108 अन्नपूर्णा ॐ भगवत्यै च विद्महे माहेश्वर्यै च धीमहि तन्नोऽन्नपूर्णा प्रचोदयात् ॥
109 बगलामुखी ॐ बगलामुख्यै च विद्महे स्तम्भिन्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
110 बटुकभैरव ॐ तत्पुरुषाय विद्महे आपदुद्धारणाय धीमहि तन्नो बटुकः प्रचोदयात् ॥
111 भैरवी ॐ त्रिपुरायै च विद्महे भैरव्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
112 भुवनेश्वरी ॐ नारायण्यै च विद्महे भुवनेश्वर्यै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
113 ब्रह्मा ॐ पद्मोद्भवाय विद्महे देववक्त्राय धीमहि तन्नः स्रष्टा प्रचोदयात्॥
114 ॐ वेदात्मने च विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥
115 ॐ परमेश्वराय विद्महे परतत्त्वाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥
116 चन्द्र ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्त्वाय धीमहि तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् ॥
117 छिन्नमस्ता ॐ वैरोचन्यै च विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्॥
118 दक्षिणामूर्ति ॐ दक्षिणामूर्तये विद्महे ध्यानस्थाय धीमहि तन्नो धीशः प्रचोदयात्॥
119 देवी ॐ देव्यैब्रह्माण्यै विद्महे महाशक्त्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्॥
120 धूमावती ॐ धूमावत्यै च विद्महे संहारिण्यै च धीमहि तन्नो धूमा प्रचोदयात्॥
121 दुर्गा ॐ कात्यायन्यै विद्महे कन्याकुमार्यै धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्॥
122 ॐ महादेव्यै च विद्महे दुर्गायै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
123 गणेश ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥
124 ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥
125 गरुड ॐ वैनतेयाय विद्महे सुवर्णपक्षाय धीमहि तन्नो गरुडः प्रचोदयात् ॥
126 ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्णपर्णाय (सुवर्णपक्षाय) धीमहि तन्नो गरुडः प्रचोदयात् ॥
127 गौरी ॐ गणाम्बिकायै विद्महे कर्मसिद्ध्यै च धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥
128 ॐ सुभगायै च विद्महे काममालायै धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥
129 गोपाल ॐ गोपालाय विद्महे गोपीजनवल्लभाय धीमहि तन्नो गोपालः प्रचोदयात् ॥
130 गुरु ॐ गुरुदेवाय विद्महे परब्रह्माय धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात् ॥
131 हनुमत् ॐ रामदूताय विद्महे कपिराजाय धीमहि तन्नो हनुमान् प्रचोदयात् ॥
132 ॐ अञ्जनीजाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि तन्नो हनुमान् प्रचोदयात् ॥
133 हयग्रीव ॐ वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात् ॥
134 इन्द्र, शक्र ॐ देवराजाय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि तन्नः शक्रः प्रचोदयात्॥
135 ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सहस्राक्षाय धीमहि तन्न इन्द्रः प्रचोदयात् ॥
136 जल ॐ ह्रीं जलबिम्बाय विद्महे मीनपुरुषाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥
137 ॐ जलबिम्बाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि तन्नस्त्वम्बु प्रचोदयात् ॥
138 जानकी ॐ जनकजायै विद्महे रामप्रियायै धीमहि तन्नः सीता प्रचोदयात्॥
139 जयदुर्गा ॐ नारायण्यै विद्महे दुर्गायै च धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥
140 काली ॐ कालिकायै विद्महे श्मशानवासिन्यै धीमहि तन्नोऽघोरा प्रचोदयात् ॥
141 काम ॐ मनोभवाय विद्महे कन्दर्पाय धीमहि तन्नः कामः प्रचोदयात्॥
142 ॐ मन्मथेशाय विद्महे कामदेवाय धीमहि तन्नोऽनङ्गः प्रचोदयात् ॥
143 ॐ कामदेवाय विद्महे पुष्पबाणाय धीमहि तन्नोऽनङ्गः प्रचोदयात् ॥
144ॐ दामोदराय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ॥
145ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नः कृष्ण: प्रचोदयात्:।
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109 बगलामुखी ॐ बगलामुख्यै च विद्महे स्तम्भिन्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
110 बटुकभैरव ॐ तत्पुरुषाय विद्महे आपदुद्धारणाय धीमहि तन्नो बटुकः प्रचोदयात् ॥
111 भैरवी ॐ त्रिपुरायै च विद्महे भैरव्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
112 भुवनेश्वरी ॐ नारायण्यै च विद्महे भुवनेश्वर्यै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
113 ब्रह्मा ॐ पद्मोद्भवाय विद्महे देववक्त्राय धीमहि तन्नः स्रष्टा प्रचोदयात्॥
114 ॐ वेदात्मने च विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥
115 ॐ परमेश्वराय विद्महे परतत्त्वाय धीमहि तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ॥
116 चन्द्र ॐ क्षीरपुत्राय विद्महे अमृततत्त्वाय धीमहि तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् ॥
117 छिन्नमस्ता ॐ वैरोचन्यै च विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्॥
118 दक्षिणामूर्ति ॐ दक्षिणामूर्तये विद्महे ध्यानस्थाय धीमहि तन्नो धीशः प्रचोदयात्॥
119 देवी ॐ देव्यैब्रह्माण्यै विद्महे महाशक्त्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्॥
120 धूमावती ॐ धूमावत्यै च विद्महे संहारिण्यै च धीमहि तन्नो धूमा प्रचोदयात्॥
121 दुर्गा ॐ कात्यायन्यै विद्महे कन्याकुमार्यै धीमहि तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्॥
122 ॐ महादेव्यै च विद्महे दुर्गायै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥
123 गणेश ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥
124 ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥
125 गरुड ॐ वैनतेयाय विद्महे सुवर्णपक्षाय धीमहि तन्नो गरुडः प्रचोदयात् ॥
126 ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सुवर्णपर्णाय (सुवर्णपक्षाय) धीमहि तन्नो गरुडः प्रचोदयात् ॥
127 गौरी ॐ गणाम्बिकायै विद्महे कर्मसिद्ध्यै च धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥
128 ॐ सुभगायै च विद्महे काममालायै धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥
129 गोपाल ॐ गोपालाय विद्महे गोपीजनवल्लभाय धीमहि तन्नो गोपालः प्रचोदयात् ॥
130 गुरु ॐ गुरुदेवाय विद्महे परब्रह्माय धीमहि तन्नो गुरुः प्रचोदयात् ॥
131 हनुमत् ॐ रामदूताय विद्महे कपिराजाय धीमहि तन्नो हनुमान् प्रचोदयात् ॥
132 ॐ अञ्जनीजाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि तन्नो हनुमान् प्रचोदयात् ॥
133 हयग्रीव ॐ वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात् ॥
134 इन्द्र, शक्र ॐ देवराजाय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि तन्नः शक्रः प्रचोदयात्॥
135 ॐ तत्पुरुषाय विद्महे सहस्राक्षाय धीमहि तन्न इन्द्रः प्रचोदयात् ॥
136 जल ॐ ह्रीं जलबिम्बाय विद्महे मीनपुरुषाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥
137 ॐ जलबिम्बाय विद्महे नीलपुरुषाय धीमहि तन्नस्त्वम्बु प्रचोदयात् ॥
138 जानकी ॐ जनकजायै विद्महे रामप्रियायै धीमहि तन्नः सीता प्रचोदयात्॥
139 जयदुर्गा ॐ नारायण्यै विद्महे दुर्गायै च धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात् ॥
140 काली ॐ कालिकायै विद्महे श्मशानवासिन्यै धीमहि तन्नोऽघोरा प्रचोदयात् ॥
141 काम ॐ मनोभवाय विद्महे कन्दर्पाय धीमहि तन्नः कामः प्रचोदयात्॥
142 ॐ मन्मथेशाय विद्महे कामदेवाय धीमहि तन्नोऽनङ्गः प्रचोदयात् ॥
143 ॐ कामदेवाय विद्महे पुष्पबाणाय धीमहि तन्नोऽनङ्गः प्रचोदयात् ॥
144ॐ दामोदराय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ॥
145ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नः कृष्ण: प्रचोदयात्:।
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हनुमान सर्व रक्षा-शाबर मन्त्र
*“ॐ गर्जन्तां घोरन्तां, इतनी छिन कहाँ लगाई ? साँझ क वेला, लौंग-सुपारी-पान-फूल-इलायची-धूप-दीप-रोट॒लँगोट-फल-फलाहार मो पै माँगै। अञ्जनी-पुत्र प्रताप-रक्षा-कारण वेगि चलो। लोहे की गदा कील, चं चं गटका चक कील, बावन भैरो कील, मरी कील, मसान कील, प्रेत-ब्रह्म-राक्षस कील, दानव कील, नाग कील, साढ़ बारह ताप कील, तिजारी कील, छल कील, छिद कील, डाकनी कील, साकनी कील, दुष्ट कील, मुष्ट कील, तन कील, काल-भैरो कील, मन्त्र कील, कामरु देश के दोनों दरवाजा कील, बावन वीर कील, चौंसठ जोगिनी कील, मारते क हाथ कील, देखते क नयन कील, बोलते क जिह्वा कील, स्वर्ग कील, पाताल कील, पृथ्वी कील, तारा कील, कील बे कील, नहीं तो अञ्जनी माई की दोहाई फिरती रहे। जो करै वज्र की घात, उलटे वज्र उसी पै परै। छात फार के मरै। ॐ खं-खं-खं जं-जं-जं वं-वं-वं रं-रं-रं लं-लं-लं टं-टं-टं मं-मं-मं। महा रुद्राय नमः। अञ्जनी-पुत्राय नमः। हनुमताय नमः। वायु-पुत्राय नमः। राम-दूताय नमः।”*
विधिः-
अत्यन्त लाभ-दायक अनुभूत मन्त्र है। १००० पाठ करने से सिद्ध होता है।
अधिक कष्ट हो, तो हनुमानजी का फोटो टाँगकर, ध्यान लगाकर लाल फूल और गुग्गूल की आहुति दें।सभी कष्ट समाप्त हो जाएंगे।
लाल लँगोट, फल, मिठाई, ५ लौंग, ५ इलायची, १ सुपारी चढ़ा कर पाठ करें।
@Sanatan
