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आध्यात्मिक उन्नति में सफलता के लिए ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें।
सभी पूरा पढ़ें ध्यान से और जीवन में अपनाएं, समाज के कल्याण हेतु आगे अन्य लोगों को भी भेजें।
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Forwarded from Vaidic Kranti (Nishchal)
ऋषि दयानन्द के उपकार को कभी न भूलें
किसी को भी प्रतिक्रियावादी नहीं बनना चाहिए। आर्य समाज अब तक वेद आदि शास्त्रों के शुद्ध, पूर्ण एवं वैज्ञानिक स्वरूप को प्रस्तुत नहीं कर पाया तथा आर्य विद्वानों से भी कुछ भूल हो गई। इसका अर्थ यह नहीं है कि आर्य समाज का इस देश पर कोई ऋण नहीं है। प्रत्येक भारतीय महर्षि दयानन्द एवं आर्य समाज का ऋणी है। यदि आर्य समाज न होता, तो देश कभी स्वतन्त्र नहीं होता और समाज भी बहुत दुःखद स्थिति में होता। हम लोग मुसलमान अथवा ईसाई बन चुके होते। जो भी आज वेद, सनातन एवं हिन्दुओं की बात करते हैं, वह यह कभी नहीं कर पाते। इसलिए हमें सदैव ऋषि दयानन्द और आर्य समाज का उपकार मानना चाहिए। यही धर्म है, क्योंकि किए हुए का उपकार न मानना बहुत बड़ा पाप है। जो विद्वानों से भूल हो गई है, उसे मैं सुधारने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं केवल आर्य समाज ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण सनातन समाज एवं मानवता की वैदिक विज्ञान के द्वारा रक्षा करने को कृत्यसंकल्प हूँ।
मैंने भगवान श्रीराम से सीखा है कि कोई भी यदि हमारा थोड़ा भी उपकार कर दे, तो उसे सदैव याद रखना चाहिए तथा यदि कोई कुछ हानि कर दे, उसे भूलना चाहिए। इसके साथ ही यदि हम कोई उपकार करें, तो उसे भी भूलना चाहिए। आर्य समाज एवं भगवान महर्षि ब्रह्मा से लेकर स्वामी दयानन्द पर्यन्त ऋषियों के बहुत ऋणी हैं। इसलिए जिससे जो हो सके, वेद एवं सनातन धर्म की रक्षा का एवं विशुद्ध मानवता की स्थापना का प्रयास कर्तव्य-भाव से करते रहना चाहिए। यही एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए, न कि व्यर्थ किसी की निन्दा प्रतिशोधवश करनी चाहिए। आशा है, सभी इस धर्म का पालन करेंगे।
हमें यह अवश्य देखना चाहिए कि इस समय देश और विश्व में क्या-क्या अनर्थ हो रहा है। उनमें से जो बड़ा अनर्थ हो रहा हो, उसे रोकने के लिए पहले प्रयत्न करना चाहिए। जो भी लोग विचारधारा से अधिकतम निकट हैं, उनके साथ मिलकर ही चर्चा करनी चाहिए, न कि सोशल मीडिया के द्वारा। सोशल मीडिया एक दुधारी तलवार है, इसलिए इसका उपयोग सोच-विचार कर ही करना चाहिए। विद्वानों को भी अपने हठ छोड़कर सत्य को ग्रहण करने के लिए किसी से भी संवाद करने के लिए तत्पर रहना चाहिए, अन्यथा उनकी विद्या अविद्या का ही रूप होगी।
–आचार्य अग्निव्रत
