Forwarded from Sunil Arya
महर्षि दयानंद सरस्वती जी के ग्रन्थों से ब्रह्मचर्य विषयक वचनों का संग्रह ।
हमारा सभी का कर्तव्य है कि हम अपने ऋषि के दिव्य वचनों को धारण करके जीवन को पवित्र बनावें।
1. जिसके शरीर में वीर्य नहीं होता, वह नपुंसक, महाकुलक्षणी और जिसको प्रमेह रोग होता है, वह दुर्बल, निस्तेज-निर्बुद्धि और उत्साह-साहस-धैर्य-बल, पराक्रम आदि गुणों से रहित होकर नष्ट हो जाता है। (सत्यार्थप्रकाश, 2 समुल्लास)
2. देखो, जिसके शरीर में सुरक्षित वीर्य रहता है, उसको आरोग्य, बुद्धि, बल और पराक्रम बढ़ कर बहुत सुख की प्राप्ति होती है।
(सत्यार्थप्रकाश, 2 समुल्लास)
3. जो सदा सत्याचार में प्रवृत्त, जितेन्द्रिय और जिनका वीर्य अधःस्खलित कभी न हो उन्हीं का ब्रह्मचर्य सच्चा होता है। (सत्यार्थप्रकाश, 4 समुल्लास)
4. जिस देश में यथायोग्य ब्रह्मचर्य विद्या और वेदोक्त धर्म का प्रचार होता है, वही देश सौभाग्यवान् होता है। (सत्यार्थप्रकाश, 3 समुल्लास)
5. सर्वत्र एकाकी सोवे। वीर्य स्खलित कभी न करें। जो कामना से वीर्य स्खलित कर दे तो जानो कि अपने ब्रह्मचर्य व्रत का नाश कर दिया। (सत्यार्थप्रकाश, 3 समुल्लास)
6. ब्रह्मचर्य सेवन से यह बात होती है कि जब मनुष्य बाल्यावस्था में विवाह न करे, उपस्थेन्द्रिय का संयम रखे, वेदादिशास्त्रों को पढ़ते-पढ़ाते रहें। विवाह के पीछे भी ऋतुगामी बने रहें। तब दो प्रकार का वीर्य अर्थात् बल बढ़ता है, एक शरीर का और दूसरा बुद्धि का। उसके बढ़ने से मनुष्य अत्यन्त आनन्द में रहता है।(ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, उपासनाविषय)
7. ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी मद्य, मांस, गन्ध, माला, रस, स्त्री और पुरुष का संग, सब खटाई, प्राणियों की हिंसा, अङ्गों का मर्दन, बिना निमित्त उपस्थेन्द्रिय का स्पर्श, आंखों में अञ्जन, जूतों और छत्रधारण, काम-क्रोध, लोभ-मोह-भय-शोक-ईर्ष्याद्वेष, नाच-गान और बाजा बजाना, द्यूत, जिस किसी की कथा, निन्दा, मिथ्याभाषण, स्त्रियों का दर्शन, आश्रय, दूसरों की हानि आदि कुकर्मों को छोड़ देवें। (सत्यार्थप्रकाश, 3 समुल्लास)
8. जिस पुरुष ने विषय के दोष और वीर्य संरक्षण के गुण जाने हैं, वह विषयासक्त कभी नहीं होता । (सत्यार्थप्रकाश, 5 समुल्लास)
9. सब आश्रमों के मूल, सब उत्तम कर्मों में उत्तम कर्म और सब के मुख्य कारण ब्रह्मचर्य को खण्डित करके महादुःख सागर में कभी नहीं डुबना। (संस्कार विधि, वेदारम्भ संस्कार)
10.आयु वीर्यादि धातुओं की शुद्धि और रक्षा करना तथा युक्तिपूर्वक ही भोजन-वस्त्र आदि का जो धारण करना है, इन अच्छे नियमों से आयु को सदा बढ़ाओ।
(ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, वेदोक्तधर्मविषय)