*“ॐ गर्जन्तां घोरन्तां, इतनी छिन कहाँ लगाई ? साँझ क वेला, लौंग-सुपारी-पान-फूल-इलायची-धूप-दीप-रोट॒लँगोट-फल-फलाहार मो पै माँगै। अञ्जनी-पुत्र प्रताप-रक्षा-कारण वेगि चलो। लोहे की गदा कील, चं चं गटका चक कील, बावन भैरो कील, मरी कील, मसान कील, प्रेत-ब्रह्म-राक्षस कील, दानव कील, नाग कील, साढ़ बारह ताप कील, तिजारी कील, छल कील, छिद कील, डाकनी कील, साकनी कील, दुष्ट कील, मुष्ट कील, तन कील, काल-भैरो कील, मन्त्र कील, कामरु देश के दोनों दरवाजा कील, बावन वीर कील, चौंसठ जोगिनी कील, मारते क हाथ कील, देखते क नयन कील, बोलते क जिह्वा कील, स्वर्ग कील, पाताल कील, पृथ्वी कील, तारा कील, कील बे कील, नहीं तो अञ्जनी माई की दोहाई फिरती रहे। जो करै वज्र की घात, उलटे वज्र उसी पै परै। छात फार के मरै। ॐ खं-खं-खं जं-जं-जं वं-वं-वं रं-रं-रं लं-लं-लं टं-टं-टं मं-मं-मं। महा रुद्राय नमः। अञ्जनी-पुत्राय नमः। हनुमताय नमः। वायु-पुत्राय नमः। राम-दूताय नमः।”*
विधिः-
अत्यन्त लाभ-दायक अनुभूत मन्त्र है। १००० पाठ करने से सिद्ध होता है।
अधिक कष्ट हो, तो हनुमानजी का फोटो टाँगकर, ध्यान लगाकर लाल फूल और गुग्गूल की आहुति दें।सभी कष्ट समाप्त हो जाएंगे।
लाल लँगोट, फल, मिठाई, ५ लौंग, ५ इलायची, १ सुपारी चढ़ा कर पाठ करें।
@Sanatan
👍24🙏13❤4
महाँकालभैरव_साधना
यह रक्षा कारक साधना है, जिन्हें दुसरों से धोखे अगर बार बार मिलते हों,अनजाना भय लगता हो, शत्रु हैरान या बदनामी करते हों, उनके लिए ये रामबाण साधना है। ये किसी भी रविवार या अष्टमी की रात्रि में कर सकते हैं।
संकल्प लेकर गुरुदेव, गणपति को प्रणाम करें भैरवजी के यंत्र या चित्र के सामने स्नान करके रात्रि 9 बजे काले या लाल आसन पर दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके बैठ जाएं।
अपने सामने काले वस्त्र पर सूखा नारियल , एक कपूर के टुकड़े , 11 लौंग 11 इलायची थोड़ा लोबान या धूप रखें।
सरसों के तेल का दीपक जलाएं। हाथ में नारियल लेकर अपनी मनोकामना बोलें।
नारियल परसिंदूर,अक्षत,काले तिल लाल पुष्प, थोड़ा गुड़ या जलेबी अर्पित करें।
दक्षिण दिशा की ओर देखकर इस मन्त्र का 108 बार जप हकीक या रुद्राक्ष से करें।
मंत्र:-
"ॐ भ्रां भ्रीं भ्रूं भ्रः! ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रः!ख्रां ख्रीं ख्रूं ख्रः!घ्रां घ्रीं घ्रूं घ्र:! म्रां म्रीं म्रूं म्र:! म्रों म्रों म्रों म्रों! क्लों क्लों क्लों क्लों!श्रों श्रों श्रों श्रों! ज्रों ज्रों ज्रों ज्रों। हूँ हूँ हूँ हूँ। हूँ हूँ हूँ हूँ फट सर्वतो रक्ष रक्ष रक्ष रक्ष भैरव नाथ हूँ फट।"
जप के बाद क्षमा प्रार्थना करें, अपनी इच्छा पूर्ण होने का अनुरोध करें। गुरु महाकाल,
भोग गुड़ या जलेबी को घर के बाहर कुत्ते के लिए रख दें,फिर इस बाकी सामान को उसी रात्रि या अगले दिन काले कपडे़ में बांधकर भैरव मंदिर में चढ़ा दें या फिर जल में प्रवाहित कर दें या सुनसान जगह पर छोड़ दें।
।।जय श्री महाकाल।।
@Sanatan
यह रक्षा कारक साधना है, जिन्हें दुसरों से धोखे अगर बार बार मिलते हों,अनजाना भय लगता हो, शत्रु हैरान या बदनामी करते हों, उनके लिए ये रामबाण साधना है। ये किसी भी रविवार या अष्टमी की रात्रि में कर सकते हैं।
संकल्प लेकर गुरुदेव, गणपति को प्रणाम करें भैरवजी के यंत्र या चित्र के सामने स्नान करके रात्रि 9 बजे काले या लाल आसन पर दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके बैठ जाएं।
अपने सामने काले वस्त्र पर सूखा नारियल , एक कपूर के टुकड़े , 11 लौंग 11 इलायची थोड़ा लोबान या धूप रखें।
सरसों के तेल का दीपक जलाएं। हाथ में नारियल लेकर अपनी मनोकामना बोलें।
नारियल परसिंदूर,अक्षत,काले तिल लाल पुष्प, थोड़ा गुड़ या जलेबी अर्पित करें।
दक्षिण दिशा की ओर देखकर इस मन्त्र का 108 बार जप हकीक या रुद्राक्ष से करें।
मंत्र:-
"ॐ भ्रां भ्रीं भ्रूं भ्रः! ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रः!ख्रां ख्रीं ख्रूं ख्रः!घ्रां घ्रीं घ्रूं घ्र:! म्रां म्रीं म्रूं म्र:! म्रों म्रों म्रों म्रों! क्लों क्लों क्लों क्लों!श्रों श्रों श्रों श्रों! ज्रों ज्रों ज्रों ज्रों। हूँ हूँ हूँ हूँ। हूँ हूँ हूँ हूँ फट सर्वतो रक्ष रक्ष रक्ष रक्ष भैरव नाथ हूँ फट।"
जप के बाद क्षमा प्रार्थना करें, अपनी इच्छा पूर्ण होने का अनुरोध करें। गुरु महाकाल,
भोग गुड़ या जलेबी को घर के बाहर कुत्ते के लिए रख दें,फिर इस बाकी सामान को उसी रात्रि या अगले दिन काले कपडे़ में बांधकर भैरव मंदिर में चढ़ा दें या फिर जल में प्रवाहित कर दें या सुनसान जगह पर छोड़ दें।
।।जय श्री महाकाल।।
@Sanatan
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🌹🌹श्री बटुकभैरव_माला मन्त्रम्!!🌹🌹
💫विनियोग:~
*"ॐ अस्य श्रीबटुकभैरव माला मन्त्रस्य वृहदारण्यक ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीबटुक-भैरवो देवता, ह्रीं बीजं, बटुकाय, शक्तिः, आपदुद्धारणाय कीलकं, ममाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।"*
*न्यासाः ध्यानं च पूर्व-वत्*
💫माला मन्त्र:~
*"ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं द्रां द्रीं क्लीं क्लूं सः हौं जूं सः ह्रां ह्रीं ह्रूं भ्रां भ्रीं भ्रुं डमल वरयूं हौं हौं महा कालाय महा भैरवाय मां रक्ष रक्ष, मम पुत्रान् रक्ष रक्ष, मम भ्रातृन् रक्ष रक्ष, मम शिष्यान् रक्ष रक्ष, साधकान् रक्ष रक्ष, मम परिवारान् रक्ष रक्ष, ममोपरि दुष्ट दृष्टि दुष्ट बुद्धि दुष्ट प्रयोगान् कारकान् दुष्ट प्रयोगान् कुर्वति कारयति करिष्यति तां हन हन, उच्चाटय उच्चाटय, स्तम्भय स्तम्भय, मारय मारय, मथ मथ, धुन धुन छेदय छेदय, छिन्धि छिन्धि, हन हन, फ्रें फ्रें फ्रें, खें खें खें, ह्रीं ह्रीं ह्रीं, ह्रूं ह्रूं ह्रूं, दुं दुं दुं, दुष्टं दारय दारय, दारिद्रं हन हन, पापं मथ मथ, आरोग्यं कुरु कुरु, पर बलानि क्षोभय क्षोभय, क्षौं क्षौं क्षौं ह्रीं बटुकाय, केलि रुद्राय नमः।"*
।। जय श्री महाकाल।।
@Sanatan
💫विनियोग:~
*"ॐ अस्य श्रीबटुकभैरव माला मन्त्रस्य वृहदारण्यक ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीबटुक-भैरवो देवता, ह्रीं बीजं, बटुकाय, शक्तिः, आपदुद्धारणाय कीलकं, ममाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।"*
*न्यासाः ध्यानं च पूर्व-वत्*
💫माला मन्त्र:~
*"ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं द्रां द्रीं क्लीं क्लूं सः हौं जूं सः ह्रां ह्रीं ह्रूं भ्रां भ्रीं भ्रुं डमल वरयूं हौं हौं महा कालाय महा भैरवाय मां रक्ष रक्ष, मम पुत्रान् रक्ष रक्ष, मम भ्रातृन् रक्ष रक्ष, मम शिष्यान् रक्ष रक्ष, साधकान् रक्ष रक्ष, मम परिवारान् रक्ष रक्ष, ममोपरि दुष्ट दृष्टि दुष्ट बुद्धि दुष्ट प्रयोगान् कारकान् दुष्ट प्रयोगान् कुर्वति कारयति करिष्यति तां हन हन, उच्चाटय उच्चाटय, स्तम्भय स्तम्भय, मारय मारय, मथ मथ, धुन धुन छेदय छेदय, छिन्धि छिन्धि, हन हन, फ्रें फ्रें फ्रें, खें खें खें, ह्रीं ह्रीं ह्रीं, ह्रूं ह्रूं ह्रूं, दुं दुं दुं, दुष्टं दारय दारय, दारिद्रं हन हन, पापं मथ मथ, आरोग्यं कुरु कुरु, पर बलानि क्षोभय क्षोभय, क्षौं क्षौं क्षौं ह्रीं बटुकाय, केलि रुद्राय नमः।"*
।। जय श्री महाकाल।।
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🌹🌹हनुमान सर्व रक्षा-शाबर मन्त्र🌹🌹
*“ॐ गर्जन्तां घोरन्तां, इतनी छिन कहाँ लगाई ? साँझ क वेला, लौंग-सुपारी-पान-फूल-इलायची-धूप-दीप-रोट॒लँगोट-फल-फलाहार मो पै माँगै। अञ्जनी-पुत्र प्रताप-रक्षा-कारण वेगि चलो। लोहे की गदा कील, चं चं गटका चक कील, बावन भैरो कील, मरी कील, मसान कील, प्रेत-ब्रह्म-राक्षस कील, दानव कील, नाग कील, साढ़ बारह ताप कील, तिजारी कील, छल कील, छिद कील, डाकनी कील, साकनी कील, दुष्ट कील, मुष्ट कील, तन कील, काल-भैरो कील, मन्त्र कील, कामरु देश के दोनों दरवाजा कील, बावन वीर कील, चौंसठ जोगिनी कील, मारते क हाथ कील, देखते क नयन कील, बोलते क जिह्वा कील, स्वर्ग कील, पाताल कील, पृथ्वी कील, तारा कील, कील बे कील, नहीं तो अञ्जनी माई की दोहाई फिरती रहे। जो करै वज्र की घात, उलटे वज्र उसी पै परै। छात फार के मरै। ॐ खं-खं-खं जं-जं-जं वं-वं-वं रं-रं-रं लं-लं-लं टं-टं-टं मं-मं-मं। महा रुद्राय नमः। अञ्जनी-पुत्राय नमः। हनुमताय नमः। वायु-पुत्राय नमः। राम-दूताय नमः।”*
💫विधिः-
अत्यन्त लाभ-दायक अनुभूत मन्त्र है। १००० पाठ करने से सिद्ध होता है।
अधिक कष्ट हो, तो हनुमानजी का फोटो टाँगकर, ध्यान लगाकर लाल फूल और गुग्गूल की आहुति दें।सभी कष्ट समाप्त हो जाएंगे।
लाल लँगोट, फल, मिठाई, ५ लौंग, ५ इलायची, १ सुपारी चढ़ा कर पाठ करें।
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*“ॐ गर्जन्तां घोरन्तां, इतनी छिन कहाँ लगाई ? साँझ क वेला, लौंग-सुपारी-पान-फूल-इलायची-धूप-दीप-रोट॒लँगोट-फल-फलाहार मो पै माँगै। अञ्जनी-पुत्र प्रताप-रक्षा-कारण वेगि चलो। लोहे की गदा कील, चं चं गटका चक कील, बावन भैरो कील, मरी कील, मसान कील, प्रेत-ब्रह्म-राक्षस कील, दानव कील, नाग कील, साढ़ बारह ताप कील, तिजारी कील, छल कील, छिद कील, डाकनी कील, साकनी कील, दुष्ट कील, मुष्ट कील, तन कील, काल-भैरो कील, मन्त्र कील, कामरु देश के दोनों दरवाजा कील, बावन वीर कील, चौंसठ जोगिनी कील, मारते क हाथ कील, देखते क नयन कील, बोलते क जिह्वा कील, स्वर्ग कील, पाताल कील, पृथ्वी कील, तारा कील, कील बे कील, नहीं तो अञ्जनी माई की दोहाई फिरती रहे। जो करै वज्र की घात, उलटे वज्र उसी पै परै। छात फार के मरै। ॐ खं-खं-खं जं-जं-जं वं-वं-वं रं-रं-रं लं-लं-लं टं-टं-टं मं-मं-मं। महा रुद्राय नमः। अञ्जनी-पुत्राय नमः। हनुमताय नमः। वायु-पुत्राय नमः। राम-दूताय नमः।”*
💫विधिः-
अत्यन्त लाभ-दायक अनुभूत मन्त्र है। १००० पाठ करने से सिद्ध होता है।
अधिक कष्ट हो, तो हनुमानजी का फोटो टाँगकर, ध्यान लगाकर लाल फूल और गुग्गूल की आहुति दें।सभी कष्ट समाप्त हो जाएंगे।
लाल लँगोट, फल, मिठाई, ५ लौंग, ५ इलायची, १ सुपारी चढ़ा कर पाठ करें।
@Sanatan
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सर्वप्रथम गणेश का ही पूजन क्यों?