किसी को भी प्रतिक्रियावादी नहीं बनना चाहिए। आर्य समाज अब तक वेद आदि शास्त्रों के शुद्ध, पूर्ण एवं वैज्ञानिक स्वरूप को प्रस्तुत नहीं कर पाया तथा आर्य विद्वानों से भी कुछ भूल हो गई। इसका अर्थ यह नहीं है कि आर्य समाज का इस देश पर कोई ऋण नहीं है। प्रत्येक भारतीय महर्षि दयानन्द एवं आर्य समाज का ऋणी है। यदि आर्य समाज न होता, तो देश कभी स्वतन्त्र नहीं होता और समाज भी बहुत दुःखद स्थिति में होता। हम लोग मुसलमान अथवा ईसाई बन चुके होते। जो भी आज वेद, सनातन एवं हिन्दुओं की बात करते हैं, वह यह कभी नहीं कर पाते। इसलिए हमें सदैव ऋषि दयानन्द और आर्य समाज का उपकार मानना चाहिए। यही धर्म है, क्योंकि किए हुए का उपकार न मानना बहुत बड़ा पाप है। जो विद्वानों से भूल हो गई है, उसे मैं सुधारने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं केवल आर्य समाज ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण सनातन समाज एवं मानवता की वैदिक विज्ञान के द्वारा रक्षा करने को कृत्यसंकल्प हूँ।
मैंने भगवान श्रीराम से सीखा है कि कोई भी यदि हमारा थोड़ा भी उपकार कर दे, तो उसे सदैव याद रखना चाहिए तथा यदि कोई कुछ हानि कर दे, उसे भूलना चाहिए। इसके साथ ही यदि हम कोई उपकार करें, तो उसे भी भूलना चाहिए। आर्य समाज एवं भगवान महर्षि ब्रह्मा से लेकर स्वामी दयानन्द पर्यन्त ऋषियों के बहुत ऋणी हैं। इसलिए जिससे जो हो सके, वेद एवं सनातन धर्म की रक्षा का एवं विशुद्ध मानवता की स्थापना का प्रयास कर्तव्य-भाव से करते रहना चाहिए। यही एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए, न कि व्यर्थ किसी की निन्दा प्रतिशोधवश करनी चाहिए। आशा है, सभी इस धर्म का पालन करेंगे।
हमें यह अवश्य देखना चाहिए कि इस समय देश और विश्व में क्या-क्या अनर्थ हो रहा है। उनमें से जो बड़ा अनर्थ हो रहा हो, उसे रोकने के लिए पहले प्रयत्न करना चाहिए। जो भी लोग विचारधारा से अधिकतम निकट हैं, उनके साथ मिलकर ही चर्चा करनी चाहिए, न कि सोशल मीडिया के द्वारा। सोशल मीडिया एक दुधारी तलवार है, इसलिए इसका उपयोग सोच-विचार कर ही करना चाहिए। विद्वानों को भी अपने हठ छोड़कर सत्य को ग्रहण करने के लिए किसी से भी संवाद करने के लिए तत्पर रहना चाहिए, अन्यथा उनकी विद्या अविद्या का ही रूप होगी।
–आचार्य अग्निव्रत
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Forwarded from गृहस्थ जीवन
आदर्श पति-पत्नी
पत्नी पति के लिए मन से गुण कीर्तन करने वाली तथा पति पत्नी के लिए मन से गुण कीर्तन करने वाला होना चाहिए और दोनों श्रेष्ठ गुण कर्म स्वभाव वाले होने चाहिए।
पत्नी ससुर आदि के लिए, पति के लिए, गृहस्थ संबंधियों के लिए और सब प्रजा के लिए सुख देने वाली और इनके पोषण के लिए तत्पर रहने वाली होनी चाहिए। वह दोष और शोक आदि से पृथक् रहने वाली होनी चाहिए। गृह कार्यों में चतुर और प्रसन्नता से घर के कार्यों को करने में तत्पर रहने वाली होनी चाहिए।
(महर्षिदयानंदकृत संस्कार विधि)
पत्नी पति के लिए मन से गुण कीर्तन करने वाली तथा पति पत्नी के लिए मन से गुण कीर्तन करने वाला होना चाहिए और दोनों श्रेष्ठ गुण कर्म स्वभाव वाले होने चाहिए।
पत्नी ससुर आदि के लिए, पति के लिए, गृहस्थ संबंधियों के लिए और सब प्रजा के लिए सुख देने वाली और इनके पोषण के लिए तत्पर रहने वाली होनी चाहिए। वह दोष और शोक आदि से पृथक् रहने वाली होनी चाहिए। गृह कार्यों में चतुर और प्रसन्नता से घर के कार्यों को करने में तत्पर रहने वाली होनी चाहिए।
(महर्षिदयानंदकृत संस्कार विधि)
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