम के धमाके से आदमी बहरा हो जाता है, मकान की खिड़कियाँ टूट जाती है, तथा कई मकान नीचे गिर जाते हैं। अमेरिका में ध्वनि के प्रयोग से बड़े-बड़े तालाब खोद लिये जाते हैं तथा केवल मात्र, ध्वनि से बड़े-बड़े बांध तथा पहाड़ को इधर-उधर खिसकाया जाता है। कई बार युद्ध में केवल बम की ध्वनि के आघात से व्यक्तियों को लकवा हो जाता है, उनके मुँह टेढ़े हो जाते हैं, नाड़ी-संस्थान कार्य करना बन्द कर देता है, गर्भवती स्त्रियों के गर्भ गिर जाते हैं, तथा हृदय रोग से पीड़ित व्यक्तियों का देहान्त हो जाता है। तेज आवाज से वायु मण्डल में तीव्र कम्पन्न पैदा होते हैं और जब वे कम्पन हमारे मस्तिष्क को स्पर्श करते हैं तो उसके दुष्प्रभाव से व्यक्ति पागल हो जाता है।
मंत्रों के प्रभाव के मूल में यही ध्वनि-विज्ञान कार्य करता है। मंत्रों के प्रत्येक अक्षरों का आपस में संबंध रहता है और उन अक्षरों के संयोग से एक विशेष ध्वनि का प्रादुर्भाव होता है और यही ध्वनि वायुमण्डल में फैलकर इच्छित कार्य करने में सफल होती है।
"राम रक्षा स्तोत्र" के प्रभाव के मूल में भी यही ध्वनि कार्य करती है। इस स्तोत्र में शब्दों का संयोजन अपने आप में विलक्षण एवं अप्रतिम है, जिसकी वजह से एक विशेष ध्वनि का निर्माण होता है और उस ध्वनि के कम्पन, बीमार के अचेतन मन में जाकर उसे साहस एवं दृढ़ता प्रदान करते हैं। इस आत्म बल से ही रोग दूर होते हैं तथा उसे आरोग्य, बल एवं शान्ति मिलती है। जो व्यक्ति जितनी ही पुष्टता तथा विश्वास से इस स्तोत्र का पाठ करता है उसे उतनी ही जल्दी सफलता प्राप्त होती है। यह अपने आप में एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है, और यह प्रक्रिया लाखों लोगों ने लाखों बार आजमाई है तथा उन्हें अपने कार्यों में सफलता मिली है।
कई पुस्तकों तथा पत्र पत्रिकाओं में राम रक्षा स्तोत्र के फल के बारे में समाचार सुनने को मिलते रहते हैं। सैकड़ों लोगों ने मुझे राम रक्षा स्तोत्र की सफलता के बारे में बताया है।
राम रक्षा स्तोत्रम्
विनियोगः- अस्य श्रीराम रक्षा स्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिक ऋषिः श्रीसीतारामचन्द्रो देवता अनुष्टुप् छन्दः सीता शक्तिः श्रीमान् हनुमान् कीलकं श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः ।
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥१॥
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् । जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥२॥
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥३॥
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥४॥
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥५॥
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः ।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥६॥
करौ सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्र्यजित् ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥७॥
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
ऊरू रघूत्तमः पातु रक्षः कुलविनाशकृत ॥८॥
जानुनी सेतुकृत्पातु जंघे दशमुखान्तकः ।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ॥९॥
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥१०॥
पाताल भूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥११॥
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