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हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य का आरंभ करने के पूर्व गणेशजी की पूजा करना आवश्यक माना गया है, क्योंकि उन्हें विघ्नहर्ता व ऋद्धि-सिद्धि का स्वामी कहा जाता है। इनके स्मरण, ध्यान, जप, आराधना से कामनाओं की पूर्ति होती है विघ्नों का विनाश होता है। वे शीघ्र प्रसन्न होने वाले बुद्धि के अधिष्ठाता और साक्षात् प्रणव रूप हैं। प्रत्येक शुभ कार्य के पूर्व 'श्री गणेशाय नमः' का उच्चारण कर उनकी स्तुति में यह मंत्र बोला जाता है-
वक्रतुण्ड महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभः।
निर्विघ्नं कुरु मेदेव सर्व कार्येषु सर्वदा ॥
गणेशजी विद्या के देवता हैं। साधना में उच्चस्तरीय दूरदर्शिता आ जाए, उचित-अनुचित, कर्तव्य-अकर्तव्य की पहचान हो जाए, इसीलिए सभी शुभ कार्यों में गणेश पूजन का विधान बनाया गया है। गणेशजी की ही पूजा सबसे पहले क्यों होती है, इसकी पौराणिक कथा इस प्रकार है-
पद्मपुराण के अनुसार सृष्टि के आरंभ में जब यह प्रश्न उठा कि प्रथम पूज्य किसे माना जाए, तो समस्त देवतागण ब्रह्माजी के पास पहुंचे। ब्रह्माजी ने कहा कि जो कोई संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा सबसे पहले कर लेगा, उसे ही प्रथम पूजा जाएगा। इस पर सभी देवतागण अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर परिक्रमा हेतु चल पड़े। चूंकि गणेशजी का वाहन चूहा है और उनका शरीर स्थूल, तो ऐसे में वे परिक्रमा कैसे कर पाते? इस समस्या को सुलझाया देवर्षि नारद ने। नारद ने उन्हें जो उपाय सुझाया, उसके अनुसार गणेशजी ने भूमि पर 'राम' नाम लिखकर उसकी सात परिक्रमा की और ब्रह्माजी के पास सबसे पहले पहुंच गए। तब ब्रह्माजी ने उन्हें प्रथम पूज्य बताया। क्योंकि 'राम' नाम साक्षात् श्रीराम का स्वरूप है और श्रीराम में ही संपूर्ण ब्रह्मांड निहित है।
शिवपुराण की एक अन्य कथा के अनुसार एक बार समस्त देवता भगवान् शंकर के पास यह समस्या लेकर पहुंचे कि किस देव को उनका मुखिया चुना जाए। भगवान् शिव ने यह प्रस्ताव रखा कि जो भी पहले पृथ्वी की तीन बार परिक्रमा करके कैलास लौटेगा, वही अग्रपूजा के योग्य होगा और उसे ही देवताओं का स्वामी बनाया जाएगा। चूंकि गणेशजी का वाहन चूहा अत्यंत धीमी गति से चलने वाला था, इसलिए अपनी बुद्धि-चातुर्य के कारण उन्होंने अपने पिता शिव और माता पार्वती की ही तीन परिक्रमा पूर्ण की और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि तुमसे बढ़कर संसार में अन्य कोई इतना चतुर नहीं है। माता-पिता की तीन परिक्रमा से तीनों लोकों की परिक्रमा का पुण्य तुम्हें मिल गया, जो पृथ्वी की परिक्रमा से भी बड़ा है। इसलिए जो मनुष्य किसी कार्य के शुभारंभ से पहले तुम्हारा पूजन करेगा, उसे कोई बाधा नहीं आएगी। बस, तभी से गणेशजी अग्रपूज्य हो गए।
@Sanatan
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हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य का आरंभ करने के पूर्व गणेशजी की पूजा करना आवश्यक माना गया है, क्योंकि उन्हें विघ्नहर्ता व ऋद्धि-सिद्धि का स्वामी कहा जाता है। इनके स्मरण, ध्यान, जप, आराधना से कामनाओं की पूर्ति होती है विघ्नों का विनाश होता है। वे शीघ्र प्रसन्न होने वाले बुद्धि के अधिष्ठाता और साक्षात् प्रणव रूप हैं। प्रत्येक शुभ कार्य के पूर्व 'श्री गणेशाय नमः' का उच्चारण कर उनकी स्तुति में यह मंत्र बोला जाता है-
वक्रतुण्ड महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभः।
निर्विघ्नं कुरु मेदेव सर्व कार्येषु सर्वदा ॥
गणेशजी विद्या के देवता हैं। साधना में उच्चस्तरीय दूरदर्शिता आ जाए, उचित-अनुचित, कर्तव्य-अकर्तव्य की पहचान हो जाए, इसीलिए सभी शुभ कार्यों में गणेश पूजन का विधान बनाया गया है। गणेशजी की ही पूजा सबसे पहले क्यों होती है, इसकी पौराणिक कथा इस प्रकार है-
पद्मपुराण के अनुसार सृष्टि के आरंभ में जब यह प्रश्न उठा कि प्रथम पूज्य किसे माना जाए, तो समस्त देवतागण ब्रह्माजी के पास पहुंचे। ब्रह्माजी ने कहा कि जो कोई संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा सबसे पहले कर लेगा, उसे ही प्रथम पूजा जाएगा। इस पर सभी देवतागण अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर परिक्रमा हेतु चल पड़े। चूंकि गणेशजी का वाहन चूहा है और उनका शरीर स्थूल, तो ऐसे में वे परिक्रमा कैसे कर पाते? इस समस्या को सुलझाया देवर्षि नारद ने। नारद ने उन्हें जो उपाय सुझाया, उसके अनुसार गणेशजी ने भूमि पर 'राम' नाम लिखकर उसकी सात परिक्रमा की और ब्रह्माजी के पास सबसे पहले पहुंच गए। तब ब्रह्माजी ने उन्हें प्रथम पूज्य बताया। क्योंकि 'राम' नाम साक्षात् श्रीराम का स्वरूप है और श्रीराम में ही संपूर्ण ब्रह्मांड निहित है।
शिवपुराण की एक अन्य कथा के अनुसार एक बार समस्त देवता भगवान् शंकर के पास यह समस्या लेकर पहुंचे कि किस देव को उनका मुखिया चुना जाए। भगवान् शिव ने यह प्रस्ताव रखा कि जो भी पहले पृथ्वी की तीन बार परिक्रमा करके कैलास लौटेगा, वही अग्रपूजा के योग्य होगा और उसे ही देवताओं का स्वामी बनाया जाएगा। चूंकि गणेशजी का वाहन चूहा अत्यंत धीमी गति से चलने वाला था, इसलिए अपनी बुद्धि-चातुर्य के कारण उन्होंने अपने पिता शिव और माता पार्वती की ही तीन परिक्रमा पूर्ण की और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि तुमसे बढ़कर संसार में अन्य कोई इतना चतुर नहीं है। माता-पिता की तीन परिक्रमा से तीनों लोकों की परिक्रमा का पुण्य तुम्हें मिल गया, जो पृथ्वी की परिक्रमा से भी बड़ा है। इसलिए जो मनुष्य किसी कार्य के शुभारंभ से पहले तुम्हारा पूजन करेगा, उसे कोई बाधा नहीं आएगी। बस, तभी से गणेशजी अग्रपूज्य हो गए।
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गणेश को दुर्वा और मोदक चढाने का महत्व क्यों?
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भगवान् गणेशजी की 3 या 5 गांठ वाली दूर्वा (एक प्रकार की घास) अर्पण करने से वह प्रसन्न होते हैं और भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। इसीलिए उन्हें दूर्वा चढ़ाने का शास्त्रों में महत्त्व बताया गया है। इसके संबंध में पुराण में एक कथा का उल्लेख मिलता है- "एक समय पृथ्वी पर अनलासुर नामक राक्षस ने भयंकर उत्पात मचा रखा था। उसका अत्याचार पृथ्वी के साथ-साथ स्वर्ग और पाताल तक फैलने लगा था। वह भगवद् भक्ति व ईश्वर आराधना करने वाले ऋषि-मुनियों और निर्दोष लोगों को जिंदा निगल जाता था। देवराज इंद्र ने उससे कई बार युद्ध किया, लेकिन उन्हें हमेशा परास्त होना पड़ा। अनलासुर से त्रस्त होकर समस्त देवता भगवान् शिव के पास गए। उन्होंने बताया कि उसे सिर्फ गणेश ही खत्म कर सकते हैं, क्योंकि उनका पेट बड़ा है इसलिए वे उसको पूरा निगल लेंगे। इस पर देवताओं ने गणेश की स्तुति कर उन्हें प्रसन्न किया। गणेशजी ने अनलासुर का पीछा किया और उसे निगल गए। इससे उनके पेट में काफी जलन होने लगी। अनेक उपाय किए गए, लेकिन ज्वाला शांत न हुई। जब कश्यप ऋषि को यह बात मालूम हुई, तो वे तुरंत कैलास गए और 21 दूर्वा एकत्रित कर एक गांठ तैयार कर गणेश को खिलाई, जिससे उनके पेट की ज्वाला तुरंत शांत हो गई।
गणेशजी को मोदक यानी लड्डू काफी प्रिय हैं। इनके बिना गणेशजी की पूजा अधूरी ही मानी जाती है। गोस्वामी तुलसीदास ने विनय पत्रिका में कहा है-
गाइए गनपति जगबंदन । संकर सुवन भवानी नंदन।
सिद्धि-सदन गज बदन विनायक।कृपा-सिंधु सुंदर सब लायक ॥
मोदकप्रिय मुद मंगलदाता। विद्या वारिधि बुद्धि विधाता ॥
इसमें भी उनकी मोदकप्रियता प्रदर्शित होती है। महाराष्ट्र के भक्त आमतौर पर गणेशजी को मोदक चढ़ाते हैं। उल्लेखनीय है कि मोदक मैदे के खोल में रखा, चीनी, मावे का मिश्रण कर बनाए जाते हैं। जबकि लड्डू मावे व मोतीचूर के बनाए हुए भी उन्हें पसंद हैं। जो भक्त पूर्ण श्रद्धाभाव से गणेशजी को मोदक या लड्डुओं का भोग लगाते हैं, उन पर वे शीघ्र प्रसन्न होकर इच्छापूर्ति करते हैं।
मोद यानी आनंद और 'क' का शाब्दिक अर्थ छोटा-सा भाग मानकर ही मोदक शब्द बना है, जिसका तात्पर्य हाथ में रखने मात्र से आनंद की अनुभूति होना है। ऐसे प्रसाद को जब गणेशजी को चढ़ाया जाए, तो सुख की अनुभूति होना स्वाभाविक है। एक दूसरी व्याख्या के अनुसार जैसे ज्ञान का प्रतीक मोदक मीठा होता है, वैसे ही ज्ञान का प्रसाद भी मीठा होता है।
गणपति अथर्वशीर्ष में लिखा है-
यो दूर्वाकुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति स मेघावान भवति ॥
यो मोदक सहस्रेण यजति स वांछित फलमवाप्राप्नोति ॥
अर्थात् जो भगवान् को दूर्वा चढ़ाता है, वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजो (धान-लाई) चढ़ाता है, वह यशस्वी हो जाता है, मेधावी हो जाता है और जो एक हजार लड्डुओं का भोग गणेश भगवान् को लगाता है, वह वांछित फल प्राप्त करता है।
गणेशजी को गुड़ भी प्रिय है। उनकी मोदकप्रियता के संबंध में एक कथा पद्द्मपुराण में आती है। एक बार गजानन और कार्तिकेय के दर्शन करके देवगण अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने माता पार्वती को एक दिव्य लड्डू प्रदान किया। इस लड्डू को दोनों बालक आग्रह कर मांगने लगे। तब माता पार्वती ने लड्डू के गुण बताए "इस मोदक की गंध से ही अमरत्व की प्राप्ति होती है। निस्संदेह इसे सूंघने या खाने वाला संपूर्ण शास्त्रों का मर्मज्ञ, सब तंत्रों में प्रवीण, लेखक, चित्रकार, विद्वान, ज्ञान-विज्ञान विशारद और सर्वज्ञ हो जाता है।" फिर आगे कहा- "तुम दोनों में से जो धर्माचरण के द्वारा अपनी श्रेष्ठता पहले सिद्ध करेगा, वही इस दिव्य मोदक को पाने का अधिकारी होगा।"
माता पार्वती की आज्ञा पाकर कार्तिकेय अपने तीव्रगामी वाहन मयूर पर आरूढ़ होकर त्रिलोक की तीर्थयात्रा पर चल पड़े और मुहूर्त भर में ही सभी तीर्थों के दर्शन, स्नान कर लिए। इधर गणेशजी ने अत्यंत श्रद्धा-भक्ति पूर्वक माता-पिता की परिक्रमा की और हाथ जोड़कर उनके सम्मुख खड़े हो गए और कहा कि तीर्थ स्थान, देव स्थान के दर्शन, अनुष्ठान व सभी प्रकार के व्रत करने से भी माता-पिता के पूजन के सोलहवें अंश के बराबर पुण्य प्राप्त नहीं होता है, अतः मोदक प्राप्त करने का अधिकारी मैं हूं। गणेशजी का तर्कपूर्ण जवाब सुनकर माता पार्वती ने प्रसन्न होकर गणेशजी को मोदक प्रदान कर दिया और कहा कि माता-पिता की भक्ति के कारण गणेश ही यज्ञादि सभी शुभ कार्यों में सर्वत्र अग्रपूज्य होंगे।