हमारा सभी का कर्तव्य है कि हम अपने ऋषि के दिव्य वचनों को धारण करके जीवन को पवित्र बनावें।
1. जिसके शरीर में वीर्य नहीं होता, वह नपुंसक, महाकुलक्षणी और जिसको प्रमेह रोग होता है, वह दुर्बल, निस्तेज-निर्बुद्धि और उत्साह-साहस-धैर्य-बल, पराक्रम आदि गुणों से रहित होकर नष्ट हो जाता है। (सत्यार्थप्रकाश, 2 समुल्लास)
2. देखो, जिसके शरीर में सुरक्षित वीर्य रहता है, उसको आरोग्य, बुद्धि, बल और पराक्रम बढ़ कर बहुत सुख की प्राप्ति होती है।
(सत्यार्थप्रकाश, 2 समुल्लास)
3. जो सदा सत्याचार में प्रवृत्त, जितेन्द्रिय और जिनका वीर्य अधःस्खलित कभी न हो उन्हीं का ब्रह्मचर्य सच्चा होता है। (सत्यार्थप्रकाश, 4 समुल्लास)
4. जिस देश में यथायोग्य ब्रह्मचर्य विद्या और वेदोक्त धर्म का प्रचार होता है, वही देश सौभाग्यवान् होता है। (सत्यार्थप्रकाश, 3 समुल्लास)
5. सर्वत्र एकाकी सोवे। वीर्य स्खलित कभी न करें। जो कामना से वीर्य स्खलित कर दे तो जानो कि अपने ब्रह्मचर्य व्रत का नाश कर दिया। (सत्यार्थप्रकाश, 3 समुल्लास)
6. ब्रह्मचर्य सेवन से यह बात होती है कि जब मनुष्य बाल्यावस्था में विवाह न करे, उपस्थेन्द्रिय का संयम रखे, वेदादिशास्त्रों को पढ़ते-पढ़ाते रहें। विवाह के पीछे भी ऋतुगामी बने रहें। तब दो प्रकार का वीर्य अर्थात् बल बढ़ता है, एक शरीर का और दूसरा बुद्धि का। उसके बढ़ने से मनुष्य अत्यन्त आनन्द में रहता है।(ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, उपासनाविषय)
7. ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी मद्य, मांस, गन्ध, माला, रस, स्त्री और पुरुष का संग, सब खटाई, प्राणियों की हिंसा, अङ्गों का मर्दन, बिना निमित्त उपस्थेन्द्रिय का स्पर्श, आंखों में अञ्जन, जूतों और छत्रधारण, काम-क्रोध, लोभ-मोह-भय-शोक-ईर्ष्याद्वेष, नाच-गान और बाजा बजाना, द्यूत, जिस किसी की कथा, निन्दा, मिथ्याभाषण, स्त्रियों का दर्शन, आश्रय, दूसरों की हानि आदि कुकर्मों को छोड़ देवें। (सत्यार्थप्रकाश, 3 समुल्लास)
8. जिस पुरुष ने विषय के दोष और वीर्य संरक्षण के गुण जाने हैं, वह विषयासक्त कभी नहीं होता । (सत्यार्थप्रकाश, 5 समुल्लास)
9. सब आश्रमों के मूल, सब उत्तम कर्मों में उत्तम कर्म और सब के मुख्य कारण ब्रह्मचर्य को खण्डित करके महादुःख सागर में कभी नहीं डुबना। (संस्कार विधि, वेदारम्भ संस्कार)
10.आयु वीर्यादि धातुओं की शुद्धि और रक्षा करना तथा युक्तिपूर्वक ही भोजन-वस्त्र आदि का जो धारण करना है, इन अच्छे नियमों से आयु को सदा बढ़ाओ।
(ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, वेदोक्तधर्मविषय)
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