@Sanatan
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भगवान् गणेशजी की 3 या 5 गांठ वाली दूर्वा (एक प्रकार की घास) अर्पण करने से वह प्रसन्न होते हैं और भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। इसीलिए उन्हें दूर्वा चढ़ाने का शास्त्रों में महत्त्व बताया गया है। इसके संबंध में पुराण में एक कथा का उल्लेख मिलता है- "एक समय पृथ्वी पर अनलासुर नामक राक्षस ने भयंकर उत्पात मचा रखा था। उसका अत्याचार पृथ्वी के साथ-साथ स्वर्ग और पाताल तक फैलने लगा था। वह भगवद् भक्ति व ईश्वर आराधना करने वाले ऋषि-मुनियों और निर्दोष लोगों को जिंदा निगल जाता था। देवराज इंद्र ने उससे कई बार युद्ध किया, लेकिन उन्हें हमेशा परास्त होना पड़ा। अनलासुर से त्रस्त होकर समस्त देवता भगवान् शिव के पास गए। उन्होंने बताया कि उसे सिर्फ गणेश ही खत्म कर सकते हैं, क्योंकि उनका पेट बड़ा है इसलिए वे उसको पूरा निगल लेंगे। इस पर देवताओं ने गणेश की स्तुति कर उन्हें प्रसन्न किया। गणेशजी ने अनलासुर का पीछा किया और उसे निगल गए। इससे उनके पेट में काफी जलन होने लगी। अनेक उपाय किए गए, लेकिन ज्वाला शांत न हुई। जब कश्यप ऋषि को यह बात मालूम हुई, तो वे तुरंत कैलास गए और 21 दूर्वा एकत्रित कर एक गांठ तैयार कर गणेश को खिलाई, जिससे उनके पेट की ज्वाला तुरंत शांत हो गई।
गणेशजी को मोदक यानी लड्डू काफी प्रिय हैं। इनके बिना गणेशजी की पूजा अधूरी ही मानी जाती है। गोस्वामी तुलसीदास ने विनय पत्रिका में कहा है-
गाइए गनपति जगबंदन । संकर सुवन भवानी नंदन।
सिद्धि-सदन गज बदन विनायक।कृपा-सिंधु सुंदर सब लायक ॥
मोदकप्रिय मुद मंगलदाता। विद्या वारिधि बुद्धि विधाता ॥
इसमें भी उनकी मोदकप्रियता प्रदर्शित होती है। महाराष्ट्र के भक्त आमतौर पर गणेशजी को मोदक चढ़ाते हैं। उल्लेखनीय है कि मोदक मैदे के खोल में रखा, चीनी, मावे का मिश्रण कर बनाए जाते हैं। जबकि लड्डू मावे व मोतीचूर के बनाए हुए भी उन्हें पसंद हैं। जो भक्त पूर्ण श्रद्धाभाव से गणेशजी को मोदक या लड्डुओं का भोग लगाते हैं, उन पर वे शीघ्र प्रसन्न होकर इच्छापूर्ति करते हैं।
मोद यानी आनंद और 'क' का शाब्दिक अर्थ छोटा-सा भाग मानकर ही मोदक शब्द बना है, जिसका तात्पर्य हाथ में रखने मात्र से आनंद की अनुभूति होना है। ऐसे प्रसाद को जब गणेशजी को चढ़ाया जाए, तो सुख की अनुभूति होना स्वाभाविक है। एक दूसरी व्याख्या के अनुसार जैसे ज्ञान का प्रतीक मोदक मीठा होता है, वैसे ही ज्ञान का प्रसाद भी मीठा होता है।
गणपति अथर्वशीर्ष में लिखा है-
यो दूर्वाकुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति स मेघावान भवति ॥
यो मोदक सहस्रेण यजति स वांछित फलमवाप्राप्नोति ॥
अर्थात् जो भगवान् को दूर्वा चढ़ाता है, वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजो (धान-लाई) चढ़ाता है, वह यशस्वी हो जाता है, मेधावी हो जाता है और जो एक हजार लड्डुओं का भोग गणेश भगवान् को लगाता है, वह वांछित फल प्राप्त करता है।
गणेशजी को गुड़ भी प्रिय है। उनकी मोदकप्रियता के संबंध में एक कथा पद्द्मपुराण में आती है। एक बार गजानन और कार्तिकेय के दर्शन करके देवगण अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने माता पार्वती को एक दिव्य लड्डू प्रदान किया। इस लड्डू को दोनों बालक आग्रह कर मांगने लगे। तब माता पार्वती ने लड्डू के गुण बताए "इस मोदक की गंध से ही अमरत्व की प्राप्ति होती है। निस्संदेह इसे सूंघने या खाने वाला संपूर्ण शास्त्रों का मर्मज्ञ, सब तंत्रों में प्रवीण, लेखक, चित्रकार, विद्वान, ज्ञान-विज्ञान विशारद और सर्वज्ञ हो जाता है।" फिर आगे कहा- "तुम दोनों में से जो धर्माचरण के द्वारा अपनी श्रेष्ठता पहले सिद्ध करेगा, वही इस दिव्य मोदक को पाने का अधिकारी होगा।"
माता पार्वती की आज्ञा पाकर कार्तिकेय अपने तीव्रगामी वाहन मयूर पर आरूढ़ होकर त्रिलोक की तीर्थयात्रा पर चल पड़े और मुहूर्त भर में ही सभी तीर्थों के दर्शन, स्नान कर लिए। इधर गणेशजी ने अत्यंत श्रद्धा-भक्ति पूर्वक माता-पिता की परिक्रमा की और हाथ जोड़कर उनके सम्मुख खड़े हो गए और कहा कि तीर्थ स्थान, देव स्थान के दर्शन, अनुष्ठान व सभी प्रकार के व्रत करने से भी माता-पिता के पूजन के सोलहवें अंश के बराबर पुण्य प्राप्त नहीं होता है, अतः मोदक प्राप्त करने का अधिकारी मैं हूं। गणेशजी का तर्कपूर्ण जवाब सुनकर माता पार्वती ने प्रसन्न होकर गणेशजी को मोदक प्रदान कर दिया और कहा कि माता-पिता की भक्ति के कारण गणेश ही यज्ञादि सभी शुभ कार्यों में सर्वत्र अग्रपूज्य होंगे।
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महागणपति
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जो ज्ञान तथा आनन्द के स्वरूप है, निर्मल स्फटिक तुल्य जिनकी आकृति है, जो समस्त विद्याओं के परम आधार हैं, उन हयग्रीव गणेश की मैं उपासना करता हूं, जो आवि ओंकार है, वेद की ऋचाएं भी जिनकी स्तुति करती हैं, जिनके सिर पर अर्द्ध चन्द्र शोभायमान है, समस्त देवता जिनके चरणों में नतमस्तक हैं, उन श्री गणेश की मैं वन्दना करता हूं।
श्री गणेश आदि स्वरूप, पूर्ण कल्याणकारी, देवताओं के भी देवता माने गये हैं, जिनकी उपासना एवं पूजा का उल्लेख वेदों में भी प्राप्त होता है, सभी प्रकार के पूजनों में प्रथम पूजन का अधिकार गणपति का ही माना गया है, इसके पीछे ठोस शास्त्रीय आधार है, किसी भी कार्य को पूर्ण रूप से सिद्ध करने के लिए समुचित प्रयत्न करना पड़ता है, लेकिन कई बार सभी प्रकार के प्रयत्नों की पराकाष्ठा होने पर भी ऐन मौके पर कोई न कोई बाधा आ जाती है, इस प्रकार की बाधा को हटाने के लिए, जिससे कार्य निविघ्न रूप से पूर्ण हो जाय, और जैसे- तैसे पूरा न होकर जिस सफलता के साथ कार्य पूरा करने की इच्छा है उसी रूप में कार्य पूरा हो, इसके लिए ही गणपति पूजन विधान निर्धारित किया गया है।
गणेश पूजा ही क्यों?
प्रतिभा और ज्ञान की भी एक सीमा अवश्य होती है, व्यक्ति अपने प्रयत्नों से किसी भी कार्य को श्रेष्ठतम रूप से पूर्ण करते हुए उज्जवल पक्ष की ओर विचार करता है, लेकिन उसकी बुद्धि एक सीमा के आगे नहीं दौड़ पाती है, बाधाएं उसकी बुद्धि एवं कार्य के विकास को रोक देती है, और यही मूल कारण है कि हमारे शास्त्रों में पूजा, साधना उपासना को विशेष महत्व दिया गया है।
सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और पूर्णता ब्रह्मा, विष्णु, और महेश द्वारा सम्पादित की जाती है, लेकिन सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही यह व्यवस्था सुचारु रूप से चलती रहे, और विघ्न न आएं यह भी गणेश के ही जिम्मे है, विघ्नकर्ता और विघ्नहर्ता दोनों ही गणेश हैं, आसुरी प्रकृति के अभक्तों के लिए गणेश विघ्नकर्ता हैं, तो उनकी पूजा उपासना करने वाले भक्तों के लिए विघ्नहर्ता और ऋद्धि-सिद्धि के प्रदाता है, इसीलिए श्री गणेश को सर्वविध्नैहरण, सर्वकामफलप्रद, अनन्तानन्तसुखद और सुमंगलमंगल कहा गया है।
सभी प्रकार के देवता विभिन्न शक्तियों से सम्पन्न हैं, लेकिन विशिष्ट कार्य के लिए विशिष्ट शक्ति सम्पन्न देवताओं का स्मरण, पूजन, साधना सम्पन्न करनी पड़ती है, इसीलिए किसी भी कार्य को निविघ्र्न, पूर्ण फलयुक्त, मंगलमय रूप में पूर्ण करने हेतु भी गणपति का पूजन किया जाता है।
गणपति पूजन 👉 https://t.me/Sanatan/2001
गणेश का स्वरूप शक्ति और शिवतत्व का साकार स्वरूप है, और इन दोनों तत्वों का सुखद स्वरूप ही किसी कार्य में पूर्णता ला सकता है, गणेश शब्द की व्याख्या अत्यन्त महत्वपूर्ण है, गणेश का 'ग' मन के द्वारा, बुद्धि के द्वारा ग्रहण करने योग्य, वर्णन करने योग्य सम्पूर्ण भौतिक जगत को स्पष्ट करता है, और 'ण' मन, बुद्धि और वाणी से परे, ब्रह्म विद्या स्वरूप परमात्मा को स्पष्ट करता है, और इन दोनों के ईश अर्थात स्वामी गणेश कहे गये हैं।
श्री गणेश के द्वादश नाम
१ सुमुख, २ एकवन्त, ३ कपिल, ४ गजकर्ण, ५ लम्बोदर, ६ विकट, ७ विघ्ननाशक, ८ विनायक, ९ धूम्रकेतु, १० गणाध्यक्ष, ११ भालचन्द्र, और १२ गजानन है।
इनमें से प्रत्येक नाम का एक विशेष अर्थ है, ( https://t.me/Sanatan/2007 ) और विशेष भाव है, संक्षिप्त में यही कहना उचित है, कि साधक को अपने पूजा कार्य में गणेश की पूजा एवं इन नामों के जप को एक निश्चित स्थान अवश्य देना चाहिए।
मंत्र साधना और तंत्र साधना का मार्ग गुरु गम्य माना गया है, जो साधक गुरु परम्परा से गणपति सपर्या की विद्या प्राप्त करते हैं, उन्हें ही उपासना में प्रवेश का अधिकार है।
(क्रमशः)
@Sanatan
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ज्ञामानन्दमचं देयं निर्मलं स्फटिकाकृतिम् ।
आधारं सर्वविद्यानां हयग्रीवमुपास्महे ॥
ओंकारमायंप्रवदन्लिसंतो वाचः श्रुतीनामपियंगृणन्ति ।
गजाननं देवगणालताङखिं भजेऽहमर्थेत्युकृतावतंसम् ॥
जो ज्ञान तथा आनन्द के स्वरूप है, निर्मल स्फटिक तुल्य जिनकी आकृति है, जो समस्त विद्याओं के परम आधार हैं, उन हयग्रीव गणेश की मैं उपासना करता हूं, जो आवि ओंकार है, वेद की ऋचाएं भी जिनकी स्तुति करती हैं, जिनके सिर पर अर्द्ध चन्द्र शोभायमान है, समस्त देवता जिनके चरणों में नतमस्तक हैं, उन श्री गणेश की मैं वन्दना करता हूं।
श्री गणेश आदि स्वरूप, पूर्ण कल्याणकारी, देवताओं के भी देवता माने गये हैं, जिनकी उपासना एवं पूजा का उल्लेख वेदों में भी प्राप्त होता है, सभी प्रकार के पूजनों में प्रथम पूजन का अधिकार गणपति का ही माना गया है, इसके पीछे ठोस शास्त्रीय आधार है, किसी भी कार्य को पूर्ण रूप से सिद्ध करने के लिए समुचित प्रयत्न करना पड़ता है, लेकिन कई बार सभी प्रकार के प्रयत्नों की पराकाष्ठा होने पर भी ऐन मौके पर कोई न कोई बाधा आ जाती है, इस प्रकार की बाधा को हटाने के लिए, जिससे कार्य निविघ्न रूप से पूर्ण हो जाय, और जैसे- तैसे पूरा न होकर जिस सफलता के साथ कार्य पूरा करने की इच्छा है उसी रूप में कार्य पूरा हो, इसके लिए ही गणपति पूजन विधान निर्धारित किया गया है।
गणेश पूजा ही क्यों?
प्रतिभा और ज्ञान की भी एक सीमा अवश्य होती है, व्यक्ति अपने प्रयत्नों से किसी भी कार्य को श्रेष्ठतम रूप से पूर्ण करते हुए उज्जवल पक्ष की ओर विचार करता है, लेकिन उसकी बुद्धि एक सीमा के आगे नहीं दौड़ पाती है, बाधाएं उसकी बुद्धि एवं कार्य के विकास को रोक देती है, और यही मूल कारण है कि हमारे शास्त्रों में पूजा, साधना उपासना को विशेष महत्व दिया गया है।
सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और पूर्णता ब्रह्मा, विष्णु, और महेश द्वारा सम्पादित की जाती है, लेकिन सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही यह व्यवस्था सुचारु रूप से चलती रहे, और विघ्न न आएं यह भी गणेश के ही जिम्मे है, विघ्नकर्ता और विघ्नहर्ता दोनों ही गणेश हैं, आसुरी प्रकृति के अभक्तों के लिए गणेश विघ्नकर्ता हैं, तो उनकी पूजा उपासना करने वाले भक्तों के लिए विघ्नहर्ता और ऋद्धि-सिद्धि के प्रदाता है, इसीलिए श्री गणेश को सर्वविध्नैहरण, सर्वकामफलप्रद, अनन्तानन्तसुखद और सुमंगलमंगल कहा गया है।
सभी प्रकार के देवता विभिन्न शक्तियों से सम्पन्न हैं, लेकिन विशिष्ट कार्य के लिए विशिष्ट शक्ति सम्पन्न देवताओं का स्मरण, पूजन, साधना सम्पन्न करनी पड़ती है, इसीलिए किसी भी कार्य को निविघ्र्न, पूर्ण फलयुक्त, मंगलमय रूप में पूर्ण करने हेतु भी गणपति का पूजन किया जाता है।
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गणेश का स्वरूप शक्ति और शिवतत्व का साकार स्वरूप है, और इन दोनों तत्वों का सुखद स्वरूप ही किसी कार्य में पूर्णता ला सकता है, गणेश शब्द की व्याख्या अत्यन्त महत्वपूर्ण है, गणेश का 'ग' मन के द्वारा, बुद्धि के द्वारा ग्रहण करने योग्य, वर्णन करने योग्य सम्पूर्ण भौतिक जगत को स्पष्ट करता है, और 'ण' मन, बुद्धि और वाणी से परे, ब्रह्म विद्या स्वरूप परमात्मा को स्पष्ट करता है, और इन दोनों के ईश अर्थात स्वामी गणेश कहे गये हैं।
श्री गणेश के द्वादश नाम
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।यह श्लोक गणेश पूजन और उनकी साधना उपासना के महत्व को विशेष रूप से स्पष्ट करता है, इसका तात्पर्य यह है, कि व्यक्ति विद्या प्रारम्भ करते समय, विवाह के समय, नगर में अथवा नये भवन में प्रवेश करते समय, यात्रा में कहीं बाहर जाते समय, संग्राम अर्थात शत्रु और विपत्ति के समय, यदि श्री गणेश जी के इन बारह नामों का स्मरण करता है, तो उसकी उद्देश्य की पूर्ति में अथवा कार्य की पूर्णता में किसी प्रकार का विघ्न नहीं आता, गणेश जी के ये बारह नाम
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ।।
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ।।
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ।।
१ सुमुख, २ एकवन्त, ३ कपिल, ४ गजकर्ण, ५ लम्बोदर, ६ विकट, ७ विघ्ननाशक, ८ विनायक, ९ धूम्रकेतु, १० गणाध्यक्ष, ११ भालचन्द्र, और १२ गजानन है।
इनमें से प्रत्येक नाम का एक विशेष अर्थ है, ( https://t.me/Sanatan/2007 ) और विशेष भाव है, संक्षिप्त में यही कहना उचित है, कि साधक को अपने पूजा कार्य में गणेश की पूजा एवं इन नामों के जप को एक निश्चित स्थान अवश्य देना चाहिए।
मंत्र साधना और तंत्र साधना का मार्ग गुरु गम्य माना गया है, जो साधक गुरु परम्परा से गणपति सपर्या की विद्या प्राप्त करते हैं, उन्हें ही उपासना में प्रवेश का अधिकार है।
(क्रमशः)
@Sanatan
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कामना सिद्धि गणपति साधना
साधना की दृष्टि से अलग-अलग रूपों में गणपति का स्मरण और चिन्तन विभिन्न फलों की प्राप्ति में सहायक है, तंत्रसार में गणेश के भिन्न-भिन्न ध्यान का फल इस प्रकार है
पीतं स्मरेत एतम्भमकार्य एवं
वश् ग्राय मंत्री गुरुणं स्मरेत तम्।
कृष्ण स्मरेन्मारण कर्मणीशम
उच्चाटेन धूम्रनिभं स्मरेत तम् ।।
बन्धू कपुष्णादिनिमं चं कृष्टौ
स्मरेत बलार्थ किल पुष्टिकायें ।
स्मरेत् धनार्थी हरिवर्णमेत
मुक्तों च शुक्लं मनुवित्त स्मरेत तम्
एवं प्रकारेण गणं त्रिकालं
ध्यानाच्च किल सिद्धियुक्तो भवेत सः ॥
अर्थात साधक को चाहिए, कि वे स्तम्भन कार्य में गणेश जी के पीत कांति वाले स्वरूप का ध्यान करें, वशीकरण आदि कायों में गणेश जी के अरुण कांति वाले स्वरूप का चिन्तन अनुकूल रहता है। मारण कार्य में कृष्ण कान्ति वाले गणेश जी का ध्यान फलदायक माना गया है, इसी प्रकार उच्चाटन कार्य में धूम्रवर्ण वाले गणपति का स्मरण करना चाहिए, आकर्षण कार्य में बंधूक पुष्प के समान लाल वर्ण वाले गणपति का चिन्तन करना चाहिए। बल एवं पुष्टि कार्य के लिये शान्त गणपति का ध्यान अनुकूल माना गया है। धन प्राप्ति के इच्छुक साधकों को हरित वर्ण वाले गणपति का ध्यान करना चाहिए तथा मोक्ष प्राप्ति के लिये शुक्ल वर्ण वाले गणपति का ध्यान पूर्ण फलदायक होता माना गया है।
गणेश मंत्र साधना
गणपति उपनिषद के अनुसार गणपति का सर्वश्रेष्ठ और सर्वप्रिय मंत्र निम्न है -
॥ ॐ गं गणपतये नमः ॥
साधक या गृहस्थ व्यक्ति को चाहिए कि वह इस मंत्र का जप निरन्तर करता रहे, सोते समय भी इस मंत्र का सतत जप किया जा सकता है, यह मंत्र अपूर्व सिद्धि एवं फलदायक है।
द्वात्रिशाक्षर मंत्र
यह मंत्र अत्यंत ही अनुकूल और तुरन्त प्रभाव देने बाला माना गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराग में बताया गया है, कि श्री गणेश जी को यह मंत्र सबसे अधिक प्रिय है -
मंत्र
॥ श्रीं ह्रीं क्लीं गणेश्वराय ब्रह्मस्वरूपाय चारवे सर्व सिद्धि प्रदाय विघ्नेशाय नमो नमः ॥
श्री गणेश जी के इस मंत्र में ३२ अक्षर है। यह सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाला तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष का शीघ्र ही फलदायक मंत्र है। इसके पांच लाख जप से मंत्र सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इस मंत्र के सिद्धि होने पर घर में विघ्न नहीं आते, उसे असाधारण क्षेत्र में पूर्ण सम्पन्नता तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण सफलता प्राप्त हो जाती है।
इस मंत्र की साधना में विशेष विधि विधान की आवश्यकता नहीं है। नित्य २१ मालाएं, फेरे पर इतना ध्यान रहे, कि यह क्रम तब तक नियमित रूप से चलता रहे जब तक पांच लाख मंत्र जप पूर्ण न हो जाय। मंत्र जप करते समय सामने विजय गणपति का विग्रह हो तो विशेष फलदायक होता है।
षोडशाक्षरी मंत्र
यह मंत्र भी विशेष महत्वपूर्ण माना गया है, इसकी साधना भी ऊपर लिखे अनुसार ही सम्पन्न होती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में पांच लाख मंत्र जप बताया गया है, जिससे कि जीवन में अपने लक्ष्य को तुरन्त प्राप्स करने में साधक सफलता प्राप्स कर लेता है।
मंत्र
॥ ॐ गं गौं गणपतये विग्नविनाशिने स्वाहा ॥
ऊपर मैंने महागणपति से सम्बन्धित कुछ मंत्र व साधनाएं स्पष्ट की हैं, जो कि प्रत्येक गृहस्थ अपनी सुविधानुसार सम्पन्न कर सकता है, ये साधनाएं पुरुष और स्त्री समान रूप से सम्पन्न कर सकते है।
@Sanatan
साधना की दृष्टि से अलग-अलग रूपों में गणपति का स्मरण और चिन्तन विभिन्न फलों की प्राप्ति में सहायक है, तंत्रसार में गणेश के भिन्न-भिन्न ध्यान का फल इस प्रकार है
पीतं स्मरेत एतम्भमकार्य एवं
वश् ग्राय मंत्री गुरुणं स्मरेत तम्।
कृष्ण स्मरेन्मारण कर्मणीशम
उच्चाटेन धूम्रनिभं स्मरेत तम् ।।
बन्धू कपुष्णादिनिमं चं कृष्टौ
स्मरेत बलार्थ किल पुष्टिकायें ।
स्मरेत् धनार्थी हरिवर्णमेत
मुक्तों च शुक्लं मनुवित्त स्मरेत तम्
एवं प्रकारेण गणं त्रिकालं
ध्यानाच्च किल सिद्धियुक्तो भवेत सः ॥
अर्थात साधक को चाहिए, कि वे स्तम्भन कार्य में गणेश जी के पीत कांति वाले स्वरूप का ध्यान करें, वशीकरण आदि कायों में गणेश जी के अरुण कांति वाले स्वरूप का चिन्तन अनुकूल रहता है। मारण कार्य में कृष्ण कान्ति वाले गणेश जी का ध्यान फलदायक माना गया है, इसी प्रकार उच्चाटन कार्य में धूम्रवर्ण वाले गणपति का स्मरण करना चाहिए, आकर्षण कार्य में बंधूक पुष्प के समान लाल वर्ण वाले गणपति का चिन्तन करना चाहिए। बल एवं पुष्टि कार्य के लिये शान्त गणपति का ध्यान अनुकूल माना गया है। धन प्राप्ति के इच्छुक साधकों को हरित वर्ण वाले गणपति का ध्यान करना चाहिए तथा मोक्ष प्राप्ति के लिये शुक्ल वर्ण वाले गणपति का ध्यान पूर्ण फलदायक होता माना गया है।
गणेश मंत्र साधना
गणपति उपनिषद के अनुसार गणपति का सर्वश्रेष्ठ और सर्वप्रिय मंत्र निम्न है -
॥ ॐ गं गणपतये नमः ॥
साधक या गृहस्थ व्यक्ति को चाहिए कि वह इस मंत्र का जप निरन्तर करता रहे, सोते समय भी इस मंत्र का सतत जप किया जा सकता है, यह मंत्र अपूर्व सिद्धि एवं फलदायक है।
द्वात्रिशाक्षर मंत्र
यह मंत्र अत्यंत ही अनुकूल और तुरन्त प्रभाव देने बाला माना गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराग में बताया गया है, कि श्री गणेश जी को यह मंत्र सबसे अधिक प्रिय है -
मंत्र
॥ श्रीं ह्रीं क्लीं गणेश्वराय ब्रह्मस्वरूपाय चारवे सर्व सिद्धि प्रदाय विघ्नेशाय नमो नमः ॥
श्री गणेश जी के इस मंत्र में ३२ अक्षर है। यह सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाला तथा धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष का शीघ्र ही फलदायक मंत्र है। इसके पांच लाख जप से मंत्र सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इस मंत्र के सिद्धि होने पर घर में विघ्न नहीं आते, उसे असाधारण क्षेत्र में पूर्ण सम्पन्नता तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण सफलता प्राप्त हो जाती है।
इस मंत्र की साधना में विशेष विधि विधान की आवश्यकता नहीं है। नित्य २१ मालाएं, फेरे पर इतना ध्यान रहे, कि यह क्रम तब तक नियमित रूप से चलता रहे जब तक पांच लाख मंत्र जप पूर्ण न हो जाय। मंत्र जप करते समय सामने विजय गणपति का विग्रह हो तो विशेष फलदायक होता है।
षोडशाक्षरी मंत्र
यह मंत्र भी विशेष महत्वपूर्ण माना गया है, इसकी साधना भी ऊपर लिखे अनुसार ही सम्पन्न होती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में पांच लाख मंत्र जप बताया गया है, जिससे कि जीवन में अपने लक्ष्य को तुरन्त प्राप्स करने में साधक सफलता प्राप्स कर लेता है।
मंत्र
॥ ॐ गं गौं गणपतये विग्नविनाशिने स्वाहा ॥
ऊपर मैंने महागणपति से सम्बन्धित कुछ मंत्र व साधनाएं स्पष्ट की हैं, जो कि प्रत्येक गृहस्थ अपनी सुविधानुसार सम्पन्न कर सकता है, ये साधनाएं पुरुष और स्त्री समान रूप से सम्पन्न कर सकते है।
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पारद शिवलिंग और शालग्राम पूजन का विशेष महत्त्व क्यों?
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पारद शम्भु-बीज है। अर्थात् पारद (पारा) की उत्पत्ति महादेव शंकर के वीर्य से हुई मानी जाती है। इसलिए शास्त्रकारों ने उसे साक्षात् शिव माना है और पारदलिंग का सबसे अधिक महत्त्व बताकर इसे दिव्य बताया है। शुद्ध पारद संस्कार द्वारा बंधन करके जिस देवी-देवता की प्रतिमा बनाई जाती है, वह स्वयं सिद्ध होती है। वागभट्ट के मतानुसार, जो पारद शिवलिंग का भक्ति सहित पूजन करता है, उसे तीनों लोकों में स्थित शिवलिंगों के पूजन का फल मिलता है। पारदलिंग का दर्शन महापुण्य दाता है। इसके दर्शन से सैकड़ों अश्वमेध यज्ञों के करने से प्राप्त फल की प्राप्ति होती है, करोड़ों गोदान करने एवं हजारों स्वर्ण मुद्राओं के दान करने का फल मिलता है। जिस घर में पारद शिवलिंग का नियमित पूजन होता है, वहां सभी प्रकार के लौकिक और पारलौकिक सुखों की प्राप्ति होती है। किसी भी प्रकार की कमी उस घर में नहीं होती, क्योंकि वहां ऋद्धि-सिद्धि और लक्ष्मी का वास होता है। साक्षात् भगवान् शंकर का वास भी होता है। इसके अलावा वहां का वास्तुदोष भी समाप्त हो जाता है। प्रत्येक सोमवार को पारद शिवलिंग पर अभिषेक करने पर तांत्रिक प्रयोग नष्ट हो जाता है।
शिव महापुराण में शिवजी का कथन है-
लिंगकोटिसहस्रस्य यत्फलं सम्यगर्चनात् ।
तत्फलं कोटिगुणितं रसलिंगार्चनाद्भवेत ॥
ब्रह्महत्या सहस्राणि गौहत्यायाः शतानि च।
तत्क्षणद्विलयं यांति रसलिंगस्य दर्शनात् ॥
स्पर्शनात्प्राप्यत मुक्तिरिति सत्यं शिवोदितम् ॥
अर्थात् करोड़ों शिवलिंगों के पूजन से जो फल प्राप्त होता है, उससे भी करोड़ गुना फल पारद शिवलिंग की पूजा और दर्शन से प्राप्त होता है। पारद शिवलिंग के स्पर्श मात्र से मुक्ति प्राप्त होती है।
शालग्राम
नेपाल में गंडकी नदी के तल में पाए जाने वाले काले रंग के चिकने अंडाकार पत्थर, जिनमें एक छिद्र होता है और पत्थर के अंदर शंख, चक्र, गदा या पद्म खुदे होते हैं तथा कुछ पत्थरों पर सफेद रंग की गोल धारियां चक्र के समान पड़ी होती हैं, इनको शालग्राम कहा जाता है।
शालग्राम रूपी पत्थर की काली बटिया विष्णु के रूप में पूजी जाती है। शालग्राम को एक विलक्षण मूल्यवान पत्थर माना गया है, जिसका वैष्णवजन बड़ा सम्मान करते हैं। पुराणों में तो यहां तक कहा गया है कि जिस घर में शालग्राम न हो, वह घर नहीं, श्मशान के समान है। पद्मपुराण के अनुसार जिस घर में शालग्राम शिला विराजमान रहा करती है, वह घर समस्त तीयों से भी श्रेष्ठ होता है। इसके दर्शन मात्र से ब्रह्महत्या दोष से शुद्ध होकर अंत में मुक्ति प्राप्त होती है। पूजन करने वालों को समस्त भोगों का सुख मिलता है। शालग्राम को समस्त ब्रह्मांडभूत नारायण (विष्णु) का प्रतीक माना जाता है। भगवान् शिव ने स्कंदपुराण के कार्तिक महात्म्य में शालग्राम का महत्त्व वर्णित किया है। प्रति वर्ष कार्तिक मास की द्वादशी को महिलाएं तुलसी और शालग्राम का विवाह कराती हैं और नए कपड़े, जनेऊ आदि अर्पित करती हैं। हिंदू परिवारों में इस विवाह के बाद ही विवाहोत्सव शुरू हो जाते हैं।
ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृतिखंड अध्याय 21 में उल्लेख मिलता है कि जहां शालग्राम की शिला रहती है, वहां भगवान् श्री हरि विराजते हैं और वहीं संपूर्ण तीर्थों को साथ लेकर भगवती लक्ष्मी भी निवास करती हैं। शालग्राम शिला की पूजा करने से ब्रह्महत्या आदि जितने पाप हैं, वे सब नष्ट हो जाते हैं। छत्राकार शालग्राम राज्य देने की तथा वर्तुलाकार में प्रचुर संपत्ति देने की योग्यता है। विकृत, फटे हुए, शूल के नोक के समान, शकट के आकार के, पीलापन लिए हुए, भग्नचक्र वाले शालग्राम दुख, दखिता, व्याधि, हानि के कारण बनते हैं। अतः इन्हें घर में नहीं रखना चाहिए।
पुराण में यह भी कहा गया है कि शालग्राम शिला का जल जो अपने ऊपर छिड़कता है, वह समस्त यज्ञों और संपूर्ण तीथों में स्नान कर चुकने का फल पा लेता है। शिला की उपासना करने से चारों वेद के पढ़ने तथा तपस्या करने का पुण्य मिलता है। जो निरंतर शालग्राम शिला के जल से अभिषेक करता है, वह संपूर्ण दान के पुण्य तथा पृथ्वी की प्रदक्षिणा के उत्तम फल का अधिकारी बन जाता है। इसमें संदेह नहीं कि शालग्राम के जल का निरंतर पान करने वाला पुरुष देवाभिलषित प्रसाद पाता है। उसे जन्म, मृत्यु और जरा से छुटकारा मिल जाता है। मृत्युकाल में इसका जलपान करने वाला समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को चला जाता है। शालग्राम पर चढ़े तुलसी पत्र को दूर करने वाले का दूसरे जन्म में स्त्री साथ नहीं देती। शालग्राम, तुलसी और शंख इन तीनों को जो व्यक्ति सुरक्षित रूप से रखता है, उससे भगवान् श्री हरि बहुत प्रेम करते हैं।
@Sanatan
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पारद शम्भु-बीज है। अर्थात् पारद (पारा) की उत्पत्ति महादेव शंकर के वीर्य से हुई मानी जाती है। इसलिए शास्त्रकारों ने उसे साक्षात् शिव माना है और पारदलिंग का सबसे अधिक महत्त्व बताकर इसे दिव्य बताया है। शुद्ध पारद संस्कार द्वारा बंधन करके जिस देवी-देवता की प्रतिमा बनाई जाती है, वह स्वयं सिद्ध होती है। वागभट्ट के मतानुसार, जो पारद शिवलिंग का भक्ति सहित पूजन करता है, उसे तीनों लोकों में स्थित शिवलिंगों के पूजन का फल मिलता है। पारदलिंग का दर्शन महापुण्य दाता है। इसके दर्शन से सैकड़ों अश्वमेध यज्ञों के करने से प्राप्त फल की प्राप्ति होती है, करोड़ों गोदान करने एवं हजारों स्वर्ण मुद्राओं के दान करने का फल मिलता है। जिस घर में पारद शिवलिंग का नियमित पूजन होता है, वहां सभी प्रकार के लौकिक और पारलौकिक सुखों की प्राप्ति होती है। किसी भी प्रकार की कमी उस घर में नहीं होती, क्योंकि वहां ऋद्धि-सिद्धि और लक्ष्मी का वास होता है। साक्षात् भगवान् शंकर का वास भी होता है। इसके अलावा वहां का वास्तुदोष भी समाप्त हो जाता है। प्रत्येक सोमवार को पारद शिवलिंग पर अभिषेक करने पर तांत्रिक प्रयोग नष्ट हो जाता है।
शिव महापुराण में शिवजी का कथन है-
लिंगकोटिसहस्रस्य यत्फलं सम्यगर्चनात् ।
तत्फलं कोटिगुणितं रसलिंगार्चनाद्भवेत ॥
ब्रह्महत्या सहस्राणि गौहत्यायाः शतानि च।
तत्क्षणद्विलयं यांति रसलिंगस्य दर्शनात् ॥
स्पर्शनात्प्राप्यत मुक्तिरिति सत्यं शिवोदितम् ॥
अर्थात् करोड़ों शिवलिंगों के पूजन से जो फल प्राप्त होता है, उससे भी करोड़ गुना फल पारद शिवलिंग की पूजा और दर्शन से प्राप्त होता है। पारद शिवलिंग के स्पर्श मात्र से मुक्ति प्राप्त होती है।
शालग्राम
नेपाल में गंडकी नदी के तल में पाए जाने वाले काले रंग के चिकने अंडाकार पत्थर, जिनमें एक छिद्र होता है और पत्थर के अंदर शंख, चक्र, गदा या पद्म खुदे होते हैं तथा कुछ पत्थरों पर सफेद रंग की गोल धारियां चक्र के समान पड़ी होती हैं, इनको शालग्राम कहा जाता है।
शालग्राम रूपी पत्थर की काली बटिया विष्णु के रूप में पूजी जाती है। शालग्राम को एक विलक्षण मूल्यवान पत्थर माना गया है, जिसका वैष्णवजन बड़ा सम्मान करते हैं। पुराणों में तो यहां तक कहा गया है कि जिस घर में शालग्राम न हो, वह घर नहीं, श्मशान के समान है। पद्मपुराण के अनुसार जिस घर में शालग्राम शिला विराजमान रहा करती है, वह घर समस्त तीयों से भी श्रेष्ठ होता है। इसके दर्शन मात्र से ब्रह्महत्या दोष से शुद्ध होकर अंत में मुक्ति प्राप्त होती है। पूजन करने वालों को समस्त भोगों का सुख मिलता है। शालग्राम को समस्त ब्रह्मांडभूत नारायण (विष्णु) का प्रतीक माना जाता है। भगवान् शिव ने स्कंदपुराण के कार्तिक महात्म्य में शालग्राम का महत्त्व वर्णित किया है। प्रति वर्ष कार्तिक मास की द्वादशी को महिलाएं तुलसी और शालग्राम का विवाह कराती हैं और नए कपड़े, जनेऊ आदि अर्पित करती हैं। हिंदू परिवारों में इस विवाह के बाद ही विवाहोत्सव शुरू हो जाते हैं।
ब्रह्मवैवर्तपुराण के प्रकृतिखंड अध्याय 21 में उल्लेख मिलता है कि जहां शालग्राम की शिला रहती है, वहां भगवान् श्री हरि विराजते हैं और वहीं संपूर्ण तीर्थों को साथ लेकर भगवती लक्ष्मी भी निवास करती हैं। शालग्राम शिला की पूजा करने से ब्रह्महत्या आदि जितने पाप हैं, वे सब नष्ट हो जाते हैं। छत्राकार शालग्राम राज्य देने की तथा वर्तुलाकार में प्रचुर संपत्ति देने की योग्यता है। विकृत, फटे हुए, शूल के नोक के समान, शकट के आकार के, पीलापन लिए हुए, भग्नचक्र वाले शालग्राम दुख, दखिता, व्याधि, हानि के कारण बनते हैं। अतः इन्हें घर में नहीं रखना चाहिए।
पुराण में यह भी कहा गया है कि शालग्राम शिला का जल जो अपने ऊपर छिड़कता है, वह समस्त यज्ञों और संपूर्ण तीथों में स्नान कर चुकने का फल पा लेता है। शिला की उपासना करने से चारों वेद के पढ़ने तथा तपस्या करने का पुण्य मिलता है। जो निरंतर शालग्राम शिला के जल से अभिषेक करता है, वह संपूर्ण दान के पुण्य तथा पृथ्वी की प्रदक्षिणा के उत्तम फल का अधिकारी बन जाता है। इसमें संदेह नहीं कि शालग्राम के जल का निरंतर पान करने वाला पुरुष देवाभिलषित प्रसाद पाता है। उसे जन्म, मृत्यु और जरा से छुटकारा मिल जाता है। मृत्युकाल में इसका जलपान करने वाला समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को चला जाता है। शालग्राम पर चढ़े तुलसी पत्र को दूर करने वाले का दूसरे जन्म में स्त्री साथ नहीं देती। शालग्राम, तुलसी और शंख इन तीनों को जो व्यक्ति सुरक्षित रूप से रखता है, उससे भगवान् श्री हरि बहुत प्रेम करते हैं।
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Forwarded from Hindu 🚩 (Mohan Shukla)
🕉️ हिन्दू नववर्ष 2025 की हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏
नव संवत्सर 2082 का शुभारंभ 30 मार्च 2025 को हो रहा है। इस पावन अवसर पर हम सभी अपने जीवन में नए संकल्प लें और धर्म, संस्कृति एवं सद्भाव को बढ़ावा दें।
🔸 क्या है हिन्दू नववर्ष?
• हिन्दू नववर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। यह वही तिथि है जब ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की थी। इसी दिन से विक्रम संवत् 2082 की शुरुआत भी होती है।
🔸 हिन्दू नववर्ष 2025 की विशेषताएँ !
• इस वर्ष, सूर्य ग्रह नववर्ष के राजा और मंत्री दोनों होंगे, जिससे 'खप्पर योग' बनता है। ज्योतिषियों के अनुसार, इस योग का प्रभाव देश-दुनिया पर विशेष रूप से देखने को मिलेगा।
🔸 कैसे मनाएं हिन्दू नववर्ष?
• प्रातः स्नान कर घर में मंगल कलश स्थापित करें।
• भगवा ध्वज फहराएं और संकल्प लें कि धर्म व संस्कृति की रक्षा करेंगे।
• माँ दुर्गा एवं भगवान विष्णु की पूजा करें और नववर्ष का स्वागत करें।
• जरूरतमंदों को दान करें और अच्छे कार्यों का संकल्प लें।
• इस नववर्ष पर हम सभी अपने जीवन में शुभता, समृद्धि और शांति की कामना करें।
🕉️ @Hindu
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नव संवत्सर 2082 का शुभारंभ 30 मार्च 2025 को हो रहा है। इस पावन अवसर पर हम सभी अपने जीवन में नए संकल्प लें और धर्म, संस्कृति एवं सद्भाव को बढ़ावा दें।
🔸 क्या है हिन्दू नववर्ष?
• हिन्दू नववर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। यह वही तिथि है जब ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की थी। इसी दिन से विक्रम संवत् 2082 की शुरुआत भी होती है।
🔸 हिन्दू नववर्ष 2025 की विशेषताएँ !
• इस वर्ष, सूर्य ग्रह नववर्ष के राजा और मंत्री दोनों होंगे, जिससे 'खप्पर योग' बनता है। ज्योतिषियों के अनुसार, इस योग का प्रभाव देश-दुनिया पर विशेष रूप से देखने को मिलेगा।
🔸 कैसे मनाएं हिन्दू नववर्ष?
• प्रातः स्नान कर घर में मंगल कलश स्थापित करें।
• भगवा ध्वज फहराएं और संकल्प लें कि धर्म व संस्कृति की रक्षा करेंगे।
• माँ दुर्गा एवं भगवान विष्णु की पूजा करें और नववर्ष का स्वागत करें।
• जरूरतमंदों को दान करें और अच्छे कार्यों का संकल्प लें।
• इस नववर्ष पर हम सभी अपने जीवन में शुभता, समृद्धि और शांति की कामना करें।
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🌹🌹मां दुर्गा के मंत्र और जानकारी 🌹🌹
*II ओम ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडाय विच्चे ll*
*II ओम दुम दुर्गायै नमःII*
*"ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुतेII"*
*"सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके*
*शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते"*
देवी दुर्गा की पूजा शिव, लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश, कार्तिकेय, उनके वाहनों और महिषासुर के साथ की जाती है।
फिर देवी दुर्गा के साथ आने वाली देवियों की पूजा की जाती है।
वे निम्नलिखित हैं !
💫आठ शक्तियाँ :~
1) उग्रचंडा
2) प्रचंड
3) चंडोग्रा
4) चंदनायिका
5) चंदा
6) चंदावती
7) चंद्ररूपा
8) अतिचंडिका
💫तैंतीस विभूतियाँ :~
1) जयंती
2) मंगला
3) काली
4) भद्रकाली
5) कपालिनी
6) दुर्गा
7) शिवा
8) क्षमा
9) धात्री
10) स्वाहा
11) स्वधा
12) उग्रचंडा
13) महादंष्ट्रा
14) शुभदंष्ट्रा
15) करालिनी
16) भीमनेत्र
17) विशालाक्षी
18) विजया
19) जया
20) नंदिनी
21) भद्रा
22) लक्ष्मी
23) कीर्ति
24) यशस्विनी
25) पुष्टि
26) मेधा
27) शिवा
28) साध्वी
29) यश
30) शोभा
31) धृति
32) आनंदा
33) सुनंदा
💫चौसठ योगिनियाँ :~
1) ब्राह्मणी
2) चंडिका
3) गौरी
4) इंद्राणी
5) कौमारी
6) भैरवी
7) दुर्गा
8) नरसिंही
9) कालिका
10) चामुंडा
11) शिवदुति
12) वाराही
13) कौशिकी
14) माहेश्वरी
15) शंकरी
16) जयंती
17) सर्वमंगला
18) काली
19) करालिनी
20) मेधा
21) शिव
22) शाकंभरी
23) भीमा
24) शांति
25) भ्रामरी
26) रुद्राणी
27) अंबिका
28) क्षमा
29) धात्री
30) स्वाहा
31) स्वधा
32) अपर्णा
33) महोदया
34) घोरारूपा
35) महाकाली
36) भद्रकाली
37) कपालिनी
38) क्षेमंकरी
39) उग्रचंडा
40) चंदोगरा
41) चंदनायिका
42) चंदा
43) चंदावती
44) चंडी
45) महामाया
46) प्रियंका
47) बालविकरण
48) बालप्रमर्थनी
49) मनोनमथानी
50) सर्वभूतदमनी
51) उमा
52) तारा
53) महानिद्रा
54) विजया
55) जया
56) शैलपुत्री
57) चंडिका
58) चंद्रघंटा
59) कुष्मांडी
60) स्कंदमात्री
61) कात्यायनी
62) रौद्री
63) कालरात्रि
64) महागौरंगी
💫नौ दुर्गाएँ :~
1) ब्राह्मी
2) माहेश्वरी
3) कौमारी
4) वैष्णवी
5) वाराही
6) नरसिंही
7) ऐन्द्री
8) चामुंडा
9) कात्यायनी
💫अठासी मातृकाएँ :~
1) जयंती
2) मंगला
3) काली
4) भद्रकाली
5) कपालिनी
6) दुर्गा
7) शिवा
8) क्षमा
9) धात्री
10) स्वाहा
11) स्वधा
12) उग्रचंडा
13) महाद्रष्टा
14) शुभदा
15) करालिनी
16) भीमनेत्र
17) विशालाक्षी
18) विजया
19) जया
20) नंदिनी
21) भद्रा
22) लक्ष्मी
23) कीर्ति
24) यशस्विनी
25) पुष्टि
26) मेधा
27) साध्वी
28) यश
29) शोभा
30) अजया
31) धृति
32) आनंदा
33) सुनंदा
34) विजया
35) शांति
36) क्षमा
37) सिद्धि
38) तुष्टि
39) उमा
40) प्रिया
41) ऋद्धि
42) रति
43) दीपा
44) कांति
45) लक्ष्मी
46) ऐश्वर्या
47) वृद्धि
48) शक्ति
49) यवती
50) ब्राह्मी
51) अपरिजीत
52) अज
53) तारा
54) मनसा
55) श्वेता
56) दिति
57) माया
58) महामाया
59) मोहिनी
60) लालसा
61) तिवरा
62) विमला
63) गौरी
64) मति
65) अरुंधति
66) घंटा
67) कर्ण
68) सुकर्ण
69) रौद्री
70) काली
71) मयूरी
72) त्रिनेत्र
73) सुरूपा
74) बहुरूपा
75) रिपुहंत्री
76) अंबिका
77) चर्चिका
78) सुरपूजिता
79) वैवस्वती
80) कौमारी
81) माहेश्वरी
82) वैष्णवी
83) कृतिका
84) कौशिकी
85) शिवदूती
84) चामुंडा
85) ब्राह्मणी
86) वाराही
87) नरसिंही
88) ऐन्द्री
💫वटुका भैरव :~
1) सिद्ध
2) ज्ञान
3) सहज
4) समय
💫नौ क्षेत्रपाल :~
1) हेतुका
2) त्रिपुराघ्नय
3) अग्निजिह्वा
4) अग्निवेताल
5) काल
6) कराला
7) एकपाद
8) भीसन
9) गणेश
💫दुर्गा माता के शस्त्र :~
1) त्रिशूल
2) तलवार
3) चक्र
4) बाण
5) भाला
6) ढाल
7) धनुष
8) सर्प-फांस
9) अंकुश
10) घंटी/कुल्हाड़ी
11) ध्वज
12) पंखा
13) सिंह
14) सिंहासन
💫दुर्गा माता के सेवक :~
1) जया
2) विजया
3) डाकिनी
4) वर्णिनी
5) योगिनी
6) शाकिनी
7) हाकिनी
8) राकिनी
💫नौ भैरव :~
1) अष्टांग
2) रुरु
3) चंड
4) क्रोध
5) उन्मत्त
6) भयंकर
7) कपाल
8) भीषण
9) संहार
@Sanatan
*II ओम ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडाय विच्चे ll*
*II ओम दुम दुर्गायै नमःII*
*"ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुतेII"*
*"सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके*
*शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते"*
देवी दुर्गा की पूजा शिव, लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश, कार्तिकेय, उनके वाहनों और महिषासुर के साथ की जाती है।
फिर देवी दुर्गा के साथ आने वाली देवियों की पूजा की जाती है।
वे निम्नलिखित हैं !
💫आठ शक्तियाँ :~
1) उग्रचंडा
2) प्रचंड
3) चंडोग्रा
4) चंदनायिका
5) चंदा
6) चंदावती
7) चंद्ररूपा
8) अतिचंडिका
💫तैंतीस विभूतियाँ :~
1) जयंती
2) मंगला
3) काली
4) भद्रकाली
5) कपालिनी
6) दुर्गा
7) शिवा
8) क्षमा
9) धात्री
10) स्वाहा
11) स्वधा
12) उग्रचंडा
13) महादंष्ट्रा
14) शुभदंष्ट्रा
15) करालिनी
16) भीमनेत्र
17) विशालाक्षी
18) विजया
19) जया
20) नंदिनी
21) भद्रा
22) लक्ष्मी
23) कीर्ति
24) यशस्विनी
25) पुष्टि
26) मेधा
27) शिवा
28) साध्वी
29) यश
30) शोभा
31) धृति
32) आनंदा
33) सुनंदा
💫चौसठ योगिनियाँ :~
1) ब्राह्मणी
2) चंडिका
3) गौरी
4) इंद्राणी
5) कौमारी
6) भैरवी
7) दुर्गा
8) नरसिंही
9) कालिका
10) चामुंडा
11) शिवदुति
12) वाराही
13) कौशिकी
14) माहेश्वरी
15) शंकरी
16) जयंती
17) सर्वमंगला
18) काली
19) करालिनी
20) मेधा
21) शिव
22) शाकंभरी
23) भीमा
24) शांति
25) भ्रामरी
26) रुद्राणी
27) अंबिका
28) क्षमा
29) धात्री
30) स्वाहा
31) स्वधा
32) अपर्णा
33) महोदया
34) घोरारूपा
35) महाकाली
36) भद्रकाली
37) कपालिनी
38) क्षेमंकरी
39) उग्रचंडा
40) चंदोगरा
41) चंदनायिका
42) चंदा
43) चंदावती
44) चंडी
45) महामाया
46) प्रियंका
47) बालविकरण
48) बालप्रमर्थनी
49) मनोनमथानी
50) सर्वभूतदमनी
51) उमा
52) तारा
53) महानिद्रा
54) विजया
55) जया
56) शैलपुत्री
57) चंडिका
58) चंद्रघंटा
59) कुष्मांडी
60) स्कंदमात्री
61) कात्यायनी
62) रौद्री
63) कालरात्रि
64) महागौरंगी
💫नौ दुर्गाएँ :~
1) ब्राह्मी
2) माहेश्वरी
3) कौमारी
4) वैष्णवी
5) वाराही
6) नरसिंही
7) ऐन्द्री
8) चामुंडा
9) कात्यायनी
💫अठासी मातृकाएँ :~
1) जयंती
2) मंगला
3) काली
4) भद्रकाली
5) कपालिनी
6) दुर्गा
7) शिवा
8) क्षमा
9) धात्री
10) स्वाहा
11) स्वधा
12) उग्रचंडा
13) महाद्रष्टा
14) शुभदा
15) करालिनी
16) भीमनेत्र
17) विशालाक्षी
18) विजया
19) जया
20) नंदिनी
21) भद्रा
22) लक्ष्मी
23) कीर्ति
24) यशस्विनी
25) पुष्टि
26) मेधा
27) साध्वी
28) यश
29) शोभा
30) अजया
31) धृति
32) आनंदा
33) सुनंदा
34) विजया
35) शांति
36) क्षमा
37) सिद्धि
38) तुष्टि
39) उमा
40) प्रिया
41) ऋद्धि
42) रति
43) दीपा
44) कांति
45) लक्ष्मी
46) ऐश्वर्या
47) वृद्धि
48) शक्ति
49) यवती
50) ब्राह्मी
51) अपरिजीत
52) अज
53) तारा
54) मनसा
55) श्वेता
56) दिति
57) माया
58) महामाया
59) मोहिनी
60) लालसा
61) तिवरा
62) विमला
63) गौरी
64) मति
65) अरुंधति
66) घंटा
67) कर्ण
68) सुकर्ण
69) रौद्री
70) काली
71) मयूरी
72) त्रिनेत्र
73) सुरूपा
74) बहुरूपा
75) रिपुहंत्री
76) अंबिका
77) चर्चिका
78) सुरपूजिता
79) वैवस्वती
80) कौमारी
81) माहेश्वरी
82) वैष्णवी
83) कृतिका
84) कौशिकी
85) शिवदूती
84) चामुंडा
85) ब्राह्मणी
86) वाराही
87) नरसिंही
88) ऐन्द्री
💫वटुका भैरव :~
1) सिद्ध
2) ज्ञान
3) सहज
4) समय
💫नौ क्षेत्रपाल :~
1) हेतुका
2) त्रिपुराघ्नय
3) अग्निजिह्वा
4) अग्निवेताल
5) काल
6) कराला
7) एकपाद
8) भीसन
9) गणेश
💫दुर्गा माता के शस्त्र :~
1) त्रिशूल
2) तलवार
3) चक्र
4) बाण
5) भाला
6) ढाल
7) धनुष
8) सर्प-फांस
9) अंकुश
10) घंटी/कुल्हाड़ी
11) ध्वज
12) पंखा
13) सिंह
14) सिंहासन
💫दुर्गा माता के सेवक :~
1) जया
2) विजया
3) डाकिनी
4) वर्णिनी
5) योगिनी
6) शाकिनी
7) हाकिनी
8) राकिनी
💫नौ भैरव :~
1) अष्टांग
2) रुरु
3) चंड
4) क्रोध
5) उन्मत्त
6) भयंकर
7) कपाल
8) भीषण
9) संहार
@Sanatan
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🌹🌹श्री हनुमत शक्ति मंत्र प्रयोग🌹🌹
💫हमारे सनातन धर्म मे रुद्रा अवतार हनुमान सदैव विराजमान है,मनुष्य हो या देवी,देवता सभी के कार्य को सम्पन्न करते है हनुमान जी। राम भक्त,दुर्गा भक्त हो या शिव भक्त,सभी मार्गो मे परम सहायक होते है हनुमान।
ये शिव अंश भी,शिव पुत्र भी है राम के भक्त भी वही सीता के पुत्र हैं।ये कपि मुख है,वही पंचमुख,सप्तमुख,और ग्यारहमुख धारण करने वाले है।ये सभी जगह सूपूजित है कारण ये संकटमोचन है।माता,पिता के लिए अपने संतान से प्यारा कोई नही होता ,जैसै गौरी पुत्र गणेश है,वही शिवांश देवी पुत्र बटुक भैरव है वही शिवांश राम भक्त हनुमान जी है।
💫कहा गया है कि बिना गुरु ज्ञान नही होता है वही बिना कुल देवता के कृपा बिना किसी अन्य देव की कृपा प्राप्त नहीं होती है।
प्रथम श्री गणेश को स्मरण पूजन किए बिना पूजा प्रारम्भनहीं होता हैं।
महाविद्या की साधना करनी हो,वहाँ बिना बटुक कृपा आगे बढ़ना कठिन है।
असली माता पिता के पास ये पुत्र ही पहुँचा सकते है,परन्तु अपने इस जीवन के माता पिता की सेवा तथा आदर किए बिना यह संभव ही नहीं है।
जीवन के बाधा,संकट का निवारण न हो तो धर्म मार्ग में बढ़ना दुष्कर है।
💫मूर्ति पूजा हो या निंरकार,परन्तु सत्य यही है कि परमात्मा एक हैं,तभी तो कहा गया है कि सत्यम,शिवम, सुन्दरम।
सत्य ही शिव है,शिव ही सुन्दर है बाकी सब गौण।एक शिव ही सृष्टि में सत्य है,वही क्रिया शक्ति,चित शक्ति एवं इच्छा शक्ति के रुप में अर्धनारीश्वर है,शिव के बायें भाग में शक्ति हैं,वही शिव के एक रुप है हरि हरात्मक आधा शिव आधा विष्णु,ये शिव की अलग अलग लीला एंव रुप है।शिव सुन्दर है वही उनकी शक्ति सुन्दरी के नाम से विख्यात है,फिर तो शिव के द्वारा रचित श्री रामायण का हनुमत कान्ड को उन्होंने सुन्दर कान्ड का नाम रखा,यह विशेष रहस्यपूर्ण है।
💫सुन्दर कान्ड के प्रत्येक श्लोक का अर्थ समझेगे तो उस शिव के सुन्दर रुप का मर्म समझ में आ जायेगा।सुन्दर कान्ड का पाठ जहाँ होता है सारे अभाव,पाप,रोग विकार स्वतःनष्ट होने लगता है,हमे सिर्फ पूर्ण श्रद्धा से होकर पाठ करना चाहिए।
पाठ से पूर्व हमें क्या करना चाहिए यह भी महत्वपूर्ण है। सुन्दर कान्ड मे शिवशक्ति,सीताराम,वरदान,बल,धन,शुभ,दमन,अहंकार का विसर्जन,भक्ति की परकाष्टा,प्रेम,मिलन विश्वास,धैर्य,बौद्धिक विकास क्यों नहीं प्राप्त किया जा सकता हैं।
हमारे हनुमान जी वे सत्यम शिव के सुन्दर,लीलाधर हैं,सभी उनके कृपा से प्राप्त हो जाता है।हनुमत उपासना व्यापक है,हर कार्य सुलभ है।
प्रथम गुरु,गणेश का पूजन कर राम परिवार ऋषि पूजन कर हनुमत उपासना करने से ही पूर्ण सफलता प्राप्त होती है।
💫 यहां हनुमत का विशेष पाठ प्रयोग लिख रहा हूँ,जो चमत्कारिक है और पूर्ण फल प्रदान करनें मे सक्षम ।
श्री रामायण के प्रथम रचनाकार शिव है फिर ऋषि बाल्मिकी,फिर गोस्वामी तुलसीदास जी है ।मंत्र कवच के ऋषि देवता भिन्न भिन्न है।बजरंग बाण जो प्राप्त होता है वह भी अधुरा हैं।फिर भी लोगों को लाभ मिलता है। एक एक अक्षर शक्ति सम्पन्न है।श्री हनुमान जी शिवांश है परन्तु वैष्णव परिवार से है इस कारण इनके पूजा में मांस,मदिरा,स्त्री भोग वर्जित है।
गृहस्थ आश्रम के भक्त इन्हें अधिक प्रिय है परन्तु साधना काल में नियम का पालन अवश्य करे।
स्त्री भक्त मासिक धर्म में इनकी साधना न करें।
श्री हनुमान चालीसा बहुत प्रभावी एवं प्रचलित हैं, शनिग्रह से प्रभावित हो या राहुकेतु से भूत पिशाच हो या रोग व्याधि नित्य१,३,७,११,२१,३१,५१,१०८ बार पाठ करने से कामना पूर्ण होती है।यह परिक्षित है।
श्री शिव पार्वती सहित गणेश नमस्कार कर,सीताराम,सपरिवार का ध्यान कर श्री गोस्वामी तुलसीदास जी को प्रणाम करे,।
विशेष लाभ के लिए तिल का तेल और चमेली का तेल मिलाकर लाल बती का दीपक लगा लें,
पूर्व,उतर मुख करके थोड़ा गुड़,का लड्डू या किशमिश का प्रसाद अर्पण कर पाठ आरम्भ करें।
इससे अवश्य कामना या संकट का निवारण होता है।
@Sanatan
💫हमारे सनातन धर्म मे रुद्रा अवतार हनुमान सदैव विराजमान है,मनुष्य हो या देवी,देवता सभी के कार्य को सम्पन्न करते है हनुमान जी। राम भक्त,दुर्गा भक्त हो या शिव भक्त,सभी मार्गो मे परम सहायक होते है हनुमान।
ये शिव अंश भी,शिव पुत्र भी है राम के भक्त भी वही सीता के पुत्र हैं।ये कपि मुख है,वही पंचमुख,सप्तमुख,और ग्यारहमुख धारण करने वाले है।ये सभी जगह सूपूजित है कारण ये संकटमोचन है।माता,पिता के लिए अपने संतान से प्यारा कोई नही होता ,जैसै गौरी पुत्र गणेश है,वही शिवांश देवी पुत्र बटुक भैरव है वही शिवांश राम भक्त हनुमान जी है।
💫कहा गया है कि बिना गुरु ज्ञान नही होता है वही बिना कुल देवता के कृपा बिना किसी अन्य देव की कृपा प्राप्त नहीं होती है।
प्रथम श्री गणेश को स्मरण पूजन किए बिना पूजा प्रारम्भनहीं होता हैं।
महाविद्या की साधना करनी हो,वहाँ बिना बटुक कृपा आगे बढ़ना कठिन है।
असली माता पिता के पास ये पुत्र ही पहुँचा सकते है,परन्तु अपने इस जीवन के माता पिता की सेवा तथा आदर किए बिना यह संभव ही नहीं है।
जीवन के बाधा,संकट का निवारण न हो तो धर्म मार्ग में बढ़ना दुष्कर है।
💫मूर्ति पूजा हो या निंरकार,परन्तु सत्य यही है कि परमात्मा एक हैं,तभी तो कहा गया है कि सत्यम,शिवम, सुन्दरम।
सत्य ही शिव है,शिव ही सुन्दर है बाकी सब गौण।एक शिव ही सृष्टि में सत्य है,वही क्रिया शक्ति,चित शक्ति एवं इच्छा शक्ति के रुप में अर्धनारीश्वर है,शिव के बायें भाग में शक्ति हैं,वही शिव के एक रुप है हरि हरात्मक आधा शिव आधा विष्णु,ये शिव की अलग अलग लीला एंव रुप है।शिव सुन्दर है वही उनकी शक्ति सुन्दरी के नाम से विख्यात है,फिर तो शिव के द्वारा रचित श्री रामायण का हनुमत कान्ड को उन्होंने सुन्दर कान्ड का नाम रखा,यह विशेष रहस्यपूर्ण है।
💫सुन्दर कान्ड के प्रत्येक श्लोक का अर्थ समझेगे तो उस शिव के सुन्दर रुप का मर्म समझ में आ जायेगा।सुन्दर कान्ड का पाठ जहाँ होता है सारे अभाव,पाप,रोग विकार स्वतःनष्ट होने लगता है,हमे सिर्फ पूर्ण श्रद्धा से होकर पाठ करना चाहिए।
पाठ से पूर्व हमें क्या करना चाहिए यह भी महत्वपूर्ण है। सुन्दर कान्ड मे शिवशक्ति,सीताराम,वरदान,बल,धन,शुभ,दमन,अहंकार का विसर्जन,भक्ति की परकाष्टा,प्रेम,मिलन विश्वास,धैर्य,बौद्धिक विकास क्यों नहीं प्राप्त किया जा सकता हैं।
हमारे हनुमान जी वे सत्यम शिव के सुन्दर,लीलाधर हैं,सभी उनके कृपा से प्राप्त हो जाता है।हनुमत उपासना व्यापक है,हर कार्य सुलभ है।
प्रथम गुरु,गणेश का पूजन कर राम परिवार ऋषि पूजन कर हनुमत उपासना करने से ही पूर्ण सफलता प्राप्त होती है।
💫 यहां हनुमत का विशेष पाठ प्रयोग लिख रहा हूँ,जो चमत्कारिक है और पूर्ण फल प्रदान करनें मे सक्षम ।
श्री रामायण के प्रथम रचनाकार शिव है फिर ऋषि बाल्मिकी,फिर गोस्वामी तुलसीदास जी है ।मंत्र कवच के ऋषि देवता भिन्न भिन्न है।बजरंग बाण जो प्राप्त होता है वह भी अधुरा हैं।फिर भी लोगों को लाभ मिलता है। एक एक अक्षर शक्ति सम्पन्न है।श्री हनुमान जी शिवांश है परन्तु वैष्णव परिवार से है इस कारण इनके पूजा में मांस,मदिरा,स्त्री भोग वर्जित है।
गृहस्थ आश्रम के भक्त इन्हें अधिक प्रिय है परन्तु साधना काल में नियम का पालन अवश्य करे।
स्त्री भक्त मासिक धर्म में इनकी साधना न करें।
श्री हनुमान चालीसा बहुत प्रभावी एवं प्रचलित हैं, शनिग्रह से प्रभावित हो या राहुकेतु से भूत पिशाच हो या रोग व्याधि नित्य१,३,७,११,२१,३१,५१,१०८ बार पाठ करने से कामना पूर्ण होती है।यह परिक्षित है।
श्री शिव पार्वती सहित गणेश नमस्कार कर,सीताराम,सपरिवार का ध्यान कर श्री गोस्वामी तुलसीदास जी को प्रणाम करे,।
विशेष लाभ के लिए तिल का तेल और चमेली का तेल मिलाकर लाल बती का दीपक लगा लें,
पूर्व,उतर मुख करके थोड़ा गुड़,का लड्डू या किशमिश का प्रसाद अर्पण कर पाठ आरम्भ करें।
इससे अवश्य कामना या संकट का निवारण होता है।
@Sanatan
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🌹🌹बजरंग कैंची मंत्र साधना🌹🌹
💫बजरंग कैंची दूसरे के द्वारा किये गये प्रयोंगो,बंधनों की काट करने में अचूक कार्य करती है
💫विधान:
दिन: हनुमान जयंती या शुक्लपक्ष मंगलवार
दिशा: पूर्व या उतर
चौकी : हनुमान चित्र या मूर्ति अथवा यंत्र को स्थापित करें बाजोट पर लाल वस्त्र पर
वस्त्र, आसन: लाल, लाल उनी आसन
पूजन: पंचोपचार पूजन
भोग: लड्डू का नित्य लगायें तुलसी दल के साथ
विशेष : साधना के प्रथम और अंतिम दिन हनुमान जी को सिन्दूर,लंगोट,सवासेर का रोट,नारियल अर्पित करें
माला : रूद्राक्ष या मूंगे की माला
जप संख्या: दो माला
दिन अवधि: 11 दिन
(अगर दो माला रोज नहीं कर सकते है तो एक माला 21 दिन तक करें)
💫 प्रयोग
इस विद्या से अभिमंत्रित नींबू को जहां लटका दिया जाऐगा तो वहां पर किसी भी प्रकार का अभिचार ,भूत प्रेतादि नहीं ठहर सकते है और ना ही आयेंगे
दुकान में इस विद्या से अभिमंत्रित नींबू लटकाने से धन्धा अच्छा चलता है और धंधे के बंधन ,नजर ,टोने टोटके के प्रभाव समाप्त हो जाते है
भूत -प्रेत लगे व्यक्ति को 5 या 7 बार अभिमंत्रित जल छिड़कने से व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है ऐसा तीन दिन तक करें तो बाधा समूल रूप से समाप्त हो जाती है
इस मंत्र को भोजपत्र पर लिखकर,
फिर 108 बार मंत्र पढ़कर 108 बार ही फूंक मारकर अभिमंत्रित करके ताबीज में डालकर धारण करने से सर्वत्र रक्षा होती है 108 बार फूंक का मतलब है एक बार मंत्र पढ़ा और एक फूंक मारी इसी तरह से 108 बार करना है।
जिस व्यक्ति के नाम से मंत्र पढ़कर लौंग अभिमंत्रित कर उसे खिला दें तो उसकी विद्या नष्ट हो जाती है।
💫इस विद्या के अनेक प्रयोग है।
@Sanatan
💫बजरंग कैंची दूसरे के द्वारा किये गये प्रयोंगो,बंधनों की काट करने में अचूक कार्य करती है
💫विधान:
दिन: हनुमान जयंती या शुक्लपक्ष मंगलवार
दिशा: पूर्व या उतर
चौकी : हनुमान चित्र या मूर्ति अथवा यंत्र को स्थापित करें बाजोट पर लाल वस्त्र पर
वस्त्र, आसन: लाल, लाल उनी आसन
पूजन: पंचोपचार पूजन
भोग: लड्डू का नित्य लगायें तुलसी दल के साथ
विशेष : साधना के प्रथम और अंतिम दिन हनुमान जी को सिन्दूर,लंगोट,सवासेर का रोट,नारियल अर्पित करें
माला : रूद्राक्ष या मूंगे की माला
जप संख्या: दो माला
दिन अवधि: 11 दिन
(अगर दो माला रोज नहीं कर सकते है तो एक माला 21 दिन तक करें)
💫 प्रयोग
इस विद्या से अभिमंत्रित नींबू को जहां लटका दिया जाऐगा तो वहां पर किसी भी प्रकार का अभिचार ,भूत प्रेतादि नहीं ठहर सकते है और ना ही आयेंगे
दुकान में इस विद्या से अभिमंत्रित नींबू लटकाने से धन्धा अच्छा चलता है और धंधे के बंधन ,नजर ,टोने टोटके के प्रभाव समाप्त हो जाते है
भूत -प्रेत लगे व्यक्ति को 5 या 7 बार अभिमंत्रित जल छिड़कने से व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है ऐसा तीन दिन तक करें तो बाधा समूल रूप से समाप्त हो जाती है
इस मंत्र को भोजपत्र पर लिखकर,
फिर 108 बार मंत्र पढ़कर 108 बार ही फूंक मारकर अभिमंत्रित करके ताबीज में डालकर धारण करने से सर्वत्र रक्षा होती है 108 बार फूंक का मतलब है एक बार मंत्र पढ़ा और एक फूंक मारी इसी तरह से 108 बार करना है।
जिस व्यक्ति के नाम से मंत्र पढ़कर लौंग अभिमंत्रित कर उसे खिला दें तो उसकी विद्या नष्ट हो जाती है।
💫इस विद्या के अनेक प्रयोग है।
@Sanatan
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